Monday, May 17, 2010

पार्टी होगी तो जीतेंगे

सुधीर राघव

पार्टी होगी तो जीतेंगे, नहीं तो अपने वश का नहीं। कप्तान साहब क्लू दे रहे हैं, मगर प्रबंधन समझने को राजी नहीं। इसलिए वह खुलकर बात को दोहरा रहे हैं, देखिए लीग में पार्टी हुई तो हमने धुरंधर खिलाड़ी की टीम को हरा कर कप जीता। यह वल्र्डकप भी कोई कप था। गरीब देश में करा दिया। न कोई पार्टी, न रौनक-शौनक। चीयर लीडर्स तक तो वे बाहर से मंगवा नहीं सके। जो नाच रही थीं, उन्हें देखकर हमारा एक भी खिलाड़ी जोश में नहीं आया। ऐसे भला कहीं मैच जीता जाता है। ऐसा कंगाल देश जब मैच के बाद हमारे खिलाड़ी अपना पैसा खर्च कर पब में पार्टी कर रहे थे तो उन्हें पीट दिया गया। हमारे कपड़े फाड़ दिए गए। मैं पूछता हूं ऐसे देश में हमें खेलने ही क्यों भेजा गया, इसकी जांच
होनी चाहिए।
प्रबंधन गुस्से में है-तुम्हें मैच खेलने के पैसे मिलते हैं, न कि पार्टी के। हार के बाद पब में पार्टी करोगे तो लोग भड़केंगे ही।... लीग की बात तुम मत करो, उसमें क्या चल रहा है अब पूरी दुनिया जान गई है। वहां मैच कैसे होते हैं और कैसे जीते जाते हैं। सबको पता है। ...सबको इन्कम टैक्स वाले ढूंढ रहे हैं। ...मैदान में खेल तुम लोगों को दिखाना था न कि चीयर लीडर्स को। ...तुम्हें जो जरा भी सीनियर लगा उसे तुमने टीम से बाहर रखा। सिर्फ तुम्हारी वजह से हमने कितने खिलाडिय़ों को चोटिल बता कर फजीहत बचाई। अब तुम्हें हार की जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए। ...मनपसंद खिलाडिय़ों के साथ खेलने गए थे।
एक पूर्व कप्तान बात संभालने की कोशिश कर रहे हैं, देखिए कप्तान साहब, यह हार आपकी जिद्द की वजह से हुई है। जिद्द छोड़ कर लचीला रुख अपनाओ, लचीला। पहले आपके शरीर में कितनी लचक थी। हर शॉट पर टांग उठ जाती थी। अब तो अकड़े हुए से खेलते हो, गेंद बाउंड्री से बाहर ही नहीं जाती। रन लेते वक्त दौड़ भी बनावटी लगती है, जैसे किसी विज्ञापन फिल्म में कोल्ड ड्रिंक का पीछा कर रहे हो। मैं कहता हूं सुधार की बहुत जरूरत है।
'हां, सुधार की बहुत जरूरत है,Ó कप्तान साहब का गुस्सा भी बढ़ गया है- इसके लिए इंटरनेशनल बोर्ड को राजी करना होगा। दर्शकों को भी संयम सिखाना होगा। कभी दर्शकों के लिए कोच रखा है किसी बोर्ड ने। वे जब चाहे, जहां चाहे चिढ़ाते हैं और गाली देते हैं। मैं फिर साफ कहूंगा, बिना पार्टियों के कोई खेल नहीं होता...।
प्रबंधन बीच में ही बात काटता है-कैसी बात करते हो। वो हॉकी वाले भी तो जीत रहे हैं। उनके लिए तो पार्टियां नहीं होतीं। विश्वनाथन आनंद को देखो। लगातार जीत रहा है। उसकी जीत की खबर किसी चैनल के लिए ब्रैकिंग न्यूज नहीं होती। कोई अखबार उसे पहले पन्ने पर भी नहीं लेता। फिर भी जीत रहा है। कोई नखरा नहीं। तुम्हारी हार की खबर भी पहले पन्ने पर लगती है। कितना मीडिया मैनेज कर रहे हैं हम तुम लोगों के लिए। जो लीग-वीग में भाव बने हुए हैं, वह इसी प्रचार के भरोसे हैं। नहीं तो कई नहीं पूछेगा। अरे! प्रचार के बूते पर तो विदेशी कंपनियां हमारा ही पानी थोड़ा सा पाउडर मिलाकर हमें 40 रुपये लीटर बेच रही हैं तो तुम लोग तो फिर भी खिलाड़ी हो। खिलाड़ी हो इसलिए खेल को प्राथमिकता दो। ...
कप्तान साहब गुस्से से बैठक बीच में ही छोड़ कर निकल गए। थोड़ी देर बाद सभी चैनलों पर खबर थी, वल्र्ड कप में हार की वजह खिलाडिय़ों की थकान और कई वरिष्ठ खिलाडिय़ों के चोटिल होने को बताया गया है। अगले दौरे के लिए टीम के फीजियो को बदल दिया गया है। टीम प्रबंधन ने कहा है कि नेतृत्व में कहीं कोई कमी नहीं है। उधर, कप्तान साहब ने कहा है कि आने वाले दौरे में हम सारा हिसाब चुकता कर देंगे। विरोधी टीम हमारे आगे नहीं ठहर सकती।
(सभी पात्र और कथा काल्पनिक हैं, इसका किसी चरित्र या घटना से मेल खाना महज संयोग ही हो सकता है)
(प्रकाशित-चंडीगढ़, हिन्दुस्तान,16 मई 2010)

