Monday, July 31, 2017

Tolerance formula : सहनशीलता कैसे ज्ञात करें

दो साल पहले पत्रकार अक्षय सिंह व्यापम घोटाले पर रिपोर्ट तैयार करने मध्य प्रदेश गये थे,  उनकी लाश ही लौटकर आई। मोदी सरकार और सीबीआई ने इस भ्रष्टाचार  कै प्रति जीरो नहीं बल्कि 165×6.022 × 1000 000 000 000 000 000 000 00 टालरेंस दिखाई है।

भ्रष्टाचार  के किसी मामले में मोदी सरकार की टोलरेंस निकालने का फार्मूला

1. अगर मामला भाजपा नेता से जुड़ा है तो टोलरेंस

विस या लोस में भाजपा सदस्यों की संख्या × ई मीडिया × सोशल मीडिया × संबित × Avogadro No.= Near Infinity

2.  अगर मामला विपक्ष के नेता का है तो टालरेंस

0 × Avogadro No.= 0

Friday, July 28, 2017

पप्पू की अम्मा की चोटी कटी

सुधीर राघव

अफवाहें और अंधविश्वास ! हमेशा से सामंती सरकारों के मुख्य हथियार रहे हैं। ऐसी सरकारें धन्ना सेठों के पैसे से चलती हैं। धनपतियों के खजाने भरने के लिए जनता पर कर का बोझ बढा़या जाता है और किसानों का शोषण किया जाता है। शोषण और भ्रष्टाचार से तंग जनता की आहों और कराहों को देशभक्ति की धुनों के शोर से दबाया जाता है।

भाजपा शासित राज्यों हरियाणा और राजस्थान में आजकल महिलाओं की चोटी कट रही है। साथ ही अफवाह फैलाई जा रही है चोटी कटने के तीसरे दिन महिला मर जाती है। 

राजस्थान में साल के अंत तक चुनाव होने हैं। अमित शाह की नजरे मिशन 2025 पर हैं। चुनाव जीतने में अफवाहें कारगर होती हैं। मौत का भय आस्था के धोखे में अंधविश्वास तक ले जाता है। अफवाहों की आंधी से धर्म  का पेड़ हिलाया जाता है और राजनीति की चादर फैलाकर फल बटोर लिए जाते हैं। बीफ की अफवाहों ने यूपी चुनावों में खास भूमिका निभाई। राम मंदिर बन जाएगा, इस अफवाह ने 1995 से 1999 तक सारे चुनावी समीकरण बदल दिए। जबकि मामाला सुप्रीमकोर्ट में है और फैसला उसे ही करना है न कि किसी सरकार को। इसके बावजूद जनता अफवाहों के झांसे में आई। इसी तरह 2014 के चुनाव में अच्छे दिन आने और सभी के खातों में 15 लाख आने की अफवाहों ने मोदी लहर पैदा की। हालांकि 2004 में फीलगुड की अफवाह फेल रही थी। इसे पहले 1971 में गरीबी हटाओ की अफवाह ने अपना रंग दिखाया था।  

अब अफवाहों का तरीका ठेठ पुराना हो गया है।  पप्पू की अम्मा की चोटी कट गई है। दहशत से उसका गला सूखा है और टीवी पर जल्दी जल्दी बता रही है कि कैसे क्या हुआ। गांवों में पुरुषों के कंधों पर नई जिम्मेदारी  आ गयी है। वे रातभर हाथ में लठ लिए चोटी काटने वाले को ढूंढ रहे हैं।

असली चोटी तो बिहार में कटी है। वहां सरकार के चोटी के पद को ही काटकर उसके नीचे की सरकार बदल दी गयी। वहां राजद वाले चोटी और उसे काटने वाले दोनों को ही गरिया रहे हैं।

