Wednesday, March 29, 2017

खोपड़ी की गागर में सागर भरना

कृत‌ि राघव



एक बार एक नेवला लकीर पीट रहा था। वह लकीर सांप की थी। यह देखकर  सांप बोला- ओ कोल्हू के बेल ! आ बेल मुझे मार।

यह सुनकर नेवला अंगारे उगलने लगा। वह बोला-सीधी अंगुली से घी नहीं न‌िकलता। मैं अभी तुम्हारी खोपड़ी की गागर में सागर भरता हूं। तब तुम्हें नानी याद आएगी। तुम दुम दबाकर भागोगे।

यह सुनकर सांप विष उगलने लगा। वह नेवले को अंगूठा दिखाकर उल्टे पांव भागा। नेवला भी उसके पीछे भागा।

नेवले के हाथ सांप की लंगोटी आ गई। वह खुशी से चिल्लाया-भागते भूत की लंगोटी ही सही।

सांप भागकर अपनी बांबी में घुस गया। बांबी में घोड़े थे। सांप घोड़े बेचकर सो गया।

Tuesday, March 28, 2017

उधार का राष्ट्रवाद-7 : ऋग्वेद और हड्प्पा काल से है हमारी देवी

सुधीर राघव



पिछले लेख में हमने चर्चा की थी कि कैसे अठाहरवी सदी में फ्रांस में आजादी की देवी का विचार लोकप्रिय हुआ और उसने यूरोप में विस्तार किया।


दक्ष‌िण एशिया में देवी का विचार पहले से मौजूद था। खासकर भारत में यह वैदिक और हड़प्पा युग से चला आ रहा था।
ऋग्वेद के दसवें अध्याय में दुर्गा सूक्त में मां दुर्गा की स्तुत‌ि के आठ श्लोक हैं। ऋग्वेद का रचनाकाल ईसा से दस से पंद्रह सदी पूर्व का माना जाता है। ईसा से पांच सदी पूर्व के मंडूक उपनिषद में काली की उपासना है। महाभारत में अर्जुन और युधिष्ठ‌िर दुर्गा उपासना करते हैं। चौथी से छठी सदी तक रचे गए देवी और शाक्त उपन‌िषदों में देवी केंद्र में है।
सनातन धर्म के तीन मतों वैष्णव, शैव और शाक्त में शाक्त को ही सबसे प्राचीन माना जाता है। इत‌िहासकार मानते हैं कि बौद्ध धर्म के उत्थान के साथ शाक्त मत कुछ समय के लिए कमजोर हुआ मगर चौथी से दसवीं सदी के बीच देवी फिर तेजी से सनातन‌ियों की आस्था का केंद्र बनीं। उस दौर में क्षत्रीय राजाओं और राजपूतों की कुलदेवी के रूप में माता स्थाप‌ित की गईं। वे युद्ध में क्षत्र‌ियों के कुल और आजादी की रक्षक मानी गईं।

हड़प्पा में भी स्त्री प्रत‌िमाएं देवी स्वरूप में मिलती हैं। जहां इसे प्रकृत‌ि की देवी माना गया है। देवी का यह विचार सिर्फ भारत तक ही सीम‌ित नहीं रहा बल्क‌ि प्राचीनकाल में यह दक्ष‌िण एशिया में दूर तक फैला। इंडोनेश‌िया के जावा द्वीप पर छठी से नौवीं सदी की सवा सौ से ज्यादा दुर्गा प्रत‌िमाएं मिली हैं। कंबोडिया में सातवीं और आठवीं सदी की देवी प्रत‌िमाएं म‌िलती हैं।


वियतनाम में दसवीं से ग्यारहवीं सदी में चंपा और चाम राजाओं ने देवी प्रत‌िमाएं बनवाईं। हालांक‌ि वियतनाम में तीसरी सदी में एक मह‌िला यौद्धा ट्रियू का वर्णन मिलता है। देवी ट्रियू का काल 225 -248 ई. का माना जाता है। वह देवी कहती है क‌ि मुझे तूफानों की सवारी और खुले समुद्र में शार्कों को मारना पसंद है। वह अपनी और अपने लोगो की आजादी के लिए लड़ती है।  वियतनामी कथाओं में उसे नौ फुट लंबी मह‌िला, जिसके स्तन तीन फुट लंबे बताए गए हैं। वह एक द‌िन में पंद्रह सौ मील चल सकती है। उसकी आवाज मंद‌िर की घंट‌ियों जैसी है और एक ही बार में कई गैलन चावल खाती है।

ऐसे समाज में जहां देवी पहले से ही आस्था का केंद्र थी जब उन्नीसवीं सदी के आखिर में कुछ अंग्रेजी पढ़े युवाओं ने फ्रांस की आजादी की देवी का भारतीय रूप में मानवीकरण किया तो यह प्रयोग बेहद लोकप्रिय हुआ। बंक‌िम का जो बंदेमातरम पहले मां दुर्गा की ही स्तुत‌ि कव‌िता था वह बिना क‌िसी फेर बदल के भारत माता का स्तुत‌ि गान बन गया।  भारत मात का यह विचार क्या सचमुच अंग्रेजों की देन था या उनकी चाल उलटी पड़ने जा रही थी, इस पर हम अगले लेख में चर्चा करेंगे। .....क्रमशः...

  

Sunday, March 26, 2017

उधार का अधनंगा राष्ट्रवाद-6 : फ्रांस की आजादी की देवी नए राष्ट्र ढूंढ रही थी

सुधीर राघव


पिछले लेखों में हमने चर्चा की थी कि 1857 के बाद किस तरह भारत में बड़े वैचारिक बदलाव जन्म ले रहे थे। हिंदी और ह‌िंदू के रूप में एक नए तरह के राष्ट्रवाद ने अंगड़ाई लेने शुरू कर दी थी।

इस नए राष्ट्रवाद के बीज कहां से आए? खाद कहां से मिला? आज हम इस पर चर्चा करेंगे।

असल में भारत का यह राष्ट्रवाद यूरोप में सौ साल पहले जन्मे राष्ट्रवाद की नकल था। अंग्रेजी कालेजों से  पढ़कर निकल रहे युवा यूरोप में हुई क्रांत‌ियों से खासा प्रभावित हुए। खासकर फ्रांस में हुई क्रांत‌ियों से। जो अंग्रेज युवा कंपनी के अफसर बनकर भारत आ रहे थे, वे भी अपने जहन में इसके बीज सहेज कर लाए।

प‌ितातुल्य माने जाते राष्ट्र को माता मानने का विचार भी दुनिया में फ्रांस ने ही लोकप्र‌िय बनाया। मैराइने फ्रांस गणराज्य का राष्ट्रीय च‌िन्ह हैं और इसे गोडेस ऑफ लिब्रटी कहा जाता है। आजादी की देवी।
इत‌‌िहासकार मौरिस अगुलोहं मानते हैं कि इसके पीछे विचार यह था कि फ्रांच गणराज्य में मह‌िलाओं को भी प्रत‌िनिधित्व देने की मानस‌िकता का न‌िर्माण हो।

1775 में जीन माइकल मोरयू ने एक युवा मह‌िला की तस्वीर बनाई थी, जो रोमन स्टाइल के कपड़े पहने और फरिज‌ियन कैप लगाए थी। 1789 में फ्रेंच क्रांत‌ि के दौरान इस आजादी की देवी का विचार फ्रांस में नए राष्ट्रवाद और आजादी का प्रतीक बना। क्रांत‌ि के बाद 1792 की पहली नेशनल कन्वेंशन इसे राष्ट्र का प्रतीक माना गया मगर इस देवी की तस्वीर खड़ी मुद्रा में कर दी गई, जिसके हाथ में एक भाला था। अगले ही साल इसे बदलकर और आक्रामक तस्वीर को मान्यता दी गई, जिसमें  देवी स्तन उघाड़े आग उगलते चेहरे के साथ युद्ध में लोगों का नेतृत्व कर रही थी। यह राष्ट्रवाद को कट्टर रूप देने के लिए थी। यह विदेश‌ियों और गैर फ्रांसस‌ियों के प्रत‌ि कठोर और उग्र रुख अपनाने का आह्वान थी।

फ्रांस में दैवी की इस तस्वीर को सौम्य होने में पचपन साल लगे। 1848 में सैकेंड रिपब्ल‌िकन के समय यह तस्वीर उदार रूप की हो गई। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद राष्ट्रवाद और देवी का क्रेज फ्रांस में तेजी से कम होना शुरू हुआ और राष्ट्रवाद की जगह विकासपरक विचारों ने ले ली।

