Saturday, May 21, 2011

तेल की दलाली में तोंद चिकनी

सुधीर राघव
पिछले दो साल से पेट्रोल के दाम देश में तेजी से बढ़ रहे हैं, दूसरी ओर तेल कंपनियों के घाटे की बातकर उन्हें मोटी सबसिडी भी दी जा रही है। ऊपरी तौर पर यह सब एक सामान्य प्रक्रिया जैसा दर्शाया जा रहा है, लेकिन जब आप आंकड़ों का अध्ययन करें तो पता चलेगा कि तेल की दलाली में तोंद चिकनी हो रही है। हकीकत यह है कि देश की पेट्रो कंपनियों का मुनाफा तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2009 की तुलना में 2010 में शुद्ध लाभ लगभग दोगुना रहा। भारत पेट्रोलियम ने वर्ष 2010 में 1537.62 करोड़ का शुद्ध लाभ कमाया, जबकि 2009 में यह केवल 735.9 करोड़ रुपये ही था। इसी तरह हिन्दुस्तान पेट्रोलियम का शुद्ध लाभ इसी अवधि में 574.98 करोड़ से बढ़कर 1301.37 करोड़ तक पहुंच गया। 2011 के आंकड़े तो अभी जारी होने हैं, इसमें अच्छी खासी बढ़ोतरी की उम्मीद है। ओएनजीसी इस वित्तवर्ष के पहले 9 महीनों में ही 16100 करोड़ रुपये का मुनाफा कमा चुकी है। सरकार पेट्रो कंपनियों को 30,000 करोड़ की सबसिडी दे रही है। पेट्रो क्षेत्र की सभी कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं और सबसिडी की राशि तो सिर्फ दो कंपनियों के मुनाफे जितनी है। इसी तरह रिलायंस पेट्रोलियम के नए नतीजे तो उपलब्ध नहीं हैं मगर कंपनी के मुताबिक उसने 2009 में 105 करोड़ रुपये शुद्ध लाभ कमाया था, जबकि इस बार कंपनी की मेंगलोर रिफाइनरी के नतीजे के अनुसार अकेले इस यूनिट ने 2011 में नेट प्रोफेट में 119 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की है। इस रिफाइनरी का शुद्ध लाभ इस बार 553 करोड़ रुपये रहा है।
क्या है खेल
डीजल, केरोसिन और रसोई गैस के नाम पर सबसिडी दी जा रही है। डीजल की सबसिडी है तो किसानों के लिए मगर इसका अधिकतम उपयोग एग्जिक्यूटिव गाड़ियों, ट्रांसपोर्ट वाहनों में हो रहा है। किसानों की तरह ही ट्रांसपोर्ट वाहनों के लिए भी हम इस सबसिडी को जायज कह सकते हैं मगर एग्जिक्यूटिव श्रेणी की कारों का सबसिडी पर चलना सबसे बड़ा बोझ है। इनकी खरीद पर जो राशि सरकार को जाती है वह बीस साल से कोई ज्यादा नहीं बढ़ी है, जबकि इस लाभ के चलते डीजल कारों की संख्या तबसे कई सौ गुना बढ़ गई है। सरकार सबसिडी की राशि इस अनुपात में बढ़ा नहीं सकती, नतीजा सारा अतिरिक्त बोझ पेट्रोल पर डाला जा रहा है। होना यह चाहिए की डीजल सबसिडी की पूरी राशि डीजल कारों के शौकीनों से वसूली जाए। तब हमारी तेल नीति अधिक तर्कसंगत हो सकती है, मगर यह भी एक अलग खेल है जो सबसिडी के नाम पर खेला जा रहा है और मंत्रालय में बैठे लोग अपने वारे-न्यारे कर रहे हैं।केरोसीन के नाम पर दी जा रही सबसिडी का हाल तो और भी बुरा है। झोंपड़ पट्टी वाला जिसके नाम पर यह सबसिडी जारी होती है, राशनकार्ड न होने पर केरोसिन तेल की एक बोतल चालीस रुपये में खरीदता है और इस तेल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल पेट्रोलपंपों पर मिलावट के लिए हो रहा है। यह इस देश का हाल है, सबसिडी देकर साधन बेकार किए जा रहे हैं। जो जरूरतमंद है वह महंगे दाम पर खरीद रहा है।

