Thursday, January 31, 2019

सोलहवीं सदी के उदार बिंब


चित्र राम जानकी, तुलसी घाट

धार्मिक पुनर्जागरण काल के उत्तरायण की सदी। सोलहवीं सदी को धार्मिक कट्टरता की सदी भी कहा जाता  है।
मगर वह सदी आज से अधिक सहिष्णु थी। गोस्वामी ने 1574 में रामचरित मानस लिखना शुरू किया था। इसके साथ ही तुलसीदास की ख्याति चारों ओर फैलने लगी।

तुलसीघाट स्थित तुलसी तीर्थ में एक ऐसी पेंटिंग है, जिसमें तुलसीदास गद्दी पर बैठे लिख रहे हैं और अकबर के वित्तमंत्री राजा टोडरमल चंवर डुला रहे हैं।

गद्दी पर गोस्वामी और चंवर डुलाते राजा टोडरमल

यह गोस्वामी का ही प्रभाव था कि टोडरमल ने 1585 में काशी में बाबा काशी विश्वनाथ के मंदिर को फिर से बनवाया, जिसे करीब सौ साल पहले सिकंदर लोधी ने तोड़ दिया था। 1585 में अकबर ने स्वयं काशी आकर तुलसीदास से मुलाकात की थी और इतने प्रभावित हुए कि सियाराम की स्वर्ण मुद्रा चलवाई। (क्रमश:)

मोदी के गढ़ में पप्पू की चाय



यह पप्पू की चाय है। नींबू चाय।

कुछ संयोग गजब होते हैं।

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में पप्पू की चाय किसी परिचय की मोहताज नहीं है। यहां जमने वाले अडी़ से काशी के लोग देश की राजनीति का तापमान मापते हैं।

मगर हम राजनीति की नहीं सिर्फ चाय की बात करेंगे। पप्पू अपने काम में माहिर हैं। यहां कमाल की चाय बनती है, जिसका न सिर्फ स्वाद बल्कि बनाने का अंदाज भी निराला है। तोला-तोला मासा-मासा कर चाय बनती है।

काशी में अस्सी चौक के पास स्थित पप्पू की चाय की दुकान 


गर्म पानी भट्टी पर चढ़ा रहता है। शुरुआत कांच के गिलासों को धोने से होती है। पहले ठंडे पानी और फिर गर्म से धोया जाता है। एक साथ छह गिलास सजाए जाते हैं। तीन बडे़ नींबू काटे जाते हैं। चीनी डालने के बाद गिलासों में तोले दो तोले भर गर्म पानी एक साथ केतली घुमाते हुए डाला जाता है। उसके बाद चायपत्ती से भरी छन्नी हर गिलास के ऊपर से घुमाते हुए छन्नी में गर्म पानी डाला जाता है। एक गिलास को एक ही बार में नहीं भरा जाता, बल्कि सभी छह गिलासों से होते हुए यह प्रक्रिया तीन से चार बार में पूरी होती है। हर गिलास गहरे भूरे रंग से आधा भर जाता है।

उसके बाद कटें नींबुओं का हर पीस हाथ से ही दो से तीन गिलासों में निचोडा़ जाता है। पुडि़या फाड़कर खास मसाला हर गिलास में डाला जाता है। फिर हर गिलास में थोडा़ और गर्म पानी डाला जाता है। गिलासों में पेय का रंग भूरे से हल्का नारंगी हो जाता है। चम्मच से अच्छी तरह चलाने के बाद हर गिलास से नींबू के बीज निकाले जाते हैं। चाय तैयार है।

कोई ओर चाया वाला हर गिलास में एक बार में ही पानी डालकर नीबू निचोड़ कर कम समय में चाय तैयार कर सकता है। मगर पप्पू की दुकान पर ऐसा नहीं होता। वह सब गिलासों में साझेदारी से चाय बनाता है। यानी सबका साथ- सबका स्वाद। यह स्वाद का गठबंधन है और इसलिए निराला है।

मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि मोदी भी अपने समय में ऐसी स्वादिष्ट चाय नहीं बना पाते होंगे, जैसी उनके संसदीय क्षेत्र में पप्पू बनाता है।

जैसा कि जीवनी में दर्ज है कि मोदी स्टेशन पर चाय बनाते थे। स्टेशन के चायवाले पत्ती को पानी के साथ उबालते हैं और इससे चाय का असली स्वाद खत्म हो जाता है। मगर पप्पू की दुकान पर  पत्ती पानी के साथ नहीं उबाली जाती।

कभी पप्पू की दुकान पर श्रद्धेय राजनारायण और जार्ज फर्नांडिस जैसी हस्तियां चाय पीने आया करती थीं।
पप्पू चाय बनाने में मोदी से ज्यादा दक्ष है। किसी काम में  दक्ष होना हमेशा तरक्की में बाधक होता है। पूरी उम्र आदमी उसी काम से चिपटा रहता है।