फ्रांस से देवी का व‌िचार जर्मनी में भी खूब लोकप्र‌िय हुआ। वहां 1848-49 में मदर जर्मेन‌िया आस्त‌ित्व में आई। पहली तस्वीर फिल‌िप बेल्ट ने कपड़े के बेनर पर बनाई थी। यह तस्वीर एक लाल खुले बालों वाली मह‌िला की थी। उसके एक हाथ में तलवार थी, जिसे पकड़कर वह मध्ययुग के शासकों के अंदाज में खड़ी थी।

यह वही दौर था जब यूरोप के दोनों बड़े देश राष्ट्रवाद का माता-माता खेल खेल रहे थे और अलग-थलग कौने में पड़ा एक प‌िछड़ा समझा जाने वाला देश इंग्लैंड नई आर्थ‌िक और सैन्य क्रांत‌ियों के खांचे गढ़कर दुन‌िया की सर्वोच्च ताकत बनने जा रहा था।

यूरोप से निकला माता का यह विचार कैसे भारत माता बना? इसपर हम आगे चर्चा करेंगे।....(क्रमशः)

Friday, March 24, 2017

रोमियो और उसका बाप

पूरी दुनिया में यूपी के युवाअों की छवि रोमियों की बनाने के लिए मोदी जी और योगी जी को बधाई! ऐसे रोमियों जो कैमरे के आगे उठक बैठक करते हैं!

 एक समय वह भी था जब यूपी के युवा संघ लोकसेवा आयोग और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में शानदार प्रदर्शन के लिए जाने जाते थे। वह छवि बड़ी बेकार थी! उससे पूरा यूपी दुखी था!

आज अपने युवाओं को टीवी पर उठक बैठक लगाते देख पूरा यूपी खुशी से फूला नहीं समा रहा! अपने नौनिहालों के रोमियो नामकरण से गौरवान्वित है! यूपी की खुशी से पूरा देश गदगद है!

यूपी के युवाओं का यह नया छवि निर्माण करीब 28-30 साल बाद हुआ है! तब कल्याण सरकार ने यूपी के युवाओं को नकलची की छवि दी थी! ऐसे नकलची जो सड़कों पर झुंड बनाकर 'तेल लगा लो डाबर का...' जैसे नितांत मौलिक नारे लगाते थे! तब भी यूपी का खुशी इंडेक्स चरम पर था!

यूपी के युवाओं का करियर दुनिया की नजरों में पुन: चमकाने के लिए मोदी जी और योगी जी को कोटि कोटि नमन!

हो सकता है, इस छवि से खुश होकर अमिता बच्चन किसी दिन टीवी पर बोलना शुरू कर दें - जहां हर चौराहे पर युवा कान पकड़कर उठक बैठक करें रोमियो के भेस में। कुछ दिन तो गुजारिए मेरे उत्तर परदेस में! हंई...! और सोचिए कि यहां बिजली आईईई या गईई!

अब यूपी वालों से दुनिया ऐसे सवाल करेगी।

 युवा - मैं इस नौकरी के लिए हर तरह से योग्य हूं।

नियोक्ता - हूं। मगर कहां से हो?

युवा - जी यूपी से।

नियोक्ता - तो रोमियोगीरी करो! नोकरी तुम्हारे बस की नहीं।
*****
ट्रेन में टीटी टिकट देखने के बाद संदिग्ध नजरों से - कहां से हो भैया।

अधेङ- जी यूपी से।

टीटी - रोमियो हो?"

अधेङ- नहीं जी, मैं उसका बाप हूं। 

Thursday, March 23, 2017

बंदूक से विचार तक : भगत स‌िंह में गांधी

सुधीर राघव



भारत की स्वतंत्रता महान विचारों की देन है। भगत सिंह और महात्मा गांधी दो ऐसे विचारक हैं, जिनके विचारों ने हमें आजादी द‌िलाई। मगर देश के दुश्मन और गद्दार इन दोनों को विचारधारा के अलग-अलग छोर पर रखते हैं। दोनों के विचारों में फासले बोते हैं। दूसरी ओर हकीकत कुछ और कहती है।


भगत सिंह कहते हैं- क्रांत‌ि का मतलब सशस्त्र आंदोलन नहीं होता। क्रांत‌ि बम और पिस्तौल की संस्कृत‌ि नहीं है।  क्रांति की तलवार तो सिर्फ विचारो की शान पर ही तेज होती है। बम फेंकना न सिर्फ व्यर्थ है, अपितु बहुत बार हानिकारक भी है । उसकी आवश्यकता किन्हीं विशेष परिस्थितियों में ही पड़ती है, हमारा मुख्य लक्ष्य मजदूर और किसानों का संगठन होना चाहिए ।

 गांधी कहते हैं- मैं‌ हिंसा का विरोध करता हूं , क्योंक‌ि जब ऐसा लगता है कि वह (ह‌िंसा) अच्छा कर रही है, तब वह जो अच्छाई करती है वह अस्थाई होती है मगर वह जो बुराई पैदा करती है, वह स्थाई होती है। आप विनम्र तरीके से दुन‌िया को ह‌िला सकते हैं।

भगत सिंह कहते हैं- व्यक्तियों को कुचल कर उनके विचारों को नहीं मार सकते। शरीर को कैद किया जा सकता है विचारों को नहीं ।

गांधी कहते हैं- आप मुझे जंजीरों में जकड़ सकते हैं और यातना दे सकते हैं परन्तु आप कभी मेरे विचारों को कैद नहीं कर सकते।

भगत सिंह कहते हैं- बुराई इसलिए नहीं बढ़ती की बुरे लोग बढ़ गए हैं बल्कि बुराई इसलिए बढ़ती है क्योंकि बुराई सहन करने वाले लोग बढ़ गए हैं।

गांधी जी कहते हैं- अन्याय के अधीन होना कायरता है और उसका विरोध करना पुरुषार्थ है। कायरता से कहीं ज्यादा अच्छा है की लड़ते-लड़ते मर जाना।

इस तरह गांधी और भगत सिंह विचारों की एेसी धाराएं हैं जो अंततः एक ही निष्कर्ष पर आकर मिलती हैं।

लायलपुर और पोरबंदर के बीच मकर रेखा का फर्क सिर्फ गर्म सर्द को मामूली सा प्रभाव‌ित करता है। यह भूमध्य रेखा की तरह विचारों के ग्लोब को दो हिस्सों में नहीं बांटता। लालयपुर से गुजरने वाले चिनाब का पानी सिंधु से होते हुए अंततः उसी अरब सागर में गिरता है, जिसके तट पर पोरबंदर है।

एक कमजोर दिल बेरिस्टर का महात्मा में बदलना और खेत में बंदूक उगाने वाले बच्चे का भगत सिंह होना एक ही धरातल की वैचारिक क्रांत‌ि है। भगत सिंह अंग्रेजों की नींद उड़ाते हैं तो महात्मा उनकी नींव उखाड़ते हैं।

दोनों विचार की ताकत को समझते हैं। विचारक भगत सिंह के लिए बम और बंदूक व्यर्थ हो जाते हैं और अह‌िंसा के पुजारी गांधी का मुख्य हथ‌ियार अन्याय का व‌िरोध बन जाता है।

गांधी और भगत सिंह को अलग पलड़े में बैठाना देशद्रोह‌ियों का षड्यंत्र था। फर्क बस इतना है कि भगत स‌िंह को तो अंग्रेजो ने फांसी दी मगर गांधी को देशद्रोह‌ियों ने मारा। ऐसी देशद्रोही ताकतों को हराने की लड़ाई विचारों से ही लड़ी जा सकती है। यह लड़ाई हमेशा जारी रहेगी। इसमें ही हमारी आजादी और इंकलाब निहित है।

Wednesday, March 22, 2017

उधार का अधनंगा राष्ट्रवाद-5 : अंग्रेजों के सेवक और हिंदी की सेवा

सुधीर राघव


पिछले लेख में हमने चर्चा की थी कि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 1870 के दशक में हिंदी और नागरी ल‌िपी के लिए कैसे अपनी प्रत‌िभा के दम पर लड़ाई लड़ी। उसी दौर में एक और नाम था राजा शिव प्रसाद सितारे हिंद का। भारतेंदु उन्हें अपने गुरु के समतुल्य मानते थे। उनके प्रयत्नों से ही स्कूलों में हिंदी को प्रवेश मिला। हालांक‌ि उस वक्त हिंदी गद्य में किताबें भी नहीं थीं। सितारे ह‌िंद ने स्वयं साह‌ित्य, व्याकरण, इत‌िहास, भूगोल आद‌ि व‌िषयों पर 35 किताबें ल‌िखीं।

