Sunday, March 4, 2018

इस हार जीत के मायने

देश में कम्युनिस्टों और कांग्रेस की हार पर आज खुशी मनाई जा रही है।
भारत की आजादी के लिए लड़ने में ये दोनों ही नाम अग्रणी रहे हैं।
कम्युनिस्टों ने अंग्रेजों के खिलाफ गदर और भूमिगत संघर्ष किए। किसानों और मजदूरों में आजादी की अलख जगाई। तो कांग्रेस ने मंच और मोर्चों से अंग्रेजों के खिलाफ राजनीतिक लडा़ई लडी़।

दोनों ही संगठनों ने बहुत सी कुर्बनियां दी। इनके नेताओं ने लंबे लंबे कारावास भोगे।

तब एक तीसरा संगठन भी था, जिसके अनुयायी अंग्रेज पुलिस के रंग का कच्छा पहनकर अंग्रेज भक्ति करते थे और मुस्लिम लीग की ही तरह नफरत फैलाते थे। इनका कोई नेता कभी अंग्रेजों का विरोध करने के लिए नहीं धरा गया।

अब बात करते हैं सावरकर की। 1911 से पहले अच्छे भले रिपब्लिकन थे। इटली के मैजिनी से प्रभावित थे। अपना क्रांतिकारी संगठन भी बनाया। 1910 में पकडें गये। 50 साल की सजा हुई और कालापानी भेज दिए गये।
कालापानी की सेलुलर जेल में एक महीना ही हुआ था कि 30 अगस्त 1911 को  अपने क्रांतिकारी कार्यों पर खेद जताते हुए दया याचिका लिख दी जो चार दिन में ही खारिज हो गयी।
मगर सावरकर ने क्षमा याचना मांगने में कसर नहीं रखी और 14 नवंबर 1913, 1917 और 30 मार्च 1920 को चौथी बार दाया याचिका डाली। जेल में ही सावरकर ने हिंदुत्व पर तीन किताबें लिखीं और रिपब्लिकन क्रांतिकारी से सीधे हिंदू चिंतक बन गये।

1920 में ही महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक और विट्ठलभाई भाई पटेल ने भी सावरकर को बिना शर्त रिहा करने की अंग्रेजी हकूमत से मांग की।
आखिर कुछ शर्तों के साथ सावरकर को रिहा कर दिया गया। सावरकर ने उन शर्तों कापूरी तरह पालन किया और फिर कभी अंग्रेजों के खिलाफ चूं नहीं किया।

उसके बाद 5 फरवरी 1948 को गांधी जी की हत्या के षड्यंत्र में पकडे़ गये। हालांकि गोडसे ने सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ली और सावरकर रिहा हो गये। ये वही गांधी थे जो 1920 में सावरकर को रिहा कराने के लिए अंग्रेजों से भिडे़ थे।

आजादी का सुख भोगते 70 साल हो गये हैं। आजादी के लिए लड़ने वाले गदर करने वाले जनता के दिल से उतर गये हैं। गद्दारी करने वाले देशभक्ति के रंगे हुए चोले में हैं। तरीका अब भी वही है - नफरत फैलाओ और राज करो।

1 comment:

Ashwini Vashishth said...

हम लोगों की त्रासदी रही है और लगता है, अभी तक चली आ रही है कि हम एक तो अपना अतीत बहुत जल्दी भूलते हैं और दूसरे लच्छेदार प्रवचनों के बहकावे में बहुत जल्द आ जाते हैं। नतीजा हमेशा यही निकला, गुलामी। हम अपनी सोच को विस्तारित नहीं कर पाते, विचारों के गंदले पानी को निथार नहीं पाते और वैसे का वैसा गटक जाते हैं। बाद में बदहजमी, बिमारियों को भोगते हैं और दोष पानी पर मढ़ देते हैं और पानी के गंदलेपन बारे कुछ नहीं सोचते। इसका इससे बढ़ा और उदाहरण क्या होगा, कालाधन वापस आएगा और हर नागरिक के खाते में 15-15 लाख जाएगा। ऐसा कुछ नहीं हुआ, बल्कि नोटबंदी की आड़ में एक नया प्रपंच रचा गया, स्वांग किया गया कि कालेधन का उपाय किया जा रहा है। इसके लिए भी जमाखोर और धन्ना सेठ चुन-चुन कर निशाने पे लिए गए और इससे कोई मतलब नहीं था कि नोटबंदी से आमजन को कितना कष्ट उठाना पड़ेगा। एक खेल खेला गया। हिन्दुस्तान में खेल पर खूब तालियां पीटी जाती हैं, इस पर भी खूब पीटी गईं।