Tuesday, August 22, 2017

एक तलाक और तीन तलाक बनाम बिना तलाक

बहुत अच्छा फैसला है। कोई भी समुदाय, खाप खुद ही फैसला कर ले तो अदालते क्या करेंगी?
तलाक के लिए सब अदालत आएंगे तो वकीलों का रोजगार बढ़ेगा। अदालतों का काम बढ़ेगा। देश तरक्की करेगा।

समस्या सिर्फ कानून से हल नहीं होती। लोगों के जागरूक होने से होती है। कट्टर हिंदुओं में भी बिना तलाक लिए पत्नी छोड़ देने का चलन है। आजादी के सत्तर साल बाद भी यह जारी है।

हिंदू मैरिज एक्ट है। कानून प्रावधान है मगर ये छूटी पत्नियां आज भी अपने अधिकारों से वंचित हैं। ये भी आरटीआई लगा कर अपने अधिकार जानना चाहती हैं। मगर कोई बताता नहीं।

यह खुशी की बात है कि अदालतें समुदायों को उनकी फैसला करने की परंपरा से मुक्त कर रही हैं और सारी जिम्मेदारी अपने पास ले रही हैं।

पर समुदायों को दायित्व मुक्त करने से पहले एक बात पर जरूर गौर करना चाहिए । क्या अपना बोझ बढा़ कर कोई गलती तो नहीं की जा रही। क्या अदालतों में भीड़ बढा़कर बेहतर नतीजे आएंगे?
क्योंकि पहले एक पूर्व चीफ जस्टिस रो रोकर बताया करते थे कि अदालतों में काम ज्यादा है और जज कम। यह बहुत पुरानी बात नहीं है।

1 comment:

Unknown said...

सही कहा परिवार न्यायालय के मामलों को परिवार कल्याण समझौता समितियों से निपटने की कोशिश करना होगा