Tuesday, December 27, 2016

नोटबंदी के बाद की प्लानिंग



चीन से प्लास्टिक के चावल, सिंथेटिक अंडे, मीट और अन्य नकली खाद्य पदार्थ मोदी मित्र बे रोक टोक धड़ल्ले से आयात कर रहे हैं और मोटा मुनाफा कमा रहे हैं।

क्या मोदी सरकार इसीलिए किसानों को बर्बाद कर रही है।

यही नहीं, गेहूं पर इंपोर्ट ड्यूटी 25 प्रतिशत थी, लेकिन केंद्र सरकार ने इसे पूरी तरह खत्म कर दिया है। गेहूं की बुबाई के समय नोटबंदी के पीछे यही प्लानिंग है। इसबार गेहूं की बुबाई बहुत कम हुई है। मोदी मित्र आस्ट्रेलिया से बंपर गेहूं आयात करेंगे। यह 12 सौ रुपये क्विंटल के करीब पड़ता है। इस गेहूं को ही सरकारी खरीद एजेंसियों को मोदी मित्र न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचकर मोटी कमाई करेंगे और सरकार कहेगी कि इसबार गेहूं की बंपर फसल हुई।

Sunday, December 25, 2016

उल्लुओं का उल्लूपन

कैशलेस व्यवस्था उल्लुओं के जंगल में चालाक कौवे द्वारा छेड़ा गया शिगूफा भर है।

क्योंकि जिस दिन नोटबंदी की घोषणा की गई उस दिन कैशलेस का जिक्र तक न किया गया। नोटबंदी से उपजे विकट संकट को संभालने में हुई नाकामी पर 21 दिन बाद यह शिगूफा छोड़ा गया।

कौवे की चालाकी देखिए कि वह हर नाकामी पर सुर बदलता रहा और उल्लुओं का उल्लूपन भी देखिए कि वे हर मूर्खता पर ताली पीटकर कौवे का हौसला बढ़ाते रहे।

Saturday, December 24, 2016

पचास दिन


योगी : उत्तानपाद आसन से उदर विकार कितने दिन में ठीक हो जाएंगे?
बाबा :गारंटी देता हूं, 50 दिन में।

रोगी : यह कड़वा काढ़ा कितने दिन में कैंसर ठीक कर देगा?
वैद्य : मेरी गारंटी है 50 दिन में।

मरीज : मेरी टांग कब तक सीधी हो जाएगी?
हकीम : 50 दिन पुड़िया खाओ गारंटी से पुराने से पुराना पोलियो ठीक करता हूं।

भक्त : महाराज वीजा कब लगेगा?
ज्योतिषी : पचास दिन गोलगप्पे खाओ गारंटी से कृपा होगी।

जनता : नेता जी! आपके जने ये कष्ट कितने दिन और चलेंगे?
नेता : बस 50 दिन झेल लो। गारंटी देता हूं उसके बाद नहीं होंगे।

देश में अब हर झोलाछाप ने गारंटी पीरियड बढ़ाकर 50 दिन कर दिया है। पहले यह 3 दिन था।

RBI को अप्रासंगिक करने की तैयारी

प्लास्टिक मनी और कैशलेस सिस्टम का सही अर्थ मौद्रिक नीति तय करने में RBI की भूमिका को सीमित करना है। पेटीएम जैसी कंपनियां खुद ही यह तय करने का अधिकार रखती हैं कि आपको देय सेवा के बदले उन्हें कितना शुल्क बढ़ाना है।

वे ही समय समय पर बताएंगी कि किन ग्राहकों की वालेट लिमिट कितनी होगी यानी लोगों की पर्चेजिंग पावर तय करने पर भी उनका पूरा नियंत्रण होगा।

वह दिन जल्द आएगा कि जब शेयर बाजार के लिए आरबीआई गवर्नर से महत्वपूर्ण इन कंपनियों के सीओज की प्रेस कान्फ्रेंस हुआ करेगी।

Friday, December 23, 2016

छापेमारी


काला धन पकड़ने का एक ही तरीका था छापेमारी। नोटबंदी विफल रहने पर आखिर सरकार को उसी नीति पर आना पड़ा।
नोटबंदी से सिर्फ जनता परेशान हुई। बाजार बर्बाद हुआ| उल्टा इसने भ्रष्टाचार को बढ़ाया। बहुत से बैंक अफसर लालच में फंस कालाधन बदलने लगे। जो कालाधन छापेमारी में एक ही जगह पकड़ा जा सकता था नोटबंदी से कई जगह बंट गया।
अगर बिना नोटबंदी लागू किए ही इस पैमाने पर छापेमारी होती तो धरपकड़ में कई गुना बड़े नतीजे मिलते। इस तरह कालेधन के खिलाफ लड़ाई में नोटबंदी भ्रष्टों का कवच साबित हुई|

Monday, December 19, 2016

दूर दराज का प्यार

चंडीगढ़ के सेक्टर-27 में मोची से जूते पॉलिश कराए और पूछा कि पेटीएम है क्या? वह हैरत से मुंह देखने लगा।
मुझे समझ आ गया कि देश में अभी सारी तरक्की सिर्फ पीएमओ और पीएम निवास में ही हुई है, सुना है वहां कोई भिखारी भी स्वाइप मशीन लेकर आता है।
मैं बस यह जानना चाहता हूं कि कैशलेस दुनियावाला यह पीएमओ अभी देश में ही है या चांद-मंगल जैसे किसी अन्य ग्रह उपग्रह से चल रहा है। वहां से मोदी जी रोज अपने लावलश्कर और अप्सराओं के साथ आते हैं और तरक्की और विकास का भाषण देकर लौट जाते हैं।
मैं तो कहता हूं कि मोदी जी , क्या रखा है दूर दराज के प्यार में, आकर कुछ दिन तो गुजारिए बैंकों की कतार में।

Saturday, December 17, 2016

शहंशाह मदारी और कालाधन जमूरा

सुधीर राघव
मदारी : जमूरे! पब्लिक को अपना नाम तो बताओ।
जमूरा : कालाधन!
मदारी : हां ..तो कालाधन! बाबू को सलाम कर!
जमूरा : किया!!
मदारी : नेता को सलाम कर!
जमूरा : किया!!
मदारी : अफसर को सलाम कर!! दारोगा को सलाम कर!! गुंडे को सलाम कर!! सेठ को सलाम कर!!
जमूरा : किया! किया! किया!
मदारी : अब सारी जनता को सलाम कर!
जमूरा : नहीं....! कलाधन इसको सलाम नहीं करेगा।
मदारी : इस पेंट वाले भाई.. इस पाजामे वाले भाई को सलाम कर!
जमूरा : नहीं...! नहीं करेगा।
मदारी : अच्छा तो इस हाफपेंट को सलाम कर!!
जमूरा : किया!
मदारी : तू पाजामें वाले को सलाम नहीं करेगा...तू पेंट वाले को सलाम नहीं करेगा तो हाफपेंट वाले को सलाम क्यों करेगा।
जमूरा : क्योंकि उसको तू भी सलाम करता है!! इसलिए कालाधन भी उसे सलाम करेगा।
मदारी : जनता तुझसे नाराज है! बोलती है, तुझे सजा दूं! कालधन! तुझे इसकी सजा मिलेगी!
मदारी कालाधन को जमीन पर लिटा देता है। चादर से ढक देता है। फिर चाकू से गरदन काटने का अभिनय करता है। कालाधन चादर के नीचे तड़पने का दिखावा करता है।
मदारी : भाइयो-बहनो! बोलो मैंने आपके सामने काले धन की गरदन काटी कि नहीं! ब़ोलो! अब आपको इसका खून दिखाना चैये कि नई चैये!! इसको मार कर आपका पुराना धन नया करना चैये कि नई चैये!
जनता : मदारी! ...मदारी!...चाहिए! चाहिए....!!
मदारी : हां तो बहनो-भाइयो! अब आप लाइन में लग जाओ। अपना पुराना सारा धन जमा कराओ। बच्चो तुम अपनी गोलक लाओ! मताओ-बहनो! तुम अपने बक्से टटोलो। दूज-टीका, बेटी का दहेज, बेटे की साइकिल के लिए जो जमा किया है सब ले आओ!!
जनता पागलों की तरह कतार में लग जाती है। कुछ बेहोश होकर गिरने लगते हैं। कुछ मर भी जाते हैं मगर लाइन नहीं टूटती। कालाधन उठकर खङा हो जाता है। उसका रंग थोङा और गुलाबी हो गया है।
मदारी हाक लगाता है - मित्रो! लाइन में भीङ है तो पेटीएम करो!
#सुधीरराघव

Wednesday, December 14, 2016

नौ सौ कार्ड लेकर बेबी एटीएम चली

नोटबंदी ने हिंदी के कई मुहावरों का नवीनीकरण कर दिया है, यथा --
1- आ मोदी पीएम बन।
2- पेटीएम की दलाली में एटीएम खाली।
3- सौ कतार की एक उधार की!
4-नौ सौ कार्ड लेकर बेबी एटीएम चली।
5- न कैश होगा न एटीएम चालैगा।
6- कैश न पावै तो कैशलेस भावै
7- संघियों में मोदी राजा
8- अपना यूपी चुनाव सीधा करना
9- भरा एटीएम पहचानना
10. दलाल का काम बनता कतार में लगे जनता
11. संसद से भागते की जनसभा ही सही
12, चलते एटीएम से कैश निकालना
13. अपने मुंह मियां मोदी होना
14. मोदी का जेटली अर्थव्यवस्था ढहाये
15. अब पछताए होत क्या जब मोदी चुग गया कैश

Tuesday, December 13, 2016

भाजपा का ब्लैकहोल

सुधीर राघव
मोदी भाजपा के लिए ब्लैकहोल में तब्दील हो रहे हैं।
राष्ट्रीय राजनीति में मोदी का उदय किसी नेता की तरह नहीं हुआ है, बल्कि विज्ञापनों और औद्योगिक घरानों की मदद से उन्होंने ने खुद को भारतीय राजनीति का स्टार बनाया है।
हर बड़े सितारे की यह नियति है कि वह अपने नाभकीय विस्फोटों की वजह से पहले तेजी से फैलता है। चमक बिखेरता है मगर एक समय के बाद इसकी फैली हुई परिधी और नाभिक के बीच एक विशाल खोखलापन (Vacuum) बन जाता है। यही खोखलापन इस तारे की चमक के अंत की वजह बनता है। अपने है गुरुत्व की वजह से परिधी तेजी से केंद्र की ओर सिकुड़ती है। और तब देखते ही देखते आसपास की पूरी पार्टी ही अपनी चमक खोकर इसके केंद्र में विलुप्त हो जाती है। तब वह सितार हमेशा के लिए समाज (ब्रह्मांड) में सिर्फ एक काला धब्बा ( Black hole) बनकर रह जाता है।
नोटबंदी वह आखिरी विस्फोट था जिसके बाद मोदी तेजी से अपनी राजनीतिक चमक खोकर काले धब्बे में तबदील हो रहे हैं। ऐसे में भाजपा का मोदी नामक सितारे का उपग्रह बने रहना उसके अपने अस्तित्व के लिए खतरा है। खुद को मोदी नामक सितारे से दूर करने के लिए भाजपा अपने संघ नामक सुपर जेट इंजन की मदद ले सकती है।
भाजपा में और कई चमकदार सितारे हैं। पार्टी को खुद को कायम रखने के लिए उन पर विश्वास करना चाहिए। वर्ना भारतीय राजनीति के इतिहास का पार्टी लीलने वाला एक और ब्लेक होल तैयार है। मोरारजी देसाई और वीपी सिंह भारतीय राजनीति के ऐसे ब्लैक होल हैं जिनके राजनीतिक चमक खोते ही पूरी पार्टी खत्म हो गई। भाजपा को उनसे सबक लेना चाहिए।
इससे पहले कि मोदी पूरी पार्टी को ब्लैक होल की तरह लील जाएं, उन्हें पार्टी से अलगकर श्वेत वामन (White dwarf) की तरह अपनी चमक अकेले खोने दो।

Monday, December 12, 2016

राणा सांगा की गलती दोहराते राजनाथ

Sudhir Raghav
मोदी दूसरे इब्राहिम लोदी साबित हो रहे हैं। देश में 1525 जैसी आर्थिक अराजकता है। पार्टी के लिए यह नेता बदलने का सही वक्त है।
अब देखना है कि क्या राजनाथ भी वही गलती करेंगे जो राणा सांगा ने की थी। इतिहासकारों के अनुसार राणा चाहते तो 1525 में लोदी को आसानी से उतारकर सत्ता अपने हाथ में ले सकते थे। मगर उन्होंने कूटनीति का रास्ता चुना और बाबर को मौका मिल गया। बाबर चालाक निकला और यहीं जम गया।
राणा की यह कूटनीति भारतीय इतिहास में उनकी सबसे बङी गलती के रूप में दर्ज है। बाद में खानवा का युद्ध ने इसे साबित कर दिया। 1525-26 में सवा लाख की सबसे शक्तिशाली सेना राणा के पास थी। वह लोदी को आसानी से बेदखल कर सकते थे और ऐसा करते तो बाबर अपने 30 हजार लङाकों के साथ दिल्ली की तरफ आंख उठाने की हिम्मत नहीं कर सकता था।
अब देखना है कि राजनाथ और भाजपा चुनाव का इंतजार करते हैं या खुद फैसला करते हैं। अगर चुनाव का इंतजार किया तो चुनाव तो फैसला करेगा ही मगर भाजपा के लिए वह राणा जैसी ही गलती होगी।
भाजपा चाहे तो वह मोदी को बदलकर खुद को जनता की नजर में मजबूत कर सकती है।

Saturday, December 10, 2016

जिंदगी कतार हो गई

जिंदगी कतार हो गई
मूछ का शिकार हो गई
नेता कालाधन मुआ
बेशर्म सरकार हो गई
मर रहे गरीब और
रो रहे किसान हैं
ठुल्ले से ही पिट रहे
देश के जवान हैं
बूढ़ी मां बीमार हो गई
जिंदगी कतार हो गई
नेता नोट खा रहा
मैनेजर मौज मना रहा
बैंक एटीएम बंदकर
नोकैश के बोर्ड लगा रहा
इकोनमी उधार हो गई
जिंदगी कतार हो गई
मोदी मजे कर रहा
मन की अपने कर रहा
गाड़ियों में नोट भरे
देश मेरा चल रहा
देशभक्ति खुमार हो गई
जिंदगी कतार हो गई
#सुधीरराघव
https://youtu.be/mKe3bbU4JwE

Wednesday, December 7, 2016

जनता से माफी मांगने और पीएम बदलने का वक्त

Sudhir Raghav
नोटबंदी भ्रष्टाचार का नया साधन साबित हुआ है। बहुत से बैंक अधिकारियों और भ्रष्ट भाजपा नेताओं के लिए यह माल कमाने का नया मौका बनकर आया है।
दूसरी ओर जनता परेशान है। काम धंधे रुक गए हैं। किसान फसल नहीं बो पाये। लोगों का दिन एटीएम और बैंकों की लाइन में बीतता है। बहुतों को तब भी पैसे नहीं मिलते। बैंक नो कैश का बोर्ड लगा देते हैं।
भाजपा के लिए यह जनता से माफी मांगने का वक्त है। यह प्रधानमंत्री बदलने का वक्त है। मोदी जी को मगरूरता छोड़कर जनता को हो रही दिक्कतों के लिए नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए। उनकी सनक ने देश की अर्थव्यवस्था चौपट कर दी है। भ्रष्ट बैंक अफसरों के पौबारह हैं।
आम और गरीब भारतीय को हेय, हीन और भ्रष्ट मानने का अवगुण संघियों ने निस्संदेह अंग्रेजों से सीखा होगा।
इन्होंने उनके ही चरणों में जरूर कसम खाई होगी कि जब हमारा राज आएगा हम जनता को तुम्हारी तरह ही प्रताड़ित करेंगे।
इनके वित्तमंत्री जेटली तो साफ कहते हैं कि पिछले 70 साल में कुछ सामान्य नहीं रहा। यानी अंग्रेजों के राज में ही इन्हें सब सामान्य लगता था। भले ही तब ये पैदा भी न हुए हों।

Saturday, December 3, 2016

सुधीर राघव
अहमदाबाद मोदी का शहर है यह है! आसाराम का भी शहर है! गांधी जी ने अपना डांडी मार्च भी यहीं से शुरू किया था!
हाल ही में पीआईबी चंडीगढ़ की ओर से ले जाए गए पत्रकारों के दल के साथ इस शहर को देखने का और करीब से जानने का मौका मिला. इस शहर में कई खूबियां है.
एक ए का फर्क

