Friday, October 25, 2013

पीली लकीर के फकीर

किसी राजा के कंधे पर लदे बेताल से आपने बेतरतीब बसे शहरों की कथा सुनी होगी। मगर यह कहानी एक ऐसे शहर की है जिसकी बसावट और बुनावट में लय और ताल है। नापतोल कर इसे बसाया गया है। इस‌लिए यह मृदंग इस किस्से का सूत्रधार बना। यहां कायदा है। कानून है। सच कहने के ल‌िए क‌िसी राजा के कंधे का मंच भी जरूरी नहीं है। बस ताल होनी चाहिए। यह दुनिया के खूबसूरत शहरों में एक है। इसल‌िए इस शहर की कथा वही सुना सकता है, जिसमें ताल और लय का सम्मोहन हो।
चंडीगढ़ के नपे-तुले सेक्टरों की सीधी सड़कों पर यह कथा मस्ती से टहलते हुए आगे बढ़ सकती थी। मगर जिन्हें बांकपन से ही खबर सूझती है, उन्हें चैन कहां। एक साफ-सुथरे शहर (देश के अन्य शहरों से) में किसी रोडगली के बंद छेद से तांक-झांक कर वे इतना कचरा निकाल लेते हैं कि नगर निगम के सिर में दर्द हो जाए। ऐसे हर स‌िर दर्द के बाद एक नया न‌ियम बनता है। नियम से न‌ियम निकलते हैं। यहां की आबादी से ज्यादा नियम बन चुके होंगे। हालत यह है कि यहां रहने वालों को और यहां से गुजरने वालों को कई बार हर अलग चौराहों पर नए नियम मिलते हैं। लोग कुछ दिन परेशान होते हैं फिर खुद को ढाल लेते हैं। अनुकूलन का ऐसा उदाहरण डार्विन देखते तो गदगद हो जाते।
हरी-लाल बत्तियों पर चलते-रुकते लोग बड़े सभ्य नजर आते हैं। इसका श्रेय आप यहां की ट्रैफिक पुलिस को दे सकते हैं। वह नियम की इतनी पक्की है कि मशीन भी हार मान ले। इसके बावजूद ट्रैफिक समस्या अखबारों की सुर्खियां बनती है। अफसर हाईकोर्ट में डांट खाते हैं। समस्या दूर करने के लिए नए न‌ियम का वायदा करते हैं। ऐसा ही एक वायदा है चंडीगढ़ में लेन सिस्टम। शहर में वन-वे ट्रैफिक की व्यवस्था है। ज्यादातर सड़कों की चौड़ाई इतनी नहीं क‌ि दो से ज्यादा लेन उन पर बन सकें।
ट्रैफिक सिस्टम में सुधार के ज‌िम्मेदार अफसरों को जब कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने एक सड़क पर हाईकोर्ट के पास से सेक्टर-16 स्टेडियम तक पीली लकीर खींच कर भारी वाहनों के लिए अलग नई लेन की रचना कर दी। अब इस पीली लकीर पर खड़े होकर ट्रैफिक पुलिस वाले कार वालों और दो पह‌िया वाहन चालकों के चालान काटते हैं। बाहर से आने वालों को तो छोड़िये, ज्यादातर शहर के लोग ही एक सड़क पर चल रहे अलग कानून से अंजान हैं। इसल‌िए खूब चलान कटते हैं। एक तरह से इस पीली लकीर पर पुलिस वालों का कब्जा है। नियम का पालन कुछ इस तरह से हो रहा है कि बस वाले भी उनके ल‌िए बनी इस लेन पर नहीं चल पाते। धड़ाधड़ चालान कट रहे हैं, लेक‌िन ट्रैफिक समस्या ज्यों की त्यों है। हादसे भी खूब हो रहे हैं। एक सड़क से पूरे शहर की हालत कैसे सुधरे। यानी फिर फटकार पड़ने वाली है।
शिक्षा - इस प्रसंग से मृदंग यह श‌िक्षा देता है क‌ि सरकारी अफसर भले ही किसी छोटे कसबे के हों या किसी महानगर के। सबका सोचने का तरीका एक सा ही होता है।

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Tuesday, October 22, 2013

संघ के स‌िपाही

संघ अपने अनुशासन के ‌ल‌िए जाना जाता है। उसकी नीत‌ियां और एजेंडा तय है। इसके बावजूद संघ से देश की राजनीत‌ि में आने वाले नेता कद बड़ा होते ही ‌‌खुद को दुव‌िधा में पाते हैं। आडवाणी जी इसका उदाहरण हैं। प्रधानमंत्री पद की दौड़ में खुद को धर्म न‌िरपेक्ष सा‌ब‌ित करने की को‌‌शिश में वह ज‌िन्ना की मजार पर माथा टेकते नजर आए। मोदी कमोवेश उनके पदच‌िन्हों पर चल रहे हैं। शौचालयों पर उनका बयान और शोभन सरकार के सपने पर ‌ट‌िप्पणी, ‌‌हिदुत्व से अलग चेहरा बनाने का प्रयास भर है।

पर सबक संघ के पथ संचालन में छुपा है। पथ संचालन से पहले सबकी तैयारी परखी जाती है। संघ के न‌िक्कर में इतनी गुंजाईश रखी जाती है ‌कि ‌बिगड़ी हुई कमीज को खींच कर सुधारा जा सके। यह तस्वीर भी यही बताती है। जो नेता इसे भूलता है उसके ल‌िए अडवाणी जी एक उदाहरण हो सकते हैं।  

Friday, October 11, 2013

बाबा

एक है बाबा, उसका ढाबा
चल निकला तो शावा! शावा!
नहीं थी उसकी महिला मित्र,
देखा उसने तब चलचित्र
मन की कुंठा बाहर आई,
हीरोइन को खरी-खरी सुनाई,
कोई न बोला, सुनकर वाह!वाह!

एक है बाबा, उसका ढाबा,
चल निकला तो शावा! शावा!
बाबा ने तब आंख दबाई,
नहीं मिली उसे कोई दवाई
बस पब्लिक की सांस फुलाई
आंख मूंद कर करी कमाई
उस पर खूब ज्ञान का दावा

एक है बाबा, उसका ढाबा,
चल निकला तो शावा! शावा!
जितने गे गुंडे मवाली,
सब पर उसने की कव्वाली,
गालों पर तो भी नहीं लाली
अपने गुरु की साख दबा ली
बुरे लगें गिरजा और काबा.

एक है बाबा, उसका ढाबा
चल निकला तो शावा! शावा!
-सुधीर राघव
09-08-09