Sunday, October 9, 2011

नौटंकी बहुत हुई, अब दसटंकी हो जाए

हमारे देश की जनता का मिजाज अजीब है। काम-वाम करने वाले उसकी नजर में कद्र के काबिल नहीं है। वे सब डंडे के यार हैं। जनता का सीधा फलसफा है कि मेहनती को जितना पीटो, वह उतना सही रहता है। कोई काम करने चले तो उसमें नुक्स निकालने वाले दस आ जाते हैं। दूसरी ओर आप कोई काम मत कीजिए, बल्कि जो काम कर रहा है उसके खिलाफ नौटंकी शुरू कर दीजिए। जोर-जोर से चिल्लाइये-देखो कितनी गड़बड़ हो रही है। क्या गड़बड़ हो रही है, भले ही यह भी मत बताएं। आप पायेंगे कि आपके सिर्फ शोर मचाने से ही आपके चारों ओर समर्थकों की भीड़ लग गई है। यह भीड़ उस काम में लगे खलनायक को पीटने पर भी उतारू है। जब तक आप नौटंकी करेंगे आपको खूब जनसमर्थन मिलेगा और जैसे ही आप के हाथ में काम करने की जिम्मेवारी आएगी आप समर्थन खो देंगे। इसे एक उदाहरण से और अच्छे तरह से समझा जा सकता है।
देश के एक बड़े ही सम्मानीय नेताजी हैं. आडवाणी जी। उन्होंने मंदिर मुद्दे, जम्मू-कश्मीर से धारा-३७० हटाने के मुद्दे को लेकर देश में सिर्फ अपनी रथयात्राओं के जरिए एक बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा किया और डूब कर दो सीटों तक पहुंच गई भाजपा को सत्ता तक ला दिया। सत्ता हाथ आई तो काम करने की जुम्मेवारी आई। काम करने की जिम्मेवारी आई तो वही नेता जो जनता के सबसे प्रिय और कद्दावर थे, अप्रिय हो गए। जब उन्हें प्रधानमंत्री बनना था तो जनता ने पार्टी को पटखनी देकर विपक्ष में पहुंचा दिया। ऐसा नहीं था कि पार्टी कोई बुरा काम कर रही थी। काम ठीक-ठाक ही था। पर असली दिक्कत जनता की है, उसे काम करने वाले कम और नौटंकी करने वाले ज्यादा पसंद है। उनका सुपरहीरो जो कल तक रथयात्राओं से मजमा लगाता था अब चुपचाप गृहमंत्रालय संभाल रहा था। न लाहौर पर झंडा लहराने की बात होती थी, न धारा ३७० हटाने की और न मंदिर बनाने की। जनता का तो सारा मजा किरकिरा हो गया। इसलिए वोट की लात मार कर सारा फीलगुड निकाल दिया। अब भी यही हाल है। सरकार और सिस्टम अपना काम कर रहा है। जो भ्रष्ट हैं,  इन काम करने वालों की मेहनत से ही जेल जा रहे हैं मगर इन काम करने वालों को सिर्फ गालियां मिल रही हैं और सारा श्रेय लूट ले रहे हैं नौटंकी करने वाले। कभी किसी ने उन्हें श्रेय दिया कि फलां ऑडिट करने वालों ने इस घोटाले को पकड़ा और इसलिए उन्हें सम्मानित किया जाए। नहीं साहब वे तो काम करने वाले थे। सम्मानित तो इन्हें किया जाना चाहिए जो धरने पर बैठते हैं। भाई नौटंकी और ड्रामा के लिए दादा साहिब फालके पुरस्कार है मगर हम उसमें और भारत रत्न में कोई फर्क ही नहीं समझते। जहां दादा साहब फालके पुरस्कार दिया जाना चाहिए, वहां हम भारत रत्न देने की वकालत करते हैं।
इनमें कुछ तो ऐसे योगी पुरुष भी हैं जिनकी अपनी ट्रस्ट क्या कमाती हैं और कैसे कमाती हैं, इसपर कोई सवाल उठाए तो उसे गद्दार बताना शुरू कर देते हैं। उन्हें पता है कि देश की जनता एंग्री यंग और ओल्डमैन दोनों को पसंद करती है। गालीगलौच करते रहोगे तो जनता के प्रिय रहोगे। अगर सवाल सुनकर बनता जवाब दिया तो न सिर्फ फस जाओगे बल्कि कहींके नहीं रहोगे। ...तो साथियो आइए...सिर्फ धरना-प्रदर्शन से ही हम इस देश की सारी समस्याओं को मिटा सकते हैं। काम करके नहीं। काम करेंगे तो नुक्स निकलेंगे। इतने नुक्स की खलनायक बना दिए जाओगे। इसलिए बूढ़े होते आडवाणी जी ने अपने अनुभव के भंडार को जाया नहीं होने दिया और अगली रथयात्रा की मात्र घोषणाभर से मोदी को धोबीपाट पटखनी मार दी है। उन्हें कम न समझा जाए, वह जनता की नब्ज अच्छी तरह जानते हैं। धन्य है हमारी जनता।