देखा गया है कि जो किसी काम में कुशल नहीं होता ज्यादा तरक्की कर जाता है।  झूठ सच बोलने में गुरेज नहीं करता।

मोदी अगर अच्छी चाय बना लेते तो धंधा जम जाता और आज भी चाय ही बेच रहे होते। चाय का धंधा नहीं जमा तो संघ में चले गये। उस गैर राजनीतिक संगठन ने भी  उन्हें आगे धकेलकर राजनीति में कर दिया।

पप्पू की दुकान पर दूध और नींबू दोनों तरह की चाय मिलती है।  नींबू चाय कुछ वर्ष पहले ही शुरू की है। दोनों का रेट एक है। दस रुपये गिलास।

आप भी कभी काशी आएं तो  अस्सी चौक से थोडा़ आगे चले आएं। किसी से भी पूछ लें। काफी प्रसिद्ध है पप्पू की अडी़।

मगर ध्यान रहे- दोपहर में न आएं। सुबह शाम ही चाय मिलती है।



Monday, January 28, 2019

काशी में तुलसी के पीछे पीछे

सोमवार के शृंगार में बाबा भोलेनाथ 


"यह काशी है। मुक्तिदाता। लोग यहां आते नहीं। प्रारब्ध उन्हें लाता है। पिछले किसी जन्म का पुण्य। यहां श्मशान में स्वयं शिव मुर्दे के कान में मुक्ति मंत्र कहते हैं। मां गंगा की उपस्थिति में। इसलिए सिर्फ यहां ही शवदाह के बाद कहा जाता है- राम नाम सत्य है। मुर्दा मस्त है।"

हरिश्चंद्रघाट

घाट पर किसी भी साधु-संन्यासी या काशीवासी से पूछ लें। सबके मुख से बाबा की नगरी की एकसी ही महिमा सुनने को मिलेगी। विविधता की नगरी में विचार की यह एकरूपता सम्मोहित करती है।

जिज्ञासा  कुलांचे मारती है। काशी किस्सा है? मिथक है? या सत्य है?

एक ही उत्तर है। काशी के इस रूप को समझना है तो पहले तुलसी को समझो।

समझने चलोगे तो न तुलसी समझ में आएंगे न काशी। सबसे पहले समझ को छोडो़।

काशी पर गोस्वामी तुलसीदास की अलग छाप है। काशी के कई रूप हैं। कबीर की काशी भिन्न है और तुलसी की भिन्न। रविदास की काशी तो कबीर की ही पडो़सी है।
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इसलिए।

तुलसी दास की कर्मस्थली की रज लेने हम पहुंचे थे तुलसीघाट। जहां मिले हमें पंडित सियाराम दीक्षित।

"तुलसी सिर्फ लेखनी के ही धनी नहीं थे। नर में नारायण देखते थे। धार्मिक जागरण काल के सबसे बडे़ सामाजिक संत थे। लोगो में रहते और लोगों को जोड़ते। वे किसीके लिए इतना बडा़ रहस्य नहीं थे कि कोई भी उनके नाम पर अलग धर्म चला ले। बल्कि स्वयं सनातन धर्म के इतने बडे़ सेवक हुए कि कर्मकांड और पाखंड कहकर चुनौती देने वाले सारे तर्क आज सन्नाटे में पडे़ हैं।

"जहां तुलसी, वहां भक्ति! और जहां भक्ति, वहां भगतंन की भीड़।

"गोस्वामी ने ही टोलियां जोड़कर राम की लीलाओं का मंचन शुरू किया। यह परंपरा अब भी न सिर्फ लाखों की भीड़ जुटाती है, बल्कि समय के साथ सुदूर उत्तर पश्चिम तक फैली। उसके आगे शेक्सपियर भी बौने हैं।

उन्होंने जगह जगह मंदिरों का निर्माण कराया। यह सब ऐसे ही नहीं हुआ। यह गोस्वामी के कर्म-वचन की ताकत का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

"उन्होंने बताया कि मन में प्रीत और भक्ति हो तो साक्षात दर्शन होते हैं। जहां हनुमत की झलक मिली वहीं प्राचीन श्री सेनापति वनकटी हनुमान जी  बताएं जाते हैं। जहां हनुमत ने हाथ पकड़ लिया वहीं श्रीसंकटमोचन हो गये। उनका हाथ लगते ही एक पाथी सिंदूरी रंग में रंगी और अमर पूजनीय हो गयी।

