Friday, January 29, 2010

इब्नबतूता पहन के जूता

शीर्षक पढ़कर आप यह न समझिएगा कि यह आजकल टीवी पर चल रहा गुलजार का गीत है। यह प्रसिद्ध कवि, साहित्यकार और पत्रकार .सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता है। हम में से जो साथी बचपन में बाल पत्रिका पराग के पाठक रहे हैं, सर्वेश्वर जी उनके लिए बेहद प्रिय हैं, जिन्हें बचपन में पढ़ा अब गुलजार के गीत पर उसका प्रभाव ही जो सुनकर मनको छूता है। यहां प्रस्तुत है सर्वेश्वर जी की कविता,बतूता का जूता नाम से यह बाल कविता उन्होंने १९७१ में लिखी थी। जो आपको भी याद होगी-


इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में


कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता


उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में।

Tuesday, January 26, 2010

इक बाबा नानक सी.. पंजाब में नया विवाद

आजकल पूरे पंजाब में पेशेवर गायक बब्बू मान का गीत इक बाबा नानक सी...चर्चा में है। चर्चा ऐसी कि यह लोकगीत सा बच्चे-बूढ़ों की जुबान पर है और एक नया मुहावरा बन गया है। इस गीत में जगह-जगह पनपे गुरुओं और डेरावाद को निशाना बनाया गया है। इसलिए इसकी आलोचना भी खूब हो रही है। खासकर धर्म प्रचारकों ने इसे अपने ऊपर सीधा प्रहार माना है और ऐसे गायकों को कंजरियां नचाने वाले और नशाखोरों को बढावा देने वाला तक करार दिया है। खासकर बाबा रणजीत सिहं ढडरियांवाले और प्रसिद्ध ढाडी प्रचारक ज्ञानी तरसेम सिंह मोरांवालियां ने जो खरी-खरी बातें अपनी प्रचारसभाओं में कही हैं उनकी क्लिपिंग यू-ट्यूब पर भी उपलब्ध है। मामला यहीं नहीं रुका है गीत की तरफदारी करने वालों ने भी अपने तर्क की क्लीपिंग डाल दी हैं। यू-ट्यूब पर इक बाबा नानक सी डालते ही यह जखीरा खुल जाता है। चर्चा इतनी है तो गीत में भी कुछ जरूर है। धर्म के नाम पर कुछ गलत लोग भी जिस तरह दुकानदारी कर रहे हैं गीत में उसीको निशाना बनाया गया है, इसलिए गीत ध्यान खींचता है। गीत कुछ इस तरह है (अनुवाद के साथ)

इक बाबा नानक सी, बई जिहने तुर के दुनिया गाहती।
(अनुवाद-एक बाबा नानक थे, भाई जिन्होंने पैदल ही पूरी दुनिया नाप दी। (वैसे पंजाबी में गाहती का अर्थ खेत जुताई है)

इक आजकल दे बाबे ने, बत्ती लाल गड्डी ते ला ती।
(अनुवाद- एक आजकल के बाबा लोग हैं, जिन्होंने अपनी गाड़ी पर लाल बत्ती लगा रखी है)

कारसेवा दे नां ते मंगदे रसद नोटां दी थेली
(अनुवाद-ये लोग कार सेवा के नाम पर रसद के रूप में नोटों की थैली ही मांगते हैं)

मैं सुनैया बाबे ने आजकल काली ऑडी ले ली।
(अनुवाद-मैंने सुना है कि आजकल बाबा ने काली ऑडी (कार) ले ली है) (इस गीत में काली ऑडी की जगह बाद में महंगी गाड़ी शब्द कर दिया गया। क्योंकि काली ऑडी एक बाबा के पास थी)

इन अनपढ़ बीबीयां ने बंदे गल रब दी तख्ती पाती।
(अनुवाद-इन अनपढ़ महिलाओं (अनुयायी) ने आदमी के गले में भगवान की तख्ती डाल दी है)

छोटी जही गल्लां उत्ते हो जांदे दंगे लग दियां अग्गां।
(अनुवाद-छोटी सी बात पर दंगे हो जाते हैं, आगजनी की जाती है)

कोई बंदा सेफ नहीं, हाय राह जांदे लत्थन पग्गां।
(अनुवाद-कोई व्यक्ति सुरक्षित नहीं, हाय, राह चलते लोगों की पगड़ी उतर जाती है अर्थात इज्जत भी सुरक्षित नहीं)

