Saturday, November 26, 2016

ईश्वर की लाठी और भाजपा की काठी

सुधीर राघव
झूठ और कुप्रचार में मोदी सरकार गोएबल्स का अवतार साबित हो रही है।
सरकार की ओर से शोर मचाया जा रहा है कि जनधन खातों में कालाधन बरस रहा है।
उदाहरण दिया जा रहा है कि यूपी के 3.79 करोड़ जनधन खातों में 10670 करोङ रुपये जमा हुए हैं। यानी हर खाते में औसतन सिर्फ 2815 रुपये जमा हुए हैं।
अब सोचने की बात यह है कि जब बैंकों में पैसा बदलने की लिमिट 4500 रुपये है तो गरीब अपने ₹2800, तीन हजार या चार हजार रुपये भी जनधन खातों में जमा करने को मजबूर क्यों हुए??
बैंकों के बाहर 15 दिन तक नोट बदलने के लिए गरीबों की लाइनें तो रोज लगीं मगर बैंकों के पास उनके हिस्से का कैश खत्म था। नोट न बदले जाने से निराश कई गरीबों ने दुखी होकर अपनी जान दी।
इतना ही नहीं इन गरीबों पर कसाइयों की तरह लाठियां बरसवाई गईं ताकि ये लोग नोट बदलने की जगह, रुपये अपने जनधन खातों में जमा करने को विवश हों और सरकार शोर मचा सके कि जनधन खातों में कालाधन बरसा है।
मित्रो ! और जनधन खातों में जमा हुआ यह काला धन कैसा है?
कोई गरीब मां मजदूरी और बरतन मांजकर पाई पाई बरसों से बचाकर उन्हें 500 या हजार के नोट में बदलकर अपनी रजाई या गूदङी में सिलकर छुपाती होगी ताकि बेटी सयानी हो तो वह इस पैसे से उसके हाथ पीले कर सके। या कोई गरीब इसलिए इकट्ठा कर रहा होगा कि अपने लिए एक झौंपङी बना सके। या किसी बूढे बाप का परदेसी मजदूर बेटा मनि आर्डर भेजता होगा। मोदी सरकार ने इस सब पैसे को एक झटके में कालाधन घोषित कर दिया।
मोदी जनसभा में भाषण देता है कि मेरी गरीब माता बहन ने .. बेटी की शादी के लिए पाई पाई जोङी है तो वह ढाई लाख रुपये तक बैंक में जमा करा दे! कोई उसे पूछेगा तक नहीं। दूसरी ओर प्रति जनधन खाते सिर्फ 2815 रुपये जमा होते ही सरकार शोर मचा रही है कि कालाधन बरस गया।
मोदी सरकार और भाजपा को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसने लाइन में लगे गरीबों पर जो लाठियां बरसबाई हैं , उनमें तो आवाज थी। इन्हें ईश्वर से डरना चाहिए, क्योंकि उसकी लाठी बे आवाज होती। भगवान की लाठी चलेगी तो भाजपा की सिर्फ काठी होगी और वह दुम दबाकर दौड़ेगी।