वर्ष 1968 में हिंदी भाषा के लिए उनका लिप‌ि संबंधी प्रत‌िवेदन जो उत्तरी राज्यों के संदर्भ में था, फारसी के स्थान पर नागरी ल‌िपी के लिए पहला प्रयास माना जाता है। यह वह दौर था, जब सारा सरकारी और कचहरी का काम ऊर्दू में होता था और अंग्रेज सरकार अंग्रेजी प्रचार-प्रसार के ल‌िए पूरा जोर लगा रही थी। ऐसे समय में सितारे हिंद ने स्कूली शिक्षा में नागरी लिपी को स्थान द‌िलवाया। हालांक‌ि खड़ी बोली के नाम पर वह खुद अरबी-फारसी के शब्दों का ज्यादा इस्तेमाल करते थे। भारतेंदु का नजरिया इस मामले में उनसे भिन्न था। वह तत्सम शब्दों को भी नागरी में जोड़ रहे थे।

शिव प्रसाद ब्रिट‌िश सरकार के बहुत ही व‌िश्वासपात्र सेवक थे। वह 1845 ई. में ईस्ट इंड‌िया की अंग्रेजी हकूमत की सेवा में जुड़े। पहले एंग्लो-सिख युद्ध में सोबराओं के मोर्चे पर उन्होंने अंग्रेज ब्रिगेड‌ियर जरनल सर हेनरी मोंटगुमरी लारेंस के लिए जासूसी की थी। सोबराओं तरनतारन जिल में हरिके के पास एक गांव है। इसके बाद शिव प्रसाद शिमला की एजेंटी में मुंशी बना दिए गए थे। वर्ष 1945 में ही उन्होंने हिंदी का अखबार बनारस अखबार न‌िकालने में गोव‌िंद रघुनाथ धत्ते की मदद की थी।

सितारे हिंद की तरह ही अंग्रेजों के एक और स्वाम‌ीभक्त राजा लक्ष्मण सिंह ने भी भारतेंदु युग की हिंदी की गद्यशैली के लिए काफी काम किया। 1861 ई. में आपने आगरा से हिंदी का प्रजाह‌ितैषी नामक पत्र निकाला। काल‌िदास की कृत‌ि पर आधारित 1963 में लिखा गया इनका शकुंतला नाटक हिंदी खड़ी बोली का एक शुरुआती अनूठा प्रयोग माना जाता है। इसे इतनी ख्यात‌ि म‌िली क‌ि 1875 में  इंड‌ियन स‌िव‌िल सर्व‌िस की परीक्षा में सिलेबस के रूप में इसे शाम‌िल किया गया।

हिंदी के पक्ष में जो जंग भारतेंदु ने लड़ी, राजा लक्ष्मण सिंह ने उसे धार दी। सन 1877 में उन्होंने उन्होंने काल‌िदास की कृत‌ि रघुवंश का अनुवाद किया। इसकी भूमिका में ही राजा ने हिंदी और उर्दू के बीच के फर्क को स्पष्ट करने पर जोर दिया। वह लिखते हैं-

हमारे मत में हिंदी और उर्दू दो बोली न्यारी-न्यारी हैं। हिंदी इस देश के हिंदू बोलते हैं और उर्दू यहां के मुसलमानों और फारसी पढ़े हुए हिंदुओं की बोलचाल है। हिंदी में संस्कृत के पद बहुत आते हैं और उर्दू में अरबी-फारसी के। परंतु कुछ आवश्यक नहीं है कि अरबी फारसी के शब्दों के बिना हिंदी न बोली जाए और न हम उस भाषा को हिंदी कहते हैं, ज‌िसमें अरबी-फारसी के शब्द भरे हों।  - राजा लक्ष्मण सिंह

लक्ष्मण सिंह अंग्रेजों की सेवा में 1840 के आसपास आए। वह छोटी उम्र में ही लेफ्ट‌िनेंट कार्यालय में अनुवादक के पद पर न‌ियुक्त हुए। महज चौबीस साल की आयु में 1855 में इटावा के तहसीलदार बन गए। उसके बाद 1857 का विद्रोह हुआ तो अंग्रेजों की भरपूर सहायता की। इनामस्वरूप उन्हें डिप्टी कलेक्टर बना द‌िया गया। 1870 में अंग्रेजों ने इन्हें राजा की उपाधी से नवाजा।

इस तरह यह वह दौर था, जब अंग्रेजी कालेजों से पढ़कर निकल रहे युवा अंग्रेजों और हिंदी की सेवा साथ-साथ कर रहे थे। हालांक‌ि ह‌िंदी  और भारत दोनों को अभी माता नहीं कहा गया था, मगर निज भाषा और राष्ट्र के गौरव को हिंदुओं से जोड़कर नए संदर्भ और समीकरण  गढ़े जा रहे थे। ....क्रमशः


Tuesday, March 21, 2017

ऊँट का उल्लू


कृत‌ि राघव


एक बार एक ऊँट था। उसके मुँह में जीरा था। वह जीरा चबा रहा था। तभी वहां एक बंदर आया।

ऊँट का मुँह देखकर उसके मुँह में पानी भर आया। लार टपकाते हुए वह बोला-तुम क्या चबा रहे हो?

ऊँट बोला- बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद। मेरे मुँह में जीरा। बिल्ली खाए खीरा।

बंदर अपना सा मुँह लेकर रह गया। वह अपने पेरों पर खड़ा हुआ। उसने ऊँट को आँखें दिखाईं। बंदर बोला- चींटी के पर निकल आए हैं। चुल्लूभर पानी में डूब मरो।

यह सुनकर ऊँट का चेहरा उतर गया। उस पर घड़ों पानी पड़ गया। ऊँट के पास उल्लू था। वह अपना उल्लू सीधा करके चला गया।

(सातवीं की परीक्षा के बाद छुट्टियों में बेटी कृत‌ि ने ह‌िंदी मुहावरों के जोड़तोड़ से अपनी यह पहली बाल लघुकथा ल‌िखी है)

Monday, March 20, 2017

लोमड़ी जैसा नेता



नेता : खून के आंसू रोयके बड़ी मुश्किल से सत्ता पाई है। अब कोई बेतुके बयान नहीं देगा।

कार्यकर्ता : पर मंदिर तो अब बनेगो। हम अभी प्रेस ते कहे देते हैं।

नेता : हमने कह दिया न अब कोई बेतुका बयान नहीं देगा। सिर्फ विकास की बात होगी।

कार्यकर्ता : हर हिंदू के आठ बच्चा की पॉलिसी तो लागू होगी। अभी सबके दो हैं। हर साल एक बच्चा अनिवार्य कर दें तो पांच साल में हर हिंदू के सात बच्चा होंगे। कसम से बहुत विकास होयेगो। हर गांव में रोज रोज होएगो।

नेता : हमने कह दिया कि अब कोई बेतुकी बात नहीं।

कार्यकर्ता : इन सब मलेच्छ और सेकुलरन को पाकिस्तान भेजवे की टिकट बुक करा दें? इन्हें निकार देओ, तब बहुत विकास होयेगो।

नेता : बेतुकी बात नहीं।

कार्यकर्ता : लव जिहाद...