तुलसीघाट पर वह कक्ष जहां गोस्वामी से जुड़ी चीजें रखी हैं।


बाबा विश्वनाथ की नगरी में तुलसी ने राम-सिया-राम सिया-राम सिया-राम की जो तरंग जगाई वह ढोलक और मृदंग के साथ आज भी उतनी ही मस्ती से गूंजती है।

तुलसी को जानने की कोशिश करोगे? जान नहीं पाओगे! समझने की कोशिश करोगे? दुखी हो जाओगे! समझ नहीं पाओगे।

न जानो ! न समझो! तुलसी के पीछे पीछे चलो। इसीमें आनंद है। परम आनंद।। क्रमश:।।

तुलसी के पीछे पीछे इस यात्रा में आप भी बने रहें साथ

Sunday, January 27, 2019

तीन लोक से न्यारी काशी

प्रथम गणेश 

काशी शिव के त्रिशूल पर बसी है। तीन लोक से न्यारी है। जो जैसी इच्छा लेकर आता है। पाता है। यह यहां की मान्यता है।

खिड़किया घाट पर वरुणा गंगा में संगम करती हैं और अस्सीघाट पर अस्सी नदी का गंगा से संगम होता था। इन दोनों नदियों के बीच ही पुरानी काशी बसी। पुराने समय में गोदाउरी नामक नदी दशाश्वमेध घाट पर गंगा में गिरती थी। नदी अब लुप्त है मगर उसीके नाम पर इस जगह का नाम गोदोलिया कहा जाता है।

इस तरह उत्तर-पश्चिम से तीन धाराएं पूर्व में अर्द्धचंद्राकार मार्ग पर बह रहीं गंगा में गिरती थीं तो एक त्रिशूल आकार का पवित्र बोध कराती थीं।

गोस्वामी तुलसी दास के समय अस्सीघाट से लेकर तुलसीघाट तक एक ही घाट था। अस्सी घाट।

रीवा कोठी जो अस्सी घाट  और तुलसीघाट के बीच बनी है।

अब बीच में कई घाट हैं । जून 1879 में रीवा नरेश ने यहां रीवाकोठी का निर्माण कराया और एक हिस्सा रीवा घाट हो गया। इस तरह तुलसी की कर्मस्थली अस्सीघाट से अलग हो गई। तुलसी अस्सी से विलग कर दिए गये। अब अलग तुलसीघाट है।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा स्थापित पश्चिम मुखी हनुमानजी। तुलसीघाट।


इसी तुलसीघाट पर हमें मिले पंडित सियाराम दीक्षित। उन्होंने यहां हनुमान जी के उन चार स्वरूपों के भी दर्शन कराए, जिन्हें यहां स्वयं तुलसीदास ने स्थापित किया था। ये चारों दिशाओं में हैं। पहले बाहर हैं जिनका मुख पश्चिम की ओर है। अंदर दक्षिण मुख और ऊपरी मंजिल पर उत्तरमुखी हनुमान हैं। यहीं तुलसी गद्दी है, जहां दीक्षा दी जाती है। यहीं एक झरोखे से शिवालाघाट पर बने प्रथम गणेश मंदिर के दर्शन होते हैं। उसे भी गोस्वामी तुलसीदास ने बनवाया था। इसमें दीवार पर सिंदूरी रंग की एक साथ दो प्रतिमाएं हैं।

तुलसी गद्दी, तुलसीघाट 


तुलसी काशी का एक खास रंग हैं। संकटमोचन से प्रथम गणेश तक आप उस रंग की झलक देख सकते हैं। (क्रमश:)
गोस्वामी तुलसीदास की यह कथा अनंत है। कल फिर बात करेंगे।

अस्सी के तुलसी

तुलसीघाट पर तुलसीदास के निर्वाण दिवस की जानकारी देता शिलापट। इसी पर वह प्रसिद्ध दोहा अंकित है- संवत सोलह सो अस्सी--


तुलसी जटिल हैं। तुलसी कठिन हैं। तुलसीदास को समझना है तो सबसे पहले समझ को छोडि़ये।

जितनी समझ लगाएंगे, उतना उलझेंगे। तुलसी को न समझ पाएंगे। श्री 1008 श्रीमत गोस्वामी तुलसीदास। प्रेम से नतमस्तक हो जाइए। तुलसी पूरे के पूरे समझ आ जाएंगे। कुछ छुपा नहीं रहेगा।

काशी में लंका से लेकर दशाश्वमेध तक तुलसी ही तुलसी हैं। उन्होंने जो सनातन मार्ग चुना और जीवनभर सजाया उस पर आज श्रद्धालुओं का रैला दौड़ता है। लोग शांति की तलाश में आते हैं और भीड़ का हिस्सा बनकर खुदको धन्य मानते हैं।

