Friday, July 31, 2009

समुद्र मंथन के दौरान ही मिला ग्रहण गणना का ज्ञान

-सुधीर राघव
स्कंद पुराण की समुद्र मंथन की कथा में मैंने बताया कि यह किस तरह एक अंतरिक्ष यान की क्रेश लेंडिंग की कथा लगती है। यान के जब सभी नौ चेम्बर खोल कर चीजें निकाल ली गईं (नौ चेम्बर यहां नवरत्न से हैं) तो अंत धन्वतंरी जिस अमृत कलश को लेकर निकले, उसे पाने को लेकर देवताओं और असुरों का झगड़ा शुरू हुआ। अमृत असल में दूसरे ग्रह से देवताओं को अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए भेजा गया, द्रव्य हो। यह भी संभव है कि उस दौरान क्रेश लेंडिंग के कारणों को लेकर चर्चा शुरू हुई हो, जिसे लेकर भी झगड़ा हुआ हो। स्कंद पुराण में आचार्य गर्ग के हवाले से यह कहा जाता है कि इस समय सूर्य, बुध, चंद्र, मंगल, गुरु, शुक्र और शनि केंद्र में युक्त हैं और इसे गोमन्त नामक मुहुर्त का नाम दिया गया। इससे तय है कि यह घटना अमावस्या के दिन हुई हो। ऐसे भी संकेत लगते हैं कि उस दिन सूर्य ग्रहण रहा हो। इन सभी ग्रहों का अध्ययन करने वाले वैग्यानिक भी इन्हीं नामों से शायद पुकारे जाते थे। क्रेश लैंडिग आक्षेप इंद्र पर लगाया गया। यह संकेत हमे मंदराचल के इस कथन से मिलता है कि इंद्र ने वज्र से मेरे पंख काट दिए। जाहिर है, इसका स्पष्टिकरण दिया गया होगा। अचानक ग्रहण की वजह से राहु का आकलन करने वाला इसका अनुमान नहीं लगा पाया होगा। इसलिए उस राक्षस राहु को सूर्य और चंद्र ने अर्थात इन दोनों ग्रहों का अध्य्यन करने वाले वैग्यानिकों ने देवताओं की कतार से निकालने के लिए विष्णु को कहा होगा। जाहिर है कि यह ग्रहण सूर्य, चंद्र और केतु (यानी चंद्र की छाया) के एक राशि में होने से हुआ। जबकि केतु का तब तक ग्यान नहीं था। राहू इन सभी ग्रहों के ठीक सामने वाली राशि में रहा होगा। ऐसे में वे सूर्य ग्रहण का उचित आकलन नहीं कर पाये होंगे। तब विष्णु ने जो स्त्री रूप धारण कर झगड़े को सुलझाने का प्रयास कर रहे थे, राहु के विभाग के दो टुकड़े कर उसमें केतु की भी नियुक्ति कर दी हो। इसीके बाद पृथ्वी पर सूर्य और चंद्र ग्रहण की गणनाओं का सही ग्यान भारत के पास आया। ऋग्वेद में भी इसका उल्लेख आता है कि अचि मुनि के परिवार के पास यह ग्यान था। एक अनुमान के अनुसार ईसा से चार हजार वर्ष पहले भारतीयों को यह ग्यान हो गया था कि सूर्य और चंद्र ग्रहण कब पड़ते हैं। संभव है कि स्कंद पुराण को इस घटना के काफी समय बाद लिपिबद्ध किया गया या उसमें इस घटना को भी पूर्वजों के सुने के अनुरूप रखा गया, इसलिए वर्णन कुछ अतिश्योक्तिपूर्ण हो।

Thursday, July 30, 2009

लक्ष्मी जी की उत्पति कथा

समुद्र मंथन को लेकर लिखे गए पिछले लेख में जहां उत्साह बढ़ाने वाली टिप्पणियां मिलीं, वही कुछ जिग्यासाएं भी प्रकट की गईं। कुछ शिकायतें भी रहीं। सबसे बड़ी शिकायत तो यह रही कि लेख की लंबाई काफी ज्यादा हो गई थी। हालांकि उसमें अभी अधूरी कथा का ही विवरण था, मगर फिर भी निस्संदेह लंबाई ज्यादा रही, इसकी एक वजह यह थी कि मैं एक व्यख्या को एक ही लेख में समेटना चाहता था। भविष्य में इस संबंध में ध्यान रखूंगा। इसे ही ध्यान में रखते हुए पहले संस्कृत में लिखने और फिर अनुवाद देने से बचते हुए सीधे अनुवाद को लिया गया। इसके लिए अब अनावश्यक संदर्भ में भी कटौति की जाएगी। निर्मला कपिला जी का सवाल लक्ष्मी जी की उत्पत्ति को लेकर रहा। उनका कहना था कि लक्ष्मी जी की उत्पत्ति समुद्र से हुई है, यह उन्होंने पहली बार पढ़ा है। इसके अलावा और भी सवाल उलझे हैं।

लक्ष्मी जी की उत्तपति को लेकर पुराणों में ही अनेक मत हैं, मगर सबसे प्रचल्लित में उन्हें समुद्रमंथन से उत्पन्न नवरत्नों में से एक माना गाय है। यह वर्णन स्कन्ध पुराण के अलावा लिंग पुराण में भी मिलता है। लिंग पुराण के अनुसार भी लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र मंथन से ही बताई गई है। इसके अनुसार अलक्ष्मी की उत्पत्ति पहले हुई बाद में समुद्र मंथन से लक्ष्मी निकलीं। लिंग पुराण में कहीं भी लक्ष्मी नाम का उल्लेख नहीं मिलता, बल्कि हर जगह उन्हें नारायणी नाम से जाना गया है।

ब्रह्मवैवर्तपुराण में ही कृष्ण के मन से लक्ष्मी की उत्पत्ति बताई गई है जो कि पीतांबरा हैं एवं सुंदर आभूषणों से सुसज्जित हैं और हरि के पृष्ठ भाग में स्थित है तथा धन वैभव की देवी हैं। विष्णु पुराण में लक्ष्मी दक्ष पुत्री बताई गई है, जिनका विवाह धर्म से हुआ था। इनकी उत्पत्ति के विषय में दूसरी कथा इनको भृगु और ख्याति से उत्पन्न मानती है।