Saturday, November 26, 2016

ईश्वर की लाठी और भाजपा की काठी

सुधीर राघव
झूठ और कुप्रचार में मोदी सरकार गोएबल्स का अवतार साबित हो रही है।
सरकार की ओर से शोर मचाया जा रहा है कि जनधन खातों में कालाधन बरस रहा है।
उदाहरण दिया जा रहा है कि यूपी के 3.79 करोड़ जनधन खातों में 10670 करोङ रुपये जमा हुए हैं। यानी हर खाते में औसतन सिर्फ 2815 रुपये जमा हुए हैं।
अब सोचने की बात यह है कि जब बैंकों में पैसा बदलने की लिमिट 4500 रुपये है तो गरीब अपने ₹2800, तीन हजार या चार हजार रुपये भी जनधन खातों में जमा करने को मजबूर क्यों हुए??
बैंकों के बाहर 15 दिन तक नोट बदलने के लिए गरीबों की लाइनें तो रोज लगीं मगर बैंकों के पास उनके हिस्से का कैश खत्म था। नोट न बदले जाने से निराश कई गरीबों ने दुखी होकर अपनी जान दी।
इतना ही नहीं इन गरीबों पर कसाइयों की तरह लाठियां बरसवाई गईं ताकि ये लोग नोट बदलने की जगह, रुपये अपने जनधन खातों में जमा करने को विवश हों और सरकार शोर मचा सके कि जनधन खातों में कालाधन बरसा है।
मित्रो ! और जनधन खातों में जमा हुआ यह काला धन कैसा है?
कोई गरीब मां मजदूरी और बरतन मांजकर पाई पाई बरसों से बचाकर उन्हें 500 या हजार के नोट में बदलकर अपनी रजाई या गूदङी में सिलकर छुपाती होगी ताकि बेटी सयानी हो तो वह इस पैसे से उसके हाथ पीले कर सके। या कोई गरीब इसलिए इकट्ठा कर रहा होगा कि अपने लिए एक झौंपङी बना सके। या किसी बूढे बाप का परदेसी मजदूर बेटा मनि आर्डर भेजता होगा। मोदी सरकार ने इस सब पैसे को एक झटके में कालाधन घोषित कर दिया।
मोदी जनसभा में भाषण देता है कि मेरी गरीब माता बहन ने .. बेटी की शादी के लिए पाई पाई जोङी है तो वह ढाई लाख रुपये तक बैंक में जमा करा दे! कोई उसे पूछेगा तक नहीं। दूसरी ओर प्रति जनधन खाते सिर्फ 2815 रुपये जमा होते ही सरकार शोर मचा रही है कि कालाधन बरस गया।
मोदी सरकार और भाजपा को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसने लाइन में लगे गरीबों पर जो लाठियां बरसबाई हैं , उनमें तो आवाज थी। इन्हें ईश्वर से डरना चाहिए, क्योंकि उसकी लाठी बे आवाज होती। भगवान की लाठी चलेगी तो भाजपा की सिर्फ काठी होगी और वह दुम दबाकर दौड़ेगी।

Tuesday, November 22, 2016

गुजरात की नब्ज है ग्राम्य विकास मॉडल

सुधीर राघव
सरकार के ‌भरोसे नहीं रहते ग्रामीण, आपसी सहयोग से ला रहे बदलाव
जल प्रबंधन ही नहीं गुजरात का ग्राम्य विकास मॉडल भी पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों के लिए अनुकरणीय है। इसे नए गुजरात की नब्ज कहा जा सकता है। गावों के विकास में ग्राम समित‌ियों का काफी योगदान है। ग्रामीण सिर्फ सरकार के भरोसे नहीं हैं वे आपसी सहयोग से बुनियादी ढांचे की दिक्कतों को दूर करने में यकीन रखते हैं।
देश में श्वेत क्रांति के जनक वर्गीज कुरियन ने किसानों को स्वावलंबन का जो पाठ पढ़ाया, उसने स‌िर्फ देश में दूध की धारा ही नहीं बहाई, बल्क‌ि ग्रामीणों के आर्थ‌िक और सामाज‌िक जीवन में भी क्रांत‌ि की। पीआईबी चंडीगढ़ की ओर से गुजरात गए पत्रकारों के दल को इस क्रांत‌ि को नजदीक से जानने का मौका मिला। आणद में इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट के प्रजेंटेशन ने इस मॉडल को समझने में मदद की। मैनेजमेंट के छात्र ग्रामीणों के बीच जाकर उनकी समस्याओं का अध्ययन करते हैं और हल तलाशते हैं। इसी आधार पर छात्रों का मूल्यांकन भी होता है।
आदर्श कण‌ि गांव
पाटन जिले के कण‌ि गांव में ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से विकास की परंपरा को दिशा दी है। कणि अनुपम प्राइमरी स्कूल की इमारत शानदार है। इसमें कंप्यूटर लैब, शौचालय, भोजनालय और पानी के ल‌िए आरओ प्लांट है। पंचायत सदस्य नाथा लाल ने बताया कि यह सब ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से अपने बच्चों के लिए किया है। बच्चों को अच्छा भोजन और स्वच्छ वातावरण मिले, यही हमारा उद्देश्य है। इतना ही नहीं पूरे गांव के पेयजल के लिए अलग आरओ प्लांट लगाया भी गया है, जहां से ग्रामीण दो रुपये में बीस लीटर पानी ले सकते हैं।
अमूल करेगा पंजाब में विस्तार
पंजाब के दुग्ध किसानों के लिए यह अच्छी खबर है कि आने वाले समय में अमूल पंजाब में अपना और विस्तार कर सकता है। अभी बरेटा में अमूल का प्लांट है, इससे आसपास के किसानों को लाभ मिला है। अमूल के चीफ ऑपरेटिंग अफसर किशोर झाला से जब सवाल किया गया कि इससे वेरका के साथ कंपटीशन बढ़ेगा और दो सहकारी संस्थाओं के बीच कंपटीशन क्या सहकारिता के ल‌िए अच्छा है। उन्होंने कहा कि यह दुग्ध उत्पादक किसानों के ल‌िए अच्छा है। हमारा उद्देश्य है कि किसानों को उच‌ित मूल्य मिले। वेरका हमारे लिए भातृसंस्थान है और हम मिलकर ऐसा कंपटीशन बनाएंगे कि निजी क्षेत्र भी दुग्ध किसानों को बेहतर मूल्य दे।
ग्रामीण विकास में सबसे बड़ी बाधा इन्फ्रास्ट्रक्चर है। आप सभी गांवों को अच्छी सड़कें दे दो। बिजली और पानी दे दो। किसान की पहुंच मंड‌ियों तक हो जाएगी। वह खुद तय करने लगेगा कि उसे कहां उचित मूल्य मिलेगा और अपनी फसल किसे बेचनी है। सड़कें होंगीं तो स्वस्थ्य सेवा, शिक्षा और तकनीक तक भी किसान की पहुंच हो ही जाएगी। देश के काफी हिस्सों में किसान अपना माल खुद ग्राहक तक नहीं ले जा पाता। बड़ा मुनाफा बिचौलियों को मिल रहा है।
-डॉ. आरसी नटराजन, डायरेक्टर, इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट, आणंद

Monday, November 21, 2016

गरीब और किसान ही निशाने पर

सुधीर राघव
भाजपा नेताओं ने अपनी गाड़ियों में लाखों रुपये के पुराने नोट पकड़वाए, गंगा में नोट बहाए, कचरे में भी रखवाए ताकि उनका नेता कह सके कि सचमुच नोट जनता ने छुपा रखे थे। ये नोट सिर्फ इसलिए फैंके और दिखाए जा रहे हैं ताकि मोदी जनता को मुहं दिखाने के काबिल हो सकें।
यह सर्जीकल स्ट्राइक गरीबों और किसानो पर हुआ है। यह बिल्कुल वैसा है जैसा जैविक हथियारों का शोर मचाकर अमेरिका ने इराक पर हमला किया था मगर मिला कुछ नहीं। सिर्फ जनता तबाह हुई। सिर्फ गरीब मार हुई है। बैंकों की लाइन में और पैसे के अभाव में करीब साठ लोगों की जान जा चुकी है।
वही मूर्खता मोदी सरकार ने की है। कालेधन का शोर मचाकर गरीबों और किसानों पर कार्पेट बंबारमेंट की गई है। गरीब और किसान रोटी को मोहताज है। सरकार की साख खत्म है। गरीब अपनी साख से ही उधार पर जी पा रहा है।
किसी बङे उद्योगपति को नहीं पकङा गया। मोदी को 14 लाख का सूट देने वाले मोदीभक्त ने मोदी जी की इज्जत बचाने के लिए दो सौ फीसदी जुर्माने पर जरूर कुछ करोङ जमा कराए हैं।
इस तरह भक्त और पार्टीजन ही नोट इकट्ठे कर सार्वजनिक स्थलों पर अपने पास ही पकङवा रहे हैं। महाराष्ट्र का मंत्री तक पार्टी ने इस काम में लगा दिया है।
नोटबंदी के लिए इसलिए नवंबर का समय चुना गया ताकि किसान अपनी मुख्य रबी की फसल ही न बो सकें। उनके पास भूखे मरने और अपनी जमीने बेचने के अलावा और कोई विकल्प न बचे।
सीमा पार वाले तो सारे मोदी के फैन हो चुके हैं। नोटबंदी की ऐसी योजना तो कोई लाहौर में बैठे आकाओं के चरण छूकर ही बना सकता है, जिससे पूरे भारत में उत्पादन ठप हो जाए और देश आर्थिक एमरजेंसी की गर्त में चला जाए।
खुश आतंकियों ने अपनी गतिविधियां रोक दी हैं। भारत को बरबाद करने के लिए मोदी ही काफी हैं तो उन्हें मेहनत करने की क्या जरूरत।
इसबार गरीब किसान रबी की फसल न बो सकें, क्या इसकी तैयारी सरकार की ओर से 6 महीने से चल रही थी?
क्या नोटबंदी के पीछे सरकार का प्लान यह है कि गरीब किसान नवंबर में अगर कुछ बोयेगा नहीं तो अप्रैल में कुछ कटेगा भी नहीं? क्या इसलिए सहकारी बैंकों पर पुराने नोट न लेने कि बंदिश लगा दी गई है?
क्या अगले साल हालात यह होने वाले हैं की भूखा मरता किसान जमीन बेचने को मजबूर होगा? क्या इसलिए ही आजकल कई बाबाओं और उद्योग पतियों के चेहरे पर पहले से कहीं ज्यादा रौनक है?
ये सब अगले साल उस वक्त का इंतजार कर रहे हैं, जब किसान मजबूर होकर जमीने बेचेगा तब ये गिद्धों की तरह मंडराते हुए पहुंच जाएंगे और उनकी जमीने औने-पौने फोन दाम पर खरीदकर उद्योग लगाएंगे।
क्या यही है सरकार का भारत निर्माण? मैक इन इंडिया?

Wednesday, November 16, 2016

चंडीगढ़ से ज्यादा काले हैं अहमदाबाद के कौए

सुधीर राघव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है मगर उनके शहर अहमदाबाद में सड़कों के किनारे जगह-जगह मलबा और कचरा देखा जा सकता है। सोलिड वेस्ट मैनेजमेंट के संबंध में दिक्कतों को वहां के नगर निगम के अधिकारी भी मानते हैं। चंडीगढ़ के संदर्भ में गुजरात मॉडल का सवाल उठाने पर अधिकारियों का जवाब है कि कचरा प्रबंधन की दिक्कतें एक जैसी हैं। खासकर सेग्रीगेशन पर। अहमदाबाद नगर निगम के सोलिड वेस्ट डिपार्टमेंट के डायरेक्टर हर्षाद्रे जे सोलंकी गुजराती मुहावरा कहते हैं कि कौए सभी जगह काले होते हैं। पीआईबी चंडीगढ़ की ओर से ले जाए गए पत्रकारों के दल के सामने प्रजेंटेशन देते हुए सोलंकी ने बताया कि इस शहर की आबादी तेजी से बढ़ रही है। कंस्ट्रक्शन और इन्फ्रास्ट्रेकचर में बूम है। मलवा उठाने की व्यवस्था है, मगर व्यावहारिक दिक्कते हैं।
साबरमती में डालते हैं कचरा
सोलंकी ने बताया कि कुछ लोग पूजा के बाद का सामान साबरमती नदी में डाल देते हैं। हालांकि उन्होंने पूजा सामग्री के लिए नदी के किनारे बड़े कलश रखवा दिए हैं मगर फिर भी कुछ लोग आस्था की वजह से इनका इस्तेमाल नहीं करते। वे सामग्री नदी में ही फैंकते हैं। लोगों को जागरूक करने के लिए मुहिम चलाई जा रही है।
मेट्रो की जगह बीआरटीएस कितना कारगर
चंडीगढ़ का मेट्रो प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में हैं। विकल्प के तौर पर बस रेपिड ट्रांज‌िट सिस्टम (बीआरटीएस) अपनाने की बातें हो रही हैं। दिल्ली में यह फेल हो चुका है मगर अहमदाबाद में सफलता पूर्वक चल रहा है। अहमदाबाद के बीआरटीएस मॉडल का अध्ययन चंडीगढ़ कर सकता है। वहां एसी बसें और टर्मिनल हैं। बस के आने-जाने पर ही दरवाजे खुलते बंद होते हैं। यह मेट्रो जैसी सुविधा का अहसास कराते हैं। म्युनिसिपल कार्पोरेशन की स्टेंडिंग कमेटी के चेयरमैन प्रवीन बी पटेल के अनुसार बीआरटीएस का विश्वस्तरीय इन्फ्रास्ट्रक्चर अहमदाबाद को ग्लोबल सिटी बनाता है। हर बस की जानकारी ‌कंट्रोल रूम में रियल टाइम अपडेट होती है। हालांकि इसके रास्ते में कई चुनौतियां हैं। करीब चालीस लाख का सालान घाटा है, जिसे नगर निगम अपने साधनों से पूरा करता है। बीआरटीएस में बसों के लिए अलग लेन है मगर खाली लेन में निजी वाहन चालक भी चले आते हैं। चंडीगढ़ से गए पत्रकारों के दल को जब इस बस में ले जाया जा रहा था तो एक चौक पर सामने से ट्रक आ जाने से बस को रोकना पड़ा। हालांकि ऐसी घुसपैठ को रोकने के लिए नगर निगम की ओर से व्यवस्था की गई है। पूर्व सैनिकों को भर्ती कर नगर निगम ने चौराहों पर निगरानी के लिए तैनात किया है। मगर उनके पास कार्रवाई के अधिकार नहीं हैं। वे सिर्फ लोगों को समझाते हैं कि वे बीआरटी लेन में अपने वाहन न चलाएं।
बीआरटीएस सिस्टम के तहत रोज 2500 बसें करीब डेढ़ लाख यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाती हैं। न्यूनतम किराया 4 रुपये और अधिकतम 29 रुपये है। इससे नगर निगम को रोज 19 लाख 25 हजार रुपये की आय होती है।
-प्रवीन बी पटेल, चेयरमैन, स्टैंडिंग कमेटी

Tuesday, November 15, 2016

ढाकीं में छुपा सुखना के कायाकल्प का मंत्र

सुधीर राघव
सूखती सुखना के कायाकल्प का मंत्र हम गुजरात से सीख सकते हैं। सुरेंद्र नगर का ढाकीं प्रोजेक्ट करीब पौने दो करोड़ लोगों को पेयजल पहुंचा रहा है। ये लोग पहले मीलों दूर से पानी लाते थे।
गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी बड़े गर्व से बताते हैं कि इस साल गुजरात में काफी कम बारिश हुई है, मगर हमें कोई चिंता नहीं है। हाल ही में पीआईबी चंडीगढ़ की ओर से अहमदाबाद गए पत्रकारों के दल से बात करते हुए रूपाणी ने बताया कि यह दुनिया का सबसे बड़ा वाटर सप्लाई प्रोजेक्ट है। इस प्रोजेक्ट से हम 66 मीटर की ऊंचाई तक बसे गांवों में भी पानी पहुंचा रहे हैं। कुल 360 किलोमीटर लंबी तीन पाइप लाइनों से पानी लोगों तक पहुंचाया जा रहा है।
सूखे में भी कलकल कर बहती है साबरमती
इस साल कम बारिश होने से भले ही हमारी सुखना लेक संकट में है मगर राजस्थान से निकलने वाली साबरमती नदी इस सूखे में भी गुजरात में कलकल बह रही है। इसके पीछे प्लानिंग और विजन है। यह रेन वाटर हार्वेस्टिंग और ट्रीटेड वाटर से जल संकट दूर करने का कारगर मॉडल है। साबरमती पर कई डैम बनाकर बारिश के दिनों का पानी इकट्ठा किया जाता है। यही पानी अहमदाबाद के लोगों के लिए पेयजल सप्लाई का मुख्य स्रोत है। इसी से सीख लेते हुए सुखना के कैचमेंट एरिया में भी छोटे-छोटे डेम बनाकर बरसाती पानी की हार्वेस्टिंग की जा सकती है और इन्हें इंटरलिंक कर संकट के समय लेक तक पानी लाया जा सकता है। अहमदाबाद नगर निगम की एन्वायरमेंट इंजीनियर दर्शना पटेल के अनुसार रोज 6000 लाख लीटर सीवरेज का ट्रीटेड पानी भी अहमदाबाद से साबरमती में छोड़ा जाता है। इसका बीओडी 20 से भी कम होता है। साबरमती का यह पानी कृषि में उपयोग हो रहा है।
इस साल बारिश बहुत ही कम हुई है। सौराष्ट्र और कक्ष के 70 फीसदी डैम सूख चुके हैं मगर हमें कोई चिंता नहीं है। दुनिया के सबसे बड़े। ढाकीं प्रोजेक्ट की वजह से हम लोगों के घर तक पानी पहुचाने में सक्षम हैं।
- -विजय रूपाणी, मुख्यमंत्री, गुजरात

