Tuesday, September 24, 2019

जंगल में मोरनी रुदन करै


जिन नेताओं की नजर किसान की जमीन और जंगल हड़पने पर रहती है, वे पर्यावरण पर अच्छा भाषण भी दे देते हैं। मुंबई में आरे के जंगल के 2700 पेड़ काटने की मंजूरी देने वालों को भी संयुक्त राष्ट्र में पर्यावरण पर बोलने के अवसर मिल जाता है, और वहां बोलने वाले सब ऐसे ही राष्ट्र अध्यक्ष हैं। दुनिया में पर्यावरण को बचाने के लिए हो रहे प्रयासों का यही दुर्भाग्य है।

अगर मेट्रो कारशेड के लिए जंगल, किसान और आदीवासियों की जमीन का अधिग्रहण किया जा सकता है तो फिर एंटीलिया और फिल्मी सितारों के बंगलों का क्यों नहीं? क्या देश के विकास के लिए घर और जमीन का बलिदान सिर्फ किसानों और आदिवासियों को ही करना चाहिए?

दुनिया के पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान किसने पहुंचाया है? क्या किसानों और आदिवासियों ने? या उद्योगपतियों के लालच ने।

मानव सभ्यता ने जब से आग जलाना सीखा, तब से ही वह लकड़ी और लकड़ी के कोयले और कोयले का इस्तेमाल कर रहा है। कार्बन उत्सर्जन कर रहा है।

यह तब नुकसानदेह नहीं था, बल्कि पर्यावरण संतुलन और वायुमंडल में ऑक्सीजन तथा कार्बनडाइऑक्साइड का संतुलन बनाए रखने में अहम था। भू-भाग पर विशाल जंगल थे जो जीवों की जरूरत से ज्यादा ऑक्सीजन बनाते थे। दहन इस अतिरेक को संतुलित करता था।

पाषाण युग बीतते बीतते मानव ने खेती शुरू कर दी। जंगलों को साफ कर उस जमीन का इस्तेमाल भी किया मगर इससे भी फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि इंसान जंगल की जगह उस जमीन पर घनी फसल उगाने लगा था। ऑक्सीजन उत्सर्जन में इससे कोई बड़ी कमी नहीं आई।

फर्क पड़ना शुरू हुआ अठाहरवीं शताब्दी में, जब यूरोप में औद्योगिक क्रांति शुरू हुई। जंगलों और कोयले का पूरी दुनिया में दोहन शुरू हुआ।

ऊर्जा ही शक्ति है। मगर दो सदी तक ऐसा नहीं हुआ। जिनके पास जंगल और कोयले के भंडार थे और प्रर्यावरण संरक्षक थे, वे सभी देश गुलाम बना लिए गये।

बीसवीं सदी में गुलामी और पर्यावरण के खिलाफ हुई औद्योगिक क्रांति के नतीजे सामने आने लगे। तब मानवता और पर्यावरण की चिंता शुरू हुई।

मगर पर्यावरण की आड़ में भी महाशक्तियों ने अपना खेल खेला। अगर पर्यावरण की चिंता होती तो पेट्रोलियम ईंधन को प्रतिबंधित किया जाता न कि पारंपरिक ईंधन को।

पेट्रोलियम के तरल और गैस दोनों ही ईंधन मीथेन जैसे हाइड्रोकार्बन और हैलोजेन गैसों का उत्सर्जन करते हैं जो पर्यावरण के लिए कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन से 84 गुणा अधिक हानिकारक है।

कार्बन उत्सर्जन को तो प्रकृति खुद बरसात से नीचे ले आती है मगर फ्लोरीन समूह की हैलोजेन गैसें और क्लोरो-फ्लोरो कार्बन सीधे ओजोन परत में छेद करते हैं और उसे खत्म करते हैं। कार्बन उत्सर्जन से अस्थमा जैसी बीमारियां हो सकती हैं मगर हाइड्रोकार्बन और हैलोजेन गैसें तो कैंसर की जनक हैं।