कबीर तर्क से समझ आते हैं। पर तुलसी तर्क से पकड़ में ही नहीं आते। जैसे ही तर्क लगाओ तुलसी अंतरध्यान। फिर इतनी भीड़ क्यों हैं? ये लक्खा मेला क्यों है? आपका तर्क आपको ही बेचैन करेगा। आप और तर्क लगाएंगे। तुलसी और रहस्य हो जाएंगे।

पांच महीने पहले जब बनारस आ रहा था तो सोचा था कि सबसे पहले गोस्वामी को ही समझकर कुछ लिखूं। संकटमोचन, मानस मंदिर,  श्री सेनापति वनकटी हनुमान  जी,अस्सीघाट। गलियों में आठ-आठ किलोमीटर पैदल भटका। सब जगह भीड़ और किस्से मिले। किस्से भी सब ऐसे चमत्कारी कि तुलसी और जटिल हो गये। कठिन हो गये।

अस्सी नदी जो अब गंदगी से सिर्फ नाला बनकर रह गयी है।

आज ढूंढने तो निकला था कि अस्सीघाट पर गंगाजी में अस्सी नदी कहां गिरती है। घाट की सीढ़ियों  पर मिल गये बडा़ हनुमान मंदिर के पुजारी।

अस्सी घाट पर मिले बड़ हनुमान मंदिर के पुजारी 


बताया कि पहले अस्सी घाट पर ही गंगा और अस्सी का संगम होता था मगर अस्सी शहर में होकर आती है और गंदे नाले में तब्दील है। इसलिए नाला खोदकर उसे यहां से हटा दिया गया। करीब तीन सौ मीटर आगे वह नाला गंगा में ही गिरता है। उसके आगे ही 2012 में रविदासघाट बना है। अब अस्सी से रविदासघाट तक बीच में  और भी घाट बनने हैं।
अस्सी से रविदासघाट की ओर बढा़ तो कच्चे रास्ते पर इतनी गंदगी थी कि खिन्न होकर लौट आया। फिर आकर रुका सीधा तुलसीघाट।

घाट की सीढि़यां चढ़कर गंगा अनुसंधान प्रयोगशाला के बोर्ड पर गंगा में प्रदूषण के आंकड़े देखे। इन्हें दस जनवरी के बाद अपडेट नहीं किया गया था। इस प्रयोगशाला का उद्घाटन 27 साल पहले डा. कर्ण सिंह ने किया था।

तुलसी घाट पर मिले पंडित सियाराम दीक्षित।

पास में ही तुलसीदास की गद्दी है। यहां रखी है तुलसीदास जी की हस्तलिखित रामचरित मानस। यहीं मिले हमें पंडित सियाराम दीक्षित। (क्रमश:)
यहां तुलसी कैसे समझ में आए। इसकी चर्चा कल।

Friday, January 25, 2019

... पर वोट मोदिया को ही देव




प्रियंका गांधी बनारस से चुनाव लड़ेंगी!

काशी की गलियों, अडि़यों-सट्टियों पर यह चर्चा है।

काशीवासी मीठे के शौकीन हैं और उनके 'भइया' संबोधन में जो मिठास है वह अन्यत्र कहीं नहीं है। हरियाणा-पंजाब में तो यह शब्द ऐसे कर्कश सुर में कहा जाता है कि सुनने वाला लड़ने पर उतारू हो जाए।

हालांकि संगीत का महान पटियाला घराना पुश्तों से पंजाबियों को यही सिखा रहा है कि उच्चे सुर को नींवा कैसे लाना है और कब विलुप्त करना है। फिर कहां से उठाना है।

मगर पंजाबी हैं कि सीखते नहीं। बस एक बात जानते हैं, सुर ते सिर कदै नींवा नहीं होन देना।
.....
प्रसंग से फिर मूल पर आते हैं।

काशी में प्रियंका की चर्चा है। एक सवाल पूछीये। ढेरों जवाब मिलेंगे। एक से एक रोचक। चाहें पार्टी कार्यकर्ता हों या आम जन। सभी के पास जवाब हैं। भविष्यवाणियां हैं।

क्या प्रियंका काशी से चुनाव लड़ सकती हैं। एक भाजपा कार्यकर्ता से यह सवाल पूछने पर वह तमक जाता है। सुर अपने आप ऊंचा हो जाता है। संबोधन का पहला 'अनिवार्य' शब्द भइया लुप्त हो जाता है-

"उनका यहां का मिली? आजहे एक औरत कह रही- चाहे राशन न मिली। पानी न मिली। दवा न मिली। चाहे सड़ के मर जाव पर वोट हम मोदिया को ही देव।"

कार्यकर्ता समझाता है कि काशी की जनता मोदी के प्रति कितनी वफादार है।

...
अन्यत्र
एक चाय की दुकान पर।
 चुस्कियों के बीच भी प्रियंका पर चर्चा है- भइया मुकाबला रोचक होई जाई।
दूसरा- भइया पर जीत नहीं सकत।
तीसरा- भइया का पता। जीतहे जाए। पब्लिक का कौन भरोसा थोडी़ है।
......

