Saturday, November 21, 2015

चालुओं का दौर

ये मोदियों का दौर है
ये लालुओं का दौर है
शर्म शराफत बेच डाली
ये चालुओं का दौर है
शेर सारे फंस गए
शिकारियों के जाल में
गीदङों की लॉटरी
ये भालुओं का दौर है
दाल शाक छोङिए
कर्ज से सिर फोङिए
बाबा का ये बाजार है
ये आलुओं का दौर है
लवों को सिल लीजिए
कलम को चिल कीजिए
जुबान अपनी भींच लो
ये तालुओं का दौर है
सपनों की दुकान है
हवा में मकान है
सीमेंट जैसा कुछ नहीं
ये बालुओं का दौर है
हवा में दिल उछालकर
अपना काम निकालकर
बात पर डटो नहीं
ये टालुओं का दौर है
रोटी मिली या भूखे रहे
मजदूर से मत पूछिए
जमाखोर ही कमा रहा
ये ठालुओं का दौर है
ये मोदियों का दौर है
ये लालुओं का दौर है
-सुधीर राघव

Friday, October 16, 2015

लेखकों के सुर

Sudhir Raghav साहित्य समाज का आईना है तो साहित्यकार सुर। नेता गण खुशी से उछल रहे हैं, क्योंकि लेखकों की जमात से अलग-अलग सुर उठ रहे हैं। नेताओं की जमात में कुछ अभिनेता भी शामिल हैं। वे नहीं जानते कि सुर अलग हैं, इसलिए साहित्य समाज का दर्पण है। नहीं तो साहित्य भी एक राजनीतिक पार्टी होता, जिसमें सब एक हाईकमान के इशारे पर बोलते। जहां बातें भी शतरंज की तय गोटियों की तरह आगे बढ़तीं और रुख भांप कर रोलबैक हो जातीं। अच्छा है क‌ि साह‌ित्य दर्पण है कोई पार्टी नहीं।
देश का हाल क‌िसी छुपा नहीं। स्वच्छता अभियान के सभी विज्ञापनों और ढिंढोरों के बावजूद कट्टरपन की बास लगातार बढ़ रही थी। लेखकों को निशाना बनाया जा रहा था। अगस्त के अंत में एमएम कालबुर्गी की हत्या के बाद दादरी कांड झकझोरने के लिए काफी था। प्रधानमंत्री की चुप्पी से यह गलत संकेत निकल रहे थे कि देश में कट्टरपंथी तत्वों को छूट दी जा रही है।
सरकार पत्थर सी संवेदनहीन नजर आ रही थी। इस हादसे को देखकर संवेदनाएं भी डरकर पत्थर होतीं उससे पहले कुछ लेखक और कवि जाग उठे। वे नेता होते तो धरना देते, जाम लगाते, संसद में हगामा करते। गुट बनाते और सड़कों पर निकल जाते। जबरन दुकाने और बाजार बंद करवाते। मगर नहीं। ये कलम के सिपाही तो खुद ही सेना थे और खुद ही कमांडर। एक ने साह‌ित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया और कहा-मौजूद माहौल में मेरा दम घुटता है, मैं विरोध दर्ज कराता हूं।
इस पुरस्कार का सरकार से कोई लेना देना नहीं होता। स्वायत्त संस्था इसे देती है, मगर विरोध दर्ज कोई भी तरीका हो सकता है। कुछ उदंड टाइप के लोग दूसरों का मुहं पर स्याही पोतने को विरोध दर्ज करना कह सकते हैं तो लेखकों का यह तरीका तो बहुत ही शालीन था। एक के बाद एक पच्चीस लोगों ने अपने सम्मान लौटाए तो सोई सरकार की आंखें खुलीं। जैसे राम के पांव की हल्की सी ठोकर से पत्थर की अहिल्या नारी बन गई हो। प्रधानमंत्री ने एक पत्रिका को तत्काल साक्षात्कार दिया- दादरी और गुलाम अली से जुड़ी घटनाओं पर दुख प्रकट किया। वित्तमंत्री अरुण जेटली उतरे तो लेखकों के कदम की निंदा करने मगर उन्हें भी कहना पड़ा की दादरी कांड और कालबुर्गी की हत्या जैसे मामले निंदनीय हैं।
इन लेखकों के कदम का कुछ लेखक भी विरोध कर रहे हैं। समाज में जितने भी संभव विचार होते हैं अगर वे लेखकों में न दिखें तो लेखक पूरे समाज के प्रत‌िनिधि कैसे होंगे। शाशक जब राजधर्म भूल जाए तो उसे कौन याद द‌िलाए? यह सवाल अहम है। इस बार इसका जवाब द‌िया हैं देश के लेखक और कवियों ने। सरकार की चुप्पी टूट चुकी है। देश से भय का माहौल छंट रहा है। ये 25 लेखक समाज के 25 मुक्ते साब‌ित हुए। ऐसे मुक्तामण‌ि, जिसकी रोशनी फिर देश को भाईचारे की रोशनी द‌िखा रही है। इनका यह कदम उन नेताओं के ल‌िए भी सबक है, जो विरोध के नाम पर रास्ते जाम करते हैं, रेलें रोकते हैं, तोड़फोड़ करते हैं, लोगों को परेशान करते हैं और नतीजा तबाही के और कुछ नहीं होता। विरोध करने का वह तरीका ‌जिससे किसी का कोई नुकसान नहीं है मगर उसका असर देखिए क‌ि चुप्पी साधे बैठी एक शक्त‌िशाली सरकार को अपना मुंह खोलना पड़ा है।

