Wednesday, July 20, 2011

रसद और मदद के सिग्नल हैं मंत्र

सुधीर राघव 
वेदों के अध्ययन से कुछ और जो ठोस संकेत मिलते हैं वे ये हैं कि मानव को धरती पर बसाने के दौरान उन्हें समय-समय पर मदद भी भेजी जाती थी। जब तक उनके लिए संभव हुआ वे अंतरिक्षयान जिसे कि वेदों में अश्व कहा गया है के जरिए हमें मदद भेजते रहे। इन मदद देने वालों को हमने देवता कहा और यज्ञों के जरिए इनका अह्वान किया। जब तक संभव हुआ ये मदद देने भी आए। यज्ञ उन्हें आकाश से उस स्थान को ढूंढने में मदद करते थे, जहां मदद की जरूरत होती थी। यज्ञ की अग्नि में सुगंधित सामग्री और घी का इस्तेमाल और मंत्रोचारण इसलिए किया जाता था, ताकि साधारण लगी आग और मदद मांगने के लिए दिए जा रहे सिग्नल में अंतर कायम हो। वे अपने यंत्रों के जरिए स्पेस सेंटर यानी स्वर्ग से मंत्र ध्वनि से ही अंदाजा लगाते होंगे कि कहां इसकी जरूरत है। इसलिए ये सिर्फ मंत्र ही नहीं मदद मांगने के सिग्नल थे। यही वजह है कि हम आज तक संकट होने पर मदद के लिए ऊपर ताकते हैं कि ऊपर वाला मदद करेगा। उन्होंने मानव सभ्यता को यहां विकसित करने के लिए जब तक संभव हुआ मदद भेजी होगी।
वेदों में ऐसे मंत्र काफी हैं, जिनमें देवताओं से मदद मांगी गई है। हम यजुर्वेद के इसी मंत्र को देखते हैं-
घृतेनाञ्जन्त्सं पथो देवायानान् प्रजानन्वाज्यप्येतु देवान।
अनुत्व सप्ते प्रदिशः सतन्ता ५ स्वधामस्मै यजमानाय धेहि॥२॥ (एकोनत्रिंशोऽध्यायः, यजुर्वेद)
अर्थ- देवताओं के गमन योग्य मार्ग का घृत द्वारा सिंचित करते हुए यह यज्ञ देवताओं को प्राप्त हो। हे अश्व। समस्त दिशाओं में बसे प्राणी तुम्हें गमन करते हुए देखें। तुम इस यजमान को अन्न-धन आदि प्रदान करने वाले होवो।
यजुर्वेद के उन्नतीसवें अध्याय के इस दूसरे श्लोक से यह फिर स्पष्ट होता है कि अश्व का अर्थ अंतरिक्ष यान ही है, अंतरिक्ष में उड़ते हुए यह सभी को नजर आए ऐसी कामना की गई है और यजमान के लिए रसद मांगी गई है। यह संभव है कि धरती पर मनुष्यों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ मदद मांगने वालों की संख्या भी बढ़ी होगी। इसलिए देवताओं ने यह शर्त रख दी होगी कि आपमें से फलां-फलां पुरुषों की मौजूदगी में यज्ञ होगा अर्थात मदद मांगी जाएगी तो ही मदद मिलेगी। इन पुरुषों को ही ऋषि का नाम दिया गया।
 इसलिए हर मदद के लिए अलग-अलग यज्ञ हैं और हर यज्ञ के लिए अलग-अलग ऋषि। यजुर्वेद के हर अध्याय में इसका विवरण है। अध्याय के शुरू में ही सबसे पहले ऋषियों फिर देवता और फिर उसकी छंदों का विवरण है। जैसे प्रथम अध्याय के ऋषि हैं-परमेष्ठी प्रजापतिः
देवता हैं- सविता, यज्ञ, विष्णु, अग्नि, प्रजापति, अप्सवितारौ, इंद्र, वायु, द्योविद्युतौ।
छंद है-बृहति, उष्णिक, त्रिष्टुप, जगति, अनुष्टुप, पंक्ति, गायत्री।
(क्रमशः)

Saturday, July 9, 2011

वेदों में वर्णन है ग्रह की खोज का

सुधीर राघव
वेदों के अध्ययन से लगता है कि बसने लायक ग्रहों की तलाश में कई मिशन निकले थे। सौरमंडल में बसने लायक गुंजाइश दिखने पर इसके सभी ग्रहों के लिए अलग-अलग दल निकले। इन दलों का नेतृत्व कर रहे देवों के नाम पर ही सौरमंडल के ग्रहों का नामकरण किया गया। इसलिए इसकी पूरी संभावना है कि हमें धरती पर बसाने वाले हमारे किसी नजदीकी सौरपरिवार से रहे हों। अपने तारा मंडल और हमारे सौरमंडल के बीच उन्होंने एक स्पेस सेंटर बनाया जिसे स्वर्ग का नाम दिया गया। (जैसा कि पिछले आलेखों में भी स्पष्ट किया गया है)
इसके संदर्भ में कुछ तर्क भी समर्थन करते हैं। पहला तो यह कि ग्रह नाम ही इसलिए दिया गया क्योंकि इन्हें ग्रहित किया जाना था। यह तलाशना था कि कौन सा ग्रहण करने योग्य है। यजुर्वेद के तेइसवें अध्याय के दूसरे श्लोक से प्रकट होता है कि ग्रह के चयन में वे तीन विशेषताओं की तलाश करते थे, पहली सूर्य से पर्याप्त ऊर्जा, दूसरी वहां पर वायु की उपस्थित और तीसरी स्वर्ग (स्पेस सेंटर) से संपर्क की सुविधा। ग्रहों पर उतरने के लिए भी विशेष स्तुति थी, यथा-
उपयामगृहीतेऽसि प्रजापतये त्वा जुष्टंगृह्णाम्येष ते योनिः सूर्य्य स्ते महिमा यप्तेऽहन्त्सं वत्सरे महिमा सम्बभूव यस्ते वावयन्तरिक्षे महिमा सम्बभूव यस्ते दिवि सूर्य्य महिमा सम्बभूव तस्मै ते महिम्ने प्रजापतये स्वाहा देवेभ्य॥२॥ (त्रयोविंशोऽध्यायः , यजुर्वेद)
अर्थ- हे ग्रह, उपयाम पात्र में ग्रहीत हो। तुम्हें प्रजापति की प्रति के निमित्त ग्रहण करता हूं। यह तुम्हारा स्थान है और सूर्य तुम्हारी महिमा है। हे ग्रह, तुम्हारी सुंदर महिमा दिन के समय प्रति वर्ण प्रकट होती है, तुम्हारी महिमा वायु और अंतरिक्ष में प्रकट है और स्वर्ग तथा सूर्य लोक में प्रकट है। तुम्हारी उस महिमा से युक्त प्रजापति के लिए और देवताओं के लिए यह हवि स्वाहुत हो।
(क्रमशः)

