Thursday, September 29, 2016

अगर मैं पीएम बन जाऊं

सुधीर राघव
लगता है मोदी जी ऐसे ऐसे कारनामें करेंगे कि लोग मोहम्मद बिन तुगलक को भूल जाएंगे।
26|11 के बाद दुनिया में अलग थलग पड़े पाकिस्तान को मोदी जी ने चुनाव जीतते ही शपथ ग्रहण समारोह में बुलाकर प्यार लुटाया। फिर हर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर नवाज से चिपट चिपट कर मिलते। इतना ही नहीं डेढ़ साल में ही लाहौर पहुंचकर चरणों में भी लौट लगा दी।
देश के दुश्मन को गले लगाना देश से गद्दारी होता है और यह साबित भी हुआ। नवाज शरीफ ने इस मूर्खता का लाभ उठाकर पलटकर पठानकोट और उड़ी कर दिया। संयुक्त राष्ट्र में जहर उगला और इसकी भी शर्म नहीं कि मोदी जी ने उनके घर आकर पांव पकड़े थे।
अब मोदी जी फिर से पाकिस्तान को अलग थलग करने के रास्ते तलाश रहे हैं। यानी लौटकर दौलताबाद से दिल्ली आए वाली स्थिति है। मोदी जी मुख्यमंत्री से सीधे प्रधानमंत्री बने हैं इसलिए वह देश पर उल्टे सीधे प्रयोगकर विदेश नीति सीख रहे हैं।
पाकिस्तान को अलग थलग करने के नाम पर भी मोदी जी क्या कर रहे हैं? पाकिस्तान हमें मारकर चला गाया और हम आंसू बहाकर कह रहे हैं ओबामा जी ओबामा जी पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित करो। यूएन में गिड़गिड़ा रहे हैं -अध्यक्ष महोदय जिनके घर शीशे के होते हैं वे औरों पर पत्थर नहीं फैंकते।
अरे अमेरिका क्या जाते हो। पाकिस्तान जाओ न। पीओके और बलूचिस्तान में झंडा फहराकर आओ न। अगर आज मैं प्रधानमंत्री होता तो वही करता जो बचपन में किया था। भाइयो और बहनो। बचपन में एक लड़का मेरी पीठ पर मुक्का मार कर दौड़ गया। मैंने भी पीछा नहीं छोड़ा और उसके घर पहुंचकर उसकी खबर ली। उसे सबक सिखाया। मैं पाकिस्तान के साथ भी ऐसा ही करता। ऐसा ही करूंगा। प्रधानमंत्री बना दो प्लीज। मुझे भी मोदी जी की तरह राष्ट्रीय राजनीति का कोई अनुभव नहीं है।
( अंबानी, अडानी से सादर अनुरोध है कि अगर वे मेरी मदद करें तो मैं भी रजत शर्मा को यह धांसू इंटरव्यू दे सकता हूं)

Wednesday, September 28, 2016

कविता और कवि

सुधीर राघव
एक तरफा कवि ने
कविता से कहा
तुम मेरी हो जाओ
नहीं तो तेजाब फेंक दूंगा
कविता ने पलट कर
तमाचा जड़ा
कवि भस्म हो गया
कविता दुर्गा हो गई
कवि रक्तबीज बनकर आया
उसने कविता से कहा
तुम मेरी हो जाओ
नहीं तो कैंची से गोद दूंगा
कविता ने हुंकार भरी
खप्पर में काट खून पी गई
कवि मर गया
कविता चंडी हो गई
झरने पर बैठे गुनगुनाते कवि ने
कविता से कहा
मेरी लय पहन लो
ये अलंकार अपने बालों में लगा लो
खूब जंचेगी तुम्हे यह छंद की चोली
तुम्हारे माथे पर में चांद टांगता हूं
तुम्हारे हाथों के सुनहरे कंगन बनाउंगा
मैंने कमा लिए हैं 12 दिन के सूरज
यह नदी उठाकर
तुम्हारे पांव में बांधूंगा पायल की तरह
कविता प्रेम में डूब गई
कवि अमर हो गया।