Saturday, October 3, 2015

महंगाई का गणित तो समझ लें

सरकार दावा कर रही है कि महंगाई काबू में है। देश में थोक मूल्य सूचकांक निगेटिव ट्रेंड में है। इसे मानते हुए आरबीआई ने भी रेपो रेट में कटौती की है। दूसरी ओर महंगाई कम होने के लक्षण खुले बाजार में कहीं नहीं दिख रहे। आम आदमी को राहत कोई नहीं मिल रही। तब यह सारा खेल क्या है? इसका गणित क्या है?
आओ इस गणित को समझते हैं। उद्हारण के लिए बासमती चावल को लेते हैं। यह चावल बाजार में 100 रुपये से 190 रुपये किलो तक के रेट में मिल रहा है। हरियाणा में पिछले सीजन में बासमती धान किसानों से 2300 से 2700 रुपये क्विंटल के बीच खरीदा गया। जबक‌ि इससे एक साल पहले 2013 में धान के सीजन में यह 5500 रुपये क्विंटल तक बिका था। किसानों से धान का खरीद रेट आधा रहा जबकि बाजार में चावल के रेट में कोई फर्क नहीं पड़ा। इस तरह किसानों से खरीद मूल्य के आधार पर थोक मूल्य में 50 फीसदी की ‌निगेट‌िव दर रही। इसमें किसान तो बर्बाद हुए मगर आम आदमी को चावल उसी रेट में मिला और उसे महंगाई से कोई राहत नहीं मिली। सिर्फ धान ही नहीं सभी दालों, प्याज और कृषि उत्पादों में यही खेल चल रहा है। किसान की फसल आते ही बाजार में दाम तेजी से गिरते हैं। लागत भी न मिलने से किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहे हैं। एक दाल में 3300 करोड़ का घोटला हर माह
इसी तरह अरहर की दाल 150 से 160 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खुले बाजार में बिक रही है। सीजन में किसानों से यह 29 रुपये किलो तक खरीदी गई थी। यानी हर किलो पर 130 रुपये अतिरिक्त लिए जा रहे हैं। यह मान भी लिया जाए कि प्रत‌ि किलो दाल पर प्रोसेस‌िंग, ट्रांसपोर्ट आद‌ि का खर्च 25 से 30 रुपये है तो भी हर किलो पर 100 रुपये का मुनाफा बिचौलिए खा रहे हैं। यद‌ि यह मान लिया जाए क‌ि चार सदस्यों का पर‌िवार एक माह में एक किलो दाल खा लेता है तो पूरे देश में हर महीने करीब 3300 करोड़ रुपये का मुनाफा नेता और बिचौल‌िए मिलकर खा रहे हैं। यह पैसा देश के खजाने से होकर नहीं जनता की जेब से सीधे निकाला जा रहा है। इसलिए कैग की रिपोर्ट इस घोटाले को नहीं पकड़ेगी। कोई भी सरकार आंख मूंद कर व्यापारियों को इतना मोटा मुनाफा खाने नहीं दे सकती। जाहिर है कि नेताओं को इसका बड़ा हिस्सा मिल रहा है और इसल‌िए ही वे आंखें मूंदे हैं। अगर सभी दालों, तिलहन आदि का यह खेल जोड़ लिया जाए तो यह घोटाला साल में खरबों रुपये में पहुंच जाएगा। जाहिर है यह पैसा देश के विकास में खर्च नहीं हो रहा। इससे विदेशों में तमाशे किए जा रहे हैं।
अब आम लोगों को एक ओर चोट यह पड़ने वाली है कि रेपो रेट घटने के बाद बैंकों ने बचत खातों पर भी ब्याज दर घटानी शुरू कर दी है। इससे लोगों को अपनी बचत पर भी लाभ कम होगा।

Tuesday, September 8, 2015

कालबुर्गी, जो जिंदा है

Sudhir Raghav
हाथ में धर्म की बंदूक लिए
अधर्मियों के अनपढ़ गंवार काफिले
उतर चुके हैं सड़कों पर
हर तर्क की हत्या पर उतारू यह भीड़
बुद्धि को संखिया देकर
सुन्न करती है
ताकि सवालों को हो जाए लकवा
और भक्त संज्ञा शून्य सा
नतमस्तक रहे
आसाराम के नाच से
राधे मां की स्कर्ट तक
वे चाहते हैं कि
मस्तक लुप्त हो जाएं
रह जाएं सिर्फ लिंग और यौनी
जिन्हें वे आदेश दे सकें
पांच बच्चे पैदा करो
दस बच्चे पैदा करो
बस बच्चे पैदा करते रहो
दुनिया में ऐसे धर्म
कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ रहे हैं
जो तप और ज्ञान से नहीं
भोग और बंदूक से चल रहे हैं
वे मार डालेंगे
हर उस कालबुर्गी को
जिसमें इंसानीयत और सोच जिंदा है।
हाथ में धर्म की बंदूक लिए
अधर्मियों के अनपढ़ गंवार काफिले
उतर चुके हैं सड़कों पर।

Sunday, August 23, 2015

पाकी

सरहद के पार वो नफरत उगाते हैं
अमन के पैगाम पर आंखें दिखाते हैं
हमारी दुश्मनी कुछ इतनी पुरानी है
दोस्ती की बात पर हम मुंह की खाते हैं
मुखौटों में मोहब्बत हो नहीं सकती
इतने फ़रेबी हैं कहां चेहरा दिखाते है
लड़ाइयों और तबाहियों में नहीं आए
मजे तो यार गलबाहियों में ही आते हैं
- सुधीर राघव

Sunday, August 9, 2015

मोदी की गजेंद्रगीरी

कुछ लोग खुद को महान साबित करने के लिए उन लोगों पर ही अत्याचार करते हैं जो उन्हें प्रेम करते हैं। पत्नी प्रेम करे तो उसे छोड़ देते हैं। इस वाहवाही के लिए किे देखिए देश के लिए या मां के लिए पत्नी को छोड़ दिया।
न्याय पाने के लिए जिस तरह गांधीगीरी की जाती है ठीक उसके विपरीत जनता को सताने के लिए गजेंद्रगीरी की जाती है। गजेंद्रगीरी का अर्ध है कि जनता को सताने के लिए उस पर अयोग्य लोगों को थोपना।
इस गजेंद्रगीरी की खोज का श्रेय मोदी जी को जाता है। जनता ने चुनाव में उन पर भरपूर प्रेम लुटाया। प्रेम का बदला वह सता कर चुका रहे हैं , क्योंकि उनका यह भ्रम पुख्ता है कि प्रेम करने वाले को सताने पर ही हमारे समाज में वाह-वाही मिलती है।
सबसे पहली गजेंद्रगीरी तो उन्होंने यह की कि वकील बाबू को वित्तमंत्री बना दिया। कच्चे तेल और सोने के दाम इंटरनेशनल मार्केट में जमीन पर हैं। जेटली से पहले शायद ही किसी वित्तमंत्री को इतना अनुकूल आर्थिक ट्रेंड मिला हो। मगर जनाब जानते ही नहीं कि उन्हें क्या क्या फैसले करने हैं कि देश को इस अवसर का भरपूर लाभ मिले। अपनी इस अज्ञानता की कुढ़न RBI गवर्नर पर निकाल रहे हैं। गवर्नर इशारों में समझा रहे हैं कि क्या करना है। मगर समझ हो तो समझें।
जेटली को वित्तमंत्री बनाकर मोदी जी न सिर्फ जनता बल्कि पूरे देश से बदला लिया है। सबसे अनुकूल माहोल हम गंवा रहे हैं।
जिस सेनापति को फौज संभालने और देश की सुरक्षा संबंधी सारी जानकारियां हैं उन्हें खुड्डे लाइन लगाकर सबसे शरीफ माने जाते नेता को रक्षामंत्रालय सौंप दिया। पाकिस्तान रह रहकर आंखें दिखा रहा है और जनाब अपने शराफत के खोल से ही बहार नहीं आ रहे। जब समझ न आए कि क्या करना है तब आदमी सबसे शरीफ नजर आता है।
मोदी जी की गजेंद्रगीरी के इतने उदाहरण है कि लिखने बैठो तो किताब भर जाए। सब आपके सामने हैं। इसलिए थोड़े लिखे को ज्यादा समझना।