जब आप रसोई गैस जलाते हैं तो जलने से पहले जो आपको गंध आती है वह हवा में मीथेन, ईथेन, प्रोपेन और ब्यूटेन का लीक हुआ एक मिक्सचर होता है। जल्द ही आप इस गंध के लिए सहज हो जाते हैं। मगर इन गैसों का हर घर से रोज अल्पमात्रा में भी पर्यावरण में मिलना कितना ख़तरनाक है? इसकी चर्चा संयुक्त राष्ट्र अगली सदी में करेगा। फिलहाल वह 18वीं सदी की यूरोप की गलतियों के लिए गरीब देशों पर कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए दबाव बना रहा है ताकि वे अमेरिकी कंपनियों से बड़े पैमाने पर प्राकृतिक गैस और कचरे तेल का आयात करें। यही अमेरिका और साऊदी अरब की स्थाई दोस्ती का राज है।

Friday, September 20, 2019

अर्थव्यवस्था को घी पिलाना


देसी घी ताकत देता। हम सब यह मानते हैं।
मगर जब पहला हार्ट अटैक आ चुका हो तो निढाल पड़े मरीज को घी नहीं पिलाते।

पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही की विकास दर 8% थी, इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में तमाम अनुकूलताओं के बावजूद विकास दर मात्र 5% रह जाना अर्थव्यवस्था के लिए एक हार्ट अटैक ही था।

जब से यह हार्ट अटैक आया है, सरकार बिना मर्ज को समझे उद्योगों को नित नई राहत और पैकेज के रूप में घी पर घी पिलाए जा रही है, मगर इससे हालात सुधरने की कोई संभावना नहीं दिखती। उल्टा इसके नतीजे गंभीर हो सकते हैं।

देश के सभी प्रमुख अर्थशास्त्री और कई उद्यमी भी लगातार कह रहे हैं कि सरकार को पैकेज देने की जरूरत नहीं है, सरकार सिर्फ बाजार में मांग बढा़ने के उपाय करे।

जो उद्यमी ऐसे समय में भी सरकार से पैकेज मांग रहे हैं, वे सिर्फ लालची हैं।


पैकेज देने से उद्योगों के लिए पूंजी की तरलता तो बढ़ेगी मगर इससे मांग भी बढ़ेगी, ऐसा कोई संबंध नहीं है। मांग बढ़ाने के लिए सरकार को बिल्कुल इतर उपाय करने होंगे।

सरकार ने क्या किया है इसे ट्रेडमिल पर दौड़ रहे व्यक्ति के उदाहरण से समझते हैं-

मान लीजिए कि ट्रेडमिल पर खड़ा व्यक्ति देश की अर्थव्यवस्था है। ट्रेडमिल के रनिंग ट्रेक या पहिए की गति ही मांग है। दौड़ने वाले पांव उद्योग हैं। सहारा देने वाले हत्थे ही सर्विस सेक्टर और कृषि क्षेत्र है। ट्रेडमिल बहुत ही धीमे धीमे चल रही है। नतीजतन अर्थव्यवस्था ने दौड़ना बंद कर दिया है और वह धीमे धीमे ही चल पा रही है।

ऐसे में अर्थव्यवस्था की गति बढ़ाने के लिए अब सरकार को क्या करना चाहिए?

जाहिर है कि ट्रेडमिल की गति बढ़ानी चाहिए अर्थात मांग बढ़ानी चाहिए। बाजार में मांग होगी तो उद्यमी उत्पादन बढ़ाएंगे, इस तरह उत्पादन के साथ विकास दर भी बढ़ेगी।

मगर सरकार कर क्या रही है?