Tuesday, November 22, 2016

गुजरात की नब्ज है ग्राम्य विकास मॉडल

सुधीर राघव
सरकार के ‌भरोसे नहीं रहते ग्रामीण, आपसी सहयोग से ला रहे बदलाव
जल प्रबंधन ही नहीं गुजरात का ग्राम्य विकास मॉडल भी पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों के लिए अनुकरणीय है। इसे नए गुजरात की नब्ज कहा जा सकता है। गावों के विकास में ग्राम समित‌ियों का काफी योगदान है। ग्रामीण सिर्फ सरकार के भरोसे नहीं हैं वे आपसी सहयोग से बुनियादी ढांचे की दिक्कतों को दूर करने में यकीन रखते हैं।
देश में श्वेत क्रांति के जनक वर्गीज कुरियन ने किसानों को स्वावलंबन का जो पाठ पढ़ाया, उसने स‌िर्फ देश में दूध की धारा ही नहीं बहाई, बल्क‌ि ग्रामीणों के आर्थ‌िक और सामाज‌िक जीवन में भी क्रांत‌ि की। पीआईबी चंडीगढ़ की ओर से गुजरात गए पत्रकारों के दल को इस क्रांत‌ि को नजदीक से जानने का मौका मिला। आणद में इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट के प्रजेंटेशन ने इस मॉडल को समझने में मदद की। मैनेजमेंट के छात्र ग्रामीणों के बीच जाकर उनकी समस्याओं का अध्ययन करते हैं और हल तलाशते हैं। इसी आधार पर छात्रों का मूल्यांकन भी होता है।
आदर्श कण‌ि गांव
पाटन जिले के कण‌ि गांव में ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से विकास की परंपरा को दिशा दी है। कणि अनुपम प्राइमरी स्कूल की इमारत शानदार है। इसमें कंप्यूटर लैब, शौचालय, भोजनालय और पानी के ल‌िए आरओ प्लांट है। पंचायत सदस्य नाथा लाल ने बताया कि यह सब ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से अपने बच्चों के लिए किया है। बच्चों को अच्छा भोजन और स्वच्छ वातावरण मिले, यही हमारा उद्देश्य है। इतना ही नहीं पूरे गांव के पेयजल के लिए अलग आरओ प्लांट लगाया भी गया है, जहां से ग्रामीण दो रुपये में बीस लीटर पानी ले सकते हैं।
अमूल करेगा पंजाब में विस्तार
पंजाब के दुग्ध किसानों के लिए यह अच्छी खबर है कि आने वाले समय में अमूल पंजाब में अपना और विस्तार कर सकता है। अभी बरेटा में अमूल का प्लांट है, इससे आसपास के किसानों को लाभ मिला है। अमूल के चीफ ऑपरेटिंग अफसर किशोर झाला से जब सवाल किया गया कि इससे वेरका के साथ कंपटीशन बढ़ेगा और दो सहकारी संस्थाओं के बीच कंपटीशन क्या सहकारिता के ल‌िए अच्छा है। उन्होंने कहा कि यह दुग्ध उत्पादक किसानों के ल‌िए अच्छा है। हमारा उद्देश्य है कि किसानों को उच‌ित मूल्य मिले। वेरका हमारे लिए भातृसंस्थान है और हम मिलकर ऐसा कंपटीशन बनाएंगे कि निजी क्षेत्र भी दुग्ध किसानों को बेहतर मूल्य दे।
ग्रामीण विकास में सबसे बड़ी बाधा इन्फ्रास्ट्रक्चर है। आप सभी गांवों को अच्छी सड़कें दे दो। बिजली और पानी दे दो। किसान की पहुंच मंड‌ियों तक हो जाएगी। वह खुद तय करने लगेगा कि उसे कहां उचित मूल्य मिलेगा और अपनी फसल किसे बेचनी है। सड़कें होंगीं तो स्वस्थ्य सेवा, शिक्षा और तकनीक तक भी किसान की पहुंच हो ही जाएगी। देश के काफी हिस्सों में किसान अपना माल खुद ग्राहक तक नहीं ले जा पाता। बड़ा मुनाफा बिचौलियों को मिल रहा है।
-डॉ. आरसी नटराजन, डायरेक्टर, इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट, आणंद