नेता : (गुस्से से) अब कोई बेतुकी बात नहीं।

कार्यकर्ता : ये सब बेतुकी बाते हैं। चुनाव से पहले तो  आप यही सब बात करते थे।

नेता : तब हमारे पास सत्ता नहीं थी। जनता बेतुकी बातों से ही जोश में आती है। जोश में दंगा करती है। हमारा फायदा होता है। अब हम सत्ता में हैं। अब जनता को होश में लाना है। इसलिए कोई बेतुकी बात नहीं। समझे। जनता को उल्लू बनाया जा सकता है। नेता को लोमड़ी जैसा होना चाहिए।

Sunday, March 19, 2017

उधार का अधनंगा राष्ट्रवाद-4 : भारतेंदु ने रेंग रहे लोगों को उठाया

सुधीर राघव



पिछले लेख में हमने चर्चा की थी कि कैसे डफर‌िन रिपोर्ट ने अंग्रेजों की ही पोल खोल दी और लार्ड डफर‌िन को वायसराय के पद से व‌िदा होना पड़ा। पर जाने से पहले वह कांग्रेस की नींव डलवा गए। उनके बाद आए अंग्रेज वायसरायों को एकजुट होते भारतीय अंग्रेज शासन के लिए बड़ा खतरा नजर आने लगे और फूट की राजनीत‌ि को हथ‌ियार बनाया गया।

इससे पहले हम और वायसरायों की बात करने के लिए बीसवीं सदी में कूद जाएं, उन्नीसवीं सदी के उत्तर्राध की महान प्रत‌िभाओं की अनदेखी से बात अधूरी रहेगी। ये विभूत‌ियां भारत की दुर्दशा से खिन्न थीं और सद‌ियों की गुलामी से दयनीय जीवन जी रहे हिंदुओं को शिक्षा और प्रगत‌ि की राह पर लाने के लिए च‌िंत‌ित थीं।  
   
 इनमें से एक चमकदार नाम है भारतेंदु हर‌िश्चंद्र का। उन्हें खड़ी हिंदी भाषा साह‌ित्य के जनक के रूप में जाना जाता है। उनसे पहले हिंदी साह‌ित्य के नाम पर ब्रज और अवध‌ि या फिर कबीर की पंचमेल भाषा है। 1850 में जन्में भरतेदु सिर्फ पैंतीस वर्ष तक ही जीये। मगर अपने इस जीवनकाल में उन्होंने हिंदी भाषा के लिए इतना काम किया क‌ि आधुन‌िक हिंदी का पहला युग उनके नाम से ही जाना जाता है। पश्च‌िमी बोली, जो ऊर्दू की जमीन मानी जाती थी, उसमें उन्होंने सेंध लगा दी थी। फारसी के अक्षर देवनागरी में और प्रभावशाली हो रहे थे। युवा जोश और व्यंग की धार से भारतेंदु भारत और खासकर हिंदुओं के कायाकल्प के लिए जुटे थे। अठारह वर्ष की उम्र में उन्होंने कव‌िवचनसुधा पत्र‌िका न‌िकाली। हिंदी के लिए वह क‌िसी से भी लोहा लेने को तैयार था। उस दौर के अखबारों ने उस दौर में जब ऊर्दू  के कमजोर करने पर च‌िंता जताई तो उन्होंने खुलकर मजाक उड़ाया--
   
अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट और बनारस अखबार के देखने से ज्ञात हुआ कि बीबी उर्दू मारी गई और परम अहिंसानिष्ठ होकर भी राजा शिवप्रसाद ने यह हिंसा की-- हाय हाय ! बड़ा अंधेर हुआ मानो बीबी उर्दू अपने पति के साथ सती हो गई । यद्यपि हम देखते हैं कि अभी साढ़े तीन हाथ की ऊँटनी सी बीबी उर्दू पागुर करती जीती है, पर हमको उर्दू अखबारों की बात का पूरा विश्वास है । हमारी तो कहावत है-- "एक मियाँ साहब परदेस में सरिश्तेदारी पर नौकर थे । कुछ दिन पीछे घर का एक नौकर आया और कहा कि मियाँ साहब, आपकी जोरू राँड हो गई । मियाँ साहब ने सुनते ही सिर पीटा, रोए गाए, बिछौने से अलग बैठे, सोग माना, लोग भी मातम-पुरसी को आए । उनमें उनके चार पाँच मित्रों ने पूछा कि मियाँ साहब आप बुद्धिमान होके ऐसी बात मुँह से निकालते हैं, भला आपके जीते आपकी जोरू कैसे राँड होगी ? मियाँ साहब ने उत्तर दिया-- "भाई बात तो सच है, खुदा ने हमें भी अकिल दी है, मैं भी समझता हूँ कि मेरे जीते मेरी जोरू कैसे राँड होगी । पर नौकर पुराना है, झूठ कभी न बोलेगा।" जो हो बहर हाल हमैं उर्दू का गम वाजिब है " तो हम भी यह स्यापे का प्रकर्ण यहाँ सुनाते हैं । हमारे पाठक लोगों को रुलाई न आवे तो हँसने की भी उन्हें सौगन्ध है, क्योंकि हाँसा-तमासा नहीं बीबी उर्दू तीन दिन की पट्ठी अभी जवान कट्ठी मरी है ।


है है उर्दू हाय हाय । कहाँ सिधारी हाय हाय ।
मेरी प्यारी हाय हाय । मुंशी मुल्ला हाय हाय ।
बल्ला बिल्ला हाय हाय । रोये पीटें हाय हाय ।
टाँग घसीटैं हाय हाय । सब छिन सोचैं हाय हाय ।
डाढ़ी नोचैं हाय हाय । दुनिया उल्टी हाय हाय ।
रोजी बिल्टी हाय हाय । सब मुखतारी हाय हाय ।
किसने मारी हाय हाय । खबर नवीसी हाय हाय ।
दाँत पीसी हाय हाय । एडिटर पोसी हाय हाय ।
बात फरोशी हाय हाय । वह लस्सानी हाय हाय ।
चरब-जुबानी हाय हाय । शोख बयानि हाय हाय ।
फिर नहीं आनी हाय हाय ।   (भारतेंदु हर‌िश्चंद्र)


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हिंदी के समर्थन में उन्होंने कई दोहे भी ल‌िखे। यहां तक क‌ि उन्होंने अंग्रेज शासकों की परवाह क‌िए बगैर अंग्रेजी पर भी अपनी भाषा को तवज्जो दी। भारतेंदु के कुछ ऐसे दोहे देख‌िए--

अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।  

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।  

निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय।

सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।


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 अंग्रेजी और अंग्रेजों का मजाक उड़ाने के लिए उन्होंने महागणपत‌ि स्तोत्रम् की तर्ज पर अंग्रेज - स्तोत्र ल‌िख डाला था--


विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
स्टारार्थी लभते स्टारम् मोक्षार्थी लभते गतिं ।।
एक कालं द्विकालं च त्रिकालं नित्यमुत्पठेत।
भव पाश विनिर्मुक्त: अंग्रेज लोकं संगच्छति ।।
अर्थात इससे विद्यार्थी को विद्या , धन चाहने वाले को धन , स्टार-खिताब-पदवी चाहने वाले को स्टार और मोक्ष की कामना करने वाले को परमगति की प्राप्ति होती है । जो प्राणी रोजाना ,नियम से , तीनो समय इसका- (अंग्रेज - स्तोत्र का) पाठ करता है वह अंग्रेज लोक को गमन करने का पुण्य लाभ अर्जित करने का अधिकारी होता है ।

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 उस काल में ज्यादातर ह‌िंदुओं की हालत दयनीय थी। अंग्रेज शासन ही नहीं उन्हें पंडावाद और महाजन भी खुलकर लूट रहे थे। गुलामी के बोझ से वह स‌िर्फ घुटनों के बल नहीं थे, बल्क‌ि उनका आत्मविश्वास जमीन पर रेंग रहा था। भारतेंदु उन्हें भाषा और देश के गौरव का भान करवाकर झकझोर कर जगा रहे थे। उनका राष्ट्रवाद भारतवास‌ियों के लिए तरक्की की कोई राह खोज रहा था। मगर उनके प्रयास कुछ अन्य समुदायों को नराज करने वाले थे।  भाषा और संप्रदाय के नाम पर नए तरह के टकराव सामने आने वाले थे।  (क्रमशः)

Thursday, March 16, 2017

पंजाब की सियासत : डेरा जिसके साथ, सत्ता रही न उसके हाथ

 सुधीर राघव

मतदान से ठीक पहले डेरा सच्चा सौदा के मुख्यालय से की गई समर्थन की घोषणा शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन को इस बार बहुत भारी पड़ी। इस घोषणा ने उल्टा असर किया और शिअद के परंपरागत पंथक वोट एक बड़ा हिस्सा छिटक गया। मालवा में अकाली दल को इसबार 69 सीटों में से सिर्फ 9 सीटें हीं मिलीं। प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में अकाल‌ियों का मालवा में यह सबसे खराब प्रदर्शन है।     