Monday, September 26, 2016

सिंधु संध‌ि पर भयभीत पाक

सुधीर राघव
सितंबर 1960 में पाकिस्तान से हुई सिंधु जल संधि ठीक 56 साल बाद एक बार फिर चर्चा में है। पाकिस्तान के लिए यह उस तोते की तरह है, जिसमें उसकी जान बसती है। यही वजह है कि भारत को आतंकवाद का निर्यात करते हुए पिछले तीस साल में वह कई बार इसके टूट जाने के भय से भयभीत हुआ है।
पाकिस्तान के साथ तीन जंग लड़ने के बावजूद भारत इस संधि को क्यों ढो रहा है? यह सवाल आज देश में हर कोई पूछ रहा है। इस संध‌ि में विश्वबैंक मध्यस्थ था और संधि के बाद पाक‌िस्तान को दस साल का ग्रेस पीर‌ियड दिया गया था। 1970 तक विश्वबैंक की मदद से उसने अपने यहां दुनिया का सबसे बड़ा नदी सिंचाई सिस्टम बना लिया। इसी ग्रेस पीरियड में पाकिस्तान ने भारत से एक युद्ध भी लड़ा और दूसरा युद्ध इसके ठीक एक साल बाद 1971 में। उस दौर में भारत के लिए जम्मू-कश्मीर में बांध परियोजनाओं के बारे में विचार हो सकता था मगर उन्हें बनाने के लिए लंबे वक्त और कश्मीर की स्थानीय सरकार के सहयोग की जरूरत थी।
हालांकि ऐसा भी नहीं है कि यह सिर्फ पाकिस्तान का डर है कि भारत सिंधु समझौता तोड़ सकता है। इस दिशा में पिछले चालीस साल में कुछ कदम भी उठे और उसने पाकिस्तान को भयभीत किया। खासकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के कार्यकाल में जम्मू-कश्मीर में जेहलम और चिनाब को नियंत्रित करने के कई ठोस काम किए गए और पाकिस्तान ने इनके खिलाफ ने अपील भी की।
सत्तर के दशक में यमुना, सतलुज, ब्यास, रावी को नहरों से इंटरलिंक करने की योजना घोषित रूप से बन गई थी। जेहलम और चिनाब को इस रूप में न‌ियंत्रित करने के लिए ‌डेम निर्माण योजनाएं भी तैयार की गईं। मगर अस्सी का दशक शुरू होने से पहले ही पाक प्रायोजित आतंकवाद ने पंजाब में जड़ जमानी शुरू कर दी और उन्होंने सतलुज-यमुना लिंक का सबसे ज्यादा विरोध किया। यहां तक क‌ि इंजीनियरों की हत्या कर दी गई। कुछ क्षेत्रीय नेता भी एसवाईएल के विरोध में आ गए।
इस दौरान जम्मू-कश्मीर में कुछ ठोस काम हो रहा था। पावर प्रोजेक्ट शुरू किए गए। इनके लिए डेम बनाए गए और बिजली उत्पादन किया गया और साथ ही पाकिस्तान को आश्वस्त किया जाता रहा कि हम सिर्फ बिजली बना रहे हैं और इसमें से पानी नहीं ले रहे हैं। सबसे पहले स्थानीय सरकार की मदद से 1970 में सलाल डेम बनाया गया। 1980 में जेहलम में बुलर बांध प्रोजेक्ट तैयार किया गया और 1984 में बुलर लेक पर इसका निर्माण शुरू किया गया। 1987 में पाकिस्तान ने इसके खिलाफ शिकायत की तब से अब तक इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच 13 दौर की वार्ता हो चुकी है। राजीव गांधी के समय 1985 में किश्तवाड़ में चिनाब नदी पर 390 मेगावाट की दुलहस्ती पर‌ियोजना तैयार की गई। यहां नदी पर 70 मीटर ऊंचा बांध है। नरसिंह राव ने 1992 में डोडा जिले में चिनाब नदी पर बगल‌िहार प्रोजेक्ट की रूपरेखा तैयार ‌की। देवगोड़ा सरकार के समय 1996 में इसका निर्माण को मंजूरी मिली और। 1999 में अटल सरकार के समय निर्माण शुरू हुआ।
वर्ष 2008 में मनमोहन सिंह ने यह प्रोजेक्ट राष्ट्र को समर्प‌ित किया। अगर पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित कर दिया जाता है तो भारत इन बांधों से कैनाल सिस्टम बनाकर अपनी जरूरत का पानी ले सकता है। मगर यह पानी तभी लिया जा सकता है, जब कश्मीर और पंजाब में हमारे ही लोग इसका विरोध न करें। हम चिनाब, जेहलम, रावी, ब्यास, सतलुज और यमुना के बीच नहरों के जर‌िए इंटरलिंक बनाते हुए पानी को देश के सूखे हिस्सों में पहुंचाएं। पंजाब के नेताओं को भी एसवाईएल का विरोध करने की जगह जेहलम और चिनाब के पानी में अपना हिस्सा मांगने पर जोर लगाना चाहिए। पंजाब को इसलिए ही पंजाब कहा जाता है, क्योंकि इन नद‌ियों का पानी इसके नाम में हैं। इसल‌िए यह पंजाब का हक है। अटल ब‌िहारी बाजपेयी भी इस बात को समझते थे। इसल‌िए वह हमेशा नद‌ियों को इंटरल‌िंक करने की बात करते रहे।
मोदी मुख्यमंत्री से सीधे प्रधानमंत्री बने हैं। इसलिए उन्हें राष्ट्र की समस्याओं और जरूरतों को समझने में वक्त लगेगा। सिंधु संध‌ि पर समीक्षा बैठक बुलाकर उन्होंने अच्छा किया है। इससे उन्हें इस पूरे मसले को समझने में मदद मिलेगी। सिंधु जल संधि की वजह से पाकिस्तान को सिंधु सिस्टम की तीन नदियों सिंधु, जेहलम और चिनाब का पूरा पानी मिलता है। इस सिस्टम की बाकी तीन नदियों सतलुज, ब्यास और राव‌ि के पानी पर भारत का अधिकार है। संधि की वजह से और कुछ भारत में क्षेत्रीय दलों की राजनीत‌ि की वजह से पाकिस्तान इस सिस्टम से 75 फीसदी पानी ले रहा है और इसमें से 72 फीसदी का वह खुद इस्तेमाल करता है और तीन फीसदी पानी चीन और अफगानिस्तान को देता है। हमारा पानी पीकर वह हम पर ही आतंकवाद थोपता है। उसे बताना होगा कि आतंकवाद के बदले पानी नहीं दिया जा सकता।