नेता की नफरत

हिटलर यहुदियों से नफरत करता था और उन्हें खत्म करने के लिए उसने गैस चैंबर बनवाए।
इसे गरीबों से नफरत है, उन्हें खत्म करने के लिए इसने नोट बदलवाए।
रुपये न बदले जाने पर एक दिन में तीन गरीबों ने आत्महत्याएं की हैं और तानाशाह कहता है कि बेइमान परेशान हैं।
अगर निशाना सेठ लोग होते तो नोट बंदी महीने की पहली तारीख को की होती, क्योंकि इसी तारीख को सेठों के पास सबसे ज्यादा कैश होता है। आठ तारीख तक तो सेठ लोग इस धन का बडा हिस्सा अपने कामवालों, नौकरों और मजदूरों को वेतन के रूप में बांट चुके होते हैं।
नोट बंदी के एलान के लिए आठ तारीख इसलिए चुनी क्योंकि यह वह तिथि है, जब कैश मजदूरों और श्रमिकों के पास होता है, उन्हें नकद में वेतन मिल चुका होता है। नवंबर इसलिए चुना क्योंकि धान की फसल बेचने के बाद इस महीने काफी नकदी किसानों के पास भी होती है।
इन दोनों वर्गों को ही तानाशाह ने अपनी नफरत का निशाना बनाया है।

Thursday, November 3, 2016

साहब और शरीफ (लघुकथा)

यूनिवर्स में कहीं दो देश
ट्रिनट्रिन....ट्रिन
साहब : कहो शरीफ कैसे हो?
शरीफ : बस कट रही है शराफत से।
साहब : शराफत से कैसे कटेगी भाई। तुम तो जानते हो कई राज्यों में चुनाव हैं। तुम भी घोटालों के आरोपो में घिरे हो। यहां हमारी हालत भी पतली है।
शरीफ : क्या करें? कुछ सोचो भाई। तुम्हारा दिमाग खूब चलता है।
साहब : सोच लिया। बस हमें अपने देश में देशभक्ति का माहौल बनाना होगा।
शरीफ : वह कैसे बनेगा?
साहब : जब किसी शहर और गांव में जवान का ताबूत पहुंचता है तो बच्चे बच्चे में देशभक्ति जाग जाती है। भाई शराफत छोड़ो युद्ध का माहौल बनाएं। दोनों हथियार खरीदेंगे। कमीशन खाएंगे। मजा आएगा भाई।
शरीफ : मजा आएगा।
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> दो माह बाद
ट्रिनट्रिन ...ट्रिन
साहब : ये तुमने क्या करवाया। 15 बीस जवान एक साथ मरवा दिए। एक या दो से महौल बनता। तुमने सब उल्टा करवा दिया। अब स्ट्राइक की बात बोलकर कितनी मुश्किल से सब संभाला है।
शरीफ : अब तुमने ही अपने जवान खुले में टैंट में लिटा रखे थे। तुम हो चलाक। इसी चक्कर में तीस हजार करोङ के हथियार सौदे कर लिए। दस हजार करोङ का कमीशन पीट लिया और मेरे आगे घड़ियाली आंसू भी बहा रहे हो। रोज ताबूत भी पहुंच रहे हैं। मेरे यहां तो कुछ काबू नहीं है।
साहब : तुम्हारा भी भला होगा। वो कहावत है न कि कर भला, हो भला।

Saturday, October 29, 2016

दिवाली और दीया

सुधीर राघव
दिवाली का दीया नहीं, न बोनस की आस।
मोदी तेरे राज में, मंत्री चरें विकास।।
मंत्री चरें विकास, गजब ये नई कहानी।
तुम राजा बन गए, छोड़कर निजी जनानी।।
कह राघव कविराय, सोचिए बीवी बच्चे वालों का।
सीमा पर जान गंवाते भारत मां के लालों का।

Sunday, October 23, 2016

विकास की ताजा तस्वीर

सुधीर राघव
विकास का पहिया
गोमूत्र और गोबर के भरोसे
कितना घूमेगा
कितना दौडे़गा
कैसे चलेगा
कहां तक चलेगा
देश की यह नई छवि
घड़ रहे हैं हमारे राज्य
सड़कों पर घूमता
लावारिस गोवंश
मेवात की बिरयानी
दादरी का अखलाक
बांधकर पीटे जाते दलित
गोरक्षा के लिए कुकर्म करते भक्त
और माल कमाता बाबा
गोमूत्र और गोबर से बनी
देश के विकास की
यह एकदम ताजी तस्वीर है
इसे सूखने में
बस थोड़ा वक्त लगेगा
मगर हर चुनाव में
भगवा गुंडई का
दहकता धधकता अलाव जलेगा।।

Saturday, October 22, 2016

शहर में गांव

सुधीर राघव
कुछ जोड़ी पांव
फिर निकले धूप से
छांव की तलाश में
गांव से
शहर की तलाश में
सदियों ने बोये
नफरत के बबूल
कांटों भरी कटकनी
छांव में
लहू रोते नंगे पांव
लंगड़ाकर दौड़ते हैं
छांव से धूप में
तलाशते हैं
शहर में गांव।।
© सुधीर राघव

Friday, October 21, 2016

मोदी जी का चीन प्रेम और भक्तों का विरोध

चीन के नेताओं को प्रेम से झूला झुलाने वाले मोदी जी। चीन पर प्रेम लुटाने वाले मोदी जी। पटेल की प्रतिमा चीन से बनवाने वाले मोदी जी। आयात बाधाएं हटाने वाले मोदी जी।
मगर, इधर भक्तों ने अचानक चीन के सामान के बहिष्कार का नारा बुलंद किया तो माथा ठनका कि धर्म के नाम पर देश के लोगों को लड़वाने वाले इन गद्दारों में अचानक देशभक्ति कैसे जाग उठी। इनमें तो सारे खुद व्यापारी और चीनी माल के डीलर हैं, इनकी मरी आत्मा कैसे जाग उठी।
कहते हैं, वक्त और बाजार सारी पोल खोल देता है। अब बाजार ने इनकी पोल खोलनी शुरू कर दी है। दिवाली के लिए माल के सारे आर्डर और पैमेंट तो ढाई तीन महीने पहले ही चीन जा चुके थे। वहां से माल भी आ गया और इस माल पर मोटा मुनाफा कमाने के लिए ही भक्त मंडली ने चीन विरोध का नारा बुलंद किया है।
इनका गणित साफ है। चीनी माल की भारतीय पैकिंग जा रही है। बिजली की जो चीनी LED तीस या चालीस रुपये कि पिछले साल मिल रही थी। इस साल उन्हीं LED लड़ियों को मेड इन गोवा और मुंबई कहकर ढाई सौ रुपये में बेचा जा रहा है। सजावट का सारा चीनी माल भारतीय कहकर दसगुनी कीमत तक बेचा जा रहा है। इतना मोटा मुनाफा है कि भक्तों की तो पौ बारह हो गई है।
भक्तो की इन हरकतों से चीन खुश है और उसका मीडिया कह रहा है कि भारत उनके माल के बिना रह ही नहीं सकता। इन भक्तों ने पहले दालों में कालाबाजारी कर माल कमाया और अब चीनी माल से मोटा माल कमाने में जुटे हैं। धिक्कार है इन चोरों को और इनके नेता को, जो मिलकर भोलीभाली जनता को लूट रहे हैं।

Saturday, October 15, 2016

हमारी गिलोय पर जल्द होगा अमेरिकी दवा कंपन‌ियों का कब्जा

सुधीर राघव
गिलोय की बेल जिसमें कम से कम 35 प्रकार के औषधीय तत्व होते हैं, पर जल्द ही अमेरिकी दवा कंपन‌ियों का पेटेंट होगा। अमेर‌िका में गिलोय के औषधीय गुणों पर रिसर्च जारी है और इसके तत्वों का चूहों और जानवरों पर अध्ययन के उत्साहजन निष्कर्ष भी आ चुके हैं। हालांकि इसके तत्वों पर कई तरह के पेटेंट पहले से जारी हैं मगर उनमें ये तत्व अन्य स्रोत से प्राप्त किए गए। संतोष की बात यह है कि टिनोस्पोरिन से जुड़ा एक पेटेंट भारतीय वैज्ञानिकों के भी नाम है।
हालांकि भारत ईसा से पूर्व ही गिलोय के गुणों से पर‌िचित है मगर शोध के अभाव में इसके गुणों को हमारे रसायनविदों ने इन पर ध्यान नहीं दिया। आचार्य चरक ने गिलोय को वात दोष हरने वाली श्रेष्ठ औषधि माना है। चरक के बारे में इत‌िहासकार कहते हैं कि वह कन‌िष्क के राजवैद्य थे और उनका काल 78 ईसा पूर्व के आसपास का है।
रिसर्च के अभाव में हमारे देश में आयुर्वेद के नाम पर झोलाछाप वैद्य मनमाने तरीके से गिलोय के उपयोग बता रहे हैं। जैसे डेंगू आदि बुखार में गिलोय के तने का काढ़ा बनाकर पीने को कहा जाता है। मगर वैज्ञानिक रिसर्च बताती है कि गिलोय के तने नहीं जड़ों में वे एल्कालोइड्स होते हैं जो वायरल इन्फेक्शन से बचाते हैं।
अब हम बात करते हैं उस रिसर्च की जो अमेरिका की यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में की गई है। इस रिसर्च के अनुसार गिलोय जिसका वैज्ञानिक नाम टिनोस्पोरा कोर्डिफोलोलिया है में 35 से भी ज्यादा तरह के औषधीय तत्व हैं। इसकी जड़ों में 14 तरह के एल्कालोइड्स होते हैं। इनमें बेर्बेराइन, कोलाइन, पाल्मटेन, टेम्बेटेराइन, मैग्नेफ्लोराइन, टेट्राहाइड्रोपल्मेटाइन, टिनोस्पोरिन, आइसोकोलुंबिन इत्याद‌ि मुख्य हैं। लैब के निष्कर्ष के अनुसार ये तत्व एंटी कैंसर, एंटी वायरल इनफ्लेमेशन, इम्यूनो मोड्यूलेटरी गुण, न्यूरोलॉजिकल, साइकेट्रिक कंडीशन और मधुमेह रोधी गुण हैं।
इनमें बेर्बेराइन का औषधीय उपयोग चीन में ईसा से तीन सौ साल से हो रहा है। मगर उसका स्रोत गिलोय न होकर अन्य पौधे थे। इमली के पौधे में भी यह तत्व होता है। गहरे पीले रंग का होने की वजह से इसका इस्तेमाल प्राचीन भारत में भी ऊन और चमड़ा रंगने के ल‌िए किया जाता था। इसका इस्तेमाल डायबिटीज, अन‌ियमित धड़कन, कैंसर, अन‌ियमित ल‌िप‌िड प्रोफाइल आद‌ि में लाभदायक है।
कैंसर स्टेम सेल से जुड़ा इसका पेटेंट 2012 में नेशनल ताइवान यून‌िवर्स‌िटी ने लिया है। गिलोय में पाये जाने वाले टिनोस्पोरिन के एक दर्जन से ज्यादा पेटेंट हैं। इनमें से एड्स थेरेपी का पेटेंट हाइवर लिमटेड के नाम है तो फंगल इन्फेक्शन जांच का लुसियाना स्टेट यूनिवर्स‌िटी के पास। भारत के चेतन बलारा और अन‌िल नकुम ने वायरल इन्फेक्शन में लाभकारी गुण की पहचान कर उसका पेटेंट कराया है। इसी तरह कोलाइन व‌िटाम‌िन बी-काम्पलेक्स का अव्यव है। यह गर्भवती मह‌िलाओं के ल‌िए आवश्यक है। भ्रूण के नर्वस सिस्टम के व‌िकास में उपयोगी है। इसकी टेबलेट का पेटेंट रूडी हरमन के नाम है। गिलोय की जड़ो में पाया जाने वाला एक अन्य एल्कालोइड पल्मेटाइन ऐसा है जो पील‌िया, दस्त, हाइपरटेंशन, सूजन, लीवर संबंधी बीमार‌ियों में उपयोगी है।
गिलोय के तने में छह तरह के ग्लूकोसाइड पाए जाते हैं। ये न्यूरोलोजिकल डिसऑर्डर जैसे एएलएस, पार्किंसन्स, ड‌िमेंशिया, मोटर न्यूरोन, न्यूरोन लोस इन स्पाइन और हाइपोथेलेमस जैसी बीमारियों के उपचार में कारगर हैं। इसके इलावा इन ग्लूकोसाइड्स के एंटी कैंसर गुण भी सामने आए हैं। पूरे पौधे के रस में छह तरह के डिटेरपेनोइड लेक्टोन्स भी पाए जाते हैं। ये तनावमुक्त करने, एंटी माइक्रोबीयल, एंटी हाइपरटेंशन, एंटी वायरल गुण भी रखते हैं।
इसके तनों और पत्तों आदि में चार तरह के स्टीरोइड्स होते हैं। ये न्यूरोपेथी और ओस्टोपोरोसिस और ऑर्थेराइटिस के निदान में उपयोगी पाए गए हैं। गिलोय में तीन तरह के एल‌िफेट‌िक कंपाउंड्स भी होते हैं जो दर्द निवारक, हाइड्रोक्सीडोपामाइन और पार्किंसन के उपचार में चूहों में कारगर पाए गए।
दूसरी ओर आयुर्वेद में तो गिलोय का महत्व इसी बात से आंका जा सकता है कि इसका एक नाम अमृता भी है। इसके बारे में कथा है कि समुद्र मंथन के दौरान देवों और असुरों में झगड़े के दौरान जहां-जहां अमृत की बूंदें गिरीं वहीं गिलोय उत्पन्न हुई। आयुर्वेद में इसे त्रिदोष हरने वाली, रक्तशोधक, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली, ज्वर नाशक, खांसी मिटाने वाली प्राकृतिक औषधि के रूप में खूब उपयोग किया जाता है। टाइफायड, मलेरिया, कालाजार, डेंगू, एलीफेंटिएसिस, विषम ज्वर, उल्टी, बेहोशी, कफ, पीलिया, धातु विकार, यकृत निष्क्रियता, तिल्ली बढ़ना, सिफलिस, एलर्जी सहित अन्य त्वचा विकार, झाइयां, झुर्रियां, कुष्ठ आदि में गिलोय का सेवन वैद्य कराते हैं। दावा यहां तक किया जाता है कि यह शरीर में इंसुलिन उत्पादन क्षमता बढ़ाती है। इसका नियमित प्रयोग सभी प्रकार के बुखार, फ्लू, पेट कृमि, रक्त विकार, निम्न रक्तचाप, हृदय दौर्बल्य, क्षय (टीबी), मूत्र रोग, एलर्जी, उदर रोग, मधुमेह, चर्म रोग आदि अनेक व्याधियों से बचाता है। यह भी कहा जाता है कि गिलोय की बेल को हलके नाखूनों से छीलने पर जो हरा,मांसल भाग नजर आता है उसका काढ़ा बनाकर पीने से त्रिदोष नष्ट होता है। देसी नुसखे बेचने वाले अब यह दावा भी करते हैं कि गिलोय और गेहूं के ज्वारे के रस के साथ तुलसी के 7 पत्ते तथा नीम के पत्ते खाने से कैंसर जैसे रोग में भी लाभ होता है। उनके अनुसार सिर्फ गिलोय की डंडी का ही प्रयोग किया जाता है। पत्तों का नहीं। उसका लिसलिसा पदार्थ ही दवाई होता है। अगर पीलिया है तो इसकी डंडी के साथ साठी की जड़ भी कूटकर काढ़ा बनायें और पी सकते हैं।
इतने सारे गुण ज्ञात होने पर भी देश के फार्मेसी वैज्ञान‌िकों ने इसकी उपेक्षा की। नतीजा यह होगा क‌ि भव‌िष्य में ग‌िलोय के तत्व से बनीं व‌िदेशी कंपन‌ियों की दवाइयां हम महंगे दाम चुकाकर खाने को मजबूर होंगे।