31 जनवरी को डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम के समधि और मोड़ मंडी से कांग्रेस प्रत्याशी हरमिंदर सिंह जस्सी की सभा के पास विस्फोट हुआ। छह लोग मारे गए। ठीक अगले दिन एक फरवरी को डेरे ने शिअद-भाजपा को समर्थन की खुली घोषणा कर दी।  
इससे पहले कई नेताओं ने डेरे में जाकर हाजिरी लगाई थी। इनमें अकाली-भाजपा प्रत्याशी भी थे। सिख प्रत्याशियों के वोट के लिए डेरे की शरण में जाने को पंथक नेताओं ने मुद्दा बनाया। उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग का मामला अकाल तख्त तक जा पहुंचा। डेरे से समर्थन मांगने वालों के प्रति सिखों में नाराजगी बढ़ी।

आंखें खोलने वाले नतीजे  

यह माना जाता है कि पंजाब में डेरे के 35 लाख से ज्यादा अनुयायी हैं। इनमें से 70 फीसदी मालवा में है। इनका प्रभाव मालवा की 27 सीटों पर काफी माना जाता है। यह वजह थी कि डेरे की घोषणा के बाद अकाली-भाजपा खेमें में खुशी दौड़ गई थी। मगर मतदान केंद्रों पर चार फरवरी को जो नजारा दिखा और उसके बाद 11 मार्च को जो नतीजे आए, वे डेरों की राजनीति पर विश्वास करने वालों की आंखें खोलने वाले हैं।

मालवा की 69 सीटों में से शिअद-भाजपा को सिर्फ 9 सीटें मिलीं। सिरसा डेरे में हाजरी लगाने वाले बठिंडा शहरी से शिअद-भाजपा उम्मीदवार सरूप चंद सिंगला तीसरे स्थान पर रहे। यह सीट डेरे की राजनीति से दूर रहे कांग्रेस प्रत्याशी मनप्रीत सिंह बादल ने जीती। डेरा प्रमुख के समधि हरमिंदर जस्सी खुद भी मोड़ सीट पर तीसरे स्थान पर रहे। यह सीट आप के जगदेव सिंह ने जीती।

बादल सरकार में मंत्री रहे सिकंदर सिंह मलूका भी पंजाब चुनाव से पहले डेरे की शरण में गए थे। नतीजा यह रहा कि रामपुरा फूल सीट पर वह कांग्रेस के गुरप्रीत कांगड़ से हार गए। डेरे से समर्थन मिलने की जो खुशी तब अकाली नेताओं को हुई होगी, उसके लिए नतीजे आने के बाद वे जरूर पछता रहे होंगे।   

आंकड़े भी दे रहे गवाही     

वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में शिअद को 34 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे। इस चुनाव में सिर्फ 25 फीसदी वोट मिले और कुर्सी की लड़ाई बादल हार गए। वोटों में करीब 9 फीसदी की यह बड़ी गिरावट संकेत दे रही है कि पंथक वोट का भी शिअद से मोहभंग हुआ है।

इस वोट का बड़ा हिस्सा आप के खाते में गया। पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ी रही आप ने करीब 24 फीसदी वोट हासिल किए। भाजपा को पिछली बार सात फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे मगर इस बार पांच फीसदी ही मिल सके।

Tuesday, March 14, 2017

ठग्गू ठगे तो जग हंसे



ठग की कोई आइडियोलॉजी नहीं होती।

वह कट्टरों को ठगने के लिए कट्टरपंथी होता है- इसलिए मंदिर और श्मशान की बात करता है।

वह सेक्यूलर भी हो जाता है, और नारा लगाता है सबका साथ सबका विकास।

वह देशभक्ति का दिखावा भी करता है और भारत माता की जय बोलकर पांव छूने पाकिस्तान जाता है।

एक सर्वे के अनुसार भारतीय लोगों को ठगना सबसे आसान है। आप उन्हें धर्म के नाम पर आसाराम की तरह, अच्छे दिन के नाम पर नेता की तरह और सोने की ईंट का लालच देकर नटवर लाल की तरह ठग सकते हैं। मगर लोगों को आप तभी ठग सकते हैं, बशर्ते आपकी आत्मा गिरी हुई हो।

कुल मिलाकर मोदी ऐसे डकैत निकले, जिन्होंने ईवीएम की नौक पर यूपी के सारे वोट बैंक लूट लिए। यह एक बङीजीत है।

यूपी में कांग्रेस-सपा की दुर्गति उसी दिन तय हो गई थी, जिस दिन राहुल ने अपनी सभा में कार्यकर्ताओं को मोदी मुर्दाबाद के नारे लगाने से रोक दिया था।

भइया यह यूपी है। यहां सिर्फ गुंडई ही जीतेगी।
यहां लोग पाइन एप्पल को नारियल कहने से खुश होते हैं, न कि शिक्षा और रोजगार पर बात करने से।

Sunday, March 12, 2017

कैप्टन ने भाजपा से गढ़ छीने, शिअद को आप ने समेटा



Sudhir Raghav

पंजाब की जनता कई समस्याओं से त्रस्त थी। युवा पीढ़ी नशे से बर्बाद हो रही थी। शिअद-भाजपा सरकार इसे नकार रही थी। कीटनाशक घोटाले से बर्बाद हुए किसान जान दे रहे थे। सरकार तरक्की के गीत गा रही थी। सड़कों पर गैंगेस्टर बेखौफ थे, अतिसुरक्षित जेलों से कैदी भाग रहे थे। सरकार लीपापोती में जुटी थी। लुधियाना, जालंधर, अमृतसर और मंडी गोविंदगढ़ का उद्योग डूब रहा था और राजनेता अपना धंधा चमका रहे थे।

इन सब बातों ने पिछले पांच साल में बादल सरकार को इतना अलोकप्रिय बना दिया कि देश में चल रही मोदी लहर भी उसकी नाव पार नहीं लगा सकी। शिअद के लिए संतोष की बात है कि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, डिप्टी सीएम सुखबीर बादल और बिक्रमजीत सिंह मजीठिया अपनी सीट बचा ले गए। 23 सीटों पर चुनाव लड़ रही भाजपा खुद प्रदेश में 20 सीटों पर हार गई। मोदी, अमित शाह और अरुण जेटली की सभाएं और रेलियां भी सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए कुछ खास न कर सकीं।

सिद्धू की सुनामी ने निकाली शिअद की हवा
इस जीत से वर्ष 2012 में सत्ता से चूके कैप्टन अमरिंदर सिंह के चेहरे की चमक बढ़ गई है। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने माझा और दोआबा में भाजपा से उसके गढ़ छीन लिए। मालवा में पिछली बार की तरह ही कांग्रेस ने अपना दबदबा कायपार्टी ने पांच साल में अपनी शक्ति कई तरह से बढ़ाई।पार्टी ने इस चुनाव 69 में से 40 सीटें जीती हैं।  पिछले चुनाव में जहां मनप्रीत बादल  कांग्रेस के वोट काट रहे थे, वहीं इस बार साथ हैं। भाजपा को छोड़ कर कांग्रेस में आए नवजोत सिंह सिद्धू अपने साथ जो बयार लेकर आए उसने माझा और दोआबा में कांग्रेस की हवा को भाजपा-शिअद के लिए भयावह सुनामी बना दिया। माझा में कांग्रेस ने इस बार 25 में से 22 और दोआबा में 23 में से 15 सीटें जीती हैं।

आप : पंथक वोट में लगाई सेंध, लेकिन जीत में नहीं बदल सकी
पंजाब विधानसभा चुनाव में पहली बार मैदान में कूदी आम आदमी पार्टी की सफलता इसी को माना जा सकता है कि उसने ज्यादातर सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया। खासकर मालवा में वह बड़ी ताकत बनकर उभरी। उसने शिरोमणि अकाली दल के परंपरागत पंथक वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई। यह सेंध इतनी बड़ी रही कि डेरा सच्चा सौदा के खुलकर समर्थन में आने के बाद भी शिअद हैट्रिक बनाने में विफल रहा। शिअद का वोट प्रत‌िशत 37 से घटकर 25 फीसदी पर आ गया। पिछले लोकसभा चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी ने  अपने साथ नया बहुत कम जोड़ा बल्कि कई बड़े नेताओं को पार्टी से निकाला ही। यह बड़ी गलती रही। नवजोत सिंह सिद्धू के साथ तालमेल न हो पाने पर भी पार्टी शायद अब मंथन करे।

