Monday, November 25, 2013

तलब जगाओ

 -सुधीर राघव
‘सबसे पहले बेचने की कला सीखो। जिसने बेचने की कला सीख ली, समझो उसने सब कुछ सीख लिया।’ पार्टी का बड़ा लीडर अपनी प्रचार टीम को समझा रहा है-दुकानदार होने से अच्छा है बेचने की कला में निपुण होना। इस कला से वंच‌ित एक दुकानदार पूरी उम्र दुकानदार ही रह जाता है। दूसरी ओर जिसने बेचने की कला सीख ली, वह चाय से शुरू करता है और एक-एक कर सारी चीजें बेचते हुए आगे बढ़ता है। वह समाज बेच सकता है। वह धर्म बेच सकता है। वह जाति बेच सकता है। वह समुदाय बेच सकता है। वह राज्य बेच सकता है। वह देश बेच सकता है...।
‘...और धर्म बेच लेने के बाद कह सकता है कि धर्मस्थल से उपयोगी शौचालय होते हैं...। ...खें--खें...खें--खें...।’ प्रचार टीम का एक नेता कंधे उचका कर और गर्दन दबाकर खीसें निपोर रहा है, जैसे उसने लीडर की गोलमोल बात को सीधा कह कर पूरी गुत्थी सुलझा दी हो।
‘कोई बचकानी बात नहीं।’ लीडर ने घूर कर नेता की ओर देखा तो उसकी गर्दन कंधों के बीच और गहरे से धंस गई। लीडर ने अपनी बात आगे बढ़ाई- हां तो मैं कहां था...? --हां...जानते हो एक चाय बेचने वाला यह नहीं जानता कि चाय क्यों ब‌िकती है। वह सिर्फ केतली गर्म करता है और चाय-चाय च‌िल्लाता है। यह उसकी रोज की द‌िनचर्या होती है और वह हमेशा चाय बेचता ही रह जाता है। जिस द‌िन वह जान जाता है क‌ि चाय क्यों ब‌िकती है, वह बड़ा आदमी हो जाता है। वह नेता हो जाता है। वह मंत्री हो जाता है। वह मुख्यमंत्री हो जाता है। वह प्रधानमंत्री हो जाता है।
‘चाय क्यों ब‌िकती है?’ टीम का एक नेता बड़े ही शिष्य भाव से प्रश्न कर रहा है। उसे उम्मीद है क‌ि लीडर के पास कोई बड़ा मंत्र है। यह मंत्र सबके साथ उसकी भी नाव किनारे लगा सकता है। टीम के अन्य नेता भी आश्चर्य से मुंह फाड़े लीडर के होठों की ओर देख रहे हैं। उन्हें उम्मीद है क‌ि पार्टी की जीत का नुस्खा इन्हीं के बीच से निकलने वाला है।
लीडर की उंगल‌ियां हवा में नाच रही हैं। माथा अहंकार के भाव के साथ और चौड़ा हो गया है- जानते हो चाय तलब से ब‌िकती है। स‌िर्फ चाय ही नहीं, दुन‌िया की हर चीज तलब से ब‌िकती है। अगर लोगों में तलब जगाना सीख जाओगे तो बेचना अपने आप आ जाएगा।... अपनी पार्टी के लिए तलब जगाओ। अपने लिए तलब जगाओ।