सपा-बसपाइयों से बात करो। उनके चेहरे पर मुस्कान है। चाहते हैं। ये मुकाबला हो ही जाए। मोदी यहीं फंसकर रह जाएंगे। इससे गठबंधन को आसानी होगी।

कांग्रेसियों में उत्साह हैं। पोस्टर चिपका रहे हैं। काशी से लडा़ओ।

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 अगर इसबार मोदी सीट बदल लें और बनारस से चुनाव ही न लडे़ं तो...?

काशीवासियों के लिए यह सवाल ही अविश्वसनीय है। सबका जवाब एक सा है- नहीं भइया। इतना खर्चा किए हैं और कहां जाई। हर दूसरे महीना आवत हंई। बनारस की सीट न छोडि़एं।

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मोदी बनारस को अच्छी तरह से जानते हैं। इसकी नब्ज पहचानते हैं। इसमें कोई शक नहीं।

पर क्या बनारस भी मोदी को पहचान सका है? मार्च तक यह तस्वीर साफ हो जाएगी। मई में नतीजा इसी पर निर्भर करेगा।
#सुराघव

Wednesday, January 23, 2019

चौकीदार का डर



हर चोर कुत्ते से डरता है।

अंग्रेज जब भारत का खजाना लूट रहे थे। महिला मित्रों के घर भर रहे थे। बहुत डरते थे।

भारतीयों ने '1857' कर दिया तो डर और बढ़ गया।  अपने उठने-बैठने की जगहों पर लिखवा दिया- डॉग्स एंड इंडियंस आर नॉट अलाउड।
रायल्स शिमला क्लब इसका गवाह है।

अगर चौकीदार ही चोर हो जाए। तो क्या वह भी कुत्तों से डरता है? या कुत्ते उसके दोस्त होते हैं? यह सवाल हर तरफ पूछा जा रहा है।
जवाब सीधा है।
कुत्ते फितरतन चोर और बिल्ली के दोस्त नहीं हो सकते। यह उनके डीएनए में हैं। जो चोर का दोस्त हो जाए वह कुत्ता नहीं।

यही वजह है कि चोर हो जाने पर चौकीदार सिर्फ कुत्ते से ही डरता है। किसी कुत्ते का सामना करने से कतराता है। मगर चौकीदार होने की वजह से जानता है कि कुत्ते को कैसे और कब मालिक के दरवाजे पर बांधना है।

मीडिया हमेशा वाच डॉग की भूमिका में रहा है। ज्यादातर नेता मीडिया फ्रेंडली होते हैं। वे बेरोक टोक मीडिया से मिलते मिलाते हैं।  जब उनके विभाग या मंत्रालय में कोई घपला घोटाला आता है तो छुपा नहीं रहता और खूब सुर्खियां बनतीं हैं।
ऐसा पहले होता था मगर अब नहीं होता।

अब नेता मीडिया से कतराने लगे हैं। वे बडे़ बडे़ पूंजीपतियों के साथ बेरोक टोक बैठक करते हैं। डील करते और करवाते हैं। एक अलिखित बोर्ड के साथ बाहर अफसर पहरा देते हैं- वाच डॉग्स एंड मीडियामेन आर नॉट अलाउड।
यही वजह के बडे़ बडे़ घोटाले हो जाने पर भी आजकल खबरें नहीं बनतीं।

कभी मीडिया गैलरी नेता के मंच के बिल्कुल करीब बनती थी। अब डेढ़ सौ से दो सौ फुट का फासला रखा जाता है। मीडिया गैलरी को जगह देते वक्त अफसर सिर्फ इस बात का ध्यान रखता है कि पत्रकार अधिकतम कितनी दूर तक जूता फेंक सकते हैं। अगर पत्रकार दो सौ मीटर तक जूता फेंकने का बूता दिखा दे तो कल ही से नेता आधा किलोमीटर दूर खडे़ होकर भाषण देते दिखेगा।

पत्रकार जूता नहीं कलम चलाते हैं। जूता नहीं फेंका जा रहा फिर भी उसका खौफ है।

यही उस सवाल का जवाब है कि चौकीदार चोर हो जाए तो कुत्ते से डरता है। बहुत डरता है।

लाला हरदयाल ने अंग्रेजों को डॉग्स एंड इंडियंस आर नॉट अलाउड हटाने के लिए विवश कर दिया था। पत्रकारिता में भी बहुत से लाला हैं। और इनमें कम से कम दस बीस हरदयाल हैं।