सरकार पैकेज और राहत लेकर तरलता बढ़ा रही है, यानी वह ट्रेडमिल पर खड़ी अर्थव्यवस्था के जूतों में तेल और ग्रीस लगा रही है। सरकार न्यूटन के नियम पर काम कर रही है उसे लगता है कि घर्षण कम होगा तो अर्थव्यवस्था तेजी से दौड़ेगी।

मगर क्या इससेे अर्थव्यवस्था तेजी से दौड़ने लगेगी? नहीं। इससे खड़े खड़े ही फिसलने का खतरा है।

अगर बाजार में मांग ही नहीं हो तो तरलता बढ़ाने का उपाय बेकार है। इससे पैसा और तेजी से बाहर जाएगा।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को उद्योगो को 1लाख 45 हजार करोड़ की राहत देने की घोषणा की। तत्काल शेयर बाजार 900 अंक उछल गया। अगर बाजार में मांग नहीं है तो यह उछाल दूध के उफान जैसा है। विदेशी निवेशक इस उफान से मलाई उतारकर जल्द ही निकल लेंगे। आने वाले सप्ताह में गिरते बाजार के रूप में यह नजारा दिख सकता है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि विदेशी निवेशक इस उछले हुए बाजार से दोनों हाथ भरकर खुश होकर निकलें।

जो अर्थव्यवस्था को चाहिए था वह सरकार ने नहीं किया। सरकार ने वह किया है जो एक समझदार सरकार को इस परिस्थिति में बिल्कुल नहीं करना चाहिए था।



Tuesday, September 17, 2019

एक ही आदमी बचा सकता है मंदी से


वित्तमंत्रालय से लेकर RBI तक लगता है सब थैलियां सिलने में ही लगे हैं। शक्तिकांत साहब पहली तिमाही के डाटा पर अब चौंक रहे हैं।

आफिस में बैठकर ठीक से डाटा अध्ययन करते तो अप्रैल मई और जून में ही चौंक चौंक कर आंखें और अक्ल इतनी चौड़ी हो गई होती कि ढंग के नीतिगत उपाय करते। अभी जो स्थिति है उसमें दूसरी तिमाही और बुरी तरह चौंकाने वाली है। विकास दर 4 फीसदी रह जाए तो चौंकना मत।

अगर कोई अर्थशास्त्री होता तो अप्रैल में ही चौंक गया होता। इतिहास का छात्र है, इसलिए चीज के इतिहास हो जाने के बाद ही चौंकता है।

शक्तिकांत के देर से चौंकने के लिए आप उसे दोष न दें, बल्कि देश उस व्यक्ति की अक्ल से तत्काल सावधान हो जाए जिसने देश के प्रख्यात अर्थशास्त्रियों की उपेक्षा कर एक इतिहास पढ़ने वाले को RBI का खजाना सौंप दिया।

साहब और शक्तिकांत दोनों का अर्थशास्त्र एक जैसा है। त्राहि त्राहि करता बाजार कहता है कि उपाय करिए तो वह रेपो रेट थोड़ा और कम कर देते हैं। उपाय के नाम पर बस यही आता है। ऐसे इतिहासकार अगर घटा घटाकर रेपो रेट शून्य पर भी ले जाएं और पूरी अर्थव्यवस्था को ही इतिहास कर दें तो भी चौंकना मत।

बाजार डिमांड बढ़ाने के उपाय करने को कहता है तो जनाब लिक्विडिटी बढ़ाने के उपाय करने लगते हैं। लिक्विडिटी बढ़ाने का फायदा तो तब है जब बाजार में मांग हो।

मांग कैसे बढ़े? 1930 के बाद पहली बार देश में यह सवाल खड़ा हुआ है। भगवान की दया से इतनी आबादी है कि कभी मांग का संकट नहीं रहा, हमेशा मुद्रास्फीति ही काटने को दौड़ती रही अर्थात मांग तो आपूर्ति से ज्यादा बनी रही। मगर अब मांग ही नहीं है।

अब मांग क्यों सूख गई? जनता की क्रयशक्ति किसने छीनी ली? कौन है जो नौकरियों पर कुंडली मारकर बैठा है? भर्तियां कर नहीं रहा है, लोगों के रोजगार छीनने के रोज नये उपाय कर रहा है? गरीब और मध्यम वर्ग को निचौड़ रहा है?

