Wednesday, December 30, 2009

नववर्ष मंगलमय हो

-सुधीर राघव

पुराने साल के साथ
नई साल की नई तारीख को
क्या हम पुराने सपनों का बोझ भी विदा कर पाते हैं
पुराने सपने हकीकत बन कर
कभी भी आ सकते हैं
अपना हिसाब चुकता करने

यकीन न हो तो राठौर से पूछना
उन्नीस साल पहले आनंद प्रकाश और
उनकी बेटी अराधना ने देखा था
रुचिका के लिए न्याय का सपना
ताकत के गरूर में राठौर ने तब
उड़ाई होगी इस सपने की खिल्ली

पर सपने तो सपने होते हैं
हकीकत बनकर कभी भी आ सकते हैं
हिसाब मांगने।
इसलिए बीते साल में जो आपके सपने सच नहीं हुए
उनके लिए हताश मत होना
और नए साल में नए सपने भी जरूर देखना।

(30-12-2009)

Wednesday, December 16, 2009

बीमारी को ढक कर नहीं रोका जा सकता

सुधीर राघव
हमारे सरोकार

यह हमारे हवाई अड्डों पर हुई लापरवाही का नतीजा है। ... और इस लापरवाही पर अब तक सवाल भी नहीं उठे हैं। देशभर में स्वाइन फ्लू से हुई मौतों का आंकड़ा तेजी से 700 की ओर बढ़ रहा है। साढ़े छह हजार से ज्यादा मामले अब तक पॉजिटिव आ चुके हैं। स्थिति संभालने में सरकार अपने ढंग से जुटी है। केंद्रीय पर्यटन मंत्री मीडिया को दोष दे रही हैं, स्वाइन फ्लू को लेकर नकारात्मक खबरें दी जा रही हैं। इससे पर्यटन उद्योग के लिए खतरा पैदा हो गया है।
तो क्या स्वाइन फ्लू तब तक ही बड़ी खबर था, जब तक वह अमेरिका में था। वहां सात महीने में 10 हजार से ज्यादा मौतें हुईं और इनमें 1१00 बच्चे ही हैं। वहां सर्दियां लंबी होती हैं। चुनौती ज्यादा बड़ी है। इसके बावजूद नेता इस तरह की बात नहीं कह रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या सिर्फ अमेरिका का और अमेरिका के लिए ही मीडिया जागरूक है। बाकी दुनिया में बीमारी फैलेगी, लोग मरेंगे तो क्या प्रशासन हरकत में नहीं आएगा। मीडिया खबर नहीं बनाएगा। नेताओं को लोगों के नागरिक अधिकारों की चिंता करनी चाहिए। जनता को गुलामों की तरह सूचनाओं से वंचित करने की सामंती सोच लोकतंत्र में नेताओं को शोभा नहीं देती। सूचना रोक कर स्वाइन फ्लू को नहीं रोका जा सकता। हां सूचना मिलने से जरूर इसमें मदद मिल सकते हैं। लोग अपने स्तर पर सतर्क होंगे। लोग सतर्क होंगे तो बीमारी पर लगाम भी लग सकेगी। सूचना रुकने से उन अधिकारियों को अवश्य आसानी हो जाती है, जो परिस्थितियों के लिए जवाबदेह होते हैं। हमारे अधिकारी और नेता हमेशा जवाबदेही से बचना चाहते हैं और मीडिया को दोषी ठहरा कर लोगों का ध्यान बांटने की कोशिश में रहते हैं।

हमारे यहां तो नवंबर में प्रकोप दिखा और दिसंबर काटना मुश्किल हो रहा है। चंडीगढ़ की हालत यह हो गई है कि पहले जहां एक-दो केस पॉजिटिव आ रहे थे, वही संख्या अब एक ही दिन में 13 तक पहुंच गई है। इनमें भी सात अकेले चंडीगढ़ के और बाकी पड़ोसी राज्य हरियाणा तथा पंजाब के। शहर में अब तक पांच लोगों की मौत भी हो चुकी है। इनमें स्कूली छात्र भी हैं और बुजुर्ग भी। चिंता की बात यह है कि जो बीमारी फॉरेन टूर हिस्ट्री वालों के साथ शुरू हुई, वह अब सेक्टरों से होते हुए डड्डू माजरा तक पहुंच चुकी है। पीजीआई में शुरूआती मरीज हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश से आए। इसके बाद पीजीआई के रेजिडेंट्स और नर्सिंग स्टॉफ के भी पॉजिटिव मामले सामने आए। देखते ही देखते स्कूल, सेक्टर, सर्वेंट्स क्वाटर और गांव तक से केस निकलने लगे।

(हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के 15 दिसंबर के अंक में प्रकाशित)

