Sunday, December 21, 2014

मछली और मजहब



एक छोटी मछली बहुत दुखी थी। मां रोज सुबह सजा संवार कर उसे स्कूल भेजती।
यहां तक सब ठीक था। दुख उसके बाद शुरू होता।
क्लास में टीचर उसे खड़ा कर लेती- बताओ भाप का इंजन किसने बनाया?
वह चुपचाप सिर नीचे झुका लेती। उसे फटकार पड़ती। तमाचे पड़ते। वह खुद को दुनिया का सबसे दुखी इंसान पाती।
दूसरे दिन वह खूब रट कर जाती की भाप का इंजन किसने बनाया। क्लास में टीचर आते ही उसे खड़ा कर लेती- बताओ, बिजली का बल्व किसने बनाया?
वह चुपचाप सिर नीचे झुका लेती। उसे फटकार पड़ती। तमाचे पड़ते। वह खुद को दुनिया का सबसे दुखी इंसान पाती।
तीसरे दिन उसने कुछ नहीं रटा। फिर यह रोज का काम हो गया। टीचर सवाल पूछती। वह चुप्प रहती। उसे फटकार पड़ती। तमाचे पड़ते। वह खुद को दुनिया का सबसे दुखी इंसान पाती।
एक दिन स्कूल से छुट्टी थी। मां ने उसे नहलाया-धुलाया। उसके हाथ गुलाब की पंखुड़ियों से भर दिए। मां उसे एक पूजास्थल में ले गई। वहां पूजा करने के बाद मां उसे एक दाढ़ी वाले बाबा के पास ले गई। मां ने दाढ़ी वाले बूढ़े से कहा, इसकी नजर उतार दो। इसका पढ़ाई में मन नहीं लगता। बूढ़ा बुदबुदाने लगा। बच्ची मछली ने सवाल किया- ये बादल किसने बनाए।
बाबा- खुदा ने।
बच्ची- ये दुनिया किसने बनाई?
बाबा- खुदा ने?
बच्ची- ये बिजली किसने बनाई?
बाबा-खुदा ने।
बच्ची जान गई कि यहां हर सवाल का जवाब एक ही है। उसने मां से कहा मैं कल से स्कूल नहीं जाऊंगी। मैं सीखने के लिए बाबा के पास ही आऊंगी। बाबा ने खुशी से उसकी बात का स्वागत किया। बाबा चिल्लाया खुदा महान है। चारों ओर से आवाज आई खुदा महान है।
fish2
छोटी मछली पुरानी पढ़ाई पढ़ते-पढ़ते बड़ी होने लगी। उसके पास दुनिया के हर सवाल का जवाब था कि उसे खुदा यानी ईश्वर ने बनाया है। उसे उन स्कूलों से चिढ़ होने लगी जो दुनिया को उल्टी-सीधी बातें पढ़ा रहे थे। वह दुनिया से ऐसी बुरी शिक्षा को खत्म करना चाहती थी। उसने बंदूक उठाई और स्कूल पहुंच गई। चारों ओर लाशें थी। वह चिल्लाई खुदा महान है। मगर चारों ओर खामोशी थी। वह समझ गई कि जीवन है तो खुदा है। उसने पाप किया है। 
वह प्रयाश्चित करने के लिए पानी से बाहर गरम रेत पर आ गई। वह चिल्लाई जीवन ही खुदा है। …और हमेशा के लिए शांत हो गई।
सुधीर राघव

अमर उजाला ब्लाग पर इस ल‌िंक पर भी देख सकते हैं

http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF/fish/

Wednesday, November 5, 2014

इनके इशारे पर उजड़तीं बस्तियां

चैनलों पर बैठकर एक-दूसरे को गालियां निकालेंगे।
इस तरह वे कल को दिल्ली संभालेंगे।।
ये नेता हैं इनकी नीति ही लड़ना है।
जब भी परखो इन्हें कूड़ा ही पाओगे
कहने को ये हाथ में झाड़ू संभालेंगे।।

बातें इनकी मोटी हैं नीयत इतनी खोटी है।
दुबक कर बैठ जाते हैं दंगे कराकर ये
कहने को कहेंगे हम दुनिया हिला देंगे।।
इतने झूठे हैं कि लुभाना जानते हैं।
इनके इशारे पर उजड़तीं बस्तियां
वादा ये करेंगे कि हम मंदिर बना देंगे।।

Friday, October 31, 2014

एक कदम चलो अक्ल की ओर

सब ओर साफ सफाई है। हर शहर, कस्बा और गांव चमचमा रहा है। मंत्री, नेता, अफसर। सब झाड़ू लेकर लगे हैं। स्वच्छ भारत अभ‌ियान के लिए नरेंद्र मोदी की ज‌ितनी भी तारीफ की जाए वह कम है।
अगर मैं ऐसे ल‌िखूं तो हो सकता है कि मुझे साधुवाद की ढेरों टिप्पण‌ियां मिल जाएं। मगर लेखक कभी प्रशंसा के ल‌िए नहीं ल‌िखता। वह इसल‌िए ल‌िखता है क्योंकि उसके पास कहने के लिए कुछ ऐसा होता है, जिसे वह सबको बताना चाहता है। स्वच्छता अभ‌ियान को लेकर भी कई ऐसी बाते हैं, ज‌िन्हें साझा कर हम इस अभ‌ियान को बेहतर बना सकते हैं, भले ही इसके ल‌िए गाल‌ियां क्यों न खानी पड़ें।
सफाई का सबक क्यों जरूरी
रोम की महान सभ्यता नष्ट होने के पीछे भी एक कारण ही गंदगी था। यह इत‌िहासकार भी मानते हैं। इस महान सभ्यता ने विशाल इमारतें और नगरीय शैली दी मगर घरों से न‌िकलने वाले कूड़े का कोई इंतजाम नहीं किया। लोग घरों का कूड़ा ख‌िड़क‌ियों से गल‌ियों में फेंकते थे। हाल यह हुआ क‌ि गल‌ियों के लेवल कूड़े की वजह से घरों से ऊंचे हो गए। लोगों ने कूड़े के ढेरों पर घर बनाए। हैजा और प्लेग जैसी बीमारियां फैलीं। (मार्क सी कैसन-1998)
मोदी का संदेश कैसा
हमारे देश में गंदगी की समस्या को अभी तक समझा नहीं गया है। मोदी ने झाड़ू लगाया तो इससे पूरी दुन‌िया में यह संदेश गया क‌ि भारतीय इतने गंदगी पसंद हैं क‌ि घरों में झाड़ू तक नहीं लगाते। यहां के प्रधानमंत्री को खुद झाड़ू उठानी पड़ी है। विज्ञापनों से भी लगातार यही संदेश द‌िया जा रहा है। जो मित्र व‌िदेशों में रहते हैं, उनकी मुश्क‌िलें बढ़ी हैं, वहां के लोग उन्हें गंदगी में रहने वाला समझने लगे हैं।
modi
भारत में गंदगी की जड़ क्या
हमारे देश में सुबह उठ कर सबसे पहला काम घरों में झाड़ू लगाने का ही होता है। जिन शहरों और कस्बों में सफाइकर्मी पर्याप्त हैं वहां सड़कों पर भी रोज सुबह झाड़ू लगती है। झाड़ू न लगना हमारे देश की समस्या नहीं है। झाड़ू लगने के बाद जो कूड़ा न‌िकलता है उसका क्या क‌िया जाए, यह हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या है। ऐसे ही कूड़े से बना बदबू फैलाता पहाड़ सोनीपत से दिल्ली में घुसते ही नजर आता है। देश के लगभग सभी शहरों में कूड़े को ठिकाने के ल‌िए उच‌ित गारबेज प्लांट नहीं हैं। रोम की तरह घरों का कूड़ा गल‌ियों में फेंका जा रहा है। गल‌ियों से सफाई कर्मी इसे उठा कर शहर के किसी बाहरी हिस्से में फेंक आते हैं। यह कूड़ा उड़ कर फैलता रहता है। सड़ कर बदबू फैलाता है। गारबेज प्लांट्स को लेकर ज्यादातर शहरों में मामले अदालतों में विचाराधीन है। हर शहर में सफाई कर्म‌ियों की संख्या जरूरत से कम है। उनके पास पूरे उपकरण तक नहीं हैं। अक्सर सीवरेज में सफाई के ल‌िए खुद उतरते हैं और जहरीली गैस से उनकी मौत हो जाती है। दुन‌िया के व‌िकस‌ित देशों में मशीनें यह काम करती हैं।
सरकार क्या करे
जाह‌िर है क‌ि नेताओं का झाड़ू लगाना सफाई के मुद्दे को स‌िर्फ ड्रामा बनाना है। सफाई के प्रत‌ि अगर सरकार गंभीर है तो सबसे पहले उच‌ित कचरा प्रबंधन की कार्ययोजना बनाए। शहरों और कस्बों में अंडरग्राउंड या ढके हुए ड‌िस्पोजल ग्राउंड बनें। यहां ऑर्गेन‌िक कचरे को खाद में बदला जाए और अन्य कचरे को उसकी प्रवृत‌ि के अनुरूप ठ‌िकाने लगाने की व्यवस्था हो। सीवरेज की सफाई के ल‌िए मशीनों की उच‌ित व्यवस्था हो। गल‌ियों के लिए सफाई क‌र्म‌ियों की संख्या बढ़ाई जाए। गल‌ियों में जो डस्टब‌िन रखे जाएं उन्हें न‌ियम‌ितरूप से कूड़े सह‌ित उठाकर ले जाया जाए और उन्हें साफ कर ही दोबारा रखा जाए। उठाते वक्त ही साफ डस्टब‌िन रखे जाएं। दान में श्रम लेने से रोजगार के अवसर कम होते हैं। इसल‌िए अफसरों से झाड़ू लगवा कर सफाई का लक्ष्य हास‌िल नहीं होता। उनकी औपचार‌िकता फोटो ख‌िंचवाने तक होगी। सफाई सेवकों को क्षेत्र बांटकर उन्हें साफ रखने की ज‌िम्मेदारी दी जाए। बेहतर रखने वालों को पुरस्कृत क‌िया जाए। भारत रत्न की तरह सफाई रत्न पुरस्कार शुरू क‌िया जा सकता है।
फंड कहां से आए
श‌िक्षा, रक्षा, स्वास्थ्य की तरह ही सफाई के ल‌िए भी अलग बजट हर साल रखा जाए। सफाई कोष बनाया जा सकता है। लोग उसमें स्वेच्छा से दान कर सकते हैं। घरों से कूड़ा ले जाने के लिए शुल्क वसूला जा सकता है।

यह लेख  अमर उजाला ब्लाग पर भी देख सकते हैं ल‌िंक है-
http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C/%E0%A4%B8%E0%A4%AB%E0%A4%BE%E0%A4%88/

Thursday, October 23, 2014

द‌िवाली की शुभकामनाएं

सभी ब्लागर साथ‌ियों को दीपावली की शुभकामनाएं। लक्ष्मी जी आपके जीवन में सुख, समृद्ध‌ि, स्नेह की वर्षा करें। धन्वंतरी जी अच्छा स्वास्थ्य दें।

Sunday, October 19, 2014

तुम तो असली पप्पू निकले

न नाव का चप्पू निकले, न तारक का टप्पू निकले।
छप्पन इंच का सीना लेकर, तुम तो असली पप्पू निकले।।
रंग सारे सिंथेटिक निकले, ऐसा शेर तुम नकली निकले।
पूंजीपतियों की सरकस का, तुम तो छोटा अप्पू निकले।।
खा-खा-खी-खी हा-हा-ही-ही, तुम मोहल्ले की ताई निकले।
सारे वादे झूठे निकले, तुम तो पूरे गप्पू निकले।।
चूहों के बिल से तुम निकले, पब्लिक के दिल से तुम निकले।
चीन के चमचे पाक के प्यारे, उम्मीदों पर ढप्पू निकले।।