Saturday, May 14, 2011

समाज का सीडी सत्य


सुधीर राघव
पौष्टिकता और मूल्य में कोई सीधा संबंध होता तो अर्थशास्त्र भी विग्यान होता। खाद्य चीजों की कीमत उसकी पौष्टिकता से कम और लोगों के रुझान से ज्यादा तय होती है। यही हालत हमारे समाज में सत्य की है। सत्य भी एक रुझान है। इसी रुझान में आजकल नया ट्रेंड जुड़ा है सीडी सत्य का। यह सत्य भी फोरेंसिक साइंस के सत्यापन से अलग रुझान के सत्यापन से सत्यापित होता है। रुझान तय कर देता है कि बात सच है या नहीं, साइंस के फेर में पड़ते हैं तो सत्य को तलाशते-तलाशते भी शक दूर नहीं होता और प्याज के छिलकों की तरह कुछ हाथ नहीं आता। दो रोचक प्रसंग सामने हैं, और उन्हें लेकर बड़े गजब के रुझान दिख रहे हैं, इसलिए मन नहीं माना, नतीजा अब सुधीरा खड़ा ब्लाग पे....
दो प्रसंग हैं-एक शांतिभूषण मामले का और दूसरा अमर सिंह की सीडी का।
शांति भूषण मामले में कई तरीके से फोरेंसिक जाँच हुई. पहलीबार वोइस टेस्ट किया गया और रिपोर्ट जारी कर दी गई कि आवाज शांति भूषण की ही है और मान लिया गया कि सीडी सही है. इसके बाद पहले शांति भूषण ने खुद हैदराबाद कि ट्रुथ लैब से फिर सीबीआई कि और से चंडीगढ़ सीएफएसएल से सीडी की वोइस स्पेक्ट्रोग्राफी जांच की गई। वाइस स्पेकट्रम में सामने आया कि न तो यह निरंतर था और एक अंतराल के बाद इसमें वैवलैंथ भी अलग थी। यानी ध्वनि का ग्राफ एक जैसा नहीं था, बीच में एक कट था और उस कट के बाद ग्राफ की मोटाई ज्यादा शो हो रही थी। यानी माध्यम में परिवर्तन था और यह कट-पेस्ट कर सीडी बनाए जाने का पर्याप्त सुबूत था। इस आधार के बाद पबि्लक की तरफ से फिर रुझान आ गया कि सीडी झूठ है। सीडी को लेकर जनता को यह नहीं बताया जाता कि यह सच है या झूठ है, बड़ी चतुराई से मीडिया के माध्यम से अपने अनुकूल जाती कोई बात दी जाती है और लोग आकलन कर लेते हैं। इसलिए शांतिभूषण के मामले में दो रुझान प्राप्त हुए। तब सत्य क्या है?
इस सीडी का भी सत्य संदिग्ध है, इसमें टेप बातचीत सच हो भी सकती है और नहीं भी। फोरेंसिक जांच से यह साबित हो जाता है कि आवाज किसकी है, वह बता भी दिया गया है कि आवाज उसी व्यक्ति की है, जिसकी बताई जा रही है।  पर जो बातचीत है वह अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग संदर्भों में हुई बातचीत के शब्द उठाकर पेस्ट कर नए अर्थ भी पैदा कर बनाई जा सकती है। इसे एडीटिंग कहते हैं। रीमिक्स इसका सुलभ उदाहरण है। इस आधार पर यह सीडी झूठ हो सकती है, मगर अलग-अलग वेबलेंथ के कुछ और कारण भी हो सकते हैं- बातचीत को आपने अपने फोन से अटैच्ड रिकार्डर में रिकार्ड किया है, फिर यहां से अपने मतलब भर की बातचीत को एक फाइल में पेस्ट कर सीडी बना ली। दूसरा बातचीत टेलिकान्फ्रेंसिंग के माध्यम से दो से ज्यादा लोगों के बीच हो रही है, ऐसे में अगर दो लोगों का संपर्क करवाने के बाद बातचीत के दौरान तीसरा खुद को अलग कर लेता है तो बीच की डिस्टरबेंस कम होगी और ध्वनि तरंग पर इसका असर दिखेगा। इसलिए सिर्फ तरंग की मोटाई में अंतर के आधार पर यह भी नहीं कहा जा सकता कि यह झूट है। इसलिए यह तय है कि समाज का सत्य सिर्फ उसका रुझान तय करता है, यह सत्य सचमुच सत्य हो यह जरूरी नहीं।
अब अमर सिंह की सीडी का सत्य लेते हैं। इसकी कोई वोइस स्पेक्ट्रोग्राफी हुई है, ऐसी जानकारी नहीं है। आवाज का टेस्ट हुआ है, यह भी नहीं पता। विपाशा बार-बार कह रही हैं कि आवाज उनकी नहीं है, मगर अमर सिंह की छवि ऐसी है कि इस सीडी को सत्य माने जाने का ही रुझान आएगा। मैं यह नहीं कहता कि यह सीडी गलत या सही होगी, क्योंकि यह तो सही-सही फोरेंसिक सत्यापन के बाद भी नहीं कहा जा सकता, हां यह पता लगाया जा सकता है कि आवाज वही है यां इनकी फ्रीक्वेंसी अलग-अलग है। इसलिए समाज का अपना सीडी सत्य होता है और इसे जांच की कोई जरूरत नहीं होती। हां दो पक्ष इसे अपने नफानुकसान के हिसाब से मुद्दा बनाकर लड़ जरूर सकते हैं, लोगों का ध्यान खींच सकते हैं।