Monday, October 10, 2016

विजय दशमी उर्फ दशहरे का भाषण

सुधीर राघव
मित्रो!
हमारी सरकार को ढाई साल हो गए हैं। इस आधे कार्यकाल में हमने पूरा काम कर डाला है।
मित्रों! जो साठ साल में न हुआ वह हमने किया। हम विदेशों में जमा भारत का 20 लाख करोड़ रुपये का कालाधन वापस लाए। यह पैसा इतना है मित्रो कि अगर हम चाहते तो हर भारतीय के खाते में 15 बीस लाख रुपये ऐसे ही आ जाते। और तो और इस कालेधन में फिर भी इतना बचा रहता कि बाबा के लिए पांच छह जोड़ी सलवार सूट भी सिल जाते।
मगर मित्रो हमने ऐसा नहीं किया। जानते हो क्यों?.....बस मित्रता के लिए। अरे हमने देखा कि जिनका कालाधन विदेश में जमा है, वे तो सब अपने ही मित्र है।
मैं भारत के एक सौ बीस करोड़ लोगों से पूछना चाहता हूं कि मित्र का पैसा लेना पाप है कि नहीं। ...हां यह पाप है और हमारी सकार को यह गर्व है कि हमने यह पाप नहीं किया। हमने कहा, मित्रो तुम अपना कालाधन रखे रहो। हमें तुम्हारा यह काला धन नहीं चाहिए। हमें मित्र का धन नहीं चाहिए। हम खुद धन पैदा कर लेंगे।
मित्रो! इसके बाद हमने देशभर के आयकर अधिकारियों की बैठक बुलवाई। हमने उनसे साफ कहा- अरे अफसरो! हमें अंबानी का पैसा नहीं चाहिए। हमें अडानी का पैसा नहीं चाहिए। हमें टाटा बिडला से भी पैसा नहीं चाहिए। तुम अधिकारी लोग उनके पास जाओ जो गलियों में सारा दिन घूमकर साइकिल पर कुलचे छोले बेचते हैं। ठेले पर पानी पूरी, पाव भाजी, सब्जी फल बेचते हैं। जाओ उनका सर्वे करो। उनसे कालधन डिक्लेयर कराओ। मैंने उनसे पूछा, इस काम में कितना समय लगेगा तो उन्होंने कहा एक साल। मैंने कहा, एक साल नहीं। दो महीने में यह करके दिखाओ।
मेरे प्रिय देशवासियो! आपको यह जानकर गर्व होगा कि पटपड़गंज के एक कुलचे वाले ने अपना पुश्तैनी घर बेचकर सरकार के आगे 25 लाख रुपये का कालाधन डिक्लेयर किया। हमारे अफसरों के कहनेभर से उस गरीब कुलचेवाले ने कहा- मैं किराये के मकान में रह लूंगा, अपने बच्चों को नहीं पढाऊंगा मगर कालाधन जरूर डिक्लेयर करूंगा।
मित्रो ! ऐसे कुलचेवाले के प्रति मेरा सिर श्रद्धा से झुक जाता है जो देश की प्रगति के लिए अपने मेहनत के धन को भी काला धन घोषित करता है।
भाइयो बहनो! आपको यह जानकर खुशी होगी कि पूरे देश में 75 हजार लोगों ने 71 हजार करोड़ का कालाधन डिक्लेयर किया है। वही अफसर हैं। वही लोग हैं। बताओ ऐसा पिछले साठ साल में हुआ था। मित्रो यही असली विजय दशमी है। हमने काले धन के रावण को मार गिराया है।

Saturday, October 8, 2016

मोदी ने नवाज की दोस्ती के लिए सेना की साख को दाव पर लगाया

सुधीर राघव
सच्ची बात को विश्वसनीय तरीके से कहने का एक सलीका होता है। सरकारें इसमें पारंगत होती हैं।
याद कीजिए ऐबटाबाद में जब अमेरिका ने लादेन को खोजकर मारा था। उसकी खबर पूरी दुनिया के मीडिया को लादेन के घर पर कमांडो कार्रवाई के एक फोटो के साथ जारी की गई। इस एक फोटो ने पूरी खबर को दुनिया में विश्वसनीय बना दिया।
मोदी सरकार चाहती तो वह भी एक आइकन फोटो के साथ यह खबर जारी कर सकती थी। मगर विश्वसनीय तरीके से खबर जारी करने से मोदी के परम मित्र नवाज शरीफ संकट में फंस जाते। पाकिस्तानी सेना अपने ही देश में मुंह दिखाने के काबिल न रहती। मोदी लाहोर जाकर खुद चरण वंदना करके और बिरयानी खाकर आए थे ऐसे में वह नवाज शरीफ के लिए संकट कैसे पैदा कर सकते थे। मोदी ने पठानकोट हमले के बाद आईएसआई की टीम पठानकोट एयरबेस में बुलवाकर नवाज और पाकिस्तान के प्रति अपनी वफादारी का खुला सबूत दे ही चुके थे। इसलिए अब नमक का हक अदा करने से कैसे चूकते।
लगातार झूठे साबित होते वादों और जुमलों से मोदी जी की अपनी साख देश में बची नहीं थी। वह खुद अगर बताते कि सर्जीकल स्ट्राइक किया है तो देश में ही कोई नहीं मानता। मोदी का उद्देश्य बस इतना था कि यह सच्ची खबर देश में तो हर कोई सच मान ले मगर पाकिस्तान को इसे दुनिया के सामने खारिज करने का भी मौका मिल जाए। यानी जनता भी पट जाए और नवाज भी न टूटे। मोदी ने अपना यह मनोरथ पाने के लिए देश की सेना का इस्तेमाल किया। बिना किसी आईकन फोटो के सर्जिकल स्ट्राइक की खबर जारी कराई गई। और वही हुआ जो मोदी और नवाज शरीफ चाहते थे। पाकिस्तान ने छूटते ही खबर को खारिज कर दिया। पाकिस्तान ने इंटरनेशनल मीडिया को LOC की दौरा करवा दिया। नतीजा इंटरनेशनल मीडिया में सेना की कार्रवाई पर सवाल खङे कर दिए। देश के सम्मान और गौरव को मोदी सरकार द्वारा दाव पर लगाने पर जब कुछ नेताओं ने सेना के सम्मान के लिए कोई सबूत सार्वजनिक करने को कहा तो भक्त मीडिया उन पर टूट पड़ा।
वह तो भला हो इंडियन एक्सप्रेस का जिसने सेना के सम्मान और साख के लिए खुद सबूत जुटाकर दुनिया के सामने रखे। भले ही नई दिल्ली डेटलाइन से।
मोदी सरकार की पाकिस्तान के प्रति इसी वफादारी का नतीजा है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकी देश करार देने से इंकार कर दिया है। खुद मोदी सरकार ने भी न तो पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित किया है और न ही राजनय संबंध खत्म किए हैं।

Thursday, October 6, 2016

सवाल दर सवाल

सुधीर राघव
यह एक बड़ा सवाल है कि सरकार ने सेना से सबूत क्यों मांगे? और सेना ने वीडियो फुटेज सरकार को क्यों दिए? सरकार में बैठे नेता उन्हें सार्वजनिक करने के पक्ष में क्यों नहीं है?
नवाज शरीफ और पाकिस्तान नहीं चाहता कि भारत अपने सैनिकों के शौर्य और जांबाजी के सुबूत दुनिया को दिखाए ताकि वह भारत के सर्जिकल स्ट्राइक के खिलाफ अपना झूठ का प्रोपेगंडा जारी रख सके।
भारत में बैठे नवाज शरीफ के मित्र और गद्दार भी यही चाहते हैं कि भारत ऐसा कोई काम न करे जिससे सेना की जांबाजी सामने आए और पाकिस्तान दुनिया में मुंह दिखाने के काबिल न रहे। पाकिस्तान के हर झूठ को बेनकाब करना चाहिए। गद्दारों का समर्थन शर्मनाक है।
खबर है कि सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक का 90 मिनट का वीडियो सरकार को सौंप दिया था मगर मोदी सरकार इसे दबाए बैठी है।
उधर, पाकिस्तान ने स्ट्राइक के बाद LOC पर इंटरनेशनल मीडिया को घुमवा दिया। तब से पाकिस्तानी और इंटरनेशनल मीडिया भारतीय सेना का मजाक उड़ा रहा है।
सेना अपनी और देश की आन बान और शान को समझती है। इसलिए उसने वीडियो तत्काल सरकार को सौंप दिया मगर पाकिस्तान के चरणों में लोट लगाने वाले नेता जानबूझकर सबूत दबाकर बैठ गए हैं ताकि इंटरनेशनल मीडिया में देश की खिल्ली उड़ती रहे। उन्हें तो देश में वाहवाही मिल ही गई है।
हम सबको अपनी सेना की बात पर भरोसा है। हमें सबूत चाहिए भी नहीं मगर दुनिया में हमारी सेना के दावों का सरकार के दब्बूपन की वजह से मजाक बने यह भी गवारा नहीं। दुनिया को दिखा दो हमारी सेना का शौर्य।

Wednesday, October 5, 2016

Thursday, September 29, 2016

अगर मैं पीएम बन जाऊं

सुधीर राघव
लगता है मोदी जी ऐसे ऐसे कारनामें करेंगे कि लोग मोहम्मद बिन तुगलक को भूल जाएंगे।
26|11 के बाद दुनिया में अलग थलग पड़े पाकिस्तान को मोदी जी ने चुनाव जीतते ही शपथ ग्रहण समारोह में बुलाकर प्यार लुटाया। फिर हर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर नवाज से चिपट चिपट कर मिलते। इतना ही नहीं डेढ़ साल में ही लाहौर पहुंचकर चरणों में भी लौट लगा दी।
देश के दुश्मन को गले लगाना देश से गद्दारी होता है और यह साबित भी हुआ। नवाज शरीफ ने इस मूर्खता का लाभ उठाकर पलटकर पठानकोट और उड़ी कर दिया। संयुक्त राष्ट्र में जहर उगला और इसकी भी शर्म नहीं कि मोदी जी ने उनके घर आकर पांव पकड़े थे।
अब मोदी जी फिर से पाकिस्तान को अलग थलग करने के रास्ते तलाश रहे हैं। यानी लौटकर दौलताबाद से दिल्ली आए वाली स्थिति है। मोदी जी मुख्यमंत्री से सीधे प्रधानमंत्री बने हैं इसलिए वह देश पर उल्टे सीधे प्रयोगकर विदेश नीति सीख रहे हैं।
पाकिस्तान को अलग थलग करने के नाम पर भी मोदी जी क्या कर रहे हैं? पाकिस्तान हमें मारकर चला गाया और हम आंसू बहाकर कह रहे हैं ओबामा जी ओबामा जी पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित करो। यूएन में गिड़गिड़ा रहे हैं -अध्यक्ष महोदय जिनके घर शीशे के होते हैं वे औरों पर पत्थर नहीं फैंकते।
अरे अमेरिका क्या जाते हो। पाकिस्तान जाओ न। पीओके और बलूचिस्तान में झंडा फहराकर आओ न। अगर आज मैं प्रधानमंत्री होता तो वही करता जो बचपन में किया था। भाइयो और बहनो। बचपन में एक लड़का मेरी पीठ पर मुक्का मार कर दौड़ गया। मैंने भी पीछा नहीं छोड़ा और उसके घर पहुंचकर उसकी खबर ली। उसे सबक सिखाया। मैं पाकिस्तान के साथ भी ऐसा ही करता। ऐसा ही करूंगा। प्रधानमंत्री बना दो प्लीज। मुझे भी मोदी जी की तरह राष्ट्रीय राजनीति का कोई अनुभव नहीं है।
( अंबानी, अडानी से सादर अनुरोध है कि अगर वे मेरी मदद करें तो मैं भी रजत शर्मा को यह धांसू इंटरव्यू दे सकता हूं)

Wednesday, September 28, 2016

कविता और कवि

सुधीर राघव
एक तरफा कवि ने
कविता से कहा
तुम मेरी हो जाओ
नहीं तो तेजाब फेंक दूंगा
कविता ने पलट कर
तमाचा जड़ा
कवि भस्म हो गया
कविता दुर्गा हो गई
कवि रक्तबीज बनकर आया
उसने कविता से कहा
तुम मेरी हो जाओ
नहीं तो कैंची से गोद दूंगा
कविता ने हुंकार भरी
खप्पर में काट खून पी गई
कवि मर गया
कविता चंडी हो गई
झरने पर बैठे गुनगुनाते कवि ने
कविता से कहा
मेरी लय पहन लो
ये अलंकार अपने बालों में लगा लो
खूब जंचेगी तुम्हे यह छंद की चोली
तुम्हारे माथे पर में चांद टांगता हूं
तुम्हारे हाथों के सुनहरे कंगन बनाउंगा
मैंने कमा लिए हैं 12 दिन के सूरज
यह नदी उठाकर
तुम्हारे पांव में बांधूंगा पायल की तरह
कविता प्रेम में डूब गई
कवि अमर हो गया।