Thursday, July 30, 2015

एक हैं कलाम

Sudhir Raghav
उसने मशीनी बाज बनाए
और भर दिया खौफ उन गिद्धों की आंखों में
जिनकी बुरी नजर थी हमारी सरहद पर
उसने उदंड परमाणुओं को नकेल डाली
और अंधा कर दिया उन कैमरे सी आंखों को
जो आकाश में किसी गैर की जासूस थीं
वो गरीब का बेटा था
और उसने अपने लिए कोई एंटीलिया नहीं बनवाया
मगर इतना दे गया कि देश की झोली भरी रहेगी
उसका दिमाग दिन-रात काम करता रहा
और आदर्श पत्नी सा दिल पूरी देह को संभाले रहा
मगर कल उसने कहा, चल दो घड़ी आराम करते हैं
कलाम जो रास्ता बना रहा
कलाम जो रास्ता दिखा रहा
कलाम जो महानायक है
कलाम जो मेरे-तेर आंसुओं में है
कलाम जो देश की उड़ान में हैं
कलाम जो बच्चे बच्चे के ध्यान में है
यह खबर झूठ है कि कलाम नहीं रहे। - सुधीर राघव

Wednesday, July 22, 2015

सरकार का संदेश


सरकार का संदेश साफ हैं, किसानो! तुम अपनी जमीन उद्योगपतियों को दे दो गेहूं तो हम आस्ट्रेलिया से मंगवा लेंगे किसान या तो मानेगा या उसे मजबूर कर देंगे इसके लिए कूद पड़े हैं बाजार के बड़े खिलाड़ी अपने अकूत भंडार गृह और मॉल लेकर किसान का आलू एक रुपया किलो खरीदेंगे भंडार का आलू 30 रुपये किलो बेचेंगे ताकि दुखी किसान आलू बोना छोड़ दें सरकार की नीति साफ है किसानो! तुम अपनी जमीन उद्योगपतियों को दे दो आलू तो हम पाकिस्तान से मंगा लेंगे किसान का बासमति 22 रुपये किलो खरीदेंगे ब्रांड का चावल 150 रुपये किलो बेचेंगे किसान का बीज भी नहीं पुगेगा कब तक फंदा बुनेगा सरकार की नीति साफ है किसानो! तुम अपनी जमीन उद्योगपतियों को दे दो चावल तो हम चीन से मंगवा लेंगे किसान अपने सूखे खेत की तरफ देखता है खेत में उसकी फसल नहीं नेता की सफेद दाढीं नाच रही है जिसे उद्योगपति चांदी की तरह काट रहा है नेता खिलाखिला कर हंस रहा है किसान फंदे से झूल जाता है खबर चलती है-कर्ज से दबे किसान ने जान दी जबकि खबर यह थी कि देश की दाढ़ी में गैर का हाथ देख किसान शर्म से मर गया और बेशर्म नेता उसी हाथ को अपनी पीठ पर फिरवा रहा है मुस्कुरा रहा है। - सुधीर राघव

Saturday, July 18, 2015

चमक उठी गंजी सी चांद

अच्छे दिन तो खुजली निकले चमक उठी गंजी सी चांद रात अमावस काठ का उल्लू दिखा रहा था सबको चांद दाढ़ी ने दाढ़ी रंगवाकर खूब बटोरा भइया माल शेर ढूंढने जहां गए सब वो निकली गीदड़ की मांद कालेधन की काली माया जिसने खाया गाल बजाया पच्चीस साल का राग सुनाकर तोड़ दिया रे सब्र का बांध राघव कहता सीधी बात कंधे पर सब रख लो लात राजनीत का गंदा नाला उछल सके तो उछल के फांद लिख रहे हैं चिट्ठियां कुछ संघियों से तंग संघी लिख रहे हैं चिट्ठियां सरकार ये सुनती नहीं सब तल रहे हैं मट्ठियां सच जलेगा पर तपेगा और निखरेगा अब नहीं चूल्हे जले इस शर्त पर और बुझ गईं सब भट्टियां खिलखिलाता मुस्कुराता इक नवजात घोटाला मानो पिला दीं गईं उसे सरकारी मुगली घुट्टियां दर्द उसका कह रहा जख्म जो गहरे में सड़ रहा राघव खोल दो उम्मीद की ये झूठी मरहम पट्टियां