Sunday, September 25, 2016

ऐसे दिन भी आने थे

सुधीर राघव
पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात हम नहीं करेंगे। हम बात करेंगे उनकी जिन्हें सबक सिखाने में मोदी सरकार तन मन और धन से लगी है। भाजपा और संघ के वालिंटियर जिस काम में तन से लगे हैं। सरकार धन से और मोदी जी मन से। आज हम उसकी बात करते हैं।
सुबह सुबह डंडा लेकर गरीबों को जंगलों से भगाया जाता है। ये वे लोग हैं, जिनके पास घर नहीं हैं। चंडीगढ़ की सड़कों पर पलते हैं और रात को फुटपाथों पर सोते हैं। रिक्शा चलाते हैं या भीख मांगकर गुजारा करते हैं।
जाहिर है कि जब इनके पास घर नहीं हैं तो शौचालय भी नहीं होंगे। शहर के सार्वजनिक शौचालयों पर ताले टंगे हैं। जो कंपनी इन्हें चलाती थी, वह इन पर विज्ञापन लगवा देती थी। उस पर विज्ञापन घोटाले का आरोप लगाकर हटा दिया गया। यथा राजा तथा अफसर। अफसरों ने बौद्धिक विकास का परिचय देते हुए इन शौचालयों पर ताले लगवा दिए।
गरीब और बेघर बेशौचालय लोग सुबह सुबह जंगल की ओर निकल जाते थे। अब उन्हें वहां डंडा लेकर खङे भक्त मिल जाते हैं। गोभक्तों वाली स्पेशल ट्रेनिंग वाले ये भक्त इन बेशौचालय लोगों से क्या सलूक करते हैं, इसका कोई वीडियो तो अभी तक नहीं आया, इसलिए हम मान लेते हैं कि वे इन गरीब लोगों को प्यार से समझाते होंगे और बेचारे गरीब मान जाते होंगे। या फिर कोई ऐसा योग सिखाते होंगे कि वे नेचरकाल की समस्या से सदैव के लिए मुक्ति पा लें।
वैसे चंडीगढ़ में खुले में शौच पर 500 रुपये जुर्माना भी है। मगर इन गरीबों की जेब में पांच रुपये भी निकल आएं तो बड़ी बात है। ऐसे में अफसरों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि जुर्माना कैसे वसूलें। इस चिंता से उन्हें रातभर नींद नहीं आती। जुर्माना न वसूला तो टार्गेट पूरे न होंगे। टार्गेट पूरा न हुआ तो स्वच्छता का अवार्ड कैसे मिलेगा?
अब ऐसे नजारे आम हो सकते हैं। आप सुबह सुबह सैर पर निकले हैं। पार्क के गेट पर ही कोई मैला कुचैला सा पेट पकड़े गिड़गिड़ा रहा है- साहब पांच रुपये दे दो। शौचालय जाना है।बहुत पुण्य होगा।
आप ट्रेकसूट की जेबों पर हाथ मारते हैं। उसमें पर्स नहीं है। सिर्फ गाड़ी की चावी है। आपको दिनभर अफसोस होगा कि सुबह सुबह पुण्य के काम से वंचित रह गए।
मगर यह स्थित तब आएगी जब शहर के शौचालयों के ताले खुलेंगे। अभी आपको सुबह सुबह पुण्य कमाना है तो डंडा लेकर जंगल जाइए। गरीबों को बैठने से भगाइए। इससे मोदी जी के मन को सकून मिलेगा। आज की तारीख में मोदी के मन सकून देने से बड़ा पुण्य का काम कोई दूसरा नहीं।