इधर भ्रष्टाचार के मामले में देश ने खूब तरक्की कर ली है। पाकिस्तान को भी पीछे छोड़ दिया है। पनामा पेपर्स लीक में अपने पीएम को सजा सुना वह ईमानदारी में भारत से आगे निकल गया है। हमारे यहां तो जिन धनकुबेरों के नाम पनामा पेपर्स में दर्ज थे सरकार को उनकी खातिरदारी और मान मनौव्वल से ही फुर्सत नहीं। उनके प्रतिनिधि पीएम के साथ विदेशी  दौरों पर जाते हैं और नये नये सौदे करते हैं। देशभक्ति की आड़ में नये पनामा टाइप पेपर रचे जा रहे हैं।

ये ऊंची बातें हैं। सरकार चाहती है कि पप्पू की अम्मा सिर्फ  अपनी चोटी की फिक्र करे।

Tuesday, July 25, 2017

घेवर के तेवर

सुधीर राघव


उत्तर भारतीयों ने मैदा से बहुत से प्रयोग किए हैं। जलेबी, बालूशाही,  गुझिया, शक्करपारे और घेवर। धान, जौं, चना और मोटे अनाज खाने वालों का परिचय जब इरानी गंदुम के लोच और समोसे से हुआ तो मीठे के शौकीन भारतीयों के कई  तार झनझना गये। वे समोसे, फैनी, मट्ठी  पर ही नहीं अटके रहे।

घेवर मैदे के पकवानों में सबसे खास है। यह सिर्फ सावन में बनता है। कला का अद्भुत नमूना है। जेसलमेर की प्रसिद्ध  पटवा हवेलियों के गोल्डन पत्थरों पर हुई बेजोड़ नक्काशी के जोड़ का है। खौलते देसी घी में कूदकर सांचों में ढला मैदा फूलकर जो आकार लेता है, उसके कि्रस्पी क्रंच के आगे अच्छे अच्छे चॉकलेट फेल हैं। यह बनता तो एक ही तरीके से है मगर सजाया इतने तरीके से जाता है कि यूरोप का कैक भी इसके सामने कच्चा और नौसिखिया लगता है।

रोहतक के गुलाब हलवाई जाने तो अपनी रेबडि़यों के लिए जाते हैं मगर रेबडि़यां सिर्फ सर्दियों में ही बनती हैं। इसलिए सावन में घेवर पर भी क्या खूब हाथ आजमाते हैं। सिर्फ गुलाब ही नहीं हरियाणा  और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हर हलवाई के पास सावन में घेवर मिलेगा। गांव देहात में दुकान होगी तो उस पर भी। पंजाब के प्रमुख शहरों और चंडीगढ़  में भी प्रमुख मिष्ठान भंडारों में सावन में यह खूब सजता है।

और हां! घेवर का मतलब सिर्फ मिठाई नहीं है। इसका मतलब है सब बहन, बेटियों और बुआओं को हरियाली तीज की बधाई।

Monday, July 24, 2017

धर्म का ताला

सुधीर राघव

मन पर लटका
धर्म का ताला
और भ्रम का जाला 
रोशनी को अंंदर नहीं आने देता

अंधेरे से डरता है आदमी
भटकता है आदमी
गुरु की तलाश में
जो ज्ञान का ताला लिए
उसे ही ढूंढ रहा है

मन पर एक और ताला
भ्रम का एक और जाला
अंधेरे से घबराकर
भटकता है आदमी
ईश्वर की तलाश में
जो माया के ताले में
बांध रहा है सबको

मन पर एक और ताला
भ्रम का एक और जाला
अंधेरे से घबराकर
भटकता है आदमी
प्रेम की तलाश में
जो रिश्तों का बंधन लिए
ढूंढ रहा है उसे ही

सात तालों में कैद मन
तरसता है रोशनी को
जो उस अबोध बच्चे के मन में बरस रही है
वह जन्मा है अभी अभी
उसका मन खुला कपाट
नहीं है कोई ताला
न कोई जाला
उसकी मुस्कान तो देखो।