Monday, November 21, 2016

गरीब और किसान ही निशाने पर

सुधीर राघव
भाजपा नेताओं ने अपनी गाड़ियों में लाखों रुपये के पुराने नोट पकड़वाए, गंगा में नोट बहाए, कचरे में भी रखवाए ताकि उनका नेता कह सके कि सचमुच नोट जनता ने छुपा रखे थे। ये नोट सिर्फ इसलिए फैंके और दिखाए जा रहे हैं ताकि मोदी जनता को मुहं दिखाने के काबिल हो सकें।
यह सर्जीकल स्ट्राइक गरीबों और किसानो पर हुआ है। यह बिल्कुल वैसा है जैसा जैविक हथियारों का शोर मचाकर अमेरिका ने इराक पर हमला किया था मगर मिला कुछ नहीं। सिर्फ जनता तबाह हुई। सिर्फ गरीब मार हुई है। बैंकों की लाइन में और पैसे के अभाव में करीब साठ लोगों की जान जा चुकी है।
वही मूर्खता मोदी सरकार ने की है। कालेधन का शोर मचाकर गरीबों और किसानों पर कार्पेट बंबारमेंट की गई है। गरीब और किसान रोटी को मोहताज है। सरकार की साख खत्म है। गरीब अपनी साख से ही उधार पर जी पा रहा है।
किसी बङे उद्योगपति को नहीं पकङा गया। मोदी को 14 लाख का सूट देने वाले मोदीभक्त ने मोदी जी की इज्जत बचाने के लिए दो सौ फीसदी जुर्माने पर जरूर कुछ करोङ जमा कराए हैं।
इस तरह भक्त और पार्टीजन ही नोट इकट्ठे कर सार्वजनिक स्थलों पर अपने पास ही पकङवा रहे हैं। महाराष्ट्र का मंत्री तक पार्टी ने इस काम में लगा दिया है।
नोटबंदी के लिए इसलिए नवंबर का समय चुना गया ताकि किसान अपनी मुख्य रबी की फसल ही न बो सकें। उनके पास भूखे मरने और अपनी जमीने बेचने के अलावा और कोई विकल्प न बचे।
सीमा पार वाले तो सारे मोदी के फैन हो चुके हैं। नोटबंदी की ऐसी योजना तो कोई लाहौर में बैठे आकाओं के चरण छूकर ही बना सकता है, जिससे पूरे भारत में उत्पादन ठप हो जाए और देश आर्थिक एमरजेंसी की गर्त में चला जाए।
खुश आतंकियों ने अपनी गतिविधियां रोक दी हैं। भारत को बरबाद करने के लिए मोदी ही काफी हैं तो उन्हें मेहनत करने की क्या जरूरत।
इसबार गरीब किसान रबी की फसल न बो सकें, क्या इसकी तैयारी सरकार की ओर से 6 महीने से चल रही थी?
क्या नोटबंदी के पीछे सरकार का प्लान यह है कि गरीब किसान नवंबर में अगर कुछ बोयेगा नहीं तो अप्रैल में कुछ कटेगा भी नहीं? क्या इसलिए सहकारी बैंकों पर पुराने नोट न लेने कि बंदिश लगा दी गई है?
क्या अगले साल हालात यह होने वाले हैं की भूखा मरता किसान जमीन बेचने को मजबूर होगा? क्या इसलिए ही आजकल कई बाबाओं और उद्योग पतियों के चेहरे पर पहले से कहीं ज्यादा रौनक है?
ये सब अगले साल उस वक्त का इंतजार कर रहे हैं, जब किसान मजबूर होकर जमीने बेचेगा तब ये गिद्धों की तरह मंडराते हुए पहुंच जाएंगे और उनकी जमीने औने-पौने फोन दाम पर खरीदकर उद्योग लगाएंगे।
क्या यही है सरकार का भारत निर्माण? मैक इन इंडिया?

