Thursday, February 28, 2019

आधे से ज्यादा भुगतान के बाद भी जानें कब मिलेंगे राफेल



Dassault Rafale : A French Twin-Engin Multirole fighter aircraft.

2016 में ही दे दी गयी थी सौदे की पहली किश्त 


भारत राफेल सौदे में आधे से ज्यादा रकम का भुगतान कर चुका है। मगर ये विमान अभी तक क्यों नहीं मिले हैं? लोग ये सवाल कर रहे हैं। न तो अदालत ने कोई रोक लगाई है न भारत सरकार ने सौदे से हाथ खींचा है फिर दिक्कत कहां है?

59000 करोड़ रुपये की डील में भारत अब तक 34000 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुका है। सौदे की पहली किश्त तो 2016 में ही दे दी गयी थी। सौदे के अनुसार इस साल सितंबर में चार विमानों की पहली डिलीवरी हमें मिल जाएगी।



20 जनवरी 2019 को टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि इस सौदे में 34,000 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है। वहीं इस साल 13,000 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाएगा। 15 प्रतिशत की पहली किस्त का भुगतान सौदे पर हस्ताक्षर होने के बाद सितंबर 2016 में की गई थी। तब क्रिटिकल डिजायन रिव्यू और डॉक्यूमेंटेशन के लिए भी भुगतान किया गया था।सूत्र ने कहा कि अंतिम किश्त का भुगतान 2022 में किया जाएगा जब सभी विमान भारत आ जाएंगे। वायुसेना को फ्रांस से इस साल सितंबर में चार लड़ाकू विमान मिल जाएंगे। जिसके बाद लगभग 10 पायलटों, 10 उड़ान इंजीनियरों और 40 तकनीशियनों की मुख्य टीम को इसका प्रशिक्षण दिया जाएगा। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार यह विमान हरियाणा के अंबाला एयरबेस में मई 2020 तक पहुंच जाएंगे।

TOI 

राफेल विमानों की डिलिवरी नवंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक हो जाएगी। हालांकि भारतीय आवश्यकतानुसार बदलाव तथा उन्नयन वाले विमान सितंबर-अक्तूबर 2022 तक पूरी तरह ऑपरेशनल (संचालन युक्त) हो जाएंगे क्योंकि उन्हें भारत आने के बाद सॉफ्टवेयर सर्टिफिकेशन के लिए 6 महीने का समय और लगेगा।

Wednesday, February 27, 2019

राजा 18 दोषों से बचे



हमारे धर्म ग्रंथ राजा को 18 दोषों से दूर रहने की सलाह देते हैं। इनमें दस दोष काम से उत्पन्न हैं और आठ क्रोध से।

बिना प्रयोजन घूमना, स्त्री संभोग, मद्यपान, नाचना, गाना, बजाना, दिन में सोना, जुआ खेलना, शिकार करना और विपक्ष के दोष बताते रहना ये दस काम के व्यसन हैं।

मृगयाक्षो दिवास्वप्न: परिवाद: स्त्रियो मद:।
तौर्यत्रिकं वृयाट्या च कामजो दशको गण:।। 47||
        (7वां अध्याय, मनुस्मृति)

महाराज मनु के अनुसार काम से उत्पन्न दस व्यसनों में आसक्त हुआ राजा अर्ध और धर्म से हीन हो जाता है। क्रोध से उत्पन्न व्यसनों में आसक्त राजा तो अपने शरीर से नष्ट हो जाता है।

कामजेषु प्रसक्तो हि व्यसनेषु महीपत:|
वियुज्यतेSर्थधर्माभ्यां क्रोधजेष्वात्मनैव तु।। 46।।


क्रोध से उत्पन्न आठ व्यसन इस तरह कहे गये हैं- चुगली, (दु:)साहस, द्रोह, ईर्ष्या, विपक्ष के गुण में भी दोष देखना, द्रव्य हरण, गाली देना और कठोरता।
यथा -
पैशुन्यं साहसं द्रोह ईर्ष्यासूयार्थ दूषणम्।
वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोSपि गणोSष्टक:।।48।।

परमाणु युद्ध के खतरे की बातें बेमानी


दक्षिण एशिया में न्यूक्लियर टेंशन बढ़ रही है। अमेरिका और उत्तर कोरिया की तरह अब भारत और पाकिस्तान में भी तनाव है। यह मानना है वाशिंगटन पोस्ट का।

हालांकि भारत की एक सीमित कार्रवाई को परमाणु युद्ध या एटमी जंग का खतरा कहना बहुत बड़ी अतिश्योक्ति है।

किसी युद्ध का कोई खतरा नहीं है। यह पाकिस्तान के रुख से भी साफ है। वह भारतीय हमले को हमला मान ही नहीं रहा। उसका कहना है कि बालकोट के बम से जंगल में कुछ पेडो़ं का ही नुकसान हुआ है।

बीबीसी ने बालकोट के जाबा के जंगल में जहां हमला हुआ है, पास के ग्रमीणों के हवाले से बताया है कि कोई शव नहीं दिखा। बीबीसी के अनुसार जेश ने भी यह बात नहीं मानी है कि हमले में अजहर मसूद का जीजा युसुफ अजहर या कोई और आतंकी मारा गया। जैश का कहना है कि यह कैंप तो बंद कर दिया था।

बीबीसी की रिपोर्ट 

जब कोई नुकसान नहीं तो युद्ध के खतरे की खबर को अमेरिकी मीडिया क्यों इतना उछाल रहा है? क्या ऐसी खबरों से अमेरिकी हथियार लॉबी को फायदा होता है?

पुलवामा हमले के बाद शहीद जवानों के ताबूतों के साथ प्रधानमंत्री के फोटो उनके ट्विटर हेंडल पर और पूरे मीडिया में थे। पाकिस्तानी मीडिया में ताबूतों के फोटो नहीं दिखे हैं।

क्या पाकिस्तान में राष्ट्रवाद और मजहबी फितूर नहीं है। हमारे यहां तो कश्मीर में आतंकवादी के जनाजे में भी भीड़ उमड़ आती है।

सवाल और भी हैं।

क्या हमारी सेना को खुली छूट थी या हमले की रणनीति पर नेताओं का हस्तक्षेप था? हमारे चालीस जवानों की शहादत का बदला लिया जाए यह तय था मगर क्या यह नेताओं ने तय किया कि पाकिस्तानी सैनिकों को खरौंच न आए?