Monday, September 26, 2016

सिंधु संध‌ि पर भयभीत पाक

सुधीर राघव
सितंबर 1960 में पाकिस्तान से हुई सिंधु जल संधि ठीक 56 साल बाद एक बार फिर चर्चा में है। पाकिस्तान के लिए यह उस तोते की तरह है, जिसमें उसकी जान बसती है। यही वजह है कि भारत को आतंकवाद का निर्यात करते हुए पिछले तीस साल में वह कई बार इसके टूट जाने के भय से भयभीत हुआ है।
पाकिस्तान के साथ तीन जंग लड़ने के बावजूद भारत इस संधि को क्यों ढो रहा है? यह सवाल आज देश में हर कोई पूछ रहा है। इस संध‌ि में विश्वबैंक मध्यस्थ था और संधि के बाद पाक‌िस्तान को दस साल का ग्रेस पीर‌ियड दिया गया था। 1970 तक विश्वबैंक की मदद से उसने अपने यहां दुनिया का सबसे बड़ा नदी सिंचाई सिस्टम बना लिया। इसी ग्रेस पीरियड में पाकिस्तान ने भारत से एक युद्ध भी लड़ा और दूसरा युद्ध इसके ठीक एक साल बाद 1971 में। उस दौर में भारत के लिए जम्मू-कश्मीर में बांध परियोजनाओं के बारे में विचार हो सकता था मगर उन्हें बनाने के लिए लंबे वक्त और कश्मीर की स्थानीय सरकार के सहयोग की जरूरत थी।
हालांकि ऐसा भी नहीं है कि यह सिर्फ पाकिस्तान का डर है कि भारत सिंधु समझौता तोड़ सकता है। इस दिशा में पिछले चालीस साल में कुछ कदम भी उठे और उसने पाकिस्तान को भयभीत किया। खासकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के कार्यकाल में जम्मू-कश्मीर में जेहलम और चिनाब को नियंत्रित करने के कई ठोस काम किए गए और पाकिस्तान ने इनके खिलाफ ने अपील भी की।
सत्तर के दशक में यमुना, सतलुज, ब्यास, रावी को नहरों से इंटरलिंक करने की योजना घोषित रूप से बन गई थी। जेहलम और चिनाब को इस रूप में न‌ियंत्रित करने के लिए ‌डेम निर्माण योजनाएं भी तैयार की गईं। मगर अस्सी का दशक शुरू होने से पहले ही पाक प्रायोजित आतंकवाद ने पंजाब में जड़ जमानी शुरू कर दी और उन्होंने सतलुज-यमुना लिंक का सबसे ज्यादा विरोध किया। यहां तक क‌ि इंजीनियरों की हत्या कर दी गई। कुछ क्षेत्रीय नेता भी एसवाईएल के विरोध में आ गए।
इस दौरान जम्मू-कश्मीर में कुछ ठोस काम हो रहा था। पावर प्रोजेक्ट शुरू किए गए। इनके लिए डेम बनाए गए और बिजली उत्पादन किया गया और साथ ही पाकिस्तान को आश्वस्त किया जाता रहा कि हम सिर्फ बिजली बना रहे हैं और इसमें से पानी नहीं ले रहे हैं। सबसे पहले स्थानीय सरकार की मदद से 1970 में सलाल डेम बनाया गया। 1980 में जेहलम में बुलर बांध प्रोजेक्ट तैयार किया गया और 1984 में बुलर लेक पर इसका निर्माण शुरू किया गया। 1987 में पाकिस्तान ने इसके खिलाफ शिकायत की तब से अब तक इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच 13 दौर की वार्ता हो चुकी है। राजीव गांधी के समय 1985 में किश्तवाड़ में चिनाब नदी पर 390 मेगावाट की दुलहस्ती पर‌ियोजना तैयार की गई। यहां नदी पर 70 मीटर ऊंचा बांध है। नरसिंह राव ने 1992 में डोडा जिले में चिनाब नदी पर बगल‌िहार प्रोजेक्ट की रूपरेखा तैयार ‌की। देवगोड़ा सरकार के समय 1996 में इसका निर्माण को मंजूरी मिली और। 1999 में अटल सरकार के समय निर्माण शुरू हुआ।
वर्ष 2008 में मनमोहन सिंह ने यह प्रोजेक्ट राष्ट्र को समर्प‌ित किया। अगर पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित कर दिया जाता है तो भारत इन बांधों से कैनाल सिस्टम बनाकर अपनी जरूरत का पानी ले सकता है। मगर यह पानी तभी लिया जा सकता है, जब कश्मीर और पंजाब में हमारे ही लोग इसका विरोध न करें। हम चिनाब, जेहलम, रावी, ब्यास, सतलुज और यमुना के बीच नहरों के जर‌िए इंटरलिंक बनाते हुए पानी को देश के सूखे हिस्सों में पहुंचाएं। पंजाब के नेताओं को भी एसवाईएल का विरोध करने की जगह जेहलम और चिनाब के पानी में अपना हिस्सा मांगने पर जोर लगाना चाहिए। पंजाब को इसलिए ही पंजाब कहा जाता है, क्योंकि इन नद‌ियों का पानी इसके नाम में हैं। इसल‌िए यह पंजाब का हक है। अटल ब‌िहारी बाजपेयी भी इस बात को समझते थे। इसल‌िए वह हमेशा नद‌ियों को इंटरल‌िंक करने की बात करते रहे।
मोदी मुख्यमंत्री से सीधे प्रधानमंत्री बने हैं। इसलिए उन्हें राष्ट्र की समस्याओं और जरूरतों को समझने में वक्त लगेगा। सिंधु संध‌ि पर समीक्षा बैठक बुलाकर उन्होंने अच्छा किया है। इससे उन्हें इस पूरे मसले को समझने में मदद मिलेगी। सिंधु जल संधि की वजह से पाकिस्तान को सिंधु सिस्टम की तीन नदियों सिंधु, जेहलम और चिनाब का पूरा पानी मिलता है। इस सिस्टम की बाकी तीन नदियों सतलुज, ब्यास और राव‌ि के पानी पर भारत का अधिकार है। संधि की वजह से और कुछ भारत में क्षेत्रीय दलों की राजनीत‌ि की वजह से पाकिस्तान इस सिस्टम से 75 फीसदी पानी ले रहा है और इसमें से 72 फीसदी का वह खुद इस्तेमाल करता है और तीन फीसदी पानी चीन और अफगानिस्तान को देता है। हमारा पानी पीकर वह हम पर ही आतंकवाद थोपता है। उसे बताना होगा कि आतंकवाद के बदले पानी नहीं दिया जा सकता।

Sunday, September 25, 2016

ऐसे दिन भी आने थे

सुधीर राघव
पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात हम नहीं करेंगे। हम बात करेंगे उनकी जिन्हें सबक सिखाने में मोदी सरकार तन मन और धन से लगी है। भाजपा और संघ के वालिंटियर जिस काम में तन से लगे हैं। सरकार धन से और मोदी जी मन से। आज हम उसकी बात करते हैं।
सुबह सुबह डंडा लेकर गरीबों को जंगलों से भगाया जाता है। ये वे लोग हैं, जिनके पास घर नहीं हैं। चंडीगढ़ की सड़कों पर पलते हैं और रात को फुटपाथों पर सोते हैं। रिक्शा चलाते हैं या भीख मांगकर गुजारा करते हैं।
जाहिर है कि जब इनके पास घर नहीं हैं तो शौचालय भी नहीं होंगे। शहर के सार्वजनिक शौचालयों पर ताले टंगे हैं। जो कंपनी इन्हें चलाती थी, वह इन पर विज्ञापन लगवा देती थी। उस पर विज्ञापन घोटाले का आरोप लगाकर हटा दिया गया। यथा राजा तथा अफसर। अफसरों ने बौद्धिक विकास का परिचय देते हुए इन शौचालयों पर ताले लगवा दिए।
गरीब और बेघर बेशौचालय लोग सुबह सुबह जंगल की ओर निकल जाते थे। अब उन्हें वहां डंडा लेकर खङे भक्त मिल जाते हैं। गोभक्तों वाली स्पेशल ट्रेनिंग वाले ये भक्त इन बेशौचालय लोगों से क्या सलूक करते हैं, इसका कोई वीडियो तो अभी तक नहीं आया, इसलिए हम मान लेते हैं कि वे इन गरीब लोगों को प्यार से समझाते होंगे और बेचारे गरीब मान जाते होंगे। या फिर कोई ऐसा योग सिखाते होंगे कि वे नेचरकाल की समस्या से सदैव के लिए मुक्ति पा लें।
वैसे चंडीगढ़ में खुले में शौच पर 500 रुपये जुर्माना भी है। मगर इन गरीबों की जेब में पांच रुपये भी निकल आएं तो बड़ी बात है। ऐसे में अफसरों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि जुर्माना कैसे वसूलें। इस चिंता से उन्हें रातभर नींद नहीं आती। जुर्माना न वसूला तो टार्गेट पूरे न होंगे। टार्गेट पूरा न हुआ तो स्वच्छता का अवार्ड कैसे मिलेगा?
अब ऐसे नजारे आम हो सकते हैं। आप सुबह सुबह सैर पर निकले हैं। पार्क के गेट पर ही कोई मैला कुचैला सा पेट पकड़े गिड़गिड़ा रहा है- साहब पांच रुपये दे दो। शौचालय जाना है।बहुत पुण्य होगा।
आप ट्रेकसूट की जेबों पर हाथ मारते हैं। उसमें पर्स नहीं है। सिर्फ गाड़ी की चावी है। आपको दिनभर अफसोस होगा कि सुबह सुबह पुण्य के काम से वंचित रह गए।
मगर यह स्थित तब आएगी जब शहर के शौचालयों के ताले खुलेंगे। अभी आपको सुबह सुबह पुण्य कमाना है तो डंडा लेकर जंगल जाइए। गरीबों को बैठने से भगाइए। इससे मोदी जी के मन को सकून मिलेगा। आज की तारीख में मोदी के मन सकून देने से बड़ा पुण्य का काम कोई दूसरा नहीं।

Saturday, September 24, 2016

सिंधु के पानी पर हिंदू का अध‌िकार

सुधीर राघव
पाक‌िस्तान के साथ सिंधु जल समझौते को रद्द करने पर सरकार विचार कर रही है। ऐसे खबरें मीडिया में हैं। सरकार इस पर सचमुच विचार कर रही है या यह सिर्फ छवि संवारने का प्रचार है। यह वक्त के साथ ही स्पष्ट होगा।
मगर यह देश की जरूरत है कि सिंधु रिवर सिस्टम के पाकिस्तान के साथ कुल जल बंटवारे पर पुनर्व‌िचार किया जाए। सिंधु और इसकी सहायक नदियों के 75 फीसदी पानी का इस्तेमाल इस वक्त पाकिस्तान कर रहा है। एसवाईएल जैसी योजनाएं लटक जाने से भारत के हिस्से का पानी भी पाकिस्तान जा रहा है। इस संबंध में गत 23 मार्च को मेरा एक लेख सूखी नहर में वोटों की खान अमर उजाला में प्रकाशित हुआ था, जिसमें विस्तार से चर्चा की थी। उन्हीं पहलुओं को फिर आपके सामने रख रहा हूं। यह अब और भी प्रासंगिक हैं।
जल प्रबंधन कैसे किया जाता है? हमारे नेताओं को यह पाकिस्तान से सीखना चाहिए। पाकिस्तान के पास दुनिया का सबसे बड़ा नदी जल सिंचाई सिस्टम है। इंडस बेसिन का यह पूरा सिस्टम भारत से जाने वाले पानी पर ही निर्भर है। जेहलम पर मंगला डेम और सिंधु नदी पर तरबेला डेम बनाकर पाकिस्तान ने 1960 से 1971 के बीच अपने क्षेत्र में सिंधु की सहायक नदियों को न सिर्फ 12 इंटर रीवर लिंक नहरों से जोड़ा, बल्कि 45 अन्य नहरें भी बनाईं। नतीजा यह है कि आज पाकिस्तान की 2 करोड़ 12 लाख हेक्टेयर भूमि इस सिंधु सिस्टम से सिंचित है। हम पिछले तीस साल में सतलुज-यमुना को जोड़ने वाली एक लिंक नहर नहीं बना सके और पाकिस्तान ने दस साल में 12 इंटर रीवर लिंक नहरें बना लीं। पाकिस्तान ने यह कैसे कर दिखाया इसे धैर्य से समझने की जरूरत है।
सिंधु और इसकी सहायक नदियों जेहलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज के पानी का बंटवारा भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से 19 सितंबर 1960 को हुआ। इसे सिंधु जल समझौते के तहत सिंधु, जेहलम और चिनाब के पानी पर पाकिस्तान का हक मान लिया गया और रावी, ब्यास और सतलुज का सारा पानी भारत को मिला। साथ ही यह शर्त भी थी कि 31 मार्च 1970 तक भारत अपने हिस्से की तीनों नदियों का पानी पाकिस्तान जाने से नहीं रोकेगा। इस अवधि में पाकिस्तान अपने इलाकों में सिंचाई के लिए नहरों के माध्यम से वैकल्पिक व्यवस्था करेगा। पाकिस्तान ने तय समय में नहरों का जाल बिछाकर अपने किसानों और लोगों को सुरक्षित कर लिया। स्थिति यह है कि सिंधु और इसकी सहायक नदियों के 72 फीसदी से ज्यादा हिस्से का इस्तेमाल पाकिस्तान में हो रहा है और भारत महज 25 फीसदी का इस्तेमाल कर पा रहा है। इस पानी का थोड़ा सा हिस्सा अफगानिस्तान और चीन को भी मिलता है। मगर जल संकट से जूझने वाले दक्षिणी हरियाणा को यह पानी नहीं मिलता, जबकि यह क्षेत्र 1966 से पहले पंजाब का ही हिस्सा था।
बात सिर्फ इतनी थी कि भारत को अपने हिस्से के नदी जल का प्रबंधन कर अपने सूखे हिस्सों तक पानी पहुंचाना था। इससे पहले कि इस पर काम शुरू होता, नेताओं के राजनीतिक हित देश हित के आड़े आ गए। 1971 की जंग की हार से बौखलाए पाकिस्तान ने पंजाब को अपना निशाना बना कर खेल शुरू कर दिया था। इसी बीच 1973 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया, जो आनी वाले दिनों की राजनीति में बड़ी हलचल मचाने वाला साबित हुआ। जल प्रबंधन के काम को हमारे नेताओं ने इस कद्र विद्रूप किया कि पाकिस्तान पोषित आतंकवादियों ने भी इसके कंधे पर रखकर एक दशक तक पंजाब में अपनी बंदूकें चलाईं। हमने पाकिस्तान को जिन रास्तों से पानी दिया बदले में हमें उन्हीं रास्तों से सिर्फ आतंकवाद मिला। हरिके पत्तन के बीहड़ पाकिस्तान से ट्रैनिंग लेकर आने वाले आतंकवादियों के छुपने का मुख्य ठिकाना थे। इसी तरह रावी और इसके सहायक उज्ज दरिया से अब तक घुसपैठ अब तक हो रही है।
अब सवाल यह है कि अगर सिंधु जल समझौते को रद किया जाता है तो भारत को क्या लाभ मिलेगा। इस लाभ के रास्ते में बहुत सी व्यवहारिक दिक्कतें हैं। पाकिस्तान जाने से हम जेहलम और चिनाब का पानी रोक सकते हैं। मगर इसके लिए हमें डेम और लिंक नहरें बनानी होंगी जो इस पानी को रावी, ब्यास, सतलुज से जोड़ते हुए पंजाब के विभिन्न हिस्सों, हर‌ियाणा, राजस्थान और दिल्ली तक लाया जा सकता है। मगर इसके लिए दस साल की जरूरत होगी। साथ ही यह भी देखना होगा कि पंजाब और कश्मीर के नेता इन लिंक ‌नहरों के निर्माण का विरोध न करें।
सिंधु जल संधि तोड़ना मात्र बातों का खेल नहीं है। यह सिर्फ स‌िंधु के पानी पर हिंदू के अधिकार का जुमला भर नहीं है। यह एक लंबी अवध‌ि का काम है। इसके लिए पहले लिंक नहरें, फिर डेम बनाने होंगे। उसके बाद ही हम यह घोषणा करने की स्थिति में होगे क‌ि पचास साल पुरानी यह संध‌ि हमें मंजूर नहीं।

Sunday, September 18, 2016

उड़ने वाला हाथी

सुधीर राघव
भक्त अपने नेता की तुलना हाथी से करते हैं और आलोचकों की कुत्तों से।
मगर हमारा नेता तो हाथी नहीं, सफेद हाथी है। इंद्र का ऐरावत। वह चलता नहीं उड़ता है। कभी अमेरिका, कभी पाकिस्तान, कभी चीन कभी फ्रांस। वह पूरी दुनिया में उड़ता है।
वह जब उड़ता है तो भक्त भाव विभोर हो जाते हैं। पुष्प बरसाते हैं। जब सफेद हाथी पाकिस्तान जाता है तो भक्त सोचते हैं कि वह दाऊद को गले से पकड़ कर लेकर आ रहा है मगर वह पांव छूकर लौट आता है।
सकपकाए भक्त तब भी सफेद हाथी को दोष नहीं देते। वे अपना सुर ही बदल लेते हैं। वे फिर गुणगान करते हैं कि हाथी जी ने महान मिसाल पेश की है। ऐसे विलक्षण भक्त पाकर गदगद हाथी और सफेद हो जाता है। वह मन की बात अलापने लगता है। इस अलाप को सुन भक्त धन्य हो जाते हैं।
हाथी पर बैठे महावत का हाल भी निराला है। उसे जब इंद्रियां पुकारती हैं तो वह चिल्लाने लगता है कि भक्तो ज्यादा बच्चे पैदा करो। पहले से पैदा बच्चों पर मक्खियां भिनक रही हैं। कोई रोजगार नहीं है। हाथी मौन रहता है।
महावत चिल्लाता है गायों की रक्षा करो। भक्त लोगों को घेर घेर कर मारने लगते हैं। सफेद हाथी और सफेद हो जाता है। वह चुप रहता है। हाथी जब लोगों के भले की बात कहता है तो भक्त उसकी बात काट देते हैं। हाथी कहता है कि सबको 15 लाख मिलेंगे तो भक्त फौरन दाढ़ी नोचकर कहता है, यह तो जुमला है। हाथी कहता है कि अच्छे दिन आएंगे तो भक्त खांसने लगता है। जनता के अच्छे दिन उसे गले की हड्डी लगते हैं। अच्छे दिन तो बस नेता के ही आते हैं।
हाथी घुटनों के बल बैठा है। कह रहा है हाई लेवल बैठक कर रहा है। भक्त उसकी लीद ढकने में लगे हैं। पहरेदार बफादार कुत्ते भौंक भौंक कर उसे उठा रहे हैं- उठो गजराज। पलटकर हमला करो। मगर हाथी की लीद हाथी से बड़ी हो चली है। उससे उठा नहीं जाता। वह उठने वाला नहीं।

Friday, September 16, 2016

मोदी मच्छर और महंगाई

सुधीर राघव
मोदी मच्छर और महंगाई
इन तीनों ने प्रसिद्धी पाई
एक ही राशि भाई भाई
और जनता की नींद उड़ाई
डंडा डेंगू और डायन ने
हर गरीब पर करी चढ़ाई
बांटा चूसा जेबतराशी
छीन ले गए पाई पाई
तीनों ही अंबानी से डरते
तीनों के घर नहीं लुगाई
आकर किसी गरीब से पूछो
कैसी मिलकर गत बनाई
अस्पताल भरे और पेट हैं खाली
मन की बात करें कव्वाली
भक्त बजाते हा हा ताली
अमेरिका जाओ तीनों भाई