Saturday, September 24, 2016

सिंधु के पानी पर हिंदू का अध‌िकार

सुधीर राघव
पाक‌िस्तान के साथ सिंधु जल समझौते को रद्द करने पर सरकार विचार कर रही है। ऐसे खबरें मीडिया में हैं। सरकार इस पर सचमुच विचार कर रही है या यह सिर्फ छवि संवारने का प्रचार है। यह वक्त के साथ ही स्पष्ट होगा।
मगर यह देश की जरूरत है कि सिंधु रिवर सिस्टम के पाकिस्तान के साथ कुल जल बंटवारे पर पुनर्व‌िचार किया जाए। सिंधु और इसकी सहायक नदियों के 75 फीसदी पानी का इस्तेमाल इस वक्त पाकिस्तान कर रहा है। एसवाईएल जैसी योजनाएं लटक जाने से भारत के हिस्से का पानी भी पाकिस्तान जा रहा है। इस संबंध में गत 23 मार्च को मेरा एक लेख सूखी नहर में वोटों की खान अमर उजाला में प्रकाशित हुआ था, जिसमें विस्तार से चर्चा की थी। उन्हीं पहलुओं को फिर आपके सामने रख रहा हूं। यह अब और भी प्रासंगिक हैं।
जल प्रबंधन कैसे किया जाता है? हमारे नेताओं को यह पाकिस्तान से सीखना चाहिए। पाकिस्तान के पास दुनिया का सबसे बड़ा नदी जल सिंचाई सिस्टम है। इंडस बेसिन का यह पूरा सिस्टम भारत से जाने वाले पानी पर ही निर्भर है। जेहलम पर मंगला डेम और सिंधु नदी पर तरबेला डेम बनाकर पाकिस्तान ने 1960 से 1971 के बीच अपने क्षेत्र में सिंधु की सहायक नदियों को न सिर्फ 12 इंटर रीवर लिंक नहरों से जोड़ा, बल्कि 45 अन्य नहरें भी बनाईं। नतीजा यह है कि आज पाकिस्तान की 2 करोड़ 12 लाख हेक्टेयर भूमि इस सिंधु सिस्टम से सिंचित है। हम पिछले तीस साल में सतलुज-यमुना को जोड़ने वाली एक लिंक नहर नहीं बना सके और पाकिस्तान ने दस साल में 12 इंटर रीवर लिंक नहरें बना लीं। पाकिस्तान ने यह कैसे कर दिखाया इसे धैर्य से समझने की जरूरत है।
सिंधु और इसकी सहायक नदियों जेहलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज के पानी का बंटवारा भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से 19 सितंबर 1960 को हुआ। इसे सिंधु जल समझौते के तहत सिंधु, जेहलम और चिनाब के पानी पर पाकिस्तान का हक मान लिया गया और रावी, ब्यास और सतलुज का सारा पानी भारत को मिला। साथ ही यह शर्त भी थी कि 31 मार्च 1970 तक भारत अपने हिस्से की तीनों नदियों का पानी पाकिस्तान जाने से नहीं रोकेगा। इस अवधि में पाकिस्तान अपने इलाकों में सिंचाई के लिए नहरों के माध्यम से वैकल्पिक व्यवस्था करेगा। पाकिस्तान ने तय समय में नहरों का जाल बिछाकर अपने किसानों और लोगों को सुरक्षित कर लिया। स्थिति यह है कि सिंधु और इसकी सहायक नदियों के 72 फीसदी से ज्यादा हिस्से का इस्तेमाल पाकिस्तान में हो रहा है और भारत महज 25 फीसदी का इस्तेमाल कर पा रहा है। इस पानी का थोड़ा सा हिस्सा अफगानिस्तान और चीन को भी मिलता है। मगर जल संकट से जूझने वाले दक्षिणी हरियाणा को यह पानी नहीं मिलता, जबकि यह क्षेत्र 1966 से पहले पंजाब का ही हिस्सा था।
बात सिर्फ इतनी थी कि भारत को अपने हिस्से के नदी जल का प्रबंधन कर अपने सूखे हिस्सों तक पानी पहुंचाना था। इससे पहले कि इस पर काम शुरू होता, नेताओं के राजनीतिक हित देश हित के आड़े आ गए। 1971 की जंग की हार से बौखलाए पाकिस्तान ने पंजाब को अपना निशाना बना कर खेल शुरू कर दिया था। इसी बीच 1973 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया, जो आनी वाले दिनों की राजनीति में बड़ी हलचल मचाने वाला साबित हुआ। जल प्रबंधन के काम को हमारे नेताओं ने इस कद्र विद्रूप किया कि पाकिस्तान पोषित आतंकवादियों ने भी इसके कंधे पर रखकर एक दशक तक पंजाब में अपनी बंदूकें चलाईं। हमने पाकिस्तान को जिन रास्तों से पानी दिया बदले में हमें उन्हीं रास्तों से सिर्फ आतंकवाद मिला। हरिके पत्तन के बीहड़ पाकिस्तान से ट्रैनिंग लेकर आने वाले आतंकवादियों के छुपने का मुख्य ठिकाना थे। इसी तरह रावी और इसके सहायक उज्ज दरिया से अब तक घुसपैठ अब तक हो रही है।
अब सवाल यह है कि अगर सिंधु जल समझौते को रद किया जाता है तो भारत को क्या लाभ मिलेगा। इस लाभ के रास्ते में बहुत सी व्यवहारिक दिक्कतें हैं। पाकिस्तान जाने से हम जेहलम और चिनाब का पानी रोक सकते हैं। मगर इसके लिए हमें डेम और लिंक नहरें बनानी होंगी जो इस पानी को रावी, ब्यास, सतलुज से जोड़ते हुए पंजाब के विभिन्न हिस्सों, हर‌ियाणा, राजस्थान और दिल्ली तक लाया जा सकता है। मगर इसके लिए दस साल की जरूरत होगी। साथ ही यह भी देखना होगा कि पंजाब और कश्मीर के नेता इन लिंक ‌नहरों के निर्माण का विरोध न करें।
सिंधु जल संधि तोड़ना मात्र बातों का खेल नहीं है। यह सिर्फ स‌िंधु के पानी पर हिंदू के अधिकार का जुमला भर नहीं है। यह एक लंबी अवध‌ि का काम है। इसके लिए पहले लिंक नहरें, फिर डेम बनाने होंगे। उसके बाद ही हम यह घोषणा करने की स्थिति में होगे क‌ि पचास साल पुरानी यह संध‌ि हमें मंजूर नहीं।