-सुधीर राघव

Wednesday, July 29, 2009

समुद्र मंथन- दूसरे ग्रह से आए यान की क्रैश लैंडिंग की कथा

समुद्र मंथन की कथा असल में अंतरक्षीय घटनाओं पर विमर्श की पहली दस्तावेजी घटना है। इसका वर्णन कुछ अतिश्योक्तिपूर्ण जरूर है। यह कथा स्कंद पुराण के माहेश्वर खंड में मिलती है। इसे पढ़ने पर जो संकेत मिलते हैं, उससे लगता है की किसी अन्य ग्रह से इंद्र आदि देवताओं के लिए रसद लेकर आया अंतरिक्षयान (मन्दराचल) पृथ्वी के वायुमंडल में खराब हो जाने के बाद अपने तय स्थान क्षीर सागर में नहीं उतर सका। इस यान का समुद्र में लाकर ही खोला जा सकता था। इसलिए इसे मिशन को नाम दिया गया समुद्र मंथन। उस समय दैत्य राज बलि ने इंद्र को पराजित कर समस्त संसाधनों पर कब्जा कर रखा था, ऐसे में बिना उनकी मदद से इस यान को वापस समुद्र में लाना संभव नहीं था। राक्षसों को मनाने के लिए इस मिशन के मूल तथ्यों को गुप्त रखा गया। उन्हें सिर्फ अमृत का लालच दिया गया। इसके लिए एक विशाल सर्पाकार लंगर की भी जरूरत रही होगी, जो वासुकी रहा। क्योंकि इसे बांधने की व्यवस्था नहीं बन पायी होगी, इसलिए तय किया गया कि देवता और राक्षस इसके दोनों सिरों को पकड़े रहें। क्योंकि क्रेश लैंडिंग थी, इसलिए बंचे इंधन की कुछ जहरीली गैसें भी रही होंगी। शायद इसीलिए या इसकी ऊंचाई की वजह से इसे समुद्र में लाकर ही खोलने का निर्णय किया गया हो। इस घटना को धरती पर मानव जीवन बसाने के किसी अन्य ग्रह के प्रयास को देखा जा सकता है। स्कंद पुराण ही नहीं वेदों में भी ऐसे संकेत मिलते हैं, जिनसे यह लगता है कि किसी नष्ट होते ग्रह से जीवन धरती पर आया होगा। इस भूमिका के परिपेक्ष्य में अब आप खुद स्कंद पुराण की समुद्र मंथन कथा पढ़ें जो इस तरह है-
दैत्यराज बलि की सभा में नीति निपुण इंद्र ने कहा-वीरवर, हमारे हाथी, घोड़े आदि नाना प्रकार के रत्न जो तुम्हें प्राप्त होने चाहिए, समुद्र में गिर गए हैं। हम लोगों को उनके उद्धार का यत्न करना चाहिए। इसके लिए समुद्र मंथन उचित है। उसी समय आकाशवाणी (यह शायद मददगार ग्रह के लोगों का तब हमसे संपर्क का तरीका था) हुई-'देवताओ और दैत्यो! तुम क्षीर समुद्र का मन्थन करो। इस कार्य में तुम्हारे बल की वृद्धि होगी, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। मन्दराचल को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाओं, फिर देवता और दैत्य मिलकर मन्थन आरम्भ करो।'
मन्दराचल और सुमेरु पर्वत के विवरण से ऐसा लगता है कि मन्दारचल एक अंतरिक्षयान था, जो लेंडिंग के वक्त क्रेश हो गया था। इसके लिए हम पहले स्कंद पुराण में किया मदरांचल का वर्णन ही पढ़ते हैं-आकाशवाणी सुनकर सहस्त्रों दैत्य और देवता समुद्र-मन्थन के लिये उद्यत हो सुवर्ण के सदृश कान्तिमान् मन्दराचल के समीप गये। वह पर्वत सीधा, गोलाकार, बहुत मोटा और अत्यन्त प्रकाशमान था। अनेक प्रकार के रत्न उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। चन्दन, पारिजात, नागकेशर, जायफल और चम्पा आदि भाँति-भाँति के वृक्षों से वह हरा-भरा दिखायी देता था। (संभवतः पृथ्वी पर रोपने के लिए यह किसी अन्य ग्रह से लाए गए हों) उस महान् पर्वत (शायद विशालकाय होने के चलते पर्वत कहा गया हो) को देखकर सम्पूर्ण देवताओं ने हाथ जोड़कर कहा- 'दूसरों का उपकार करनेवाले महाशैल मन्दराचल ! हम सब देवता तुमसे कुछ निवेदन करने के लिये यहाँ आये हैं, उसे तुम सुनो।' उनके यों कहने पर मन्दराचल ने देहधारी पुरूष के रूप में (शायद उसकी बाहरी संपर्क स्क्रीन पर यान के कप्तान का चेहरा प्रकट हुआ हो) प्रकट होकर कहा- 'देवगण! आप सब लोग मेरे पास किस कार्य से आये हैं, उसे बताइये।' तब इन्द्र ने मधुर वाणी में कहा- 'मन्दराचल! तुम हमारे साथ रहकर एक कार्य में सहायक बनो; हम समुद्र को मथकर उससे अमृत निकालना चाहते हैं, इस कार्य के लिये तुम मथानी बन जाओ।' मन्दराचल ने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और देवकार्य की सिद्धि के लिये देवताओं, दैत्यों तथा विशेषत: इन्द्र से कहा- 'पुण्यात्मा देवराज! आपने अपने वज्र से मेरे दोनों पंख काट डाले हैं, फिर आपलोगों के कार्य की सिद्धि के लिये वहाँ तक मैं चल कैसे सकता हूँ?'

पंख काटने वाला वाक्य यह बताता है कि सुमेरु पर्वत उड़ सकता था। यानी वह एक यान था। साथ ही इससे यह भी पता लगता है कि वज्रपात के कारण उसकी उड़ने की क्षमता नष्ट हो गई। वज्रपात यानी आकाशीय बिजली की चपेट में वह आया होगा, बादल और तड़ित का अध्ययन का काम इन्द्र का था, इसलिए इसके लिए उन्हें ही इसका कारण बताया गया। अब आगे का वर्णन भी देखें- तब सम्पूर्ण देवताओं और दैत्यों ने उस अनुपम पर्वत को क्षीर समुद्र तक ले जाने की इच्छा से उखाड़ लिया; परंतु वे उसे धारण करने में समर्थ न हो सके। वह महान् पर्वत उसी समय देवताओं और दैत्यों के ऊपर गिर पड़ा। कोई कुचले गये, कोई मर गये, कोई मूर्च्छित हो गये, कोई एक-दूसरे को कोसने और चिल्लाने लगे तथा कुछ लोगों ने बड़े क्लेश का अनुभव किया। इस प्रकार उनका उद्यम और उत्साह भंग हो गया। वे देवता और दानव होश आने पर भगवान् विष्णु की स्तुति करने लगे- 'शरणागतवत्सल महाविष्णो! हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत् को व्याप्त है।'
विष्णु, ब्रह्मा और शिव इस सृष्टि से जीवन को धरती पर बसाने का प्रयास कर रहे दलों के प्रमुख होंगे। ब्रह्मा उस दल के प्रमुख रहे होंगे, जिसका काम अंतरिक्ष यान तैयार करना और जरूरत की चीजें भेजना होगा, जबकि विष्णु उन्हें धरती पर बसाने की जिम्मेदारी संभाले होंगे। इसी तरह शिव के हाथ में कानून व्यवस्था थी। इसका उल्लंघन करने वाले को दंडित करने का काम। तथा जरूरतमंदों की मदद का काम। जब भी धरती पर जरूरत महसूस होती थी, वह प्रकट होते और जरूरत के समय अपने यान यानी गरुण को इसी क्षीर सागर में लेंड कराते होंगे। आगे वर्णन देखें
उस समय देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये गरूड़ की पीठ पर बैठे हुए भगवान् विष्णु सहसा वहाँ प्रकट हो गये। उन्होंने देवताओं और दैत्यों की ओर दृष्टिपात करके खेल-खेल में ही उस महान् पर्वत को उठाकर गरूड़ की पीठ पर रख लिया। (अपने यान से अटैच किया) फिर वे देवताओं और दैत्यों को क्षीर सागर के उत्तर-तटपर ले गये और पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल को समुद्र में डालकर तुरंत वहाँ से चल दिये।

संभवतः मन्दरांचल यानी यान काफी ऊंचा होगा और दूसरे ग्रहों से आई सामग्री और जंतु इसमें फंसे होंगे। इसे खाली कराने के लिए यह सुझाव दिया गया होगा कि इसे समुद्र में डाला जाए, जहां इसे वास्तव में लैंड करना होगा। वे समुद्र में ही क्यों लैंड करते हैं, इसकी कई वजह हो सकती हैं। एक तो यह कि लैंडिंग के समय धरती से टक्कर कर क्रेश होने का खतरा ज्यादा रहता होगा। दूसरे यान ऊपर की और खुलते होंगे। ऐसे में वहां से सामग्री बिना किसी लॉंचिंग पेड के मुश्किल होगा। तदनन्तर सब देवता दैत्यों को साथ लेकर वासुकि नाग के समीप गये और उनसे भी अपनी प्रार्थना स्वीकार करायी। इस प्रकार मन्दराचल को मथानी और वासुकि-नाग को रस्सी बनाकर देवताओं और दैत्यों ने क्षीर-समुद्र का मन्थन आरम्भ किया। इतने में ही वह पर्वत समुद्र में डूबकर रसातल को जा पहुँचा। ( पानी में जब भी कोई चीज फैंकी जाती है तो एक बार वह अपने वजन और वेग के अनुपात में नीचे जाती है) तब लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु ने कच्छपरूप धारण करके तत्काल ही मन्दराचल को ऊपर उठा दिया। उस समय यह एक अद्भुत घटना हुई। फिर जब देवता और दैत्यों ने मथानी को घुमाना आरम्भ किया, तब वह पर्वत बिना गुरू के ज्ञान की भाँति कोई सुदृढ़ आधार न होने के कारण इधर-उधर डोलने लगा। यह देख परमात्मा भगवान् विष्णु स्वयं ही मन्दराचल के आधार बन गये और उन्होंने अपनी चारों भुजाओं से मथानी बने हुए उस पर्वत को भली-भाँति पकड़कर उसे सुखपूर्वक घुमाने योग्य बना दिया। (हो सकता है यान को कोई बड़ा एयरबेग प्लेटफार्म दिया हो) तब अत्यन्त बलवान् देवता और दैत्य एकीभूत हो अधिक जोर लगाकर क्षीर-समुद्र का मन्थन करने लगे।
कच्छपरूपधारी भगवान् की पीठ जन्म से ही कठोर थी और उस पर घूमने वाला पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल भी वज्रसार की भाँति दृढ़ था। उन दोनों की रगड़ से समुद्र में बड़वानल प्रकट हो गया। साथ ही हालाहल विष उत्पन्न हुआ। (क्योंकि क्रेश लैंडिग थी और बचा हुआ ईंधन भी इसका कारण हो सकता है) उस विष को सबसे पहले नारद जी ने देखा। तब अमित तेजस्वी देवर्षि ने देवताओं को पुकार कर कहा- 'अदिति कुमारो! अब तुम समुद्र का मन्थन न करो। इस समय सम्पूर्ण उपद्रवों का नाश करने वाले भगवान् शिव की प्रार्थना करो। वे परात्पर हैं, परमानन्दस्वरूप हैं तथा योगी पुरूष भी उन्हीं का ध्यान करते हैं।' देवता अपने स्वार्थसाधन में संलग्न हो समुद्र मथ रहे थे। वे अपनी ही अभिलाषा में तन्मय होने के कारण नारदजी की बात नहीं सुन सके। केवल उद्यम का भरोसा करके वे क्षीर-सागर के मन्थन में संलग्न थे। अधिक मन्थन से जो हालाहल विष प्रकट हुआ, वह तीनों लोकों को भस्म कर देनेवाला था। वह प्रौढ़ विष देवताओं का प्राण लेने के लिये उनके समीप आ पहुँ चा और ऊपर –नीचे तथा सम्पूर्ण दिशाओं में फैल गया। समस्त प्राणियों को अपना ग्रास बनाने के लिये प्रकट हुए उस कालकूट विषको देखकर वे सब देवता और दैत्य हाथ में पकड़े हुए नागराज वासुकि को मन्दराचल पर्वतसहित वहीं छोड़ भाग खड़े हुए। उस समय उस लोकसंहारकारी कालकूट विषको भगवान् शिव ने स्वयं अपना ग्रास बना लिया। उन्होंने उस विषको निर्मल (निर्दोष) कर दिया। इस प्रकार भगवान् शंकर की बड़ी भारी कृपा होने से देवता, असुर, मनुष्य तथा सम्पूर्ण त्रिलोकी की उस समय कालकूट विष से रक्षा हुई।