अब बेटा तू बकरा बन
लाने गए जो काला धन, उनका ‌न‌िकला काला मन
अभ‌िनेता को नेता समझे, पब्ल‌िक का बचकानापन
मुंह में राम-बगल में छूरी और बना ली इतनी दूरी
जीत गए तब नेताजी बोले-अब बेटा तू बकरा बन
न नौमन तेल-न राधा नाचे, देखो उनके टेढ़े खांचे
महंगाई की उसी ताल पर ता-ता-थइया नाचे तन
गंगा गए तब गंगाराम, यमुना पहुंचे यमुनादास
उनकी बात कुत्ते की लात, खूब बजाओ टन-टन-टन।

देश बेचते हैं
चाय बेचते हैं कभी तेल बेचते हैं
तोप बेचते हैं और रेल बेचते हैं
राजनीति जिनको समझ न आई दोस्तो
आज भी चौपाटियों पे भेल बेचते हैं
मैदान की मुसीबतें बढ़ेंगी आगे और भी
खिलाड़ियों को खरीदकर ये खेल बेचते हैं
ढाई आखर प्रेम न पढ़ सके जो बैठकर
सीख गए सियासत पूरा देश बेचते हैं

Friday, October 17, 2014

ग़ज़ल


जुगनू की चमक बाकी है
न शिकार बाकी है न शिकारी की धमक बाकी है
इस घने जंगल में मगर जुगनू की चमक बाकी है
दरिया के किनारे जो बैठा है वो डूब ही जाएगा
मौजों में उतर सीख ले जीने का सबक बाकी है
उस रोज जिन्हें आंखों से तूने गिराया जालिम
उन अश्कोँ में अभी मेरे इश्क का नमक बाकी है
मेरे दिल में आकर चुभा तेरी राह का जो कांटा
निकाले निकला न कहीं गहरे में कसक बाकी है
-----
आंखें सूनी सूनी हैं
राज क्या है इन बातों का काका जी बतलाओगे
चाय प्याली हाथ पकड़ कितना तुम शरमाओगे
दो सौ दंगे सत्तर मौतें घर भी काफी उजड़े हैं
इक कच्ची कुर्सी की खातिर कित्ता खूं बहाओगे
रौनक बस बाजारों में है आंखें सूनी सूनी हैं
मां ने फिर पूछा है बेटा दिवाली पर आओगे
जिन आंखो में नींद नहीँ उनकी बातें कौन कहे
बजे बंगले में चैन की बंसी तुम झटसे सोजाओगे

-सुधीर राघव

Friday, October 3, 2014

नेता और झाड़ू

नेता ने ठान लिया है कि वह महात्मा गांधी बनेगा। भारत में बहुत गंदगी है। गांधी ने अंग्रेजों से जंग लड़ी। नेता गंदगी से जंग लड़ेगा। गंदगी की वजह से विदेशी न‌िवेशकों पर बुरा असर पड़ता है। दुर्गंध से निवेशक भाग जाता है। न‌िवेशक को रोकना है तो सफाई करनी होगी।


नेता का कान्फ‌िडेंस सातवें आसमान पर है। वह अपनी तुलना स्वामी व‌िवेकानंद से करता है और दूसरे पल ही गांधी हो जाता है। नेता ने देश के लोगों से झाड़ू उठाने का आह्वान किया है। आह्वान होते ही सरकारी अफसर, कर्मचारी, डॉक्टर, टीचर सब झाड़ू लेकर सड़कों पर आ गए हैं। हाथ में झाड़ू ल‌िए फोटो ख‌िंचवा रहे हैं। मीड‌िया में हर ओर इन फोटुओं की बाढ़ है।

आम आदमी रोज फोटो देखता है। इतनी सफाई हो रही है मगर उसके मोहल्ले में गंदगी कायम है। गजब विरोधाभास है। यह समझ से परे हैं। नेता का ऐलान है कि वह दो अक्तूबर को खुद झाड़ू लगाएगा और पूरा देश स्वच्छ हो जाएगा। अमेर‌िका में सुपरमैन के किस्से बच्चों के मनोरंजन को पढ़ाए जाते हैं। हमारे देश में नेताओं के अंदाज ही सुपरमैन जैसे हैं। पूरे देश का मनोरंजन हो रहा है। पूरा देश खुश है। सबको पता है गंदगी के नाम पर नाटक हो रहा है। देश की गंदगी को ब्रांड बनाया जा रहा है। एक द‌िन की झाड़ू से कहीं गंदगी खत्म होती है।
गांधी की लड़ाई एक द‌िन की नहीं थी। गंदगी से लड़ाई भी एक द‌िन में नहीं जीती जा सकती। नेता अगर ठान ले क‌ि जहां गंदगी है, रोज वहां जाकर एक घंटे झाड़ू लगाएगा तो देश स्वच्छ हो जाएगा। गांधी ने सिर्फ एक द‌िन सूत नहीं काता। उनकी दिनचर्या में यह तय था। वह रोज सूत कातते थे। बड़ी ह‌स्त‌ियां उनसे ‌मिलने आती थीं और वह सूत कातते हुए ही मीट‌िंग कर लेते थे। तब देश में खादी आंदोलन खड़ा हुआ।
गांधी का नाम लेकर इस देश में ड्रामेबाजी साठ वर्षों से चल रही है। आगे भी चलती रहेगी। नेता ड्रामेबाज है तो प‌ब्ल‌िक भी कम नहीं। दोनों की युगलबंदी खूब जम रही है। यह ड्रामा हिट है भाई।


broom

Friday, July 4, 2014

चिरकुट चाय वाला

‘मोटा भाई, चीनी हैल‌िकॉप्टर घुस आया है। रेल क‌िराया बढ़ गया है। सोना चढ़ गया है। रुपया गिर गया है। महंगाई दहाड़ रही है। प्याज बेकाबू है। आलू बड़ा बाबू है। ...उसने कहा था, अच्छे द‌िन आएंगे।’पार्टी वर्कर नेता से पूछ रहा है।

‘आएंगे...आएंगे।’ नेता मुस्करा रहा है।
...लेक‌िन कब?
नेता तमक गया है- एक-एक कर सबके अच्छे द‌िन आएंगे। अभी तुम्हारे अच्छे द‌िन आए हैं। तुम मेरे साथ माल‌िश टूर पर मलेश‌िया जा रहे हो।...धीरे धीरे पब्ल‌िक का भी नंबर आएगा।

वर्कर अधीर है- तब तक बहुत देर हो जाएगी। जैसे हालात बन रहे हैं, पब्ल‌िक बहुत मारेगी। 

-पब्ल‌िक नहीं मारेगी। उसे बताओ क‌ि रेल क‌िराया बढ़ाना प‌िछली सरकार का फैसला था। अर्थ व्यवस्था को प‌िछली सरकार ने ब‌िगाड़ा। हम तो अच्छे द‌िन ला रहे हैं।

वर्कर असमंजस में है। चोर चोरी छोड़ दे पर हेराफेरी नहीं छोड़ता। चायवाला तो चायवाला है। कुछ चायवाले ऐसे होते हैं, पुरानी पत्ती उबाल कर प‌िलाते हैं। ग्राहक की सेहत की च‌िंता उन्हें नहीं होती। उनका मतलब मुनाफे से होता है। ऐसा चायवाला जब नेता बन जाए तो पुरानी नीत‌ि में मुनाफा देखेगा तो उसे ही परोस देगा।

नेता बता रहा है- रेल घाटे में थी उसे मुनाफे में लाना जरूरी है। रेल घाटे में रहेगी तो नेता का घाटा पूरा नहीं होगा। चुनाव में पंद्रह हजार करोड़ खर्च हो गए। सरकारी विभागों की हालत यह है क‌ि ज‌िससे मांगो रोने लगता है हम घाटे में है। इसल‌िए उन्हें उतना घाटे से ऊबारना जरूरी है, जिससे हमारा ह‌िस्सा न‌िकल सके।

वर्कर को अब राजनीत‌ि समझ आ रही है। वह जान गया है क‌ि अच्छे द‌िन कैसे आते हैं। इसके ल‌िए जरूरी है क‌ि ऐसा नेता चुना जाए जो भले ही कम जानकार हो मगर च‌िरकुटई जानता है।

सुधीर राघव

Thursday, July 3, 2014

सुखना वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी के रहस्य खोलती र‌िपोर्ट

चंडीगढ़ खूबसूरत शहर है। इसके जंगल भी खूबसूरत हैं। ऐसे मेंटेन जंगल शायद ही ओर कहीं देखने को ‌मिलें। यहां बात हो रही सुखना वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी की। 25 किलोमीटर में फेला यह जंगल पहली ही मुलाकात में आपके सामने कई रहस्य भी खोलता है। पास के ही हर‌ियाणा के कलेसर के जंगल में जहां जंगलीपन अपने ठेठ अंदाज में कायम है। ग्रामीणों और खनन करने वालों की गतिव‌िध‌ियां वहां नजर आती हैं। वहीं सुखना का जंगल शांत और चौकन्ना है। कांसल रेंज में प्रवेश करते ही आपको सफेदे के पेड़ों की कतार नजर आती है। किसी जंगल में इस तरह कतारबद्ध सफेदे मैंने पहले नहीं देखे। आगे बढ़ने पर वन विभाग का रेस्ट हाउस है। पास ही बाड़ों में हिरण और खरगोश कैद हैं। आसपास के लॉन मैंटेन करने के लिए मॉली लगे हुए हैं। जंगल में इतने सफेदे कैसे? माली सवाल पर चौंकता है फिर संभल कर जवाब देता है, पहले यहां गांव होते थे। sukhana for net
बंदर कहां
रेस्ट हाउस के पास बेल, आम, नासपाति के पौधे लगे हैं। हम आगे लॉग हट की ओर बढ़ते हैं। आगे बांस के घने जंगल हैं। सिंबल, बरगद, कीकर, अमलतास के पेड़ हैं। चंडीगढ़ के बहुत से सेक्टर बंदरों की धमाचौकड़ी से त्रस्त हैं। पर जंगल में बंदर नजर नहीं आए। बंदर देखने के लिए सेक्टर-7 ज्यादा उपयुक्त जगह है। इस सेक्टर में वन विभाग के बड़े अधिकारी भी रहते हैं। बंदर उनके बंगलों पर धमाचौकड़ी मचाते दिख जाएंगे। जंगल में बंदरों के खाने के लिए क्या है? यह एक बड़ा सवाल है। वैसे घूमने और पिकनिक के ल‌िए यह जंगल सुखना और रॉकगार्डन से ज्यादा आकर्षक जगह है।
कुत्ता काटे तो खबर
समय के साथ मानक टूटते हैं। पत्रकार बंधुओं को सिखाया जाता है कि कुत्ता काटे तो खबर नहीं कुत्ते को कोई काटे तो खबर है। चंडीगढ़ में हर महीने हजार से 1200 डॉग बाइट्स के केस आ रहे हैं। सड़कों पर और सेक्टरों में लावारिस कुत्तों की दहशत है। प्रशासन और नगर निगम इससे निजात पाने के लिए लाखों रुपये खर्च कर रहा है। इसल‌िए कुत्ता काटना चंडीगढ़ में एक बड़ी खबर है। वैसे यह समस्या लोगों की पैदा की हुई। महंगे व‌िदेशी कुत्ते स्टेटस स‌िंबल हैं। घरों में स‌िर्फ उनके ल‌िए जगह हैं। अपनी वफादारी के लिए जाने जाते देसी नस्ल के कुत्ते लावारिस हो गए हैं। उन्हें अब कोई नहीं पालता। वे खाने के ल‌िए भटकते हैं और लोगों पर हमला करते हैं। कुत्ते सद‌ियों से इंसान के साथी रहे हैं। वे कहीं ओर नहीं जा सकते। दूसरी ओर हम विदेशों से ब्रीड मंगवा रहे हैं। विदेशियों के कुत्ते उनके ल‌िए उद्योग बन गए हैं और हमारे कुत्ते हमारे ल‌िए समस्या। यही होता है जब आप अपने आसपास की चींजों से प्यार नहीं करते। यह समस्या पैदा हुई है, क्योंक‌ि हमारा प्रेम भी द‌िखावटी है।
यह तो बहानेबाजी है
अब बात हो जाए अपने प्रधानमंत्री जी की। अच्छे द‌िन का वादा कर सत्ता में आए। मगर काम सारे उलटे हो रहे हैं। उस पर मोदी जी ट्व‌िट कर रहे हैं क‌ि उनकी अभी आलोचना न की जाए कम से कम एक साल का मौका तो दें। दूसरों को 67 साल द‌िए। मगर हमारे प्रधानमंत्री जो अपने कमजोर इत‌िहास ज्ञान के ल‌िए जाने जाते हैं, उनसे पहले क‌िसी को एक महीन का भी मौका नहीं मिला। कुर्सी संभालते ही नेहरू की आलोचना शुरू हो गई थी। महीना बीतने से पहले तो पाकिस्तान के मसले पर गांधी जी ने उन्हें अनशन पर जाने की चेतावनी दे दी थी। भारतीयों की नब्ज न समझने के ल‌िए राजीव गांधी की खिली भी सत्ता संभालने के बाद ही उड़ने लगी थी। पर क‌िसी ने भी मोदी की तरह आलोचनाओं पर ऐसी बहानेबाजी नहीं की। मोदी सरकार की आलोचना तो उसके उन्हीं फैसलों के ल‌िए हो रही. ज‌िन्हें ब‌िना विचारे लागू क‌िया गया है। जब लोग और बाजार ब्याज दरों में कमी की उम्मीद कर रहा था मोदी सरकार ने रेल किराये बढ़ाकर बता द‌िया कि उम्मीदें मायने नहीं रखतीं। यह सरकार कांग्रेस के द‌िखाये रास्ते पर ही चलेगी। नतीजा सामने है। बड़े निवेशक बाजार से न‌िकलकर फ‌िर सोने और डॉलर की ओर मुड़ गए हैं। बहानेबाजी छोड़ो भाई।
http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF/sukhana/