Sunday, June 21, 2015

भागमत गीता

Sudhir Raghav
लोकतंत्र के सिंहासन पर बैठी नेत्रहीन जनता को मीडिया ने योग दिवस का हाल भली प्रकार सुनाया-
मीडिया उवाच : राजक्षेत्रे योगक्षेत्रे। हे राजन! भारी भरकम जीत से हर्षित आपके प्रिय मोदी की 21 अक्षोणी सेना योग के लिए तैयार है।
सबसे पहले मोदी ने भाषण नामक योग किया। इसको सुनकर सबके हाथपांव इठने लगे और वे भांति भांति के योग करने लगे।
बाबा ने टैक्स बचाऊ योग किया और उनके कंपनी कौशल पर सरकार ने ताली पीटी।
ललित मोदी ने ब्लैकमनी योग किया और नोट उड़ उड़ कर मंत्रियों-संतरियों की ओर आने लगे।
सुषमा ने ललित मोदी खुश योग किया। इसके करते ही वह संकट में फंस गईं । पूरी पार्टी उन्हें बचाने दौड़ी।
वसुंधरा ने ललित से पुत्र कमाउ योग किया। इस योग से पुत्र धन संपदा से संपन्न हुआ।
आडवाणी जी ने कंपकपी योग किया। इमरजेंसी के भय से सब भयभीत हो गए।
गडकरी ने ई-रिक्शा योग किया मगर बिना हेलमेट पकड़े गए।
हे! राजन! अमितशाह ने दिल्ली हराऊ नामक योग किया, जिससे घबराकर तुम्हारे प्रिय मोदी अब देश से बाहर ही रहते हैं।
जेटली ने मध्यम वर्ग बोझ मरे नामक योग किया। इसके बाद से किसानों और आमजन की आत्महत्या का सिलसिला जारी है।
हे! राजन! नेताओं के ये नाना प्रकार के योग देख पब्लिक का धैर्य जवाब देने लगा। एक गीता नामक महिला वहां से भाग छूटी। यह देखकर तुम्हारे प्रिय मोदी ने कहा-
मोदी उवाच : कर्मक्षेत्रे योगक्षेत्रे। हे गीता! भागमत। तू भी योग कर। तेरे लिए नाना प्रकार के योग हैं। तू पेट से पट्टी बांध योगकर। यह योग तुझे भूख और महंगाई दोनों से बचाएगा। तू रिश्वत दे योग कर ये तेरे सारे सरकारी काम करवाएगा। तू सब्सिडी छोड़ योग कर। इससे तेरे खाने के लाले पड़ेंगे और तुझे मोक्ष की प्राप्ति होगी।
मीडिया उवाच : कष्टक्षेत्रे योगक्षेत्रे। हे! राजन। इतना सुनते ही वह गीता नामक स्त्री मूर्छित हो गई मगर योग अभी जारी है।

Tuesday, June 2, 2015

गाय तुम लौट जाओ

Sudhir Raghav

गाय तुम जंगल से आई थीं
तुम जंगल को ही लौट जाओ
नहीं तो ये मूर्ख इंसान
लड़ मरेंगे तुम्हारे नाम पर

गाय तुम्हें जंगल लौटना चाहिए
क्योंकि हिंदुओं के लिए
उपयोगिता की लड़ाई तो तुम
बहुत पहले हार चुकी हो
भैंस और जर्सी गाय से

गाय तुम जंगल लौट जाओ
क्योंकि तुम अच्छी नहीं लगतीं
सड़क पर इधर-उधर मुंह मारते
पॉलिथीन की जुगाली करते
रेहड़ी वाले से डंडे खाते
ठूंसकर भरे ट्रकों में सवार होकर जाते

चलो गाय! मैं तुम्हें जंगल ले चलूं
वही तुम्हारा स्वर्ग है
जहां से मेरा एक पूर्वज
राजा दिलीप तुम्हें ले आया था
मां का दर्जा देकर

चलो गाय! अब जंगल लौट चलो
इससे पहले कि तुम्हारे नाम पर कुछ और दंगे हों
तुम्हे और ताने पड़ें
सीता माता की तरह
किसी लक्ष्मण को तुम्हारे सम्मान का बोझ उठाना होगा
जंगल तक छोड़कर आना होगा
इससे पहले कि धर्म के ठेकेदारों की दुकान खुले
चलो मां हम जंगल चलें
वही हमारा पहला स्वर्ग है।

-सुधीर राघव
02.06.2015

Sunday, April 19, 2015

क‌िसान

Sudhir Raghav

निराश और हारे किसान
आत्महत्या कर रहे हैं
ऐसी नकारात्मक खबरें मत छापीये

खबर छापो
किसान ने चुनौतियों से लड़ने का
नया ढंग सीख लिया है
धरती पुत्र ने
फंदा बुनने का हुनर सीख लिया है

वह गजब स्टंट करता है
गले में रस्सी डाल पेड़ पर झूलता है
शांत होने से पहले जिंदगी से संघर्ष करता है

यकीन मानो
यह पॉजिटिव खबर
प्रधानमंत्री को खुश कर देगी
वह गदगद भाषण देंगे-
भाइयो! जिस देश का किसान हुनरमंद होता है
उसका PM भाग्यशाली होता है।
हर चीज का सकारात्मक पहलु होता है
नकारात्मक मीडिया से बचकर रहो
वह बिकाऊ है
जो सकारात्मक है वह कमाऊ है।

जो मीडिया नकारात्मक है
उसे गरियाने के लिए मोदी के पास फौज है
सब ओर अच्छा ही अच्छा
मौज ही मौज है।।
-सुधीर राघव

Monday, March 23, 2015

नवरात्र में प्रकृति मां के साक्षात दर्शन



सुधीर राघव

Sudhir Raghav


नेपली रेंज में ट्रैक‌िंग शुरू करने से पहले सा‌थ‌ियों के साथ। फोटो खींच रहे हैं गुरजीत  स‌िंह।

नेपली रेंज में ट्रैक‌िंग शुरू करने से पहले सा‌थ‌ियों के साथ। फोटो खींच रहे हैं गुरजीत स‌िंह।

नवरात्र का पहला दिन और प्रकृति मां के साक्षात दर्शन। असीम सौंदर्य और वहीं शांति जिसकी तलाश में कभी गौतम निकले होंगे। कभी कोई चिड़िया चहचहाकर इस शांति में वीणा के संगीत की मिठास घोल देती।
वर्ल्ड फोरेस्टरी डे पर 21 मार्च को चंडीगढ़ की सुखना वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी की नेपली से कांसल रेंज के बीच ट्रैकिंग करने का मौका मिला। सात किलोमीटर के इस टूर में 1500 फुट की चढ़ाई थी और रास्ते में तीन पहाड़ियां पार करनी थीं। रास्ते में हर एक किलोमीटर की दूरी पर एक वाच टावर। जहां से पूरे जंगल का शानदार विहंगम दृश्य दिखता है। शायद ऐसे ही दृश्य देखने की ललक में इंसान पक्षी होने की कामना करता है। यही इच्छा पेराग्लाइडिंग तक ले जाती है।