हमारी सेना ने उनके तीन सौ आतंकवादी मार गिराये हैं। सैनिक नहीं मारे हैं। ग्रामीण नहीं मारे हैं। इसलिए युद्ध का कोई खतरा नहीं है। न हो नेताओं पर जनता की ओर से युद्ध के लिए कोई दबाव है।

हमारे विमान पाकिस्तान जाकर बम गिरा आए। चुनाव में प्रचार के लिए इतना ही काफी है और वायुसेना के इस शौर्य को भी नेता खुद छीन लेना चाहता है कि उसने ही सब करवाया।

परमाणु युद्ध के खतरे की बात तो पूरी तरह से बेमानी है। कोई भी इतना गैरजिम्मेदार नहीं है। दोनों ही देशों में चुनाव होते हैं और दोनों ही मुल्कों के नेताओं को चुनाव लड़ने होते हैं।

जहां तक आतंकवाद का सवाल है तो जेश और लश्कर के खात्मे से ही उसकी कमर टूटेगी। अगर इनके ट्रेनिंग कैंप नष्ट होते हैं तो दोनों ही देशों को फायदा है।

Tuesday, February 26, 2019

सारा श्रेय सिर्फ जवानों को



हमारी वायुसेना ने वीरता की मिसाल पेश की है। इसकी एक सुर में प्रशंसा होनी चाहिए। उसे ही इसका श्रेय दिया जाना चाहिए।

मगर कुछ वाचाल नेता सारा श्रेय खुद लेना चाहते हैं।  उनके चेले और भक्त वीर जवानों की जगह नेता की जयजयकार कर रहे हैं। यह शर्मनाक है। ऐसे नेताओं को लानत भेजीए।

इस कार्रवाई का पूरा श्रेय हमारे वीर जवानों को जाता है। पूरे सम्मान पर उनका हक है। अगर कोई नेता जवानों का हक छीनकर खुद श्रेय लेने की कोशिश करे तो उसे शर्मिंदा करें। यह हर भारतीय का कर्तव्य है।

सैनिकों की बहादुरी और सम्मान पर राजनीति करने की इजाजत किसी को नहीं दे सकते।

महिमा मिराज की

Mirage :  दिल दुश्मन के हिलते हैं

पाकिस्तान में आतंकी ठिकाने पर सटीक हमले के बाद भारतीय वायुसेना और मिराज विमान चर्चा में है।

मिराज विमान 1984 में भारतीय वायुसेना में शामिल किए गये थे। मिराज -2000 मल्टीरोल सिंगल इंजन विमान हैं। कम ऊंचाई पर उड़ने पर सक्षम होने से दुश्मन की रडार की पकड़ में नहीं आते।

फ्रांस निर्मित मिराज भी उसी डिसाल्ट कंपनी के हैं जो राफेल विमानों की वजह से चर्चा में है। मिराज एक बार में अधिकतम 13668 किग्रा तक वजन ले जा सकता है।

पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर हजार किलो के बम गिराना इसके लिए मुमकिन है। लेजर गाइडेड तकनीक से लैस होने की वजह से निशाने सटीक रहे।

यह BVR (बियोंड विजुअल रेंज) मिजाइल का इस्तेमाल करने में भी पूरी तरह सक्षम है। कारगिल युद्ध में भी मिराज ने घुसपैठियों पर कहर बरपाया था। यह हवा से हवा में और हवा से जमीन पर भी मार कर सकता है।

मिराज की राफेल से तुलना नहीं हो सकती। राफेल विमान बाद की पीढ़ी के हैं।

सेल्यूट : भारतीय सेना है तो मुमकिन है

पाकिस्तान में आतंकी ठिकाने पर हजार किलो के बम गिराता भारतीय मिराज। 


भारतीय सेना को सलाम। वायुसेना को सेल्यूट।

यह युद्ध नहीं है। यह आतंकवाद पर प्रहार है। आतंक की जमीन पर कार्रवाई है। यह हमारा कर्तव्य था। इससे किसी युद्ध का खतरा भी नहीं है।

इस बार पाकिस्तानी सेना चिल्ला रही है कि भारतीय वायुसेना ने कार्रवाई की है। बालाकोट, मुजफ्फराबाद और  चकोटी में आतंकवादी ठिकाने ध्वस्त किए हैं।  सोशल मीडिया पर पाकिस्तान की ओर से इस कार्रवाई की तस्वीरें भी डाली गई।

इसबार भारतीय कार्रवाई की ऐसी तस्वीरें खुद पाकिस्तान ने जारी की हैं।

भारतीय मीडिया के अनुसार तड़के साढ़े तीन बजे भारतीय वायुसेना ने 12 मिराज विमानों से लेजर गाइडेड बमबारी कर आतंकी ठिकाने तबाह किए। मिराज की उडा़नों को पाकिस्तानी रडार पकड़ तक नहीं पाये।

पाकिस्तानी डिफेंस के ट्विटर हेंडल पर कल रात ही यह तस्वीर डाल कर पाकिस्तानियों से कहा गया था कि जमकर सोयें पाकिस्तानी वायुसेना जाग रही है। तब से पाकिस्तान डिफेंस का यह ट्विटर हेंडल ऐसा सोया है कि शर्म के मारे अब तक नहीं जागा।

चार माह पुराने पाप का प्रायश्चित

संगम तट पर चटख रंग के कपड़े पहने सफाई कर्मियों के चरण पखारते प्रधानमंत्री।

सफाई कर्मियों के पांव धोना एक अच्छी मिसाल हो सकती थी। अफसोस यह नहीं है।

यह चार माह पहले हुए एक पाप का प्रायश्चित भर है। चुनाव से पहले किसी ज्योतिषि के कहने पर किया गया प्रायश्चित।

