Thursday, May 28, 2009

भारी भरकम टोल टैक्स सुरक्षा की जिम्मेदारी कोई नहीं

सुधीर राघव चंडीगढ़ से दिल्ली जाते समय राष्ट्रीय राजमार्ग, जहां आप भारी भरकम टोल टैक्स देकर सफर करते हैं, वहां आपकी जानमाल की रक्षा के लिए कोई नहीं है। ऐसे रास्ते जिस पर रोज करीब पांच लाख वाहन गुजरते हैं, वहां हथियारबंद लुटेरे खुलेआम घूमते हैं। इन्हें रोकने टोकने वाला कोई नहीं है। ये रास्ते में आपकी गाड़ी को ओवरटेक कर उसमें सवार हो जाते हैं। आपके घर तक आते हैं, पैसा-नकदी और आभूषण लूट कर फरार हो जाते हैं। पिछले कुछ दिनों में ही इस राजमार्ग पर एक नहीं चार-चार वारदातें हो चुकी हैं। इसके बावजूद हाइवे पर लोगों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। आम आदमी इससे दहशत में है। हाइवे के इन लुटेरों के आतंक ने १९७९ में जार्ज मिलर की परिकल्पना आस्ट्रेलियाई फिल्म मेडमैक्स के खौफ को हकीकत में ला खड़ा किया है। हलांकि तब अतिश्योक्ति से भरपूर कल्पना मान कर समीक्षकों ने इसकी आलोचना की थी। चंडीगढ़ के सेक्टर ३३ में लूटपाट करने वाले लुटेरों की हरकतें भी फिल्मी बाइकर गैंग नाइटराइडर की तरह ही अजीब हैं। यह गैंग भले ही इनोवा से चलता है मगर इसके सदस्य भी नाइटराइडर गैंग के सरगना टोय कटर और बुब्बा जनेती की तरह ही सनकी हैं। ये लूटते हैं, जान से मारने की धमकी देते हैं और विरोध न करने पर पेर छूकर माफी भी मांगते हैं। इन लुटेरों पर नकेल नहीं डाली गई तो ये मेडमैक्स के रोड वारियर्स की तरह ही अपनी सत्ता बना लेंगे। फिल्म में तो बुराई का अंत होता है, नायक मैक्स यानी मेल गिब्सन नाइटराइडर गैंग का सफाया करता है। उस समय के अंजान मेल गिब्सन को इस फिल्म ने सितारा बना दिया था। हमारे वे अधिकारी जो हाइवे की सुरक्षा के लिए जवाबदेह हैं, उन्हें अब जाग जाना चाहिए। हाइवे पुलिस का काम भी कुछ बढ़ाया जाना चाहिए। लोगों को अपनी सुरक्षा के प्रति सतर्क होना होगा। खासकर देरसबेर चलना हो तो सावधानी बरतें। पुलिस अधिकारी साधनों और जवानों की कमी का रोना रोते हैं। टोल टैक्स वसूलने वालों पर ही सुरक्षा की जवाबदेही डाली जानी चाहिए। अगर आप कार से दिल्ली जा रहे हैं तो दप्पड़, करनाल और पानीपत में कुल मिलाकर ११५ रुपए टोल टैक्स भरते हैं, जबकि जनशताब्दी का किराया ही चंडीगढ़ से दिल्ली ११० रुपए है। इसके बावजूद आप सुरक्षित नही हैं। सड़क सुरक्षा के नाम पर जो कुछ हो रहा है वह सिर्फ वाहनों की भिड़ंत कम करने के लिए लिटरेचर छापने और बांटने तक ही दिखता है। आखिर सुरक्षा की जिम्मेदारी भी तो किसी को लेनी चाहिए। दुस्सहासी लुटेरे फिर किसी शिकार में निकल चुके होंगे। इन्हें दबोचा जाना चाहिए। (संबंधित खबर के लिए देखें दैनिक हिन्दुस्तान)

Tuesday, May 19, 2009

बात जारी है...