जब तक इन सवालों को नहीं टटोलेंगे इस मंदी का समाधान मिलने वाला नहीं।

Sunday, September 15, 2019

यह गलती ले डूबी विक्रम को


चंद्रयान-2 का लैंडर विक्रम लैंडिंग के दौरान कैसे चकमा खा गया? इसका राज लैंडिंग के दौरान का उसका डाटा खोलता है।

इस डाटा से जो तस्वीर बनती है वह कुछ इस तरह है।

विक्रम अॉटो लैंडिंग कर रहा था और वर्टिकल दूरी तथा गति का डाटा इसरो के नियंत्रण कक्ष तक भी आ रहा था। मगर क्या यह डाटा रियल टाइम और रियल था?

असल में यह डाटा विक्रम के कंप्यूटर में पहले से फीड 15 मिनट के लैंडिंग प्रोग्राम का डाटा था। इसी फीड प्रोग्राम के मुताबिक विक्रम को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरना था और वह इसी के अनुरूप उतर रहा था, लैंडिंग प्रक्रिया के दौरान इसमें कोई बदलाव संभव भी नहीं था।

अगर इस प्रोग्राम में फीड वर्टिकल दूरी से वास्तविक दूरी चार किलोमीटर से ज्यादा कम निकले तो सोचिए क्या हुआ होगा?

जब विक्रम के कंप्यूटर का आखिरी डाटा उसे चांद की सतह से 2.1 किलोमीटर ऊपर दिखा रहा था, क्या तब वह वास्तव में चांद की सतह पर था? नतीजा तो यही बताता है।

इस डाटा के मुताबिक विक्रम की गति तब 48 मीटर प्रति सैकेंड यानी 173 किलोमीटर प्रति घंटे के करीब थी। 1471 किलो का विक्रम जब इस गति से चांद की सतह से टकराया तो साबुत कैसे बच गया? यह धरती पर 245 किलो वजन की चीज की 173 किमी/घंटा की गति पर टक्कर के बराबर था।

इस लिहाज से विक्रम काफी नाजुक था। विक्रम को इस तरह बनाया गया था कि वह चांद की सतह पर अधिकतम 2 मीटर प्रति सैकेंड की गति अर्थात 7.2 किमी/घंटा पर लैंडिंग में ही सुरक्षित था? तब यह सतह पर साबुत कैसे मिला?

आर्बिटर से मिली थर्मल इमेज के हवाले से इसरो इसकी पुष्टि कर चुका है लैंडर चांद की सतह पर साबुत और तिरछा पड़ा है।

इससे दो सवाल पैदा होते हैं-

अगर तेज गति से क्रेश लैंडिंग थी तो विक्रम साबुत कैसे हैं?

अगर विक्रम साबुत है तो संपर्क क्यों टूट गया?

इसका जवाब यहां छुपा है।

यह तय है कि विक्रम अगर साबुत है तो लैंडिंग प्रक्रिया के अनुरूप इंजन और थ्रस्टर चलते रहे होंगे और ये प्रक्रिया पूरे 15 मिनट ही चली होगी। जबकि 11वें मिनट के बाद हमारा उससे संपर्क टूट गया था।

अब हम लैंडिंग को दसवें मिनट से लेते हैं-

रफ ब्रेकिंग चरण के दस मिनट बीत चुके हैं विक्रम का डाटा वर्टिकल ऊंचाई पांच किलोमीटर बता रहा है मगर वास्तव में यह सतह से कुछ सौ मीटर ऊपर ही रह गया है। गति इतनी है कि सतह से टकराते ही विक्रम के टुकड़े हो जाएं मगर तभी फाइन ब्रेकिंग के लिए थ्रस्टर ऑन हुए। रफ ब्रेकिंग के दौरान जो विक्रम क्षैतिज अवस्था में नीचे आ रहा था सीधा हो गया।

