Saturday, May 31, 2014

कैंसर और यूरेनियम का संबंध

सुधीर राघव
हरियाणा तथा पंजाब के कुछ इलाकों में कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इसका क्या रहस्य है, इसका अभी अध्ययन जारी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हालत लगभग ऐसी ही है, वहां भी कोई अध्ययन चल रहा है। इसकी जानकारी मुझे नहीं है। इस संबंध में पंजाब और हरियाणा में जो अध्ययन हुए हैं, उन्हें यहां आपसे शेयर कर रहा हूं। पंजाब के कैंसर प्रोन इलाकों में पानी में यूरेनियम की उपस्थिति सुरक्षित मात्रा से ज्यादा पायी गई है। हरियाणा के शहरों में रेडॉन गैस का स्तर नापा गया। कैंसर मरीजों के आंकड़े के साथ इसके चौंकाने वाले संबंध देखे गए। cancer

बात फेफड़ों के कैंसर की

धूम्रपान निषेध दिवस पर मैं यह कहना चाहूंगा कि इसमें कोई शक नहीं है कि दुनिया में फेफड़ों के कैंसर की प्रमुख वजह स्मोकिंग ही है। मगर यूरेनियम और फेफड़ों के कैंसर में भी परोक्ष संबंध की पूरी संभावना है। यूनाइटेड स्टेट्स एन्वायरमेंट प्रोटेक्शन एजेंसी की एक कुछ साल पहले की रिपोर्ट के मुताबिक वहां भी धूम्रपान के बाद रेडॉन डॉटर पार्टीकल्स ही फेफड़ों के कैंसर का दूसरा बड़ा कारण है।
क्या हैं रेडॉन डॉटर पार्टीकल्स
यूरेनियम उत्सर्जन से बनने वाले 11 एलीमेंट में से एक रेडान हैं, जो कि गैस है। यूरेनियन के बाद थोरियम और इसके बाद रेडियम निकलता, जिसमें से रेडान गैस निकलती है। रेडान विघटित होकर नए रेडियोएक्टिव पार्टिकल बनाती है। ये रेडान डॉटर्स सांस के साथ अंदर जाकर धूल के कणों की तरह फेफड़ों के वायुछिद्रों से चिपक जाते हैं और लंग कैंसर की वजह बनते हैं। परमाणु ऊर्जा विभाग के अधिकारियों के मुताबिक पंजाब, हरियाणा के हिसार और इसके आसपास के इलाके में जमीनी पानी में यूरेनियम की अधिक मात्रा है। इसकी वजह ग्रेनाइट चट्टानें हैं। वैज्ञानिकों और डाक्टरों का कहना है कि ग्रेनाइट चट्टानों के ऊपर की जमीन पर बने घर रेडान गैस चैंबर की तरह व्यवहार करते हैं। अब हालत यह है कि लोग घरों में ग्रेनाइट टाइल्स का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि सभी वैज्ञानिक यूरेनियम और कैंसर के संबंध पर एक मत नहीं हैं। उनका कहना है कि यूरेनियम से किडनी खराब होने की बात तो साबित हो चुकी है मगर कैंसर और इसके संबंध पर अभी अध्ययन बाकी है।

हरियाणा में तेजी से बढ़ता कैंसर

हरियाणा और खासकर हिसार के आसपास के इलाके में कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। रोहतक पीजीआई के कैंसर विभाग के अनुसार हर साल कैंसर के करीब तीन हजार नए मामले आ रहे हैं। इनमें से 40 फीसदी मुंह और गले के हैं, जबकि फेफड़ों के कैंसर के 15 से 20 फीसदी तक हो गए हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इनके पीछे एक बड़ी वजह धूम्रपान है। रेडियोथेरेपी विभाग के डाटा के मुताबिक पीजीआई के जनवरी 1980 से दिसंबर 2000 तक के रिकार्ड के मुताबिक फेफड़ों के कैंसर के मरीजों की संख्या 5.2 फीसदी ही थी। इसमें तेज बढ़ोतरी 1995-96 से शुरू हुई और यह करीब चार साल में बढ़ती हुई 6.5 फीसदी से 7 फीसदी तक पहुंच गई।
रिश्ता कुछ उल्टा
हरियाणा में रेडॉन के स्तर और गले के कैंसर को लेकर तीन भौतिकविद शोध कर चुके हैं। डॉ. के. कांत, डॉ. आरपी चौहान और डॉ. एसके चक्रवर्ती के इस शोध में पीजीआई रोहतक से मरीजों के आंकड़े और वर्ष 2001 की जनसंख्या के आंकड़ों को आधार बनाया गया। इस शोध में पाया गया कि रेडॉन स्तर और गले के कैंसर में हॉर्मेसिस संबंध है, यानी रेडॉन की बड़ी खुराक से ज्यादा खतरा एक औसत छोटी खुराक वाली जगह में है। पाया गया कि हरियाणा के जिन शहरों में रेडॉन का स्तर 150 बीक्यू/मीटर क्यू है वहां रोगियों की संख्या ज्यादा और जहां यह 300 से ऊपर है वहां कम पायी गई। इससे पहले अमेरिका में हुए शोध में भी कुछ ऐसा ही नतीजा आया था।
जिले औसत रेडॉन स्तर (बीक्यू/मीटर क्यू)
कुरुक्षेत्र 92
झज्जर 115
सिरसा 118
जींद 139
भिवानी 152
रोहतक 159
हिसार 190
यमुनानगर 269