सूबे की सियासत में नए युग का संकेत
इस तरह ये नतीजे पंजाब की राजनीति में नए युग का संकेत हैं। अकाली और कांग्रेस के बीच दो ध्रुवों में बंटी राजनीति में अब एक और ध्रुव तेजी से उभर रहा है। विधान सभा में मुख्यमंत्री को इसबार सिर्फ अकालियों नहीं आप के सवालों के लिए भी तैयारी करनी पड़ेगी।  यह अच्छी बात है। लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष हमेशा लोगों के हितों की रक्षा करता है। चाहे मजबूरी में सही।
(अमर उजाला चंडीगढ़ में प्रकाशित)
http://www.amarujala.com/chandigarh/punjab-assembly-elections-2017-quick-analysis-by-sudhir-raghaw?pageId=1

Tuesday, March 7, 2017

उधार का अधनंगा राष्ट्रवाद-3 : भारतीयों को जगा रहा था एक अंग्रेज


सुधीर राघव

पिछले लेख में हमने चर्चा की थी कि बंक‌िमचंद्र चटर्जी ने उपन्यास आनंदमठ से कैसे हिंदू-मुस्ल‌िम के बीच नफरत के बीज बोए। बंगाल में एक नए हिंदू राष्ट्रवाद का उदय हुआ। मगर इस राष्ट्रवाद की जड़ें कहां थीं? यह राष्ट्रवाद कहां से आया? इसके पीछे कौन सी शक्त‌ियां थीं? इन सब सवालों के जवाब हमें इत‌िहास में मिलते हैं।

वंदेमातरम् कविता के रूप में 1870 के दशक में बंक‌िम ने कंपोज कर ली थी। पहले इसे एन ऑ़ड टू दुर्गा कहा गया। यानी यह मां दुर्गा की स्तुत‌ि थी। इसे संस्कृत और बंगाली में लिखा गया था। इसे वंदेमातरम् टाइटल दिया गया। बाद में इसे मदर बंगाल और मदर इंड‌िया कह कर प्रचारित किया गया। हालांक‌ि कव‌िता में सिर्फ वंदे मातरम् ही था, यह कौन सी माता है, इसका कोई उल्लेख नहीं था। इसल‌िए समय के साथ-साथ इसे सुव‌िधा के अनुसार प्रचारित किया गया। बंक‌िम ने 1882 में छपे आनंदमठ उपन्यास में इस कव‌िता को गीत के रूप में शाम‌िल क‌िया। संन्यासी पात्रों के माध्यम से यह भी बताया कि  यह माता असल में जन्मभूम‌ि है।

असल में 1857 के गदर के बाद भारतीयों के प्रत‌ि अंग्रेज ज्यादा सतर्क हो गए थे। उसके बाद भारत आए कई वायसरायों ने सुधारवादी कमद उठाये और भारत के गरीब लोगों में यह छव‌ि बनाने के प्रयास शुरू किए कि अंग्रेजों के रहने से ही उनके हित सुरक्ष‌ित हैं। उन्होंने रेलसेवा, जनगणना और शिक्षा के क्षेत्र में काम किए। भारतीयों के हितों को तवज्जो देने वाले ऐसे ही एक वायसराय लार्ड रिपन माने जाते हैं। उनका नाम जार्ज रोब‌िंसन था और 1880 से 1884 तक भारत के वायसराय रहे। उन्होंने भारतीयों के बीच अपनी सबसे अच्छी छव‌ि बनाई। उन्होंने एक प्रस्ताव भी तैयार करवाया था, जिसमें कहा गया था कि भारतीय मूल के योग्य लोगों को भी जजों के रूप में भारत और यूरोप में नियुक्त किया जा सकता है। मगर ब्रिट‌िश संसद ने इस प्रस्ताव को रद्दी की टोकरी में फैंक दिया था।

असल में लार्ड रिपन चाहते थे कि भारत के गरीब लोग, जोक‌ि बहुसंख्यक हैं, वे अंग्रेजों को अपना मित्र समझें। इसी में अंग्रेज राज की भलाई है। अंग्रेजों से पहले शासक वर्ग मुस्लमान ही था, इसल‌‌िए गरीबों में अध‌िसंख्य हिंदू ही थे। लार्ड रिपन अपने उद्देश्य में सफल भी रहे और काफी भारतीय उनसे प्रभाव‌ित हुए। मद्रास में तो उन्हें रिपन अंगल अप्पन (रिपन हमारे पिता) कहा जाने लगा। कोलकता में एक स्ट्रीट का नाम उनके नाम पर है। यह भी उल्लेखनीय है क‌ि यही वह काल है जब आनंदमठ छप कर आता है। 1882 में छपा यह उपन्यास भारतीय राष्ट्रवाद के उसी चेहरे की नींव रखता है, जो रिपन चाहते हैं। आनंदमठ के संन्यासी मुस्लिम शासकों और लोगों को चुन-चुन कर मारते हैं। घेरे जाने पर अंग्रेजों से भी लड़ते हैं मगर अंत में उपन्यास यह कह कर खत्म होता है कि अंग्रेज ही हिंदुओं के मित्र हैं। अब वे ही शासन करेंगे उन्हें सहयोग दो।

इसी दौर में भारतीय सिव‌िल सेवा का एक बड़ा अंग्रेज अधिकारी अपने शासकों की नीतियों के खिलाफ खुलकर भारतीयों के पक्ष में आता है। सर एलन ओस्टेवियन ह्यूम। एओ ह्यूम 1882 में ही कलकत्ता यून‌िवर्सिटी के छात्रों को खुला पत्र ल‌िखकर आह्वान करते हैं ‌क‌ि उन्हें खुद अपनी नेशनल पोल‌िटकल मूवमेंट बनानी चाह‌िए। भारतीयों के लिए ह्यूम का राष्ट्रवाद बंक‌िम के राष्ट्रवाद के बिल्कुल उलट है। बंक‌िम जहां कहते हैं कि शासन अंग्रेजों को करने दो और भारतीय उन्हें सहयोग दें, वहीं ह्यूम भारतीयों को ठीक उसी समय पर जगाते हैं ‌कि राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भागेदारी खुद सुन‌िश्चित करो।

लार्ड रिपन के काल में जीत बंक‌िम के प्रचार की होती हैं मगर रिपन की विदाई के साथ ही तीन साल में ही कहानी बदलने लगती है। 13 दिसंबर  1884 को लार्ड डफरिन भारत के वायसराय की कुर्सी पर आते हैं। उनका नाम फ्रेड्रिक हेमिल्टन था। उन्हें भारतीय राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के लिए ही जाना जाता है। उनके काल में ही 1885 में ह्यूम ने इंड‌ियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना की। उन्होंने 1888 में डफरिन रिपोर्ट तैयार करवाई, जिसमें बंगाल के गरीबों की दयनीय हालत का वर्णन था। इस रिपोर्ट ने सभी अंग्रेजों को नाराज कर दिया। अंग्रेज देश में यह धारणा बना रहे थे कि वे गरीबों के मित्र हैं, दूसरी ओर रिपोर्ट ने उनकी पोल खोल दी थी। रिपोर्ट ने आनंदमठ के उस प्रचार की भी धज्जियां उड़ा दी थीं कि अंग्रेजों के राज में ही गरीब हिंदू जनता का भला है। भारतीय अंग्रेज भी इस रिपोर्ट से कितने नाराज थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है क‌ि कव‌ि और लेखक रुडयार्ड किपल‌िंग ने डफरिन रिपोर्ट को डफरिन का त्यागपत्र कहते हुए कव‌िता ल‌िखी। इसमें आने वाले वायसराय को चेताया गया था। इस रिपोर्ट से उठे विवाद के बीच लार्ड डफरिन को भारत से जाना पड़ा।

डफरिन के बाद हेनरी पेटी फिट्जमौरिस, जिनके पास लार्ड लैंसडोव्ने की उपाध‌ि थी, भारत के वायसराय बने। भगवान जाने यह किपल‌िंग की कव‌िता का असर था या उनकी ऑक्सफोर्ड की शिक्षा का। भारत में लार्ड लैंसडोव्ने पहचाने गए हिंदू-मुसलमानों के बीच फूट डालने और तनाव पैदा करने के लिए। 1890 में एक छोटा सा व‌िद्रोह हुआ तो उन्होंने क्रूरता से उसका दमन करवाया और उससे जुडे सभी नेताओं को मौत के घाट उतरवा दिया। इस पर ज्यूरी में हेनरी के खिलाफ मामला भी आया मगर सरकार ने इसे खारिज कर दिया।