Friday, May 14, 2010

तुम्हारे स्कूल का प्रिंसिपल कौन है गडकरी

भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी भाषण करते-करते बहक गए और गाली-गलौच कर गए। गाली-गलौच भी खाली बैठे लालू और मुलायम सिंह यादव से। उनकी इस हरकत पर पार्टी और खुद गडकरी कह रहे हैं कि उन्होंने तो बस मुहावरे बोले हैं। अगर सचमुच उन्होंने ये मुहावरे ही कहे हैं तो बड़ी चिंता की बात है। उस स्कूल का पता लगाना चाहिए जहां हिन्दी के नाम पर ऐसे मुहावरे पढ़ाए जा रहे हैं। उस स्कूल को तत्काल बंद करवाया जाना चाहिए। उन्होंने चंडीगढ़ में पत्रकार सम्मेलन के दौरान क्या नए मुहावरे वोले आओ इसका विश्लेषण कर लेते हैं।

लालू यादव और मुलयम के बारे में उन्होंने कहा कि दोनों चापलूस हैं-ये कुत्ते की तरह कांग्रेस के तलवे चाट रहे हैं-
-तलवे चाटना- मुहावरा है मगर कुत्ते की तरह तलवे चाटना उन्होंने जिस स्कूल में पढ़ा है, उस स्कूल को दंडित किया जाना चाहिए।
इस तरह एक अन्य वाक्य जिसे भी वह मुहावरा बता रहे हैं यह है कि -कांग्रेस में अगर कोई मर्द की औलाद है तो मेरे सवालों का जवाब दे-
माई का लाल मुहावरा है, मर्द की औलाद मुहावरा तो नहीं है, कम से कम हमने किसी स्कूल में नहीं पढ़ा। हां, मुंबइया फिल्मों में गाली की तरह जरूर इस्तेमाल होता है। यह इस्तेमाल तभी किया जाता है, जब मां की महिमा कम करनी हो या उसे गाली देनी हो। मां को गाली देने वाले मुहावरे वे कहां पढ़ कर आए हैं। ये सब मुहावरे किस स्कूल में पढ़ कर आए हैं यह उन्हें स्पष्ट करना चाहिए। कम से कम और बच्चों को यह सब सीखने से बचाया जा सके।

या वे मुहावरों से छेड़छाड़ कर कुछ और कहना चाहते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं महाराष्ट्र में वाहवाही लूटने के लिए उनका मराठी मानुष जाग गया हो और उत्तर भारतीय नेताओं के लिए गाली अनजाने ही उनके मुहवरों से जुड़ गई हो। ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि वे आजकल महंगाई को लेकर प्रधानमंत्री से लगातार सवाल कर रहे हैं, पर ऐसा एक भी शब्द कृषिमंत्री शरद पवार के लिए नहीं बोल रहे। अपने इस मराठी भाई के लिए अभी तक ऐसा एक भी मुहावरा उनके मुंह से नहीं निकला।
भाई गडकरी अब आप राष्ट्रीय अध्यक्ष हो। कम से कम मुहावरों की अपनी जानकारी ठीक करो। अगर तुम किसी को गालियां देना ही चाहते हो तो दो, मगर उसका ठीकरा भाषा के सिर मत फोड़ो। इससे भाषा की बहुत किरकिरी और बदनामी होती, तुम्हारी होती है पता नहीं, क्योंकि तुम तो खुद अध्यक्ष हो।