Sunday, September 18, 2016

उड़ने वाला हाथी

सुधीर राघव
भक्त अपने नेता की तुलना हाथी से करते हैं और आलोचकों की कुत्तों से।
मगर हमारा नेता तो हाथी नहीं, सफेद हाथी है। इंद्र का ऐरावत। वह चलता नहीं उड़ता है। कभी अमेरिका, कभी पाकिस्तान, कभी चीन कभी फ्रांस। वह पूरी दुनिया में उड़ता है।
वह जब उड़ता है तो भक्त भाव विभोर हो जाते हैं। पुष्प बरसाते हैं। जब सफेद हाथी पाकिस्तान जाता है तो भक्त सोचते हैं कि वह दाऊद को गले से पकड़ कर लेकर आ रहा है मगर वह पांव छूकर लौट आता है।
सकपकाए भक्त तब भी सफेद हाथी को दोष नहीं देते। वे अपना सुर ही बदल लेते हैं। वे फिर गुणगान करते हैं कि हाथी जी ने महान मिसाल पेश की है। ऐसे विलक्षण भक्त पाकर गदगद हाथी और सफेद हो जाता है। वह मन की बात अलापने लगता है। इस अलाप को सुन भक्त धन्य हो जाते हैं।
हाथी पर बैठे महावत का हाल भी निराला है। उसे जब इंद्रियां पुकारती हैं तो वह चिल्लाने लगता है कि भक्तो ज्यादा बच्चे पैदा करो। पहले से पैदा बच्चों पर मक्खियां भिनक रही हैं। कोई रोजगार नहीं है। हाथी मौन रहता है।
महावत चिल्लाता है गायों की रक्षा करो। भक्त लोगों को घेर घेर कर मारने लगते हैं। सफेद हाथी और सफेद हो जाता है। वह चुप रहता है। हाथी जब लोगों के भले की बात कहता है तो भक्त उसकी बात काट देते हैं। हाथी कहता है कि सबको 15 लाख मिलेंगे तो भक्त फौरन दाढ़ी नोचकर कहता है, यह तो जुमला है। हाथी कहता है कि अच्छे दिन आएंगे तो भक्त खांसने लगता है। जनता के अच्छे दिन उसे गले की हड्डी लगते हैं। अच्छे दिन तो बस नेता के ही आते हैं।
हाथी घुटनों के बल बैठा है। कह रहा है हाई लेवल बैठक कर रहा है। भक्त उसकी लीद ढकने में लगे हैं। पहरेदार बफादार कुत्ते भौंक भौंक कर उसे उठा रहे हैं- उठो गजराज। पलटकर हमला करो। मगर हाथी की लीद हाथी से बड़ी हो चली है। उससे उठा नहीं जाता। वह उठने वाला नहीं।