Friday, June 6, 2014

फेंकू पहलवान



फेंकू गांव में गुड़ से रोटी खा रहा था। गर्मी के दिन थे। खबू मक्खियां मंडरा रही थीं। जमीन पर जहां गुड़ का टुकड़ा गिरा मक्खियों का झुंड उस पर बैठ गया। फेंकू ने चप्पल उतार कर मारी और झुंड ढेर हो गया। उसने एक-एक कर गिना। पूरी तीन सौ मक्खियां मारी गई थीं। फेंकू ने पहलवानों की तरह एक व‌िजयी पट्टा बना कर अपने गले में डाल लिया- एक प्रहार में तीन सौ को मारा।
गले में पट्टा डालकर फेंकू पूरे गांव में घूमता। लोग अचानक उससे डरने लगे। सलाम ठोकने लगे। वह ज‌िधर निकलता लोग रास्ता छोड़ देते। किसी के खेत से गन्ना तोड़ कर खा लेता। क‌िसी के बाग से फल। कोई उसे टोकता नहीं। धीरे-धीरे उसकी ख्यात‌ि दूसरे गांवों तक बढ़ने लगी।
इलाके का राजा बहुत दबा कुचला समझा जाता था। जब चाहे पड़ोसी राज्य हमले की धमकी देकर मोटी धनराश‌ि बटोर ले जाते थे। इन द‌िनों जंगल में एक शेर का बहुत आतंक था। वह जंगल से निकल कर गांवों वालों पर हमला करता। रोज एक-दो को मार डालता। राजा के सैन‌िक उस शेर को पकड़ पाने में नाकाम रहे। राजा ने सब उपाय करके देख लिए। वह बहुत न‌िराश था।
एक द‌िन वजीर ने राजा को सुझाव द‌िया- महाराज आपके राज में एक ऐसा वीर आदमी है, ज‌िसने एक प्रहार में तीन सौ को मार डाला? क्यों न शेर को पकड़ने की ज‌िम्मेदारी उसे सौंपी जाए। मैंने उसके बारे में काफी सुना है।
राजा को पहले तो विश्वास नहीं हुआ क‌ि इतना बहादुर कोई व्यक्त‌ि उसके राज में हो सकता है। फिर उसने वजीर को आदेश द‌िया क‌ि फोरन उस आदमी को पेश क‌िया जाए।
सैन‌िकों का एक बड़ा झुंड गांव में पहुंच गया। उन्होंने फेंकू से कहा क‌ि तुम्हें राजा ने बुलाया है। फेंकू डर गया। वह पूरी तरह से घ‌िरा था। करता भी क्या। उनके साथ चल पड़ा। दरबार में पहुंचते ही राजा ने फेंकू को शेर पकड़ने का ज‌िम्मा सौंप द‌िया और ऐसा करने पर इनाम वरना जान से मारने की धमकी भी दी। फेंकू ने सोचा क‌ि वह राज छोड़ कर भाग जाएगा। उसने राजा से एक घोड़ा देने की मांग की। घोड़ा लेकर फेंकू जंगल की ओर निकला। रास्ते में रात हो गई। जंगल में शेर का डर था, इसल‌िए घोड़ा पेड़ से बांधकर पेड़ पर चढ़ गया। सोचा भोर होते ही दूसरे राज में न‌िकल जाएगा। रात को शेर आया और पेड़ के नीचे बंधे घोड़े को खा गया। पेट भर जाने पर उसे सुस्ती लगी और शेर वहीं सो गया। सुबह चार बजने को थे। धुंधलका था। फेंकू ने सोचा अब तो द‌िन न‌िकलने वाला है। अब भागूंगा तो पकड़ा जाउंगा। चलो घर चलते हैं। वह नीचे उतरा। उसे कुछ दिख नहीं रहा था। वह शेर की पीठ पर बैठा और आधी नींद में कान पकड़ उसे घर ले आया। शेर भी अचानक हुई इस हरकत से डर गया था। फेंकू ने शेर को दरवाजे पर रस्सी से बांधा और अंदर जा कर सो गया।
फेंकू शोर सुनकर सुबह जागा। हर कोई उसकी जयजय कार कर रहा था। आदमखोर शेर पकड़ा गया था। राजा ने फेंकू को बुलाकर भारी भरकम इनाम द‌िया और सेनापत‌ि नियुक्त कर द‌िया। अभी कुछ द‌िन बीते थे क‌ि पड़ोसी राज का पैगाम आ गया क‌ि या तो युद्ध लड़ो या दस हजार स्वर्ण मुद्रिका लगान भेजो। वजीरों ने सलाह दी-इस बार हमारा सेनापत‌ि फेंकू है, इसल‌िए हम लगान नहीं देंगे, युद्ध लड़ेंगे। राजा को सुझाव पसंद आया और युद्ध की तैयारी शुरू हो गई। फेंकू युद्ध के बारे में कुछ नहीं जानता था। उसने अपने ल‌िए उस घोड़े को चुना जो तीन टांग पर खड़ा था। वह राजा का अरबी घोड़ा था। राजा ने फेंकू की पसंद और जानकारी की दाद दी और युद्ध के ल‌िए उसे अपना घोड़ा भी दे द‌िया।
युद्ध का ब‌िगुल बज चुका था। फेंकू अपनी पलटन के आगे खड़ा था। उसने जैसे ही घोड़े को एड़ लगाई, वह हवा हो गया। वह तेजी से दुश्मन खेमे की ओर भागने लगा। फेंकू के बाकी घुड़सवार और सेना पीछे छूट गई। फेंकू बुरी तरह से घबरा गया। उसने देखा रास्ते में एक पेड़ है। सोचा- इसी को पकड़ कर लटक जाउंगा। घोड़ा जहां जाए उसकी मर्जी। अपनी जान बचेगी। फेंकू ने जैसे ही पेड़ को हाथ डाला। पेड़ में दीमक लगी थी। पूरा पेड़ उखड़कर उसके हाथ में आ गया।
उधर, दुश्मन सेना ने फेंकू के बारे में पहले ही काफी कुछ सुन रखा था। जब उन्होंने देखा क‌ि एक अकेला आदमी घोड़े पर उनकी ओर दौड़ा आ रहा है और उसने एक ही झटके से पेड़ भी उखाड़ लिए तो इतन बलशाली व्यक्त‌ि देखकर दुश्मन सेना के होश उड़ गए। वह मैदान छोड़ कर भाग गई। घोड़ा फेंकू को ल‌िए जब उनके पीछे-पीछे भागते थक गया तो रुक गया। राजा और पूरी सेना ने पहुंच कर फेंकू की जयजयकार की। राजा इतना प्रभाव‌ित हुआ क‌ि उसने अपनी बेटी की शादी फेंकू से कर दी और पूरा राजपाट सौंप कर जंगल में चला गया।

श‌िक्षा- अगर क‌िस्मत मेहरबान हो तो कोई भी फेंकू ‌सिर्फ पहलवान ही नहीं राजा भी बन सकता है।

Saturday, May 31, 2014

कैंसर और यूरेनियम का संबंध

सुधीर राघव
हरियाणा तथा पंजाब के कुछ इलाकों में कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इसका क्या रहस्य है, इसका अभी अध्ययन जारी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हालत लगभग ऐसी ही है, वहां भी कोई अध्ययन चल रहा है। इसकी जानकारी मुझे नहीं है। इस संबंध में पंजाब और हरियाणा में जो अध्ययन हुए हैं, उन्हें यहां आपसे शेयर कर रहा हूं। पंजाब के कैंसर प्रोन इलाकों में पानी में यूरेनियम की उपस्थिति सुरक्षित मात्रा से ज्यादा पायी गई है। हरियाणा के शहरों में रेडॉन गैस का स्तर नापा गया। कैंसर मरीजों के आंकड़े के साथ इसके चौंकाने वाले संबंध देखे गए। cancer

बात फेफड़ों के कैंसर की

धूम्रपान निषेध दिवस पर मैं यह कहना चाहूंगा कि इसमें कोई शक नहीं है कि दुनिया में फेफड़ों के कैंसर की प्रमुख वजह स्मोकिंग ही है। मगर यूरेनियम और फेफड़ों के कैंसर में भी परोक्ष संबंध की पूरी संभावना है। यूनाइटेड स्टेट्स एन्वायरमेंट प्रोटेक्शन एजेंसी की एक कुछ साल पहले की रिपोर्ट के मुताबिक वहां भी धूम्रपान के बाद रेडॉन डॉटर पार्टीकल्स ही फेफड़ों के कैंसर का दूसरा बड़ा कारण है।
क्या हैं रेडॉन डॉटर पार्टीकल्स
यूरेनियम उत्सर्जन से बनने वाले 11 एलीमेंट में से एक रेडान हैं, जो कि गैस है। यूरेनियन के बाद थोरियम और इसके बाद रेडियम निकलता, जिसमें से रेडान गैस निकलती है। रेडान विघटित होकर नए रेडियोएक्टिव पार्टिकल बनाती है। ये रेडान डॉटर्स सांस के साथ अंदर जाकर धूल के कणों की तरह फेफड़ों के वायुछिद्रों से चिपक जाते हैं और लंग कैंसर की वजह बनते हैं। परमाणु ऊर्जा विभाग के अधिकारियों के मुताबिक पंजाब, हरियाणा के हिसार और इसके आसपास के इलाके में जमीनी पानी में यूरेनियम की अधिक मात्रा है। इसकी वजह ग्रेनाइट चट्टानें हैं। वैज्ञानिकों और डाक्टरों का कहना है कि ग्रेनाइट चट्टानों के ऊपर की जमीन पर बने घर रेडान गैस चैंबर की तरह व्यवहार करते हैं। अब हालत यह है कि लोग घरों में ग्रेनाइट टाइल्स का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि सभी वैज्ञानिक यूरेनियम और कैंसर के संबंध पर एक मत नहीं हैं। उनका कहना है कि यूरेनियम से किडनी खराब होने की बात तो साबित हो चुकी है मगर कैंसर और इसके संबंध पर अभी अध्ययन बाकी है।

