Tuesday, September 22, 2009

डीएनए और सूक्ष्म शरीर की अवधारणा में समानताएं

वेदान्त का सूक्ष्म शरीर ही है डीएनए। मेरे पिछले लेख पर श्री शशि भूषण तामरे जी का सुझाव आया कि इस विषय पर और अध्ययन के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाना चाहिए। यह सही बात है, डीएन का अध्ययन करने के लिए आपके पास विस्तार से जानकारियां हैं, मगर जब आप सूक्ष्म शरीर की बात करते हैं आप को बहुत ही मिलीजुली जानकारियां मिलती हैं। जैसे कुछ पुराणों में इसे अंगूठे के आकार का बताया गया है। मुझे लगता है कि यह भ्रांति बाद में ही आई होगी, और इससे पैदा हुई होगी कि हमारे स्थूल शरीर के अंदर ही हमारे जैसा एक शरीर होता है। तब किसी लेखक ने इसकी सूक्ष्मता का आकलन अपने अंगूठे से किया हो। मगर वेदकालीन साहित्य में हमें परमाणु और अणु आकारों का जिक्र मिलता है। कहा जाता है कि जो कर्म हम करते हैं उन्हें हमारा सूक्ष्म शरीर साथ ढोता है और अगले जन्मों में अच्छे-बुरे कर्मों के नतीजे भोगता है। असल में यह बात भले ही थोड़ी बढ़ा-चढ़ाकर है मगर एक हद तक सही है। अब आप डीएनए को ही लीजिए। इनमें शुगर और फासफेट के बंध वाले प्रोटीन्स की एक लंबी शृंखला होती है, जिन्हें जीन कहा जाता है।
असल में इन्ही जीन्स में छुपी है पुनर्जन्म की अवधारणा। यही जीन हमारी अनुवांशिकी को ढोते हैं। इसे ही डार्विन ने अनुवांशिकता पर आधारित जीव विकास का सिद्धांत बनाया। हमारे पुराणों ने जिसे कथाशैली बनाकर पुनर्जन्म में निपटा दिया, ठीक उसीकी व्याख्या डार्विन ने जैव विकास के रूप में की। जीन सचमुच संस्कार ढोते हैं, इसमें कोई शक नहीं। साइंस साबित कर चुकी है। अब मनुष्य के डीएनए में ३३ हजार से ज्यादा जीन्स की शृंखला है। इनका क्रमिक विकास हुआ। आज साइंस डीएनए जांच से यह बताने में सक्षम है कि कौन किस कुनबे का है।
इसी तरह वेदांत का विवरण बताता है कि सूक्ष्म शरीर हमारे संस्कारों को ढोता है। हमारे कर्मों और जीन में सीधा संबंध है। विकासवाद को ही मानें तो भी। हमारी पूंछ इसीलिए गायब हुई, क्योंकि हमारे दैनिक कर्म में उसका सरोकार नहीं रहा था और वह बाधा बनी थी। इस तरह कई पीढि़यों तक यह संदेश जीन को मिलने के बाद ही पूंछ गायब हुई। इस तरह कहा जा सकता है कि डीएनए और सूक्ष्म शरीर की अवधारणा में काफी समानता है।

Monday, September 21, 2009

वेदान्त का सूक्ष्म शरीर ही है डीएनए

वेदान्त दर्शन के मुताबिक तीन तरह के शरीर होते हैं- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। यह माना जाता है कि मृत्यु के समय सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर से निकलकर परलोक में अपने पाप-पुण्य का फल भोगता है। यह भी माना जाता है कि आत्मा इसी शरीर से आवृत्त रहती है। स्थूल शरीर पाँच तत्वों से बना होता है जो कि दिखाई देता है और सूक्ष्म शरीर तीन तत्वों से बना होता है जो दिखाई नहीं देता है। जीवात्मा का सूक्ष्म शरीर तीन तत्वों (1).मन (2).बुद्धि (3).अंहकार से बना होता है।


