Thursday, January 27, 2011

गणतंत्र की अवधारणा को कमजोर करते हैं सारे सुपर हीरो


बेटमैन, सुपरमैन, स्पाइडरमैन, हीमैन, निंजा...बच्चों के सुपर हीरोज की एक लंबी सीरीज है। इन सभी के पास एक घोषित खलनायक है, जिसके खिलाफ ये ताकत दिखाने के हर फैसले लेते हैं। यहां तक कि हत्या तक कर देने का भी। एक तरफ हम लोकतांत्रिक समाज बनाने का आदर्श रखते हैं, दूसरी ओर हमारे बच्चों के नायक ठेठ व्यक्तिवादी लोग हैं, जो कुछ प्रकृति से इतर शक्तियों से भी लैस हैं। यहां तक कि दुनिया के प्रमुख ग्रंथ भी व्यक्ति पूजा का ही संदेश देते हैं। ऐसे में हमें समाज के कितना लोकतांत्रिक होने की उम्मीद करनी चाहिए। अब जबकि बच्चे टीवी और सिनेमा की दुनिया के सुपरमैनों के दीवाने हैं। क्या हमारे बच्चे भी हर फैसला खुद करना का अधिकार नहीं चाहते? क्या वे पर्सिनेलिटी सिंड्रोम का शिकार हो रहे हैं? वे हमेशा किसी को खलनायक बनाने की फिराक में रहते हैं। यह द्वंद्व छात्र हिंसा में भी परिवर्तित हो रहा है। समाज के खलनायक इतने घोषित नहीं होते, जितने कथाओं में होते हैं।इसलिए यह द्वंद्व उन्हें अपराध की दलदल में भी ले जा सकता है।

पहले एसपीएस राठौर और अब तलवार पर हमला करने वाला उत्सव शर्मा भी ऐसे ही सुपर हीरोज से प्रेरित लगता है। गाजियाबाद में छात्र का अपहरण कर उसके भाई को गोली मारने वाला छात्र नेता भी उत्सव की तरह ही पर्सनेल्टी सिंड्रोम का शिकार लगता है। दोनों को दुनिया में अपने खलनायक स्पष्ट नजर आते हैं। असल में वे खुद खलनायक बनने की ओर हैं। इस तरह के फैसले ही अपराध की ओर बच्चों का रास्ता खोलते हैं। ज्यादातर अपराधी आक्रोश के चलते ही गलत रास्ते पर जाते हैं। वे अपने फैसले खुद करना चाहते हैं, जबकि लोकतंत्र में इसके लिए न्यायपालिका है। लोकतंत्र की अपनी समस्याएं हैं, जो लोगों व्यावहार संबंधी कमजोरियों की वजह से है। इस पर सोचिए कि हर आदमी सुपर मैन हो और हर दूसरे को खलनायक माने तो ऐसे समाज की क्या हालत होगी।
यह बात इस मामले में खरी उतरती है कि साहित्य समाज बनाने में अपनी भूमिका भी निभाता है। अगर हम व्यक्तिवादी और अहंवादी नायक गढ़ते हैं तो समाज को हिंसा के लिए भी तैयार रहना चाहिए। क्या हम अपने बच्चों के लिए कुछ सहज और सामान्य पात्र रच सकते हैं।ऐसे पात्र जो मिल बैठकर फैसला करते हैं। हर कोई अपनी जिम्मेदारी समझता है और अपने हिस्से के ही फैसले लेता है। या हम व्यक्तिपूजक बनकर समाज की अशांति को बनाए रखना चाहते हैं। जिस समाज में हर नायक औरों के हिस्से के फैसले भी खुद करता हो उसमें अशांति ही होगी। हिंसा ही होगी और अपराध ही बढ़ेगा।

Monday, January 24, 2011

वर्ल्डकप में तुरुप के तीन पत्ते

इस वर्ल्डकप में भारतीय क्रिकेट के फेवरेट होने की बात इस बार भी कही जा रही है। हर मैच में गेंदबाजों की अपनी भूमिका होती है मगर मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि इस बार भारतीय क्रिकेट टीम को ट्राफी मिलेगी या नहीं, यह तीन बल्लेबाजों की परफार्मेंस तय करेगी। अगर ये तीनो फार्म में रहते हैं तो कोई भी टीम और कोई भी बड़ा स्कोर मायने नहीं रखेगा। इन खिलाड़ियों का क्रम इस तरह-
वीरेंद्र सहवाग-इनकी आक्रामक शैली पूरी टीम को मजबूत करती है। जिस दिन यह नहीं चलते अक्सर वह टीम का बुरा दिन ही होता है।
युसुफ पठान-जब तक यह क्रीज पर हैं तो समझो मैच भारत की मुट्ठी में रहेगा। अपनी आक्रामक शैली से यह कहीं से भी मैच में टीम की वापसी करवा सकते हैं।
विराट कोहली-भले ही अनुभव कम है मगर भारतीय धरती पर किसी भी टीम की बखिया उधेड़ने में सक्षम हैं। युसुफ की तरह यह युवा तुर्क भी मैच का रुख मोड़ता नजर आएगा।
पर ये तीन एक साथ मैच में खिलाए जाएंगे इसमें शक।

Sunday, January 2, 2011

क्या वाम पंथियों का दिमाग मोटा होता है?

 यह सवाल उठा है यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के रिसर्चरों के एक शोध से, जिसमें उन्होंने पाया है कि दिमाग की बनावट ही दक्षिण और वाम विचारधारा तय करती है। उन्होंने अपने शोध में पाया कि वाम पंथ को मानने वाले लोगों के मस्तिष्क के बीच का हिस्सा एंटीरियर सिंगुलेट दक्षिण पंथियों की तुलना में मोटा होता है। एमआरआई स्कैनरों से करीब नब्बे राजनेताओं के दिमाग का अध्ययन किया गया। एंटीरियर सिंगुलेट वह हिस्सा है, जो भावनात्मक और निर्णय प्रक्रिया को तय करता है। शोध से संबंधित खबर पीटीआई से जारी हुई।
अब इस मोटे को अगर हम दूसरी भाषा में कहें तो वामपंथियों का यह हिस्सा मोटा अर्थात अधिक विकसित होता है, इन्हें एक बार में समस्याओं के एक से ज्यादा हल नजर आते हैं। दूसरी ओर दक्षिणपंथी एक भावावेग में फैसला कर लेते हैं।जहां दक्षिणपंथी भावनात्मक फैसलों की वजह से तेजी से लोकप्रिय होते हैं, वहीं इसी वजह से वे अपनी लोकप्रियता जल्दी गंवा भी देते हैं। इसलिए उनका उत्थान पतन तेजी से होता है जितनी तेजी से वे प्रगति करते हैं, उतने समय वे उस उत्थान के साथ टिके नहीं रह पाते।