कपड़े नहीं देखे कैसे बदले गये। तंत्र विद्याओं के विधान की तरह। पांव धोते समय अलग रंग। नहाते समय अलग। आरती में अलग और जाते समय अलग रंग। इतनी जल्दी इतने रंग एक नेता ही बदल सकता है।

संगम में नहाते और गंगा आरती करते प्रधानमंत्री।


अब बात करते हैं उस पाप की जो चार माह पहले हुआ था। 12 नवंबर 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में दीनापुर एसटीपी का उद्घाटन किया था। दो दिन पहले इस एसटीपी तक सीवरेज का पानी पहुचाने की कोशिश में दो सफाई मजदूर मलजल में बहकर मर गये थे। प्रधानमंत्री ने तब इन सफाई मजदूरों के बलिदान पर दो शब्द भी नहीं कहे थे। और अब चुनाव नजदीक है तो पांव धोये जा रहे हैं। मन का बोझ जो न कराये।

10 नवंबर 2018 को वाराणसी में चौकाघाट सीवर लाइन में मारे गये सफाई मजदूरों की खबर अगले दिन के अखबार में।


दीनापुर एसटीपी तक सीवरेज पाइपलाइन लिंक का काम महीनों से रुका था। उद्घाटन की जल्दबाजी में 10 नवंबर 2018 को चौकाघाट सीवर लाइन में बिना सुरक्षा उपकरणों के मजदूरों को उतारने का हुक्म हुआ।

12 नवंबर 2018 को वाराणसी में दीनापुर एसटीपी के उद्घाटन की खबर अगले दिन के आखबार में।


27 वर्षीय दिनेश पासवान और उसका 18 वर्षीय भतीजा विकास जहरीली गैस से बेहोश हो सीवरेज के बहाव में बह गये थे। ये दोनों मौतें सिर्फ आम खबर बनकर रह गयी थीं। अगर 12 नवंबर की जनसभा में सफाई कर्मियों के पांव पखारे जाते और मृत कर्मियों के लिए श्रद्धांजलि के दो बोल कहे जाते तो एक सच्ची मिसाल बनती।

Monday, February 25, 2019

काले वस्त्रों में स्नान करने वाली पुरानी सभ्यताएं

काले हिजाब में स्नान करतीं मुस्लिम महिलाएं।


काले कपड़े पहनकर स्नान की भी दुनिया में पुरानी रवायत है। खासकर फलस्तीनी और ईरानी (पर्सियन) समुदायों में।

दुनिया में सामूहिक स्नान की परंपरा काफी पुरानी है। पारसियों द्वारा ईरान में बनवाये गये प्राचीनतम सामूहिक स्नानागार देखने आज भी दुनिया जाती है।

मुस्लिमों  और खासकर मुस्लिम महिलाओं द्वारा काले वस्त्रों में नदी या ताल में पवित्र स्नान किया जाता है। हिंदुओं में तंत्र विद्या वाले काले वस्त्र पहनते हैं। मगर इसे असूरियन प्रभाव ही माना जाता है।

असूरियन से असुर और रक्ष से राक्षस शब्द बने हैं। लंबे चौड़े गोरे असूरियन्स को प्राचीन भारत के आर्य राजा अपना रक्षक रखते थे। जो रक्षक विद्रोहकर सत्ता हथिया लेते थे, राक्षस कहलाए। असूरियन्स काले और चटख रंग के लबादे पहना करते थे।

सभ्यताओं का यह संघर्ष इतर विषय है। फिर स्नान पर आते हैं। मुस्लिम समाज में भी नदियों का अलग महत्व है। खासकर शियाओ में।

हर साल 15वीं शबां को हजरत इमाम मेहंदी का जन्मदिवस मनाने के लिए शिया समुदाय दुनियाभर में सूर्योदय से पहले नदियों के तट पर जुटता है। सूर्योदय तक प्रार्थना की जाती है। फिर दिया और अगरबत्ती जलाते हैं। कागज पर अर्जियां लिखकर नदी में डालते हैं।

धुले पाप या फेशियल धुल गये

Black Coat :  हिंदू धर्म में तांत्रिक अनुष्ठानों में काले वस्त्र पहने जाते हैं। वैष्णव अनुष्ठानों और पूजा में काले वस्त्र त्याज्य कहे गये हैं। 

न श्रद्धा की कमी थी। न प्रेम की। डुबकी भी गहरी थी। पूरे तीन सैकेंड की। पर कोट काला ही रहा। साड़ी भी काली ही रही।

स्नान गंगा में और पुण्य मिला कालिंदी का। निर्मल गंगा के 26000 करोड़ बेकार गये। काला रंग और गहरा हुआ। न श्वेत हुआ। न धवल।

पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने भी काली साड़ी में ही कुंभ स्नान किया था। आमतौर पर श्रद्धालु महिलाओं के पीले या लाल वस्त्रों में स्नान का विधान है।


गंगा निर्मल हो जातीं तो चमत्कार होता। पाप धुल जाते। कोट श्वेत हो जाता। साड़ी पीली या लाल। पर जल का स्पर्श पाते ही काला रंग और गहरा गया।

पाप धुले? पता नहीं। पर फेशियल जरूर धुल गये।

हाथ जोड़कर भगत प्रार्थना कर रहा है। डुबकी लगाने पर साडी़ काली निकली। कोट भी काला रहा। चमत्कार न हुआ।

बल बल जाऊं मैं तोरे रंगरेजवा, अपनी सी रंग लीनी मोहे पीएम बनाइके।


मां गंगा भी भगत से गुहार कर रही हैं- उद्योगों का जहरीला जल और सीवरेज रोको। फूल और मालाएं, चिराग-बाती पानी में मत डालो। डीजल इंजन वाली मोटर बोट क्यों चलवाते हो। रोज इतना कचरा झौंकते हो। तब चमत्कार कैसे होगा।

ऐसा नहीं है कि Man in Black मोदी कैबिनेट का कुंभ स्नान कोड हैं। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने हिंदू परंपराओं और संस्कारों का सम्मान करते हुए श्वेत धोती में कुंभ की डुबकी लगाई थी।