1894 में हेनरी की वायसराय पद से व‌िदाई हुई और उनकी जगह लार्ड ऑफ एल्ज‌िन विक्टर ब्रूस आए। वह ब्रिटेन की दक्ष‌िणपंथी राजनीत‌िक विचारधारा से जुड़े थे और उनके कट्टरपंथी संस्कार उन्हें पहले तक वायसरायों की तरह आनंद और शौकम‌िजाजी से रोकते थे। भारत के ‌क्रियाकलापों में भी उन्होंने कोई खास रुच‌ि नहीं द‌िखाई। उनके काल में सबसे बड़ा अकाल पड़ा। खुद एल्ज‌िन ने अकाल से पैंतालीस लाख भारतीयों की मौत की बात स्वीकार की थी।

एल्ज‌िन के बाद 1898  से  1905 के बीच लार्ड कर्जन भारत के वायसराय रहे। उन्होंने ही रानी विक्टोरिया को बंगाल के विभाजन का प्रस्ताव दिया था। कर्जन का तर्क था कि अगर ‌बंगाल के हिंदू और मुस्ल‌िम एकजुट हो गए तो वे अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ सकते हैं। 1904 में भारत में अंग्रेज होम सेक्रेटरी ने ‌ल‌िखा - एकजुट बंगाल एक बड़ी ताकत है। इसे कई तरीके से बांटा जाना चाह‌िए। हमारा मुख्य उद्देश्य बंगाल का विभाजन है। इस तरह हम शासन के विरोधियों को कमजोर कर सकेंगे।
 इस तरह लार्ड रिपन के बाद हिंदू राष्ट्रवाद का जो अध्याय शुरू होने से पहले ही बंद होता महसूस हो रहा था। दो दशक बाद लार्ड कर्जन जाते-जाते उसमें नई जान डालने वाला था। ....क्रमशः

Saturday, March 4, 2017

वाम में ही राम

सुधीर राघव

भारतीय दर्शन में दक्षिण पंथ राक्षसी माना गया है। राक्षस रावण की नगरी दक्षिण में थी।
नक्शे में उत्तर ऊपर और दक्षिण नीचे की दिशा है। देवों का स्थान ऊपर और रक्षसों का पाताल बताया गया है।

राम उत्तर की अयोध्या के वासी हैं। उत्तर यानी वाम। राम समतामूलक, समदर्शी, ऊंच-नीच का भेद न करने वाले, गरीबों, शोषितों, पीड़ितों के रक्षक हैं। यही वामपंथ है।

दूसरी ओर दक्षिणवासी दक्षिणपंथी रावण गरीब और कमजोरों पर जुल्म करता है। उनका रक्तपीता है। जनता पर तरह तरह के टैक्स लगा उन्हें प्रताङित कर सुख का अनुभव करता है। वह स्त्री जाति का अपमान करता है। उनका अपहरण करता है। नीति सम्मत बात कहने पर रावण अपने भाई विभिषण को देशद्रोही कहकर लात मारकर निकाल देता है। वह लंका के उन सभी लोगों को देशद्रोही कह निकालने की धमकी देता है, जो उसकी हां में हां नहीं मिलाते।

आज के दक्षिणपंथी राक्षसप्रवृति में रावण से भी दो कदम आगे हैं। वे देश की बेटियों को बलात्कार की धमकी देते हैं। गलत को गलत कहने वालों को देश से निकाल फेंकने की धमकी देते हैं। नानाप्रकार के टैक्स लगाकर जनता का खून चूसते हैं।

असल में उत्तर दक्षिण धरती के दो हिस्से नहीं हैं। ये हमारे दिमाग के दो भाग हैं- वामपंथ और दक्षिणपंथ!

वाम में ही राम हैं और दक्षिण मे राक्षस रहता है।

आपको राम बनना है या राक्षस? यह आपको ही तय करना है।

Thursday, March 2, 2017

उधार का अधनंगा राष्ट्रवाद-2 : बंक‌िम ने कैसे बोए नफरत के नए बीज



सुधीर राघव

पिछले लेख में आपने पढ़ा क‌ि आनंदमठ के जरिए बंक‌िमचंद्र ने किस तरह मुसलमानों के खिलाफ झूठा राष्ट्रवाद खड़ा किया, जो अंग्रेजों के चरणों में नतमस्तक था। किस सफाई से उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ हुए संन्यासी विद्रोह की सच्ची संघर्षगाथा को मुस्ल‌िमानों के खिलाफ काल्पन‌िक जहर उगलती उपन्यास गाथा में बदल दिया। इसके लिए उन्होंने न केवल इत‌िहास के साथ खिलवाड़ क‌िया, बल्क‌ि वह घटनाकाल भी अठारवीं सदी से उठा कर सीधे बारहवीं सदी में ले गए। (1174 में फसल अच्छी नहीं हुई, अत: ग्यारह सौ पचहत्तर में अकाल आ पड़ा- भारतवासियों पर संकट आया। ----आनदमठ से) बंकिम की काल गणना को हिजरी मानकर  काल दोष को तो एकबार के लिए काफी हद तक दूर किया जा सकता है मगर कथानक में तथ्य दोष कथा के साथ साथ बढ़ता जाता है।


बंगाल में अंग्रेजों से हार चुके डरे मुस्ल‌िम समुदाय को निशाना बनाने में कोई जोखिम नहीं था, उल्टा उन्होंने अपने कथानक से जो राष्ट्रवाद खड़ा किया, वह अंग्रेजों के प्रत‌ि अपनी वफादारी प्रकट करने जैसा था। बंक‌िम का यह राष्ट्रवाद चाणक्य के राष्ट्रवाद से एकदम भिन्न था। चाणक्य के राष्ट्रवाद में स्वाभ‌िमान सर्वोपरि था। वह सेल्युकस के खिलाफ सर्वोच्च हिंदू सत्ता स्थाप‌ित करने का पक्षधर है, जबक‌ि आनंदमठ का राष्ट्रवाद मुस्लमानों से सत्ता छीन कर अंग्रेजों के हाथ में रखने की वकालत करता है। बंक‌िमचंद्र का राष्ट्रवाद कैसा है, ‌इसकी यह बानगी देखें-

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महापुरुष ने कहा-अंगरेज उस समय बनिया थे- अर्थ संग्रह में ही उनका ध्यान था। अब संतानों के कारण ही वे राज्य-शासन हाथ में लेंगे, क्योंकि बिना राजत्व किए अर्थ-संग्रह नहीं हो सकता। अंगरेज राजदण्ड लें, इसलिए संतानों का विद्रोह हुआ है। अब आओ, स्वयं ज्ञानलाभ कर दिव्य चक्षुओं से सब देखो, समझो!
सत्यानंद-हे महात्मा! मैं ज्ञान लाभ की आकांक्षा नहीं रखता-ज्ञान की मुझे आवश्यकता नहीं। मैंने जो व्रत लिया है, उसी का पालन करूंगा। आशीर्वाद कीजिए कि मेरी मातृभक्ति अचल हो!
महापुरुष-व्रत सफल हो गया- तुमने माता का मंगल-साधन किया- अंगरेज राज्य तुम्हीं लोगों द्वारा स्थापित समझो! युद्ध-विग्रह का त्याग करो- कृषि में नियुक्त हो, जिसे पृथ्वी श्स्यशालिनी हो, लोगों की श्रीवृद्धि हो।
सत्यानंद की आंखों से आंसू निकलने लगे, बोले-माता को शत्रु-रक्त से शस्यशालिनी करूं?
महापुरुष-शत्रु कौन है? शत्रु अब कोई नहीं। अंगरेज हमारे मित्र हैं। फिर अंगरेजों से युद्ध कर अंत में विजयी हो- ऐसी अभी किसी की शक्ति नहीं?
सत्यानंद-न रहे, यहीं माता के सामने मैं अपना बलिदान चढ़ा दूंगा।
महापुरुष -अज्ञानवश! चलो, पहले ज्ञान-लाभ करो। हिमालय-शिखर पर मातृ-मंदिर है, वहीं तुम्हें माता की मूर्ति प्रत्यक्ष होगी। (आनंदमठ से)


