Friday, September 20, 2019

अर्थव्यवस्था को घी पिलाना


देसी घी ताकत देता। हम सब यह मानते हैं।
मगर जब पहला हार्ट अटैक आ चुका हो तो निढाल पड़े मरीज को घी नहीं पिलाते।

पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही की विकास दर 8% थी, इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में तमाम अनुकूलताओं के बावजूद विकास दर मात्र 5% रह जाना अर्थव्यवस्था के लिए एक हार्ट अटैक ही था।

जब से यह हार्ट अटैक आया है, सरकार बिना मर्ज को समझे उद्योगों को नित नई राहत और पैकेज के रूप में घी पर घी पिलाए जा रही है, मगर इससे हालात सुधरने की कोई संभावना नहीं दिखती। उल्टा इसके नतीजे गंभीर हो सकते हैं।

देश के सभी प्रमुख अर्थशास्त्री और कई उद्यमी भी लगातार कह रहे हैं कि सरकार को पैकेज देने की जरूरत नहीं है, सरकार सिर्फ बाजार में मांग बढा़ने के उपाय करे।

जो उद्यमी ऐसे समय में भी सरकार से पैकेज मांग रहे हैं, वे सिर्फ लालची हैं।


पैकेज देने से उद्योगों के लिए पूंजी की तरलता तो बढ़ेगी मगर इससे मांग भी बढ़ेगी, ऐसा कोई संबंध नहीं है। मांग बढ़ाने के लिए सरकार को बिल्कुल इतर उपाय करने होंगे।

सरकार ने क्या किया है इसे ट्रेडमिल पर दौड़ रहे व्यक्ति के उदाहरण से समझते हैं-

मान लीजिए कि ट्रेडमिल पर खड़ा व्यक्ति देश की अर्थव्यवस्था है। ट्रेडमिल के रनिंग ट्रेक या पहिए की गति ही मांग है। दौड़ने वाले पांव उद्योग हैं। सहारा देने वाले हत्थे ही सर्विस सेक्टर और कृषि क्षेत्र है। ट्रेडमिल बहुत ही धीमे धीमे चल रही है। नतीजतन अर्थव्यवस्था ने दौड़ना बंद कर दिया है और वह धीमे धीमे ही चल पा रही है।

ऐसे में अर्थव्यवस्था की गति बढ़ाने के लिए अब सरकार को क्या करना चाहिए?

जाहिर है कि ट्रेडमिल की गति बढ़ानी चाहिए अर्थात मांग बढ़ानी चाहिए। बाजार में मांग होगी तो उद्यमी उत्पादन बढ़ाएंगे, इस तरह उत्पादन के साथ विकास दर भी बढ़ेगी।

मगर सरकार कर क्या रही है?

सरकार पैकेज और राहत लेकर तरलता बढ़ा रही है, यानी वह ट्रेडमिल पर खड़ी अर्थव्यवस्था के जूतों में तेल और ग्रीस लगा रही है। सरकार न्यूटन के नियम पर काम कर रही है उसे लगता है कि घर्षण कम होगा तो अर्थव्यवस्था तेजी से दौड़ेगी।

मगर क्या इससेे अर्थव्यवस्था तेजी से दौड़ने लगेगी? नहीं। इससे खड़े खड़े ही फिसलने का खतरा है।

अगर बाजार में मांग ही नहीं हो तो तरलता बढ़ाने का उपाय बेकार है। इससे पैसा और तेजी से बाहर जाएगा।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को उद्योगो को 1लाख 45 हजार करोड़ की राहत देने की घोषणा की। तत्काल शेयर बाजार 900 अंक उछल गया। अगर बाजार में मांग नहीं है तो यह उछाल दूध के उफान जैसा है। विदेशी निवेशक इस उफान से मलाई उतारकर जल्द ही निकल लेंगे। आने वाले सप्ताह में गिरते बाजार के रूप में यह नजारा दिख सकता है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि विदेशी निवेशक इस उछले हुए बाजार से दोनों हाथ भरकर खुश होकर निकलें।

जो अर्थव्यवस्था को चाहिए था वह सरकार ने नहीं किया। सरकार ने वह किया है जो एक समझदार सरकार को इस परिस्थिति में बिल्कुल नहीं करना चाहिए था।



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