विक्रम के सीधा होते ही थ्रस्टर्स और 800 न्यूटन के चार तरल ईंधन इंजनों ने इतना बल पैदा किया कि इसे सतह से टकराने नहीं दिया मगर थ्रस्टर और इंजनों से सतह पर मौजूद धूल बड़ी मात्रा में उड़ी और विक्रम को ढंक लिया, इस धूल की वजह से विक्रम का संपर्क टूट गया मगर अंदर कंप्युटर सुरक्षित था और लैंडिंग प्रोग्राम पूरे तय 15 मिनट चला। यह दृश्य एक फंसी हुई आतिशबाजी की तरह था। इंजन और थ्रस्टर जब बंद हुए तो यह एक तरफ लुढ़क गया।

Thursday, September 12, 2019

ट्रैफिक सुधार के लिए चंडीगढ़ मॉडल


ज्यादातर शहरों में हमारे पास ट्रेफिक का ऐसा गुजरात मॉडल है

चंडीगढ़ देश के उन गिने-चुने शहरों में है जहां लोग ट्रैफिक नियमों का सबसे ज्यादा पालन करते हैं। ऐसा अब शुरू नहीं हुआ है वर्षो से है। जाहिर है कि वहां नियम पालन की वजह भारी-भरकम जुर्माना नहीं है। जब जुर्माना कम था तब भी अधिकांश लोग नियमों का पालन करते थे, यहां तक कि रात में हाईबीम पर गाड़ी भी नहीं चलाते।

जो भक्त ये मान रहे हैं कि सिर्फ जुर्माना बढ़ाने से ही नियमों का पालन हो सकता है, उन भक्तों की बुद्धि पर और ऐसे नियम बनाने वाले नेताओं की कमअकली पर सिर्फ तरस खाया जाना चाहिए।

चंडीगढ़ में भी पांच दस फीसदी ऐसे गुंडा मवाली तत्त्व हैं जो बुलेट से पटाखे छोड़ते हैं, हेलमेट नहीं लगाते, उन्हें हर ट्रेफिक नियम तोड़ने में मजा आता है और आसानी से पकड़ में नहीं आते। जुर्माना कितना भी बढ़ जाए वे नहीं रुक सकते।

मगर वहां अधिकांश लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करते हैं तो इसकी वजह क्या है? भारी-भरकम जुर्माना इसकी वजह नहीं है। जो कम जुर्माना राशि पहले थी, लोग उस पर भी पालन कर रहे थे।

अतः वजह जुर्माना नहीं बल्कि वहां मौजूद नियमित जांच की एक आदर्श व्यवस्था है। पुलिस के पास पर्याप्त स्टाफ है जो नियमित जांच करता है। हर चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल हैं। जैब्रा लाइन्स हैं। ट्रैफिक पुलिसकर्मी हैं।

दूसरी ओर अन्य राज्यों और शहरों में जहां पुलिस स्टाफ जरूरत से बेहद कम है, ट्रैफिक जांच महीने में एकाध बार होने वाला कमाई उत्सव ही है। इसलिए वहां के लोग ट्रैफिक नियमों के प्रति कभी जागरूक नहीं हो पाये।

अब जैसे लोग, उन्हें वैसी ही सरकार भी मिल गई। एक ऐसी सरकार जो चंडीगढ़ जैसी मौजूद आदर्श व्यवस्था को छोड़कर दक्षिण भारतीय फिल्मों से प्रेरणा लेकर नये ट्रैफिक जुर्माना नियम बनाती है, जिसका एक ही जानवर सिद्धांत है कि लोगों के चेहरे पर डर दिखना चाहिए।

अगर सरकार सचमुच चाहती है कि पूरे देश में ट्रैफिक नियमों का सही से पालन हो तो हर शहर और हाइवे टोल प्लाजा के पास नियमित जांच व्यवस्था हो। ट्रैफिक सिग्नल हों और पार्किंग की समुचित व्यवस्था उसे तत्काल करनी चाहिए।

जुर्माना राशि भले न्यूनतम हो मगर यह सुनिश्चित हो कि ज़ो रोज गलती करेगा, उसका रोज चालान होगा। वह बच नहीं सकता। छह चालान के बाद लाइसेंस रद्द हो जाएगा। विकसित देशों में जहां ट्रैफिक नियमों का पालन अच्छे से होता है तो उसकी एक ही वजह है, प्रर्याप्त और नियमित जांच व्यवस्था।