Monday, December 14, 2009

सकाम निष्कर्मी मतलब नेता

सुधीर राघव

नेता का जन्म नीति और नेतृत्व से हुआ है। आम आदमी जीवनभर इसी गलतफहमी में जीता है और कभी नेता नहीं बन पता। नेता का भला इन दोनों शब्दों से क्या काम। नेतागीरी की शुरुआत अनीति पर चलकर होती है और जो शुरू में जितना बड़ा पिछलग्गू होता है आगे चलकर उतना ही बड़ा नेता बनता है। अधिकांश लोग इस मर्म को समझ नहीं पाते और बुझाने के नाम पर पराई आग में कूद जाते हैं। उनके हिस्से में सिर्फ जले हुए हाथ और कालिख ही आती है। अगर गलती से आग बुझ भी जाए तो एक सुलझा हुआ नेता उसे फिर सुलगाकर बुझाने की कोशिश का सारा क्रेडिट ले जाता है।
नेता का एक और बड़ा गुण हैं। ...जो धर्म की जितनी बातें करे समझो वह उतना ही बड़ा अधर्मी है। वह न गीता जानता है न कुरान। उसकी आस्था तो सिर्फ फजीता में है। समाज में फजीता हो, हिंसा हो, खून-खराबा हो, लोग हथियार लेकर एक दूसरे की गर्दन पर टूट पड़ें तभी तो उसकी राजनीति जमेगी। समाज में शांति हो, कोई बड़ी समस्या नजर न आ रही हो तो नेता बेचैन हो जाता है। वह लोकतंत्र के लोकनारायण से यही दुआ मनाता है कि थोड़ा सा तो लड़ जाओ। देखो धर्म संकट में है, भाषा संकट में है, जाति का हक मारा जा रहा है, हमारे इलाके में दूसरे इलाके के लोग घुस आए हैं। इतने सारे मुद्दे हैं और लोग लड़ नहीं रहे हैं। ऐसा कैसे चलेगा।
लोग लड़ें नहीं तो वह समय नेता के लिए संकटकाल होता है। उसकी जीभ में खुजली होती है, उसके हाथ में खुजली होती है। यह खुजली जब असहनीय हो जाती है तो वह चमचों से रैलियां निकालने को कहता है। चमचा पलट कर पूछे कि किस मुद्दे पर फिलहाल तो सब शांत हैं, नेता आपे से बाहर हो जाता है। वह पुराने आतंकवादी मित्र को याद करता है, यार कहीं बम ही रखवा दो, नहीं तो मेरी सारी नेतागीरी चौपट हो रही है।
जब सब उठाईगीर, चोर-उचक्के, धर्म के ठेकेदार हाथ खड़े कर लेते हैं। साफ कह देते हैं कि नेता भाई जनता हमारी बातों में नहीं आ रही। हम क्या करें? ...तब नेता खुद चक्कर चलाते हैं। वे आपस में भिड़ जाते हैं। मीडिया के कैमरे उनका जोश दोगुना कर देते हैं। ऐसे में वे न लोकसभा की गरिमा देखते हैं, न विधानसभा की। पवित्र सदन हुल्लड़बाजों के लिए चौराहा हो जाता है, जहां एक-दूसरे की पगड़ी उछालो, मुंह नोचो, गाली-गलौच कर और दुनिया को दिखा दो कि वह किसी गलतफहमी में न रहे। हम अब भी नेता हैं।
एक बड़ा नेता अपने पिछलग्गू को समझा रहा है-निष्काम कर्म की बात करोगे तो नेता कैसे बनोगे। नेता बनना है तो सकाम निष्कर्मी हो जा। अगर तू कर्म में व्यस्त हो जाएगा तो फल कोई और ले जाएगा। अगर निष्काम हो जाएगा तो किसी काम का नहीं रहेगा। तब सीएम और पीएम की कुर्सी पर तेरे विरोधी बैठ जाएंगे। इसलिए तू सीएम और पीएम की कुर्सी की कामना कर और इस कामना में किसी भी तरह की शर्म भी महसूस मत कर। नेता का मतलब ही है सकाम निष्कर्मी।
पिछलग्गू होनहार है। उसने उपदेश का मर्म जान लिया है। नेता से बगावत कर उसने मंत्री की कुर्सी हथिया ली है। पिछलग्गू अब नेता से भी बड़ा नेता हो गया है। नेता बेचारा खड़ा-खड़ा टाप रहा है। चिल्ला रहा है-अध्यक्ष महोदय यह अनीति है।

(13 दिसंबर 2009 को हिन्दुस्तान के चंडीगढ़ के संस्करण कलम में प्रकाशित)