किसी भी दिन न्यूजरूम में यह घोषणा कर देंगे- किसी नेता का थोथा भाषण, झूठ और बकवास छापना तथा प्रसारित करना आज से बंद। तथ्य लाओ। सुबूत लाओ।

Saturday, January 19, 2019

लल्लू जी खावैं, विकास व्यावै



टेंट लग गये हैं। पांच दिन बाद उखड़ जाएंगे। खर्च है ₹200 करोड़ ।

तंबू लगाने और उखाड़ने से राष्ट्र का विकास होगा। सरकारी दावा है कि प्रवासियों को निवेश के लिए प्रेरित किया जाएगा। माॉरिशस, थाईलैंड, सूरीनाम और बहुत से अफ्रीकी- द.अमेरिकी देशों से प्रवासी भारतीय इस सम्मेलन में आ रहे हैं।

वाराणसी में 21 से 23 जनवरी तक होने वाले प्रवासी भारतीय सम्मेलन के लिए ऐढे़ गांव में टेंट सिटी बनाई गयी है। 150 एकड़ में 630 टेंट (स्विस काटेज) लगाये गये हैं। इनमें 1400 प्रवासियों के ठहरने की व्यवस्था है।

जानकारों का कहना है कि 200 करोड़ में तो एक कमरे के आठ से दस हजार फ्लैट बन जाते। उनमें प्रवासी ठहराये जाते और बाद में वे फलैेट प्रधानमंत्री आवास योजना में आवंटित हो जाते। ऐसे एक आवास की निर्माण लागत दो से ढाई लाख रुपये रहती है।

मगर देश के खजाने में गरीबों के लिए पैसा कहां?

 नया मुहावरा है, ' किसान का कर्ज माफ करने से सरकारी खजाने पर बोझ पड़ता है। लल्लू जी खायें तो राष्ट्र विकसित होता है। '

या ऐसे कहें
किसान को देवे तो नेता रोवे, लल्लू जी खावैं, विकास व्यावै।

(लल्लू महज काल्पनिक किरदार हैं, बुनियाद सीरियल ही नहीं यह देश की बुनियाद पर भी असर डालता है)

Friday, January 18, 2019

काशी करवत



श्री भीमेश्वर ज्योतिर्लिंग काशी

विध्वंसकारी ताकते निर्माण करना नहीं जानतीं। निर्माण के नाम पर भी विध्वंस होता है। धन बटोरा जाता है। मगर  निर्माण कभी नहीं होता।

ये ताकतें जब विध्वंस कर रही होती हैं तो न किसी धर्म को मानती हैं और न कानून को। मगर जब इनसे पूछो कि निर्माण कब होगा तो सुप्रीम कोर्ट की दुहाई दी जाएगी।

इतिहास गवाह है -: जब एक धर्मस्थल को ढांचा बताकर तोड़ा गया तो न धर्म की बात मानी गयी न कानून की। जो पैसा बटोरा गया था, उसका भी हिसाब नहीं। अब वही ताकतें कह रही हैं कि मंदिर निर्माण का फैसला तो सुप्रीम कोर्ट को करना है।

आप कानून मानने लगे हैं। आप सुधर गये हैं। यह अच्छी बात है। पर क्या आप वाकई सुधर गये हैं?

निर्माण के बहाने विध्वंस का जो खेल अयोध्या से शुरू हुआ था, वह अब और तेजी से जारी है।

कॉरिडोर के लिए जारी ध्वस्तीकरण 

आजकल काशी में कॉरिडोर निर्माण के नाम पर ध्वस्तीकरण तेजी से चल रहा है। बाबा काशी विश्वानाथ के चौगिर्द 56 विनायक हैं। इनमें से कुछ के सिर से छत हट गयी है। उन्हें टीन के घेरे में रखा गया है। पुष्प प्रसाद भी चढ़ा दिया जाता है।

290 से ज्यादा भवन प्रस्तावित कॉरिडोर के रास्ते में हैं। इनमें अनेक मंदिर है।

पास ही एक गली में प्राचीन काशी करवत मंदिर है। मंदिर की दीवार पर अंकित है- यहां पवित्र भीमेश्वर ज्योतिर्लिंग है। पुराने समय में लोग यहां प्राणोत्सर्ग की भावना से प्रेरित होकर आते थे। करवत (आरा) से सिरच्छेद करा मोक्ष को प्राप्त होते थे।

