Friday, October 31, 2014

एक कदम चलो अक्ल की ओर

सब ओर साफ सफाई है। हर शहर, कस्बा और गांव चमचमा रहा है। मंत्री, नेता, अफसर। सब झाड़ू लेकर लगे हैं। स्वच्छ भारत अभ‌ियान के लिए नरेंद्र मोदी की ज‌ितनी भी तारीफ की जाए वह कम है।
अगर मैं ऐसे ल‌िखूं तो हो सकता है कि मुझे साधुवाद की ढेरों टिप्पण‌ियां मिल जाएं। मगर लेखक कभी प्रशंसा के ल‌िए नहीं ल‌िखता। वह इसल‌िए ल‌िखता है क्योंकि उसके पास कहने के लिए कुछ ऐसा होता है, जिसे वह सबको बताना चाहता है। स्वच्छता अभ‌ियान को लेकर भी कई ऐसी बाते हैं, ज‌िन्हें साझा कर हम इस अभ‌ियान को बेहतर बना सकते हैं, भले ही इसके ल‌िए गाल‌ियां क्यों न खानी पड़ें।
सफाई का सबक क्यों जरूरी
रोम की महान सभ्यता नष्ट होने के पीछे भी एक कारण ही गंदगी था। यह इत‌िहासकार भी मानते हैं। इस महान सभ्यता ने विशाल इमारतें और नगरीय शैली दी मगर घरों से न‌िकलने वाले कूड़े का कोई इंतजाम नहीं किया। लोग घरों का कूड़ा ख‌िड़क‌ियों से गल‌ियों में फेंकते थे। हाल यह हुआ क‌ि गल‌ियों के लेवल कूड़े की वजह से घरों से ऊंचे हो गए। लोगों ने कूड़े के ढेरों पर घर बनाए। हैजा और प्लेग जैसी बीमारियां फैलीं। (मार्क सी कैसन-1998)
मोदी का संदेश कैसा
हमारे देश में गंदगी की समस्या को अभी तक समझा नहीं गया है। मोदी ने झाड़ू लगाया तो इससे पूरी दुन‌िया में यह संदेश गया क‌ि भारतीय इतने गंदगी पसंद हैं क‌ि घरों में झाड़ू तक नहीं लगाते। यहां के प्रधानमंत्री को खुद झाड़ू उठानी पड़ी है। विज्ञापनों से भी लगातार यही संदेश द‌िया जा रहा है। जो मित्र व‌िदेशों में रहते हैं, उनकी मुश्क‌िलें बढ़ी हैं, वहां के लोग उन्हें गंदगी में रहने वाला समझने लगे हैं।
modi
भारत में गंदगी की जड़ क्या
हमारे देश में सुबह उठ कर सबसे पहला काम घरों में झाड़ू लगाने का ही होता है। जिन शहरों और कस्बों में सफाइकर्मी पर्याप्त हैं वहां सड़कों पर भी रोज सुबह झाड़ू लगती है। झाड़ू न लगना हमारे देश की समस्या नहीं है। झाड़ू लगने के बाद जो कूड़ा न‌िकलता है उसका क्या क‌िया जाए, यह हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या है। ऐसे ही कूड़े से बना बदबू फैलाता पहाड़ सोनीपत से दिल्ली में घुसते ही नजर आता है। देश के लगभग सभी शहरों में कूड़े को ठिकाने के ल‌िए उच‌ित गारबेज प्लांट नहीं हैं। रोम की तरह घरों का कूड़ा गल‌ियों में फेंका जा रहा है। गल‌ियों से सफाई कर्मी इसे उठा कर शहर के किसी बाहरी हिस्से में फेंक आते हैं। यह कूड़ा उड़ कर फैलता रहता है। सड़ कर बदबू फैलाता है। गारबेज प्लांट्स को लेकर ज्यादातर शहरों में मामले अदालतों में विचाराधीन है। हर शहर में सफाई कर्म‌ियों की संख्या जरूरत से कम है। उनके पास पूरे उपकरण तक नहीं हैं। अक्सर सीवरेज में सफाई के ल‌िए खुद उतरते हैं और जहरीली गैस से उनकी मौत हो जाती है। दुन‌िया के व‌िकस‌ित देशों में मशीनें यह काम करती हैं।
सरकार क्या करे
जाह‌िर है क‌ि नेताओं का झाड़ू लगाना सफाई के मुद्दे को स‌िर्फ ड्रामा बनाना है। सफाई के प्रत‌ि अगर सरकार गंभीर है तो सबसे पहले उच‌ित कचरा प्रबंधन की कार्ययोजना बनाए। शहरों और कस्बों में अंडरग्राउंड या ढके हुए ड‌िस्पोजल ग्राउंड बनें। यहां ऑर्गेन‌िक कचरे को खाद में बदला जाए और अन्य कचरे को उसकी प्रवृत‌ि के अनुरूप ठ‌िकाने लगाने की व्यवस्था हो। सीवरेज की सफाई के ल‌िए मशीनों की उच‌ित व्यवस्था हो। गल‌ियों के लिए सफाई क‌र्म‌ियों की संख्या बढ़ाई जाए। गल‌ियों में जो डस्टब‌िन रखे जाएं उन्हें न‌ियम‌ितरूप से कूड़े सह‌ित उठाकर ले जाया जाए और उन्हें साफ कर ही दोबारा रखा जाए। उठाते वक्त ही साफ डस्टब‌िन रखे जाएं। दान में श्रम लेने से रोजगार के अवसर कम होते हैं। इसल‌िए अफसरों से झाड़ू लगवा कर सफाई का लक्ष्य हास‌िल नहीं होता। उनकी औपचार‌िकता फोटो ख‌िंचवाने तक होगी। सफाई सेवकों को क्षेत्र बांटकर उन्हें साफ रखने की ज‌िम्मेदारी दी जाए। बेहतर रखने वालों को पुरस्कृत क‌िया जाए। भारत रत्न की तरह सफाई रत्न पुरस्कार शुरू क‌िया जा सकता है।
फंड कहां से आए
श‌िक्षा, रक्षा, स्वास्थ्य की तरह ही सफाई के ल‌िए भी अलग बजट हर साल रखा जाए। सफाई कोष बनाया जा सकता है। लोग उसमें स्वेच्छा से दान कर सकते हैं। घरों से कूड़ा ले जाने के लिए शुल्क वसूला जा सकता है।