Wednesday, November 16, 2016

चंडीगढ़ से ज्यादा काले हैं अहमदाबाद के कौए

सुधीर राघव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है मगर उनके शहर अहमदाबाद में सड़कों के किनारे जगह-जगह मलबा और कचरा देखा जा सकता है। सोलिड वेस्ट मैनेजमेंट के संबंध में दिक्कतों को वहां के नगर निगम के अधिकारी भी मानते हैं। चंडीगढ़ के संदर्भ में गुजरात मॉडल का सवाल उठाने पर अधिकारियों का जवाब है कि कचरा प्रबंधन की दिक्कतें एक जैसी हैं। खासकर सेग्रीगेशन पर। अहमदाबाद नगर निगम के सोलिड वेस्ट डिपार्टमेंट के डायरेक्टर हर्षाद्रे जे सोलंकी गुजराती मुहावरा कहते हैं कि कौए सभी जगह काले होते हैं। पीआईबी चंडीगढ़ की ओर से ले जाए गए पत्रकारों के दल के सामने प्रजेंटेशन देते हुए सोलंकी ने बताया कि इस शहर की आबादी तेजी से बढ़ रही है। कंस्ट्रक्शन और इन्फ्रास्ट्रेकचर में बूम है। मलवा उठाने की व्यवस्था है, मगर व्यावहारिक दिक्कते हैं।
साबरमती में डालते हैं कचरा
सोलंकी ने बताया कि कुछ लोग पूजा के बाद का सामान साबरमती नदी में डाल देते हैं। हालांकि उन्होंने पूजा सामग्री के लिए नदी के किनारे बड़े कलश रखवा दिए हैं मगर फिर भी कुछ लोग आस्था की वजह से इनका इस्तेमाल नहीं करते। वे सामग्री नदी में ही फैंकते हैं। लोगों को जागरूक करने के लिए मुहिम चलाई जा रही है।
मेट्रो की जगह बीआरटीएस कितना कारगर
चंडीगढ़ का मेट्रो प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में हैं। विकल्प के तौर पर बस रेपिड ट्रांज‌िट सिस्टम (बीआरटीएस) अपनाने की बातें हो रही हैं। दिल्ली में यह फेल हो चुका है मगर अहमदाबाद में सफलता पूर्वक चल रहा है। अहमदाबाद के बीआरटीएस मॉडल का अध्ययन चंडीगढ़ कर सकता है। वहां एसी बसें और टर्मिनल हैं। बस के आने-जाने पर ही दरवाजे खुलते बंद होते हैं। यह मेट्रो जैसी सुविधा का अहसास कराते हैं। म्युनिसिपल कार्पोरेशन की स्टेंडिंग कमेटी के चेयरमैन प्रवीन बी पटेल के अनुसार बीआरटीएस का विश्वस्तरीय इन्फ्रास्ट्रक्चर अहमदाबाद को ग्लोबल सिटी बनाता है। हर बस की जानकारी ‌कंट्रोल रूम में रियल टाइम अपडेट होती है। हालांकि इसके रास्ते में कई चुनौतियां हैं। करीब चालीस लाख का सालान घाटा है, जिसे नगर निगम अपने साधनों से पूरा करता है। बीआरटीएस में बसों के लिए अलग लेन है मगर खाली लेन में निजी वाहन चालक भी चले आते हैं। चंडीगढ़ से गए पत्रकारों के दल को जब इस बस में ले जाया जा रहा था तो एक चौक पर सामने से ट्रक आ जाने से बस को रोकना पड़ा। हालांकि ऐसी घुसपैठ को रोकने के लिए नगर निगम की ओर से व्यवस्था की गई है। पूर्व सैनिकों को भर्ती कर नगर निगम ने चौराहों पर निगरानी के लिए तैनात किया है। मगर उनके पास कार्रवाई के अधिकार नहीं हैं। वे सिर्फ लोगों को समझाते हैं कि वे बीआरटी लेन में अपने वाहन न चलाएं।
बीआरटीएस सिस्टम के तहत रोज 2500 बसें करीब डेढ़ लाख यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाती हैं। न्यूनतम किराया 4 रुपये और अधिकतम 29 रुपये है। इससे नगर निगम को रोज 19 लाख 25 हजार रुपये की आय होती है।
-प्रवीन बी पटेल, चेयरमैन, स्टैंडिंग कमेटी

Tuesday, November 15, 2016

ढाकीं में छुपा सुखना के कायाकल्प का मंत्र

सुधीर राघव
सूखती सुखना के कायाकल्प का मंत्र हम गुजरात से सीख सकते हैं। सुरेंद्र नगर का ढाकीं प्रोजेक्ट करीब पौने दो करोड़ लोगों को पेयजल पहुंचा रहा है। ये लोग पहले मीलों दूर से पानी लाते थे।
गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी बड़े गर्व से बताते हैं कि इस साल गुजरात में काफी कम बारिश हुई है, मगर हमें कोई चिंता नहीं है। हाल ही में पीआईबी चंडीगढ़ की ओर से अहमदाबाद गए पत्रकारों के दल से बात करते हुए रूपाणी ने बताया कि यह दुनिया का सबसे बड़ा वाटर सप्लाई प्रोजेक्ट है। इस प्रोजेक्ट से हम 66 मीटर की ऊंचाई तक बसे गांवों में भी पानी पहुंचा रहे हैं। कुल 360 किलोमीटर लंबी तीन पाइप लाइनों से पानी लोगों तक पहुंचाया जा रहा है।
सूखे में भी कलकल कर बहती है साबरमती
इस साल कम बारिश होने से भले ही हमारी सुखना लेक संकट में है मगर राजस्थान से निकलने वाली साबरमती नदी इस सूखे में भी गुजरात में कलकल बह रही है। इसके पीछे प्लानिंग और विजन है। यह रेन वाटर हार्वेस्टिंग और ट्रीटेड वाटर से जल संकट दूर करने का कारगर मॉडल है। साबरमती पर कई डैम बनाकर बारिश के दिनों का पानी इकट्ठा किया जाता है। यही पानी अहमदाबाद के लोगों के लिए पेयजल सप्लाई का मुख्य स्रोत है। इसी से सीख लेते हुए सुखना के कैचमेंट एरिया में भी छोटे-छोटे डेम बनाकर बरसाती पानी की हार्वेस्टिंग की जा सकती है और इन्हें इंटरलिंक कर संकट के समय लेक तक पानी लाया जा सकता है। अहमदाबाद नगर निगम की एन्वायरमेंट इंजीनियर दर्शना पटेल के अनुसार रोज 6000 लाख लीटर सीवरेज का ट्रीटेड पानी भी अहमदाबाद से साबरमती में छोड़ा जाता है। इसका बीओडी 20 से भी कम होता है। साबरमती का यह पानी कृषि में उपयोग हो रहा है।
इस साल बारिश बहुत ही कम हुई है। सौराष्ट्र और कक्ष के 70 फीसदी डैम सूख चुके हैं मगर हमें कोई चिंता नहीं है। दुनिया के सबसे बड़े। ढाकीं प्रोजेक्ट की वजह से हम लोगों के घर तक पानी पहुचाने में सक्षम हैं।
- -विजय रूपाणी, मुख्यमंत्री, गुजरात