Thursday, May 13, 2010

अन्याय पर आधारित व्यवस्था के खिलाफ जीत हमेशा रखती है मायने

सुधीर राघव

हमारे सरोकार
---------
कोई भी जीत सिर्फ इस लिए मायने नहीं रखती कि कुछ लोगों के सिर कलम किए गए, जीत इसलिए मायने रखती है क्योंकि अन्याय पर आधारित व्यवस्था को बदला गया। तीन सौ साल पहले बाबा बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में मोहाली के चप्पड़ चिड़ी मैदान में दमन और अत्याचार के खिलाफ एक ऐसी ही विजयगाथा लिखी गई। 12 मई 17१0 की इस जीत के बाद सरहिंद सूबे की जगह लुधियाना जिले से लेकर करनाल तक के हिस्से में पहले खालसा गणराज्य की नींव रखी गई। साथ ही जमींदारी प्रथा खत्म कर किसानों को जमीनों का मालिक बनाया गया। यह आम आदमी के जोश की जीत थी। हौसलों की जीत थी, जो बताती है कि अन्याय पर आधारित कोई भी व्यवस्था तोपों और बंदूकों की पहरेदारी में भी सुरक्षित नहीं है, उसे नष्ट होना ही है। इस जंग में एक ओर वजीर खान की प्रशिक्षित सेना थी तो दूसरी और बाबा बंदा बहादुर के नेतृत्व में सिख सूरमा और आम जनता, जिसके साथ था दशम पातशाह गुरु गोबिंद सिंह जी का आशीर्वाद।
मोहाली शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित चप्पड़ चिड़ी कलां में आज कल खूब चहल पहल है। 30 अप्रैल को नांदेड़ साहिब से चले फतह मार्च के स्वागत के लिए यह गांव सज कर तैयार है। गुरुद्वारा साहिब बंदा बहादुर फतह-ए-जंग का निर्माण कार्य भी तेजी से चल रह है। यहां निरंतर चल रहे शबद कीर्तन श्रद्धालुओं में पावन भाव जगाते हैं। गांव के लिए चंद रोज में ही नई सड़क बना दी गई है। हालांकि अभी इस पर डांवर पडऩा बाकी है। इस पर निरंतर पानी का छिड़काव हो रहा है ताकि धूल न उड़े। दूर-दूर से श्रद्धालु आ रहे हैं। इनमें नेता भी और पत्रकार भी। अटूट लंगर चल रहा है। यह आयोजन बाबा हरबंस सिंह दिल्ली वालों की ओर से है। रास्ते पर दोनों ओर छोटी-छोटी दुकानें भी सज गई हैं।
मुख्य सेवादार और प्रबंधकों से आयोजन के बारे में जिज्ञासा प्रकट करने पर प्यार से भरा जवाब मिलता है, तुसीं पहलां प्रसादा छको जी। साथ ही एक सेवादार खीर परोसता है। गुरु घर की देग के अटूट लंगर का प्रसाद। मुख्य प्रबंधक बड़ी ही विनम्रता से कहते हैं, जो कुछ है तुहाडे साहमणे है। सबकी इच्छा एक ही है, यहां उस महान जीत को दर्शाती बड़ी यादगार बने।
यहां आने वाले हर श्रद्धालु की इच्छा होती है कि उस जंड के पेड़ को देखा जाए, जिस पर अत्याचारी वजीर खान को लटकाया गया था। पेड़ का पुराना हिस्सा उसके चबूतरे पर धराशायी है और उससे बाद में फूटा नया अंकुर बड़ा पौधा बन गया है। पुराना हिस्सा गवाह है कि कैसे आतातायी का पतन होता है और नए पेड़ की पत्तियां हवा की सरसराहट के साथ विजयगाथा गा रही हैं।
(चंडीगढ़, हिन्दुस्तान के सोहणी सिटी में बुधवार, 12 मई 2010)

Tuesday, May 11, 2010

जो लरै दीन के हेत...