हरियाणा में तेजी से बढ़ता कैंसर

हरियाणा और खासकर हिसार के आसपास के इलाके में कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। रोहतक पीजीआई के कैंसर विभाग के अनुसार हर साल कैंसर के करीब तीन हजार नए मामले आ रहे हैं। इनमें से 40 फीसदी मुंह और गले के हैं, जबकि फेफड़ों के कैंसर के 15 से 20 फीसदी तक हो गए हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इनके पीछे एक बड़ी वजह धूम्रपान है। रेडियोथेरेपी विभाग के डाटा के मुताबिक पीजीआई के जनवरी 1980 से दिसंबर 2000 तक के रिकार्ड के मुताबिक फेफड़ों के कैंसर के मरीजों की संख्या 5.2 फीसदी ही थी। इसमें तेज बढ़ोतरी 1995-96 से शुरू हुई और यह करीब चार साल में बढ़ती हुई 6.5 फीसदी से 7 फीसदी तक पहुंच गई।
रिश्ता कुछ उल्टा
हरियाणा में रेडॉन के स्तर और गले के कैंसर को लेकर तीन भौतिकविद शोध कर चुके हैं। डॉ. के. कांत, डॉ. आरपी चौहान और डॉ. एसके चक्रवर्ती के इस शोध में पीजीआई रोहतक से मरीजों के आंकड़े और वर्ष 2001 की जनसंख्या के आंकड़ों को आधार बनाया गया। इस शोध में पाया गया कि रेडॉन स्तर और गले के कैंसर में हॉर्मेसिस संबंध है, यानी रेडॉन की बड़ी खुराक से ज्यादा खतरा एक औसत छोटी खुराक वाली जगह में है। पाया गया कि हरियाणा के जिन शहरों में रेडॉन का स्तर 150 बीक्यू/मीटर क्यू है वहां रोगियों की संख्या ज्यादा और जहां यह 300 से ऊपर है वहां कम पायी गई। इससे पहले अमेरिका में हुए शोध में भी कुछ ऐसा ही नतीजा आया था।
जिले औसत रेडॉन स्तर (बीक्यू/मीटर क्यू)
कुरुक्षेत्र 92
झज्जर 115
सिरसा 118
जींद 139
भिवानी 152
रोहतक 159
हिसार 190
यमुनानगर 269

नोट- अन्य शहरों का डाटा जानने और पूरा लेख पढ़ने के ल‌िए इस ल‌िंक पर जाएं  http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A5%8D%E0%A4%AF/cancer-2/

Sunday, May 25, 2014

कैंसर की अंत‌िम स्टेज

कैंसर समाज में फैल रहा है। तेजी से। साधन सीमित हैं और मरीज लगातार बढ़ रहे हैं। मुझे लगता है, अमरत्व की इच्छा से हमारे जीन बदल रहे हैं। कुछ जीन ऐसे सेल्स बनाने लगते हैं जो मरते नहीं। मेरी धारणा दर्शन से प्रेर‌ित है, वह वैज्ञान‌िक नहीं है। डॉ. अवधेश कुमार पांडे बताते हैं-कैंसर की वजह हमारा लाइफस्टाइल है। यह तेजी से बदला है। हमारी शरीर की उम्मीद से भी तेज। म्युटेशन भी कारण है, मगर लाइफ स्टाइल का बदलना ही मुख्य है? वह पूछते हैं- आप ही बताओ अब कौन साइक‌िल चलाता है? कौन पैदल चलता है। हफ्ते में तीन से चार द‌िन बाहर खाना जरूरी है? उनके सवाल मुझे चुप कर देते हैं। डॉ. पांडे चंडीगढ़ के सरकारी मेडीकल कालेज के रेडियोलॉजी ड‌िपार्टमेंट के हेड हैं। cancer1
रोज साठ से सत्तर मरीज उनके पास आते हैं। वह सुबह से देर शाम तक उन्हें देखते हैं। हर मरीज की पूरी बात सुननी, र‌िपोर्टस देखने, प्रोग्रेस जांचने में समय लगता है। वह बताते हैं मरीज की मानस‌िकता पहली चुनौती है। बीमारी का नाम सामने आते ही वे खाना-पीना छोड़ देते हैं। वजन कम होता है। होमोग्लोब‌िन ग‌िरता है। खून में क्रिटोन्स और यूर‌िया बढ़ने लगता है। ऐसे में कीमों और रेड‌ियोथेरेपी देना मुश्किल हो जाता है। इसके इलावा कोई इलाज नहीं है। इसल‌िए वह मरीजों को हौसला देते हैं। युवराज स‌िंह की कहानी सुनाते हैं। सौ की उम्र के बाद कमाल करने वाले फौजा स‌िंह का हौसला बताते हैं। एक के बाद एक उदाहरण देते हैं। वह अपनी डॉक्टर पत्नी का भी उदाहरण देते हैं। बीमारी के खिलाफ वह कैसे लड़ीं और एक द‌िन भी काम नहीं छोड़ा। अब पूरी तरह स्वस्थ हैं। यह मरीज के ल‌िए दवा से ज्यादा कारगर है। उसकी आंखों में चमक और चेतना लौटती है। मगर इस सब में इतना टाइम लगता है क‌ि अक्सर डॉक्टर पांडे अपना लंच वापस घर ले जाते हैं। सुबह आठ बजे से देर शाम तक उनका यही रुटीन है। उनके पास आने वाले काफी मरीज बहुत गरीब पर‌िवारों से हैं। एक बच्ची अपनी मां का इलाज करवा रही है। पिता की मौत पहले ही हो चुकी है। वह तीन महीने पहले मां को गांव से लेकर आई थी। कोई और देखरेख करने वाला नहीं है। उस बच्ची और कैंसर मरीज मां के लिए डॉक्टर ही मसीहा हैं। वह बताती है- हमें सारा इलाज और टेस्ट यहीं मुफ्त में मिल रहा है। खाना तो कोई भी खिला देता है। कैंसर का यह पहलू बताता है क‌ि मानवीयता आदर्श रूप में कैसे बुझी आंखों में नम चमक लाती है।
कैंसर का दूसरा पहलू
कैंसर का दूसरा पहलू बाजार में है। यह दवा का बाजार है। कीमो के ल‌िए पेक्लीटेक्सल इंजेक्शन। एक न‌िश्च‌ित मात्रा की और एक कंपनी की प्रिंट कीमत है 10 हजार 203 रुपये। अस्पताल में मौजूद कै‌म‌िस्ट शाप पर यह इंजेक्शन 3700 रुपये में म‌िल रहा है। इस हैवी ड‌िस्काउंट से मरीज खुश है। दवा लेकर जब मरीज पहुंचता है तो उसे स्टाफ से पता चलता है क‌ि यह और भी सस्ता है अगर वह दूसरे सेक्टर की दुकान से इसे खरीदे। दूसरी कीमो दो हफ्ते बाद लगनी है। अगली बार मरीज दूसरे सेक्टर की दुकान पर जाता है। उसी कंपनी का वही और उसी मात्रा का इंजेक्शन 2300 रुपये में मिलता है। प्रिंट रेट इस पर भी उतना ही है। कैंसर में दवा का यह क्या खेल चल रहा है? मरीज असमंजस में है। उसे लगता है क‌ि उसे ठगा जा रहा है। कैंसर के ल‌िए मदद की बहुत सी घोषणाएं हैं मगर सेहत मंत्रालय की नजर इस प्रिंट रेट की कहानी पर नहीं है, जहां कैम‌िस्ट की मनमानी चलती है। इतना ही नहीं सरकार तो कैंसर मरीजों से दवा पर पांच फीसदी वैट भी वसूल रही है। कैंसर का यह पहलू मरीज की आंखों फिर उदासी भर देता है।
समाज में कैंसर
बड़ी बी सहारनपुर से बेटी का इलाज कराने आई हैं। बेटी को कीमो लगा है। इस चढ़ने में चार घंटे लग जाते हैं। डे-केयर के सभी बैड मरीजों से भरे हैं। कुछ मरीज कीमो के ल‌िए अपनी बारी का बाहर इंतजार कर रहे हैं। समय काटने के ल‌िए पड़ोस के मरीज के साथ आई मह‌िला से बातचीत शुरू हो जाती है। बड़ी बी की कहानी कुछ अलग है। परिवार के सभी मर्द लोग साउदी अरब में हैं। बेटे ने जो सूचना दी है, उसने उनकी चिंता और बढ़ा दी है। बेटे ने कहा है क‌ि वह अगले महीने इंग्लैंड जाएगा। बड़ी बी बता रही हैं- इंग्लैंड तो बड़ा देश है। वहां से दो साल बाद ही आ सकेगा। साउदी अरब उतना बड़ा नहीं है। वह तो घर जैसा समझो। दूसरे-तीसरे महीने में आ जाता था। घर पर बहू है। बच्चे हैं। यह पूछने पर क‌ि वोट क‌िसे डाला। वह उसी सांस में तेजी से कहती हैं- हमें वोट से कौन सा फायदा है। क‌िसी की सरकार बनो। हमारे बच्चों को तो दूसरे ही देश में रोजगार है। औरतें-औरतें घर में रहवैं हैं। हमारे तो मर्दों ने भी कह दिया है कि जो कहवे उसने वोट डाल द‌ियो। वोट ले लो भाई पर हमें शांत‌ि से रहने दो। हम तो और कुछ नहीं चाहते।


(इस लेख को पूरा पढ़ने के ल‌िए आप इस ल‌िंक पर जा सकते हैं-  http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF/cancer/

Thursday, May 8, 2014

फेंकू पीएम कब बनेगा

-सुधीर राघव
फेंकू बहुत ऊंची-ऊंची फेंक रहा है। पब्लिक कूद-कूद कर लपक रही है। फेंकू का मुंह बबलगन हो गया है। उससे निकले बुलबुले पूरे आकाश को ढके ले रहे हैं। इन बुलबुलों पर जनता मोहित है। ताल‌ियां पीट रही है। जय-जय चिल्ला रही है। हकीकत का हाथ लगते ही ये बुलबुले फूटने वाले हैं। पर किसे परवाह। जो समझाने या रोकने की कोशिश करता है, जनता थप्पड़ मार कर गाल सुजा देती है।
फेंकू के चेले भी गुणगान पाठशाला चला रहे हैं। एक येड़ा चमचा जिसकी डंडी प‌िछले चुनाव में टेढ़ी हो गई थी बता रहा है-जानते हो इस बार पीएम कौन बनेगा। पब्ल‌िक चिल्ला रही है-फेंकू।
चमचा- पाकिस्तान को सबक कौन स‌िखा सकता है?
पब्ल‌िक- फेंकू।
चमचा-चीन को सबक कौन स‌िखा सकता है?
पब्ल‌िक- फेंकू।
चमचा-अमेर‌िका को सबक कौन सिखा सकता है?
पब्ल‌िक- फेंकू।
ऐसे जवाब सुन चमचा अपार संतुष्ट‌ि से गदगद है। ऐसे निहार रहा है-जैसे कोई गिरी का शेर अपने पिंजरे में भेजे गए मैमने को देखता है। आंखों का यह आलस अंदाज को शाही करता है। शिकार कहां जाने वाला है, जब मन करेगा खा लेंगे।
उधर, बाबा फेंकू योग स‌िखा रहा है-बच्चा! थोड़ा और ऊंचा फेंको। थोड़ा सांस खींचो, बच्चा! बच्चा और ऊंचा! सांस रोको बच्चा! सांस छोड़ो बच्चा!बुलबुले ऐसे आएं, जैसे विदेश से काला धन लौट के आ रहा है। बुलबुले पब्लिक के सिर से इतने ऊंचे रखो क‌ि हाथ न लगे बच्चा!
पब्ल‌िक को मस्त देखकर बाबा भी गदगद है। लूटो बुलबुला। ये सब तुम्हारे ल‌िए है। लूटो-लूटो बच्चा लूटो। अच्छे द‌िन आ रहे हैं। पब्ल‌िक पर इतना पहले कभी क‌िसी ने नहीं लुटाया।
एक कौने में छुपकर व्यापारी पानी में अच्छे ब्रांड का साबुन घोल रहा है, ताक‌ि बुलबुले अच्छे बनें। घोल तैयार करके फेंकू के मुंह में फेंका जा रहा है। सब ध्यान रख रहे हैं क‌ि साबुन की कोई कमी न पड़े। साबुन की क्वाल‌िटी देखकर व्यापारी गदगद है।