साइंस बताती है कि डीएनए में ही जीव का सूक्ष्मकोड होता है, जो तय करता है कि एक जीव कैसा होगा। शरीर की हर कोशिका के यह केंद्र में रहता है। अतः कहा जा सकता है कि शरीर इसी से मिलकर बना है। इस सूक्ष्म शरीर (डीएनए) का आकार २.२ नैनो मीटर से २.६ नैनोमीटर तक होता है। नैनो मीटर असल में एक मीटर का अरब वां हिस्सा है। सेंस और एंटीसेंस इसके दो मुख्य गुण हैं, जो इसे जीवन का आधार बनाते हैं। ये आरएनए की कॉपी से उत्पन्न होते हैं। शायद इसीको बुद्धि और अहंकार कहा गया होगा। सेंस ही बुद्धि है और एंटीसेंस यानी प्रतिक्रिया को अहंकार कहा जा सकता है। इसमें जीव के मैं भाव का बोध होता है। डीएनए आसानी से नष्ट भी नहीं होता। शायद इसी लिए यह अवधारणा बनी होगी कि यह सूक्ष्म शरीर आगे स्थूल को धारण करता है। यह अवधारणा इससे भी सिद्ध होती है कि मनुष्यों के डीएनए के जेनेटिकक्रम में ९९.९ तक की समानता होती है। व्यक्ति के दाह संस्कार के बाद भी उसकी बचने वाली हड्डियों और राख जिसे फूल कहा जाता है में यह मौजूद रहता है। इसलिए उसे सम्मान देने के लिए ही फूल चुनने की रस्म की जाती है।

Tuesday, September 15, 2009

बिगबैंग का सिद्धान्त ऋग्वेद की देन

साइंस सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर सबसे प्रच्चलित मत बिग-बैंग थ्योरी है। यह सिद्धांत जॉर्ज लेमटायर बीसीवीं सदी के शुरू में लेकर आए। पहले इसे एक बड़ा मिथक माना गया, मगर हबल के गैलेक्सियों के सिद्धांत से इस दिशा में कुछ संकेत मिलने लगे। इस सिद्धान्त के अनुसार इस सृष्टि की उत्पत्ति ऊर्जा के एक स्रोत में महाविस्फोट के बाद हुई है और ब्रह्माण्ड तब से लगातार विस्तार कर रहा है। अब ऋग्वेद के ये श्लोक भी देखें-
असीदिदं तमोभूतमप्रग्यातमलक्षणम्। अप्रतर्क्यमविग्येयं प्रसुप्तमिव सर्वतः॥
यह सारा जगत सृष्टि से पहले अंधकार से आच्छादित था। उस समय इसमें जानने योग्य कुछ नहीं होता। इसी तरह अंत के पश्चात भी वैसा ही सुप्त होता है।

तम आसीत्तमसा गूढ़मग्रें प्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम। तुच्छ्येनाभ्वपिंहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकम्॥

यह सब जगत सृष्टि से पहले अन्धकार से आवृत, रात्रिरूप में जानने के अयोग्य आकाशरूप सब जगत तथा तुच्छ अर्थात अनन्त परमेश्वर के सम्मुख एकदेशी आच्छादित था। पश्चात परमेश्वर ने अपने सामर्थ्य से कारणरूप से कार्यरूप कर दिया।

इस तरह स्पष्ट है कि सृष्टि के निर्माण की साइंस की धाराणा और भारतीय दर्शन की धारणा में कितनी ज्यादा समानता है। अब भाषा और समय के अंतर को छोड़ दें तो वैदिक व्याख्या अधिक वैग्यानिक दिखती है। अगर यह मान लिया जाए कि आत्मा शब्द का मूल अर्थ वही है, जिसे अब ऊर्जा या एनर्जी कहा जाता है तो वैदिक दर्शन एक विग्यान नजर आता है। ऋग्वेद में आत्मा की परिभाषा देखें यही परिभाषा आगे गीता में भी रखी गई है-

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

यह आत्मा किसी काल में न तो जन्मता है और न मरता है। यह हमेशा साश्वत है। सिर्फ शरीर मरता है आत्मा नहीं।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्य 'नैनं छिदंति शस्त्राणी, नैनं दहति पावक। न चैनं क्लेदयां तापो, नैनं शोशयति मारूतः।।

आत्मा वो है जिसे किसी भी शस्त्र से भेदा नहीं जा सकता, जिसे कोई भी आग जला नहीं सकती, कोई भी दु:ख उसे तपा नहीं सकता और न ही कोई वायु उसे बहा सकती है।