(बाबा बंदा बहादुर की सरहिंद फतह पर विशेष
------------------------

सूरमा की पहचान यही है कि वह धर्म के लिए लड़ता है, वह नीति के लिए लड़ता है, वह अन्याय के खिलाफ लड़ता है, वह अत्याचार से लड़ता है और अत्याचारियों का सफाया करता है। मुगलों के अत्याचार से जब भारतवर्ष की जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी, औरंगजेब की मौत के बाद उसके वारिस सत्ता के लिए आपस में लड़ रहे थे और नवाब तथा जागीरदार जनता का मनमाना शोषण कर रहे थे, उस समय सिखों के दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने नांदेड़ के आश्रम में बैरागी बनकर बैठे माधोदास को बंदा सिंह बहादुर के रूप में सूरमा का अवतार देकर पंजाब भेजा। गुरु के इस सिख ने न सिर्फ मुगलों के अत्याचार और शोषण का दमन किया बल्कि खालसा राज की स्थापना भी की। हमारा यह आलेख बंदा बहादुर की उसी सरहिंद फतेह को समर्पित है, जिसे कल 300 साल होने जा रहे हैं...
सूरा सो पहचानिए जो लरै दीन के हेत, पुर्जा-पुर्जा कट मरे कबहुं न छाड़े खेत
दशम पातशाह गुरु गोबिंद सिंह जी के सिख बंदा सिंह बहादुर का नाम त्याग, समर्पण, वीरता और शौर्य की ऐसी मिसाल है, जिसने पंजाब को मुगलों के अत्याचार से मुक्ति दिलाई। उन्होंने सरहिंद को जीत कर खालसा राज की स्थापना की तथा गुरुओं के नाम पर सिक्के चलाए। यद्यपि बाबा बंदा सिंह बहादुर के जीवनकाल के पहले चालीस साल की बहुत कम जानकारियां इतिहासकारों के पास हैं, फिर भी अधिकतर विद्वान इस बात पर सहमत हैं कि वे जम्मू-कश्मीर के राजपूत परिवार से थे। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. गंडा सिंह ने लिखा है कि उनका जन्म 16 अक्तूबर 1670 में जम्मू-कश्मीर के राजौरी इलाके में हुआ। वह डोगरा राजपूत थे और उनका नाम लक्ष्मण दास था। बचपन में उन्हें घुड़सवारी, कुश्ती और शिकार का काफी शौक था। एक छोटी सी घटना ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। एक बार उनका वाण एक गर्भवती हिरणी को लगा। हिरणी ने मरते-मरते बच्चों को जन्म दिया और बच्चे भी बिना मां के तड़प कर मर गए।
इस घटना के बाद लक्ष्मण दास ने घर छोड़ दिया और बैरागी साधु जानकी दास के शिष्य बन गए। उन्होंने नया नाम माधो दास दिया। इसके बाद वह साधुओं के साथ उत्तर भारत से घूमते हुए महाराष्ट्र के नांदेड़ पहुंचे और यहीं पर उन्होंने गोदावरी के तट पर अपना आश्रम बनाया तथा ध्यान में जुट गए। कुछ किवदंतियों के अनुसार उन्होंने गुरु औघड़ नाथ से हठयोग भी सीखा। वह कई रहस्यमय कलाएं भी जानते थे।
गुरु गोबिंद सिंह जी से भेंट
3 सितम्बर 1708 में नांदेड़ में गुरु जी माधोदास से उसके आश्रम में मिले थे। डॉ. हरजिंदर सिंह दिलगीर की पुस्तक सिख तवारीख में लिखा गया है कि गुरुजी से माधोदास एक बार पहले 1696 में भी मिल चुका था। यह मुलाकात हरिद्वार के निकट कनखल में हुई थी। यह मुलाकात बड़ी ही संक्षिप्त थी। इसकी तुलना में दूसरी मुलाकात देश के इतिहास में एक नई इबारत लिखने वाली थी।