Thursday, September 15, 2016

गले की हड्डी

सुधीर राघव
अच्छे दिन तो गले की हड्डी
आंख फटी सच बोली चड्ढी
क्यों अचरज करते हो भाई
सड़क छोड़ चलते पगडंडी
हू तू तू अब रेड मार तू
नेता के संग खेल कबड्डी
जख्म न बदला बोझ न बदला
यूं टूटी घोड़े की हड्डी
गधे कि किस्मत इकदम पलटी
कही चाय और मिल गई गद्दी
अच्छे दिन तो गले की हड्डी
आंख फटी सच बोली चड्ढी
टूटी खटिया किसान ले गए
नेता ले गया नोट की गड्डी
फसल लूट चौपट कर डाली
अरब सागर से आई टिड्डी
तेरी काशी में भांग का अड्डा
मेरे मगहर में भूख की अड्डी
कैसे होगा मेल हमारा
न मैं नड्डा न तू नड्डी
अच्छे दिन तो गले की हड्डी
आंख फटी सच बोली चड्ढी

Tuesday, September 13, 2016

अंकल सेम की कठपुतलियां

सुधीर राघव
बाबू मोशाय! न तो ये गोभक्त हैं, न राम भक्त, न गंगा भक्त और न ही शिवभक्त !
अरे! ये सब तो अंकल सेम के हाथों की कठपुतलियां हैं रे!
अंकल सेम कहेगा कि सस्ती जेनरिक दवाएं प्रतिबंधित करो हमारी दवा कंपनियों को घाटा होता है तो ये 356 दवाओं की बिक्री रोक देंगे।
अंकल सेम कहेगा कि किसानों और आदिवासियों को सताओ तो जंगल और जमीन छीनने में जुट जाएंगे।
अंकल सेम कहेगा कि पब्लिक को सताओ तो ये कालाबाजारियों को जनता पर छोङ देंगे।
अंकल सेम कहेगा कि मुसलमानों को सताओ तो ये गोभक्त बन जाएंगे।
अंकल सेम कहेगा कि नवाज शरीफ को मनाओ तो ये पांव छूने पाकिस्तान चल देंगे।
अंकल सेम कहेगा कि अपने सैन्य हवाई अड्डे हमारे लिए खोल दो तो ये बिछ बिछ जाएंगे।
अंकल सेम कहेगा कि कश्मीर तो ये पूरी घाटी को अशांत कर देंगे।
अगर अंकल सेम कहेगा कि अंबानी और अडानी की नकेल कसो तो ये फोरन मना कर देंगे। न भाई न! अपना भी जमीर है।

Friday, September 9, 2016

सैर सुखना की

सुखना लेक के ट्रेक‌िंग ट्रेल में नेचर वाक।

Wednesday, September 7, 2016

डिजिटल इंडिया में लट्ठ गाढ़ता हरियाणा

देश में डिजिटल नारों की गूंज है, मगर सिस्टम मैनुअली भी नहीं चल पा रहा। हालत यह है कि सड़क हादसे में घायलों के लिए एंबुलेंस मंगाना भी आसान नहीं है।
दो साल पहले तक बहुत से मामलों में नंबर वन होने का दवा करने वाले हरियाणा में अब हालत यह है कि एक जज को भी कह दिया कि एंबुलेंस उङकर नहीं आएगी।
मामला दो दिन पहले का है। पंचकूला स्थित सीबीआई की विशेष अदालत के जज जगदीप लोहान जींद के पास अपने गांव से चंडीगढ़ लौट रहे थे। इक्कस के पास एक हादसे को देख उन्होंने अपनी गाङी रुकवाई और घायलों की मदद को नीचे उतरे। उन्होंने 102 पर एंबुलेंस को कॉल किया मगर एंबुलेंस नहीं आई। काफी देर इंतजार के बाद दोबारा काल किया तो जवाब मिला एंबुलेंस उड़कर नहीं आएगी। एंबुलेंस के न आने पर जज साहब ने एक कैंटर को रुकवाकर घायलों को अस्पताल पहुंचाया।
जज साहब ने जो किया वह हर व्यक्ति के लिए अनुकरणीय है। मगर उस अॉपरेटर का जवाब देश को सोचने को मजबूर करता है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्री उङकर जा सकते हैं मगर देश में एंबुलेंस उङकर नहीं जा सकती। हाइवे पर तङपते व्यक्ति की जान की कीमत कुछ नहीं हैं।
सारा मामला हरिराणा के स्वास्थ्य मंत्री की जानकारी में है। उनका कहना है कि मामले की जांच के आदेश स्वास्थ्य विभाग को दे दिए गए हैं।

Tuesday, September 6, 2016

सुनो बनारस

सुधीर राघव
अपनी अपनी खाट यहां पर
अपने अपने ठाठ
नेता कब से देख रहे थे
इस चुनाव की बाट
गैया गोबर खाट खरहरी
मंदिर होगा मुद्दा
जाति धर्म या हाथी साइकिल
मुस्काएगा बुद्धा
घर घर ढूंढे गंगा मैया
फर फर झूठा नेता
भूल बनारस दिल्ली बैठा
वोटर क्या कर लेता
हाथ का मैल नहीं है वोटर
जिसने उसे भुलाया
उस पार्टी की दुर्गति ऐसी
कैसा हुआ सफाया
कमल खिलेगा इसी आस में
कीचड़ जो फैलाता
पब्लिक अगर जान ले ये सब
खाता नहीं खुल पाता
झूम झूमकर चलने वाला
खुद को समझे हाथी
गाय के गोबर के आगे मगर
दाल नहीं गल पाती
कच्ची पक्की सड़क पर पंक्चर
ये साइकिल की सत्ता
कब यहां खाट खड़ी हो जाए
नहीं पता ये चलता
अपने अपने को देय रेबड़ी
जब जब बांटे अंधा
मत इनको जन सेवक समझो
इनका मोटा धंधा
कहत सुधीर सुनो बनारस
कुर्ते पर मत जाना
जीत गए तो सूट पहनकर
इन्हें मनीला जाना।।

Saturday, September 3, 2016

सिद्धू को हवा में खेलना ही पसंद

सुधीर राघव
क्रिकेट में ऊंचा शॉट खेलने के लिए मशहूर नवजोत सिंह सिद्धू ने सियासत की पिच पर भी वही अंदाज दिखा दिया है। करीब डेढ़ महीने से कैच के लिए फिल्डिंग सजाए आम आदमी पार्टी और कांग्रेस अब आसमान की ओर ताक रहे हैं। सत्ता के डगआउट में बैठी शिअद के लिए यह तालियां बजाने का वक्त है।
देश में शायद यह पहला मौका है, जब किसी नई पार्टी या मोर्चे की पहली घोषणा औपचारिक प्रेसकान्फ्रेंस में नहीं, बल्कि फेसबुक के जरिए हुई है। बात भी सीधी
नहीं कही गई है। पेनाल्टी कॉर्नर के माहिर पगट सिंह के जरिए अलग मोर्चा बनने की खबर मीडिया में आई। हालांकि अंदाज चौंकाने वाला था मगर इसका आभास
लोगों को पहले से था कि सिद्धू अलग पार्टी बना सकते हैं। आम आदमी पार्टी को उनकी शर्तें स्वीकार नहीं थीं और पलक पावड़े बिछाए इंतजार कर रही कांग्रेस को लेकर उन्हें खुद ही हिचक होगी।
आभासी दुनिया के जरिए उतरने का आभास देकर कोई और खेल भी खेला जा सकता है। आखिर इस आवाज-ए-पंजाब मोर्चा में मझे हुए खिलाड़ी हैं, जो खेल को रोचक बनाने के लिए जाने जाते हैं। अकाली दल से बगावत कर सिद्धू के साथ आ रहे परगट सिंह अपने समय के देश के सबसे शानदार ड्रेग ‌फ्ल‌िकर रहे हैं।
पेनाल्टी कॉर्नर को गोल में बदलने का उनका रिकार्ड शानदार है।पंजाब की सियासी बिसात पर असली मोहरे सजने अभी बाकी हैं। खेल की दिशा तय होने से पहले फेर बदल की खूब गुंजाइश है, क्योंकि चुनाव अगले साल होने हैं। ऐसे में सिद्धू और परगट के कौशल की परीक्षा इस चुनौती के साथ है कि सियासत के ‌खेल में न तो कोई थर्ड अंपायर है और न ही इसमें पेनाल्टी कॉर्नर का तोहफा मिलता है। इसमें कुछ खास किस्म का कौशल चाहिए।
सिद्धू हवा में खेलने के शौकीन हैं। हवा में खेलने का खतरा भी है। नवर्स नाइंटीन का शिकार होने के मामले में सिद्धू का रिकार्ड खराब रहा है। मगर वह अमृतसर में भाजपा के लिए शानदार पारी खेलते रहे हैं। अब देखना ह है कि इसबार वह अपने दम पर गेंद जनता तक पहुंचा पाते हैं कि नहीं। आइए इसका इंतजार करते हैं।

Friday, September 2, 2016

बादल और मोदी

सुधीर राघव
सीवरेज तो शहरों में नहीं डाल पाते तो गांवों में कहां से डाल दें।
देश के स्वच्छता अभियान की जमीनी हकीकत बयान करती यह बात पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने जालंधर के आदमपुर इलाके में संगतदर्शन के दौरान साठ गांवों की पंचायतों की मांग पर कही।
प्रकाश सिंह बादल जमीन से जुङी नेताओं की उस पीढ़ी से हैं, जिसने देश को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राजनीति के अपार अनुभवी बादल खरी खरी कहते हैं। उनके खरेपन में भी कङवाहट नहीं होती बल्कि शब्द गुदगुदाते हैं। इस उम्र में भी शब्द चयन में उनका बौद्धिक कौशल आपको विस्मित कर देगा। उनका अनुभव इसलिए भी अपार है, क्योंकि कांग्रेस के दिग्गज नेता भी दो चुनावों में उन पर पार नहीं पा सके हैं।
अब फिर विषय पर लौटते हैं। मोदी जी का स्वच्छता अभियान टीवी चैनलों और अखबारों में जबरदस्त है। उसका कोई मुकाबला नहीं है। मगर धरातल पर यह उस नौटंकी की तरह जिसका पर्दा किसी भी वक्त गिर सकता है। विज्ञापनबाजी से आप भावनाएं तो पैदा कर सकते हैं मगर जरूरी नहीं कि जरूरतभर की अक्ल भी पैदा कर लें। स्वच्छता के लिए आपको ठोस प्लानिंग की जरूरत है। प्लानिंग के मोर्चे पर मोदी जी की अनुभव हीनता साफ झलकती है। उनका सारा वाकचातुर्य धरा रह जाता है। यही वजह है कि जो बात बादल समझ रहे हैं, मोदी उसे नहीं समझ पाते।
स्वच्छता अभियान के नाम पर गांवों में बिना सीवरेज डाले हजारों शौचालय बना दिए गए हैं। छोटे छोटे सैप्टिक टैंक खोदकर, इनके इस्तेमाल पर भी जोर दिया जा रहा है। जब ये सैप्टिक टैंक भर जाएंगे तब क्या होगा। छोटे किसानों और भूमिहीन मजदूरों की वास्तविक आय जिस तरह लगातार कम हो रही है, क्या वे इस स्थिति में हैं कि सैप्टिक टैंकों की नियमित सफाई का खर्च वहन कर सकें। इतना ही नहीं सैप्टिक टैंकों की सफाई के बाद एकत्र मल की भारी मात्रा को गांवों में खुले में फैंके जाने के अलावा और क्या विकल्प होगा। अंतत: यह स्वच्छता अभियान मल खुले में करने की जगह खुले में फैंकने का अभियान ही साबित होगा।
इतना ही नहीं, इस मूर्खतापूर्ण भेङचाल में कई खतरे छुपे हैं। पहले तो लोग गांव से दूर शौच के लिए जाते थे, मगर अब गांवों की गलियों में ये भरे हुए सेफ्टी टैंक बरसात या बाढ़ की सूरत में भयाभय स्थिति बनाएंगे। महामारी फैलाएंगे। रोम की महान सभ्यता भी अपने ही कचरे और मल से उठी महामारियों से लुप्त हुई थी। ऐसा इतिहासकार कहते हैं।
स्वच्छता अभियान को सफल बनाना है तो गांवों में पहले सीवरेज सिस्टम बनाना होगा, उसके बाद शौचालय बनवाए जाएं। विज्ञापन और दिखावा करने का पैसा इस पर खर्च किया जाए। पहले गांवों और शहरों में सीवरेज, ड्रेनेज सिस्टम मजबूत किया जाए, उसके बाद सांसदो, विधायकों का वेतन बढाने की बात हो। मगर मोदी जी से इस तरह की व्यवस्था की उम्मीद कम है, क्योंकि उनके चरित्र में यूरोपीय इतिहास के किशोरवय राजाओं की तरह दिखावा ज्यादा है और अनुभव तथा समझदारी कम। अनुभवी बादल इस बात को समझते हैं और बेहिचक कहते हैं कि शहरो में सीवरेज डाल नहीं पाते, गांवों में कहां से डाल दें।

Tuesday, August 30, 2016

चल संन्यासी

सुधीर राघव
चल संन्यासी विधानसभा में
मंदिर में क्या रखा है
पत्नी बनकर खङा है नेता उससे विवाह रचाएंगे
उसकी चूड़ियां तेरा चिमटा
मिलकर साथ बजाएंगे
जनता को उल्लू बनाएंगे
मियां बीवी की नई व्याख्या
नई रीत चलाएगी ससुराल में जब भी फंक्शन होगा
बीवी 50 लाख दे जाएगी
जनता नगर में रोये मायका
महंगाई बेरोजगारी धक्का है
चल संन्यासी विधानसभा में
मंदिर में क्या रखा है
नेता पत्नी पति संन्यासी
छूटे काबा छूटे काशी
सोच धर्म का क्या होगा
न मिलाई कुंडली गुण राशि
नेता संत सेज सजाएं
तो विकास का होना तय रखा है
चल संन्यासी विधानसभा में
मंदिर में क्या रखा है।।

Monday, August 29, 2016

संघ चरित

सुधीर राघव
कहत भागवत, सुनो अडवानी। अटलराज यह नीति बखानी||
संघकुल रीत सदा चली आई। ढांचा गिरे तो मुकर जाई ||
सरकार बने तो चुप लगाई। नहीं बने तो फिर चिल्लाई ||
संघ मन हिंदू बसिहें ऐसे | सर्पकंठ मुक्तामणि जैसे ||
पुन: पुन: उगल चाटिहें रीति। पीएम बने समझावें नीति ||
मोदी मन नहीं आनि गुसाईं। पाटि पढ़ि जो संघ पढ़ाई ||
जाए पाक चरण पादुका लावा | धन्य भाग्य जो कुर्सी पावा||
तुम हू गए चिल्लाए जिन्हा जिन्हा। पर इक भूल परम यह कीन्हा ||
पीएम बने से पहले गईऊ। और पाक के गुण भी गाईऊ ||
जासु पाप तुम कुर्सी गंवाई | ढलत बुढ़ापे रहा खिसयाई ||
मन की बात बिसार दे, मन ही मन ये विचार।
जो न राष्ट्रपति बनाए गए, का लेओगे उखार ||

Sunday, August 28, 2016

सच्ची बात

संघियों की पूर्ण बहुमत वाली सरकार ने सारे वादे पूरे किए
. अयोध्या में राम मंदिर बन चुका है।
. कश्मीर में 370 हट चुकी है।
. दुनिया की सबसे बङी सरदार पटेल की प्रतिमा लग चुकी है।
. कोई हिंदू बेरोजगार नहीं है।
. पाकिस्तान , चीन और अमेरिका को औकात बता दी गई।
अब बस एक काम बचा है पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान में तिरंगा लहराना 2019 चुनाव में जितवा दो ये दोनों काम भी हो जाएंगे। इस देश में बस संघी ही अपने वचन के पक्के हैं।
संघकुल रीत सदा चली आई
ढांचा गिरे तो मुकर जाई सरकार बने तो चुप लगाई