येह गातर धर्मा दी किसी दी पच्छ के तुर जाए छाती
(अनुवाद-ये धर्म की कटार है, मजाल है किसी की छाती बिने छिले रह जाए)

ले ले दो चार ढोलकी पांच सत्त चिमटे रख ले नाले
(अनुवाद-दो चार ढोलकियां ले लो और साथ ही पांच-सात चिमटे रखलो)

बीबी अते वीआईपी घुम्मनगे चात्थों पैर द्वाले
(अनुवाद-फिर देखना महिलाएं और बीआईपी चारों पहर आपके चारों ओर घूमेंगे)

आसी बड़े महान हां, किसी ने झूठी फूंक छकाती
(अनुवाद-हम बड़े महान हैं, किसी ने झूठी हवा बनादी। - वैसे छकाने का अर्थ खिलाने से है)

काहनू टप्पे सिट्टें जाके, रखके बाजा तू भी गा ले
(अनुवाद-खेत में जाकर तू क्यों फावड़ा-कस्सी चलाता है, एक बाजा रख और गाना शुरू कर)

तेरा बाग फल गया जा सेंटर बिच्च कुल्ली पा ले
(अनुवाद- तेरा बाग में अब फल आ गए हैं, जा केंद्र (सरकार) में झौंपड़ी पा ले अर्थात धर्मों की राजनीति करने का जो तुम्हारा मकसद था वह सफल हो गया है, अब तुम केंद्र सरकार में जाकर अपनी जगह पक्की कर लो )

रीलां हुण बिकनियां नहीं शुरू कर खेती गायक साथी।
(अनुवाद-अब गीतों की कैसेट-रीलें नहीं बिकेंगी, गायक साथी अब तू खेती करना शुरू कर दे।)

यह देखा गया है कि पंजाब में जब भी कोई बहस छिड़ती है तो उसमें वैचारिक मुद्दे पीछे छूटने लगते हैं और ज्यों-ज्यों लोग उसमें जुड़ते जाते हैं प्यार और नफरत के सीधे-सीधे दो धड़े बन जाते हैं। महौल कड़ुवा होता जाता है और खून-खराबे की बात भी की जाती है। अब भी वही हो रहा है, रोडे-भोडे (मोने- जो केश नहीं रखते) कहा जा रहा है तो जवाब में मोनों का महत्त्व पूहला को गड्डी चाढ़ने वाली बात कह कर दिया जा रहा है। निहंग प्रमुख बाबा पूहला आतंकवाद के दौर में पंजाब पुलिस के साथ रहे, उनकी सूचनाओं पर बहुत से आतंकवादी मारे गए थे। पंजाब में आतंकवाद काबू में आने के बाद में उन पर कई आपराधिक मामले दर्ज हुए, वह जेल में बंद थे। बादल सरकार के समय उन्हें पिछले साल जेल में ही जिंदा जला दिया गया, इससे उनकी मौत हो गई। यह विवाद किस दिशा में जाता है फिलहाल वक्त ही बताएगा। हालांकि बब्बू मान ने गीत पर सफाई देकर कि यह किसी एक को निशाना बनाने के लिए नहीं है, मैंने तो आम बात कही है, मामले को ठंडा करने की कोशिश की मगर जो निशाना बने हैं उनकी नाराजगी कायम है।

