Wednesday, August 9, 2017

जनमत का हत्था

सुधीर राघव 

एक तरफ है सारी सत्ता
एक तरफ इकलौता पत्ता

झुकी डालियां बता रही हैं
तूफान यहीं से गुजरा है
तू भी उठकर देख मजे से
यह सत्ता का मुजरा है
सूरज खूब तपा था दिनभर
रेत अभी तक तत्ता है
उस फकीर से क्या छीनोगे
जिसके तन न लत्ता है

कुर्सी खूब हिलाई तुमने
पर लोकतंत्र न हिलता है
उस अंगद की लात से भारी
इस जनमत का हत्था है।

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