‘यह तलब कैसे जगेगी?’तोते जैसी नाक वाले एक नेता ने अपने चश्मे का शीशा साफ करते हुए पूछा। बाकी नेताओं को माथे पर भी बल हैं, जो बता रहे हैं क‌ि लीडर की बात उनके भी पल्ले नहीं पड़ी।
‘क्यों पंड‌ित जी तलब जगाना नहीं जानते हो! वो पंजाब वाली ज‌िला प्रधान के साथ तो बहुत हुलसाये रहते हो।...तुम्हारी तलब की कहानी सुनाकर तो कम से कम चार सुंदर‌ियां हमसे ट‌िकट मांगने आ चुकी हैं। और वो एक्ट्रेस भी तुम्हारा ही नाम ले रही थी। बहुत पहुंचे हुए हो। देख लेना कोई सीडी-वीडी न आ जाए बाजार में। विपक्ष वाले ताक में हैं और मीड‌िया तो हमेशा मसाला ढूंढता है।
लीडर के इस सीधे वार से तोते जैसी नाक वाला नेता झेंप गया। बाकी भी खीं-खीं कर हंसने लगे। लीडर ने पाठ आगे बढ़ाया- तलब लगाने के ल‌िए मुद्दे तलाशो। मुद्दा नहीं है तो मुद्दे पैदा करो। कोई मूर्ति बनवा दो या तुड़वा दो। फेसबुक और ट्व‌िटर पर एकाउंट खोलो। कम से कम पांच से छह लाख लाइक करने वाले हों..।
‘इतने लाइक करने वाले कहां से आएंगे?’ एक और नेता बेबसी जता रहा है।
इस सवाल पर लीडर का पारा चढ़ गया- तुम तो कलमघिस्सू ही रहोगे। कब से कह रहा हूं नेटसेवी बनो। अब नेता समाज सेवी नहीं नेटसेवी होता है। जो समाज सेवा करता है उसे समाज तब तक नहीं पहचानता, जब तक कोई इंटरनेट पर उसे बताने वाला न हो। जो ब‌िना सेवा किए भी इंटरनेट पर बखान करता है, वही कुछ द‌िन बाद बड़ा समाजसेवी माना जाता है। अब हमें ही देख लो। बिना कुछ किए सबसे ब‌ढ़‌िया परफारमेंस वाले नेता हैं। यह सब नेटसेवी होने का ही कमाल है।...और तुम जैसे मोटा कमाने वालों के ल‌िए पांच छह लाख लाइक कोई मुश्क‌िल नहीं हैं। सिर्फ 9 डालर में 20 हजार लाइक मिलते हैं।...तुम्हें क्या लगता है कि हमारे पांच लाख फालोअर कोई मुफ्त में टूट पड़े हैं। क्या बाबा जी का लंगर है, जो मुफ्त में आएंगे। सबमें पैसा खर्च करना पड़ता है। ...जनता की तलब जगाने के ल‌िए धर्म के नाम पर बहाए गए खून की बात करो। अपनी दादी की बात करो। जनता की भूख की बात करो। भ्रष्टाचार की बात करो। घोटाले की बात करो। जनता की प्यास की बात करो।
 
