Thursday, February 6, 2014

च‌िड़िया और शेर

सुधीर राघव
अव्यवस्था के पेड़ पर उल्टे लटके बेताल को पब्ल‌िक ने फ‌िर से उतार कर अपने कंधे पर लाद लिया लिया। हमेशा की तरह रास्ता काटने के लिए बेताल ने फिर कहानी शुरू की...।
बात बहुत पुरानी नहीं है। एक जंगल में शेर और चिड़‌िया रहते थे। शेर गजब का श‌िकारी था। उसकी इस प्रतिभा की जानकारी जंगलवालों को हाल ही में हुई थी। पहले उस शेर को साधारण ही समझा जाता था। तब जंगल में एक खुर्रांट श‌िकारी का दबदबा था। दबदबा इतना क‌ि सब उससे दबते थे। चेले उसे लोहे का आदमी पुकारने लगे थे। तब यह शेर भी उसके आगे पूंछ ह‌िलाता था।

अचानक जंगल में एक च‌िड़िया चहचहाने लगी। शिकारी जहां जाता च‌िड़िया जाकर चहचहा देती और शिकार चौकन्ना हो जाता। शिकार भाग जाता। इस तरह शिकारी का खेल ब‌िगड़ गया। लोग उसके हुनर के कायल नहीं रहे। शेर मौके को भांप गया। उसने पहला झपट्टा उस लोहपुरुष शिकारी पर ही मारा। शिकारी के शिकार होते ही शेर का रुतबा बढ़ गया।

जंगल में च‌िड़िया की चहचहाट अब भी जारी थी। शेर के हाथ से भी श‌िकार न‌िकलने का खतरा था। इसलिए शेर सोचने लगा चि‌ड़‌िया से कैसे निजात पायी जाए। एक द‌िन अखबार का एक टुकड़ा उसके हाथ लगा। उसमें एक नई र‌िसर्च थी। शीर्षक था, मोबाइल टावरों की तरंगों से चिड़‌िया को खतरा।  बस फ‌िर क्या था। शेर ने आईटी क्रांत‌ि का सहारा लेने की ठान ली। चिड़‌िया के खिलाफ पूरे जंगल में अपने प्रचार टावर लगवा दिए। उनकी तरंगों ने चिड़‌िया को बेचैन कर दिया। अब हालत यह है कि च‌िड़‌िया बदहवास है। जंगल में शेर का गुणगान चल रहा है। श‌िकारी अब पाप बोध लिए शेर के पीछे हाथ बांधे चल रहा है।
कहानी बीच में छोड़ कर बेताल बोला-बता पब्ल‌िक शेर ताकतवर कैसे हुआ और च‌िड़िया बदहवास क्यों हो गई।
पब्ल‌िक ने कहा- च‌िड़‌िया के चहचहाने से जब श‌िकारी का ध्यान बंटा और न‌िशाने चूकने लगे तो उसकी प्रत‌िष्ठा भी जाती रही। शेर ने इसी बात का फायदा उठाकर पहले उसी को ठ‌िकाने लगाया। शेर के हाथ अखबार का बही टुकड़ा लगा ज‌िसमें च‌िड़िया पर र‌िसर्च थी, इसल‌िए कह सकते हैं क‌ि वह क‌िस्मत का भी धनी था। जहां तक च‌िड‌़िया की बात है तो उसकी कोई जुगत काम नहीं कर रही इसल‌िए वह बदहवास है। ...और बेताल लोग खामख्वाह कहते हैं कि राजनीत‌ि में जंगलीपन बढ़ रहा है। असल में जंगल की भी अपनी राजनीत‌ि होती है। वोट डालकर राजा चुन लेते हो स‌िर्फ इसल‌िए ही आप सभ्य नहीं हो जाते। 
इस पर बेताल जोर से अट्टहास क‌िया और बोला, पब्ल‌िक तू फ‌िर मेरी बातों में फंसकर बोली। लो अब में उड़ा। हा..हा...हा।