Friday, September 16, 2016

मोदी मच्छर और महंगाई

सुधीर राघव
मोदी मच्छर और महंगाई
इन तीनों ने प्रसिद्धी पाई
एक ही राशि भाई भाई
और जनता की नींद उड़ाई
डंडा डेंगू और डायन ने
हर गरीब पर करी चढ़ाई
बांटा चूसा जेबतराशी
छीन ले गए पाई पाई
तीनों ही अंबानी से डरते
तीनों के घर नहीं लुगाई
आकर किसी गरीब से पूछो
कैसी मिलकर गत बनाई
अस्पताल भरे और पेट हैं खाली
मन की बात करें कव्वाली
भक्त बजाते हा हा ताली
अमेरिका जाओ तीनों भाई

Thursday, September 15, 2016

गले की हड्डी

सुधीर राघव
अच्छे दिन तो गले की हड्डी
आंख फटी सच बोली चड्ढी
क्यों अचरज करते हो भाई
सड़क छोड़ चलते पगडंडी
हू तू तू अब रेड मार तू
नेता के संग खेल कबड्डी
जख्म न बदला बोझ न बदला
यूं टूटी घोड़े की हड्डी
गधे कि किस्मत इकदम पलटी
कही चाय और मिल गई गद्दी
अच्छे दिन तो गले की हड्डी
आंख फटी सच बोली चड्ढी
टूटी खटिया किसान ले गए
नेता ले गया नोट की गड्डी
फसल लूट चौपट कर डाली
अरब सागर से आई टिड्डी
तेरी काशी में भांग का अड्डा
मेरे मगहर में भूख की अड्डी
कैसे होगा मेल हमारा
न मैं नड्डा न तू नड्डी
अच्छे दिन तो गले की हड्डी
आंख फटी सच बोली चड्ढी

Tuesday, September 13, 2016

अंकल सेम की कठपुतलियां

सुधीर राघव
बाबू मोशाय! न तो ये गोभक्त हैं, न राम भक्त, न गंगा भक्त और न ही शिवभक्त !
अरे! ये सब तो अंकल सेम के हाथों की कठपुतलियां हैं रे!
अंकल सेम कहेगा कि सस्ती जेनरिक दवाएं प्रतिबंधित करो हमारी दवा कंपनियों को घाटा होता है तो ये 356 दवाओं की बिक्री रोक देंगे।
अंकल सेम कहेगा कि किसानों और आदिवासियों को सताओ तो जंगल और जमीन छीनने में जुट जाएंगे।
अंकल सेम कहेगा कि पब्लिक को सताओ तो ये कालाबाजारियों को जनता पर छोङ देंगे।
अंकल सेम कहेगा कि मुसलमानों को सताओ तो ये गोभक्त बन जाएंगे।
अंकल सेम कहेगा कि नवाज शरीफ को मनाओ तो ये पांव छूने पाकिस्तान चल देंगे।
अंकल सेम कहेगा कि अपने सैन्य हवाई अड्डे हमारे लिए खोल दो तो ये बिछ बिछ जाएंगे।
अंकल सेम कहेगा कि कश्मीर तो ये पूरी घाटी को अशांत कर देंगे।
अगर अंकल सेम कहेगा कि अंबानी और अडानी की नकेल कसो तो ये फोरन मना कर देंगे। न भाई न! अपना भी जमीर है।

Friday, September 9, 2016

सैर सुखना की

सुखना लेक के ट्रेक‌िंग ट्रेल में नेचर वाक।

Wednesday, September 7, 2016

डिजिटल इंडिया में लट्ठ गाढ़ता हरियाणा

देश में डिजिटल नारों की गूंज है, मगर सिस्टम मैनुअली भी नहीं चल पा रहा। हालत यह है कि सड़क हादसे में घायलों के लिए एंबुलेंस मंगाना भी आसान नहीं है।
दो साल पहले तक बहुत से मामलों में नंबर वन होने का दवा करने वाले हरियाणा में अब हालत यह है कि एक जज को भी कह दिया कि एंबुलेंस उङकर नहीं आएगी।
मामला दो दिन पहले का है। पंचकूला स्थित सीबीआई की विशेष अदालत के जज जगदीप लोहान जींद के पास अपने गांव से चंडीगढ़ लौट रहे थे। इक्कस के पास एक हादसे को देख उन्होंने अपनी गाङी रुकवाई और घायलों की मदद को नीचे उतरे। उन्होंने 102 पर एंबुलेंस को कॉल किया मगर एंबुलेंस नहीं आई। काफी देर इंतजार के बाद दोबारा काल किया तो जवाब मिला एंबुलेंस उड़कर नहीं आएगी। एंबुलेंस के न आने पर जज साहब ने एक कैंटर को रुकवाकर घायलों को अस्पताल पहुंचाया।
जज साहब ने जो किया वह हर व्यक्ति के लिए अनुकरणीय है। मगर उस अॉपरेटर का जवाब देश को सोचने को मजबूर करता है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्री उङकर जा सकते हैं मगर देश में एंबुलेंस उङकर नहीं जा सकती। हाइवे पर तङपते व्यक्ति की जान की कीमत कुछ नहीं हैं।
सारा मामला हरिराणा के स्वास्थ्य मंत्री की जानकारी में है। उनका कहना है कि मामले की जांच के आदेश स्वास्थ्य विभाग को दे दिए गए हैं।