 पदचाप की दहशत

जंगल के बीच कई कुदरती ताल हैं, कुछ इंसानों के बनाए चैक डेम हैं। हिरण, चीतल, सांभर यहां पानी पीने आते हैं और तेंदुए उनकी घात में रहते हैं। मगर यह खेल तब चलता है, जब इंसानी चहलकदमी न हो। इंसानी पदचाप की दहशत जानवर में कितनी है, यह जंगल जाकर ही समझा जा सकता है। इंसान ने अपना बर्चस्व बनाने के लिए सबको भयभीत किया है। जंगल इस बात का गवाह है।

ट्रैक‌िंग पूरी करने के बाद कांसल रेंज में लोगहट के पास।
ट्रैक‌िंग पूरी करने के बाद कांसल रेंज में लोगहट के पास।

कुछ दिखना चाहिए

जंगल में हम साथी आंखों में एक ही ललक लिए हैं। कोई जानवर दिखना चाहिए। चिड़ियाओं के चहचहाने की अवाज आती है तो नजर उसी ओर जाती है। कोई ड्रोंगो बर्ड इंसानी पदचाप सुन कर बेचैन है। वह शायद औरों को सचेत कर रहा है। पानी से बने एक रास्ते पर खूबसूरत जंगली मुर्गों का जोड़ा दिखता है। मगर इंसान को देखते ही दोनों फुर्र हो जाते हैं।

रोडियांवाली खुई की कहानी

जंगल में एक पक्का कुआं, गांव के पुराने दिन याद दिलाता है। चंडीगढ़ बसने से पहले कभी गांवों के बीच का सफर जब इस जंगल से होता होगा तो लोग इस कुएं के पास ही बैठकर सुस्ताते होंगे। उन्होंने ही इसे नाम दिया होगा रोडियांवाली खुई। वन विभाग इसका संरक्षण कर रहा है। यह कुआं जंगल में भूमिगत जल के स्तर का पता भी देता है। इस जंगल में ऐसे 11 कुएं हुआ करते थे। इनमें से कई सूख गए हैं।

जंगल जाना अब इंसान को भयभीत नहीं करता। हालत यह है कि आज जंगल डरता है कि इंसान न आए। जंगल का डरना, इंसान के लिए खतरा है। अब जंगल को हरा-भरा बनाने की जरूरत है। जंगल को खुशहाल करने की जरूरत है। जंगल जितना खुशहाल होगा, वह इंसान को उतनी ही खुशहाली देगा।

Saturday, March 21, 2015

आजा चिड़िया आ जा री


सुधीर राघव

Sudhir Raghav

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20 मार्च को विश्व गौरेया दिवस मना रहा है। वर्ल्ड स्पेरो डे। मीठे कलरव से नींद खुले ऐसा अब होता नहीं। कोई चिड़िया अब घर में आकर नहीं चहचहाती। घड़ी का बेसुरा अलार्म अब हमारी नींद तोड़ता है। अपनी इस हालत के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं।
चिड़िया हमारी जिंदगी का हिस्सा थी। चिड़िया हमारे बचपन का किस्सा थी। मुंह में चार दांत वाले घुटने चलते बच्चे को मां हाथ पकड़ कर पीढ़े पर बैठाती और दूध में भीगी रोटी के छोटे ग्रास खिलाती तो चिड़िया का ही गीत गाती। आजा चिड़िया आ जा री-चुग चुग दाना खा जा री।
चिड़िया चार दशक पहले तक हर बच्चे के बचपन की अहम साथी थी। वह घर में ही घोंसले बनाती थी। घर तब कच्चे और शहतीरों के थे, मगर दिल में और घर में गौरेया के लिए खूब जगह थी। घर कंकरीट के हुए तो दिल भी पत्थर के हो गए। चिड़िया के लिए एक सुराख तक नहीं छोड़ा। चिड़िया बेघर हो गई।
लोग थैली बंद आटा खाने लगे। घरों की छत पर गेहूं अब नहीं सूखते। चिड़िया क्या खाए। खेतों में दाने कीटनाशकों के छिड़काव से सुरक्षित किए गए और चिड़िया के लिए जानलेवा साबित हुए। मोबाइल क्रांति से निकली ध्वनि तरंगों ने आकाश पर कब्जा कर लिया और इसके अगोचर हमले से वह बच नहीं सकी। यह एक खामोश आतंकवाद था, जिसकी शिकार चिड़िया बनी और कोई चर्चा तक नहीं हुई।
अब बच्चा डोरीमोन को जानता है। पॉकीमोन को जानता है। स्पाइडरमैन, बैटमैन, सुपरमैन, आयरनमैन को भी जानता है मगर चिड़िया को नहीं जानता। कुदरत के जीव स्मृति से गायब होने लगे तो आभासी दुनिया के चरित्रों ने बचपन को जकड़ लिया। चिड़िया चहकना सिखाती थी। प्यार सिखाती थी। मगर कार्टून चरित्र झूठ, हिंसा और छलकपट से भरी दुनिया के द्योतक बने हुए हैं। बच्चा क्या सीखे?
चंडीगढ़ में हरियाली है। लोगों का सौभाग्य है कि गौरेया कहीं-कहीं दिख जाती है। आज भले घर में गौरेया नहीं रह सकती मगर आप चाहें तो अपने आंगन में या लॉबी में उसे जगह दे सकते हैं। बांस और लकड़ी के बने छोटे-छोटे आलने (घौंसले) आप छज्जों के पास लगा सकते हैं। यही चैत्र का महीना है। हो सकता है कोई चिड़िया वहां अपना घर बसा ले