अब ऊर्जा की परिभाषा देखते हैं-ऊर्जा को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही उत्पन्न। सिर्फ एक ऊर्जा को दूसरी ऊर्जा में बदला जा सकता है।

जाहिर है आत्मा रूप बदलती है, यह दृष्टांत भी ऊर्जा के रूपांतरण से मिलता है। इस तरह वैदिक मान्यताओं का वैग्यानिक दृष्टिकोण से अध्ययन काफी ग्यानदायक है।

Friday, September 11, 2009

स्त्री और मनुस्मृति

मनुस्मृति काल के समाज के बारे में जो कुछ उपलब्ध है, वह बताता है कि जाति और वर्ण में बंधे समाज में स्त्री की हैसियत पुरुष से दोयम होती चली गई। कुछ श्लोक ऐसे भी हैं जिनमें उसे शूद्र की बराबरी पर रखते हुए, उसी तरह के व्यवहार की बात कही गई है। हालांकि कई श्लोक ऐसे हैं, जिन्हें कई इतिहासविद क्षेपक मानते हैं। इसके अलावा स्त्री के लिए यौन शुचिता का बोझ अलग से बांधा गया, जिसे ढोते-ढोते न जाने कितनी स्त्रियों ने अग्नी-परीक्षा दी। पत्नी का कब-कब त्याग कर पति दूसरी शादी कर सकता है, इससे संबंधित रोचक श्लोक मनुस्मृति में है-

बन्ध्याष्टमेsधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजाः। एकदशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी॥
अर्थात-स्त्री संतान उत्पति में सक्षम न हो तो उसे आठवें वर्ष में, संतान होकर मर जाए तो दसवें वर्ष में तथा कन्या ही कन्या पैदा करे तो ग्यारहवें वर्ष में तथा अप्रिय बोलने वाली को तत्काल छोड़ देना चाहिए।
हालांकि पुरुष को स्त्री भी छोड़ सकती है, मनुस्मृति में इसका भी उल्लेख है। मगर इसके लिए उसे लंबा इंतजार सुझाया गया है। वह केवल पति के दूर जाने पर ही ऐसा कर सकती है। इंतजार की अवधि भी पति के उद्देश्य के मुताबिक घटी बढ़ी है। यदि पति धर्म के लिए परदेश गया है तो आठ वर्ष तक, विद्या के लिए तो छह वर्ष तक और धन के लिए गया हो तो तीन वर्ष तक उसका इंतजार करे।
यौन शुचिता का बोझ उसकाल की स्त्री पर कितना ज्यादा डाला गया, यह हमें राजा के लिए दंड विधान तय करने वाले अध्याय में देख सकते हैं। पर पुरुष से संबंध वाली स्त्री को राजा क्या दंड दे-देखें-
भर्तारं लंड्घयेद्या स्त्री स्वग्यातिगुणदर्पिता। तां श्वाभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते॥
अर्थात- जो स्त्री अपनी जाति गुण के घमंड में पति को छोड़कर व्यभिचार करे उसको स्त्री-पुरुषों की भीड़ के सामने जीवित ही कुत्तों से कटवा कर राजा मरवा डाले।
हालांकि मनुजी ने पुरुषों के लिए भी व्यभिचार की कठोर सजा कही है। उन्हें लोह के लाल तपे पलंग पर सुलाकर भस्म करने की बात कही गई है।
जाहिर है कि इस तरह के दंड अगर दिए जाते रहे होंगे, तभी समाज में झूठ और प्रपंच पनपे होंगे। यह देखा गया है कि जिस समाज में दंड व्यवस्था जितनी ज्यादा कठोर होती है, उसमें झूठ का उतना ही बोलबाला होता है। कठोर दंड से बचने के लिए झूठ बोलने में ही भलाई समझी जाती है। यही वजह है कि तालिबानी समाज कभी बेहतर नहीं हो पाते और हमेशा उनकी निन्दा की जाती रही है। इसके विपरीत उदार समाज भले ही आलोचना का ज्यादा शिकार बनते हों मगर उनमें ही सबसे तीव्र विकास होता है। जब तक भारत का समाज उदार था उसने तरक्की की। इसी तरह अब नई पीढ़ी समाज को उदार बना रही हो तो समाज तरक्की कर रहा है। दूसरी ओर तालिबानी समाज पूरे विश्व की शांति और विकास के लिए खतरा बना हुआ है।