ब्लां..ब्लां..ब्लां..ब्लां। फेंकू का मुंह बबलगन की तरह चल रहा है। रंग-बिरंगे बुलबुले निकल रहे हैं। केसरिया, हरा, नीला, पीला। ये बुलबुला बेरोजगारी दूर करेगा। ये बुलबुला डवलमेंट लाएगा। ये बुलबुला धर्मनिरपेक्ष है। ये बुलबुला युवाओं के ल‌िए। ये बुलबुला मह‌िलाओं के ल‌िए।

Friday, May 2, 2014

ऐसे खिलेगा कमल

कीचड़ में कमल अपने आप खिलता है। कीचड़ से बाहर कमल खिलाना एक कला है। इस कला पर देश का एक बड़ा बिजनेस चलता है। साल में एक दिन कमल के बिजनेस के नाम होता है। असल में व्यवसाय के उद्देश्य से कमल की कल‌ियों को तालाबों से तोड़ा जाता है। मांग के अनुरूप इनकी देशभर में सप्लाई होती है। कमल कली की ज्यादा मांग मंद‌िरों और श्रद्धालुओं की ओर से होती है। वह भी खासकर द‌िवाली के दिन। इस कली को खिलाना भी सब नहीं जानते। इसे खिलाने का एक खास तरीका है। पुजारी और पूजापाठी गृहस्थ ही इसमें स‌िद्ध हस्त होते हैं। अनाड़ी तो अपनी कली खराब कर लेते हैं। हम आपको बताते हैं कि कमल कैसे खिलेगा। कली को कमल बनाने के ल‌िए हाथ के अंगूठे और अनामिका को मिलाकर गोलाकार बनाएं। इस पर कली को रखें। दूसरे हाथ से कली के शीर्ष पर बड़ी सधी हुई चोट मारें। इसके बाद एक-एक पंखुड़ी को पकड़ कर खिला दें। कमल खिल जाएगा।
अब बात राजनीत‌ि के कमल की
राजनीति का कमल भी इसी तरह खिलाया जाएगा, यह बात पोल‌िट‌िक्स के पंड‌ितों को भी हैरान कर देती है। इसके ल‌िए भ्रष्टाचार और विद्वेष के जहर से ज‌ितना कीचड़ जुटाया गया उससे कली तो बन गई। इसी कली को खिलाने का उतावलापन इतना ज्यादा रहा क‌ि उस पर जरूरत से ज्यादा चोट मारी गई। नतीजा आधार की कई पत्त‌ियां टूट गईं और कई रूठ गईं। अब अनाड़ीपने से खिलाए गए कमल में क‌ितना सौंदर्य और गर‌िमा आ पती है यह तो वक्त ही बताएगा।

यह लेख पूरा पढ़ने के ल‌िए इस ल‌िंक पर जाएं
http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF/lotus/
 

Friday, April 18, 2014

नमक का नया दारोगा

फ्रांस में कहावत है- कभी-कभी सच्चाई बहुत असंभव प्रतीत हो सकती है और इसके ठीक उल्ट कई बार ऐसी असंभव बात भी सच प्रतीत हो सकती है जो कभी हुई न हो। leader
अर्थात कुछ ऐसे झूठ होते हैं जो कि इसलिए सत्य मान ल‌िए जाते हैं क‌ि सभी लोग यह सोचते हैं कि वहां ऐसा ही है, और जो ऐसा झूठ अपनी कल्पना से भी कहता है तो वह सत्यवादी हो जाता है। सभी समाजों में ऐसी स्थिति आती है। फ्रांसीसी समाज ने इसे समझा और वहां यह लोकप्रिय कहावत बन गई। दूसरी ओर हमारे यहां पर‌िवारों और समाज में जब दोनों पक्ष ऐसे ही सत्य का सामना करते हैं तो ताकत और बहुमत से खुद को सच्चा साब‌ित कर देते हैं। ऐसे सच हमारे पर‌िवार और समाज में सबसे ज्यादा लड़ाइयों को जन्म देते हैं। और कुछ लड़ाइयां खानदानी बन जाती हैं। फ्रांसीसियों की तरह हम इसे समझ नहीं पाये।
अब बात करते हैं नमक के नए दारोगा की। पुराना दारोगा तो मुंशी प्रेमचंद का वंशीधर था। नए दारोगा कहते हैं क‌ि उन्होंने भी बंशीधर से प्रेरणा ली है। वंशीधर ने अपनी नौकरी लगते ही छह महीने के भीतर पंडित आलोपदीन को तस्करी करते हुए पकड़ ल‌िया था। संजय बारू सम्मानित संपादक, नीत‌ि विश्लेषक वर्ष 2004-2008 तक प्रधानमंत्री मनमोहन स‌िंह के मीड‌िया सलाहकार और चीफ स्पोक्सपर्सन रहे। इन चार साल में उन्होंने क‌िसे-क‌िसे पकड़ा यह उतना लोकप्रिय नहीं है। इसके छह साल बाद वह अपनी क‌िताब में प्रधानमंत्री की हैसीयत सामने लाते हैं, जो ठीक वैसी ही है, जैसी क‌ि देश में पहले से प्रचार‌ित है क‌ि उनकी नहीं चलती। यह सत्य इसल‌िए सत्य है क्योंक‌ि सबको स्वीकार्य है। नमक के दारोगा बंशीधर ने जब पंडित आलोपदीन को पकड़ा तो वह अदालत से बाइज्जत बरी हो गए। बंशीधर पर खूब ताने पड़े। वहीं ऐसा सत्य कहने के ल‌िए बारू की चारों और प्रशंसा हो रही है।
अब सवाल उठता है क‌ि क्या मुंशी प्रेमचंद समाज के सत्य को नहीं पहचानते थे। क्या उनका सत्य झूठा था या बारू का सत्य सच्चा है। मनमोहन स‌िंह का स्वागत पंड‌ित अलोपदीन जैसा नहीं हो रहा। वंशीधर की तरह अकेले मौन हैं। हो सकता है उनका सामना भी दुनिया के एक नए सच से हुआ हो।
अंत फिर उसी निष्कर्ष पर आते हैं। सच और झूठ मान्यताओं से माने जाते हैं। असली सत्य क्या है? शायद ही सब जान सकें। हो सकता है बारू की बात ही सत्य हों या नहीं भी। पर उनकी टाइम‌िंग लाजबाव है। एक पद से रुखसत होने वाला प्रधानमंत्री किसी का क्या ब‌िगाड़ लेगा। यही है एक मान्य सच वाला नमक का नया दारोगा। जो कुछ दांव पर नहीं लगाता। शोहरत भी कमाता है और रायल्टी भी कमाएगा।

यह लेख पूरा पढ़ने के ल‌िए इस ल‌िंक पर जाएं

http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF/sanjaya-baru/ 

Wednesday, April 9, 2014

घर्र-घर्र मोदी


हर्र-हर्र मोदी। घर्र-घर्र मोदी। बच्चे गली में नारे लगा रहे हैं। आज का बच्चा टीवी से ज्यादा सीखता है और टीचर से कम। घ पर लहजा ठेठ पंजाबी है। मगर हर्र का अर्थ पूर्वांचल से लोगे तो नारा सार्थक हो जाएगा। मोदी भी महादेव से तुलना के पाप से मुक्त हो जाएंगे। पूर्वांचल के मित्र हरड़ को हर्र बोलते हैं। जिन्होंने बस में यात्रा की है वे हर्र या हरड़ की मह‌िमा से पर‌िचत हैं। चूरण बेचने वाले हर्र को पेट के सभी रोगों का रामवाण बताते हैं। सोशल मीडिया में मोदी प्रेमी भी ऐसा ही प्रचार कर रहे हैं। मोदी को देश की सभी समस्याओं का हल बताया जा रहा है। गाड़ी कैसे स्टार्ट होती है, यह उसकी बैटरी पर निर्भर करता है। स्टार्ट होने से पहले यह घर्र-घर्र करती है। भाजपा को भी बड़ी उम्मीद है कि इस बार उसकी गाड़ी स्टार्ट हो जाएगी। इसल‌िए हर-हर और घर-घर की तुलना में हर्र-हर्र और घर्र-घर्र का नारा ज्यादा सार्थक लगता है। कहते हैं बच्चों में दैवीय तत्व ज्यादा प्रखर होता है। इसल‌िए अक्सर वे ज्यादा सार्थक चीजें खोज लाते हैं। ऐसी चीजें जिनके आगे अकल के बड़े-बड़े घोड़े भी गधे साब‌ित होते हैं।

विकास का मतलब

विकास का मतलब है दूध की रक्षा। दूध की रक्षा के लिए सभी दलों का अपना-अपना मॉडल है। इसे ही विकास का मॉडल कहा जाता है। कांग्रेस के कलमाडी छाप ‌विकास मॉडल पर खुद ही दूध पी जाने का आरोप है। इसल‌िए भाजपा के पास दूध की रक्षा के ल‌िए येदुरप्पा छाप वैकल्प‌िक मॉडल है। यही है विकास का गुजरात मॉडल। इसी तरह एक झाड़ू मॉडल है, जो आम आदमी की समझ से बाहर है।
पते की बात
कुछ नेता डींग मार रहे हैं कि उनकी रैल‌ियों में खूब भीड़ जुट रही है। ऐसे नेताओं को गायक मीका चुनौती दे रहे हैं। कुछ दिन पहले चंडीगढ़ आए मीका ने कहा क‌ि नेताओं से ज्यादा भीड़ तो मेरे एक कार्यक्रम में होती है। सही है पब्ल‌िक मनोरंजन मतलब है। मनोरंजन चाहे मोदी करे या मीका। जहां होगा मनोरंजन वहीं पहुंच जाएगी भीड़। मनोरंजन में राष्ट्रवाद का नुस्खा हमेशा काम करता है। विश्वास नहीं होता तो निर्माता-निर्देशक-अभिनेता मनोज कुमार से पूछ लो।

धर्म और राजनीति

जब तक राजनीत‌ि में धर्म न मिलाया जाए तब तक पता नहीं चलता क‌ि भारत में चुनाव हो रहे हैं। वोट क‌िसे देना है यह धार्म‌िक नेता तय करें। धर्म स्थल बनना है या नहीं यह घोषणापत्र में न आए तब तक चुनावी माहौल नहीं बनता। इसल‌िए बुखारी और बाबा सब अपने-अपने तरीके से लोगों को बता रहे हैं।
इस लेख को पूरा पढ़ने के ल‌िए इस ल‌िंक पर जाएं
 http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF/modi/