Saturday, August 27, 2016

कंधे पर लाश

सुधीर राघव
उसने कंधे पर
उठाई अपनी लाश
और निकल पङा
अच्छे दिन की तलाश में
वह चलता गया
मील कोस
अंधेरे से उजाले तक
उजाले से अंधेरे तक
और पहुंच गया
उसी अस्पताल में
जहां से वह उठाकर चला था
अपने कंधे पर अपनी लाश
दरवाजे पर डाक्टरों की भीङ थी
एक एंबुलेंस आकर रुकी
स्ट्रेचर पर लदे नेता के लिए
"इस एंबुलेंस का किराया कौन देगा"
काउंटर पर बैठे कैशियर ने पूछा
सुपरिंटेंडेंट ने झिङका-
"डाल दे पुअर पेशेंट के खाते में
नेता जी ने ही उनके लिए एंबुलेंस फ्री की है"
सामने कंधे पर अपनी
लाश उठाए उठाए
उसे दुनिया गोल नजर आने लगी
वह चक्कर खाकर गिरा
मगर उसकी लाश उस पर
अब भी सवार थी
यह वही पुअर पेशेंट था
जिसके नाम पर पलता है
इस देश का नेता
इस देश का अफसर
अपने दोनों हाथों में
अच्छे दिन लिए।

Monday, August 22, 2016

बेरोजगारी में कच्छा, काम गोरक्षा

सुधीर राघव
यह है देश में युवाशक्ति के विकास की तस्वीर
* वर्ष 2012 ओलंपिक में देश ने 06 मेडल जीते और ओलंपिक 2016 में सिर्फ दो जीत सके। यानी तीन सौ फीसदी की अभूतपूर्व गिरावट।
* युवाओं को रोजगार देने में तो तीन सौ फीसदी की ज्यादा गिरावट आई है। वर्ष 2014 में 4 लाख 93 हजार युवाओं को रोजगार मिला था मगर 2015 में यह संख्या घटकर सिर्फ 1 लाख 35 हजार ही रह गई। ( लेबर ब्यूरो के अनुसार)
नतीजा देश के निर्यात में लगातार जबरदस्त गिरावट। इस साल जुलाई में ही 6.84 फीसदी दर्ज की गई। इस दबाव में रुपया दो साल में डालर के मुकाबले करीब नौ रुपये से ज्यादा कमजोर हुआ।
कारण
लोगों की टैक्स से जमा राजस्व का बङा हिस्सा नमामी गंगे, योगा और सवच्छता अभियानों पर उङाया गया। इन योजनाओं के तहत कोई उत्पादक काम नहीं हुआ। बस विज्ञापनबाजी हुई और सारा पैसा चुनिंदा लोगों को ही गया। युवाओं के विकास, रिसर्च फंड और खेल के फंड तक रोके और काटे गए।
इन बेरोजगार युवाओं को भी लगता है कि कच्छा पहनो, लाठी उठाओ और चांदी कूटो। वे नहीं जानते कि यह कच्छा और लाठी उन्हें विनाश के मार्ग पर ले जा रहे हैं। युवा शक्ति को भ्रमित कर देश को बर्बाद कर रहे हैं।

Saturday, August 20, 2016

पूर्वजों की पहली नदी

सुधीर राघव
सिंधु प्रदेश के निवासी सिंधू ही कहलाएंगे न कि सिंधु। सिंधु तो प्रदेश हुआ और निवासी सिंधू।
आधुनिक उच्चारण हिंदू, जिस पर इरानी प्रभाव है, उसका मूल आर्यावर्त उच्चारण रूप सिंधू ही बनेगा।
वैसे प्राचीनकाल में सिंधु निवासियों के लिए भारतीय क्षेत्र में सैंधव का उल्लेख मिलता है।
अब सिंधी शब्द प्रचलन में है, जो सिंध प्रांतीयों के लिए सीमित है। वैसे सिंध भी सिंधु का अपभ्रंष है।
हिंदू शब्द का पहला उल्लेख इतिहासकारों को ईसा से 400 साल पहले ईरानी शासक दारा प्रथम के शिलालेख में मिलता है। मगर वहां यह सिंधु प्रदेश के लिए है न कि निवासियों के लिए।
इतिहासकार यह भी मानते हैं कि उस काल में भारत का व्यपार मिस्र तक होता था। भारत में बनी इस्पात की तलवारों की वहां खूब मांग थी और इन तलवारों को वहां तब हिंदी कहा जाता था।
अत; हिंदी शब्द का अर्थ भी सिंधु प्रदेश की वस्तु के संदर्भ में था न कि निवासियों के लिए।
समय के साथ शब्दों ने अर्थ बदले हैं। अब सिंधु एक नदी है। सिंधु का उच्चारण देश या प्रदेश के लिए अब कहीं नहीं है। सिंधु घाटी सभ्यता अबशेषों और किताबों में है। पाकिस्तान में सिंध प्रांत है।
मगर भारतवर्ष में सिंधु शब्द की छाप हमारे उपनामों में मौजूद है। पंजाब में संधू, सिद्धू, सोढी, सूद हैं तो अन्य हिस्सों में सिंधी, सिंधू, सिंधिया, सिंदवानी मौजूद हैं।
हम सिंधु से गंगा नदियों के बीच पली बढी और सदूर दक्षिण पूर्व तक फैली सभ्यता के लोग आज भी खुद को गर्व से हिंदू कहते हैं और इस बात पर जोर देते हैं कि यह हिंदू शब्द सिंधु का ही अपभ्रंष है।
गंगा को भले ही मां का दर्जा है मगर पूर्वजों की पहली नदी सिंधु आज भी हमारे जेहन में बहती। ...और हम इस पर गर्व करते हैं।

Friday, August 19, 2016

मुक्ति का महामार्ग

सुधीर राघव
हवाओं का रास्ता कभी तय नहीं होता। दिशा तय नहीं होती। वेग तय नहीं होता। हवाओं की आद्रता तय नहीं होती। हवाओं का बल तय नहीं होता।
मगर तय होता है - हवा को चलना है। निरंतर चलना है। किसी भी रास्ते पर। किसी भी दिशा में। किसी भी वेग से।
उसकी दिशा। उसकी गति। उसका वेग। उसकी नमी। उसका बल। सब सूरज को तय करना है। सूरज की गरमी ही हवा की नियति और उसका भाग्य तय करती है।
हवा गरम होने पर मंद गति से ऊपर उठती है मगर ठंडी होकर अधिक बल और वेग के साथ नीचे आती है।
मृत्युलोक में आत्माओं का भी रास्ता तय नहीं है। आत्माओं की दिशा तय नहीं है। उनकी गति तय नहीं है। उनका बल तय नहीं है। मगर उनका होना और चलना तय है।
आत्माओं का रास्ता, उनकी दिशा, उनका वेग, उनका बल ईश्वर तय करता है।
दुखों से आप्त हो आत्मा अपने ईश्वर की ओर ऊपर उठती है। जितना ऊपर उठती है उतना सुखी होती है। सुख की अनुभूति उसे शीतल करती है। यह ठंडी रुह अध्यात्म से व्यवसाय की ओर मुड़ती है। तेजी से पतित होकर नीचे आती है। अशांत होती है और सबको अशांत करती है।
हवाओं और आत्माओं की मुक्ति उनके ताप से ही तय होगी। इसलिए तपते रहो। तप करो। ...ताकि रुह ठंडी न हो जाए।

Thursday, August 18, 2016

रोहतक की बेटी ने दिलाया रियो में पहला पदक

साक्षी मलिक ने खत्म किया सूखा। http://www.amarujala.com/sports/other-sports/sakshi-malik-creates-history-by-winning-bronze-in-women-wresling

Tuesday, August 9, 2016

आर्यावर्त की खेल नीति

सुधीर राघव
बात बहुत पुरानी है। तब आर्यावर्त में हिंदू हृदय सम्राट का राज था।
यूनान में दुनिया का सबसे बङा खेल आयोजन था। समझो कि आज के ओलंपिक जैसा।
खेल मंत्रालय के नेतृत्व में आमात्य ही खिलाङियों का चयन कर रहे थे। प्रशिक्षक, कोच और गुरुजन कौने में खड़े थे।
तभी एक खिलाड़ी गुस्से से हांफता हुआ पहुंचा और तेज स्वर में बोला- अमात्य आपने मेरा चयन क्यों नहीं किया?
अमात्य ने घूर कर देखा और पूछा - योग जानते हो?
"नहीं!"
"...हूं!! बनारस से हो??"
"नहीं जी! हरियाणा ते हूं!" खिलाङी और खीज गया।
"करनाल से हो?"
"नहीं!"
"रेवाङी से हो?"
"नहीं..!!!! सोनीपत ते हूं@!! के करेगा? खेलना मुझे है, गाम ने के चाटेगा..?"
अमात्य ने शांत स्वर में कहा- देख भाई सोनीपत! तुम्हारा तो शर्मा नहीं खेल पा रहा तो तू क्या खेलेगा??? योग तुझे आता नहीं??? बनारस से तेरा नाता नहीं!! कैसे खेलेगा भाई?"
इतना सुनते ही खिलाङी आपा खो बैठा - शर्मा गया भैंस की पुच्छड़ म्ह.....!!! वर्ल्ड रिकार्ड होल्डर हूं...। मन्ने भेज। गोल्ड न लिआया तो नाम बदल दीये....
अमात्य के इशारे पर आठ दस सिपाही आगे बढ़े और खिलाड़ी को खींच कर ले गए।
अमात्य शांत गंभीर स्वर में बोले - हूं! वर्ल्ड रिकार्ड तो मैं बना रहा हूं। सबसे बङा दल भेजूंगा। 257 में से 250 सिफारिशी। यह रिकार्ड है। ऐसा कभी नहीं हुआ होगा। क्यों हुआ है....?
कहते हैं उस साल पदक तालिका में आर्यावर्त शब्द आखिर में भी नहीं था।।

Thursday, August 4, 2016

चूहों का मानसून सत्र

सुधीर राघव
चूहों ने सुना कि इंसानों ने कोई नया बिल बनाया है। खाने कि तलाश में चूहे जैसे ही बिलों से निकलते, घरों मे घुसते। उन्हें टीवी पर एक ही बात सुनने को मिलती- नया बिल। नया बिल।
इंसानों के नए बिल की बात से चूहे चौकन्ने हो गए। तरह तरह की चर्चाएं होने लगीं। अफवाहें फैलने लगीं। दुखी चूहों ने जंतर मंतर पर सभा बुला ली।
तय दिन। तय समय पर लाखों की संख्या में चूहे मैदान में पहुंच गए। सब चूहे एक जैसे थे मगर उनके बिल अलग अलग घरों में थे। उन्हें अलग अलग न्यूज चैनल देखने को मिलते। इसलिए उनकी एकता में भी अनेकता थी।
सबसे पहले इंडिया टीवी देखने वाला चूहा उठा। उसने सभा को संबोधित किया- साथियो मुद्दे की बात यह है कि इंसान बिल क्यों बनाते हैं? वे घरों में रहते हैं, उन्हे बिल की क्या जरूरत? अगर इंसान बिल बनाएंगे तो हम क्या करेंगे?
जी न्यूज देखने वाला चूहा बीच में ही चिल्लाया-बिलों पर सिर्फ हमारा अधिकार है। इंसानो को बिल नहीं बनाने देंगे! हम जान की बाजी लगा देंगे?
एनडीटीवी देखने वाले चूहे ने उसे टोका- अरे पहले बात को समझो। इंसान रहने के लिए नहीं देश चलाने के लिए बिल बनाते हैं। वे बङी बङी बहस करते हैं। खूब सोच विचार कर एक बिल बनाते हैं। हमारी तरह नहीं जो हर साल लाखों बिल बनाते हैं। उनमें भी सांप घुस आता है और हमें और हमारे बच्चों को खा जाता है। हमें संसद में जाकर देखना चाहिए कि इंसान बिल कैसे बनाते हैं।
आजतक देखने वाले चूहे ने कहा- मगर संसद मे कैसे घुसेंगे? वहां बहुत सिक्योरिटी होती है। वहां सिर्फ सांसद ही जा सकते हैं।
ईटीवी हरियाणा देखने वाले चूहे ने कहा- हम रंग बदलने वाली स्याही की मदद से राज्यसभा में घुस सकते हैं। इस स्याही की एक बोतल एक घर में है।
रंग बदलने वाली स्याही की मदद से सभी चूहे राज्यसभा में घुस गए। मानसून सत्र चल रहा था। लंबी लंबी बहस। नारेबाजी। विरोध और फिर आम सहमति।
राज्यसभा से लौटकर चूहों ने तय किया कि वे भी अब आपसी सहमति से बिल बनाएंगे और देश चलाएंगे।
उस साल चूहों में खूब झगङा हुआ। पहले जहां खामोशी से लाखों बिल बन जाते थे वहीं इस बार आम सहमति से हजार बिल भी नहीं बन सके। चूहों की बड़ी आबादी खुले मे रहने को मजबूर हुई। बिल्लियों, कोओ और सांपों ने खूब दावत उड़ाई। चूहों कि आबादी एक चौथाई भी नहीं बची।
बचे हुए चूहों ने फिर सभा की और तय किया- हम चुपचाप बिल बनाएंगे। देश नहीं चलाएंगे। यह देश चलाना ही सारे झगड़ो, मुसीबतों और भ्रष्टाचार की जड़ है। इंसान देश चलाने कि कोशिश करता है, इसलिए इतना दुखी और झगड़ालू है।

Monday, August 1, 2016

देशद्रोही

इसबार देशद्रोही जयचंद और मीर जाफर के भेस में नहीं बल्कि राष्ट्रवादियों का नकाब पहनकर आए।
उन्होंने पाकिस्तानियों के पांव छुए और अपने ही देश के लोगों को गालियां दीं।
उन्होंने चीन और पाकिस्तान से दोस्ती की तथा वहां की शांति और खुशहाली के भाषण दिए मगर अपने देश में उपद्रव कराए।
इसबार यह धोखा हुआ क्योंकि गद्दारों ने पहन लिए राष्ट्रवाद के चोगे और असली राष्ट्रवादी खामोशी से राष्ट्र को विकास की नई दिशा देकर भी मन से मौन रहे।
रंगा हुआ गीदड़ जब अपने झुंड में पहुंचता है तो उसकी असलीयत सामने आ जाती है। ये देशद्रोही भी जब पाकिस्तान जाते हैं या चीनियों से मिलते हैं तो खुशी से हूकने लगते हैं। दासी की तरह झूला झुलाने लगते हैं। चरणों में लोट लोट जाते हैं।

Monday, July 25, 2016

एसवाईएल का विरोध देशद्रोह

सिंध, जेहलम और चिनाब के पानी से पाकिस्तान के 65 फीसदी हिस्से की सिंचाई होती है। नहरों का जाल बिछा कर पाकिस्तान के पूरे पंजाब प्रांत, खैबर पख्तूनख्वा, सिंध प्रांत के अधिकतर हिस्सों और बलूचिस्तान के पूर्वी हिस्सों तक इन नदियों का पानी पहुंचाया जा रहा है।
वहां कोई नेता विरोध नहीं करता कि पंजाब का पानी खैबर और बलूचिस्तान क्यों जा रहा है।
दूसरी ओर भारत में व्यास और सतलुज का पानी हम उस हरियाणा तक भी नहीं पहुंचा पा रहे जो उस संयुक्त पंजाब का हिस्सा था।
हमारे ही कुछ नेता अपने ही देश के पानी को अपने ही देश के हिस्सों में जाने से रोके हुए, जबकि इस पानी के पाकिस्तान जाने पर उन्हें कोई ऐतराज नहीं है।
एसवाईएल का विरोध मत करो, बल्कि पाकिस्तान जा रहे पानी को देश के सूखे हिस्सों में पहुंचाने की बात करो।
भारत से मिले पानी के दम पर ही पाकिस्तान बासमती चावल पूरी दुनिया को निर्यात करता है। इस पैसे का इस्तेमाल आतंकवाद के रूप में भारत के खिलाफ ही इस्तेमाल करता है। नवाज शरीफ परिवार की की सारी जमींदारी भी भारत से जाने वाले पानी से ही है।