Monday, July 17, 2017

स्वच्छ भारत की सही तस्वीर

देश के स्वच्छता अभियान की दो तस्वीरें हैं।

एक वह जिसमें विद्या बालन और शिल्पा शेट्टी दिखती हैं और दूसरी वह जिसमें बिना जरूरी उपकरणों सफाई में जुटे सफाईकर्मी सीवरेज में जान देते हैं या बीमारियों से मर जाते हैं।

मोदी जो को स्वच्छता की पहली तस्वीर पसंद हैं। इसलिए हर साल इलेक्ट्रॉनिक चैनलों को सफाई  विज्ञापनों के अरबों रुपये दिए जा रहे हैं। इतने रुपये सफाईकर्मी रखने और उपकरणों पर खर्च होते तो भारत के शहर सचमुच स्वच्छ हो जाते।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया  के बड़े हिस्से पर चंद्रा और अंबानी का कब्जा हो गया है। इसलिए उनकी कमाई का ख्याल रखना सरकार का फर्ज है। चेनलों के रुख से ही कोक, पेप्सी, दंदकांति और सरकार की साख बनती है। चैनल साख बनाएंगे तभी वोट मिलेंगे।

देख लेना गांधी जयंती पर अगर मोदी झाडू़ लगाएंगे तो दिनभर टीवी पर खबर चलेगी। पूरा देश साफ हो जाएगा। ईश्वर न करे कि सीवरेज में उतरा कोई सफाईकर्मी दमतोड़ दे, अगर ऐसा हुआ तो उसकी खबर कहीं नहीं दिखेगी। साफ हो जाएगी।

आप ने कोई टीवी चैनल खोला तो शिल्पा जी प्रकट हो जाएंगी और मीठे से मुस्कुराएंगी। आपको लगेगा पूरा देश साफ हो गया। आप धन्य हो गये जो ऐसा पीएम रत्नधन पायो।

यही है स्वच्छ भारत की नयी तस्वीर। इसमें विद्या बालन की अदाएं हैं। मोदी  का लेक्चर है। देश का खुला खजाना है। बस सफाईकर्मी के घर का मातम नहीं है। उसके बच्चों की चींखें नहीं हैं।

Saturday, July 15, 2017

इस लंगड़े को देखकर लार टपक जाएगी

आदमी जब आम नहीं हुआ था, खास था। आम तब भी लंगड़ा था।
आम के लंगड़े होने में जो खासियत है। स्वाद है । महक है। वह न तो उसके दशहरी होने में है, न सफेदा, न चौसा, न तोतापरी, न अलफांसों, न मालदा, न फजली,  न नीलम और न देसी होने में हैं।

भोले की नगरी काशी से जुड़कर मोदी जी तो दुनिया में  अब मशहूर हुए हैं मगर काशी का लंगड़ा तो ढाई सदी से मशहूर है। अकेले मोदी जी ही नहीं, रामनगर का लंगड़ा भी दुनिया घूम रहा है।

आम को खाना भी एक कला है। आम की हर किस्म को खाने का एक अलग सही तरीका है। देसी डाल का पका हो तभी खाएं मगर अब इसके दर्शन दुर्लभ हैं। देसी को डंडी वाली साइड से खुरच कर हल्का जमीन की ओर निचोडे़ं। रस कीदो तीन बूंदें टपक जाने दें तब चूसें। नहीं तो इसका कसैला चैंप आपका मुंह पका देगा। इसकी गुठली में रैशों का गुच्छा और जूस ही होता है। आपको गुठली ही करीने से चूसनी होती है।

सफेदा को आप चाकू की मदद से गुठली के दोनों ओर से दो फांकों में काट लें। फिर फांक को छिलके सहित हथेली पर रखें और दूसरेहाथ से चम्मच से गूदा निकालकर ऐसे ही खाएं जैसे कप से निकालकर आइसक्रीम खाते हैं।

चौंसा भी देसी आम की तरह ही चूसकर खाएं। इसकी गुठली में रेसे नहीं होते और इसे हथेली से दबाते हुए चूसने पर इसका गूदा ही जूस बन जाता है और रसीला स्वाद देता है।