प्यास की बात तक पहुंचते-पहुंचते लीडर के अपने होठ सूख गए। वह होठों पर जीभ फिराते हुए बोल-अरे देशवानी जी कुछ इंतजाम किया है कि सूखे ही हमारा गला रेतते रहोगे। बहुत ज्ञान हो चुका। अब नहीं बोला जा रहा।
‘अरे नहीं सब इंतजाम है। हम तो बस आपके इशारे का इंतजार कर रहे थे।’ देशवानी ने घंटी बजाई और लड़क‌ियों की कतार अंदर आ गई।
नेताओं की पूरी टीम की तलब जाग चुकी थी। कपड़े उतर रहे थे। यह तलब स‌िर्फ जाम तक रुकने वाली नहीं थी। यह तलब देहों को लील जाने वाली थी। व्यवस्था को खा जाने वाली थी। पूरे देश को पी जाने वाली थी। लोकतंत्र इसी तलब की भेंट चढ़ने वाला था।
(मास‌िक पत्र‌िका कलरव के द‌िसंबर अंक में भी प्रकाशित)

Wednesday, November 13, 2013

नेता जी तुम नाचो

सुधीर राघव

जो जनता की नब्ज पकड़ ले वही नेता है। इस नब्ज की खोज में अच्छे-अच्छे अर्श से फर्श पर आते देखे हैं। जो समोसे में आलू को ही राजनीति का अमृत मानते थे, वे समझ गए हैं कि समोसे दाल से भी बनते हैं। समोसे की जोड़ी चाय के साथ बनती है। इसल‌िए कोई चाय बेचने वाला नेता हो जाए, इसकी गुंजाइश है।
‘तो चाय-समोसा ही जनता की नब्ज है?’
पोलटिक्स का नया चेला सवाल‌िया निशान सा मुंह बनाए गुरु से पूछ रहा है। चुनाव नजदीक है। सोचकर आया है कि कोई मंत्र हाथ लगे तो हाथ आजमा ले।
‘न बेटा।...न।’ गुरु गंभीर है- राजनीति अब पेट से नहीं चलती। अब भूखे नहीं ओबेसिटी वाले पेट देश में नेता तय करते हैं। मोटे पेट को क्या चाहिए? सोचो?
चेले के सवालिया निशान जैसे चेहरे पर च‌िंतन की तीन लाइनें उभर आई हैं। प्रश्नवाचक के नीचे ब‌िंदी की तरह मुंह खुला है- मोटे पेट। हमें कुछ नहीं सूझ रहा। आप ही बताओ गुरु?
‘बताते हैं...धीरज रखो।’ गुरु अपनी तोंद पर हाथ फिराते हुए और गंभीर हो गए हैं- जानते हो जनता की नब्ज कहां है?
‘कहां गुरु?’ चेला जिज्ञासा से लहरा चला है और पूरा शरीर ही सवालिया निशान हो गया।
गुरु के माथे पर दर्प की दमक बढ़ गई है। चंचल आंखें भोलेपन से चतुराई उड़ेल रही हैं। सफाचट मोटे होठ महानता के बोध से और भारी हो चले हैं। आखिर इनमें से ही देश का अगला नेता निकलने वाला है- जानते हो जनता की नब्ज कहां हा?...नहीं। कोई नहीं जानता...पर हम तुम्हें बताते हैं। ....जनता की नब्ज मनोरंजन में है।
‘क्या...मतलब।’ चेले की सारी लहर निकल गई। वह एकदम सीधा होकर विस्मयबोधक हो गया। गुरु से इतने हल्के जवाब की उम्मीद नहीं थी।