Sunday, July 17, 2016

बाबा का घी दूध का खेल

बाबा रामदेव के अनुसार उनके पास करीब हजार देसी गाय हैं। हर गाय रोज पचास लीटर दूध देती है।
हरिद्वार में बहादराबाद के पास बाबा की घी की फैक्टरी है। इसके बाहर ट्रकों की लाइन लगी रहती है। इनमें घी के पैकेट लोडकर देश के विभिन्न हिस्सों में सप्लाई की जाती है। पिछले दिनों बाबा की अनुमति के बाद हमें इसे देखने का मौका मिला तो पाया कि यहां घी दूध से नहीं बल्कि मक्खन से तैयार होता है। वहां सोनाई और अमूल बटर के ढेरों कार्टून थे। जब कर्मचारियों से पूंछा कि मक्खन कहां से आता है तो किसी ने कहा कि महाराष्ट्र से तो किसी ने कहा कर्नाटक से। हालांकि गुजरात का नाम किसी ने नहीं लिया। इस मक्खन को बङे कंटेनरों में गर्मकर घी बनाया जा रहा था और उसकी पैकिंग पतंजलि के पैक में हो रही थी। साथ ही यह भी बताया कि मक्खन भले अन्य कंपनियों से खरीदा जाता है मगर पतंजलि खुद क्वलिटी चैक करती है।
यह तो हुई घी की कहानी। अब दूध की बात करते हैं। बाबा के अनुसार वह वैज्ञानिकों की मदद से ऐसी देसी गाय तैयार कर रहे हैं, जो पचास किलो दूध देंगी। जब बाबा से पूछा गया कि देसी गाय तो दो-चार किलो दूध ही देती है, तो जीन संवर्धन के बाद भी क्या वह गाय देसी ही रहेगी? बाबा ने इस सवाल को यह कहकर हंसी में उङा दिया कि अगले साल तक एक ऐसी बछिया तुम्हें भी दे देंगे।
बाबा के वैज्ञानिक देसी गायों में संवर्धित गायों के डिंब रखकर नई नस्ल तैयार करेंगे। इसमें कोई खराबी नहीं है। इस तरह पैदा हुई गाय को हम देसी कहें या संकर, यह भी कोई चिंता की बात नहीं।
चिंता की बात निजी स्वामित्व में जैव संवर्धन की प्रोयगशालाएं चलना है। सबसे बङा खतरा यह है कि अमेरिका कब ऐसी प्रयोगशालाओं को जैविक हथियारों की प्रयोगशाला कहकर चढ़ाई कर दे ? कोई ठिकाना नहीं। इराक में वह ऐसा कर चुका है। इसलिए भारत सरकार को सभी पहलुओं पर विचार करना चाहिए।
बाबा की अपनी ट्रांसपोर्ट भी है, जिसमें करीब सौ ट्रक बताए जाते हैं।

Thursday, July 14, 2016

संघियों की सरकारें और अलगाववाद

सुधीर राघव
जब भी संघ से जुङे लोग सत्ता में आते हैं अलगाववादी ताकतें मजबूत होती देखी गई हैं।
मार्च 1977 में जनसंघ और क्षेत्रीय पार्टियों से मिलकर मोरारजी के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। यह जुलाई 1979 तक रही। असल में यही वह काल था जब भिंडरावाले पंजाब में सबसे प्रभावशाली लीडर बनकर उभरा। उसके बाद पंजाब में शुरू हुए आतंकवाद के काले दौर में बीस साल में 30000 से ज्यादा लोग मारे गए।
दिसंबर 1989 में भाजपा के समर्थन से वीपी सिंह सरकार बनी और गृहमंत्री मुफ्ती की बेटी रूबीया सईद का अपहरण कांड हुआ। पंजाब के बाद कश्मीर में भी आतंकवाद बङी समस्या बन गया।
1998 में अटल जी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। कारगिल की चोटियों पर पाकिस्तानी सेना का कब्जा करवा दिया गया। देश के जवानों ने अपनी जान देकर 2001 में करगिल की चोटियों से पाकिस्तानी फौज को खदेङा। अब मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा सरकार है और कश्मीर समस्या और विकट हो गई है। हरबार संघ से निकले लोगों से जुङी सरकार? क्या यह सिर्फ इत्तिफाक है??

Tuesday, July 12, 2016

श्री श्री ने योग के लिए नया क्या किया : रामदेव

बाबा रामदेव का एक बङा सवाल है कि यह श्री श्री योगा, आयंगर योगा, फलाना योगा क्या है? मैंने भी योग किया पर उसे अपना नाम नहीं दिया, ऋषि का नाम दिया।
पत्रकारों के सामने बाबा ने यह रहस्य भी बताया कि उन्होंने अकेले में एक बार श्री श्री से सवाल भी किया कि योगा के लिए आपने नया क्या किया है जो उसे अलग नाम दे दिया।
बाबा की बात पर हैरत नहीं होनी चाहिए। कुल मिलाकर योग के बाजार में कङा कंपटीशन है। जब आप लंगोटी टांगकर बाजार में उतर जाते हैं तो फिर बाजार आप से अपनी भाषा ही बुलवाता है।
बाबा भले ही योगी हैं मगर राजनीति की बारीकियां न केवल खूब समझते हैं, बल्कि उन्हें खुद गढ़ना भी जानते हैं। जमीन से जुङे तमाम विवादों के बाद भी हिमाचल के सीएम वीरभद्र को बाबा एक भद्र पुरुष ही मानते हैं। साथ ही कहते हैं कि मैया का डंडा है। जैसा मैया चाहती है वीरभद्र वैसा ही करते हैं। मैया की जङें इटली में हैं। वह भारत के लिए भारतीयों की तरह नहीं सोच सकतीं। इसमें उसका दोष नहीं। हम भारतीय भी जब दूसरे देश में जाते हैं तो वहां रह रहे भारतीय भी भारत माता की जय ही बोलते है। यह गुण बीज में है।

जयचंद और मोदी

सुधीर राघव
इतिहासकार कहते है कि जयचंद ने मित्रता के नाम पर मोहम्मद गौरी के चरणों में शीश नवाया था।
मोदी जी ने मोहम्मद शरीफ की गोरी के चरणों में शीश नवाया। (मोहम्मद शरीफ पाक पीएम नवाज के पिता)
जयचंद देश को पृथ्वी राज चौहान से मुक्त करना चाहता था।
मोदी देश को कांग्रेस से मुक्त करना चाहते हैं।
तराइन के आखिरी युद्ध में जब राजपूत सैनानी मारे जा रहे थे, कहते हैं जयचंद जश्न मना रहा था।
आज जब कश्मीर में हमारे सुरक्षा बलों और अमरनाथ यात्रियों पर हमले किए जा रहे हैं तो मोदी अफ्रीका में नगाड़े बजा रहे हैं।
जयचंद को नालायक और देशद्रोही तक कहा जाता है।
मोदी जी नायक और देशभक्त हैं।
निष्कर्ष : वक्त के साथ लोगों के विचार और मानक बदलते हैं।

Monday, July 11, 2016

पतंजलि : अब वैद्य बाबा नहीं, डॉक्टर बाबा ही कहना

सुधीर राघव
क्या आयुर्वेद और ऐलोपैथ का मूल फर्क खत्म कर देंगे बाबा?
जिनका जड़ी बूटियों के इलाज पर विश्वास है, उनके लिए अच्छी खबर यह है कि अब यह विज्ञान प्रमाणित भी होगा।
पतंजलि की ओर से हरिद्वार में बहादराबाद के पास अनुसंधान केंद्र स्थापित किया जा रहा है। बाबा रामदेव के अनुसारभविष्य में यहां देसी दवाओं को बाजार में उतारने से पहले उनके एलिमेंटरी और कंटेंट टेस्ट होंगे। पत्रकारों के आग्रह पर गत शनिवार बाबा ने इस निर्माणाधीन केंद्र को देखने की इजाजत भी दी और प्रबंध भी कराया।
इस केंद्र में वैज्ञानिक खरगोश आदि जीवों पर पहले परीक्षण करेंगे और उसमें सफल रहने पर और सभी चरण पूरे करने के बाद दवा मरीज को दी जाएगी।
यह एक सराहनीय कदम है। मगर इससे आयुर्वेद और एलोपैथ का बेसिक फर्क खत्म हो जाएगा। इस तरह बाबा अब वैद्य से डॉक्टर हो जाएंगे।
एलोपैथ और आयुर्वेद सहित सभी प्राच्य विद्याओं में मूल फर्क यही है कि जहां प्राच्य विद्याओं में अनुभव के आधार पर चयनित जड़ी या रसायन को उपचार के लिए सीधे इस्तेमाल कर लिया जाता है, वहीं एलोपैथ में पेङ पोधे या रसायन में मौजूद कारगर तत्व की पहचानकर और उसे अलग कर तमाम परीक्षणों के बाद दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
इस प्रक्रिया ने ही एलोपैथ की सफलता दर बढ़ाई और इसे दुनिया में लोकप्रिय बनाया। जहां तक बात कैमिकल की है तो रसायन का इस्तेमाल आयुर्वेद में भी होता है। आयुर्वेद में और एलोपैथ में मूल फर्क परीक्षण और तत्व शोधन का ही था और बाबा भविष्य में दोनों के बीच के इस अंतर को बहुत कम कर देने वाले हैं।
ऐसे में कुछ परंपरावादी लोग सवाल और विवाद कर सकते हैं मगर यह तय है कि यह प्रक्रिया अपनाने से विदेशों और वैज्ञानिक सोच रखने वालों के बीच बाबा की दवाओं की स्वीकार्यता बढ़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
हलांकि जड़ी बूटियों की घुटाई करने वाले हमपेशेवर अन्य बाबा भविष्य में ऐसे सवाल भी उठा सकते हैं कि पतंजलि की परीक्षित दवाओं को आयुर्वेदिक मानें या एलोपैथिक।

Thursday, July 7, 2016

कपड़ा

सुधीर राघव
... जी! सुनते हो ???"
....हूं????
...तुमने मेरी पढ़ाई क्यों छुड़वा दी।
...सारा दिन बेमतलब की किताब लिए बैठी रहती थीं। पूरे घर में कांय कांय मची रहती थी। जानती हो पिछली बार मैं अमेरिका गया तो बैग में एक भी कुर्ता नहीं था। सिर्फ पैजामे पैजामे ही थे। बङी फजीहत हुई। सोचा उस काले कोटवाले दोस्त से मांग लूंगा मगर उसके पास एक भी कुर्ता नहीं था। वह तो कुर्ता पहनता ही नहीं।
..... तो तुम उससे कोट पैंट मांग लेते!!!!
....ए!!!! कोट का नाम नहीं लेना!!! एकदम नहीं!!! चौदह चौदह लाख का कोट आता है। पहन लो तो लोग हालत खराब कर देते हैं। ....एक कुर्ते से तीन दिन काटे। शाम को धोता और सुबह पहनता।
...सॉरी।
...सॉरी-वॉरी कुछ नहीं। पढ़ाई छोड़ो अब कपड़े-लत्ते संभालो। और सुनो! हमें अफ्रीका जाना है। हमारा बैग तैयार कर देना। इसबार कपड़े सब बरोबर हों। हां.....।
....तो मेरी किताबों का क्या होगा???
...उन्हें तुम अपने बड़े भाई को दे दो।

Tuesday, July 5, 2016

वक्त

यह कथित धार्मिक आतंकवाद के खिलाफ इंसानों के उठ खड़े होने का वक्त है।
यह कहने का वक्त है - आतंकवादियो! तुम अपनी आयतें और मस्जिदें संभालों, सिर्फ इन पर कब्जाकर तुम खुदा के बंदे नहीं हो जाओगे। हमें खुदा की इबादत करनी आती है। ढाका में जो फराज हुसैन ने किया, वही खुदा की इबादत है, न कि जो तुमने किया।
यह कहने का वक्त है - आतंकवादियो! तुम अपनी गाय, अपने मंदिर संभालो, इन पर कब्जा कर लेने भर से तुम भगवान के भक्त नहीं हो जाते। किसी को पीट पीटकर मारना भगवान की पूजा नहीं है। भगवान की पूजा है, मंदिर के बाहर बैठे भूखे लाचारों को भोजन कराना।
यह कहने का वक्त है- आतंकवादियो! तुम अपने चर्च और इस्रायल संभालो। गाजा और इराक में खून बहाकर तुम ईसा के बंदे नहीं होते। ईसा की बंदगी है सबसे प्रेम करना।

Saturday, July 2, 2016

नार्कोटेररिज्म

सुधीर राघव
मध्य प्रदेश और राजस्थान अफीम और चूरापोस्त के लिए बदनाम हैं। पंजाब में जितनी भी भुक्की और अफीम पकङी जाती है वह इन्हीं राज्यों से लाई बताई जाती है।
पंजाब में पिछले छह सात सालों से सीमा पार से हेरोइन आदि की सप्लाई और युवा पीढी बर्वाद हो रही है। खेलों में धाक जमाने वाले हरियाणा में भी एक साल में ड्रग्स का नशा बढने की बात सामने आ रही है।
क्यो यह नार्को पोलटिक्स है? क्या इन सभी राज्यों में किसी एक पार्टी का प्रभाव बढा है? क्या युवाओं को अपने साथ जोङने या अपना गुलाम बनाने के लिए कोई राजनीतिक दल गलत तरीके अपना रहा हैं?
क्या नशा और आतंक सप्लाई कर रहे पाकिस्तान से मित्रता करने के लिए कोई राजनीतिक दल बार बार गिङगिडा रहा है?

Friday, July 1, 2016

तेजस का तेज

सुधीर राघव
1980 में मिग-21 की जगह लेने के लिए स्वदेशी लाइट कोम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA) प्रोग्राम शुरू किया गया। वर्ष 2003 में अटल सरकार ने इस प्रोग्राम का नाम बदलकर तेजस कर दिया। तेजस अब वायुसेना का हिस्सा बन गया है। इसे आज नारियल फोङकर उङया गया।
असल में 1969 में स्वदेशी लङाकू विमान बनाने का फैसला ले लिया गया था और हिंदुस्तान एयरोनोटिकल लिमटेड की स्थापना की गई। 1975 तक इसने देश की जरूरत के हिसाब से देसी स्वदेशी इंजन के लिए अध्ययन किया। LCA प्रोग्राम को सपोर्ट देने के लिए 1984 में एयरोनोटिकल डवलपमेंट एजेंसी बनाई गई, इसकी देशभर में सौ के करीब डिफैंस लेबोटरीज बनाई गईं। इसके लिए मल्टी फंक्शनल डिस्पले और कुछ अन्य पुर्जे लेने के लिए फ्रांस और इस्राइल की कंपनियों से अनुबंध किया गया।
मगर 1998 में अटल सरकार के परमाणु परीक्षण कर देने से भारत पर प्रतिबंध लग गए और फ्रांस और इस्राइल से आपूर्ति रुक गई। कार्यक्रम ही लटक गया। बाद में प्रतिबंध हटने पर अटल सरकार ने इसे तेजस नाम से शुरू किया।
जो आज नारियल फोङ रहे हैं उनका सामान्य ज्ञान इतना तो होना ही चाहिए कि जानें पिछले साठ साल से देश में इतना कुछ हुआ है कि उसपर आप आज तक नारियल फोङ रहे हैं।
हमारे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई।

Tuesday, June 28, 2016

शाखा बाबू हिम्मत दिखाओ

सुधीर राघव
सुनो शाखा बाबू ! ये तुम जो आधे अधूरे फैसले लेते हो न इससे कुछ नहीं होने वाला।
एनएसजी पर विरोध के बाद जो तुमने चीनी दुग्ध उत्पादों पर प्रतिबंध लगाया है, इससे क्या होगा शाखा बाबू? तुम्हे लगता है कि इससे चीन डर जाएगा और हमारा समर्थन कर देगा।
नहीं शाखा बाबू। नहीं। इससे कुछ नहीं होगा। बल्कि चीन इससे खुश होगा कि मेरे विरोध पर बस इतना ही कर सका भारत।
आज तो हालत यह है कि देश के खेल उद्योग, खिलौना उद्योग, लघु उद्योग, मझौले उद्योग। सबको चीन चौपट कर रहा है। और तो और अब तो हमारे आम भी चीन से मंगाई एसिटिलीन से पकते हैं। साठ साल से आजमाए जा रहे शुद्ध भारतीय तरीके कार्बाइड को तुमने झूला झुलाते झुलाते प्रतिबंधित कर दिया। अरबों डालर भारत से चीन जा रहा है।
शाखा बाबू। मौका है तुम्हारे पास। चीन के विरोध का जवाब देते हुए चीन से आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दो। इससे देश के उद्योग में नई जान आ जाएगी और चीन भी घुटनों पर आ जाएगा। विशाल आबादी वाला एक बङा बाजार हाथ से निकलते ही ससुरा चीन मंदी से मर जाएगा या फिर हमारी शर्तें मानेगा।
शाखा बाबू। चीन की अक्ल ठिकाने लाने का असली तरीका तो यही है मगर इससे आपूर्ति घटने पर महंगाई बढ़ सकती है। वह तो तुम्हारे काला बाजारी दोस्त अब भी बढाए हुए हैं। इसलिए जनता सह ही लेगी।
नहीं तो दूसरा तरीका भी है। यह तुम पहलाज निहलानी और अनुपम खेर से सीखो। पाकिस्तान की तरह ही चीन का चमचा बन जाओ। दोस्त दोस्त कहते हुए हर महीने जाओ आओ। मगर चीन इसके लिए जमीन मांगेगा तो पाकिस्तान का उत्तरी हिस्सा जीतकर डवलपमेंट के लिए चीन को दे दो।
शाखा बाबू। बस यही दो रास्ते हैं। तुम इनमें से किस एक को चुनने की हिम्मत दिखा पाओगे।