Friday, March 13, 2015

शहर में जंगल

 सुधीर राघव
Sudhir Raghav

जंगल में दुख है। संदेश आ रहे हैं। जानवर आबादी में घुसपैठ कर रहे हैं।
गत दिसंबर में एक तेंदुए ने रायपुरानी के गांव में हमला कर तीन किसानों को घायल कर दिया था। उसकी दहशत अब तक बनी है। जंगलों से सटे ट्राइसिटी के गांवों में कोई मरा कुत्ता या पगमार्क दिखते ही, डर और बढ़ जाता है। करीब-करीब रोज ही ग्रामीण कुछ पंजों के निशान देखने की सूचना देते हैं। हाल यह है कि पिंजरे में बकरे की टांग टांगे वन विभाग की टीम उन पदचिन्हों की पीछे-पीछे तेंदुए की तलाश में भटक रही है।
तेंदुआ है या नहीं यह बहस का विषय हो सकता है। इससे अलग एक और दृश्य है। उत्तरी सेक्टरों में हर दूसरे-तीसरे दिन कोई न कोई सांभर, हिरण या नील गाय भटक कर आ जाते हैं। रातभर स्ट्रे डॉग्स के झुंड इन्हें दौड़ाते हैं, कुछ वाहन की चपेट में आकर घायल हो जाते हैं। घायल होने पर वन विभाग की टीम उठाकर उन्हें जंगल ले जाती है और फिर जंगल से उनकी कोई खबर नहीं आती।
जंगल खबर नहीं देता। जंगल संकेत देता है। वह संकेत दे रहा है कि अब जानवरों के लिए पर्याप्त खाना नहीं है। शायद पानी भी नहीं। जंगल में दूसरे महाद्वीप से आए सफेदे के पेड़ अपना साम्राज्य बढ़ा रहे हैं। उनके पत्ते और बीज हमारे एशियाई वन्यजीवों के लिए किसी काम के नहीं। जहां सफेदा उगता है, वहां आसपास कुछ और नहीं होता। बंदर जंगल से ज्यादा सेक्टरों में हैं। उनके आगे सबसे बड़ी समस्या है कि जंगल जाकर क्या खाएं? अकेले बांस की कोपलों से कैसे गुजारा करें। कुछ फलदार पौधे वन विभाग ने लगाए हैं मगर उनमें फल आने में तो अभी कई साल लगेंगे। मजबूरी ने बंदरों को चोर बना दिया है। वह घरों से आपके फ्रिज से खाने-पीने की चीजें चुरा रहे हैं। उनका जंगल उनके पेट भरने लायक नहीं छोड़ा है। यह उसीकी कीमत है, जो चुकानी पड़ रही है। 
इंसान की शुरुआत भी जंगल से हुई। न पंजों में तीखे नाखून थे। न शिकार लायक लंबे-नुकीले दांत। जंगल में सबसे ज्यादा खतरे में इंसान था। इंसान एकजुट हुए। उन्होंने बस्तियां बसाईं। गांव-नगर बसाये। कंकरीट के महानगर बसाये। आज हालत यह है कि जंगल खतरे में है। जंगल खतरे में है तो यकीन मानो कि इंसान अब भी सुरक्षित नहीं है। ईश्वर मौका देता है। जानवर शहर नहीं आ रहे बल्कि खतरे के संकेत आ रहे हैं। जंगल से जो छीना है, उसे वापस करना होगा। अब जंगल से चुराने के लिए कुछ नहीं बचा है। चलो जंगल में कुछ फलदार पौधे लगाए जाएं।

Thursday, February 26, 2015

मेरी तीन कव‌िताएं

- सुधीर राघव

बाइब्रैंट चायवाला
एक तरफ अंबानी अडानी।
दूसरी तरफ किसान।
एक बाइब्रैंट चायवाला
किस तरफ खोले अपनी दुकान।
उन्हें नहीं करना विकास
जैसलमेर के सम में
कच्छ के रण में
थार के मरुस्थल में कहीं भी।
ऐसे विकास तो दुबई में होते हैं।
इन्हें तो विकास के लिए चाहिए
दिल्ली के आसपास
पंजाब, यूपी और हरियाणा
के किसानों की
उपजाऊ जमीनें
तरसते लोगों को
सड़क और बिजली देना
विकास नहीं होता
विकास होता है
सिक्स लेन को
एट लेन में बदलना
मेट्रो शहरों को
स्मार्ट सिटी बनाना
कमाते खाते किसानों से
निवाला छीनना
परिंदों से उनके
खेत और जंगल छीनना।
एक तरफ अंबानी अडानी।
दूसरी तरफ किसान।
एक बाइब्रैंट चायवाला
किस तरफ खोले अपनी दुकान।


जमीन और जंगल
अमेरिका में बैठा खरबपति
गिद्ध सा देख रहा है
दिल्ली के चायवाले को
उसे चाहिए जमीन और जंगल
अपनी मशीनों के लिए
मगर जमीन किसान के पास है
जंगल आदीवासियों के
योग और भोग के बाद
डकार मार कर
बाबा फेर रहा है
अपने पेट पर हाथ
उसे चाहिए जमीन और जंगल
अपने आश्रम के लिए
मगर जमीन किसान के पास है
जंगल आदिवासियों के
इस देश की तलब
चाय मिटाती है
और देश के दुश्मनों ने
एक चाय वाले को
मोहरा बनाया है
अपनी तलब मिटाने को
इसलिए
किसानों!
अब न तुम्हारे पास जमीन रहेगी
आदीवासियो!
अब न तुम्हारे पास जंगल रहेंगे।

लोमड़ी का राज
सरकार को बिल लाने दो।
किसानों को बिलबिलाने दो॥
जिन गिद्धों की नजर है तेरी जमीन पर,
उनसे कहो पहले दम तो निकल जाने दो।
रोटियों का सपना दिखा नोचता जो बोटियां,
उस शख्स को अपने गांव में न आने दो।
बिक चुकी है आत्मा बिक रहा शरीर भी,
नसीबबानो के बजट को भी आ जाने दो।
अच्छे दिन की बेल के अंगूर कच्चे रह गए,
लोमड़ी का राज है उसे कूद जाने दो।
साफ न सफाई है न जख्म की दवाई है
सुअर के फ्लू सा न इन्हें फैल जाने दो।
बिक चुका जमीर कपड़ों की बोली लग गई,
ये बचीखुची हाफपैंट भी उतर जाने दो॥

Friday, February 20, 2015

चंडीगढ़ आना चिड़िया

-सुधीर राघव


यह संदेश च‌िड़‌िया के नाम है। परिंदों के नाम है।
कीटनाशकों और मोबाइल टावरों की ध्वनितरंगों के खामोश आतंकवाद से सताये छोटे पक्षी अपने लिए कोई सुरक्षित पनाहगाह ढूंढ रहे हैं।