Sunday, January 17, 2010

सबसे डरावनी खबर

सुधीर राघव

व्यंग्य

राहु ने सूर्य को ग्रस लिया है। एक खबरिया चैनल पर एक पहुंचे हुए ज्योतिषाचार्य लोगों को डरा रहे हैं। जब से रामसे ब्रदर्स ने डरावनी फिल्में बनाने से हाथ खींचे हैं, यह काम कुछ चैनल कर रहे हैं। भय सबसे ज्यादा बिकता है। पहले यह सिर्फ रामसे ब्रदर्स जानते थे फिर महेश भट्ट कैंप ने इसका महत्त्व समझकर राज तथा रामू कैम्प ने भूत बनाकर मोटी कमाई की। आजकल खबरिया चैनल यह काम कर रहे हैं। इसकी कमाल की टीआरपी है। आदमी खबर देखने के लिए चैनल लगाता है, पर दृश्य देखकर कांपने लगता है। कंठ सूख जाता है। रोम खड़े हो जाते हैं। हाथ से रिमोट छूटकर गिर जाता है। चैनल चलायमान रहता है और टीआरपी बढ़ती जाती है। यह धरती नष्ट होने वाली है। एक बहुत बड़ी उल्का धरती की ओर आ रही है। दृश्य उभरते हैं-उल्का धरती से टकराती है। धरती ज्वालामुखी बन जाती है। जीवन नष्ट हो रहा है। दर्शक भय से पीला पड़ जाता है। उसे अपने माता-पिता और बीवी-बच्चे याद आने लगते हैं। पुरानी प्रेमिकाओं के चेहरे एक-एक कर नजरों के आगे से गुजरते हैं। उनके साथ बिताए हंसी-खुशी के पल याद आते हैं। ये सब नष्ट होने वाले हैं। वह हताश हो जाता है। करीब घंटे भर तक धरती नष्ट होने के दृश्य दोहराये जाते हैं। उसके बाद दर्शक का भ्रम टूटता है। वह यह जानकर राहत की सांस लेता है कि ऐसा अभी नहीं, एक हजार साल बाद होना है। वह प्रफुल्लित है। यह जानकर भी प्रफुल्लित है कि उसे, उसके बच्चों और उसकी प्रेमिकाओं को तो तब तक जीवित ही नहीं रहना है। संसार नश्वर है। यह तो हम युगों से जानते आए हैं। यह जानने के बाद भी पिछले सौ साल में हम 3 कोटि से एक अरब की संख्या पार कर गए हैं।
ज्योतिषाचार्य बता रहे हैं कि यह कंकण सूर्यग्रहण बहुत उथल-पुथल करने वाला था। इसका असर एक माह तक रहेगा। हैती में दो लाख हताहत हुए। गरीब देशों और गरीबों के लिए यह बहुत भारी है। अगर गरीब लोग सात तरह के अनाज नदी में बहाएं तो उनके दुख दूर हो सकते हैं। महंगाई, महिलाएं और मनमोहन खूब तरक्की करेंगे। एक दर्शक फोन कर बीच में टोक रहा है, जिसके पास सात तरह का अनाज पानी में बहाने का सामर्थ्य हो तो वह गरीब ही कहां होगा? ज्योतिषाचार्य दार्शनिक हो जाते हैं-देखो, जहां इच्छा होती है, वहां सामर्थ्य आ जाता है। गरीब इसलिए गरीब है, क्योंकि उसकी इच्छा मर जाती है।
दर्शक खांटी है। वह फिर टोकता है-साहब गरीब की इच्छा तो मरेगी ही। बच्चा दूध के लिए जिद करता है, दूध वाला कहता है, 30 रुपए किलो दूंगा। पचास रुपए लेकर मंडी जाता है, खाली झोला लेकर लौटता है। परचून वाला अब 10 रुपए की चीनी नहीं देता। पहले इतने में आधा किलो चीनी आ जाती थी और बच्चों के लिए तीन टॉफियां। पूरे दिन की दिहाड़ी में आटा और नमक ही आता है। आटे में नमक डालकर कब तक इच्छाएं जीवित रखी जा सकती हैं...। फोन बीच में कट जाता है।
पर आंखों के सामने दृश्य छोड़ जाता है। आज की सबसे भयाभय खबर गरीब की झोंपड़ी में चल रही है, जो एक हजार साल बाद गिरने वाले उल्का से ज्यादा खतरनाक है। यह खबर किसी चैनल पर नहीं है। महंगाई की उल्का जो तबाही मचा रही है, उस पर किसी का ध्यान नहीं है। मनमोहन और शरद पवार का भी नहीं। ज्योतिषाचार्य कह रहे हैं-दोनों नेताओं के सितारे बुलंद हैं। इनके लिए यह ग्रहण और तरक्की लेकर आ रहा है। वही ग्रहण जो गरीब को ग्रस रहा है।
(यह व्यंग्य 17 जनवरी 2010 को हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के कलम में प्रकाशित)

Wednesday, January 13, 2010

सुनो राधिका : अनुगूंज का सम्मोहन

सुधीर राघव

जीवन के कुछ शाश्वत सत्य होते हैं। जो इनका मर्म जान लेता है, वही काल को जीत लेता है। कालजयी हो जाता है। हर काल में उसकी सार्थकता बनी रहती है। यही वजह है कि खंड काव्य सुनो राधिका का डेढ़ दशक के बाद आया द्वितीय संस्करण उतना ही प्रासंगिक लगता है, जितना की 15 साल पहले। यह वह समय है, जिसमें आधुनिक समाज की एक पीढ़ी बदल जाती है। पिछले पंद्रह साल में समाज पूरी तरह से बदल गया है, मगर इस खंडकाव्य के सरोकार आज भी उतने ही सार्थक हैं और करीब एक सदी बाद भी वैसे ही रहने वाले हैं। कृष्ण हमारे वह महानायक हैं, जिनके चरित्र में अनंत वैचारिक आयाम छिपे हैं। ऐसे ही कुछ मंत्रमुग्ध कर देने वाले आयामों से माधव कौशिक ने हमारा परिचय इस खंड काव्य में कराया है। कृष्ण के स्वकथन के माध्यम से जो विषय यहां उठाए गए हैं उनका महत्त्व कभी कम नहीं होने वाला। यहां उनके ही शब्दों में उसकी बानगी देखिए...

1. सम्बन्धों पर

राधा!
सम्बन्ध केवल
विरासत में ही नहीं मिलते
सृजित भी किए जाते हैं
तप से, जप से
कर्म से, धर्म से
ऐसे सम्बन्ध
रक्त-सम्बन्धों से अधिक
गहन, अधिक सक्रिय
ज्यादा उत्कट, ज्यादा तीव्र
मन और आत्मा के
अधिक पास होते हैं
इन सम्बन्धों के समक्ष
बौने हैं
विश्व के सभी नाम

2. मानसिकता

कंस, कर्ण, दुर्योधन
शिशुपाल, जयद्रथ,
ये सब मात्र व्यक्ति नहीं
मानसिकताएं हैं
इनसे भी बढ़कर
विचारधाराएं हैं
जिनकी जड़ें पाताल तक
पृथ्वी के रोये रेशे में
अन्दर तक समाई
इसे खोखला करने पर तुली हैं।
व्यक्ति का वध करना
कितना सरल है
कितना आसान है
उसका आस्तित्व मिटाना
किन्तु मानसिकता को मारना
बहुत ही कठिन
उसे समूल नष्ट करना
उससे भी दुष्कर
और कुत्सित विचारधारा
वह तो मरती ही नहीं
मर कर भी
युगों-युगों तक
भयंकर व्याल सी
श्वास लेती रहती है
धीरे-धीरे
गर्त में पड़ी
ढूंढती रहती है
अपने पोषक पदार्थ को।

3. नारी

समझ नहीं आता?
मानव शोषण और
अत्याचार की
अन्तिम शिकार,
उनका अन्तिम ग्रास
उनके प्रतिशोध का
अन्तिम साधन
नारी-जाति ही क्यों बनती है?

**************
एक, दो, चार
दस-बीस वर्षों का
अभिषाप नहीं है यह
पूरी शताब्दियों के
कुटिल चिन्तन का
परिणाम है यह
कि कुन्ती, द्रौपदी, उत्तरा
हर वर्ग, हर वर्ण की
हर नारी
आज स्वयं को विवश
रूढिय़ों में जकड़ी
महासंताप को झेल रही है।

4. राजनीति

राजनीति भी अजीब
दुमुंही वस्तु है
एक मुंह से हां करती है
तो दूसरे से उसी क्षण
ना कहकर नाक काट डालती है।
एक मुंह दुंदुभि बजाता है
तो दूसरा
मुंह पर थूक कर
उसी क्षण, हाथों हाथ
बदला चुका भी लेता है
मुखौटे पर मुखौटे पर मुखौटे
कितने उतारेंगे आप
मायवी-लोक समाप्त नहीं होता
छल-छद्म का
कोई ओर नहीं
छोर भी नहीं
दलदल है
महासागर सा दलदल
बचना चाहकर भी
नहीं बच सकता कोई।

इस खण्ड काव्य में विचारों के जो मोती पिरोये गए हैं, उससे माधव कोशिक के खाते में कई उपलब्धियां हैं। इसके काव्य प्रसंगों को आधार बनाकर राम प्रताप वर्मा ने जो चित्र बनाए उन्हें उस समय कला प्रदर्शनी में काफी सराहा गया। इसके कथ्य एवं शिल्प पर शोध हो चुका है। आकशवाणी और दूरदर्शन के विभिन्न केंद्रों से इस काव्य के प्रमुख अंशों का प्रसारण भी हुआ। कुल मिलाकर सुनो राधिका की यह अनुगूंज इसकी पहली गूंज की तरह ही सम्मोहक है।

(यह पुस्तक चर्चा १० जनवरी २०१० को हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के कलम पृष्ठ पर प्रकाशित हुई।)