Tuesday, July 25, 2017

घेवर के तेवर

सुधीर राघव


उत्तर भारतीयों ने मैदा से बहुत से प्रयोग किए हैं। जलेबी, बालूशाही,  गुझिया, शक्करपारे और घेवर। धान, जौं, चना और मोटे अनाज खाने वालों का परिचय जब इरानी गंदुम के लोच और समोसे से हुआ तो मीठे के शौकीन भारतीयों के कई  तार झनझना गये। वे समोसे, फैनी, मट्ठी  पर ही नहीं अटके रहे।

घेवर मैदे के पकवानों में सबसे खास है। यह सिर्फ सावन में बनता है। कला का अद्भुत नमूना है। जेसलमेर की प्रसिद्ध  पटवा हवेलियों के गोल्डन पत्थरों पर हुई बेजोड़ नक्काशी के जोड़ का है। खौलते देसी घी में कूदकर सांचों में ढला मैदा फूलकर जो आकार लेता है, उसके कि्रस्पी क्रंच के आगे अच्छे अच्छे चॉकलेट फेल हैं। यह बनता तो एक ही तरीके से है मगर सजाया इतने तरीके से जाता है कि यूरोप का कैक भी इसके सामने कच्चा और नौसिखिया लगता है।

रोहतक के गुलाब हलवाई जाने तो अपनी रेबडि़यों के लिए जाते हैं मगर रेबडि़यां सिर्फ सर्दियों में ही बनती हैं। इसलिए सावन में घेवर पर भी क्या खूब हाथ आजमाते हैं। सिर्फ गुलाब ही नहीं हरियाणा  और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हर हलवाई के पास सावन में घेवर मिलेगा। गांव देहात में दुकान होगी तो उस पर भी। पंजाब के प्रमुख शहरों और चंडीगढ़  में भी प्रमुख मिष्ठान भंडारों में सावन में यह खूब सजता है।

और हां! घेवर का मतलब सिर्फ मिठाई नहीं है। इसका मतलब है सब बहन, बेटियों और बुआओं को हरियाली तीज की बधाई।

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