 आकार पर मत जाइए। उनकी ताकत उनके परों में है। वे दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर तक उड़ते हैं। आसमान के वे बादशाह हैं। मगर खाने के लिए उन्हें मुट्ठीभर अनाज चाहिए, जो जमीन पर मिलेगा। बच्चों के लिए उन्हें घोसलाभर जगह चाहिए, जो जमीन पर ही मिलेगी। तलाब-जौहड़ों के आसपास।

ज्यादातर जमीन पर उतरना उनके लिए मौत है। जमीन पर जो अनाज है, वह कीटनाशकों ने जहरीला कर दिया है। इसलिए अनुभवी चिड़‌ियों के झुंड अब खेतों में उतरते नहीं दिखते। घोंसले में चि‌ड़‌िया पांच अंडे देती है तो बच्चा सिर्फ एक में से ही निकलता है। कीटनाशकों का जहर परिंदों की रगों में पहुंच गया है, जिसने एगशैल कमजोर कर दिया है।इस त‌रहे पर‌िंदे अपनी संतानों को बचाने के ल‌िए तरस रहे हैं। कोई डॉक्टर और वैज्ञान‌िक उनकी मदद के ल‌िए नहीं है।


 
 लेफ्टि कर्नल एसएस चीमा  ने 16 फरवरी को मोरनी में देखी यह ‌‌नई चिड़‌िया
इस निराशाजनक माहौल के बीच देश में कई छोटे-छोटे हिस्से हैं, जहां हरियाली बढ़ रही है। पक्षी यहां खुद को महफूज पा रहे हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। खासकर ऊंचे हिमालय और यूरोप के इलाके जब बर्फ से ढक जाते हैं तो मैदानों की ओर कूच करने वाले परिंदों के लिए ये पसंदीदा जगह बन रहे हैं। चंडीगढ़ के आसपास 50 वर्ग किलोमीटर का इलाका ऐसा ही है, जहां पिछले दस साल से कई नए -नए पक्षी दिख रहे हैं। चंडीगढ़ के बर्ड वाचर्स इससे खुश हैं। जैसे ही किसी नए पर‌िंदे को वे कैमरे में कैद करते हैं, उनकी खुशी देखने लायक होती है।
इस हरे-भरे इलाके में परिंदों की 415 प्रजा‌त‌ियां देखे जाने का रिकार्ड दर्ज है। यह सूची लगातार बढ़ रही है। फरवरी में इसमें एक और पीले रंग के सुंदर पक्षी गोल्डन फ्लैंक्ड बुश रोब‌िन का नाम जुड़ गया है। इसे बर्डवाच‌िंग के शौक‌ीन लेफ्टिनेंट कर्नल एसएस चीमा ने 16 फरवरी को ही मोरनी के पास देखा और कैमरे में कैद किया। वर्ष 2004 तक चंडीगढ़ के बर्ड वाचर के पास यहां 342 प्रजातियां दिखने का ही रिकार्ड था। दस साल में इस सूची में 73 और पक्षियों के नाम जुड़ चुके हैं।
बर्ड हैबीटेट एंड वेटलेंड संस्था से जुड़ी रीमा ढिल्लों बताती हैं कि शहर में सबसे पहले पांच लोगों ने बर्ड वाचिंग शुरू की। इनमें उनके साथ सर्वजीत कौर, नवजीत सिंह, नरवीर काहलों और डॉ. धीरेंद्र शामिल थे। अब यह संख्या बढ़कर सात गुना हो चुकी है।
बर्ड वाचर मितिंदर सेखों को चंडीगढ़ की एवीफौना (बर्डलाइफ) अच्छा जानकार माना जाता है। इस शौक के लिए वे लगातार सक्रिय रहते हैं। उनके पास आसपास के इलाके में आने वाले परिंदों का एक विस्तृत रिकार्ड और तस्वीरे हैं। परिंदों को उनके पंजाबी और हिंदी नाम से पहचान कारने में माह‌िर हैं। इसी तरह वर्ड वाचर नवतेज सिंह को कई नए पर‌िंदों को देखने और उनसे पर‌िचत कराने के लिए जाना जाता है।
यह सारा काम कुछ कड़े एथिक्स का पालन कर हो रहा है। पक्षियों के घोसलों और उनकी विचरणगाहों में हस्तक्षेप किये ब‌िना। यही वजह है कि चंडीगढ़ और इसके आसपास खूबसूरत पर‌िंदों की एक नई दुन‌िया अंगड़ाई ले रही है। उन जंगलों में जहां आपके मोबाइल के स‌िग्नल नहीं मिलते,  निचले हिमालय के कुदरती झरनों से निकलकर जहां सुखना चो और एनचो इनके लिए जीवन रेखा बनाते हैं। कीटनाशकों के जहर से मुक्त एक माहौल।



Thursday, February 5, 2015

आज का महाभारत


द्रौपदी, नकुल, सहदेव भेज दिए गये कौरवों के खेमे में। खुशी से फूले दुर्योधन ने अपनी 18 अक्षौहिणी सेना द्रौपदी के नेतृत्व में जंग में उतार दी। मैं भी हथियार उठाउंगा, कृष्ण का इतना संकेत ही काफी था। कौरवों की बाजी पलट गई। हर मोर्चे पर मात हुई। दुर्योधन को संभलने तक का मौका नहीं मिला।
द्रौपदी ने युद्ध कुछ अलग अंदाज़ में लड़ा। आते ही सबसे पहले अपने ही खेमे पर बाणवर्षा कर दी। कौरवों में खलबली मच गई। इसके बाद बाण चलाने बंद कर दिये। दुर्योधन चिल्लाया -मुझे बचाओ और अर्जुन पर बाण चलाओ।
गले पर हाथ रखकर द्रौपदी उवाच- मेरा धनुष खराब है।

धूतक्रीड़ा में विश्वास रखने वाले कौरवों को उन्हीं की धूर्त शैली में पराजित करना। जीत के बाद सभी पांडव फिर एकजुट। कृष्ण रालेगन में प्रकट हुए और मुसकराये-मैं इनको भूखा रहकर समझाया, जनता से राजनीति मत करो तो ये मेरे से खेल गए। अब मेरे शिष्यों ने सत्य औकात का ज्ञान करा दिया है। यही आज की गीता का ज्ञान है जो युद्ध के बाद दे रहा हूं।
कमाल का मास्टर स्ट्रोक। फिल्म बन सकती है। ( कथा और सभी पात्र काल्पनिक, नाम महाभारत से रूपक के तौर पर)