‘अरे हां। जनता की नब्ज मनोरंजन में है।’ गुरु की अवाज में गुस्से का वजन है। चेला अव‌िश्वास करेगा। अहमक। ‘जब बुद्धि छोटी हो तो बड़ी बात समझ नहीं आती।’ गुरु गरज रहे हैं- तुम्हारा कसूर नहीं है। बड़े-बड़े नेता नहीं समझ पाते। तुम तो अभी कच्चे हो। पब्ल‌िक उसी पर रीझती है, जिसमें कला होती है। बड़े-बड़े ज्ञानी बेमानी हो जाते हैं और एक ठेठ कलाकार महफ‌िल लूट लेता है।
चेले के विस्मयबोधक से सतर शरीर में फिर से लहर बनने लगी है। चेहरा पुनः प्रश्नवाचक हो चला है-बात में दम है गुरु।
चेला लाइन पर है। गुरु की वाणी ज्ञान के बोझ से फिर गंभीर हो गई- मनमोहना है तो कुछ मोद-प्रमोद करना होगा। खड़े-खड़े कागज पढ़ने से तो कोई पीएम भी एमपी नहीं बन सकता। कुछ वीर रस बहाओ। कुछ गर‌ियाओ। कोई शिगूफा छोड़ो। फिल्मी गाना सुनाओ। कोई मुहावरा गढ़ो। हाथ में लचक हो। आवाज में ठसक हो। अंगुलियां घुमाओ। चुटुकुले सुनाओ। और अकल की बात भूल कर भी मत करो। नहीं तो जनता बिदक जाएगी।
चेला नतमस्तक हो चला है। गुरु का ज्ञान जारी है- मंदिर-मस्जिद का फार्मूला पुराना हो गया। पाकिस्तान में भी अब दम नहीं। हकीकत की बात में कोई मनोरंजन नहीं है। सपने की बात करो। सोने की बात करो। अपनी दादी की बात करो। मनोरंजन करोगे तो टीआरपी बढ़ेगी। टीआरपी बढ़ेगी तो टीवी तुम पर फोकस होगा। टीवी फोकस हुआ नहीं क‌ि तुम नेता बन गए।
ज्ञान के प्रभाव में चेला गुरु के चरणों में झुकते हुए अल्पविराम बन गया है।
गुरु गदगद हैं और उनकी वाणी में ओज है- यह मनोरंजन का ही प्रताप है कि अम‌िताभ जीत जाते हैं और बहुगुणा हार जाते हैं। अभिनेता टिकट ले जाता है और नेता टापता रह जाता है। जनता नेता से भी अभ‌िनय चाहती है। काम नहीं। काम करने वाला नेता गरियाया जाता है। काम करने के ल‌िए तो सरकारी नौकर हैं। अफसर हैं। नेता काम करेंगे तो वे सब क्या करेंगे। नेता तो बस नोट बनाए और पब्लिक का मनोरंजन करें। जो नेता इतना नहीं कर सकते वे शीघ्र पतन को प्राप्त होते हैं। जो मनोरंजन करते हैं, वे दीर्घकाल तक टिके रहते हैं। पर मनोरंजन में भी जनता की पसंद बदलती रहती है। समोसा और आलू हमेशा नहीं र‌िझाते। मरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है पर भी जनता सदा नहीं नाचेगी। बसंती का नाच भी समय के साथ फीका होगा। इसल‌िए मनोरंजन का नया गुरु सोचो साधो। साधु गा रहा है। नाच रहा है। सांस फुला रहा है और कमा रहा है। तुम नेता हो तो नाचो। तुम नाचो ताक‌ि नेता हो जाओ।
चेले का शरीर बल खाने लगा है। विराम चिन्हों की नई कंपोजीशन तैयार है। चेला नाच रहा है। पब्ल‌िक जुटने लगी है। भीड़ बढ़ती जा रही है। कदमों में लय आ रही है। कुपोषित शरीर लाइन में लगे हैं। मोटे पेट उन्हें घरों से निकाल कर ला रहे हैं। इस तरह देश के नए नेता का चयन हो रहा है।
(यह लेख आप कलरवमें भी देख सकते हैं।)

