Sunday, August 25, 2019

थैलियां कम, गालियां ज्यादा


अटल जी ने कहा था कि लोकतंत्र में सिर गिने जाते हैं, यह नहीं देखा जाता कि सिर में क्या है!

जुलाई में पेश किए गये बजट को विपक्ष और उद्योग व्यापार जगत को अनसुना करते हुए संख्या बल से सदन में पास करा लिया गया था।

मगर एक महीना भी न बीता, वित्त मंत्री ने शुक्रवार को एकबार में ही इसके 30 से ज्यादा प्रावधानों को पलट दिया।

क्या सचमुच बजट इतना बुरा और बिना सोचे समझे बनाया गया था, जो ऐसी नौबत आई?

जहां तक मंदी और अर्थव्यवस्था के चरमराने की बात है तो वह 2017 से ही हिली हुई है और 2018 में इसका व्यापक असर भी सामने आ गया था। ऐसे में चुनाव जीतने के बाद नासमझी भरा बजट बनाना और तरह तरह के सेस लगाना तथा प्रतिबंध के प्रावधान करना कहां की समझदारी था?

इस तरह का सख्त बजट बनाना क्या सचमुच नासमझी थी या सोचा समझा प्लान?

क्या उद्योग जगत और सुपर रिच को डराने, दबाने और निचोड़ने का प्लान था? पहले बजट दिखाकर डराओ और थैलियां आ जाएं तो पास हुए बजट के प्रावधान भी गुच्छे (बल्क) में वापस ले लो। सदन की गरिमा की तो कोई परवाह नहीं।

मगर बाजार की जो हालत है, उसमें नेताओं के लिए थैलियां कम और गालियां ज्यादा हैं। यह नहीं सोचा गया।

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