मंदिर के सेवा में बैठे विद्वान गणेश उपाध्याय। ध्वस्तीकरण से चिंतित है। वह बताते हैं कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री सबको पत्र लिख चुके हैं। अब देखते हैं आगे क्या होता है। अपने शिव पर भरोसा है। जो हो रहा है, धर्म के अनुसार नहीं है। मंदिर में ईश्वर कैसे प्राण प्रतिष्ठित किये जाते है। इस विधान को भी विस्तार से समझाते हैं।

पहले मीडिया में खबरें दी गयी थीं कि ध्वस्तीकरण के साथ ही एक तरफ से निर्माण भी शुरू हो जाएगा। मगर तीन माह से सिर्फ ध्वस्तीकरण ही जारी है। निर्माण कब होगा? वक्त ही बताएगा? यह भी संभव है कि निर्माण का वक्त आते ही कोई कानून याद आ जाए और हाथ ठिठक जाएंं।

 धवस्तीकरण के बीच एक दीवार पर हनुमान जी प्रकट हो गये हैं। उस दीवार को छोड़कर काम आगे बढ़ गया है।

Friday, January 11, 2019

एक सकारात्मक खबर


सूचना तकनीक क्रांति के साथ ही पत्रकारिता में भी अमूलचूल परिवर्तन आया है। यह छुपा नहीं है। हम सब इसके साक्षी हैं।

सरकार अगर अनिश्चितकाल के लिए चुनाव स्थगित कर दे तो आज इसे गलत कहना नकारात्मक विचार मान लिया जाएगा।

यह संभव है कि ज्यादातर न्यूज चैनल चुनाव न कराने के फायदे गिनाने लगें। एंकर आंकडे़ देकर समझाने लगें कि देश में चुनाव कराने में कितना खर्च आता है। यह सारा पैसा अब देश के विकास में लगेगा। इससे कितने रोजगार पैदा होंगे। कितने एम्स बन सकते हैं। कितनी प्रतिमाएं बन सकती हैं। कितनी सड़कें बन सकती हैं। कितने स्कूल बन सकते हैं। कितने शहरों के नाम सुधारे जा सकते हैं। कितने मंदिर बन सकते हैं। इत्यादि।

चुनाव न कराने के फायदे गिनवाने पर ये उसी तरह महीनों बहस चलवा सकते हैं, जैसे नोटबंदी के फायदे गिनवाने में जोर लगाया था।

प्रेस इतनी आजाद शायद पहले कभी नहीं थी। जनता के प्रति जवाबदेही से उसने खुदको पहले कभी इस तरह मुक्त नहीं किया था। यह प्रेस की आजादी का दौर है।

नोटबंदी और जीएसटी के लाभ ही लाभ जिस तरह गिनाये गये, वे सब पत्रकारिता के इतिहास में दर्ज हो गये हैं। वक्त उन सबका अध्ययन करेगा।

जीएसटी से बहुत सी चीजें सस्ती हो जाने की खबरें कितनी सच निकली? नोटबंदी से कालाधन खत्म हो जाने की खबरें कितना सच थीं? पत्रकारिता की आने वाली पीढि़यां यह सब  जानेंगी।

क्या निरंकुश राजनेताओं के पीछे चलते हुए प्रेस भी खुद को जनता पर शासक की मुद्रा में पाती है?

हालांकि निरंकुश ताकत का कोई भविष्य नहीं। हिटलरशाही हिटलर से शुरू होकर हिटलर पर ही खत्म होती है। तानाशाही और निरंकुश ताकतें निर्वंश है। इनका कभी वंश नहीं चला।

पत्रकारिता अपने जनसरोकारों की वजह से फलीफूली है।

जनता और उसके हित ही सर्वोपरि हैं। नर में नारायण हैं। बंदे में खुदा है। बंदा खुदा नहीं है।

सिर्फ सकारात्मक खबरें लिखी जाएं। एक ओर पांच साल से पूरा सरकारी तंत्र इसके लिए मीडिया की नाक में उंगली किए हुए है। दूसरी ओर नेता खुद दुनिया में घूम घूमकर प्रचार करते हैं कि देश सत्तर साल में बर्बाद हो गया।

क्या सत्तर साल पहले अंग्रेज बडा़ ही खुशहाल भारत छोड़ कर गये थे?  नेताओं से ज्यादा नकारात्मक बातें आजकल कोई नहीं कर रहा। जो जितना बडा़ नेता, उतने नकारात्मक बोल।

पर सच तो सच है। उसे बोलो या न बोलो । वह रहेगा। किसी अशोक शिलालेख की तरह। सदियों के बाद भी प्रकट हो जाएगा।

Friday, January 4, 2019

क्या क्योटो से कम है काशी



काशी का विकास सदियों से जारी है। इसका श्रेय यहां के लोगों को है। देशभर के राजा रजवाडो़ं को है, जिन्होंने खूबसूरत घाटों को विकसित किया। सुंदर मंदिर बनवाये।