आनंदमठ ने हिंदुओं के बीच मुसलमानों के प्रत‌ि नफरत के नए बीज भी बोए। यह एक ऐसा राष्ट्रवाद था, जो अपने ही लोगों के खिलाफ था और अंग्रेजों के समर्थन में। सभी मुसलमान फारस की खाड़ी पारकर नहीं आए थे। बड़ी संख्या हमारे अपने लोगों की थी, जिन्होंने जोर-जुल्म का शिकार होने से बचने के लिए धर्म बदला। बंक‌िम का नजरिया ‌इन सबके प्रत‌ि कैसा था, आनंदमठ में इसकी तस्वीर इस तरह है--
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उस रात को हरिध्वनि के तुमुल नाद से प्रदेश भूमि परिपूर्ण हो गई। संतानों के दल-के-दल उस रात यत्र-तत्र वंदेमातरम और जय जगदीश हरे के गीत गाते हुए घूमते रहे। कोई शत्रु-सेना का शस्त्र तो कोई वस्त्र लूटने लगा। कोई मृत देह के मुंह पर पदाघात करने लगा, तो कोई दूसरी तरह का उपद्रव करने लगा, कोई गांव की तरफ तो कोई नगर की तरफ पहुंचकर राहगीरों और गृहस्थों को पकड़कर कहने लगा- वंदेमातरम कहो, नहीं तो मार डालूंगा। कोई मैदा-चीनी की दुकान लूट रहा था, तो कोई ग्वालों के घर पहुंचकर हांडी भर दूध ही छीनकर पीता था। कोई कहता- हम लोग ब्रज के गोप आ पहुंचे, गोपियां कहां हैं? उस रात में गांव-गांव में, नगर-नगर में महाकोलाहल मच गया। सभी चिल्ला रहे थे- मुसलमान हार गये; देश हम लोगों का हो गया। भाइयों! हरि-हरि कहो!-गांव में मुसलमान दिखाई पड़ते ही लोग खदेड़कर मारते थे। बहुतेरे लोग दलबद्ध होकर मुसलमानों की बस्ती में पहुंचकर घरों में आग लगाने और माल लूटने लगे। अनेक मुसलमान ढाढ़ी मुंढ़वाकर देह में भस्मी रमाकर राम-राम जपने लगे। पूछने पर कहते-
हम हिंदू हैं।
त्रस्त मुसलमानों के दल-के-दल नगर की तरफ भागे। राज-कर्मचारी व्यस्त हो गए। अवशिष्ट सिपाहियों को सुसज्जित कर नगर रक्षा के लिए स्थान-स्थान पर नियुक्त किया जाने लगा। नगर के किले में स्थान-स्थान पर, परिखाओं पर और फाटक पर सिपाही रक्षा के लिए एकत्रित हो गए। नगर के सारे लोग सारी रात जागकर क्या होगा.. क्या होगा? करते रात बिताने लगे। हिंदू कहने लगे- आने दो, संन्यासियों को आने दो- हिंदुओं का राज्य- भगवान करें- प्रतिष्ठित हो। मुसलमान कहे लगे-इतने रोज के बाद क्या सचमुच कुरानशरीफ झूठा हो गया? हम लोगों ने पांच वक्त नवाज पढ़कर क्या किया, जब हिंदुओं की फतह हुई। सब झूठ है! इस तरह कोई रोता हुआ, तो कोई हंसता हुआ बड़ी उत्कंठा से रात बिताने लगा। (आनंदमठ से)
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बंक‌िम के इस राष्ट्रवाद की जड़ें कहां थीं? यह कहां से भारत पहुंचा? कौन सी शक्त‌ियां देश में ऐसा राष्ट्रवाद खड़ा करना चाहती थीं? इसमें किन की स्वार्थपूर्त‌ि थी? यह हम अगले लेख में पढ़ेंगे.....क्रमशः----

Wednesday, March 1, 2017

उधार का अधनंगा राष्ट्रवाद-1: क्या सिस्टर निवेद‌िता ही हमारी पहली भारत माता हैं...


Sudhir Raghav

भारत माता की पहली तस्वीर 1905 में बनी थी। यह सिस्टर न‌िवेद‌िता से प्रभाव‌ित थी। सिस्टर न‌िवेद‌िता आयरिश-स्कॉट मूल की समाज सेव‌िका और ‌शिक्ष‌िका थीं, जो स्वाम‌ी विवेकानंद की शिष्या थीं।
      
भारत माता का यह पहला चित्र अब‌न‌‌िंद्रनाथ टैगोर ने बनाया था। माता भगवा वस्त्र पहने थी। उसके चरणों में चार कमल थे। चार हाथ थे, जिनमें- माला, धान की बाली, श्वेत वस्त्र और पुस्तक थीं। भारत माता की यह तस्वीर शिक्षा-दीक्षा-अन्न-वस्त्रा की प्रतीक थी। यह तस्वीर  सिस्टर निवेद‌िता के भगवाधारी चित्र से रंग-रूप में काफी मिलती-जुलती थी। चार हाथ और तस्वीर की पृष्ठभूम‌ि च‌ित्रकार की कल्पनाशीलता का म‌िश्रण थी।

उसी दौर के स्वतंत्रा सैनानी सुब्रमण‌िया भारती ने गंगा भूम‌ि को भारत माता कहा है, जो एक पराशक्त‌ि है। भारती कहते हैं क‌ि भारत माता का दर्शन उन्हें अपनी गुरु सिस्टर न‌िवेद‌िता से मिला था।

यह शोध का व‌िषय है कि क्या भारत माता का विचार सिस्टर न‌िवेद‌िता की ही देन है? या उन्होंने इसके प्रसार में कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?

सिस्टर न‌िवेद‌िता 1895 में लंदन में स्वामी व‌िवेकानंद से मिली थीं। उसके बाद कोलकाता आ गईं और 1898 में स्वामी जी ने उन्हें दीक्षा देकर निवेद‌िता नाम द‌िया। उनका मूल नाम मार्गेट एल‌िजाबेथ नोबेल था।

हालांक‌ि साक्ष्य ये भी हैं क‌ि सिस्टर न‌िवद‌िता से पहले भारत माता का विचार बंगालमें पहुंच चुका था। 1873 में किरनचंद्र बेनर्जी ने भारत माता के नाम से एक नाटक प्रस्तुत किया था। 1882 में  बंक‌िमचंद्र चटर्जी का उपन्यास आनंदमठ आया और उसमें जननी जन्मभूम‌ि के रूप में लगभग ऐसा ही व‌िचार मौजूद था। उसका गीत वंदे मातरम् बेहद लोकप्रिय हुआ और स्वदेशी आंदोलन में खूब गाया गया।

यह गीत भारत माता के ल‌िए था या जननी जन्मभूम‌ि बंगाल के लिए, यह स्पष्ट नहीं होता। उपन्यास में गीत से जुड़ा प्रसंग इस प्रकार है-
महेंद्र गाना सुनकर कुछ आश्चर्य में आए। वे कुछ समझ न सके-सुजलां, सुफलां, मलयजशीतलां शस्यश्यामला माता कौन है। उन्होंने पूछा यह माता कौन है।
कोई उत्तर न दे भवानंद गाते रहे।
महेंद्र बोले- यह तो देश है, यह तो मां नहीं है।
भवानंद ने कहा- हम लोग दूसरी किसी मां को नहीं मानते। जननी जन्मभूमश्चि स्वर्गादीप गरीयसी- हमारी माता, जन्मभूम‌ि ही हमारी जननी है- नमारे न मां है, न प‌िता है, न भाई है- कुछ नहीं है, स्त्री भी नहीं, घर भी नहीं, मकान भी नहीं, हमारी अगर कोई है तो वही सुजला, सुफला मलयज समीरण-शीतला-शस्यश्यामला.....
अब महेंद्र ने समझकर कहा- तो फिर गाओ।

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असल में आनंदमठ बंगाल के संन्यासी व‌िद्रोह पर लिखा गया था। यह व‌िद्रोह अंग्रेजो के व‌िरुद्ध 1763 से 1800 ई. तक चला। अंग्रेजों ने बल से इसे कुचल दिया था। अंग्रेज शासन में करीब सौ साल बाद बंक‌िम चंद्र चटर्जी ने अपने उपन्यास में इस विद्रोह की पृष्ठभूम‌ि बदल दी थी। उन्होंने संन्यास‌ियों के इस विद्रोह को मुसलमानों के खिलाफ बताया और अंग्रेजों की प्रशंसा और इस कामना के साथ कि अंग्रेज राज करें और हिंदुओं का कल्याण होगा, से उपन्यास खत्म किया। इस तरह बंक‌िमचंद्र का राष्ट्रवाद मुसल‌िमों के खिलाफ और अंग्रेजों की चाटुकारिता में निहीत था।

क्रमश.....