Tuesday, September 6, 2016

सुनो बनारस

सुधीर राघव
अपनी अपनी खाट यहां पर
अपने अपने ठाठ
नेता कब से देख रहे थे
इस चुनाव की बाट
गैया गोबर खाट खरहरी
मंदिर होगा मुद्दा
जाति धर्म या हाथी साइकिल
मुस्काएगा बुद्धा
घर घर ढूंढे गंगा मैया
फर फर झूठा नेता
भूल बनारस दिल्ली बैठा
वोटर क्या कर लेता
हाथ का मैल नहीं है वोटर
जिसने उसे भुलाया
उस पार्टी की दुर्गति ऐसी
कैसा हुआ सफाया
कमल खिलेगा इसी आस में
कीचड़ जो फैलाता
पब्लिक अगर जान ले ये सब
खाता नहीं खुल पाता
झूम झूमकर चलने वाला
खुद को समझे हाथी
गाय के गोबर के आगे मगर
दाल नहीं गल पाती
कच्ची पक्की सड़क पर पंक्चर
ये साइकिल की सत्ता
कब यहां खाट खड़ी हो जाए
नहीं पता ये चलता
अपने अपने को देय रेबड़ी
जब जब बांटे अंधा
मत इनको जन सेवक समझो
इनका मोटा धंधा
कहत सुधीर सुनो बनारस
कुर्ते पर मत जाना
जीत गए तो सूट पहनकर
इन्हें मनीला जाना।।

Saturday, September 3, 2016

सिद्धू को हवा में खेलना ही पसंद

सुधीर राघव
क्रिकेट में ऊंचा शॉट खेलने के लिए मशहूर नवजोत सिंह सिद्धू ने सियासत की पिच पर भी वही अंदाज दिखा दिया है। करीब डेढ़ महीने से कैच के लिए फिल्डिंग सजाए आम आदमी पार्टी और कांग्रेस अब आसमान की ओर ताक रहे हैं। सत्ता के डगआउट में बैठी शिअद के लिए यह तालियां बजाने का वक्त है।
देश में शायद यह पहला मौका है, जब किसी नई पार्टी या मोर्चे की पहली घोषणा औपचारिक प्रेसकान्फ्रेंस में नहीं, बल्कि फेसबुक के जरिए हुई है। बात भी सीधी
नहीं कही गई है। पेनाल्टी कॉर्नर के माहिर पगट सिंह के जरिए अलग मोर्चा बनने की खबर मीडिया में आई। हालांकि अंदाज चौंकाने वाला था मगर इसका आभास
लोगों को पहले से था कि सिद्धू अलग पार्टी बना सकते हैं। आम आदमी पार्टी को उनकी शर्तें स्वीकार नहीं थीं और पलक पावड़े बिछाए इंतजार कर रही कांग्रेस को लेकर उन्हें खुद ही हिचक होगी।
आभासी दुनिया के जरिए उतरने का आभास देकर कोई और खेल भी खेला जा सकता है। आखिर इस आवाज-ए-पंजाब मोर्चा में मझे हुए खिलाड़ी हैं, जो खेल को रोचक बनाने के लिए जाने जाते हैं। अकाली दल से बगावत कर सिद्धू के साथ आ रहे परगट सिंह अपने समय के देश के सबसे शानदार ड्रेग ‌फ्ल‌िकर रहे हैं।
पेनाल्टी कॉर्नर को गोल में बदलने का उनका रिकार्ड शानदार है।पंजाब की सियासी बिसात पर असली मोहरे सजने अभी बाकी हैं। खेल की दिशा तय होने से पहले फेर बदल की खूब गुंजाइश है, क्योंकि चुनाव अगले साल होने हैं। ऐसे में सिद्धू और परगट के कौशल की परीक्षा इस चुनौती के साथ है कि सियासत के ‌खेल में न तो कोई थर्ड अंपायर है और न ही इसमें पेनाल्टी कॉर्नर का तोहफा मिलता है। इसमें कुछ खास किस्म का कौशल चाहिए।
सिद्धू हवा में खेलने के शौकीन हैं। हवा में खेलने का खतरा भी है। नवर्स नाइंटीन का शिकार होने के मामले में सिद्धू का रिकार्ड खराब रहा है। मगर वह अमृतसर में भाजपा के लिए शानदार पारी खेलते रहे हैं। अब देखना ह है कि इसबार वह अपने दम पर गेंद जनता तक पहुंचा पाते हैं कि नहीं। आइए इसका इंतजार करते हैं।