Sunday, April 6, 2014

नेत‌ि-नेत‌ि नेता

सुधीर राघव
शायर ने कहा है- परखना मत, परखने सो कई अपना नहीं रहता...। मगर वक्त बलवान है। आप परखें या न परखें। आदमी की पहचान हो ही जाती है। अगर आदमी नेता है तो यह वक्त और जल्दी-जल्दी आता है। नेता गजब चीज है- हर बार नया चरित्र सामने आता है। फिर शायर याद आता है-हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी।
पिछले बीस साल से नेता पर रिसर्च कर रहा हूं, अब तक पूरी नहीं हो पायी है। चाल-चलन, रंग-रूप, काम-काज, वायदे-शायदे, उम्र-व्यवहार, रिश्ते-नाते। सब पर टाइम खपाता हूं। यह सोच कर रिसर्च पेपर तैयार कर लेता हूं, इस बार फाइनल है। मगर नेता कोई नया गुल खिला देता है। सारे निष्कर्ष पलट जाते हैं। पूरा रिसर्च रद्दी हो जाता है।
अब नए स‌िरे से जुटा हूं। हमारे जैसे नेता-रिसर्च प्रेमियों के ल‌िए चुनाव वैसा ही महत्त्व रखते हैं, जैसा खगोल वैज्ञानियों के लिए सूर्य ग्रहण। जहां ग्रहण पड़ता है, वे अपनी दूरबीन लेकर पहुंच जाते हैं और उन्हें खगोलीय पिंडों के करेक्टर का सटीक आकलन मिलता है। उनका रिसर्च पूरा हो जाता है। जब चुनाव होता है, मैं भी अपनी दूरदृष्टि खोल लेता हूं। मगर नेताओं के चर‌ित्र से जो डाटा जेनरेट होता है, वह मेरे होश उड़ा देता है। उसमें इतना बदलाव होता है कि सारा र‌िसर्च ध्वस्त हो जाता है।
यही हाल पार्ट‌ियों का भी है। मनो‌वैज्ञानिक से रिसर्च में मदद के लिए सूत्र पूछ रहा हूं। उसने बेस लाइन दी है कि खुशी और दुख में ही चरित्र की असली पहचान होती है। इस चुनाव में भाजपा सबसे खुश पार्टी है। आधा रिसर्च पेपर तैयार है- पार्टी विद डिफरेंट, चाल-चरित्र, बुजुर्गों का सम्मान, देशभक्त‌ि, हिंदू रक्षक आद‌ि-आदि बस निष्कर्ष से मिलान बाकी है। मगर खुशी से फूली इस पार्टी ने बेस लाइन ही हिला दी है। इतने कांग्रेसी और दागी पार्टी ने अपने साथ जोड़ लिए हैं कि डिफरेंट शब्द बेमानी हो गया है। हेडगेवार और गुरगोलवलकर की जगह सरदार पटेल की प्रतिमा बनवाने के लिए चंदा और सामान जुटा रही है। भाजपा ही असली कांग्रेस नजर आ रही है। प्रचार में झूठ-सच का व‌िक‌िलिक्स चाल और चर‌ित्र दोनों को ही बता रहा है। पहले आतंकवादियों को कंधार छोड़ कर आए थे, इस बार टुंडा और दूसरे आतंक‌ियों को पता नहीं दुबई छोड़ने जाएं, विश्वास नहीं होता। ताबूत घोटाला। सब बातें देशभक्ति वाले प्वाइंट को हिला रही हैं। हिंदू रक्षक अब ह‌िंदुत्व पर चुप हैं। निष्कर्ष से पूरी बेस लाइन में भूचाल आ गया है।
चुनाव में कांग्रेस सबसे दुखी पार्टी है। कांग्रेस के चरित्र को लेकर शुरू से ही कन्फयूज हूं। घास तरह-तरह सूखते-सूखते भी हरी रहती है। पाश की कविता याद आती है- मैं तां घाह हां, तुहाडे हर कित्ते कराये ते उग आवांगा। यानी तुम्हारे सब करे-कराये पर उग आउंगा। अटल युग ने जितना किया उस पर यह फिर उग आई। इस पार्टी का चर‌ित्र आंकने के ल‌िए तो शब्द ही नहीं मिलता। एक शब्द उठाता हूं, चर‌ित्र पर ब‌िठाता हूं, उससे पहले चरित्र ढेर हो जाता है। ज्ञानी कहते हैं दुनिया क्षणभंगुर है और अज्ञानी देखता है फिर भी यह कायम है। कांग्रेस पर तो रिसर्च पेपर शुरू ही नहीं हो पा रहा है।
बाकी दल ऐसे हैं क‌ि आकलन करूंगा तो भी कुछ हाथ नहीं आने वाला। लगता है, इस चुनाव में भी मेरी रिसर्च पूरी होने वाली नहीं।

Thursday, April 3, 2014

चलो उल्लू बनावें

वफादारी की कीमत
इस चुनावी मौसम में कुछ गैर चुनावी बात करते हैं। वफादारी और उसकी कीमत की बात करते हैं। कुत्ता सबसे वफादार जानवर है। यह प्रस्ताव बचपन में पढ़ा था। अब आंखों देखी कहता हूं। सेक्टर के पड़ोसियों ने दस हजार रुपये में पग खरीदा। नाम रखा डॉन। साथ खाता। साथ पीता। साथ गाड़ी में घूमता। साथ ही सोता। तीन-चार महीने उसकी खूब सेवा की। एक दिन वह घर से गायब हो गया। पूरा घर बेचैन। सब डॉन की तलाश में। करीब छह महीने बाद कुछ चार-पांच सेक्टर दूर एक घर में डॉन दिखा। उस घर वाले का कहना था कि उसने छह महीने पहले इसे 12 हजार में खरीदा है। मामला पुलिस में पहुंच गया। पुलिस ने दोनों पक्षों को आसपास खड़ा किया। जिसके पास पग मिला पहला मौका उसे दिया गया। उसने जैसे ही शेरू कहा। पग दौड़ कर उसके पास पहुंच गया। पेर सूंघने लगा। लगा यह कुत्ता तो जन्म-जन्म से इनका है। इसके बाद पड़ोसी के परिवार को मौक दिया गया। उसने दूसरी ओर से जैसे ही डॉन कहा- कुत्ता दौड़ कर उनके पैरों में लोट गया। सब हैरान। पुलिस असमंजस में। मामला फिर जांच के लिए अटक गया। यह कुत्ता तो वफादार नहीं निकला। ये विदेशी कुत्ते हैं। इनकी ऊंची कीमत है। अब देसी कुत्तों की बात करता हूं। वे आज भी वफादार हैं। मगर अब वह सेक्टर में किसी के घर में नहीं बाहर सड़क पर मिलते हैं। रात को जब हम जैसे पत्रकार लौटते हैं तो झुंड बना कर हमारी गाड़ी पर भौंकते हैं। पूछते हैं वफादारी की कीमत क्या है?
नेता की कीमत
चंडीगढ़ के एक बड़े नेता हैं। पार्टी ने ‌ट‌िकट नहीं दिया तो रूठ गए। तीन-चार दिन तक रूठे रहे, फिर अचानक मान गए। लोगों को उनका रूठना तो समझ में आया पर मानना नहीं। यह अभी तक राज है मगर पार्टी में ही उनके विरोधी चुटकी ले रहे हैं कि लगता है उन्हें चंडीगढ़ का मेयर बनाने का लालच दिया गया और वह मान गए। इसे कहते हैं, देख दिनन के फेर।
मामा-भांजा
इस शीर्षक से भले कंस और कृष्ण की कहानी याद आती हो। मगर चंडीगढ़ में चुनाव अधिकारी ने इस विषय पर नाटक करने से विपक्षियों को रोक दिया। पूर्व रेलमंत्री यहां से फिर मैदान में हैं और उनके भांजे को सीबीआई ने माम के नाम पर पैसे लेते गिरफ्तार किया था। सीबीआई पूर्व रेलमंत्री को क्लीनचिट दे चुकी है। अधिकारी का कहना है, प्लीज नो पर्सनल कमेंट।
लच्छेदार बातें
मोदी अपनी कम बौद्धिक और ज्यादा लच्छेदार बातों के लिए लोकप्रिय हैं। उस लच्छे को खोलो तो शायद ही उसमें कुछ निकले। इसके लिए वह सेना का बिना सिर वाला कंधा भी इस्तेमाल कर रहे हैं। वह बताते हैं कि जवानों के स‌िर पाक द्वारा काटे जाना सरकार की कमजोरी है। यह बात भी लच्छेदार है। सेना को खुद अपने सिरों की और देश के सम्मान की रक्षा करनी होती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सेना को सुरक्षा दें तो यह विचार और भी रोचक है। पीएमओ सिर्फ युद्ध की घोषणा कर सकता है या ज्यादा से ज्यादा उनके दूत को बुलाकर फटकार सकता है। पहला कदम मूर्खता होता और दूसरे से पाक को कोई फर्क नहीं पड़ता। मोदी की बात का अर्थ भले न हो पर यह बात भोली जनता के द‌िल को छूती है। यह देश द‌िलवालों का है दिमाग की बात अमेर‌िका को करने दो।
सुधीर राघव

इस लेख को पूरा पढ़ने के ‌लिए इस ल‌िंक पर जाएं
 http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF/owl/

Friday, March 7, 2014

नेता को नौकर कैसे बनाएं




indian_politics
दृश्य
चुनाव सिर पर हैं। नेता जी द्वार पर। मुख से एक ही आवाज है- हम तो आपके नौकर हैं। बस सेवा का एक मौका दीजिए। चेहरे पर मुस्कान खिंची है। कुछ झेंप भी है। हिचक है- पब्ल‌िक सब जानती होगी। कैसी सेवा? कोई पूछ न बैठे।
पब्लिक का हाल
नेता को कोसने वाले खूब हैं। मगर मुंह पर सब खिले चेहरे से मिलते हैं। मुस्कान ऐसी की गाल खींच कर बना दी हो। सब हाथ जोड़ कर कहेंगे- जी पक्का। आपको ही वोट देंगे। कोई ‌विरोध में जोर से बोले भी तो उसे बांका वीर मत समझना। जांचोगे तो विरोधी पार्टी का वर्कर निकलेगा। 
नेता का गणित
50 फीसदी प‌ब्ल‌िक भी वोट डालने नहीं जाती। मैदान में दस से बारह उम्मीदवार। 20 फीसदी वोट मिल गए तो जीत पक्की। 15 फीसदी पार्टी का कैडर वोट है। 5 फीसदी ‌अपनी ब‌िरादरी का वोट है। 5 फीसदी वोट शराब की बोतल दिलवा देगी। यानी भारी बहुतम से जीतेंगे। जाह‌िर है, ऐसा नेता खुद को संव‌िधान से भी ऊपर मानेगा। वह स‌िर्फ कैडर और ब‌िरादरी की सुनेगा। बाकी पब्ल‌िक जाए भाड़ में।
नौकर बनाने का फार्मूला
नेता को ज्यादा जवाबदेह बनाने का एक ही फार्मूला है। हर वोटर मतदान करे। वोट‌िंग 90 से सौ फीसदी पहुंचा दो। नेता को जीत सुन‌िश्च‌ित करने के ल‌िए 50 फीसदी वोट चाह‌िए। 15 फीसदी के कैडर वोट से क्या होगा? 5 फीसदी बिरादरी भी ऊंट के मुंह में जीरा। शराब की बोतल भी क्या कर लेगी। जीतना है तो सबकी सुननी होगी। काम करने होंगे। ऐसा करेगा तो समझो नेता सुधर गया। …तो भाइयो इस बार मतदान से मत चूकना और बहनो आप भी। वोट‌िंग नब्बे फीसदी से ऊपर हो तो देखो राजनीत‌ि कैसे सुधरती है।

मेरा ये लेख अमर उजाला ब्लाग पर भी है। इस ल‌िंक पर जाएं। 
http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF/%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%A4%E0%A4%BE/

Thursday, March 6, 2014

नारी और नीति

-सुधीर राघव 

पब्लिक ने अव्यवस्था के पेड़ पर उल्टे लटके तंत्र के बेताल को काबू कर फ‌िर से अपने कंधे पर लाद लिया लिया। बेताल ने पहले छूटने की बेकार कोश‌िश की। नाकाम होने पर हर बार की तरह फिर रास्ता काटने के नाम पर किस्सा सुनाने लगा।

बेताल ने बोलना शुरू किया-यह प्राचीन नहीं अति प्राचीन काल की बात है। चंपावत नाम का एक राज था। उस राज में नारी का बड़ा सम्मान था। राजदरबार में रानी भी राजा के बराबर की गद्दी पर बैठती थी। राजा हर काम और फैसले में उसकी राय लेता था। जनता दोनों की आरती उतारती थी और सब सुखी थे।

एक दिन दरबार में पश्चिमी राज्य से भागकर आए कुछ लोग पहुंचे। काफी दयनीय हालत में थे। दास जैसी हालत। उन्होंने आकर राजा से रहम की अपील करते हुए शरण मांगी। राजा को संकोच हुआ मगर रानी को उन पर दया आ गई। रानी ने कहा क‌ि इन्हें कोई काम दे द‌िया जाए।

राजा ने उनसे पूछा क‌ि तुम क्या काम कर सकते हो। उनमें जो बुजुर्ग था उसने कहा-हम आपके लोगों को श‌िक्षा दे सकते हैं।
शिक्षा!-राजा ने चौंक कर पूछा-वह क्या होती है?