तोतापरी या पैरी आम खटास की वजह से खाया कम जाता है और जूस बनाने वाली कंपनियों का पसंदीदा है। देखने में सुंदर है,  सलाद के टेबल पर निखरता है।

दसहरी को आप चूसकर औरचाकू से काटकर जैसे चाहे खाएं। चूसकर खाएं तो थोड़ा सावधानी बरतें। दबाव का संतुलन बिगड़ते ही इसका छिलका कहीं से भी फट सकता या गुठली उछल कर आपके कपड़े गंदे कर सकती है।

लंगड़ा को आप छुरी कांटे की मदद से प्यार से खाएं। छुरी लगाकर हलका सा खींचने पर इसका छिलका जिस  अंदाज में गूदे को छोड़कर उतरता है। वह आपको सम्मोहित कर देगा। फिर आप छुरी से गूदे के छोटे छोटे पीस काट लें और कांटे से खाएं।

आम की कोई भी किस्म हो उसे ठंडाकर ही खाएं।

Thursday, July 13, 2017

जाओ कबीर तुम झूठे निकले

सुधीर राघव

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, 
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

क्रांतिकारी वाणी के पहले संत कबीर ने यह बहुत ऊंची बात कही थी। निंदक बिना साबुन पानी के स्वभाव को निर्मल कर देता है। इसलिए  उसे हमेशा अपने निकट रखो।

मगर  इस घनघोर कलियुग में तीन साल से यह बात झूठी साबित हो रही है। 

हर आतंकी हमले के बाद के बाद मोदी जी और राजनाथ जी निंदा ही नहीं बल्कि कड़ी निंदा करते हैं मगर पाकिस्तान पर कोई असर नहीं पड़ता। उसका स्वभाव निर्मल होकर ही नहीं देता। 

दो दो निंदक हैं और कड़े  निंदक हैं। बिल्कुल पडो़स में हैं। फिर भी नीच पातक पापी पाकिस्तान का स्वभाव स्वच्छ नहीं होता। 

मोदी जी तो चलो बहुत भरोसेमंद निंदक नहीं हैं। एक पल कड़ी निंदा की और दूसरे ही पल मित्र मित्र कह पांव पकड़ लें। उनका कोई भरोसा नहीं। मगर हमारे ठाकुर साहब तो कट्टर निंदक हैं। उनकी निंदा में किसी को शंका नहीं। वह पाकिस्तान जाकर बिन जलपान किए पूरी ठसक से लौटकर आए थे। मगर उनकी निंदा भी असर नहीं करती।

इंदिरा जी ने 1971 में पाकिस्तान को ठीक से साबुन पानी लगाया था। अगर अमेरिका ने जिया उल हक को  पुचकारा न होता तो पाकिस्तान का स्वभाव तब ही सदैव के लिए निर्मल हो जाता। अटल जी भी मित्र मित्र खेलकर कारगिल करवा बैठे।

उसके बाद आए मनमोहन सिंह बडे़ ही सज्जन पुरुष निकले। वो बोल तक न पाते थे तो निंदा  क्या करते।

अब तीन साल से तो हम निंदा ही कर रहे हैं। चाहे पठानकोट हो या जवानों के शवों का अपमान। मोदी जी और राजनाथ जी हर बार इस उम्मीद से निंदा करते हैं कि इस बार की निंदा से जरूर पाकिस्तान का स्वभाव निर्मल हो जाएगा । मगर ऐसा होता नहीं।

कबीर जी हमारे नेताओं को आपकी वाणी पर पूरा भरोसा है । भरोसा मुझे भी है मगर अब मन कुछ और कहता है। मन कहता है कि बहुत हुई निंदा। पाकिस्तान को सुधारना है तो अब थोड़ा साबुन पानी खर्च किया जाए।