प्रच्चलित किस्से के मुताबिक गुरुजी माधोदास को वैराग्य से कर्म की ओर मोडऩा चाहते थे। उन्होंने बकरी के बच्चे का खून आश्रम में छिड़कने का हुक्म दिया। यह देख बैरागी क्रोधित हो गया और गुस्से से बोला, मेरा डेरा अपवित्र हो गया। इस पर गुरु जी ने कहा संन्यासी तुझे अपने इस छोटे से डेरे के अपवित्र होने की चिंता है मगर वह भारत वर्ष का बड़ा डेरा जिसे रोज हजारों बेकसूर लोगों के खून से अपवित्र किया जा रहा है, उसकी तुझे कोई चिंता नहीं। इसके बाद माधोदास गुरु जी के आगे नतमस्तक हो गया और कहा, गुरु जी मैं तुम्हारा बंदा हूं। इस पर गुरुजी ने कहा तुम बहादुर हो और तुम्हें मुगलों के अत्याचार से जनता को मुक्त कराना है। माधोदास बैरागी ने अमृतपान किया और उसे गुरबख्श सिंह नाम मिला, मगर वह बंदा बहादुर के नाम से ही प्रसिद्ध हुआ। मुगलों के अत्याचार से लोगों को मुक्त कराने का कार्यभार उसे सौंप गुरु जी एकांतवास पर चले गए। बंदा बहादुर पंजाब के लिए कूच करने को तैयार हुआ। गुरु जी ने अपने तरकश से पांच बाण और सलाहकार के तौर पर पांच हजूरी सिंह -बाब बिनोद सिंह, बाबा बाज सिंह, बाबा कुइर सिंह, बाबा धर्म सिंह और बाबा फतेह सिंह साथ में नगाड़ा, निशान सिंह, बीरसिंह द्वारा गुरुजी की संगतों के लिए हुक्मनामा दिया।
25 सैनिकों के साथ किया कूच
इस तरह गुरु जी के फतेह के आशीर्वाद और 25 सैनिकों के साथ बंदा बहादुर ने नांदेड़ से पंजाब की ओर कूच किया। गुरु जी की हुक्मनामे में सिखों से आह्वान था कि वे सरहिंद के नवाब वजीर खान के खिलाफ संघर्ष में बंदा बहादुर की मदद करें। सिर्फ आठ किलोमीटर आगे बढऩे तक ही उसके साथ 300 सिखों की रिसालदारी हो गई। बंदा बहादुर ने पहला पड़ाव दिल्ली के पास डाला और सिख संगतों को गुरु जी का हुक्मनामा भेजकर धर्मयुद्ध का आह्वान किया। देखते ही देखते जत्थेदार जत्थे लेकर आ मिले और पूरी फौज बन गई। हिसार में सिख और हिन्दुओं ने उसका स्वागत किया और धन भेंट किया, जिसे उसने वहीं गरीब और जरूरत मंद लोगों में बांट दिया। इसके बाद टोहाना में बंदा बहादुर ने मालवा के सिखों को पत्र लिखा कि वे वजीर खान के खिलाफ उसके साथ एक जुट हों। सरहिंद की ओर बढ़ते समय उसने दिल्ली तख्त को चुनौती देते हुए सोनीपत और कैथल में शाही सैनिकों पर हमला कर खजाना छीन लिया। इस खजाने को भी जरूरतमंद लोगों में बांट दिया गया। इससे बंदा की प्रसिद्धि और बढ़ गई।
समाना पर पहला प्रहार
26 नवंबर 1709 में पहला हमला सिख फौज ने समाना पर किया। यहां के सैयद जलालुद्दीन जल्लाद ने गुरु तेगबहादुर पर तेग चलाई थी और यहीं के सैयदों ने दोनों छोटे साहिबजादों को दीवार में जिंदा चुनने का फतवा जारी किया था। बंदा बहादुर के साथ अब हजारों की संख्या में सिख फौज थी। तीन दिन की जंग में समाना जीत लिया गया। फौज आठ दिन समाना में रुकी फिर आसपास के मुसलमानों जागीरदारों को खत्म किया। बाबा फतेह सिंह को समाना का प्रभारी बना कर इसे मुगलों से मुक्त करा दिया गया। इस तरह समाना बंदा बहादुर के राज की पहली प्रशासकीय इकाई बना। जल्द ही शाहबाद मारकंडा को भी मिला लिया गया। इसके बाद कपूरी के हाकिम कदमदीन और संढोरा के हाकिम उसमान खां और उसके जरनैलों को मौत के घाट उतारा गया। इस जीत के बाद बाबा बंदा बहादुर के साथ 25 से 30 हजार की फौज हो गई। जत्थे के जत्थे उसके साथ लगातार जुड़ रहे थे।
लोहगढ़ की स्थापना
बंदा बहादुर का लक्ष्य सरहिंद के नवाब वजीर खान को दंडित करना था, जिसने गुरु जी के दो छोटे साहिबजादों जोरावर सिंह और फतेह सिंह को जिंदा दीवार में चुनवा दिया था। वजीर खान से मुकाबला करने के लिए पूरी तैयारी जरूरी थी। इसलिए बंदा बाहदुर ने सढोरा से 20 किलोमीटर दूर नाहन के दक्षिण में शिवालिक पहाडिय़ों में स्थित मुखलिसगढ़ को अपना मुख्यालय बनाया और इसे लोहगढ़ का नाम दिया। फरवरी 17१0 में यहां एक पहाड़ी की चोटी पर किला बनाया गया। यहीं से बंदा बहादुर ने अपनी मोहर और सिक्के जारी किए। इस तरह लोहगढ़ खालसा राज की पहली राजधानी बना।
आतंकित वजीर खान ने तैयारी शुरू की