बुजुर्ग ने कहा- हम आपको नई-नई बातें स‌िखा सकते हैं।
राजा को लगा क‌ि ये लोग उपयोगी हो सकते हैं उन्हें दरबार में रख लिया। उधर, दासों की उस टोली ने जब दरबार में अपनी आंखों से रानी का महत्त्व देखा तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने मिलकर प्लान बनाया। उनमें जो युवा थे, बुजुर्ग ने उनके सिर को एक खास अंदाज में मुड़वा कर पीछे एक मोटी चोटी छुड़वा दी, जो स्त्री जैसा आभास देती।  युवाओं को चंदन और केसर के लेप से सजाया गया। अगले दिन दरबार सजा। सभी दास साफ-सुथरे नए रूप में थे। उनका अलग रूप काफी भव्य लग रहा था। राजा और रानी भी इससे प्रभाव‌ित हुए।

राजा ने उनसे पूछा- हां तो आज क्या नई बात स‌िखाओगे?

बुजुर्ग ने इजाजत लेकर कहा- आज की सीख है, नारी नरक का द्वार है।

सुनते ही चारों ओर सन्नाटा छा गया। राजा ने कड़क कर पूछा - यह क्या बक रहे हो?

बुजुर्ग ने कहा- हुजूर आपने नई बात स‌िखाने को कहा था। हम स‌िख रहे हैं। आप ही बताओ क्या यह बात आपने पहले कभी सुनी है और नई नहीं है।

राजा ने कहा- बात तो नई है, मैंने पहले कभी नहीं सुनी।

-तो नई बात पर भरोसा देर से होता है, बुजुर्ग ने कहा-मेरे ये शिष्य आपको भरोसा द‌िलाएंगे। आप रानी को महल में रहने को कहें और इनमें लीन हो जाएं।

राजा प्रभाव‌ित हो गया। उसने रानी को महल में कैद करवा दिया। खुद उन दासों की मंडली में लीन हो गया। उन्होंने दरबार में रानी की जगह ले ली। अब राजा उनकी ही सलाह पर चलता था। गरीब लोगों पर अत्याचार बढ़ गए और सब त्राह‌ि-त्राह‌ि करने लगे। औरतों पर जुल्म होने लगे। उन पर बंद‌िशों के ल‌िए दास मंडली नए-नए ग्रंथ ल‌िखने लगी।

अचानक कहानी बीच में छोड़कर बेताल ने पब्ल‌िक से पूछा-बताओ चंपावत में स्त्री की दुर्गत‌ि के ल‌िए कौन ज‌िम्मेदार है और राजा कैसे दासों के प्रभाव में आ गया।

पब्लिक ने कुछ देर सोचा और कहा-सुनो बेताल, नई चीजें और नई बातें आम आदमी को प्रभाव‌ित करती हैं। राजा भी एक आम आदमी था। दासों ने जब स्त्री की जगह लेकर उसे आनंद के नए रास्ते बताए तो वह उन्हीं में लीन हो गया और पतन की ओर बढ़ गया। जहां तक स्त्री की दुर्गत‌ि का सवाल है तो उसके लिए राजा ही ज‌िम्मेदार है।
बेताल बोला-पब्ल‌िक तू बहुत समझदार है। पर हर बार मेरे झांसे में आ जाती है। तू बोली तो अब में उड़ा। यह कह कर तंत्र का बेताल फिर से अव्यवस्था के पेड़ पर जाकर उल्टा लटक गया।

Thursday, February 6, 2014

च‌िड़िया और शेर

सुधीर राघव
अव्यवस्था के पेड़ पर उल्टे लटके बेताल को पब्ल‌िक ने फ‌िर से उतार कर अपने कंधे पर लाद लिया लिया। हमेशा की तरह रास्ता काटने के लिए बेताल ने फिर कहानी शुरू की...।
बात बहुत पुरानी नहीं है। एक जंगल में शेर और चिड़‌िया रहते थे। शेर गजब का श‌िकारी था। उसकी इस प्रतिभा की जानकारी जंगलवालों को हाल ही में हुई थी। पहले उस शेर को साधारण ही समझा जाता था। तब जंगल में एक खुर्रांट श‌िकारी का दबदबा था। दबदबा इतना क‌ि सब उससे दबते थे। चेले उसे लोहे का आदमी पुकारने लगे थे। तब यह शेर भी उसके आगे पूंछ ह‌िलाता था।

अचानक जंगल में एक च‌िड़िया चहचहाने लगी। शिकारी जहां जाता च‌िड़िया जाकर चहचहा देती और शिकार चौकन्ना हो जाता। शिकार भाग जाता। इस तरह शिकारी का खेल ब‌िगड़ गया। लोग उसके हुनर के कायल नहीं रहे। शेर मौके को भांप गया। उसने पहला झपट्टा उस लोहपुरुष शिकारी पर ही मारा। शिकारी के शिकार होते ही शेर का रुतबा बढ़ गया।

जंगल में च‌िड़िया की चहचहाट अब भी जारी थी। शेर के हाथ से भी श‌िकार न‌िकलने का खतरा था। इसलिए शेर सोचने लगा चि‌ड़‌िया से कैसे निजात पायी जाए। एक द‌िन अखबार का एक टुकड़ा उसके हाथ लगा। उसमें एक नई र‌िसर्च थी। शीर्षक था, मोबाइल टावरों की तरंगों से चिड़‌िया को खतरा।  बस फ‌िर क्या था। शेर ने आईटी क्रांत‌ि का सहारा लेने की ठान ली। चिड़‌िया के खिलाफ पूरे जंगल में अपने प्रचार टावर लगवा दिए। उनकी तरंगों ने चिड़‌िया को बेचैन कर दिया। अब हालत यह है कि च‌िड़‌िया बदहवास है। जंगल में शेर का गुणगान चल रहा है। श‌िकारी अब पाप बोध लिए शेर के पीछे हाथ बांधे चल रहा है।
कहानी बीच में छोड़ कर बेताल बोला-बता पब्ल‌िक शेर ताकतवर कैसे हुआ और च‌िड़िया बदहवास क्यों हो गई।
पब्ल‌िक ने कहा- च‌िड़‌िया के चहचहाने से जब श‌िकारी का ध्यान बंटा और न‌िशाने चूकने लगे तो उसकी प्रत‌िष्ठा भी जाती रही। शेर ने इसी बात का फायदा उठाकर पहले उसी को ठ‌िकाने लगाया। शेर के हाथ अखबार का बही टुकड़ा लगा ज‌िसमें च‌िड़िया पर र‌िसर्च थी, इसल‌िए कह सकते हैं क‌ि वह क‌िस्मत का भी धनी था। जहां तक च‌िड‌़िया की बात है तो उसकी कोई जुगत काम नहीं कर रही इसल‌िए वह बदहवास है। ...और बेताल लोग खामख्वाह कहते हैं कि राजनीत‌ि में जंगलीपन बढ़ रहा है। असल में जंगल की भी अपनी राजनीत‌ि होती है। वोट डालकर राजा चुन लेते हो स‌िर्फ इसल‌िए ही आप सभ्य नहीं हो जाते। 
इस पर बेताल जोर से अट्टहास क‌िया और बोला, पब्ल‌िक तू फ‌िर मेरी बातों में फंसकर बोली। लो अब में उड़ा। हा..हा...हा।

Sunday, January 26, 2014

गौरैया के ल‌िए घर

सुधीर राघव
चिंता आपके प्रेम की द्योतक है। शीर्षक से यह मत समझ लीजिए की मैं कोई वन्य प्रेमी हूं। मेरी च‌िंता ठेठ शहरी, कस्बाई और गंवई है। यह मानव बस्त‌ियों से जुड़ी है।
गौरैया के गायब होने की कहानी कई वर्षों से सुन रहा हूं। इस पर यकीन भी है। चंडीगढ़ और आसपास इस ट्राईस‌िटी में काफी हर‌ियाली है मगर गौरैया आपको द‌िख जाए तो आप खुशकिस्मत हैं। ‌अचानक कुछ दिनों से इन च‌िड़‌ियों का एक झुंड घर के सामने आकर तारों पर बैठने लगा है। झुंड में ज्यादा नहीं आठ या दस गौरैया हैं।
गौरैया को लेकर एक अपराध बोध भी है क‌ि क्या हमारी वजह से गौरैया गायब हुई। काफी लंबे समय बाद इन्हें देखकर बचपन याद हो आया। तब घरों में गौरैया की चहचहाट से ही बच्चे जागते थे। पिसवाने से पहले गेहूं धोकर जब धूप में सुखाये जाते तो बच्चों की ड्यूटी लगती थी कि वे चिंड़ियों को उड़ाएं। बच्चों और च‌िड़‌िया का अपना भवनात्मक संबंध था। वे रखवाली वाले दानों को खुद ब‌िखेर कर च‌िड़ियों को बुलाते थे। चुपचाप शांत होकर उन्हें चुगते देखते थे ताक‌ि वे उड़ न जाएं। चिड़‌िया से ज्ञानवर्धन भी होता था कोई न कोई बुजुर्ग यह बता ही देता था कि ज‌िस गोरिया की चोंच के नीचे गर्दन पर काली दाढ़ी है वह नर है और सफेद गर्दन वाली मादा। गौरैया को पकड़ने की कला भी बच्चों ने खुद विकस‌ित कर रखी थी। टोकरी को ऐसी डंडी से ट‌िकाकर खड़ा करते थे ज‌िसमें लंबी रस्सी बंधी होती थी। टोकरी के नीचे रोटी के टुकड़े रहते थे। च‌िड़िया के आते ही रस्सी खींचकर टोकरी ग‌िरा दी जाती थी। बेचारी च‌िड़‌िया उसमें फंस जाती थी। फिर च‌िड़‌िया को पकड़ कर लाल या नीली स्याही में रंगा जाता था और छोड़ द‌िया जाता था। उस रंगी चड़ि‌या का कई द‌िन तक इंतजार किया जाता था। उसके फ‌िर से द‌िखने पर आपार खुशी होती थी। मगर क्या इन रंगों के खेल से गौरेया गायब हुई।
सबके एक ही आत्मा का अंश होने का दर्शन भी च‌ि‌ड़‌िया ने ही बचपन में पढ़ाया। गौरैया पुराने शहतीर वाले घरों में घौंसला बनाती थी। वह बया की तरह कुशल कारीगर नहीं थी। बसंत बीतने के बाद चैत की गर्म‌ियां शुरू होतीं तो चिड़‌िया का कोई बच्चा फर्श पर ग‌िरा द‌िख जाता था। बच्चों में तब उसे बचाने की जुगत शुरू होती। उसे पानी प‌िलाया जाता, उसके पास दाने डाले जाते। कोई बहादुर बच्चा उसे ग‌िलग‌िले जीव को हथेली पर भी उठा लेता था। इस सब कवायद के बीच वह दम तोड़ देता। दुख से सबकी आंखें भर आती थीं। तब कोई बड़ा यह समझाता था सब जीवों की आत्मा एक ही है। अगर क‌‌िसी को दुख होता है तो सबको दुख होता है। इसल‌िए सारी दुन‌िया दुखी है क्योंक‌ि कोई न कोई दुखी है।
हम बड़े हुए। गौरैया गायब हो गई। घर एयरकंडीशंड हो गए। उनमें शहतीरें और आले नहीं रहे। च‌िड़िया अपने घौंसले कहां बनाती। पेड़ों पर तो कौवा उसके अंडे-बच्चे चुरा ले जाता। लोग म‌िलों का प‌िसा खाने लगे। छतों पर अब गेहूं नहीं सुखाए जाते। चक्क‌ियां और चड़िया दोनों कम हो गईं।
वन्य प्राणी व‌िशेषज्ञ बता रहे हैं क‌ि मोबाइल क्रांत‌ि से च‌िड़‌िया पर बुरा प्रभाव पड़ा है। पर गौरेया की असली समस्या यह है क‌ि वह कहां रहे और क्या खाए। हम चाहें तो च‌िड़या के ल‌िए इतना कर सकते हैं। घर की ऊपरी मंज‌िल पर झीने की छत्त शहतीर और टीन की हो सकती है। इसमें च‌िड़िया के घौंसले के ल‌िए जगह हो सकती है। च‌िड़‌िया आएगी तो बच्चे दानें डाल ही देंगे। बदले में च‌िड़‌िया आपके बच्चों को जीवन का दर्शन भी बताएगी।
हमारे लोकगीतों में च‌िड़या और बेटी की तुलना है।
जब से च‌िड़‌ियों का झुंड घर के सामने बैठने लगा है तब से मन में यह ज‌िज्ञासा है क‌ि यह रह कहां रहा है? इनका घर सुरक्ष‌ित होना चाह‌िए। सर्द‌ियां बीत रही हैं। बसंत आने वाला है। गर्म‌ियां शुरू होते ही अंडों से बच्चे न‌िकलेंगे और कौए ताक में होंगे।