Saturday, July 8, 2017

बस दुनिया से परदादारी है

सुधीर राघव

न डूबने का शोक है न जंग की तय्यारी है
आग के दरिया में हमने उम्र गुजारी है

हुस्न की बारीकियां सब इश्क को मालूम हैं
तेरा परदा तो बस दुनिया से परदादारी है

हर दबा राज महफिल में जाहिर हो गया है
मेरा आना ही तेरे जाने की जवाबदारी है


Tuesday, July 4, 2017

बागबान -2

रवि चोपड़ा को जल्द ही फिल्म बागबान -2  बनानी चाहिए ।

मगर इसकी स्टार कास्ट में अमिताभ और हेमा जी को नहीं लेना चाहिए ।

उनकी जगह यह फिल्म गाय और नंदी की व्यथा की कथा कहे। अन्य पात्रों में सरकार और उन गुंडों को रखा जाए जो अपनी गोमाता और गोपापा के लिए कानून बनाने और लड़ने मारने पर तो उतारू रहते हैं मगर उन्हें पालने की जगह सड़कों पर छोड़ देते हैं। समाज के बारबार टोकने पर ये संतानें यानी सरकार और गुंडे लोगों से ही चंदा वसूल कर जनता की  जमीन पर दूर दूर गोशाला और  नंदीशाला बनाकर गोमाता और गोपापा को अलग-अलग कैद कर देते हैं।

इस सिचुएशन पर एक गाना हो सकता है। गोमाता की आंखों से आंसू बहते हैं। नंदी का भी कुछ खाने को मन नहीं करता।
गोशाला और नंदीशाला के दो रहम दिल कारिंदे तब मोबाइल पर गाय और नंदी की बात कराते हैं।

इधर से गाय कहती है बां.. .  । उधर से नंदी कहता है बां.. . . । दोनों की आंखों से आंसू झरते हैं। कैमरा क्लोज होता है।

अगला सीन एक विदेशी लोकेशन पर.. .

सरकार और गुंडे अपनी गोमाता और गोपापा को भूल जनता से वसूले गये पैसे से पार्टी कर रहे हैं।

गुरु को होश तब आया

सुधीर राघव


जीएसटी क्या है क्यों है कैसा है, ऐसे समझाया
मचलते समंदर को उसने एक टॉफी से  बहलाया

हमें तुम क्या  सिखाओगे देशभक्ति, सीख लो उससे
लिपटकर आज तिरंगे में जिसके बेटे का शव आया

सजदा करना था तो करता शहीद की मां के कदमों पर
मगर तू उड़ गया लाहौर दुश्मन के तलवे चाटकर आया

सिर्फ पाला ही नहीं था, खूब टुकडे़ भी खिलाए थे
जब काटा जांघ पर उसकी, गुरु को होश तब आया

Monday, July 3, 2017

कपड़े पर कर: भाग-3: वनमैन सरकार बाकी जनता चोर

सुधीर राघव 

कपड़े पर कर की बात करने से पहले हम मोदी जी के एक जुलाई के भाषण पर गौर करते है। यह भाषण इंस्टीट्यूट चार्टर्ड  एकाउंटेंट्स के स्थापना दिवस की कॉन्फ्रेंस  में दिया गया।

इस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने नोटबंदी के दौरान बंद हुईं सभी एक लाख कंपनियों को चोर घोषित कर दिया और नोटबंदी में कालेधन को सफेद  करने के  नुसखे  बताने वाले सभी सीए को आज का ऋषि मुनि बताया।

यह बात हीं खत्म नहीं होती। जीएसटी के संदर्भ  में इसके मायने आने वाले समय में और गंभीर निकल सकते हैं। कपड़े पर  अब से पहले कोई कर नहीं था। गली मोहल्लों के छोटे छोटे दुकानदार साल के अंत में आय का एक रिटर्न भरते थे। अब उन्हें दैनिक हिसाब के साथ हर महीने रिटर्न भरना है।