नोट- अन्य शहरों का डाटा जानने और पूरा लेख पढ़ने के ल‌िए इस ल‌िंक पर जाएं  http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A5%8D%E0%A4%AF/cancer-2/

Sunday, May 25, 2014

कैंसर की अंत‌िम स्टेज

कैंसर समाज में फैल रहा है। तेजी से। साधन सीमित हैं और मरीज लगातार बढ़ रहे हैं। मुझे लगता है, अमरत्व की इच्छा से हमारे जीन बदल रहे हैं। कुछ जीन ऐसे सेल्स बनाने लगते हैं जो मरते नहीं। मेरी धारणा दर्शन से प्रेर‌ित है, वह वैज्ञान‌िक नहीं है। डॉ. अवधेश कुमार पांडे बताते हैं-कैंसर की वजह हमारा लाइफस्टाइल है। यह तेजी से बदला है। हमारी शरीर की उम्मीद से भी तेज। म्युटेशन भी कारण है, मगर लाइफ स्टाइल का बदलना ही मुख्य है? वह पूछते हैं- आप ही बताओ अब कौन साइक‌िल चलाता है? कौन पैदल चलता है। हफ्ते में तीन से चार द‌िन बाहर खाना जरूरी है? उनके सवाल मुझे चुप कर देते हैं। डॉ. पांडे चंडीगढ़ के सरकारी मेडीकल कालेज के रेडियोलॉजी ड‌िपार्टमेंट के हेड हैं। cancer1
रोज साठ से सत्तर मरीज उनके पास आते हैं। वह सुबह से देर शाम तक उन्हें देखते हैं। हर मरीज की पूरी बात सुननी, र‌िपोर्टस देखने, प्रोग्रेस जांचने में समय लगता है। वह बताते हैं मरीज की मानस‌िकता पहली चुनौती है। बीमारी का नाम सामने आते ही वे खाना-पीना छोड़ देते हैं। वजन कम होता है। होमोग्लोब‌िन ग‌िरता है। खून में क्रिटोन्स और यूर‌िया बढ़ने लगता है। ऐसे में कीमों और रेड‌ियोथेरेपी देना मुश्किल हो जाता है। इसके इलावा कोई इलाज नहीं है। इसल‌िए वह मरीजों को हौसला देते हैं। युवराज स‌िंह की कहानी सुनाते हैं। सौ की उम्र के बाद कमाल करने वाले फौजा स‌िंह का हौसला बताते हैं। एक के बाद एक उदाहरण देते हैं। वह अपनी डॉक्टर पत्नी का भी उदाहरण देते हैं। बीमारी के खिलाफ वह कैसे लड़ीं और एक द‌िन भी काम नहीं छोड़ा। अब पूरी तरह स्वस्थ हैं। यह मरीज के ल‌िए दवा से ज्यादा कारगर है। उसकी आंखों में चमक और चेतना लौटती है। मगर इस सब में इतना टाइम लगता है क‌ि अक्सर डॉक्टर पांडे अपना लंच वापस घर ले जाते हैं। सुबह आठ बजे से देर शाम तक उनका यही रुटीन है। उनके पास आने वाले काफी मरीज बहुत गरीब पर‌िवारों से हैं। एक बच्ची अपनी मां का इलाज करवा रही है। पिता की मौत पहले ही हो चुकी है। वह तीन महीने पहले मां को गांव से लेकर आई थी। कोई और देखरेख करने वाला नहीं है। उस बच्ची और कैंसर मरीज मां के लिए डॉक्टर ही मसीहा हैं। वह बताती है- हमें सारा इलाज और टेस्ट यहीं मुफ्त में मिल रहा है। खाना तो कोई भी खिला देता है। कैंसर का यह पहलू बताता है क‌ि मानवीयता आदर्श रूप में कैसे बुझी आंखों में नम चमक लाती है।