बंदा की बढ़ती ताकत से डरे हुए वजीर खान ने जिहाद की घोषणा की। उसके साथ मलेरकोटला के नवाब के अलावा सूबे के अन्य नवाब और रांगड़ आकर मिल गए। उसकी सेना में सभी प्रशिक्षित सैनिक थे, दूसरी ओर बंदा बहादुर की सेना में ज्यादातर मुगलों के सताए आम लोग थे। वजीर खान की सेना में 6 हजार घुड़सवार, 8 से 9 हजार बुरकंदाज और तीरंदाज, 10 तोपखाने और बहुत से हाथी। इसके अलावा 10 हजार गाजी। कुल मिलाकर वजीर खान की फौज 30 हजार के करीब थी।
चप्पड़चिड़ी की एतिहासिक जंग
बंदा के पास न बहुत से हाथी थे न घोड़े मगर उसके पास हौसला था, उसकी सेना में जोश था। सरहिंद पर हमला करने के लिए बंदा ने लोहगढ़ से कूच किया। पहला पड़ाव बनूड़ में डाला गया। उधर, सरहिंद के नवाब ने कूच की सूचना मिलने पर बंदा ्रको रोकने के लिए सरहिंद से करीब 20 किलोमीटर दूर चप्पड़चिड़ी में मोर्चाबंदी की। उसकी सेना के दायें छोर का नेतृत्व मलेरकोटला का नवाब मोहम्मद खान कर रहा था, वजीर खान खुद मध्य में था और बांये छोर पर नवाब का दीवान सुच्चानंद अपनी फौज के साथ था। सिखों की ओर से बाबा बाज सिंह और बिनोद सिंह दायें और बायें छोर तथा खुद बंदा बहादुर बीच में सेना को नेतृत्व कर रहे थे। 12 मई 17१0 को युद्ध शुरू होते ही सुच्चदानंद भाग खड़ा हुआ। वह बाज सिंह के हमले के आगे टिक न सका। जल्द ही बिनोद सिंह ने शेर मोहम्मद खान को ठिकाने लगा दिया। मध्य में बंदा बहादुर लगातार तीरों की बौछारें करते हुए वजीर सिंह की सेना से निपट रहे थे। जल्द ही बाज सिंह और बिनोद सिंह की सेना भी उनसे आ मिली। इस संयुक्त हमले के आगे वजीर खान भी जल्द ही मारा गया।
इस तरह मारा गया वजीर खान
इतिहासकारों के सबसे मान्य तथ्य के अनुसार बाज सिंह ने वजीर खान पर धावा बोला। वजीर खान ने उस पर अपना भाला फेंका, जिसे बाज सिंह ने बीच में ही पकड़कर वापस फेंका। यह भाला वजीर खान के घोड़े के सिर में लगा और घोड़ा धाराशायी हो गया। इस पर वजीर खान ने एक तीर बाज सिंह के कंधे में मारा और घायल बाज सिंह पर तलवार लेकर दौड़ा, इस बीच फतेह सिंह ने इतनी ताकत से वजीर खान पर वार किया कि वह कंधे से लेकर कमर तक दो हिस्सों में बंट गया और मारा गया। वजीर खान का शव चप्पड़चिड़ी में ही एक जंड के पेड़ से लटका दिया गया ताकि लोग देख सकें कि इस जालिम का अंत हो गया।
जंड के इस पेड़ की जड़ों से निकले नए पेड़ अब भी चप्पड़चिड़ी में मौजूद हैं। इसके बाद शव को घोड़े से खींचकर सरहिंद ले जाया गया। रात होने तक सिख सरहिंद पहुंच गए। शहर के दरवाजे वजीर खान के परिजनों ने बंद कर दिए थे। रातभर महराबों से सिखों पर गोलीबारी होती रही। इस बीच बजीर खान के परिजन रात में ही दिल्ली के लिए भाग गए। अगले दिन दोपहर को सिखों ने शहर के द्वार खुलवा लिए। नवाब का सारा खजाना लोहगढ़ पहुंचा दिया गया। बाबा बाज सिंह को सरहिंद का सूबेदार बनाया गया।
अली सिंह उनके सहायक बने। राम सिंह को थानेसर का प्रभार सौंपा गया। बाबा बिनोद सिंह खजाना मंत्री बनाए गए। साथ ही उन्हें करना और पानीपत का क्षेत्र भी दिया गया, उन्हें दिल्ली की ओर से मुगल सेनाओं की गतिविधियों पर नजर रखने की जिम्मेदारी दी गई। बाबा बंदा बहादुर लोहगढ़ के किले में लौट आए और सरहिंद जीत के साथ ही 12 मई 17१0 से बंदा के नेतृत्व में खालसा राज का युग शुरू हुआ।
यद्यपि बंदा बहादुर का यह राज्य लंबे समय तक नहीं चला, लेकिन जागीरदारी प्रथा को खत्म करने और कई बड़े सुधारों के कारण उनका राज इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ गया।

महान सेनानायक ही नहीं कुशल प्रशासक भी थे बाबा बंदा बहादुर
मुगल सल्तनत के खिलाफ आवाज बुलंद कर और इंकलाब की हुंकार भरने वाले बंदा बहादुर अर्थ के भी अच्छे जानकार थे। इतिहास के पन्नों में उनके जो भी काम मिलते हैं, वह साबित करते हैं कि वह महान सेना नायक ही नहीं कुशल प्रशासक भी थे। वह किसानों के लिए मसीहा साबित हुए। उन्होंने जमींदारी प्रथा का अंत कर जो कार्य किया उसका असर अब तक दिखता है। उनके शासनकाल में किसान जिस तरह मजबूत हुए वह दबदबा पंजाब की कृषि का आज तक कायम है। मुगलों ने किसानों से लगान वसूलने के ठेके जमींदारों को दे रखे थे। ये जमींदार किसानों पर अत्याचार करते थे। बंदा बहादुर ने लोहगढ़ के किले से बागडोर संभालते ही जमींदारी प्रथा खत्म करने की घोषणा की और किसानों को उस जमीन जिस पर वे खेती कर रहे थे, असली मालिक घोषित कर दिया। समकालीन इतिहासकार खाफी खान ने बंदा बहादुर के बारे में लिखा है कि उन्होंने मुगल शासकों के अधिकारियों, एजेंटों और जागीरदारों को संदेश भेजे कि अब वे अपना काम बंद कर दें।
पंजाब यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर डॉ. ईश्वर दयाल गौड़ कहते हैं कि एक ओर लगान नहीं देने की हुंकार भरना और दूसरी ओर समानान्तर मुद्राओं का चलन शुरू करना तत्कालीन मुगल साम्राज्य के खिलाफ एक नए साम्राज्य और व्यवस्था की शुरुआत का शंखनाद साबित हुआ। जिस तरह से उन्होंने मुद्राओं को ढालने की प्रक्रिया बताई, उस योजना तक सिरे चढ़ाया और इसके जरिए सम्मान की ललक पैदा की। इससे गुलामी का दंश झेल रहे लोगों में एक नई उम्मीद की किरण जगी और वे मुहिम में शामिल हो गए। छोटी सी टुकड़ी से फौज तैयार करना बंदा बहादुर की कुशल प्रशासक होने के गुण को भी दर्शाता है।

( हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के सोहणी सिटी में प्रकाशित विशेष पेज से साभार )

Saturday, May 1, 2010

सत्यम् वद धर्म चर : भगदड़ और मौत के बीच

सुधीर राघव
---------
हमारे सरोकार

सदैव सच बोलो और धर्म का पालन करो। तैतरीय उपनिषद का यह वैदिक वाक्य हमारी सभ्यता की रीढ़ है। सच की इसी नाव ने गुलामी के गहरे अंधेरे झंझावातों में भी हमें डूबने नहीं दिया। यूनान, मिस्र और रोम की प्राचीन सभ्यताएं या तो मिट गईं या बदल गईं, मगर हम अब भी सीना ताने उतनी ही मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं। निरंतर आगे बढ़ते रहने के लिए जरूरी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा हमें हमारे धर्मों और धर्मशास्त्रों से मिलता रहा है।
धर्मों और सम्प्रदायों के टकराव भी हमने झेले हैं, मगर सत्य से हमारी आस्था कभी नहीं डिगी। सुबह-सुबह पहली सूचना मिली कि डेरा सच्चा सौदा में भगदड़ मच गई है। स्थानीय संवाददाता से बात की गई तो पता चला कि पांच महिलाओं की मौत हो गई है। घायलों की संख्या काफी ज्यादा हो सकती है। भगदड़ वीरवार रात करीब 10-11 बजे के आसपास हुई। घटना का पता सुबह तब चला, जब कुछ लोग तीन शव लेकर सिविल अस्पताल पहुंचे। उसके बाद पत्रकार डेरे के ओर दौड़े घायलों को अंदर ही स्थित अस्पताल में भर्ती कराया गया था। भूकंप और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के समय डेरे के अनुयायी जिस सेवा भाव से काम करते हैं, वह किसी से छिपा नहीं है। इसलिए यहां भी कुछ प्रशासन के भरोसे नहीं था। यही वजह थी कि सुबह तक पत्रकार इस सूचना से अंजान थे। पुलिस के बड़े अफसर भी सुबह ही डेरे पहुंचे। सुबह सबके पास बस अटकलें ही थीं।
स्थिति जानने के लिए डेरे के प्रवक्ता पवन इन्सां से फोन पर संपर्क किया गया। उनका कहना था कि नियमित कार्यक्रम के अनुरूप ही डेरा श्रद्धालु सत्संग के बाद लंगर छककर निकले तो आंधी का गुबार आने से महिलाओं में भगदड़ मच गई। इस वजह से पांच महिलाओं की मौत हो गई। तीन-चार को मामूली चोट आई है। यह एक दुखद घटना है।
डेरा सिर्फ अनुयायियों के सेवा भाव ही नहीं अनुशासन के लिए भी जाना जाता है। भगदड़ कहां मची, इसे लेकर अलग-अलग बातें सामने आईं। पहली सूचना यह थी कि डेरे के लंगर हाल में भगदड़ मची। एक अनुयायी का कहना था कि भगदड़ डेरे से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर टैक्सी स्टैंड के पास मची है। बाद में प्रशासन की ओर से बताया गया कि भगदड़ डेरे के गेट नंबर 3 के बाहर हुई। हादसे में मारी गई बठिंडा की महिला कमला के बेटे शंकर लाल का कहना था कि भगदड़ कहां हुई, वह यह तो नहीं बता सकता, मुझे बस यह पता है कि मेरी मां इस भगदड़ में मर गई है।
मरने वालों और घायलों की संख्या को लेकर भी अलग-अलग बातें सामने आईं। राज्य सरकार ने मरने वालों के लिए मुआवजा तो घोषित कर दिया है मगर ऐसे स्थानों पर जहां एक लाख के करीब लोग जुट रहे हों, वहां प्रशासन व्यवस्था पूरी तरह संबंधित संस्थान के ही भरोसे नहीं छोड़ सकता। इस के बारे में कुछ सोचा जाना चाहिए।
भले ही आज हम सूचनाएं कुछ ही मिनटों में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने में सक्षम हों, मगर इनकी साख इनके सच होने से ही जुड़ी है। इस घटना के संदर्भ में भी हम विश्वास करते हैं कि सभी पक्ष सच कह रहे हैं और धर्म का पालन कर रहे हैं।

(1 मई 2010 को हिन्दुस्तान चंडीगढ़ में प्रकाशित)