Friday, September 2, 2016

बादल और मोदी

सुधीर राघव
सीवरेज तो शहरों में नहीं डाल पाते तो गांवों में कहां से डाल दें।
देश के स्वच्छता अभियान की जमीनी हकीकत बयान करती यह बात पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने जालंधर के आदमपुर इलाके में संगतदर्शन के दौरान साठ गांवों की पंचायतों की मांग पर कही।
प्रकाश सिंह बादल जमीन से जुङी नेताओं की उस पीढ़ी से हैं, जिसने देश को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राजनीति के अपार अनुभवी बादल खरी खरी कहते हैं। उनके खरेपन में भी कङवाहट नहीं होती बल्कि शब्द गुदगुदाते हैं। इस उम्र में भी शब्द चयन में उनका बौद्धिक कौशल आपको विस्मित कर देगा। उनका अनुभव इसलिए भी अपार है, क्योंकि कांग्रेस के दिग्गज नेता भी दो चुनावों में उन पर पार नहीं पा सके हैं।
अब फिर विषय पर लौटते हैं। मोदी जी का स्वच्छता अभियान टीवी चैनलों और अखबारों में जबरदस्त है। उसका कोई मुकाबला नहीं है। मगर धरातल पर यह उस नौटंकी की तरह जिसका पर्दा किसी भी वक्त गिर सकता है। विज्ञापनबाजी से आप भावनाएं तो पैदा कर सकते हैं मगर जरूरी नहीं कि जरूरतभर की अक्ल भी पैदा कर लें। स्वच्छता के लिए आपको ठोस प्लानिंग की जरूरत है। प्लानिंग के मोर्चे पर मोदी जी की अनुभव हीनता साफ झलकती है। उनका सारा वाकचातुर्य धरा रह जाता है। यही वजह है कि जो बात बादल समझ रहे हैं, मोदी उसे नहीं समझ पाते।
स्वच्छता अभियान के नाम पर गांवों में बिना सीवरेज डाले हजारों शौचालय बना दिए गए हैं। छोटे छोटे सैप्टिक टैंक खोदकर, इनके इस्तेमाल पर भी जोर दिया जा रहा है। जब ये सैप्टिक टैंक भर जाएंगे तब क्या होगा। छोटे किसानों और भूमिहीन मजदूरों की वास्तविक आय जिस तरह लगातार कम हो रही है, क्या वे इस स्थिति में हैं कि सैप्टिक टैंकों की नियमित सफाई का खर्च वहन कर सकें। इतना ही नहीं सैप्टिक टैंकों की सफाई के बाद एकत्र मल की भारी मात्रा को गांवों में खुले में फैंके जाने के अलावा और क्या विकल्प होगा। अंतत: यह स्वच्छता अभियान मल खुले में करने की जगह खुले में फैंकने का अभियान ही साबित होगा।
इतना ही नहीं, इस मूर्खतापूर्ण भेङचाल में कई खतरे छुपे हैं। पहले तो लोग गांव से दूर शौच के लिए जाते थे, मगर अब गांवों की गलियों में ये भरे हुए सेफ्टी टैंक बरसात या बाढ़ की सूरत में भयाभय स्थिति बनाएंगे। महामारी फैलाएंगे। रोम की महान सभ्यता भी अपने ही कचरे और मल से उठी महामारियों से लुप्त हुई थी। ऐसा इतिहासकार कहते हैं।
स्वच्छता अभियान को सफल बनाना है तो गांवों में पहले सीवरेज सिस्टम बनाना होगा, उसके बाद शौचालय बनवाए जाएं। विज्ञापन और दिखावा करने का पैसा इस पर खर्च किया जाए। पहले गांवों और शहरों में सीवरेज, ड्रेनेज सिस्टम मजबूत किया जाए, उसके बाद सांसदो, विधायकों का वेतन बढाने की बात हो। मगर मोदी जी से इस तरह की व्यवस्था की उम्मीद कम है, क्योंकि उनके चरित्र में यूरोपीय इतिहास के किशोरवय राजाओं की तरह दिखावा ज्यादा है और अनुभव तथा समझदारी कम। अनुभवी बादल इस बात को समझते हैं और बेहिचक कहते हैं कि शहरो में सीवरेज डाल नहीं पाते, गांवों में कहां से डाल दें।