तदनन्तर भगवान् विष्णु के समीप मन्दराचल को मथानी और वासुकि नागको रस्सी बनाकर देवताओं ने पुन: समुद्र मन्थन आरम्भ किया। तब समुद्र से सदेवकार्य की सिद्धि के लिये अमृतमयी कलाओं से परिपूर्ण चन्द्रदेव प्रकट हुए। (यह भी मददगार ग्रह से आए वैग्यानिक रहे होंगे, जिन्हें धरती से गई सूचना के अनुरूप चंद्र का अध्ययन करना होगा, जैसे बादलों और वातावरण का अध्ययन इंद्र कर रहे थे, वैग्यानिकों का यह दल ही देवता कहलाता होगा, वैग्यानिकों पर भरोसा न करने वाले दैत्य या राक्षस) सम्पूर्ण देवता, असुर और दानवों ने भगवान् चन्द्रमा को प्रणाम किया और गर्गाचार्यजी से अपने-अपने चन्द्रबल की यथार्थरूप से जिज्ञासा की। उस समय गर्गाचार्यजी ने देवताओं से कहा- 'इस समय तुम सब लोगों का बल ठीक है। तुम्हारे सभी उत्तम ग्रह केंन्द्र स्थान में (यानी कुंडली में लग्न या चतुर्थ, सप्तम और दशम स्थान में) हैं। (यहां प्रारंभिक ज्योतिष को लेकर अच्छा उदाहरण है, जिसका जिक्र मैं अगले लेख में करूंगा, एक बात और इस कुंडली में राहु-केतु का विवरण नहीं है) चन्द्रमा से गुरू का योग हुआ है। बुध, सूर्य, शुक्र, शनि औ मंगल भी चन्द्रमा से संयुक्त हुए हैं। इसलिये तुम्हारे कार्य की सिद्धि के निमित्त इस समय चन्द्रबल बहुत उत्तम है। यह गोमन्त नामक मुहूर्त है, जो विजय प्रदान करने वाला है।' महात्मा गर्गजी के इस प्रकार आश्र्वासन देने पर महाबली देवता गर्जना करते हुए बड़े वेग से समुद्र-मन्थन करने लगे।मथे जाते हुए समुद्र के चारों ओर बड़े जोर की आवाज उठ रही थी। इस बार के मन्थन से देवकार्यों की सिद्धि के लिये साक्षात् सुरभि कामधेनु प्रकट हुईं। (यानी यान के एक और चैम्बर को सफलतापूर्वक खोल लिया गया, या यान के सिस्टम से वह स्वतः सफलतापूर्वक खुला) उन्हें काले, श्वेत, पीले, हरे तथा लाला रंग की सैकड़ों गौएँ घेरे हुए थीं। उस समय ऋषियों ने बड़े हर्ष में भरकर देवताओं और दैत्यों से कामधेनु के लिये याचन की और कहा- 'आप सब लोग मिलकर भिन्न-भिन्न गोत्रवाले ब्राह्मणों को कामधेनु सहित इन सम्पूर्ण गौओं का दान अवश्य करें।' ऋषियों के याचना करने पर देवताओं और दैत्यों ने भगवान् शंकर की प्रसन्नता के लिये वे सब गौएँ दान कर दीं तथा यज्ञ कर्मों में भलीभाँति मनको लगाने वाले उन परम मंगलमय महात्मा ऋषियों ने उन गौओं का दान स्वीकार किया। तत्पश्चात् सब लोग बड़े जोश में आकर क्षीरसागर को मथने लगे। यानी अन्य चैम्बर भी खोले जाने लगे। तब समुद्र से कल्पवृक्ष, पारिजात, स्त्रियां(इस शब्द को बदला गया है) और सन्तान- ये चार दिव्य वृक्ष प्रकट हुए।
उन सबको एकत्र रखकर देवताओं ने पुन: बड़े वेग से समुद्र मन्थन आरम्भ किया। इस बार के मन्थन से रत्नों में सबसे उत्तम रत्न कौस्तुभ प्रकट हुआ, जो सूर्यमण्डल के समान परम कान्तिमान् था। वह अपने प्रकाश से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रहा था। देवताओं ने चिन्तामणि को आगे रखकर कौस्तुभका दर्शन किया और उसे भगवान् विष्णु की सेवा में भेंट कर दिया। तदनन्तर, चिन्तामणि को मध्य में रखकर देवताओं और दैत्यों ने पुन: समुद्र को मथना आरम्भ किया। वे सभी बल में बढ़े-चढ़े थे और बार-बार गर्जना कर रहे थे। अब की बार उस मथे जाते हुए समुद्र से उच्चै:श्रवा नामक अश्र्व प्रकट हुआ। वह समस्त अश्र्वजाति में एक अद्भुत रत्न था। उसके बाद गज जाति में रत्न भूत ऐरावत प्रकट हुआ। उसके साथ श्वेतवर्ण के चौसठ हाथी और थे। ऐरावत के चार दाँत बाहर निकले हुए थे और मस्तक से मद की धारा बह रही थी। इन सबको भी मध्य में स्थापित करके वे सब पुन: समुद्र मथने लगे। उस समय उस समुद्र से मदिरा, भाँग, काकड़ासिंगी, लहसुन, गाजर, अत्यधिक उन्मादकारक धतूर तथा पुष्कर आदि बहुत-सी वस्तुएँ प्रकट हुईं। इन सबको भी समुद्र के किनारे एक स्थान पर रख दिया गया। तत्पश्चात् वे श्रेष्ठ देवता और दानव पुन: पहले की ही भाँति समुद्र-मन्थन करने लगे। अब की बार समुद्र से सम्पूर्ण भुवनों की एकमात्र अधीश्वरी दिव्यरूपा देवी महालक्ष्मी प्रकट हुईं, जिन्हें ब्रह्मवेत्ता पुरूष आन्वीक्षिकी (वेदान्त-विद्या) कहते हैं। इन्हीं को दूसरे लोग 'मूल-विद्या' कहकर पुकारते हैं।कुछ सामर्थ्यशाली महात्मा इन्हीं को वाणी और ब्रह्मविद्या भी कहते हैं। कोई-कोई इन्हीं को ऋद्धि, सिद्धि, आज्ञा और आशा नाम देते हैं। कोई योगी पुरूष इन्हीं को 'वैष्णवी' कहते हैं। सदा उद्यम में लगे रहने वाले माया के अनुयायी इन्हीं को 'माया' के रूप में जानते हैं। जो अनेक प्रकार के सिद्धान्तों को जानने वाले तथा ज्ञानशक्ति से सम्पन्न हैं, वे इन्हीं को भगवान् की 'योगमाया' कहते हैं। देवताओं ने रेखा, देवी महालक्ष्मी का रूप परम सुन्दर है। उनके मनोहर मुख पर स्वाभाविक प्रसन्नता विराजमान है। हार और नूपुरों से उनके श्रीअंगो की बड़ी शोभा हो रही है। मस्तकपर छत्र तना हुआ है, दोनों ओर से चँवर डुल रहे हैं; जैसे माता अपने पुत्रों की ओर स्नेह और दुलारभरी दृष्टि से देखती है, उसी प्रकार सती महालक्ष्मी ने देवता, दानव, सिद्ध, चारण और नाग आदि सम्पूर्ण प्राणियों की ओर दृष्टिपात किया। माता महालक्ष्मी की कृपा-दृष्टि पाकर सम्पूर्ण देवता उसी समय श्रीसम्पन्न हो गये। वे तत्काल राज्याधिकारी के शुभ लक्षणों से सम्पन्न दिखायी देने लगे।