जो काशी को क्योटो बनाना चाहते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि हमारी काशी का महत्व क्या क्योटो से कम है।

क्योटो जापान का धार्मिक शहर है और 'शांति की नगरी' कहलाता है। हमारा काशी भी सदियों से 'मोक्ष की नगरी' के रूप में दुनिया में प्रसिद्ध है।

क्योटो अपने विशाल मंदिरों और कलात्मक भवनों के लिए प्रसिद्ध है तो काशी के बाबा विश्वनाथ, संकटमोचन और विशालाक्षी मंदिर में सभी हिस्सों से श्रद्धालु आते हैं। गंगा के घाट अपनी स्थापत्य कला के लिए दुनिया के आकर्षण का केंद्र हैं। इन घाटों ने गंगा के जलप्रलय से भी शहर को सुरक्षा दी।

क्योटो अपने रेशम वस्त्र उद्योग के लिए जाना जाता है तो बनारसी सिल्क भी किसी परिचय का मोहताज नहीं है। बनारसी साडी़ में सजी दुल्हन उत्तर भारतीय परंपरा का खास पैमाना है।

चमक -दमक में भी काशी कहीं से क्योटो से कम नहीं। शाम को गोदोलिया, महमूरगंज और रथयात्रा के बाजारों में घूमिये। उद्मियों ने न सिर्फ अपने प्रतिष्ठानों को चमकाया है बल्कि सीआरएस फंड से सड़कों पर भी खास लाइटिंग की है? इस सब में भला किसी सरकार का योगदान है?


क्योटो जापान में बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा केंद्र है। क्या काशी को क्योटो बनाने का मतलब इसे बौद्ध सर्किट के सबसे बडे़ केंद्र के रूप में विकसित करना है? नहीं लगता कि सरकार की ऐसी कोई मंशा होगी, जबकि काशी से दस किलोमीटर की दूरी पर सारनाथ के रूप में बौद्ध धर्म का एक बड़ा केंद्र मौजूद है।


Wednesday, January 2, 2019

काशी अब क्योटो भई


(पंचवटी कालोनी की तस्वीर जो 2 जनवरी 2019 की है)


जिन्हें जिद है कि काशी क्योटो होना चाहिए। उन्हें मुख्य सड़कों से उतरकर जरा काशी की गलियों में घूमना चाहिए।
जानना चाहिए कि काशी कैसी है और इसकी जरूरतें क्या हैंं? अगर तुम काशी की जरूरतों को नहीं समझ सकते तो तुम उसका विकास नहीं कर सकते।

(गोदोलिया की एक गली। तस्वीर 2 जनवरी 2019)


बिना सोचे समझे थोपा गया विकास का कोई रेडीमेड मॉडल काशी की पीठ पर ऐसा बोझ बन सकता है जो उसकी व्यवस्था की रीढ़ को ही नष्ट कर दे।

10 हजार नाविकों के रोजगार को खत्म कर गंगा में चुनिंदा कंपनियों के क्रूज उतारने को क्या काशी का विकास कहा जा सकता है?

( गंगा में क्रूज चलाने के विरोध में नाविकों की हड़ताल के कारण आरपी घाट पर जेटी के आसपास बांधीं गयीं नावें - तस्वीर 2 जनवरी 2019 )


अगर अफसरों को नजर से काशी को देखोगे तो वे इसे ही विकास बताएंगे। वे विकास की झूठी तस्वीर पेश करेंगे और तुम से झूठ भी बुलवाएंगे। जैसे 18 सितंबर 2018  को प्रधानमंत्री ने बीएचयू में जनसभा के दौरान आईपीडीएस परियोजना का लोकार्पण किया और बताया गया कि इस योजना से बनारस को बिजली के तारों के जालों से मुक्ति दे दी गयी है। तारें भूमिगत कर दी गयी हैं। मगर इस घोषणा के चार महीने बाद भी आपको गलियों में बिजली के तारों के जाल मिलेंगे। यकीन न हो तो मैदागिन और गोदोलिया की गलियों का चक्कर लगा लें।

(मैदागिन की एक गली में तारों का जाल। तस्वीर 2 जनवरी 2019 )


काशी में सबसे ज्यादा जरूरत नागरिक समस्याओं को दूर करने की है, मगर इस दिशा में सबसे कम और धीमा काम हो रहा है।

इस विकास का मतलब काशी के लोगों के लिए काशी का विकास नहीं है। यह ऐजेंडा है कि काशी दुनिया को क्योटो जैसी नजर आनी चाहिए, भले ही इसके लिए काशीवासियों को कितनी भी बडी़ कीमत क्यों न चुकानी पडे़? (क्रमश:)