दुनिया में देशों की नीतियां विद्वानों की समितियां समुचित अध्ययन के बाद तैयार करती हैं। मगर हमारे यहां तो यह फिल्म देखकर भी तय हो सकती है।

कोई नई दवा भी तैयार होती है तो ऐलोपेथी में उसके परीक्षण की एक लंबी प्रक्रिया के बाद उसे इंसान पर इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही संभावित साइड इफेक्ट्स की सूची भी रिसर्च के दौरान ही तैयार की जाती है।

दूसरी ओर आयुर्वेद में घातक स्टीरायड युक्त शिवलिंगी, हाइली एल्काइड (घातक क्षारीय)आक और किडनी को ध्वस्त करने में सक्षम भारी तत्वों पारा और सोने की भस्म भी बिना किसी परीक्षण सीधे इंसान को खिला दी जाती है, ऊपर से यह भी दावा किया जाता है कि इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता।

भारी-भरकम जुर्माना भी लोगों को पारे की भस्म खिलाने जैसा ही इलाज है। इस इलाज के साइड इफेक्ट्स छुपे नहीं हैं और इससे कोई सुधार होगा लगता नहीं। क्या अब बुलेट के पटाखों की आवाज कम हो गई है? नहीं।

हां शरीफ लोगों के चेहरे पर डर जरूर है। कुछ शरीफ लोग अपनी गाड़ी से चलना कम कर देंगे। बहुत से ड्राइवरों की नौकरी जाएगी। कोई मालिक नहीं चाहेगा कि वह अपने ड्राइवर की एक गलती का इतना जुर्माना चुकाये जो उसकी मासिक सेलरी से भी ज्यादा है।

Wednesday, September 11, 2019

मुर्दा होती कौम


1919 की तुलना में 2019 का समाज एकदम मुर्दा समाज है।

1919 में जब दमनकारी रोलेट एक्ट लागू किया गया तो विरोध में समाज उठ खड़ा हुआ। अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा।

ऐसा नहीं है कि भक्त तब नहीं थे। तब भी अंग्रेजों के भक्त समाज में भरे पड़े थे। वे भी रोलेट एक्ट के फायदे गिनाते थे। मगर तब का समाज जिंदा समाज था और लोग इतने समझदार थे कि दमनकारी और पालनकारी नीति का अंतर बखूबी समझ लेते थे।

सास-बहू और नाग-नागिन देखकर बड़ी हुई इस पीढ़ी में वह समझ नहीं दिखती।

गुजरात की राज्य सरकार ने मोटर व्हीकल एक्ट के नये जुर्माना नियमों को लागू करने से इनकार कर दिया है। गुजरात के लोगों को यह छूट मिलनी भी चाहिए। रोलेट एक्ट के प्रावधान अंग्रेजों पर लागू नहीं थे। सिर्फ उन्हें ही अव्वल और विश्वसनीय नागरिक माना गया था। बाकी देशवासी दोयम दर्जे के नागरिक थे।

मुर्दा कौम से ही सरकारें मनमाने जुर्माने वसूल सकती हैं। जिंदा कौमें तो नमक पर भी टैक्स देने से इन्कार कर देती हैं। गांधी का सत्याग्रह यही सिखाता है। कानून पहले भी था, जुर्माना पहले भी था मगर ऐसा मनमाना और दमनकारी नहीं था, जिसकी जद में आटो और ट्रक चालकों की रोजी-रोटी भी आ जाए।

Tuesday, September 10, 2019

7 दिन के हिसाब में छुपा है लैंडर विक्रम का दुर्भाग्य



चंद्रयान-2 की लांचिंग पहले 15 जुलाई को होनी थी और विक्रम की लैंडिंग 7 सितंबर को। मगर लांचिंग ऐन मौके पर रोकनी पड़ी। सफल लांचिंग सावन के पहले सोमवार 22 जुलाई को हुई मगर लैंडिंग का समय नहीं बदला जा सकता था, क्योंकि 7 सितंबर को ही उस हिस्से में दिन होना था जहां लैंडिंग प्रस्तावित थी।


इससे कुछ सवाल उठते हैं।

चंद्रयान-2 मिशन के पूर्व शेड्यूल टाइम में 7 दिन की कटौती क्या लैंडर विक्रम को भारी पड़ी?