Thursday, December 10, 2009

सुलगती नदी - सच ने खोजी अपनी कलम

पंजाब के आतंकवाद पर मार्क टुली से लेकर सरकारी तथा गैर सरकारी संगठनों और पत्रकार बिरादरी की रिपोर्ट में बहुत से कारण गिनाए गए हैं। अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय चर्चित-बदनाम संगठनों और अनगिनत जटिल शब्दों का सहार लेकर आतंकवाद का सच बताने का दावा किया जाता है। पर विश्वास नहीं जमता और सच की तलाश में हरबार नए सिरे से जांच शुरू होती है।
सच तो सहज होता है, उसे कहने के लिए साहस और बेबाक होने की जरूरत पड़ती है। शब्दों से सच नहीं गढ़ा जा सकता। सच अपने लिए शब्द खोज लेता है। अगर उसे कहा जाना है तो वह अपने लिए जुबां खोज लेता है और अगर लिखा जाना है तो कलम खोज लेता है। सच के लिए कोई बौद्धिक विलास नहीं करने पड़ते। सच वही है, जिस बच्चा-बच्चा जानता है। आतंकवाद का यही सच सहजता से कहा है पंजाब में हिन्दी के हस्ताक्षर सुरेश सेठ ने। उनकी किताब -सुलगती नदी- शब्दों का आडंबर नहीं है। इसके पन्नों में उतर कर जो तस्वीर आपको दिखती है, उसके बारे में पूरे दोआबा के किसी बच्चे से जाकर भी पूछ लेंगे तो वह कहेगा-हां आतंकवाद के दौरान ऐसा ही हुआ था। कैसे तस्कर आतंकवादी बन गए? कैसे बस्तियां उजड़ीं? कैसे कलम के ठेकेदार एक दूसरे को विघटनकारी और राष्ट्रनिर्माता कहते हुए रातोंरात धनकुबेर बने।

किताब कुछ इस तरह रू-ब-रू कराती है-

पहले दूसरे देशों से सोना-चांदी और न जाने क्या-क्या अलाबला ले आते थे और तस्कर कहलाते थे, अब हथियारों की खेप लेकर आते हैं, और बाबे बन गए हैं। पुलिस वाला उनका चौकी भरने चला आता है। कोई धाकड़ भी उनकी हवेलियों के पास से खांस कर गुज़र नहीं सकता। उनका गांव भी क्या कभी उजड़ेगा?

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पूरा इलाका तो एक सहमी हुई नींद में न जाने कब का गुम हो गया। दूर गांव की बस्तियां भी अब बुझ गयीं। कोई-कोई रोशनी कहीं-कहीं अब भी टिमटिमाती है। इस गांव के आसपास कुछ और गांव भी हैं, पर कहीं से भी एक कुत्ते का भौंकने का स्वर नहीं होता। बहुत दिन हुए जब इस सरहद से सोने-चांदी के स्थान पर हथियारों की तस्करी होने लगी थी, तो एक हुक्म हुआ था। किसी गांव में एक कुत्ता भी जिन्दा नहीं रहना चाहिए। इन्हें जहर दे दिया जाए।

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दौड़ते कदमों की आहट इस इलाके में कोई जिग्यासा पैदा नहीं करती। लोग यही मनाते रहते हैं कि यह कदम उनके घर के बाहर आकर न रुक जाएं। फिर कोई इस दर्द भरी आवाज से चीख उठे तो अजीब नहीं लगता। हां कोई जोर-जोर से हंसने लगे तो अवश्य भ्रम होता है, हम किसी दूसरे शहर में तो नहीं चले आये हैं।


सुलगती नदी के उपरोक्त तीनों अंश औपन्यासिक शैली में उस इतिहास को दर्ज करने की शुरुआत भर हैं, जिसे पंजाब के लोगों ने पंद्रह साल से भी ज्यादा समय तक भोगा।जैसे-जैसे कथानक आगे बढ़ता है, एक-एक चेहरे से नकाब उतरने लगता है। पुस्तक प्रदत्त नाम धुंधले पड़ जाते हैं और आप उनके असली नामों से उन्हें पहचानने लगते हैं। हाल ही में चंडीगढ़ की साहित्य अकादमी ने यहां के साहित्य प्रेमियों को सुरेश सेठ से रू-ब-रू कराया इस मौके पर उनके इस उपन्यास की भी चर्चा हुई। लेखिका इन्दुबाली ने उनसे कालजयी रचना के लिए सस्नेह आग्रह किया। माधव कोशिक ने मंच संचालन किया। शहर के लेखकों के तरकश में सुरेश सेठ के लिए कई सवाल थे। डॉ. आत्मजीत का सवाल था, जिन्होंने बंदूक उठाई तो क्यों उठाई। डॉ. चंद्र त्रिखा ने भी लेखक से अपनी उम्मीदों को उजागर किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कथाकार जगमोहन चोपड़ा ने सवालों की सार्थकता बताते हुए इस कार्यक्रम का समापन किया।