Thursday, November 7, 2013

परंपराओं से प्रेम पनपने दो

 दिवाली की रात बीत चुकी है। सड़कों पर कागज की चिंदियों का कचरा और हवा में पोटाश की गंध, रात भर चली आतिशबाजी की गवाह हैं। क्रिसमस आने वाला है और बा‌क्स‌िंग डे को घरों के बाहर खाली डिब्बों और रेपर का भरपूर कचरा होगा। नए साल का जश्न भी आत‌िशबाजी के साथ होगा। इसके अलावा सालभर मनाए जाने वाले तीज-त्योहारों, पर्वों पर लगने वाले लंगरों का डिस्पोजल भी सड़कें ही झेलती हैं।
परंपराएं अपने पीछे कचरा और प्रदूषण क्यों छोड़ जाती हैं? समाज को इस पर विचार करना चाह‌िए। आबादी जब सवा अरब की ओर बढ़ रही है तब हम इस तरह से क्या इतना अतिरिक्त कचरा और प्रदूषण झेलने की स्थ‌िति में हैं?
स्नान, ध्यान और स्वच्छता सभी धर्मों का आधार तत्व है। इसके बावजूद कुछ ऐसी रीत‌ियां भी अपना स्थान बनाए हुए हैं, जो धर्म के सार से मेल नहीं खातीं। प्रेम और आनंद के उत्सवों में आतिशबाजी और दिखावटी तोहफेबाजी तो उदाहरण भर हैं।
इसल‌िए परंपराओं का भी स्नान-ध्यान होना चाहिए। पर यह तभी संभव है, जब समाज के पास विचार की स्वच्छ वैतरणी हो। वह उपयोग‌िता के तटबंधों से सुरक्षित हो। पहले यह ज‌िम्मेदारी धर्मगुरु संभालते थे। हमारी गंगा ही दूष‌ित नहीं हुई, विचार की धारा भी अपनी धार खो चुकी है। ज‌िन्हें व‌िचार के केंद्र समझा जाता था, वे आश्रमों और मठों की माया और काया का आकर्षण बढ़ाने के उपाय बताने और ढूंढने में लगे हैं।
परंपराएं समाज में प्रेम और भाईचारा बढ़ाने के लिए हैं। यही इनका दर्शन है। इन्हीं गुणों को पनपने दो। हालत यह है कि परंपराओं के नाम पर स‌िर कलम क‌िए जा रहे हैं। नफरत फैलाई जा रही है। चबूतरों पर कुछ लोग बैठकर फरमान जारी कर देते हैं।
चंडीगढ़ के बाग-बगीचों में जो अधेड़ कभी-कभार सुबह के बाद घूमने चले जाते हैं उन्हें शिकायत रहती है कि माहौल खराब हो गया है। खासकर प्रस‌िद्ध रोज गार्डन, शांत‌ि कुंज, ले‌ज‌ियर वेली में युवा जोड़े एक-दूसरे का हाथ थामे या गोद में स‌िर रखकर लेटे होते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि इनमें से ज्यादातर युवा पंजाब और हरियाणा के उन ग्रामीण इलाकों से होते हैं, जहां परंपराओं के नाम पर ज्यादा कट्टर व्यवहार होते हैं। युवा जोड़े घरों से भाग कर आते हैं। चंडीगढ़ में शाद‌ियां करते हैं और हाईकोर्ट से सुरक्षा मांगते हैं। इस तरह की शाद‌ियां कराने का एक पूरा उद्योग, ज‌िससे कुछ धर्मस्थलों के लोग जुड़े थे,चंडीगढ़ में चल रहा था। अदालत की सख्ती के बाद स्थित‌ि में कुछ सुधार आ रहा है। पर परंपराएं अपने युवाओँ को ही घर से भागने के मजबूर कर रही हैं। उनके खून की प्यासी हो चली हैं। हर समाज के लिए युवा उसकी संपत्त‌ि होते हैं। भव‌िष्य होते हैं।
क्यों न परंपराओं को थोड़ा और स्नान-ध्यान करवाएं। ये जितना पव‌ित्र होंगी, समाज उतना ही खुशहाल होगा।

अमर उजाला में यह लेख देखने के ‌लिए क्ल‌िक करें-

http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%93%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE-%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%A6/

Sunday, November 3, 2013

दीपावली की शुभकामनाएं

सुधीर राघव

एक बाती के दम पर
अंधेरे से
रात भर लड़ा ‌च‌िराग।

उम्मीद उस लौ की तरह है
‌ज‌िसे कम से कम
एक द‌िए और बाती के
साथ की जरूरत होती है।

इस तरह दीपावली
देती है
भाईचारे के संदेश।

‌द‌िवाली शुभ है
क्यों‌क‌ि च‌िराग की
रोशनी है सबके ल‌िए।

द‌िवाली शुभ है
क्योंक‌ि तुमने
सबकी बात की
और सब तुम्हारी बात करते हैं।

‌द‌िवाली शुभ है
क्योंक‌ि स्नेह के घी
और
मक्खन लगाने में
फर्क होता है।

खील बताशों
और खाल‌िस मीठे के साथ
आप सबको दीपावली की शुभकामनाएं।