नेता की नफरत

हिटलर यहुदियों से नफरत करता था और उन्हें खत्म करने के लिए उसने गैस चैंबर बनवाए।
इसे गरीबों से नफरत है, उन्हें खत्म करने के लिए इसने नोट बदलवाए।
रुपये न बदले जाने पर एक दिन में तीन गरीबों ने आत्महत्याएं की हैं और तानाशाह कहता है कि बेइमान परेशान हैं।
अगर निशाना सेठ लोग होते तो नोट बंदी महीने की पहली तारीख को की होती, क्योंकि इसी तारीख को सेठों के पास सबसे ज्यादा कैश होता है। आठ तारीख तक तो सेठ लोग इस धन का बडा हिस्सा अपने कामवालों, नौकरों और मजदूरों को वेतन के रूप में बांट चुके होते हैं।
नोट बंदी के एलान के लिए आठ तारीख इसलिए चुनी क्योंकि यह वह तिथि है, जब कैश मजदूरों और श्रमिकों के पास होता है, उन्हें नकद में वेतन मिल चुका होता है। नवंबर इसलिए चुना क्योंकि धान की फसल बेचने के बाद इस महीने काफी नकदी किसानों के पास भी होती है।
इन दोनों वर्गों को ही तानाशाह ने अपनी नफरत का निशाना बनाया है।

Thursday, November 3, 2016

साहब और शरीफ (लघुकथा)

यूनिवर्स में कहीं दो देश
ट्रिनट्रिन....ट्रिन
साहब : कहो शरीफ कैसे हो?
शरीफ : बस कट रही है शराफत से।
साहब : शराफत से कैसे कटेगी भाई। तुम तो जानते हो कई राज्यों में चुनाव हैं। तुम भी घोटालों के आरोपो में घिरे हो। यहां हमारी हालत भी पतली है।
शरीफ : क्या करें? कुछ सोचो भाई। तुम्हारा दिमाग खूब चलता है।
साहब : सोच लिया। बस हमें अपने देश में देशभक्ति का माहौल बनाना होगा।
शरीफ : वह कैसे बनेगा?
साहब : जब किसी शहर और गांव में जवान का ताबूत पहुंचता है तो बच्चे बच्चे में देशभक्ति जाग जाती है। भाई शराफत छोड़ो युद्ध का माहौल बनाएं। दोनों हथियार खरीदेंगे। कमीशन खाएंगे। मजा आएगा भाई।
शरीफ : मजा आएगा।
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> दो माह बाद
ट्रिनट्रिन ...ट्रिन
साहब : ये तुमने क्या करवाया। 15 बीस जवान एक साथ मरवा दिए। एक या दो से महौल बनता। तुमने सब उल्टा करवा दिया। अब स्ट्राइक की बात बोलकर कितनी मुश्किल से सब संभाला है।
शरीफ : अब तुमने ही अपने जवान खुले में टैंट में लिटा रखे थे। तुम हो चलाक। इसी चक्कर में तीस हजार करोङ के हथियार सौदे कर लिए। दस हजार करोङ का कमीशन पीट लिया और मेरे आगे घड़ियाली आंसू भी बहा रहे हो। रोज ताबूत भी पहुंच रहे हैं। मेरे यहां तो कुछ काबू नहीं है।
साहब : तुम्हारा भी भला होगा। वो कहावत है न कि कर भला, हो भला।