Friday, September 4, 2009

व्यास जी के नाम पर हुए हैं मान्यताओं के घोटाले

आर्थिक घोटालेबाजी भले आपको आज की पीढ़ी के नेताओं की करतूत लगती हो मगर समाज में लाभ उठाने के लिए घोटाले पहले भी होते रहे हैं। प्राचीन इतिहास के जिस सबसे बड़े घोटाले के सूत्र हाथ लगे हैं, वह है मान्यताओं का घोटाला। स्त्री-पुरुष और कर्मकांड के नाम पर कई रूढ़ियां व्यासजी का नाम लेकर मान्य बनाई गई हैं। कर्मकांडियों और पोंगापंथियों ने अपनी दुकानदारी जमाने के लिए बहुत कुछ लिखा और उसे व्यासजी का नाम दे दिया। महार्षि दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश के एकादशसमुल्लास में इसके लिए राजा भोज के ग्रंथ संजीवनी का हवाला देते हैं। वह लिखते हैं-
राजा भोज के राज्य में व्यास जी के नाम से मार्कण्डेय और शिवपुराण किसी ने बना कर खड़ा किया था। उसका समाचार राजा भोज को हने से उन पंडितों को हस्तच्छेदनादि का दंड दिया और उनसे कहा कि जो गई काव्यादि ग्रन्थ बनावे तो अपने नाम से बनावे, ऋषि-मुनियों के नाम से नहीं। यह बात राजा भोज के बनाए संजीवनी नामक इतिहास में लिखी है कि जो ग्वालियर के राज्य भिंड नामक नगर के तिवाड़ी ब्राह्मणों के घर में है। --- उसमें स्पष्ट लिखा है कि व्यासजी ने चार सहस्र चार सौ (४४००) और उनके शिष्यों ने पांच सहस्र छह सौ श्लोक युक्त अर्थात सब दस सहस्र (दस हजार) श्लोकों का प्रमाण भारत बनया था। वह महाराज विक्रमादित्य के समय में बीस सहस्र और मेरे पिताजी के समय में पच्चीस सहस्र और मेरी आधी उम्र तक तीस सहस्र श्लोकयुक्त महाभारत पुस्तक के रूप में मिलता है। जो ऐसे ही बढ़ता चला तो महाभारत की पुस्तक एक ऊंट का बोझा हो जाएगा और ऋषि-मुनियों के नाम से पुराणदि ग्रंथ बनावेंगे तो आर्यवर्तीय लोग भ्रमजाल में पड़के वैदिक धर्म विहीन होकर भ्रष्ट हो जाएंगे।
अतः पुराणों में वर्णित स्वर्ग-नर्क तत्कालीन किवदंतियों और कल्पना के सहारे रचे गए। यह भी संभव है कि इसमें कुछ सुने-सुनाए एतिहासिक तथ्य भी हों जिनका वर्णन अपने अनुसार किया गया। सवाल यह उठता है कि लेखकों ने इन ग्रंथों को अपना नाम क्यों नहीं दिया। दयानन्द कहते हैं कि संभवतः उन्हें डर था कि लोग उनके लिखे को मानेंगे नहीं। इसलिए व्यासजी के नाम पर लिखा जाए। इसका अलावा यह भी संभव है कि जाति-प्रथा बंधन कठोर होने की वजह से भी लेखक अपना नाम देने का साहस न कर पाये हों। पुराणों में वेदों की सूक्तियों का भी हवाला दिया गया है। शूद्र और स्त्री आदि के लिए वेद वर्जित होने की मान्यता उसकाल तक थी, इसलिए लेखकों को दंडित होने का भय भी हो सकता है। राजा भोज द्वारा कुछ लेखकों दंडित करने का जिक्र उनकी संजीवनी में भी आता है। इसलिए कहा जा सकता है कि धर्मग्रंथों में व्यासजी के नाम पर मान्यताओं का एक महाघोटाला है।