ज्यादातर दुकानदार बहुत पढे़ लिखे नहीं है। अत: सके उन्हें स नियमित सीए की सेवाएं  लेनी होंगी। इससे उनका खर्च और बढ़ेगा। ऐसे में उनको दी जाने वाली फीस मुनाफे में सीधी कटौती होगी। जो लाखों दुकानदार   यह खर्च नहीं उठा पाएंगे कामधंधा बंद करने को मजबूर होंगे।

जब देश में लाखों दुकानें बंद होंगी तब भी मोदी जी को कोई फर्क नहीं पडे़गा। वह किसी कॉन्फ्रेंस में थोड़ी सी जुबान हिलाकर सबको चोर घोषित कर देंगे। इस समय वह देश में वनमैन सरकार हैं। वह जिसे चाहे जो घोषित कर सकते हैं।


Sunday, July 2, 2017

कपड़े पर कर : भाग दो.... कंपनी राज की याद

सुधीर राघव 

मोदी सरकार ने कपड़े  पर जीएसटी लगाकर देश को ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन की याद ताजा करा दी है ।

प्लासी के युद्ध से पहले भारतीय सूती और सिल्क के कपड़े की यूरोप  एशिया और  अफ्रीकी बाजारों में तूती बोलती थी । ब्रिटिश  इतिहासकार जेम्स  मिल ने अपनी किताब द हिस्ट्री आफ ब्रिटिश इंडिया में  इसका उल्लेख किया है। वह वर्ष 1813 का उल्लेख करते हैं कि इस बात के साक्ष्य हैं कि उस समय तक भारत के सूती और सिल्क उत्पाद ब्रिटिश बाजारों में 50 से 60 फीसदी तक मुनाफे पर बेचे जाते थे। इसके बावजूद वे ब्रिटिश कपड़ों से सस्ते पड़ते थे । इसलिए ब्रिटिश  उद्योग को बचाने के लिए यह  जरूरी हो गया था कि भारतीय कपड़े पर 70 से 80 फीसदी ड्यूटी लगाई जाए।

आज भी भारत के सूती कपड़े को बांग्लादेश और श्रीलंका से कड़ी चुनौती मिल रही है। ऐसे में मोदी सरकार ने कपड़े पर कर लगाकर ब्रिटिश रूल की याद ताजा कर दी है ।....  क्रमश:

Saturday, July 1, 2017

कपड़े पर कर से गुलामी के घर तक

सुधीर राघव 

कहते हैं कि बंगाल को जीतने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने वहां के बुनकरों के हाथ कटवा दिए थे। 1757 में प्लासी और 1764 में बक्सर का युद्ध जीतने के बाद पूरे बंगाल पर  ईस्ट इंडिया कंपनी का कब्जा हो गया था। हालांकि हाथ काटने की बात को इतिहासकार मिथक मानते हैं मगर यह पूरी तरह झूठ भी नहीं है।

1772 में डच मूल के व्यवसायी विलियम बोल्ट्स की किताब में अंग्रेजों के शुरुआती शासन में चले दमनचक्र की व्यापक जानकारी है। बोल्ट्स शुरू में ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी बनकर 1759 में बंगाल आए थे। वह कंपनी की कोलकाता और बनारस की फैक्टरियों में रहे। उन्होंने कई तरह का अपना व्यवसाय भी शुरू किया। सितंबर 1768 में उन्होंने कोलकाता से अपना अखबार भी निकाला, जिसमें  ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियों की अनेक धांधलियों का खुलासा भी किया। हालांकि बाद में दिवालिया होने पर भारत छोड़कर जाना पड़ा।

इन सब कारणों के बावजूद विलियम बोल्ट्स दुनिया में जाने जाते है 1972 में प्रकाशित  उनकी किताब कंसिडिरेशन अॉफ इंडिया अफेयर्स के लिए। इसमें अंग्रेजों द्वारा बंगाल की लूट की पूरी गाथा वर्णित है। वह लिखते हैं कि ढाका के बुनकरों की हालत  अंग्रेजों ने इतनी दयनीय कर दी थी कि काम से बचने के लिए उन्होंने  अपने अंगूठे काट लिए थे।.....  क्रमश: