Wednesday, January 13, 2010

सुनो राधिका : अनुगूंज का सम्मोहन

सुधीर राघव

जीवन के कुछ शाश्वत सत्य होते हैं। जो इनका मर्म जान लेता है, वही काल को जीत लेता है। कालजयी हो जाता है। हर काल में उसकी सार्थकता बनी रहती है। यही वजह है कि खंड काव्य सुनो राधिका का डेढ़ दशक के बाद आया द्वितीय संस्करण उतना ही प्रासंगिक लगता है, जितना की 15 साल पहले। यह वह समय है, जिसमें आधुनिक समाज की एक पीढ़ी बदल जाती है। पिछले पंद्रह साल में समाज पूरी तरह से बदल गया है, मगर इस खंडकाव्य के सरोकार आज भी उतने ही सार्थक हैं और करीब एक सदी बाद भी वैसे ही रहने वाले हैं। कृष्ण हमारे वह महानायक हैं, जिनके चरित्र में अनंत वैचारिक आयाम छिपे हैं। ऐसे ही कुछ मंत्रमुग्ध कर देने वाले आयामों से माधव कौशिक ने हमारा परिचय इस खंड काव्य में कराया है। कृष्ण के स्वकथन के माध्यम से जो विषय यहां उठाए गए हैं उनका महत्त्व कभी कम नहीं होने वाला। यहां उनके ही शब्दों में उसकी बानगी देखिए...

1. सम्बन्धों पर

राधा!
सम्बन्ध केवल
विरासत में ही नहीं मिलते
सृजित भी किए जाते हैं
तप से, जप से
कर्म से, धर्म से
ऐसे सम्बन्ध
रक्त-सम्बन्धों से अधिक
गहन, अधिक सक्रिय
ज्यादा उत्कट, ज्यादा तीव्र
मन और आत्मा के
अधिक पास होते हैं
इन सम्बन्धों के समक्ष
बौने हैं
विश्व के सभी नाम

2. मानसिकता

कंस, कर्ण, दुर्योधन
शिशुपाल, जयद्रथ,
ये सब मात्र व्यक्ति नहीं
मानसिकताएं हैं
इनसे भी बढ़कर
विचारधाराएं हैं
जिनकी जड़ें पाताल तक
पृथ्वी के रोये रेशे में
अन्दर तक समाई
इसे खोखला करने पर तुली हैं।
व्यक्ति का वध करना
कितना सरल है
कितना आसान है
उसका आस्तित्व मिटाना
किन्तु मानसिकता को मारना
बहुत ही कठिन
उसे समूल नष्ट करना
उससे भी दुष्कर
और कुत्सित विचारधारा
वह तो मरती ही नहीं
मर कर भी
युगों-युगों तक
भयंकर व्याल सी
श्वास लेती रहती है
धीरे-धीरे
गर्त में पड़ी
ढूंढती रहती है
अपने पोषक पदार्थ को।

3. नारी

समझ नहीं आता?
मानव शोषण और
अत्याचार की
अन्तिम शिकार,
उनका अन्तिम ग्रास
उनके प्रतिशोध का
अन्तिम साधन
नारी-जाति ही क्यों बनती है?

**************
एक, दो, चार
दस-बीस वर्षों का
अभिषाप नहीं है यह
पूरी शताब्दियों के
कुटिल चिन्तन का
परिणाम है यह
कि कुन्ती, द्रौपदी, उत्तरा
हर वर्ग, हर वर्ण की
हर नारी
आज स्वयं को विवश
रूढिय़ों में जकड़ी
महासंताप को झेल रही है।

4. राजनीति

राजनीति भी अजीब
दुमुंही वस्तु है
एक मुंह से हां करती है
तो दूसरे से उसी क्षण
ना कहकर नाक काट डालती है।
एक मुंह दुंदुभि बजाता है
तो दूसरा
मुंह पर थूक कर
उसी क्षण, हाथों हाथ
बदला चुका भी लेता है
मुखौटे पर मुखौटे पर मुखौटे
कितने उतारेंगे आप
मायवी-लोक समाप्त नहीं होता
छल-छद्म का
कोई ओर नहीं
छोर भी नहीं
दलदल है
महासागर सा दलदल
बचना चाहकर भी
नहीं बच सकता कोई।

इस खण्ड काव्य में विचारों के जो मोती पिरोये गए हैं, उससे माधव कोशिक के खाते में कई उपलब्धियां हैं। इसके काव्य प्रसंगों को आधार बनाकर राम प्रताप वर्मा ने जो चित्र बनाए उन्हें उस समय कला प्रदर्शनी में काफी सराहा गया। इसके कथ्य एवं शिल्प पर शोध हो चुका है। आकशवाणी और दूरदर्शन के विभिन्न केंद्रों से इस काव्य के प्रमुख अंशों का प्रसारण भी हुआ। कुल मिलाकर सुनो राधिका की यह अनुगूंज इसकी पहली गूंज की तरह ही सम्मोहक है।

(यह पुस्तक चर्चा १० जनवरी २०१० को हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के कलम पृष्ठ पर प्रकाशित हुई।)

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