यह लेख  अमर उजाला ब्लाग पर भी देख सकते हैं ल‌िंक है-
http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C/%E0%A4%B8%E0%A4%AB%E0%A4%BE%E0%A4%88/

Thursday, October 23, 2014

द‌िवाली की शुभकामनाएं

सभी ब्लागर साथ‌ियों को दीपावली की शुभकामनाएं। लक्ष्मी जी आपके जीवन में सुख, समृद्ध‌ि, स्नेह की वर्षा करें। धन्वंतरी जी अच्छा स्वास्थ्य दें।

Sunday, October 19, 2014

तुम तो असली पप्पू निकले

न नाव का चप्पू निकले, न तारक का टप्पू निकले।
छप्पन इंच का सीना लेकर, तुम तो असली पप्पू निकले।।
रंग सारे सिंथेटिक निकले, ऐसा शेर तुम नकली निकले।
पूंजीपतियों की सरकस का, तुम तो छोटा अप्पू निकले।।
खा-खा-खी-खी हा-हा-ही-ही, तुम मोहल्ले की ताई निकले।
सारे वादे झूठे निकले, तुम तो पूरे गप्पू निकले।।
चूहों के बिल से तुम निकले, पब्लिक के दिल से तुम निकले।
चीन के चमचे पाक के प्यारे, उम्मीदों पर ढप्पू निकले।।

अब बेटा तू बकरा बन
लाने गए जो काला धन, उनका ‌न‌िकला काला मन
अभ‌िनेता को नेता समझे, पब्ल‌िक का बचकानापन
मुंह में राम-बगल में छूरी और बना ली इतनी दूरी
जीत गए तब नेताजी बोले-अब बेटा तू बकरा बन
न नौमन तेल-न राधा नाचे, देखो उनके टेढ़े खांचे
महंगाई की उसी ताल पर ता-ता-थइया नाचे तन
गंगा गए तब गंगाराम, यमुना पहुंचे यमुनादास
उनकी बात कुत्ते की लात, खूब बजाओ टन-टन-टन।

देश बेचते हैं
चाय बेचते हैं कभी तेल बेचते हैं
तोप बेचते हैं और रेल बेचते हैं
राजनीति जिनको समझ न आई दोस्तो
आज भी चौपाटियों पे भेल बेचते हैं
मैदान की मुसीबतें बढ़ेंगी आगे और भी
खिलाड़ियों को खरीदकर ये खेल बेचते हैं
ढाई आखर प्रेम न पढ़ सके जो बैठकर
सीख गए सियासत पूरा देश बेचते हैं