Sunday, February 24, 2019

रस्ते की बात

चाचा चौधरी से तेज दिमाग 

पाकिस्तान में टमाटर महंगे हो गये हैं। हाफिज सईद खरीद नहीं पा रहा। बिरयानी खाने को तरस गया है। आतंकवाद से तोबा कर रहा है। गिड़गिडा़ रहा है-मोदी जी माफ कर दो।

सचमुच। बिना सेना के ही आतंक के सरगना को क्या सबक सिखाया है।

मोदी जी का दिमाग चाचा चौधरी से भी तेज है।

#रस्ते_की_बात


तोप

हमारा तो प्रधानमंत्री ही तोप है जी।

मुंह से इतने गोले दाग देगा कि टैंक और बंदूक की तो जरूरत ही नहीं पडे़गी।

(रस्ते की बात)

बेदिल सीना



हमारे नेता युद्ध नहीं चाहते
इसलिए अपने ही
कश्मीरियों पर
बंदूकें तानते हैं और
हमारे सैनिक पत्थर खाते हैं
शहादत देकर
रोज लड़ते हैं
अपनी ही धरती पर युद्ध

आतंकवाद के खिलाफ
इंसानियत की लडा़ई
रखवालों के सिर देकर
नहीं जीती जाती
न ही खीजकर अपने ही
लोगों को पीटकर

बल्कि

आतंक की धरती पर उतरकर
करना होता है आतंकवाद को
नेस्तेनाबूद
इसके लिए किसी वीडियो
और फिल्म की जरूरत नहीं होती

ऐबटाबाद में घुसकर
आतंक के सरगना को
खत्म करने के लिए
छप्पन इंच का सीना नहीं
एक छोटे सीने में
बडा़ दिल चाहिए

मेरे दोस्त!
ऐसा सीना किस काम का
जिसमें दिल ही न हो
और जो जवानों की
मौत के बाद
मटरगश्ती पर निकला हो।।
#सुराघव

Saturday, February 23, 2019

क्या सूचनाओं को सजाना चाहिए

क्या सूचनाओं को सजाया जाता है? क्या सजाने का महत्व है? ऊपर चित्र को देखें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटन के मौके पर वाराणसी  के मंडुवाहडीह रेलवे स्टेशन की सैकेंड एंट्री पर दर्शनार्थ लगे डीजल इंजन को जब सजाया गया और नीचे के चित्र में अन्य सामान्य दिनों में वही इंजन और वही जगह।


कम्युनिकेशन के दौरान आप अपने श्रोता या दर्शक की कितनी ज्ञाानेंद्रियों को कैटर करते हैं, यह महत्वपूर्ण है।

आप क्या दृश्य पैदा करते हैं? क्या संवाद करते हैं? कैसे स्पर्श, सुगंध और स्वाद की संभावना बनाते हैं? कम्युनिकेशन में इन सबका महत्व है।

रेडियो सिर्फ आपके कानों के लिए है। अखबार आंखों के लिए है और हाथों में स्पर्श की अनुभूति भी देता है। टीवी से आप आंख और कानों दोनों के लिए कम्युनिकेट करते हैं।
मगर आप जब मोबाइल पर कम्युनिकेट करते हैं तो आंख, कान और त्वचा (स्पर्श) तीनों ज्ञाानेंद्रियां सक्रिय रहती हैं। मोबाइल आपके हाथ में अखबार की ही तरह लगातार स्पर्श की अनुभूति देता है। इसलिये इसकी स्वीकार्यता तेजी से बढी़ है।

डिजिटल क्रांति से मोजो (मोबाइल जर्नलिज्म) आपको न्यूनतम साधनों से अपने इवेंट और सूचनाओं के रियल टाइम अपडेट और प्रसारण में मदद करती है।

भविष्य में आपके हाथ में ऐसे मोबाइल भी होंगे जो चित्र के साथ गंध का भी एहसास कराएं।

सारी प्रतियोगिता खुद को सच और विश्वसनीय साबित करने की है। कसौटी व मानक और ऊंचे होंगे। फेक न्यूज के खतरे के बीच सिर्फ दृश्य और संवाद पर्याप्त नहीं है। गंध, स्पर्श और स्वाद का प्रयोग भी मायने रखेगा। इसलिए सूचनाओं की प्रस्तुति को इवेंट बनाएं। कुछ मेहमान हों। प्रत्यक्षदर्शी हों। यह सब विश्वसनीयता पैदा करने के लिए ही किया जाता है।
(क्रमश:)

मोबाइल ब्लागिंग के इस माध्यम से आपसे कल फिर रूबरू होंगे।

Friday, February 22, 2019

सूचनाओं की तलाश को भी बना सकते हैं इवेंट


Think Out Of The Box 

When There is No Box

न्यूज एंकर और टीम अब रोज इवेंट प्लान करते हैं। कुछ खास लोगों को बुलाते हैं और बहस कराते हैं।

पत्रकारिता और खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आजकल यह इवेंट मैनेजमेंट का सबसे ज्यादा घिसा जा रहा फार्मूला है। दर्शकों का एक वर्ग इनसे ऊब चुका है।

कुछ चैनलों पर तो ऐसी बहस थप्पड़ और हाथापाई तक भी पहुंची। ऐसा क्रिएटिविटी के अभाव से उपजी ऊब से हुआ या यही रचनात्मकता थी, यह प्लानर बेहतर जानते हैं।

क्योंकि इवेंट मैनेजमेंट की पत्रकारिता किसी बंधें सांचे की पत्रकारिता नहीं है।  एंकर और मेहमानों का चींखना चिल्लान इसका एक नकारात्मक पहलू हो सकता है मगर अच्छे और सफल उदाहरण भी बहुत हैं।

भारत में तीन दशक पहले की पत्रकारिता में इसके शानदार उदाहरण हैं। 1992 में एक टाकशो को इवेंट की तरह प्लान किया गया। कटघरा तैयार किया गया, जिसमें गेस्ट को बैठाया गया, एक अन्य मेहमान जज की भूमिका में थे और वकील की तरह जिरह के लिए थे रजत शर्मा।