तदनन्तर देवी लक्ष्मी ने भगवान् मुकुन्द की ओर देखा। उनके श्रीअंग तमाल के समान श्यामवर्ण थे। कपोल और नासिका बड़ी सुन्दर थी। वे परम मनोहर दिव्य शरीर से प्रकाशित हो रहे थे। उनके वक्ष:स्थल में श्रीवत्स का चिह्न सुशोभित था। भगवान् एक हाथ में कौमोद की गदा शोभा पा रही थी। भगवान् नारायण की उस दिव्य शोभा को देख ते ही लक्ष्मी जी आश्चर्यचकित हो उठीं और हाथ में वनमाला ले सहसा हाथी से उतर पड़ीं। वह माला श्रीजीने अपने ही हाथों बनायी थीं, उसके ऊपर भ्रमर मडरा रहे थे। देवी ने वह सुन्दर वनमाला परमपुरूष भगवान् विष्णु के कण्ठ में पहना दी और स्वयं उनके वाम भाग में जाकर खड़ी हो गयीं। उस शोभाशाली दम्पतिका वहाँ दर्शन करके सम्पूर्ण देवता, दैत्य, सिद्ध, अप्सराएँ, किन्नर तथा चारणगण परम आनन्द को प्राप्त हुए। अन्त में धन्वन्तरि वैद्य अमृत का घट लेकर प्रकट हुये।" धन्वन्तरि के हाथ से अमृत को दैत्यों ने छीन लिया और उसके लिये आपस में ही लड़ने लगे। अतः धन्वंतरी जो मेडिकल साइंस के जनक थे वे भी मददगार गृह से पृथ्वी पर आए थे। इससे आगे की कथा का पूरा महत्व ज्योतिष और एस्ट्रोनॉमी से जुड़ा है और काफी रोचक है। इसक वर्णन अगले लेख में करूंगा।
-सुधीर राघव

Saturday, July 25, 2009

सांप की तरह अपने ही अंडे खा रही हैं खाप पंचायतें

सभी जीव अपनी संतती की रक्षा करते हैं और वृद्धि करते हैं। अपनी ही संतानों की हत्या के षड्यंत्र रचने के किस्से बहुत कम मिलते हैं। सौतेली संतानों के लिए ऐसा करने के बहुत उदाहरण होंगे। हां संतानों द्वारा बड़ों की हत्या कर सत्ता कब्जा लेने के भी बहुत उदाहरण हैं। जीव हमेशा अपनी वंश वृद्धि करते हैं और शत्रुओं का हनन करते हैं। हरियाणा की खाप पंचायतें जिनका मूल आधार ही गोत्र और वंश हैं, वे सांप की तरह अपने ही अंडे खा रहे हैं। ऐसे में कहां वे गोत्रों के विकास और रक्षा की बात कर रहे हैं। वह कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाकर ऐसा कर रही हैं।
इस संबंध में ग्रामीणों और संबंधित समुदायों को जागरूक करने के लिए क्या अभियान नहीं चलाया जाना चाहिए। यह सवाल मैंने हरियाणा के दो प्रमुख लोगों से पूछा, पहले थे अखिल भारतीय जाट महासभा के अध्यक्ष पवनजीत सिंह। वह झज्जर और सिंहवाल की घटना पर पहले तो सफाई देते से नजर आए। उनका कहना था कि पंचायतें ऐसा नहीं करती हैं, बात जब परंपराओं के खिलाफ जाती है तो लोग आवेश में आकर कदम उठाते हैं। वेदपाल की हत्या भी आवेश में की गई। जब उनसे यह पूछा गया कि जब पंचायतों की नाराजगी के बाद अपने ही गोत्र के बच्चे मारे जा रहे हैं तो क्या इस संबंध में पूरे प्रदेश में किसी अभियान की जरूरत महसूस नहीं हो रही है। ऐसे कौनसे कारक हैं जो ऐसे परिस्थितयां खड़ी कर रहे हैं और उनके समाधान के रास्ते निकाले जाने चाहिए। उनका कहना था कि हां अभियान की जरूरत हैं। हम लोग बैठकर विचार करेंगे।
यही सवाल आर्यसमाज के स्वामि अग्निवेश जी से किया गया तो उनका कहना था कि समाज दो जन्मना जातिवाद के खिलाफ दो सदी से मुहिम चलाए हुए है। अग्निवेश जी सुधारक और विचारक की छवि रखते हैं तथा मंदिरों के बहाने हो रहे अवैध कब्जों के खिलाफ मुहिम पर जोर देकर एक और अच्छी पहल की है। ऐसे में खाप-पंचायतों द्वारा कानून व्यवस्था के लिए खड़ी की जा रही समस्या के प्रति मुहिम खड़ी कर पाना खुद खाप से जुड़े लोगों द्वारा ही संभव है। अगर बाहरी लोग इस दिशा में कुछ करेंगे तो जाहिर है विवाद बढ़ेंगे, लेकिन समुदाय के पढ़े-लिखे लोगों को खापों की मनमानी के खिलाफ आगे आना चाहिए। अपने ही बच्चों को मार कर आप कोई भला संदेश नहीं दे रहे हैं, युवा खून विद्रोही होता है, पंचायतों पर हुक्का गुड़गुड़ाते बुढ़ाते लोग अगर समझते हैं कि उनके कठोर फैसले प्रेम विवाहों को रोक सकते हैं तो वे गलती पर हैं, ऐसे मामले और बढ़ेगे। समझदारी इसी में है कि बच्चों को सही संस्कार दें। डंडे के जोर पर काम करोगे तो तालिबान कहलाओगे या फिर जंगली। क्योंकि जंगल में ही लाठी अकल से बड़ी होती है।

-सुधीर राघव

Friday, July 24, 2009

यहां हीर-रांझा के लिए कोई वारिस शाह नहीं रोता

सुधीर राघव चंडीगढ़
माना जाता है कि समाज अपने आघात से सीखता है, मगर हरियाणा में आकर ऐसी मान्यताएं अक्सर खापों के कठोर फैसलों के आगे टूटती दिखती हैं। गोत्र के दायरे से बाहर जाकर विवाह और प्रेम विवाह करने वालों के खिलाफ मौत तक के फरमान बदस्तूर जारी होते हैं। इसके बावजूद ऐसे विवाह हो रहे हैं और फरमान भी उसी गति से जारी हो रहे हैं। शादी ही नहीं, कई बार बच्चा होने के बाद भी दंपति को भाई-बहन बनने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। इस तरह के फरमान सुनने में पूरी तरह तुगलकी और तालिबानी लगते हैं। इसके बावजूद हरियाणा का कोई कद्दावर नेता या पुलिस अधिकारी इस खापतंत्र के खिलाफ जुबान खोलने को राजी नहीं।
इस संबंध में खापों के अपने तर्क हैं। वह यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि इसकी वजह पंचायतों के अपने अधिकारों से आगे जाकर फैसला करना है। उनका मानना है कि नियमों में ही कुछ खोट है।
अखिल भारतीय जाट महासभा के अधक्ष पवनजीत सिंह का कहना है कि हिन्दू विवाह अधिनियम हमारे समाज के अनुरूप नहीं है। कानूनी तौर पर ऐसी शादियों को मंजूरी दे दी जाती है, जिनमें लड़का-लड़की को हमारी संस्कृति के अनुसार भाई-बहन माना जाता है। ऐसे में टकराव तो होता रहेगा। लोग भले ही इन्हें तुगलकी और तालिबानी फरमान कहें, मगर हमारी जड़ों और जरूरतों को समझते हुए प्रावधान किया जाना चाहिए और हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन होना चाहिए। जब तक यह नहीं होगा, ऐसे टकराव होते रहेंगे। परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं, वे किसी एक के लिए नहीं टूट सकतीं।
आर्य समाज के स्वामि अग्निवेश सिंहवाला की घटना को सरकार की नाकामी के रूप में देखते हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई नागरिक हाईकोर्ट से आदेश लेकर भी सुरक्षित नहीं है तो इसका मतलब है कि सरकार कमजोर है। वह कानून व्यवस्था को लागू करवापाने में नाकाम है। सरकार को सामंती ताकतों के आगे नहीं झुकना चाहिए। आर्य समाज हमेशा से ही जन्मना-जातिवाद व्यवस्था के खिलाफ रहा है। आर्य समाज के मंदिरों में देशभर में प्रतिदिन ७०० से ८०० शादियां होती हैं और इनका आधार जाति नहीं होता। साथी चुनने का अधिकार हर युवक-युवती को है। परिवारवालों को उसका समर्थन करना चाहिए। वह कहते हैं कि स्वामि दयानंद के ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि स्वंयवर प्रथा जबतक हमारे समाज में रही, आर्यवर्त ऊंचाइयों तक गया और जब से यह समाप्त हुई हमारा पतन शुरू हो गया।
समाज में युवा जोड़ों के प्रेम के प्रति सामंती नजरिया कई बार बदले की भावना से भी प्रेरित होता है। ऐसा लगता है कि हीर रांझा के किस्से सुनकर यहां किसी वारिस शाह की आंखें नहीं भीगती। हरियाणवी फिल्म चंद्रावल भी दुखांत प्रेम कहानी पर आधारित फिल्म थी, जो यहां सुपर हिट रही। जो किस्से हमारा मनोरंजन करते हैं, वे क्या हमें सबक नहीं देते। वेदपाल जैसा हर किस्सा अपने पीछे सबक छोड़ जाता है, असर आएगा मगर धीर-धीरे।
(जैसा कि हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के शुक्रवार के अंक में प्रकाशित)