Tuesday, September 1, 2009

पार्वती जी को पत्नी धर्म का उपदेश - यानी स्त्रियों की स्थिति का विवरण

शिव पुराण में आता है कि पार्वती जी की विदाई के समय माता मेना की इच्छा पर एक ब्राह्मण पत्नी ने पार्वती जी को पतिव्रत धर्म का उपदेश दिया, जो इस प्रकार है-
पातिव्रत्य- धर्म में तत्पर रहने वाली स्त्री अपने प्रिय पति के भोजन कर लेने पर ही भोजन करे। शिवे। जब पति खड़ा हो, तब साध्वी स्त्री को भी खड़ी रहना चाहिए। शुद्ध बुद्धि वाली स्त्री पति के सोने पर ही सोये। वह छल कपट छोड़कर सदा उसके लिए हितकर कार्य करे। यदि पति किसी कार्य से परदेस में गया हो तो उन दिनों उसे कदापि शृंगार नहीं करना चाहिए। पतिव्रता कभी पति का नाम न ले। पति के कटुवचन कहने पर भी वह बदले में कड़ी बात न गहे. पति के बुलाने पर वह घर के सारे कार्य छोड़कर तुरंत उसके पास चली जाए और हाथ जोड़कर मस्तिष्क झुकाकर पूछे-नाथ. किसलिए इस दासी को बुलाया है? मुझे सेवा के लिए आदेश देकर अपनी कृपा से अनुग्रहित करें। फिर पति जो आदेश दे, उसका वह प्रसन्न हृदय से पालन करे। वह घर के दरवाजे पर देर तक खड़ी न रहे। दूसरे के घर न जाए। कोई गोपनीय बात जानकर हर एक को उसे न बताए। लोगों की भीड़ से भरी हुई सभा या मेले आदि उत्सवों को दूर से ही त्याग दे। जिस नारी को तीर्थयात्रा का फल पाने की इच्छा हो उसे पति का चरणोदक पीना चाहिए। उसके लिए उसी में सारे तीर्थ और क्षेत्र हैं, इसमें संशय नहीं।
पतिव्रता नारी पति के उच्छिष्ट अन्न आदि को परम प्रिय भोजन मानकर ग्रहण करे और पति जो कुछ दे, उसे महाप्रदास मानकर शिरोधार्य करे।
पति से द्वेष रखने वाली स्त्री का कभी आदर न करे। कहीं अकेल खड़ी न हो। कभी नंगी होकर न नहाये। मैथुनकाल के सिवा और किसी समय धृष्टता न करे। जिस-जिस वस्तु में पति की रुचि हो उससे वह प्रेम करे। पतिव्रता नारी के लिए पति ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव से अधिक माना गया है। उसके लिए अपना पति ही शिवरूप है। जो स्त्री पति के कुछ कहने पर क्रोधपूर्वक कठोर उत्तर देती है, वह गांव में कुतिया और निर्जन वन में सियारिन होती है। जो दुर्बुद्धि नारी अपने पति को त्यागकर एकान्त में विचरती है वह वृक्ष के खोखल में शयन करने वाली क्रूर उलूकी होती है। जो पर पुरुष को कटाक्षपूर्ण दृष्टि से देखती है वह ऐंचातानी देखनवाली होती हैं। पति को छोड़कर अकेले मिठाई खाती है वह गांव में सूअरी होती है। जो पति को तू कहकर बोलती है, वह गूंगी होती है। जो सौत से ईर्ष्या रखती है, वह दुर्भाग्यवती होती है। जो पति की आंख बचाकर दूसरे पुरुष पर दृष्टि डाले वह कानी, टेढ़े मुंहवाली तथा कुरूपा होती है। जो दुराचारिणी स्त्रियां अपना शील भंग कर देती हैं, वे अपने माता-पिता और पति तीनों कुलों को नीचे गिराती हैं और परलोक में दुख भोगती हैं।
यह वह पाठ है जो धर्म के नाम पर स्त्री के मायके से ससुराल विदा होने पर पढ़ाया जाता था। यह विचार ही समाज में मान्यता बनते चले गए। इसलिए कहा गया है कि सोच समझकर बोलो और लिखो तो उसे कई बार परख लो। कहीं आपका लिखा किसी दूसरे के लिए बेड़ियां न बन जाए।