बताने की जरूरत नहीं है कि पत्रकारिता में आपकी अदालत का प्रयोग कितना प्रभावशाली और सफल रहा। यह अब तक चल रहा है। अब ऐसे कई प्रयोग हो रहे हैं। थर्ड डिग्री, ऊपर वाला देख रहा है, सनसनी....आदि इत्यादि।

पत्रकार अब सिर्फ़ घटनाओं और सूचनाओं का ही इंतजार नहीं करता। वह अपनी टीम के साथ स्वयं इवेंट प्लान करता है और उसे कवर करता है। वह मान कर चलता है There is NO BOX. मगर इसके नतीजे इस बात पर निर्भर करते हैं कि वह कितना परिपक्व है।

पत्रकारिता के मूल्यों को ध्यान में रखते हुए सूचनाओं की तलाश को भी इवेंट बनाया जा सकता है। पूरी रचनात्मकता के साथ। स्क्रीन को ब्लैक किया जा सकता है। माइम प्ले हो सकता है। रवीश कुमार का प्राइम टाइम इसका एक श्रेष्ठ और सफल उदाहरण है।

विनोद दुआ ने टीम के साथ खाने में सूचनाओं को तलाशकर कुछ पुराने सांचे बदले।

इवेंट मैनेजमेंट एक अलग इंडस्ट्री भी है और सब में शामिल भी है। पत्रकारिता में भी।


प्रिंट मीडिया भी इससे अछूता नहीं है। वहां भी इवेंट आयोजित किए जाते हैं और चौथाई से लेकर कई पन्नों पर इसे कवर करते हैं। इवेंट की सफलता से टीम की सफलता आंकी जाती है। इसलिए सिर्फ इवेंट नहीं, इवेंट मैनेजमेंट महत्वपूर्ण है।

इवेंट मैनेजमेंट क्या है? इसके लिए हम फिर प्रोफेसर डेविड हिंड की बात पर आते हैं। इवेंट मैनेजमेंट यानी आपको एक कहानी चाहिए। करेक्टर चाहिए। स्क्रिप्ट चाहिए। एक्स्ट्रा अॉर्डेनरी अनुभव पैदा करने वाली रचनात्मकता चाहिए।
(क्रमशः)
अब और नया क्या? इस पर कल बात करेंगे।







Thursday, February 21, 2019

इवेंट सफल तो पीढ़ी सफल

Professor Devid Hind, President, APIEM, in NIU campus on Thursday.

अगले दौर की पत्रकारिता की दिशा तय हो रही है। नये कदम नयी दिशा में हैं। पब्लिक रिलेशन से एक कदम आगे। इवेंट मैनेजमेंट।

सफल आयोजन और आयोजन को सफल बनाना।

शादियों से लेकर सरकार तक की सफलता का पैमाना आजकल इवेंट मैनेजमेंट ही है।

पब्लिक रिलेशन की तरह ही अकेडमिक रूप से इवेंट मैनेजमेंट भी पत्रकारिता (मास मीडिया कम्युनिकेशन) का हिस्सा है। अब छात्रों का भी इस ओर अच्छा रुझान है।

हालांकि यूरोप में 1970 के दशक में ही यूनिवर्सटियों में इस दिशा में काम शुरू हो गया था। भारत में पिछले एक दशक से यह ट्रेंड कर रहा है।

नोयडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के स्कूल आफ मीडिया एंड कम्युनिकेशन स्टडीज के इंट्रेक्टिव सेशन में इस विषय पर हमें बहुत सी नयी जानकारियां मिलीं।

एशिया पेसेफिक इंस्टिट्यूट फार इवेंट मैनेजमेंट के चेयरमैन प्रोफेसर डेविड हिंड इसके विशेषज्ञ हैं। यूके में ट्रेवल एंड टूरिजम पर डिग्री कोर्स तैयार करने वाली अकेडमिक टीम को लीड किया (नार्थुम्ब्रिया यूनिवर्सिटी) है। छात्रों में रोजगारमूलक क्षमता कैसे बढा़ई जाए, इस पर उनकी कई किताबें और शोध हैं।



प्रोफेसर हिंड के अनुसार हर इवेंट एक कहानी कहता है। वह इसके आयोजक की कहानी कहता है। इसमें हिस्सा लेने वालों की कहानी कहता है। क्लाइंट और ब्रांड की कहानी कहता है। प्रायोजकों की कहानी कहता है।

इन कहानियों को विश्वसनीय तरीके से कहने के लिए जर्नलिस्ट वाले गुण चाहिए। क्रिएटिविटी चाहिए।

आदमी की पांच ज्ञाानेंद्रियां हैं। इवेंट की सफलता इसमें है कि ये ज्यादा से ज्यादा इन्वाल्व हों।  क्या दर्शनीय है,  क्या सुनाया जाता है, गंध-सुगंध, स्पर्श और स्वाद सबका ध्यान रखें।

प्रोफेसर हिंड का अपना दर्शन है don't just think out of the box but think like that there is NO BOX. (सिर्फ खांचे बदलने तक ही न सोचो बल्कि ये सोचो कि कोई खांचा ही नहीं है।)

इवेंट मैनेजमेंट सेक्टर देश में तेज गति से बढ़ रहा है। पिछले पांंच साल से 15 फीसदी का ग्रोथ रेट बना हुआ है। यह देश की औसत विकास दर से दूनी दर है। 5,631 करोड़ की इंडस्ट्री है। 2021 तक इसके 10,000 करोड़ हो जाने का अनुमान है।

पत्रकारों की नई पीढ़ी इस ओर आकर्षित है। अब कोई खांचा नहीं है। इवेंट सफल तो पीढ़ी सफल।