Friday, July 17, 2009

बात और बेबात

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में यह मुहावरा चलता है- आदमी की बात और गधे की लात का कोउ भरोसा नाय। कब चल जाए और कुछ मतलब भी न निकले।
हमने तभी कही ही कि बात पर जादा भरोसा मत करो।
इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में ही बात का सबसे ज्यादा बतंगड़ बनता है। बेशक बात भले की हो चाहे नुकसान की बतगंड़ जरूर बनेगा। अमिताभ जब बोले कि यूपी में दम है तो बतंगड़ बना। वरुण ने कुछ काटने की बात कही या नहीं कही (कोर्ट फैसला करेगा) पर बतंगड़ खूब बना। अब रीता बहुगुणा के बयान पर खूब बवंडर है। यहां नेता बता बनाकर ही चुनाव जीत लेते हैं। काम को कोई नहीं पूंछता। यही वजह है हर कोई दूसरे को बोलने से रोकता है। इसलिए यह मुहावरा भी खूब प्रचल्लित है - काहे गाल बजाते हो, हमको सब मालूम है। या बहुत ग्यानी बनते हो। अभी ---पर गोली मारेंगे और सारा ग्यान वहीं कूंच देंगे। यह बातें सिर्फ गली मोहोल्लों में ही नहीं लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में भी होती हैं। भले ही इस शहर को तहजीव और मीठी जुबान के लिए जाना जाता हो मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लठैत बोली ब्रज के बंधन तोड़ यहां ठेठ गंवई अंदाज में चलती है।
उसके बाद महिलाएं एक-दूसरे को बलात्कार की धमकी देती हैं। भली मानुष हुईं तो माफी भी मांग लेती हैं। मायावती हुई तो इसकी जरूरत भी नहीं। वह किसी दूसरे को गाल नहीं बजाने देंगी। अगर कोई उनकी सी बोली बोलता है तो सामंती ठसक दिखादी जाती है। वरुण जेल काट चुके हैं। रीता बहुगुणा जेल में हैं। संजय दत्त डर कर भाग ही गए थे।
उत्तर प्रदेश में जो गाली-गलौच का कल्चर सिर चढ़ कर बोल रहा है, वह बताता है कि देश के यान भले चांद पर पहुंच जाए अभी उन्हें विकास योजनाओं से कोई बहुत ज्यादा लेना-देना नहीं है। उनके लिए पत्थरों के बुत अब भी मायने रखते हैं। मायावती उसी भावना की झलक है, जिसे उत्तर प्रदेश की जनता ने सर्वसम्मति से चुना।
-सुधीर राघव

Tuesday, July 14, 2009

गुलाम की सोच

मंदी के दौर में जनसंख्या नियंत्रण का नारा एक बार फिर जोर-शोर से उठ खड़ा हुआ है। जाहिर है एक अरब आबादी की जिम्मेदारी जिस सरकार को लेनी पड़े उसके पसीने छूट जाएंगे। एक अरब पेट और खाने के लिए खुले मुंह सचमुच अनाज, फल, सब्जियों की एक बड़ी मात्रा की रोज मांग करते हैं। इनके साथ जुड़े दो हाथ तो हैं पर सरकार को यह भी फिक्र होगी कि इन हाथों को काम क्या दिया जाए। जब दुनिया की अरथव्यवस्थाएं कुलाचें भर रही थीं, उस दौर में हम दुनिया को कामगार मुहैया करा रहे थे। अब मंदी की वजह से उन्हें भी लौटना पड़ रहा है। नए अवसर तो बहुत ही कम हो गए हैं। ऐसे में जनसंख्या नियंत्रण का नारा फिर उसी तेजी से उठा है जैसा ९० के दशक से पहले उठता था। जनसंख्या वृद्धि दर नियंत्रित होनी ही चाहिए। पर यह नियंत्रण कैसे हो इस पर लोगों के पास पिछले पांच दशक से ढेरों सुझाव हैं। संजय गांधी भी इस मामले में कुछ लोगों के आदर्श हो सकते हैं, जो ७६-७७ में जबरन नसबंदी के लिए बदनाम हुए। इसके अलावा परिवार नियोजन या परिवार कल्याण विभाग की पूरी फौज इस दिशा में वर्षों से काम कर रही है। नतीजा क्या निकला है, वह सबके सामने है। ऐसे में हमारे गुलाम नबी आजाद मंत्रिपद का दायित्व निभाते हुए कुछ नई बात कह गए हैं। गुलाम नबी कह रहे हैं कि गांवों तक टीवी पहुंचा दीजिए, फिर देखिए जनसंख्या कैसे नियंत्रित होती है। यह बात लोगों क्या बुद्धिजीवियों और धर्मजीवियों के गले भी नहीं उतर रही है। यह माना जाता है कि जहां मनोरंजन के साधन नहीं होते, उन जगहों पर जनसंख्या तेजी से बढ़ती है। टीवी देखने के लिए बच्चे और लोग देर रात तक जगेंगे। नहीं यह एक कारण नहीं है। टीवी आप तक सूचनाएं भी पहुंचाता है। वह अवांछित गर्भ से छुटकारा पाने के तरीके भी बताता है। हालांकि बहुत से धर्मों में इसे वर्जित माना जाता है। गर्भपात जैसे जटिल उपाय सचमुच कट्टर समुदायों में कोई भी स्त्री चाहकर भी नहीं अपना सकती, मगर ७२ घंटे वाली गोली, जिसमें गर्भ सुनिश्चित ही नहीं है, उन्हें बिना अपराधबोध के साथ इसे अपनाने की राह दिखा सकती है। टीवी अपने साथ यह सूचना लेकर आता है। हो सकता है घर में रोज यह सूचनाए तो लोग इसे आजमाएं भी। जानकारियां हमेशा लोगों का बुरा नहीं करती, जैसा कि कट्टरपंथी मानते हैं। उन्हें हर नई जानकारी के नकारात्मक प्रभाव ही नजर आते हैं। चुनौतियों से निपटने में हमेशा पुराने उपाय कारगर नहीं होते। इसके लिए नए तौर-तरीके अपनाए ही जाने चाहिए। संचार क्रांति का पूरा फायदा गांवों तक पहुंचे। वहां भी बिजली-पानी और कैमिस्ट की दुकान तक पहुंचने के लिए सड़कें और साधन हों तो जाहिर है, आबादी नियंत्रित होगी।
-सुधीर राघव