Saturday, July 2, 2011

अंतरिक्षयान का वर्णन भी है यजुर्वेद में

">सुधीर राघव
अगर किन्ही पराग्रहियों ने मनुष्य को धरती पर बसाया तो वे यहां तक किन यानों से पहुंचे? ये यान कैसे थे? किससे बने थे? और इन्हें क्या कहा जाता था?

ये सब सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब हमारे वेदों में छुपे हैं। यजुर्वेद के तेइसवें अध्याय में ऐसे ही सवालों का जवाब मिलता है। यजुर्वेद के इस अध्याय में वर्णित अश्व शब्द को लें तो यहां इसका अर्थ घोङा नहीं यान निकलता है। अंतरिक्ष यान को ही अश्व कहा गया है।

यह संभव है कि पराग्रही सभ्यता जब धरती पर बसी तो उनके गुट आपसी लङाई में अपने साधनो और तकनीकों को गंवाते रहे। ऐसे में धरती पर जब उन्होंने परिवहन के लिए घोङे को पालतू बनाया तो अपने अंतरिक्ष यान के रूपक में उसे अश्व नाम दिया। परिवहन का यह साधन भी हवा से बातें करे यह मनुष्य की इच्छा रही और मुहावरों तक में झलकी।इस अध्याय के ग्याहरवें श्लोक के सवालों में से एक है कि स्वर्ग पर्यंत पहुंचने वाला महान पक्षी कौन है। इसका जवाब अगले श्लोक में यह कहकर दिया गया है कि अश्व ही स्वर्ग पर्यंत पहुंचने वाला महान पक्षी है। देखें-

द्योरासीत्पूर्विचत्तिरश्वऽ आसीदूबृहद्वयः।
अविरासीत्यिलिप्पिल रात्रिरासीत्यिशाड़ि्गला॥ 12 ॥ (यजुर्वेद, त्रियोविशंऽध्यायः)
अर्थ- पूर्व स्मरण का विषय ही वृष्टि है, अश्व ही स्वर्ग पर्यंत पहुंचने वाला महान पक्षी है। रक्षिका पृथ्वी ही वृष्टि द्वारा चिकनी होती है। रूप को निगलने वाली रात्री है।

इसके अलावा सोलहवें श्लोक में भी इसका विस्तार से वर्णन है कि यह तीव्रगामी है और देवायन मार्ग से देवताओं के पास जाता है। यह नष्ट भी नहीं होता।

न वाऽउऽएतन्म्रियसे न रिष्यसि देवाँऽहृदेषि पथिभिः सुगेभिः। 
यत्रासते सुकृतो यत्र ते ययुस्तत्र त्व देवः सविता दधातु॥१६॥ (यजुर्वेद, त्रियोविशंऽध्यायः)
अर्थ- हे अश्व! तुम मृत्यु को प्राप्त नहीं होते और न कभी विनिष्ठ ही होते हो। तुम तीव्रगामी होकर देवायन मार्ग द्वारा देवताओं के पास जाते हो, जिस लोक में पुण्यात्मा गये हैं तथा जहां वे निवास करते हैं, उसी लोक में सूर्य प्रेरक सविता देव तुम्हारी स्थापना करें।

ये अश्व और यान किस तरह बनते थे इसके भी कुछ संकेत दिए गए हैं। इससे भी स्पष्ट हो जाता है कि ये अश्व जीते-जागते घोड़े नहीं यान ही थी। तेइसवें अध्याय के सेंतीसवें श्लोक में स्पष्ट लिखा है कि चांदी, सोने और लेड आदि की सूचियां (शृंखलाएं) मिलाकर इनका निर्माण होता था। वायमंडल में प्रवेश करते वक्त ये जलें नहीं इसलिए इन्हें मिलाकर कोई उच्चमिश्रित धातु तैयार की जाती होगी।

रजता हरिणीःसीसा युजो युज्यन्ते कर्मभिः।
अश्वस्य वाजिनस्त्वचि सिमाः शम्यन्तु शम्यन्तीः॥३७॥ (यजुर्वेद, त्रियोविशंऽध्यायः)
अर्थ- चांदी, स्वर्ण और सीसा आदि की सूचियाँ संयुक्त होकर अश्वकार्य में लगती हैं। वे वेगवान अश्व के निमित्त भली भांति रेखा युक्त संस्कार के करने वाली हों।  
इस तरह यह प्रमाण और पुख्ता होते हैं कि धरती पर मनुष्य क्रम विकास का नतीजा नहीं बल्कि उसे यहां बसाया गया। (क्रमशः)