क्या सात दिन की भरपाई के लिए चांद के कक्षा क्षेत्र में चंद्रयान को कम समय दिया गया? क्या इस वजह से लैंडर विक्रम लैंडिंग से पहले अपनी गति तय प्रोग्राम के अनुरूप कम नहीं कर सका?

15 जुलाई को जो पहला लांचिंग शेड्यूल प्रस्तावित था वह 54 दिन का था। यानी 54वें दिन लैंडिंग होनी थी। उसके मुताबिक चंद्रयान को चंद्रमा की कक्षाओं में अपने घटनाक्रम पूरे करने के लिए कुल 32 दिन मिलने थे। मगर नये शेड्यूल में उसे इस सारे काम के लिए 20 अगस्त से 7 सितंबर तक सिर्फ 18 दिन ही मिले यानी पूरे 12 दिन कम।

दूसरी ओर धरती की कक्षाओं में यान ने 6 दिन का ज्यादा समय लिया। पहले शेड्यूल में इसे 17 दिन में पृथ्वी की कक्षाओं में अपने घटनाक्रम पूरे करने थे मगर नये शेड्यूल में उसे 22 जुलाई से 14 अगस्त तक कुल 23 दिन लगे।

यहां यह भी समझना जरूरी है कि जब चंद्रयान-2 धरती की कक्षाएं बदल रहा था तो उसकी गति लगातार तेज हो रही थी, वहीं चंद्रमा पर छोटी कक्षाओं में जाते हुए गति धीमी होती गई।

अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की टीम के साथ कार्यक्रम की कवरेज करने वाले नेशनल ज्योग्राफिक के हवाले से न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि लैंडिंग से पहले जब फाइन ब्रेकिंग चरण शुरू हुआ तो विक्रम की गति निर्धारित गति से ज्यादा थी। करता उसे गति कम करने का प्रर्याप्त समय नहीं मिला।

इसरो की ओर से 4 अगस्त को विक्रम के 35 किमी x101 किमी की कक्षा में आ जाने की जानकारी दी गई। यानी इस कक्षा में न्यूनतम बिंदु पर भी चांद की सतह से ऊंचाई 35 किमी होनी थी। इसी कक्षा से लैंडिंग हुई।

मगर शनिवार तड़के 1:38 बजे लैंडिंग शुरू होते ही विक्रम से जो डाटा मिला उसमें विक्रम की चांद की सतह से ऊंचाई 30 किलोमीटर से कुछ ही ज्यादा थी।

इसरो सारे डाटा की जांच कर रहा है। इसकी भी जांच होगी कि क्या चांद के स्पेस में विक्रम को पर्याप्त समय नहीं मिला?

अब चलतें है फ्लैशबैक में

15 जुलाई को सभी तैयारियां पूरी थीं। उलटी गिनती चालू थी। राष्ट्रपति लांचिंग देखने के लिए बेंगलुरु में थे। जीएसएलवी मार्क-3 राकेट से लांचिंग तड़के 2 :52 बजे होनी थी। सीधा प्रसारण शुरू था। मगर 55 मिनट पहले ही लांचिंग रोक दी गई। तीन दिन बाद 18 जुलाई को इसरो ने आधिकारिक रूप से सिर्फ इतना ही बताया कि कोई तकनीकी रोड़ा था।