गुलाम की सोच

मंदी के दौर में जनसंख्या नियंत्रण का नारा एक बार फिर जोर-शोर से उठ खड़ा हुआ है। जाहिर है एक अरब आबादी की जिम्मेदारी जिस सरकार को लेनी पड़े उसके पसीने छूट जाएंगे। एक अरब पेट और खाने के लिए खुले मुंह सचमुच अनाज, फल, सब्जियों की एक बड़ी मात्रा की रोज मांग करते हैं। इनके साथ जुड़े दो हाथ तो हैं पर सरकार को यह भी फिक्र होगी कि इन हाथों को काम क्या दिया जाए। जब दुनिया की अरथव्यवस्थाएं कुलाचें भर रही थीं, उस दौर में हम दुनिया को कामगार मुहैया करा रहे थे। अब मंदी की वजह से उन्हें भी लौटना पड़ रहा है। नए अवसर तो बहुत ही कम हो गए हैं। ऐसे में जनसंख्या नियंत्रण का नारा फिर उसी तेजी से उठा है जैसा ९० के दशक से पहले उठता था। जनसंख्या वृद्धि दर नियंत्रित होनी ही चाहिए। पर यह नियंत्रण कैसे हो इस पर लोगों के पास पिछले पांच दशक से ढेरों सुझाव हैं। संजय गांधी भी इस मामले में कुछ लोगों के आदर्श हो सकते हैं, जो ७६-७७ में जबरन नसबंदी के लिए बदनाम हुए। इसके अलावा परिवार नियोजन या परिवार कल्याण विभाग की पूरी फौज इस दिशा में वर्षों से काम कर रही है। नतीजा क्या निकला है, वह सबके सामने है। ऐसे में हमारे गुलाम नबी आजाद मंत्रिपद का दायित्व निभाते हुए कुछ नई बात कह गए हैं। गुलाम नबी कह रहे हैं कि गांवों तक टीवी पहुंचा दीजिए, फिर देखिए जनसंख्या कैसे नियंत्रित होती है। यह बात लोगों क्या बुद्धिजीवियों और धर्मजीवियों के गले भी नहीं उतर रही है। यह माना जाता है कि जहां मनोरंजन के साधन नहीं होते, उन जगहों पर जनसंख्या तेजी से बढ़ती है। टीवी देखने के लिए बच्चे और लोग देर रात तक जगेंगे। नहीं यह एक कारण नहीं है। टीवी आप तक सूचनाएं भी पहुंचाता है। वह अवांछित गर्भ से छुटकारा पाने के तरीके भी बताता है। हालांकि बहुत से धर्मों में इसे वर्जित माना जाता है। गर्भपात जैसे जटिल उपाय सचमुच कट्टर समुदायों में कोई भी स्त्री चाहकर भी नहीं अपना सकती, मगर ७२ घंटे वाली गोली, जिसमें गर्भ सुनिश्चित ही नहीं है, उन्हें बिना अपराधबोध के साथ इसे अपनाने की राह दिखा सकती है। टीवी अपने साथ यह सूचना लेकर आता है। हो सकता है घर में रोज यह सूचनाए तो लोग इसे आजमाएं भी। जानकारियां हमेशा लोगों का बुरा नहीं करती, जैसा कि कट्टरपंथी मानते हैं। उन्हें हर नई जानकारी के नकारात्मक प्रभाव ही नजर आते हैं। चुनौतियों से निपटने में हमेशा पुराने उपाय कारगर नहीं होते। इसके लिए नए तौर-तरीके अपनाए ही जाने चाहिए। संचार क्रांति का पूरा फायदा गांवों तक पहुंचे। वहां भी बिजली-पानी और कैमिस्ट की दुकान तक पहुंचने के लिए सड़कें और साधन हों तो जाहिर है, आबादी नियंत्रित होगी।
-सुधीर राघव

Monday, July 13, 2009

क्या चल रहा है जननी सुरक्षा के नाम पर

यहां एक महिला की दवाई न मिलने पर प्रसव के दौरान मौत हो गई। यह सब हुआ एक सिविल अस्पताल में। मातृत्व मृत्यु दर घटाने के लिए करोड़ों रुपए का फंड जारी हो रहा है। इसके बावजूद यह देखने में आता है कि डॉक्ट़र दवाएं किसी एक कंपनी की लिखते हैं। मरीजों की संख्या रोज इतनी हो ही जाती है कि जब पर्ची कैमिस्ट तक पहुंचती है, दवा कई बार खत्म हो चुकी होती है। दूसरी कंपनी की कौन सी दवा इसकी जगह ली जा सकती है, न तो मरीज के रिश्तेदार को पता होता है और कैमिस्ट को यह डर होता है कि किसी ओर कंपनी की दवा दी गई तो डॉक्टर नाराज हो जाएगा। अच्छा-भला धंधा चल रहा है क्यों बिगाड़ा जाए। इस चक्कर में कई बार मरीज की जान भी चली जाती है। इस घटना में भी ऐसा हुआ, यह पक्के तौर पर तो नहीं कहा जा सकता। यह घटना खरड़ के सिविल अस्पताल की है। महिला पिंकी का प्रसवकाल शुरू होने के बाद से इसी अस्पताल से इलाज चल रहा था। शुक्रवार को उसे भर्ती भी करा दिया गया था। शनिवार को अचानक उसकी हालत बिगड़ने पर उसे इमरजेंसी में ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया। उसके एक परिजन को दवाई की लिस्ट पकड़ा दी गई। परिजनों का कहना है कि वह दवाई आसपास कहीं नहीं मिली। जब तक वे दवाई लेकर आए तब तक पिंकी की हालत काफी बिगड़ चुकी थी। उसे पीजीआई रेफर कर दिया गया। पीजीआई में डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इस मामले में किस स्तर पर लापरवाही हुई कोई नहीं कह सकता। परिजनों की ओर से उसे शुरू से ही अस्पताल की देख-रेख में रखा गया, अगर इसके बावजूद ऐसे कैस हो जाते हैं तो जननी सुरक्षा योजना में क्या चल रहा है, कुछ सवाल तो होने चाहिए।

Friday, July 10, 2009

इसे भोगो लालू प्रसाद

यह लालूपन का एक और खुलासा है। रेलमंत्री ममता बेनर्जी ने संसद में वीरवार को खुलासा किया कि रेलवे के मुनाफे को लेकर लालू प्रसाद यादव सौ करोड़ जनता की आंखों में धूल झोंकते रहे। ८३६१ करोड़ के मुनाफे को २०,००० करोड़ रुपए बताया गया। अगर यही बात निजी क्षेत्र से जुड़ी होती तो सत्यम जैसा शोर मच गया होता। यह मीडिया के लिए भी शर्म की बात है कि उसके रहते लालू पांच साल तक देश की जनता से झूठ बोलते रहे और वह बिना सच्चाई परखे उसके गुनगान करता रहा। इससे पहले वह वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन बनाने के अपनी ही घोषणा को फऱेब कह चुके हैं। इस मानसिकता पर मुझे एक घटना याद आ रही है।किस्सा आठ साल पहले का है। जालंधर रेलवे स्टेशन से मैंने घर जाने के लिए रिक्शा लिया। रिक्शे मे बैठते ही रिक्शा चालक ने अपनी राम कहानी शुरू कर दी। साहब का बताएं, मजबूरी में रिक्शा चलाते हैं। मजबूरी भी क्या यो कहलो बस अपना शोक ही निराला है। मधेपुरा में अपनी काफी जमीन जायदाद है। १२ बीघा में तो पोदीना ही होता है। शादी के बाद पिता जी बोले की राधे अब जमीन-जदाद तुम ही संभालोगे। हम बोले हम से नहीं होता यह सब। कौन जाकर अपकी सौ बीघा जमीन के रोज चक्कर लगाए। बस क्या था, घर छोड़कर इधर आ गए पंजाब में। रिक्शा चला रहे हैं। घर से हर दूसरे दिन तार आ जाता है कि राधे लोट आओ, पर हमने ठान लिया तो ठान लिया। घर पहुंचकर मैं रिक्शे से उतरा उसे १० रुपए दिए और घर के अंदर चला गया। तब उस पर कभी सोचा भी नहीं। पहली ही नजर में मान लिया कि गप्प हांक रहा है। अब लालू के बारे में यह जानकर अचानक उसका चेहरा भी सामने आ गया। लालू प्रसाद और रिक्शा चालक की सोच में मुझे कोई ज्यादा अंतर नहीं दिखता। इसके बावजूद रिक्शाचालक को इसके लिए दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उस पर अपना आत्मसम्मान बचाए रखने के लिए दबाव होगा। एक रिक्शा चालक से वैसे भी लोग बड़े असभ्य तरीके से पेश आते हैं। संभवत है चारा घोटाला के बाद लगातार गरियाये जा रहे लालू प्रसाद भी ऐसी ही मनोस्थिति से गुजर रहे होंगे, जब वे रेलमंत्री बने। चूंकी रेलवे में आपके पास ओबलाइज करने के लिए काफी संसाधन होते हैं, अतः मीडिया में कुछ लोग दोस्ती को आतुर भी हो गए होंगे। अब जब आंकड़े निकल कर सामने आ रहे हैं तो पाठक यह सवाल कर सकते हैं कि अब किसका कितना भरोसा किया जाए। आपको लगता है कि वह रिक्शा चालक खुला झूठ बोल रहा था, तो क्या आप उसे किसी जिम्मेदारी वाले पद पर देखना चाहेंगे। आपका जवाब होगा नहीं। लालू के बारे में भी शायद आपका यही जवाब हो। इसके बावजूद लालू सत्ता में अगले किसी भी चुनाव में लोट सकते हैं। क्योंकि लोग वैसे ही प्रतिनिधि चुनते हैं, जिनसे उन्हें सुविधा होती है। इसी तरह भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार फैलता है। झूठ बोलने वाले दंडित हों, यह हर कोई चाहता है। सत्ता से बाहर बैठे लालू हो सकता है कि अपने ऐसे अनेक झूठ का ही दंड भोग रहे हों। लोग इस संबंध में कोई वैग्यानिक तर्क नजर नहीं आता और इसलिए वह कहते हैं, ईश्वर की लाठी बेअवाज होती है। यह लाठी एक-दूसरे के हाथ में घूमकर एक-दूसरे को दंडित करती है। अब ममता बनर्जी जिस तरह से लालू के हर जले पर नमक छिड़क रही हैं, यह लालू के हिस्से का दंड है। इसे भोगो लालू प्रसाद।
-सुधीर राघव

