Saturday, January 20, 2018

प्राचीन नदी के खोये लोग



अजीब खेल चल रहा है। झांसा हेड से नहर का पानी पाइप से पिपली लाकर उसे सरस्वती नदी घोषित किया जा रहा है।

ऐसे में जब सरस्वती की मूल धारा आज भी नदी के रूप में बह रही है तो उसके समांतर नहर खोदकर, उसमें अन्य नहरों का पानी भरकर उसे सरस्वती घोषित करना न सिर्फ़ जनता के धन की बर्बादी है, बल्कि एक ही नदी की दो नदियां बनाकर  अपने इतिहास को बर्बाद करने का भी पाप है।

सरस्वती और घग्गर नाम एक ही नदी को अति प्राचीन उन दो अलग-अलग संस्कृतियों ने दिए हैं, जिन्हें वेदों के लेखन काल में व्यास ने एक करने की कोशिश की। पहले तीन वेदों की शैली चौथे अथर्वेद से बिल्कुल भिन्न है। अथर्वेद की शैली यहुदियों और पारसियों के प्राचीन ग्रंथों से मिलती है। यहां यह उल्लेखनीय है कि वेदों का लेखन उनके रचनाकाल से बहुत बाद में हुआ। लेखनकाल में अन्य सभ्यताएं संपर्क में थीं, जिसे आर्यों के बाहर से आने का संकेत ज्यादातर इतिहासकार मानते हैं।

ऐसे पर्याप्त ऐतिहासिक और भौगोलिक तथ्य हैं जो साबित करते हैं कि आज की घग्गर की धारा ही मूल सरस्वती है। वक्त के साथ साथ स्रोत बदलने से इस धारा में कुछ विचलन हुआ। नासा द्वारा तलाशा गया पेलियो चेनल इसी नदी की प्राचीन कालीन स्थिति है जो घग्गर के समानंतर है।

अफगानिस्तान से लेकर गंगा क्षेत्र तक बहुत सी नदियों के नाम सरस्वती से मिलते जुलते हैं। इतिहासकार मानते हैं कि सर शब्द जो जलराशि या तालाव का प्रतीक है उसी से नदी के लिए सरस्वती शब्द बना और आर्यों के मार्ग में आई नदियों को उन्होंने इसी नाम से पुकारा, जबकि मूल निवासी अन्य नाम से पुकारते थे।

सरस्वती शब्द घग्गर कैसे बना? इसकी चर्चा अगले लेख में।(क्रमश:)

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