हांलांकि मीडिया में ऐसी खबरें जरूर दिखीं कि क्रायोजेनिक स्टेज में लिकेज मिली है। अगर ऐसा होता तो लीकेज जांच और पूरे मॉड्यूल की रिअसैंम्बलिंग में लंबा समय लग सकता था मगर इसरो से इसी दिन 22 जुलाई का नया लांचिंग शेड्यूल भी आ गया।

22 जुलाई को दोपहर 2:40 बजे प्रधानमंत्री की गरिमामय उपस्थिति में चंद्रयान-2 की सफल लांचिंग हुई।


इस 7 दिन के अंतर से क्या नुकसान हुआ? और इसका जिम्मेदार कौन है? इसका जवाब आप इसरो चीफ के आंसुओं और बेबसी में तलाश सकते हैं।

इस मामले में डॉ के सिवन और इसरो को दोष नहीं दिया जा सकता। यह टीम इस सदी के महान वैज्ञानिकों में शुमार होने की कूवत रखती है।

जब देश की सेना नारियल फोड़ने को विवश हैं तो एक वैज्ञानिक ऐसा करने से कैसे बच सकता है। उसकी टीम की तो दस साल की मेहनत दांव पर लगी थी। यह टीम अब भी 99 फीसदी सफल है। इसे बधाई देने में कंजूसी न करें।



Monday, September 9, 2019

अपने वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों पर भरोसा करें




इसरो का चंद्रयान अभियान विज्ञान का एक महान प्रयोग रहा। वैज्ञानिकों के समर्पण ने इसे किफायती बनाया। इसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है।


इसकी महानता का अंदाजा इससे लगाइए कि जितनी कीमत हमने एक राफेल विमान की फ्रांस को दी है, चंद्रयान-2 की लागत उससे करीब आधी है। यानी कुल 36 राफेल विमान सौदे की कीमत में तो इसरो चंद्रयान-2 जैसे 70 से ज्यादा मिशन पूरे कर सकता है।

इस दौर में दुनिया की शक्तियों के बीच हथियारों और लड़ाकू विमानों से पारंपरिक युद्ध नहीं लड़े जाने हैं। अब लड़ाई का मैदान अंतरिक्ष और आर्थिक मोर्चा है।

जिस देश के पास योग्य और कुशल अर्थशास्त्री और वैज्ञानिक होंगे और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होंगे, भविष्य की लड़ाई में वे देश ही टिकेंगे और तरक्की करेंगे।

राजनीतिक हस्तक्षेप इतना नहीं होना चाहिए कि योग्य अर्थशास्त्री देश के लिए काम न कर पाएं और छोड़कर निकलने को मजबूर हों। हस्तक्षेप इतना न हो कि सावन के सोमवार के लिए वैज्ञानिकों को अपने पूरे प्रयोग का शेड्यूल ही बदलना पड़े और वे विफलता पर विवश होकर आंखों में आंसू भरकर रह जाएं।

जब आप अपने मिग-21 से अमेरिकी एफ-16 मार सकते हैं तो राफेल की खरीद एक विकसित देश से ऐसे कबाड़ की खरीद है, जिसका भविष्य में शायद ही कभी इस्तेमाल हो।

यही धन आप इसरो और डीआरडीओ को दे सकते हैं। ये 60 करोड की लागत में आपको अग्नि पांच बनाकर देते हैं। यानी एक राफेल की कीमत में करीब 300 मिसाइलें। दुश्मन हिमाकत की कोशिश करें तो उसके कुछ सोचने से पहले ही अंतरिक्ष से निशाना बनाएं।

मगर अपने वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों से ये लाभ हम तभी ले पाएंगे, जब उन पर भरोसा करेंगे। उनकी सलाह पर अमल करेंगे। अगर सब कुछ राजनीति ही तय करेगी तो हम विकसित देशों के हथियारों का कबाड़ खरीदकर अपने लिए सिर्फ आर्थिक संकट खरीदेंगे। नेताओं का हस्तक्षेप अपने वैज्ञानिकों की विफलताओं का कारण बनेगा। उनकी आंखों में आंसू भर देगा।

मगर आंसू पौंछने की राजनीति का अपना ही आनंद है।