Wednesday, July 8, 2009

बदल गया सावन

सावन का महीना शुरू हो गया है। सावन का नाम सुनते ही ठंडी, लहराकर चलती तेज पुर्वाई का अहसास होता है और उमड़ते-घुमड़ते काले बादलों की तस्वीर उभरती है, जो कभी गरजते हैं और कभी मूसलाधार बरसते हैं। उनके आगे जेठ-भादों की तपती धूप की गर्मी छूमंतर हो जाती है। बागों में मोर नाचते हैं, कोयल की मधुर गूंज कभी अमराई से आती है तो कभी नीम के उस पेड़ से जिस पर झूले पड़ गए हैं।

 कवि के मन में भी हिलोरें उठने लगती हैं। नवविवाहिताएं मायके आ जाती हैं। आकाशवाणी दिल्ली से सावन के मधुर ब्रज गीत बजते हैं। सावन की यह तस्वीर लगता है पुरानी हो गई। जैसे-जैसे इन्सान बदला है सावन भी बदल गया है।

यहां चंडीगढ़ में सावन का स्वागत चालीस डिग्री तक पहुंचा पारा कर रहा है। आसमान में बादल दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे। मोर और कोयल की बात करनी है तो छतबीड़ चिडियाघर का चक्कर लगा आइए। अब शहर ही नहीं गांवों में भी सावन के मायने इतने ही रह गए हैं। फसलों पर पेस्टीसाइट्स के अंधाधुंध इस्तेमाल ने मोर और कोयल छोड़े ही कहां। कुछ इक्का-दुक्का कहीं दिख जाते हैं।

 मोर मन का प्रतीक है, उसे कंकरीट के जंगल ऐसा आनंद नहीं दे सकते कि वह मगन हो कर नाचने लगे। उसे तो मानसून का छपछप राग चाहिए। बादलों की उमड़-घुमड़ और जमीन को छूकर चलती पुर्वाई। हम प्रकृति का दोहन कर रहे हैं। बदले में उसे क्या दे रहे हैं। यह कौन सोचे। ज्योतिषी चिल्ला रहे हैं कि इस सावन में तीन ग्रहण है। चंद्रग्रहण के साथ सावन शुरू हो रहा है, बीच में अमावस्या को सूर्यग्रहण और फिर अगली पूर्णिमा को चंद्रग्रहण। यह लक्षण कोई शुभ नहीं है। प्रकृतिक कोप देखने को मिल सकते हैं। ज्योतिषी का गणित मैं नहीं जानता, मगर इतना जरूर जानता हूं कि इस सावन को सचमुच कई ग्रहण लगे हैं। हमने अंधाधुंध पेड़ काटे हैं। मानसून तो भटकेगा ही। हमारे ऐसी, फ्रिज से निकले क्लोरो-फ्लोरो कार्बन ओजोन परत के लिए खतरा हैं।

धरती लगातार गर्म हो रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्र तल बढ़ रहा है। अब इतना होगा तो सावन को तीन नहीं कई ग्रहण लगेगें। इसलिए सावन सूखा है। मौसम विभाग की आलोचना की जाती है कि वह मौसम को नहीं पकड़ पाता उसकी भविष्यवाणी हमेशा फेल होती है। विभाग क्या करे। मानव निर्मित इतने कारक मौसम को प्रभावित करने लगे हैं कि उनका हिसाब-किताब लगाने के लिए वर्षों की रिसर्च चाहिए। पहले जब इनसान कुदरत के आगे दब कर रहता था, उसकी इज्जत करता था तो उसे कुदरत का अंदाजा भी रहता था।

एक सामन्य बुद्धिवाला घाघ भड्डरी भी हमारे सेटेलाइट्स और संसाधन संपन्न मौसम विभाग से कहीं सटीक भविष्यवाणियां करता था। अब इन्सान ज्यादा घाघ है, पर घाघ बनकर फायदा क्या। उसका सावन तो सूखा है।
-सुधीर राघव

Tuesday, July 7, 2009

यह कैसा बजट

लंबे समय बाद दीर्घकालिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बना बजट सामने आया है। इसमें लोकप्रिय फैसले लेने से बचा गया है। यह जरूरी नहीं है कि लोकप्रिय फैसले व्यवस्था के लिए फायदेमंद हों? वित्तमंत्री चाहते तो आयकर सीमा में छूट दो लाख तक कर और उद्योगों के लिए पैकेज की घोषणा कर आसानी से वाहवाही लूट सकते थे। ऐसा नहीं किया गया। बजट में व्यवस्था उन लोगों को लिए की गई, जिन्हें शायद इस बात ठीक-ठीक अंदाजा भी नहीं हो पाएगा कि उनके लिए क्या-क्या किया गया है। यह तो था जनदृष्टि से बजट का आकलन। लोगों के लिए इसमें बहुत खुश होने के लिए कुछ नहीं है। यही बजह भी रही की बजट भाषण सुन शेयर बाजार धड़ाम हुआ।अब जाने की अर्थशास्त्र क्या कहता है। देश के तीव्र विकास के लिए ऊंची विकासदर जरूरी है। जाहिर है देश का सकल उत्पादन जिस गति से बढ़ेगा, उसी गति से रोजगार बढ़ेंगे, लोगों की आया बढ़ेगी, आय बढ़ने से क्रयशक्ति बढ़ेगी, जाहिर मांग बढ़ेगी और निवेश का माहौल बनेगा। अभी तक जो छह से आठ फीसदी की विकासदर के बीच हम पिछले दस साल से चल रहे हैं, वह हमें महानगरों और उनके आसपास के छोटे शहरों और कस्बों में हुए विकास की बदोलत है। यहां ढांचागत व्यवस्था में निवेश हुआ, जमीनों के भाव बढ़े, लोगों को रोजगार मिले और इतनी ज्यादा दोहन हो गया कि यहां और निवेश की सीधी गुंजाइश नहीं थी और ज्यादा निवेश वहां सिर्फ चीजों के दाम बढ़ाने वाल ही हो गया यानी सीधे-सीधे इनफ्लेशन। इसे हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं। दिल्ली और गुड़गांव के आसपास के किसी भी इलाके में आज से दस साल पहले जमीन के रेट देखे। तब जो निवेश हुआ, उसने वहां नए संसाधन खड़े किए और वहां की बेरोजगार पड़ी या कम उत्पादकता दे रही जमीन और लोगों को उपयोगी बना दिया। अब वहां और निवेश का मतलब है कि निवेशक को जमीन खरीदने के लिए बहुत बड़ी प्रतियोगिता का सामना करना होगा और कीमत काफी ऊंची होती जाएगी। इसके अलावा उसके उत्पादन के खरीददार भी कम होंगे क्योंकि वहां उसे प्रतियोगियों का सामना करना पड़ेगा, और इस तरह एक मंदी की स्थिति उसे अपने काम में झेलनी होगी। इसके विपरीत दूर-दराज के इलाकों में अब भी जमीन और लोग अनुपयोगी और बेरोजगार हैं। वहां कोई निवेश करने को राजी नहीं है। वजह, वहां लोगों के पास क्रय शक्ति नहीं है। जिनके पास है, उनकी संख्या इतनी कम है कि उन्हें अपनी खऱीददारी के लिए शहर आना पड़ता है और चीजें उनके पास नहीं पहुंचतीं। इन लोगों की अगर क्रयशक्ति बढ़ती है तो जाहिर है कि निजी निवेशक और उद्यमी वहां भी पहुंचने लगेंगे। शुरू में कोई निवेशक वहां धन नहीं लगा सकता, क्योंकि यह घाटे का सौदा है और धन लगाने के बाद लंबा इंतजार करना होगा। इसलिए यह पहल सरकार को करनी होगी। इस बजट में सरकार ने वही पहल की है। ग्रामीण और मजदूरों और किसानों के लिए बनी योजना कोई समाजवादी फलसफा नहीं है, यह ठेठ पूंजीवादी जरूरत है। अगर पूंजी का प्रसार इन पिछड़े इलाकों की ओर नहीं होता है तो भारत भी लंबी मंदी के भंवर में उसी तरह से फंस सकता है, जैसे पश्चिमी देश, जिनके पास अब विकास के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है। हो सकता है इसके लिए वे अफ्रीकी देशों का रुख करना चाहें, मगर इसके लिए अगर अफ्रीकी देशों के सरकारें उदार होती हैं और इन कंपनियों को धन लगाने की इजाजत देती हैं तो वे इनपर उपकार ही करेंगी। साथ ही भूख और गरीबी से लड़ रहे लोगों की मदद होगी इसलिए यह मानवता से भी उपकार होगा। हमारे देश में एक साथ रवांडा और न्यूयॉर्क बसता है। इसलिए हमें प्रयोग करने के लिए अपने ही देश में काफी गुंजाइश है। इस तरह से प्रणब का बजट अर्थशास्त्र की किताब के मुताबिक बिल्कुल समय के अनुकूल है। इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। अगर किसी अर्थशास्त्री को प्रणव को बजट पर नंबर देने हों तो वह सौ में से नब्बे से ज्यादा ही देगा। यही वजह है कि उद्योगों को कुछ खास न मिलने के बाद भी फिक्की के अध्यक्ष या किसी भी बड़े औद्योगिक संगठन ने बजट की आलोचना नहीं की है। असल में दूरदराज के इलाकों के लिए बिजली, सड़क और मूलभूत सुविधाओं का फंड बढ़ाकर और उनके लिए रोजगार के नरेगा जैसी योजनाओं में अस्सी फीसदी की बढ़ोतरी कर परोक्ष रूप से उद्योगों को ही नई जमीन देने की तैयारी की गई है। अगर योजनाएं सफल हुईं तो उद्योगपति पांच साल बाद उन दूरदराज के इलाकों में उद्योग लगाना पसंद करेंगे, जहां बिजली, पानी और सड़क हो। वहां जमीन और मजदूर तो पहले ही काफी सस्ता होगा। अगर ऐसा होता है विकास दर दो अंकों में आसानी से पहुंच सकती है।
सबसे बड़ी बाधा पर ऐसा होने में सबसे बड़ी बाधा हमारा चरित्र है। सरकारी योजनाओं के बारे में राजीव गांधी खुद कहते रहे हैं कि अगर १ रुपया चलता है तो पांच पैसे भी नहीं पहुंचते। अगर यह पैसा गांव के लोगों तक पहुंच पाता है तो तस्वीर बदलेगी, इसमें शक नहीं। वर्ना लालफीताशाही और भ्रष्टाचार और बढ़ेगा है। एक तरह से विधानपालिका ने अपना काम कर दिया है। अब लोकतंत्र के अन्य स्तंभों को इस दिशा में काम करने की जरूरत है। कार्यपालिका में सबसे ज्यादा गड़बड़ होती है। ऐसे में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया को एक बार फिर अपनी चौकस निगाहें रखनी होंगी। इसके लिए मिडिया को भी अब गांवों और कस्बों का रुख करना होगा। अब अगल दशक का नारा यही है, चलो गांव की ओर।