छात्र जिज्ञासु हैं। उन्हें अपनी रचनात्मकता पर भरोसा है। वे जानना चाहते हैं कि इवेंट तो वे रच लेंगे मगर गुस्साये क्लाइंट को संभालने का क्या तरीका है?
इस मौके पर मलेशिया की यूनिवर्सिटी टेक्नोलॉजी मारा के रिसर्च एंड इंडस्ट्री डिपार्टमेंट के डिप्टी डीन मोहम्मद राजिफ जमालुद्दीन ने ओपन लर्निंग के विषय में बताया।

(Left to right) Mr. Mohd Raziff , Mr. RD Sharma (VC, NIU), Mr. David Hind and Mr. Jayanand (Registrar, NIU)
नोयडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के कुलपति आरडी शर्मा ने भारत में शिक्षा क्षेत्र में मजबूत मानिटरिंग सिस्टम की जानकारी दी। स्कूल आफ मीडिया एंड कम्युनिकेशन स्टडीज के डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ अमिताभ ने नये विचारों के महत्व को बताया। यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार जयानंद भी उपस्थित रहे। असिस्टेंट प्रोफेसर शानू गुप्ता ने मंच संचालन किया।

(क्रमश:)
इस विषय पर कुछ और जानकारियों के साथ कल बात करेंगे।



हुर्रियत की हरकतों पर अब कैसे नजर रखेंगे



सब खुश हैं। हुर्रियत नेताओं की सुरक्षा वापस ले ली गई है। सभी चैनल खुश हैं। बता रहे हैं देश खुश है।

पर अब हुर्रियत के इन अलगाववादी नेताओं के मूवमेंट और हरकतों पर नजर रखने के लिए कोई और व्यवस्था करनी होगी।

हुर्रियत नेता भी खुश हैं। सुरक्षाकर्मी उनकी हर मूवमेंट पर नजर रखते थे। वे आतंकियों को घर में नहीं छुपा सकते थे। उनके साथ बैठकर प्लान नहीं तैयार कर पाते थे।

जब 18 फरवरी को पहले छह अलगाववादियों की सुरक्षा वापस ली गयी तो हुर्रियत के एक नेता मौलाना अब्बास अंसारी ने तो खुशी में प्रदेश के सुरक्षा प्रकोष्ठ को पत्र लिख डाला कि उनकी सुरक्षा भी तत्काल वापस ली जाए। उसके बाद उनके सहित 18 नेताओं की सुरक्षा भी वापस ले ली गई।

आंसारी के संगठन इत्तेहादुल मुसलीमीन के प्रवक्ता ने तो पहले ही कह दिया कि हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। हमने कभी सुरक्षा नहीं मांगी थी।

सरकार का फैसला देखने में तो सख्त है। इससे सभी खुश भी हैं मगर सुरक्षा एजेंसियों की क्या राय है? यह महत्त्वपूर्ण है।

Wednesday, February 20, 2019

श्रद्धांजलि : बुरा जमाना और नामवर सिंह का चले जाना


बुरे जमाने से कवि आलोचक नामवर सिंह को शिकवा नहीं था। मगर उनके जाने से हिंदी साहित्य में जो शून्य पैदा हुआ है, उसकी शिकायत जमाने को हमेशा रहेगी। पढे़ं उनकी यह कविता 

बुरा जमाना

नामवर सिंह 

बुरा ज़माना, बुरा ज़माना, बुरा ज़माना
लेकिन मुझे ज़माने से कुछ भी तो शिकवा नहीं, 
नहीं है दुख कि क्यों हुआ मेरा आना
ऐसे युग में जिसमें ऐसी ही बही हवा
गंध हो गई मानव की मानव को दुस्सह ।

शिकवा मुझ को है ज़रूर लेकिन वह तुम से—
तुम से जो मनुष्य होकर भी गुम-सुम से
पड़े कोसते हो बस अपने युग को रह-रह
कोसेगा तुम को अतीत, कोसेगा भावी
वर्तमान के मेधा ! बड़े भाग से तुम को
मानव-जय का अंतिम युद्ध मिला है चमको
ओ सहस्र जन-पद-निर्मित चिर-पथ के दावी !

तोड़ अद्रि का वक्ष क्षुद्र तृण ने ललकारा
बद्ध गर्भ के अर्भक ने है तुम्हें पुकारा ।

Tuesday, February 19, 2019

इमरान के रिवर्स स्विंग को दोनों छोर से खेलें



एक तरफ से गेंद को चमकाओ और दूसरी तरफ से खुरदरा करो। ऐसी गेंद टिप्पा पड़ते है दिशा बदलकर चकमा देती है।

यह इमरान खान की रिवर्स स्विंग है। वह राजनीति भी क्रिकेट की तरह खेल रहा है। 1970 के दशक में उसने रिवर्स स्विंग की कला अपने साथी खिलाड़ी सरफराज नवाज से सीखी थी।

आतंकवादियों की मदद से भारत-पाक रिश्तों की गेंद की एक सतह लगातार खरौंची जा रही है। दूसरी सतह बातों के चुइंगम से चमकाई जा रही है। यह बॉल टैंपरिंग है।

हमारे पास इस स्विंग का माकूल जवाब होना चाहिए। अगर हम अपने बल्ले की दिशा ठीक रखकर तगड़े हाथ दिखाएं तो इमरान खान लाइन लैंथ भूल जाए।

मगर ऐसा नहीं है।

दूसरी ओर नरेंद्र मोदी सबकुछ सेना पर छोड़कर चुनाव प्रचार के लिए पवेलियन लौट गये हैं। इमरान की रिवर्स स्विंग पर उन्होंने हाथ खोलना तो दूर मुंह खोलने की भी जरूरत नहीं समझी है। विदेश मंत्रालय हैरानी जता रहा है।

पुलवामा हमले पर इमरान का यह कहना कि पाकिस्तान ऐसा क्यों करेगा, इंपायर को दिखाकर गेंद पर चुइंगम चिपकाने जैसा है। साथ ही यह कहकर दूसरी सतह को नाखून से खुरचा है कि जंग शुरू करना आसान है लेकिन इसे खत्म करना मुश्किल है।

यह सीधी धमकी है कि भारत को पाकिस्तान में पल रहे आतंकवादियों पर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए।