Sunday, February 1, 2015

नेता की झाड़ू

नेता ने ठान लिया है कि वह महात्मा गांधी बनेगा। भारत में बहुत गंदगी है। गांधी ने अंग्रेजों से जंग लड़ी। नेता गंदगी से जंग लड़ेगा। गंदगी की वजह से विदेशी न‌िवेशकों पर बुरा असर पड़ता है। दुर्गंध से निवेशक भाग जाता है। न‌िवेशक को रोकना है तो सफाई करनी होगी।
नेता का कान्फ‌िडेंस सातवें आसमान पर है। वह अपनी तुलना स्वामी व‌िवेकानंद से करता है और दूसरे पल ही गांधी हो जाता है। नेता ने देश के लोगों से झाड़ू उठाने का आह्वान किया है। आह्वान होते ही सरकारी अफसर, कर्मचारी, डॉक्टर, टीचर सब झाड़ू लेकर सड़कों पर आ गए हैं। हाथ में झाड़ू ल‌िए फोटो ख‌िंचवा रहे हैं। मीड‌िया में हर ओर इन फोटुओं की बाढ़ है।
आम आदमी रोज फोटो देखता है। इतनी सफाई हो रही है मगर उसके मोहल्ले में गंदगी कायम है। गजब विरोधाभास है। यह समझ से परे हैं। नेता का ऐलान है कि वह दो अक्तूबर को खुद झाड़ू लगाएगा और पूरा देश स्वच्छ हो जाएगा। अमेर‌िका में सुपरमैन के किस्से बच्चों के मनोरंजन को पढ़ाए जाते हैं। हमारे देश में नेताओं के अंदाज ही सुपरमैन जैसे हैं। पूरे देश का मनोरंजन हो रहा है। पूरा देश खुश है। सबको पता है गंदगी के नाम पर नाटक हो रहा है। देश की गंदगी को ब्रांड बनाया जा रहा है। एक द‌िन की झाड़ू से कहीं गंदगी खत्म होती है।
गांधी की लड़ाई एक द‌िन की नहीं थी। गंदगी से लड़ाई भी एक द‌िन में नहीं जीती जा सकती। नेता अगर ठान ले क‌ि जहां गंदगी है, रोज वहां जाकर एक घंटे झाड़ू लगाएगा तो देश स्वच्छ हो जाएगा। गांधी ने सिर्फ एक द‌िन सूत नहीं काता। उनकी दिनचर्या में यह तय था। वह रोज सूत कातते थे। बड़ी ह‌स्त‌ियां उनसे ‌मिलने आती थीं और वह सूत कातते हुए ही मीट‌िंग कर लेते थे। तब देश में खादी आंदोलन खड़ा हुआ।
गांधी का नाम लेकर इस देश में ड्रामेबाजी साठ वर्षों से चल रही है। आगे भी चलती रहेगी। नेता ड्रामेबाज है तो प‌ब्ल‌िक भी कम नहीं। दोनों की युगलबंदी खूब जम रही है। यह ड्रामा हिट है भाई।

Tuesday, January 27, 2015

जीवन

मैं जीवन हूं
मुझे किसी मजहब ने नहीं बनाया
दुनिया के सारे मजहब
रचे हैं मैंने

धर्म बनाये गये
प्रेम का प्रकाश फैलाने के लिए
यही उस ईश्वर का संदेश था
न कि गिरोह बनाकर
एक दूसरे पर हमला
करने के लिए

धर्म के नाम पर जो
तलवारें बंदूक उठाते हैं
या बम फैंकते हैं भीड़ पर
लील जाते हैं
हर साल हजारों जिंदगियां
बिलखने को मजबूर करते हैं
बच्चों और माताओं को
उन्हें मैं
अपने अंगूठे की नौक पर रखता हूं

मैं जीवन हूं
मुझे किसी मजहब ने नहीं बनाया
दुनिया के सारे मजहब
रचे हैं मैंने॥
- सुधीर राघव

Sunday, January 11, 2015

जमाखोरों की सरकार

जमाखोरों की सरकार
देश में महंगाई बरकरार
फैंकू इतना फैंक गया
राजनीति की रोटी सेंक गया
अब तो बस मुंह पर ताला है
इतना माल पेट में डाला है
कालेधन की कील पर लटकी
बाबा की लंगोटी देखो
कुश्ती देखो मस्ती देखो
बातें कितनी सस्ती देखो
उसकी बोटी बोटी देखो
कितनी बासी है मत पूछो
गरीब के हाथ में रोटी देखो
नफरत के व्यापारी की
हरकत छोटी छोटी देखो
बंदर सा मत नाचो भैया
हाथ मदारी सोटी देखो
- सुधीर राघव

Sunday, January 4, 2015

सांड बाबा



मैं समय नहीं हूँ
सिर्फ अपने समय का साक्षी हूँ

साक्षी हूँ
अच्छे दिनों के विज्ञापनों का
जिनकी जगह अब
मर्दाना ताकत बढ़ाने के विज्ञापनों ने ले ली है

चैनलों पर बाबाओं के स्लाट बुक हैं
वे धर्म के साथ
कमजोरी दूर करने की दवा भी बेच रहे हैं
वे किवदंती से कथा ढूंढ़ लाये हैं
वे दावा करते हैं -
जिससे बुढ़ापे में कोई ऋषि जवान हुआ
वह दवा भी उनके पास है

पर खबरें गवाह हैं
देश की औरतें
पुरुषों की कमजोरी नहीं
ताकत से परेशान हैं

घरेलू कलह की वजह भी
कोई कमजोरी नहीं
वह ताकत है
जो बढ़ती उम्र के साथ
बेजरूरी बढ़ रही है

मुझे ईर्ष्या हो रही है
बाबाओं की टैक्समुक्त अकूत कमाई से
मेरे अंदर भी ज्ञान का कीड़ा
बहुत जोर से कुलबुला रहा है

सोच रहा हूं
सांड बाबा के नाम से
बुक करवा लूं टीवी पर एक स्लाट
फिर एक दिन
सारी खबरों का प्रायोजक
मैं ही होऊंगा।
सिर्फ मैं।।

- सुधीर राघव