कैंसर का दूसरा पहलू
कैंसर का दूसरा पहलू बाजार में है। यह दवा का बाजार है। कीमो के ल‌िए पेक्लीटेक्सल इंजेक्शन। एक न‌िश्च‌ित मात्रा की और एक कंपनी की प्रिंट कीमत है 10 हजार 203 रुपये। अस्पताल में मौजूद कै‌म‌िस्ट शाप पर यह इंजेक्शन 3700 रुपये में म‌िल रहा है। इस हैवी ड‌िस्काउंट से मरीज खुश है। दवा लेकर जब मरीज पहुंचता है तो उसे स्टाफ से पता चलता है क‌ि यह और भी सस्ता है अगर वह दूसरे सेक्टर की दुकान से इसे खरीदे। दूसरी कीमो दो हफ्ते बाद लगनी है। अगली बार मरीज दूसरे सेक्टर की दुकान पर जाता है। उसी कंपनी का वही और उसी मात्रा का इंजेक्शन 2300 रुपये में मिलता है। प्रिंट रेट इस पर भी उतना ही है। कैंसर में दवा का यह क्या खेल चल रहा है? मरीज असमंजस में है। उसे लगता है क‌ि उसे ठगा जा रहा है। कैंसर के ल‌िए मदद की बहुत सी घोषणाएं हैं मगर सेहत मंत्रालय की नजर इस प्रिंट रेट की कहानी पर नहीं है, जहां कैम‌िस्ट की मनमानी चलती है। इतना ही नहीं सरकार तो कैंसर मरीजों से दवा पर पांच फीसदी वैट भी वसूल रही है। कैंसर का यह पहलू मरीज की आंखों फिर उदासी भर देता है।
समाज में कैंसर
बड़ी बी सहारनपुर से बेटी का इलाज कराने आई हैं। बेटी को कीमो लगा है। इस चढ़ने में चार घंटे लग जाते हैं। डे-केयर के सभी बैड मरीजों से भरे हैं। कुछ मरीज कीमो के ल‌िए अपनी बारी का बाहर इंतजार कर रहे हैं। समय काटने के ल‌िए पड़ोस के मरीज के साथ आई मह‌िला से बातचीत शुरू हो जाती है। बड़ी बी की कहानी कुछ अलग है। परिवार के सभी मर्द लोग साउदी अरब में हैं। बेटे ने जो सूचना दी है, उसने उनकी चिंता और बढ़ा दी है। बेटे ने कहा है क‌ि वह अगले महीने इंग्लैंड जाएगा। बड़ी बी बता रही हैं- इंग्लैंड तो बड़ा देश है। वहां से दो साल बाद ही आ सकेगा। साउदी अरब उतना बड़ा नहीं है। वह तो घर जैसा समझो। दूसरे-तीसरे महीने में आ जाता था। घर पर बहू है। बच्चे हैं। यह पूछने पर क‌ि वोट क‌िसे डाला। वह उसी सांस में तेजी से कहती हैं- हमें वोट से कौन सा फायदा है। क‌िसी की सरकार बनो। हमारे बच्चों को तो दूसरे ही देश में रोजगार है। औरतें-औरतें घर में रहवैं हैं। हमारे तो मर्दों ने भी कह दिया है कि जो कहवे उसने वोट डाल द‌ियो। वोट ले लो भाई पर हमें शांत‌ि से रहने दो। हम तो और कुछ नहीं चाहते।