राजनीतिक मोर्चा मोदी जी को संभालना चाहिए। रिवर्स स्विंग का तोड़ सचिन तेंदुलकर ने खोजा था। फिर द्रविड़ और तेंदुलकर ने मिलकर क्रिस क्रेंस की वो धुनाई की थी कि ऐसे गेंदबाज आज तक भारतीय बल्लेबाजों से कांपते हैं। एक छोर पर द्रविड़ खेलते थे तो दूसरे छोर पर सचिन गेंदबाज पर नजर रखते थे। इस तरह दोनों छोर से रिवर्स स्विंग को ठोका गया।

सिद्धू तो पहले भी गुरू का नाम लेकर फ्रंटफुट खेलते थे। कभी छक्के लगते थे और कभी बाउंड्री पर लपके जाते। इसबार तो उन्होंने रिवर्स बॉल की आशंका से खुद ही उल्टा बल्ला घुमा दिया और क्रीज छोड़कर इतना आगे निकल गये कि अपने ही मीडिया ने स्टंप उखाड़ दिए।

हालांकि सिद्धू के बल्ले की दिशा रिवर्स स्विंग के लिए अनुकूल थी। हम भी यही कहते कि हम युद्ध नहीं चाहते। युद्ध नहीं करेंगे। बस पाकिस्तान में बैठे आतंकियों को खुद ठोकेंगे। पाकिस्तान अच्छे पडो़सी की तरह मदद करे।

चिकनी सतह का ध्यान रखते हुए अगर हम ठुकाई करें तो पाकिस्तान में बैठे आतंकियों के पास खत्म होने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होगा।

कट्टरपंथ से इंसानियत की लडा़ई बहुत पुरानी



अग्नि का रहस्य नचिकेता को यम से मिला था। ऋषि उद्दालक ने हठ ठान लेने पर पुत्र नचिकेता को यम को दान कर दिया था।

इसकी कथा मंडूकोपनिषद में है। अग्नि देव वैदिककाल के सबसे ऊंचे देवता हैं। वे ही अन्य देवों के भरण पोषण का माध्यम माने गये हैं। इसलिए हिंदू धर्म में यज्ञ का महत्व है। देवों को आहूतकर अग्नि में ही आहुति दी जाती है। देव अग्नि में प्रकट हो उन्हें ग्रहण करते हैं।


क्या मंडूकोपनिषद की कथा इंसानों द्वारा अग्नि की खोज की कथा है? मगर अग्नि का अह्वान तो वेदों में भी है। ऋग्वेदकाल काल में भी अग्नि थी। उपनिषदकाल से पहले भी अग्नि का ज्ञान इंसान को था।

यह भी संभव है कि ज्ञान पहले से हो और उस ज्ञान को प्राप्त करने की कथा बाद में लिखी गयी! मगर यही कथा  पिता उद्दालक के यज्ञ से शुरू होती है। जो अग्नि बिना संभव नहीं।

यह संभव है कि पहले इंसान दावानल की अग्नि को ही अखंड ज्योति की तरह प्रज्ज्वलित रखते हों। राक्षस इन्हें आकर बुझा जाते थे।
क्या पकाकर खाने वालों के खिलाफ कच्चा खाने वालों की लडा़ई ही देवताओं और राक्षसों की लडा़ई थी? देवता प्रगतिवादी थे और राक्षस कट्टर रूढी़वादी?




देश के लिए रख लिया दिल पर पत्थर



अभिनय एक कला है। यह हर किसीको नहीं आती।

गम के माहौल में भी हंसना पड़ता है। दिल पर पत्थर रखकर हंसना होता है। मुंह इतना फाड़ना होता है कि ठहाका दिखे। अंदर दिल रो रहा होता है। शहीदों क लिए।पर चेहरा उस रुदन को छुपाता है।

राजकपूर ने मेरा नाम जोकर में एक अभिनेता के इस दर्द को उकेरा था।  शो मस्ट गो अॉन।

राजकपूर फिल्म जगत के साहेब थे। हमारे प्रधानमंत्री जी राजनीति के साहेब हैं। पुलवामा के शहीदों की चिता की राख ठंडी भी नहीं हुई थी साहेब बिहार में नीतीश जी के साथ चुनाव सभा में थे। दिल पर पत्थर रखकर हंसते दिखे। कितना दर्द था इस हंसी में। जनाजे में जाते साक्षी महाराज का दर्द भी ऐसा ही था। कुछ सिद्ध पुरुष है ऐसा कर पाते हैं।

दुख के इस रूप को समझना सबके बस की बात नहीं। दूसरी ओर राजदीप सरदेसाई और राहुल देव जैसे पत्रकार  दुखी हैं। उनका दुख यह है कि उन्हें सौ सौ फोन कॉल आ रहे हैं।

भाई दुखी मत हो। प्रधानमंत्री जी और भाजपा नेताओं को देखो। कैसे दिल का दर्द छुपाते हैं।

मगर आप और जनता भूल के भी ऐसे मत हंसना। आपकी हंसी देशद्रोह होगी। नाकाबिले बर्दाश्त होगी। क्योंकि आप अभिनेता नहीं हैं। आप मेरा नाम जोकर नहीं हैं।

आप नहीं जानते दिल पर पत्थर रखकर देश के लिए कैसे हंसा जाता है!


Monday, February 18, 2019

खतरे में बसंत



पहाडो़ं पर बर्फ है। मैदानों में बसंत सज रहा है।

पुराने पत्ते झड़ रहे हैं। नये कौंपल फूट रहे हैं। बरगद, गूलर और अजीरों पर फल बन रहे हैं। आम बौराने लगे हैं। टेबेबुइया फूलों से लदे हैं।

पहाडो़ं पर बर्फ पिघले तो चलूं। बसंत इतजार में है।

धरती का स्वर्ग रक्तरंजित है। बसंत वहीं रहता है। केसर के फूलों में। ट्यूलिप गार्डन में। सफेद फूलों से लदे सेब के बगीचों में।

बसंत सहमा हुआ है। फिजा़ में बरूद की गंध है। हर तरफ लहू की लिसलिसाहट। तितली और भंवरे दुबके हैं। नहीं जानते बसंत का भविष्य क्या है? उनका भविष्य क्या है?