Friday, October 17, 2014

ग़ज़ल


जुगनू की चमक बाकी है
न शिकार बाकी है न शिकारी की धमक बाकी है
इस घने जंगल में मगर जुगनू की चमक बाकी है
दरिया के किनारे जो बैठा है वो डूब ही जाएगा
मौजों में उतर सीख ले जीने का सबक बाकी है
उस रोज जिन्हें आंखों से तूने गिराया जालिम
उन अश्कोँ में अभी मेरे इश्क का नमक बाकी है
मेरे दिल में आकर चुभा तेरी राह का जो कांटा
निकाले निकला न कहीं गहरे में कसक बाकी है
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आंखें सूनी सूनी हैं
राज क्या है इन बातों का काका जी बतलाओगे
चाय प्याली हाथ पकड़ कितना तुम शरमाओगे
दो सौ दंगे सत्तर मौतें घर भी काफी उजड़े हैं
इक कच्ची कुर्सी की खातिर कित्ता खूं बहाओगे
रौनक बस बाजारों में है आंखें सूनी सूनी हैं
मां ने फिर पूछा है बेटा दिवाली पर आओगे
जिन आंखो में नींद नहीँ उनकी बातें कौन कहे
बजे बंगले में चैन की बंसी तुम झटसे सोजाओगे

-सुधीर राघव

Friday, October 3, 2014

नेता और झाड़ू

नेता ने ठान लिया है कि वह महात्मा गांधी बनेगा। भारत में बहुत गंदगी है। गांधी ने अंग्रेजों से जंग लड़ी। नेता गंदगी से जंग लड़ेगा। गंदगी की वजह से विदेशी न‌िवेशकों पर बुरा असर पड़ता है। दुर्गंध से निवेशक भाग जाता है। न‌िवेशक को रोकना है तो सफाई करनी होगी।


नेता का कान्फ‌िडेंस सातवें आसमान पर है। वह अपनी तुलना स्वामी व‌िवेकानंद से करता है और दूसरे पल ही गांधी हो जाता है। नेता ने देश के लोगों से झाड़ू उठाने का आह्वान किया है। आह्वान होते ही सरकारी अफसर, कर्मचारी, डॉक्टर, टीचर सब झाड़ू लेकर सड़कों पर आ गए हैं। हाथ में झाड़ू ल‌िए फोटो ख‌िंचवा रहे हैं। मीड‌िया में हर ओर इन फोटुओं की बाढ़ है।

आम आदमी रोज फोटो देखता है। इतनी सफाई हो रही है मगर उसके मोहल्ले में गंदगी कायम है। गजब विरोधाभास है। यह समझ से परे हैं। नेता का ऐलान है कि वह दो अक्तूबर को खुद झाड़ू लगाएगा और पूरा देश स्वच्छ हो जाएगा। अमेर‌िका में सुपरमैन के किस्से बच्चों के मनोरंजन को पढ़ाए जाते हैं। हमारे देश में नेताओं के अंदाज ही सुपरमैन जैसे हैं। पूरे देश का मनोरंजन हो रहा है। पूरा देश खुश है। सबको पता है गंदगी के नाम पर नाटक हो रहा है। देश की गंदगी को ब्रांड बनाया जा रहा है। एक द‌िन की झाड़ू से कहीं गंदगी खत्म होती है।
गांधी की लड़ाई एक द‌िन की नहीं थी। गंदगी से लड़ाई भी एक द‌िन में नहीं जीती जा सकती। नेता अगर ठान ले क‌ि जहां गंदगी है, रोज वहां जाकर एक घंटे झाड़ू लगाएगा तो देश स्वच्छ हो जाएगा। गांधी ने सिर्फ एक द‌िन सूत नहीं काता। उनकी दिनचर्या में यह तय था। वह रोज सूत कातते थे। बड़ी ह‌स्त‌ियां उनसे ‌मिलने आती थीं और वह सूत कातते हुए ही मीट‌िंग कर लेते थे। तब देश में खादी आंदोलन खड़ा हुआ।
गांधी का नाम लेकर इस देश में ड्रामेबाजी साठ वर्षों से चल रही है। आगे भी चलती रहेगी। नेता ड्रामेबाज है तो प‌ब्ल‌िक भी कम नहीं। दोनों की युगलबंदी खूब जम रही है। यह ड्रामा हिट है भाई।


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