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Thursday, May 8, 2014

फेंकू पीएम कब बनेगा

-सुधीर राघव
फेंकू बहुत ऊंची-ऊंची फेंक रहा है। पब्लिक कूद-कूद कर लपक रही है। फेंकू का मुंह बबलगन हो गया है। उससे निकले बुलबुले पूरे आकाश को ढके ले रहे हैं। इन बुलबुलों पर जनता मोहित है। ताल‌ियां पीट रही है। जय-जय चिल्ला रही है। हकीकत का हाथ लगते ही ये बुलबुले फूटने वाले हैं। पर किसे परवाह। जो समझाने या रोकने की कोशिश करता है, जनता थप्पड़ मार कर गाल सुजा देती है।
फेंकू के चेले भी गुणगान पाठशाला चला रहे हैं। एक येड़ा चमचा जिसकी डंडी प‌िछले चुनाव में टेढ़ी हो गई थी बता रहा है-जानते हो इस बार पीएम कौन बनेगा। पब्ल‌िक चिल्ला रही है-फेंकू।
चमचा- पाकिस्तान को सबक कौन स‌िखा सकता है?
पब्ल‌िक- फेंकू।
चमचा-चीन को सबक कौन स‌िखा सकता है?
पब्ल‌िक- फेंकू।
चमचा-अमेर‌िका को सबक कौन सिखा सकता है?
पब्ल‌िक- फेंकू।
ऐसे जवाब सुन चमचा अपार संतुष्ट‌ि से गदगद है। ऐसे निहार रहा है-जैसे कोई गिरी का शेर अपने पिंजरे में भेजे गए मैमने को देखता है। आंखों का यह आलस अंदाज को शाही करता है। शिकार कहां जाने वाला है, जब मन करेगा खा लेंगे।
उधर, बाबा फेंकू योग स‌िखा रहा है-बच्चा! थोड़ा और ऊंचा फेंको। थोड़ा सांस खींचो, बच्चा! बच्चा और ऊंचा! सांस रोको बच्चा! सांस छोड़ो बच्चा!बुलबुले ऐसे आएं, जैसे विदेश से काला धन लौट के आ रहा है। बुलबुले पब्लिक के सिर से इतने ऊंचे रखो क‌ि हाथ न लगे बच्चा!
पब्ल‌िक को मस्त देखकर बाबा भी गदगद है। लूटो बुलबुला। ये सब तुम्हारे ल‌िए है। लूटो-लूटो बच्चा लूटो। अच्छे द‌िन आ रहे हैं। पब्ल‌िक पर इतना पहले कभी क‌िसी ने नहीं लुटाया।
एक कौने में छुपकर व्यापारी पानी में अच्छे ब्रांड का साबुन घोल रहा है, ताक‌ि बुलबुले अच्छे बनें। घोल तैयार करके फेंकू के मुंह में फेंका जा रहा है। सब ध्यान रख रहे हैं क‌ि साबुन की कोई कमी न पड़े। साबुन की क्वाल‌िटी देखकर व्यापारी गदगद है।

ब्लां..ब्लां..ब्लां..ब्लां। फेंकू का मुंह बबलगन की तरह चल रहा है। रंग-बिरंगे बुलबुले निकल रहे हैं। केसरिया, हरा, नीला, पीला। ये बुलबुला बेरोजगारी दूर करेगा। ये बुलबुला डवलमेंट लाएगा। ये बुलबुला धर्मनिरपेक्ष है। ये बुलबुला युवाओं के ल‌िए। ये बुलबुला मह‌िलाओं के ल‌िए।

Friday, May 2, 2014

ऐसे खिलेगा कमल

कीचड़ में कमल अपने आप खिलता है। कीचड़ से बाहर कमल खिलाना एक कला है। इस कला पर देश का एक बड़ा बिजनेस चलता है। साल में एक दिन कमल के बिजनेस के नाम होता है। असल में व्यवसाय के उद्देश्य से कमल की कल‌ियों को तालाबों से तोड़ा जाता है। मांग के अनुरूप इनकी देशभर में सप्लाई होती है। कमल कली की ज्यादा मांग मंद‌िरों और श्रद्धालुओं की ओर से होती है। वह भी खासकर द‌िवाली के दिन। इस कली को खिलाना भी सब नहीं जानते। इसे खिलाने का एक खास तरीका है। पुजारी और पूजापाठी गृहस्थ ही इसमें स‌िद्ध हस्त होते हैं। अनाड़ी तो अपनी कली खराब कर लेते हैं। हम आपको बताते हैं कि कमल कैसे खिलेगा। कली को कमल बनाने के ल‌िए हाथ के अंगूठे और अनामिका को मिलाकर गोलाकार बनाएं। इस पर कली को रखें। दूसरे हाथ से कली के शीर्ष पर बड़ी सधी हुई चोट मारें। इसके बाद एक-एक पंखुड़ी को पकड़ कर खिला दें। कमल खिल जाएगा।
अब बात राजनीत‌ि के कमल की
राजनीति का कमल भी इसी तरह खिलाया जाएगा, यह बात पोल‌िट‌िक्स के पंड‌ितों को भी हैरान कर देती है। इसके ल‌िए भ्रष्टाचार और विद्वेष के जहर से ज‌ितना कीचड़ जुटाया गया उससे कली तो बन गई। इसी कली को खिलाने का उतावलापन इतना ज्यादा रहा क‌ि उस पर जरूरत से ज्यादा चोट मारी गई। नतीजा आधार की कई पत्त‌ियां टूट गईं और कई रूठ गईं। अब अनाड़ीपने से खिलाए गए कमल में क‌ितना सौंदर्य और गर‌िमा आ पती है यह तो वक्त ही बताएगा।

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