Sunday, August 20, 2017

प्रभु की रेल और नारायण का दुख

प्रभु की लीला गजब है! प्रभु की रेल उससे भी गजब है!

हरिद्वार के लिए पकड़ो तो गंगा दर्शन से पहले वैतरणी पार करा दे। अब तो लोग कहने लगे हैं कि वैतरणी पार करनी है तो गाय की पूछ नहीं प्रभु की रेल पकड़ो ।  गाय क्या वैतरणी पार कराएगी! वह तो खुद कीचड़ में दम तोड़ रही है। भूख प्यास निर्बल होकर तड़प रही है। गोशालाएं ऊसके लिए काल कोठरी हो गई हैं। नेता उसके नाम पर नोट और वोट दोनों खा रहे हैं।

नारायण  दुखी हैं। गोरखपुर से बच्चो के शव आ रहे हैं। छत्तीसगढ़ से गायों के। गंगा के रास्ते से श्रद्धालुओं के।
उन्होंने यम को तलब कर पूछा - धरती पर किस राक्षस का राज है? कौन है जो मासूमों और निर्दोषों की मौत का कारण है?

यमराज ने कहा - हे स्वामी! वह आपका ही भक्त है । वह मंदिर बनाने की बात करता है। उसने गोशालाएं खुलवाई हैं। और तो और उसने हर हर के आगे से महादेव का नाम हटाकर अपना रखवा दिया है।

नारायण ने महादेव की ओर देखा और पूछा - प्रभु यह कैसी लीला है?

महादेव मुस्कुराए- प्रभु ये लीला न मेरी है न आपकी और न ही ब्रह्मा जी की। यह खेल तो धरती के धनकुबेर खेल रहे हैं। उनका एक ही मकसद है, बस जियो! जियो! और जीने मत दो!  

नारायण ने पूछा - प्रभु इस लीला को कौन समेटेगा?

महादेव - इस लीला को न मैं समेटूंगा न आप समेटोगे। इसे तो जनता ही समेटेगी।

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