नफरत और बंदूक ही अब सब तय करती है। नफरत से ठंडी पड़ गईं आत्माओं को कश्मीरी शाल भी अब गर्म नहीं करती।

सिर्फ बंदूकें और पत्थर ही नहीं जब धर्म और देशभक्ति भी नफरत का हथियार हो जाए बसंत खतरे में है। तितलियो और भंवरों तुम अभी दुबके रहने। चिडि़यो तुम शोर न करना। मुंह बंद रखना। धैर्य रखना। इंतजार करना। नफरत हारेगी। प्रेम जीतेगा और बसंत फिर आएगा।

गलती न मानने वाली सरकार

वंदे भारत ट्रेन को प्रधानमंत्री जी ने देश को समर्पित किया।


हमारे पास अब एक ऐसी सरकार है जो कभी अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करती। न गलती को मानकर उसमें सुधार करने की कोई इच्छा जताती है।

रेलमंत्री पियूष गोयल के ट्वीट 

सवाल उठाने पर मंत्रियों के झुंड और भक्तों की भीड़ सोशल मीडिया पर टूट पड़ती है। ऐसी लीपापोती की जाती है कि मूल सवाल पीछे छूट जाते हैं।

राहुल गांधी का एक दिन पहले का ट्वीट 

सत्तर साल में पहली बार देश ने ऐसी सरकार देखी है जो न अपनी गलतियों को स्वीकार करती है और न उन्हें समझने और दूर करने के लिए कोई जांच करती है। सरकार का यह रवैया देश पर भारी पड़ता है, क्योंकि सरकार की हर गलती की कीमत देश को चुकानी होती है।

अखिलेश यादव का ट्वीट 


कई तरह के ट्रायल वाद चली वंदे भारत ट्रेन जब अगले दिन ही धुआं छोड़ गई तो मामले की जांच की जरूरत नहीं समझी गयी। विपक्ष ने सवाल उठाये तो मामले को देशभक्ति से जोड़ दिया गया।

रेलमंत्री पियूष गोयल ट्वीट कर देश को बता रहे हैं कि विद्युतीकरण और दोहरीकरण से वह रेलवे का कायाकल्प कर रहे हैं। मगर रेलवे के बारे में इतना भी नहीं जानते कि ट्रेक विद्युतीकरण का काम 1958 से ही जारी है।

पीयूष गोयल द्वारा लाइक किया गया ट्वीट 

हालत यह है कि जो जयजयकार कर रहे हैं उन्हें मंत्री लाइक कर रहे हैं और जो जांच कराने को कहता है, उसे धिक्कारते हैं।

इस सरकार में चीनी पुर्जे लगाने का खूब चलन है। सेना को भी धनुष तोपें चीनी पुर्जे लगाकर दे दी गयीं। दो साल से सीबीआई के पास शिकायत पडी़ है मगर सीबीआई में दोषियों पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं।

सरदार पटेल की प्रतिमा में भी चीन से बनवाकर सिर लगवाया गया।



Sunday, February 17, 2019

जैसे मोदी, वैसे सिद्धू

  

नरेंद्र मोदी और नवजोत सिंह सिद्धू दोनों की राजनीति एक सी है। दोनों बातों में एक से निपुण हैं। दोनों एक ही राजनीति के स्कूल से हैं। दोनों ने ही अपनी राजनीति की पहली व्यवहारिक शिक्षाा भारतीय जनता पार्टी में सीखी है।

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का पाकिस्तान प्रेम न नया है और न छुपा है। सत्ता में आते ही उमड़ता है। जीत मिलते ही बाहर आता है।

यह नहीं है कि सत्ता मिलते ही लाहौर जाकर नरेंद्र मोदी ने कुछ नया किया। या मंत्री बनने के बाद पाकिस्तान से प्रेम की बातकर सिद्धू ने कुछ नया किया है।

असल में दोनों भाजपा के उसी ऐजेंडे पर चले, जिस पर सत्ता में आते ही अटलजी ने चलकर वाहवाही लूटी और बदले में देश को कारगिल मिला।

लालकृष्ण आडवाणी जी ने भी पाकिस्तान प्रेम की राह अपनाई। जिन्ना की मजार पर जाकर माथा भी टेका पर वाहवाही नहीं हुई। मीडिया में थू थू हुई। नवजोत सिद्धू के साथ भी ऐसा ही हुआ।

लाहौर जाकर पांव छूने पर भी मोदी जी की वाहवाही हुई। बदले में पाकिस्तान से पठानकोट, उडी़ और पुलवामा जैसे हमले मिले।

दूसरी ओर सिद्धू के पाकिस्तान जाकर गले मिलने पर मीडिया ने सवाल उठाये। खूब थू थू हो रही है।

असल में मीडिया ही ओपिनियन मेकर है। इसलिए पाकिस्तान से प्रेम दिखाने पर मीडिया ने जिसे चाहा उसे वाहवाही मिली और जिसे नापसंद किया उसे थू थू।

आज व्यवसायिक मीडिया का अपना एजेंडा है। लाभ का एजेंडा। जो बडा़ आर्थिक लाभ दे सकता है, सिर्फ उसकी ही वाहवाही होगी। उसकी हर गलती को मीडिया रफू करेगा।

मोदी जी की तो सारी योजनाएं ही विज्ञाापनों में ज्यादा चली हैं, धरातल पर कम। इसलिए मोदी मीडिया के प्रिय हैं और रहेंगे।

चैनलों की बातें सुन जोश में आकर किसी नेता को नायक और खलनायक बनाने की ट्रेंडिंग में हिस्सा लेना सिर्फ व्यवसायिक मीडिया के व्यवसाय को बढा़ना है।

चैनल देखकर ओपिनियन बनाने से पहले इस पर जरूर सोचिए कि देश की मौजूदा राजनीति का सबसे बड़ा स्कूल भाजपा कैसे नेता पैदा कर रहा है।