 अमर उजाला ब्लाग पर भी उपलब्ध। इस ल‌िंक पर जाएं।
http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C/sparrow/

Wednesday, January 22, 2014

मत बनने दो जड़ों पर जाला

सलीके से सौंदर्य आता है। हो सकता है ज्यादातर लोग इसे न मानें। सौंदर्य के कुदरती होने की एक मजबूत अवधारणा पहले से हम सबके पास है। फिर भी कुछ ठोस उदाहरण हैं। शहर को जब सलीके से बसाया जाता है तो चंडीगढ़ सामने आता है। लोग सलीके में विश्वास रखते हैं और नियमों का पालन करते हैं, इसलिए यह सुंदरता कायम है।
सुंदरता के साथ अक्सर अहं बोध भी आता है। यह अहं कई बार विशेषता और पहचान बनता है तो कभी बड़ी बाधा। समय के साथ चंडीगढ़ की जरूरतें बढ़ रही हैं। यह सिर्फ शहर की अपनी जरूरतें नहीं। आसपास पड़ोसी राज्यों द्वारा किए जा रहे विस्तार का भी दबाव है। इस सदी के पहले दस साल में ही इस दबाव का असर साफ दिखने लगा है। अगले बीस साल की जरूरतों को देखते हुए नई प्लानिंग एक बड़ा मुद्दा है।
खासकर ट्रैफिक संबंधी समस्याएं विकराल हो रही हैं। राउंड अबाउट्स की जगह हरी-लाल बत्त‌ियां जगमगाने लगी हैं। फिर भी जाम लग रहे हैं। ये जाम एक दशक पहले की चंडीगढ़ की पहचान से मेल नहीं खाते।
ट्रैफिक समस्या के समाधान के लिए चौराहों पर फ्लाईओवर या अंडरपास बनाने के विचार ने उन लोगों को चिंता में डाल दिया है जो चंडीगढ़ की पुरानी पहचान से प्यार करते हैं। उनका तर्क है कि चौराहों पर फ्लाईओवर और अंडर पास से चंडीगढ़ भी और शहरों जैसा दिखने लगेगा। शहर की वह विशेषता खत्म हो जाएगी, जिसके लिए यह जाना जाता है।
आप समस्याओं के समाधान तलाशते हो या समस्याएं आपको समाधान अपनाने के लिए मजबूर करती हैं? इसमें स‌िर्फ समय का अंतर है। आपके पास समय हो तो आप उसे समाधान तलाशने और उस पर बहस करने या दुविधा बनाने पर खर्च कर सकते हैं। अगर समय नहीं है तो जो समाधान सामने नजर आता है उसे ही अपना लेते हैं। इस तरह हम समस्या को संकटकाल तक ले जाते हैं।
बचपन में खेल-खेल में हम जब पौधे एक जगह से उखाड़ कर अपने किचन गार्डन में रोपते थे तो उसकी जड़ों को हथेलियों में छुपा लेते थे। एक-दूसरे को सलाह देते थे-जड़ों को हवा नहीं लगनी चाहिए, नहीं तो पौधा सूख जाएगा। क्या हम नासमझ थे? जड़ों को भी पानी और खुराक चाहिए। चाहे पौधे के लिए ही सही। थोड़े बड़े हुए तो एक बात और पता चली। अमरूद के पेड़ पर जब ढंग से फल नहीं आए तो माली ने बताया पौधों की जड़ों में जाला बन जाता है। उस जाले की सफाई के लिए गुड़ाई जरूरी है। यानी जड़ों को भी खोदना और कुरेदना जरूरी है।
चंडीगढ़ के हैर‌िटेज स्वरूप से हम सब प्रेम करते हैं। यह राष्ट्र की धरोहर है। पर शहर की जरूरतों के मुताबिक कुछ बदलावों पर गंभीरता से सोचना होगा। छोटी-छोटी जड़ों से उबरना होगा, ताकि वे जाला न बन जाएं और मूल स्वरूप ही प्रभावित होने लगे।
(मेरा यह पूरा लेख अमर उजाला. कॉम पर भी उपलब्ध है। पढ़ने के ल‌िए इस ल‌िंक पर जा सकते हैं-
http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0/chandigarh/

Tuesday, January 14, 2014

झाड़ू का दर्शन


सुधीर राघव

नाम में क्या रखा है? इग्नोर मत कीज‌िए। आपको बताता हूं। नाम और व्यवहार के दार्श‌िनक पहलू जब भी मेल खाते हैं, कर‌िश्मा होता है। झाड़ू का दर्शन आम आदमी से मेल खा रहा है। सींक-सींक से झाड़ू बनती है। सब सींक समान होती हैं। इसमें कोई दूसरे से बहुत ज्यादा अलग नहीं होती। सब निर्बल। कोई भी त‌िनके की तरह तोड़ दे। यही हाल है आम आदमी का। भ्रष्टाचार और समाज की सभी बुराइयों से अलग-अलग जूझता और उनके आगे टूटता है आम आदमी। अब कुछ सींकें एकजुट हो गई हैं और पार्टी बन गई है। झाड़ू में कोई सींक इतनी अलग और सामर्थ्यवान नहीं होती क‌ि उस पर नेतृत्व का सारा भार हो। झाड़ू की व‌िशेषता उसे बांधे रखने वाली डोर है। अन्ना हजारे ये मजबूत डोर हो सकते थे मगर वह पहले ही राजनीत‌ि की दलदल से दूर हो गए। सींकें अब द‌िल्ली की जनता के करिश्मे की डोर से एकजुट हो रही हैं। अरव‌िंद केजरीवाल और योगेंद्र यादव अब डोर की भूमिका संभालने की कोश‌िश कर रहे हैं। अब झाड़ू का सारा आस्तित्व डोर की मजबूती पर ही टिका है। सुव‌िधा के लिए कई बार झाड़ू के पीछे डंडा लगा दिया जाता है। तब जिसके हाथ में डंडा होता है। यह उसीके इशारे पर सफाई करती (नाचती) है। इसल‌िए डंडे से सावधान रहना जरूरी है।
कठपुतली की डोर
गुलगुलों से ज‌िन्हें परहेज था वे गुड़ खा रहे हैं। जनलोकपाल पर जब राजनीतिक ताकत आजमाने का फैसला हुआ तो टीम अन्ना दो हिस्सों में बंट गई। किरण बेदी और वीके स‌िंह राजनीति से घिन करते नजर आए और अन्ना के साथ असली टीम में बने रहे। अब लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो तस्वीर ओर स्पष्ट हो रही है। किरण बेदी ने खुल कर भाजपा के नरेंद्र मोदी का समर्थन कर दिया है। साफ हो रहा है कि क‌िरण बेदी तो मोदी की डोर का काम कर रही थीं, जिसका एक ही टार्गेट था अन्ना का साध लो और पूरी टीम के साथ भाजपा का समर्थन कर दो। मगर अन्ना भी कोई कठपुतली नहीं हैं। किरण जब खुलकर अपनी इच्छा जता चुकी हैं तो अब देखना है क‌ि अन्ना कब उनसे केजरीवाल की तरह किनारा करते हैं।
कमल कब खिलेगा
जो तलाब-बावड़‌ियों को नजदीक रहते हैं वे जानते हैं कि नवंबर तक कमल खिलता है। दिसंबर और जनवरी में पाला पड़ने लगता है और कमल की मुस्कान भी ढीली पड़ जाती है। दिल्ली में जो पाला पड़ा है। उससे राजनीति वाले कमल की मुस्कान पर भी असर पड़ा है। अब उम्मीद मई से है। पर कमल खिलने के लिए पर्याप्त कीचड़ चाह‌िए। इसल‌िए घोटालों का जितना शोर मचेगा, उम्मीद उतनी बढ़ेगी। मगर झाड़ू खुद कीचड़ साफ करने में जुट गई है। अब मोदी के भाषणों और कान्फिडेंस दोनों पर इसका असर द‌िख रहा है। जुगत निकालने का काम ब्रांड गुरुओं को दे द‌िय‌ा गया है। जो नए समीकरण बन रहे हैं उसमें मोदी की तुलना में सुषमा का नाम ज्यादा प्रभावशाली नजर आ रहा है।
हाथ की बात
फिलहाल कांग्रेस की उम्मीदों पर बार‌िश और ओले दोनों पड़ रहे हैं। सवाल यह है कि क्या इस बारिश से पूरे देश में इतना कीचड़ भर पाएगा क‌ि सब ओर कमल खिल सकें। चंद्र की जीत के बाद मंगल पर यान जा रहा है। शिक्षा क्षेत्र में बदलाव किए हैं मगर उनकी कोई चर्चा नहीं है। आम आदमी घोटालों की बात कर रहा है। राजनीत‌ि की कुछ कच्ची समझ रखने वाले बता रहे हैं क‌ि राहुल होंगे मोदी के सामने पीएम पद के उम्मीदवार। कभी सेनापत‌ि खुद ब‌िना टांग वाले घोड़े पर नहीं बैठता। राहुल को तो कारपोरेट तरीके से सरकार चलाने की घुट्टी म‌िली है। बहन-भाई मिल कर कोई नया खेल खेल सकते हैं। कांग्रेस चाहे तो सच‌िन तेंदुलकर को प्रधानमंत्री पद का अगला उम्मीदवार बना सकती है। देश में सचिन के आगे मोदी और केजरीवाल की लोकप्रियता कहां ट‌िकेगी, यह सब जानते हैं।
क्षत्रप
इस बार क्षत्रपों को लगता है कि वे बड़ी भूमिका न‌िभा सकते हैं मगर ज्यादातर जगह वे उसी हौवे से पीड‌़ित हैं, जिससे कांग्रेस। लोग टेस्ट बदलना चाहते हैं। क्षत्रपों ने केंद्र में ज्यादातर खलनायक की भूमिका न‌िभाई है। जहां जातीय समीकरण टूट गए हैं, वहां क्षत्रपों के लिए संघर्ष के द‌िन शुरू हो गए हैं। झाड़ू एक ऐसा चुनाव ‌चिन्ह है जो हाथी की चाल भी बदल सकता है। ‌दिल्ली वाले देख चुके हैं।
2014 की राजनीत‌ि की यह तस्वीर तो खाली द‌िमाग की उपज है। आपके पास इससे अच्छी और सटीक दूसरी तस्वीर हो सकती है।

(‌मेरा यह पूरा लेख अमर उजाला ब्लाग पर भी उपलब्ध है। पूरा पढ़ने के ल‌िए नीचे ल‌िंक पर भी क्ल‌िक कर सकते हैं)

 /http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF/aap-bjp-jhaadu/