-सुधीर राघव

Friday, July 3, 2009

आदमी क्या अमीबा बनेगा

क्या परिवार आधारित व्यवस्था की जड़ें हिलने लगी हैं। समलैंगिकता पर भारत में बहस तीखी होने के साथ ही यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि यह मानव जाति के लिए आतंकवाद से भी बड़ा खतरा है। असल में विकास की धारा में ही पतन के बीज रहते हैं। हर धारा आगे बढ़ती दिखती है, लगता है विकास की संभावना अनंत तक है, मगर असलीयत यह है कि इसका हश्र एक पहिए जैसा ही है, जिसे धुरी के चारों ओर घूमते हुए फिर वहीं पहुंचना है। मानव जाति का समूचा विकास परिवार, समुदाय और कम्यून के माध्यम से हुआ है। निस्संदेह मनुष्य ने जो अविष्कार किए उन्हें अपने समाज के साथ साझा किया। पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही काम को परिस्कृत करने में खप गईं। आज से बीस साल पहले तक यही कहा जाता था कि सुनार का बेटा सुनार और लुहार का बेटा लुहार। लोग पारंपरिक काम करते थे। इस तरह कामधंधा पुश्तैनी होता था और पीढ़ी दर पीढ़ी उसका परिमार्जन करती जाती थी। बड़े-बड़े संयुक्त परिवार होते थे और पीढ़ीयों द्वारा जुटाए अनुभव के सहारे ही जीविका उपार्जन होता था। भारत ही नहीं लगभग पूरी दुनिया में जहां भी सभ्यताएं खानबदोश नहीं थी, औद्योगिक क्रांति से पहले जीवनशैली एक सी ही थी। जीविकोपर्जन के साधन कमोवेश एक जैसे थे। ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के बाद दुनिया की तस्वीर जिस तरह से बदली है, वह आश्चर्यजनक है। पिछली दो सदी में सामाजिक बदलाव जितनी तेजी से हुए हैं, उतने पहले दो हजार साल में नहीं हुए। इस तरक्की गति इतनी तेज थी कि बड़े-बड़े संयुक्त परिवार इससे सामंजस्य बिठा पाते इसकी गुंजाइश नहीं रही। लोग अपने पैतृक गांवों और शहरों से दूर निकलने लगे। आदमी जड़ों से कटने लगा। इसके बिना जीवनसंघर्ष में पिछड़ना पड़ता। संयुक्त परिवार इस तरह टूटते गए और अब विरले ही दिखते हैं। संयुक्त परिवारों के टूटने के बाद अब एकल परिवार विकास की गति के मार्ग में बोझ बनने लगे हैं। परिवार नामक संस्था अब दुनिया घूमने को मजबूर या उत्साहित लोगों को सुहा नहीं रही है। इसलिए जहां गए वहां लिवइन रिलेशनशिप में रहे और जिम्मेवारियों का बोझ ढोने का वक्त न होने से समलैंगिकता का रुझान भी बढ़ा। अभी जो रुझान है वह भविष्य की व्यवस्था भी हो सकता है। जाहिर है, जब परिवार नामक संस्था भी नष्ट हो जाएगी तो विकास के नाम पर हमारे पास क्या होगा, यह सोचना पड़ेगा। हो सकता है हमारे आकलन, हमारी गणनाएं सब धरे रह जाएं। मानव जाति के विकास के गुण अगर उसकी प्रकृति में छिपे हैं तो उसके पतन के संकेत भी उसकी प्रवृति में होगें। हो सकता है प्रकृति ने हमारे जीन कुछ इस तरह से प्रोग्राम किए हों। एक के बाद एक दुनिया के देश जिस तरह से समलैंगिकों की मांगों के आगे घुटने टेक रहे हैं, उससे लगता है कि मानवजाति के जीन अब उसके खिलाफ ही प्रवृति को बढ़ा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह प्रवृति नई है। प्राचीन ग्रंथों तक में ऐसे संबंधों का जिक्र कुकर्मों की तरह किया गया है, मगर अब जिस तेजी से इनकी संख्या बढ़ रही है, वह संकेत कुछ अच्छे नहीं हैं। क्या इसकी वजह प्राकृतिक संतुलन से छेड़छाड़ है। जिस तरह से पिछले दो सौ सालों में मानव आबादी बढ़ी है और अन्य जीव कम हुए हैं, उसने कुछ असर तो जरूर डाला होगा। समाज में नए तरह के तनाव पैदा हुए। ऐसे तनाव ही शायद उन प्रवृतियों का कारक बन रहे हैं, जिसमें कोई जीव अपने ही वंश की वृद्धि के खिलाफ काम करे। अपने वंश की वृद्धि हर जीव की प्राकृतिक जिग्यासा और कर्म होती है, जिसे कर वह आनंदित महसूस करता है। इसके विपरीत कर्म जाहिर है, हमारे जीन में किसी आत्मघाती लक्षणों के विकसित होने का संकेत हैं। चार्ल्स डार्विन का क्रमविकास बताता है कि बंदर से किस तरह मनुष्य बना, तो क्या यह लक्षण इस बात के संकेत हैं कि मनुष्य फिर किस तरह बंदर बनेगा। और बंदर भी नहीं एक कौशकीय अमीबा या हाइड्रा शायद। ये प्रजनन के लिए नर या मादा पर निर्भर नहीं होते। ये खुद ही विखंडित होते हैं।
-सुधीर ऱाघव