Friday, February 23, 2018

एक लुटते देश का अधिनायकवाद

अगर आप नीरव मोदी का भारत में इतिहास खंगालते हो तो पता चलता है कि जैसे जैसे नरेंद्र मोदी का करियर बढ़ता है नीरव का भी बढ़ता है।
संघ और भाजपा के एक खेमें में यह चर्चा सुनी जा सकती है।
1998 से पहले मोदी गुजरात में शंकर सिंह बघेला को खुड्डे लाइन लगा चुके थे। इसी साल मई में वह गुजरात से निकलकर राष्ट्रीय महासचिव के रूप में भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बने।

तब केंद्र में अटल जी की सरकार थी और मोदी जी पर आडवाणी जी की पूरी कृपा थी। ठीक अगले साल 1999 में विदेश से आया 28 साल का एक नोजवान नीरव मोदी फटाफट सारी मंजूरियां लेकर  फायरस्टार कंपनी शुरू करता है। कंपनी का काम है कच्चे हीरे लाकर उन्हें तराशकर बेचना।

वर्ष2002 गुजरात दंगों के बाद पार्टी में ही कई नेता नरेंद्र मोदी का विरोध करने लगे थे। मोदी का विरोध करने वालों में तब स्मृति इरानी काफी मुखर थीं और 2004 में तो उन्होंने मोदी के खिलाफ धरने तक का आह्वान कर दिया था। मोदी के खिलाफ पार्टी में ही विरोधी स्वर तेज होते जा रहे थे। 2008 तक यह सिलसिला जारी था।

उधर 2007 के अंत में नीरव के एक खास दोस्त ने उससे कहा कि वह उसे  हीरेजडि़त ऐसे बहुमूल्य ईयर रिंग बनाकर दे कि उसकी रूठी दोस्त देखते ही मान जाए।

नीरव इस दोस्त की बात नहीं टाल सकता था। उसने कई महीनों की रिसर्च के बाद 2008 में दोस्त को हीरे के ईयर रिंग दिये। दोस्त की रूठी सहेली उन्हें देखते है खुशी से लिपट गयी। इससे खुश होकर उस दोस्त ने नीरव को सलाह दी कि नीरव तुम अपने आपको ब्रांड बनाओ। मैं घाहता हूं तुम अपने नाम से हीरा बेचो। शोरूम खोलो। जितनी मदद होगी मैं करूंगा।

इसके बाद 2014 में नीरव मोदी ने अपना पहला शोरूम अपने नाम से ही दिल्ली में खोला। इसके बाद उसने मुंबई  अमेरिका हांकांग लंदन में धडा़धड़ स्टोर खोले।

इससे आगे की कहानी पीएनबी घोटाले के नाम से दर्ज है। जिसकी जांच सीबीआई कर रही है। वही जांच जिसके बारे  में अदालत ने कहा है कि सरकार जांच करा रही है।मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार।

2014 से नीरव की तरक्की में उसके उस खास  दोस्त ने कितनी और कैसे मदद की? काश सीबीआई इसका पता लगाये।

Tuesday, February 6, 2018

आप भी जानें - कहां बिकते हैं एक लाख रुपये किलो से भी महंगे पकौडे़

जनता :  अगर बेसन का भाव 110 रुपये किलो है तो बताओ जयंत शाह ने 50 हजार रुपये में कुल कितना बेसन खरीदा था?

जयंत का बाप :  कुल 454.5 किलो सरकार।

जनता : बहुत खूब! अब बताओ... एक किलो बेसन से आलू प्याज पालक गोभी पनीर आदि के कुल कितने किलो पकौडे़ बनते हैं?

जयंत का बाप :  एक किलो बेसन से तीन किलो पकौडे़ बन जाते हैं हजूर।

जनता ; तो 454.5 किलो बेसन से कुल कितने पकौडे़ बने थे?

जयंत का बाप :  हजूर कुल 1363 किलो पकौडे़ बने थे।

जनता :  अगर 1363 किलो पकौडे़ 16 करोड़ रुपये में बेचे गये तो पकौडो़ं का भाव बताओ?

जयंत शाह का बाप :  पकौडो़ं को 1,17,388 रुपये किलो के भाव से बेचा गया।

जनता :  एक लाख रुपये किलो से भी महंगे पकौडे़ कौन खरीदेगा!

जयंत का बाप :  बडे़ लोग खरीदते हैं। विश्वास नहीं होता तो उत्तराखंड के सीएम से पूंछ लो।

जनता :  सीएम??

जयंत का बाप :  हां! अपना चंदन मंगलेश।

जनता : तो यह बताओ पकौडो़ं के लिए तेल कहां से मिला?

जयंत का बाप : तेल और गैस पर हमारा बिल्कुल खर्च नहीं हुआ। तेल तो जयंत के  चाचा अदानी ने दान किया। उनका बहुत बडा़ मिल है। गैस हमें उज्ज्वला योजना में मिली।
इन जवाबों के बाद से जनता की बोलती बंद है।

Sunday, February 4, 2018

ब्रह्मावर्त से ब्रह्मावाला और फिर अंबाला बना



सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम्।
त देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्त प्रचक्षते।।17।।
(मनुस्मृति, द्वितीय अध्याय)
सरस्वती और दृषद्वती इन देव नदियों के मध्य में जो देश है देवताओं से बनाया गया है उसको ब्रह्मवर्त कहते हैं।

कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पञ्चाला: शूरसेनका:।
एष ब्रह्मर्षिदेशो वै ब्रह्मावर्तादन्तर:।।19।।
(मनुस्मृति, द्वितीय अध्याय)

कुरुक्षेत्र और मत्स्य देश, पञ्चाल और शूरसेनक ये ब्रह्मर्षि देश हैं जो ब्रह्मावर्त से समीप हैं।

मनुस्मृति के दूसरे अध्याय में सरस्वती नदी और इसकी स्थिति का स्पष्ट वर्णन मिलता है। सरस्वती और दृषद्वती (चौतांग नदी) बर्ह्मावर्त के दोनों और बहती हैं। यह देश कुरुक्षेत्र के पास है। अर्थात घग्गर और चौतांग के बीच बसे अंबाला के क्षेत्र को ही वैदिक काल में ब्रह्मावर्त कहा गया।

क्या ब्रह्मावर्त शब्द ही अपभ्रंश होकर ब्रह्मावाला और कालांतर में अंबाला हुआ? क्या घग्गर ही सरस्वती है? इन सवालों पर चर्चा अगले लेख में। (क्रमश:)

Saturday, February 3, 2018

देवताओं के युद्ध में छुपा नदियों का इतिहास

देवताओं की लडा़इयों की कथायें इतिहास का संकेत भी देती हैं। गंगा नदी का इतिहास दो संस्कृतियों की  ऐसी ही कथाओं में छुपा है।

चीनी धर्मकथाओं के अनुसार गोंगौंग बाढ़ और तबाही मचाने वाला देवता था। जिसे अग्नि का देवता झूरोंग युद्ध में हरा देता है। हारे हुए गोंगौंग को स्वर्ग से नीचे फेंक दिया जाता है। हार से गुस्साया गोंगौंग अपना सिर बुझऊ पर्वत में मारता है। पर्वत गिरने लगता है। धरती दक्षिण - पूर्व की ओर खिसकने (गंगा चीन के दक्षिण पूर्व दिशा में ही बहती है) लगती है। देवी नुवा विशाल कछुए की टांग काटकर गिरते पर्वत के नीचे लगाकर उसे गिरने से बचाती है। बाढ़ थम जाती है मगर चीन में नदी, चांद और तारों की दिशा बदल जाती है।

इस कथा में गौंगोग के सहायक देवता जियांगलियू का भी जिक्र है, जिसका शरीर सांप जैसा है और नौ सिर हैं।

गोंगौंग और गंगा अवतरण कथाएं एक ही जलधारा के लिए हुए संघर्ष का दो अलग-अलग पक्षों और संस्कृतियों द्वारा दिया गया विवरण लगती है, जिनके किरदारों में आश्चर्यजनक ढंग से समानता है।

चीनी कथा में अग्नि के देवता झूरोंग युद्ध में जीतते हैं तो दूसरी ओर भारतीय कथाओं में सगर के 60 हजार पुत्रों को जलाकर भस्म करने का जिक्र है। हमारी कथाओं में विष्णु की मौजूदगी भी दिखाई गयी है तो चीनी कथा में नौ सिर वाले सर्पाकार देवता जियांगलियु का जिक्र है, जिसका विवरण शेषनाग से मिलता जुलता है।

क्या बुझऊ पर्वत ही गोमुख पर्वत है? जो नीचे से कच्छप आकार में उठा है और इस वजह से पर्वत के नीचे बनी सुरंग से रिसकर कैलाश मानसरोवर का पानी आता है? यह रिसर्च का विषय है। गंगा में कैलाश का पानी होने पर रिसर्च का एक काम उमा भारती ने मंत्री रहते हुये देश के भूवैज्ञानिकों को सौंपा भी था। नतीजे का इंतजार करना चाहिए। (-क्रमश:)


Thursday, February 1, 2018

रहने दो वकील बाबू तुम्हारे बस का नहीं

अफसरों ने लिख दिया। जेटली जी ने पढ़ दिया। जो पढ़ा, उसका अर्थ जेटली जी को पता है क्या?
अर्थ समझते तो बजट को थोड़ा व्यवहारिक बना लेते। न स्टेंडर्ड डिडेक्शन देने की जरूरत पड़ती न सेस लगाने की। वकील बाबू क्लीयर ही नहीं कर पाये कि वह नौकरी पेशा को छूट देना चाहते हैं उससे और वसूली करना चाहते हैं।

आफिस में बैठे अर्थशास्त्रियों ने ऐसी चावी घुमाई की वकील बाबू अच्छा अच्छा करते रह गये और कुछ उनके पल्ले न पड़ा।

क्या सोचा था कि आलू प्याज से महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और गुजरात का किसान खुश हो जायेगा। किसान को पैसा कैसे जाएगा आधार के जरिये या कंपनियों के थ्रू। 300 करोड़ कैसे चट हो जाएंगे, पता चलेगा?

सुनो वकील बाबू पिछले तीन साल में तुम्हारी ऐसी ही नसमझियों से बैंक तबाह हैं। अब तुम जनता की गाढ़ी कमाई का पैसे तुम बैंकों को डूबने से बचाने में लगा रहे है। तुम उस झोला छाप डाक्टर की तरह हो जो डेंगू के इलाज का बिल तो 16 लाख बना देता है पर मरीज को बचा नहीं पाता।

मेरी बात मानो तो तुम अर्थशास्त्र का मोह छोडो़! ये काम सुब्रहमण्यम स्वामी के लिये छोड़ दो। अपनी वकालत करो। मानहानि के केस लडो़।