बात आज भी वहीं से शुरू करनी पड़ रही है, जहां से कल शुरू की थी। कल सुबह तक यह माहौल था कि अपने पीएम इन वेटिंग लोकसभा में विपक्ष के नेता बनने को राजी नहीं हैं। इसमें हम जैसे लोगों को उनका आदर्शवाद दिखा कि वह एक साथ दो पदों पर नहीं रहना चाह रहे होंगे, मगर तस्वीर शाम होते-होते बदल गई। भाजपा में हार पर रार साफ दिखने लगी। मुरली मनोहर जोशी की तलवार म्यान से बाहर निकल आई और अपने मजबूत कंधों पर पार्टी का पूरा बोझा उठाने के लिए वह राजी दिखे, ऐसे में आडवाणी समर्थकों में खलबली मच गई, जाहिर है कि जोशी आते तो अरुण जेटली और सुष्मा स्वराज सहित पूरे खेमे पर गाज गिरती। खूब उठा-पटक और फेरबदल होता।
आडवाणी जी ने इस बार बच्चों के लिए त्याग किया और नेता विपक्ष हो गए। हो सकता है कि वह अब पीएम इन वेटिंग का पद छोड़ना चाहें। या एक बार ओर आजमाना चाहें। या यह भी हो सकता है कि आज वह कुछ चाहें और अगला चुनाव आते-आते जो पार्टी कहे के नाम पर कुछ ओर चाहें या फिर पार्टी के लिए त्याग करते हुए पीएम इन वेटिंग बन जाएं। असल में भाजपा की इसी परपाटी ने वोटर को कन्फ्यूज किया है। वह समझ ही नहीं पाता है कि इस पार्टी में क्या होने वाला है।
खेर हम बात कर रहे थे नई सरकार की चुनौतियों की। हम फिर मुद्दे पर आते हैं। नई सरकार के सामने कुछ और बड़ी चुनौतिया हैं, जो इस तरह से हैं-

रोजगार के नए क्षेत्र
आईटी सेक्टर के पछाड़ खाने के बाद और आउटसोर्सिंग के खिलाफ पश्चिम में बने माहौल के चलते रोजगार के कुछ ऐसे क्षेत्रों को मजबूत करना होगा, जहां प्रशिक्षित युवाओं को काम मिल सके। इसके अलावा मंदी के चलते मार्केटिंग से भी काफी हाथ बेरोजगार हुए हैं। मीडिया और इंटरटेनमेंट जो बड़ी संख्या में रोजगार मुहैया करा रहे थे, ये भी प्रभावित हो रहे हैं। सरकारी नौकरी फिर से आकर्षण बनने लगी है, जो व्यवस्था की सेहत के लिए ठीक नहीं है। छठे वेतन आयोग के लागू होने के बाद निजी क्षेत्र और दबाव में है। ऐसे में निवेश का प्रवाह इस ओर बढ़े इसके लिए नीतिगत आधार पर कुछ करना होगा। मनमोहन, चिदंबरम, प्रणब और मोंटेक सिंह आहलुवालिया ऐसे नाम हैं, जिनसे कुछ नया कर देने की उम्मीद देश की जनता पाल सकती है। निवेशकों को अंडर डवेलपड या ग्रामीण क्षेत्रों की ओर खींचा जाए। आस-पास के छोटे और बड़े गांवों को मिला कर उन्हें शहरी विकास प्राधिकरणों की तर्ज पर विकसित किया जाए और फूड प्रोसेसिंग और कृषि आधारित उद्योग पूरी तरह इन क्षेत्रों में शिफ्ट कर दिए जाएं। सहकारिता के तहत इस तरह के प्रयास हुए हैं, इनमें से सफल होने वालों के नाम अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं। दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में सहकारिता अपनी मिसाल आप है। इसके बावजूद इस प्रयोग में वह गति नहीं है कि तस्वीर पूरी तरह से बदल जाती। इसलिए निजी क्षेत्रों को आकर्षित करने से फायदा यह हो सकता है कि बड़ी पूंजी प्रवाह से शुरू होने वाले काम संसाधनों की कमी से नहीं जूझेंगे और कम समय में अच्छे नतीजे सामने आएंगे। हालांकि इस दिशा में भी अड़चने कम नहीं हैं, काफी शोर-शराबा होगा। मगर एक बार सबको काम मिलने लगेगा तो तस्वीर भी बदलेगी। यह निजी और लोगों की भागेदारी के आधार पर हो सकता है। इसमें गरीब किसानों और खेतीहर मजदूरों के हित सुरक्षित रहें इसकी व्यवस्था होनी चाहिए। यदि यह करदाताओं के खाते में जाता है तो भी। इससे फायदा यह होगा कि लोगों ग्रामीण क्षेत्रों में भी अच्छे स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएं, और बिजली-पानी तथा परिवहन की उचित सुविधाएं व रोजगार मिल सकेगा। इससे शहरों पर बोझ भी कम होगा। निवेशकों को नए क्षेत्र मिल जाने से प्रतियोगिता कम होने के शुरुआती लाभ मिलेंग, नया बाजार मिलेगा। मंदी जैसे फेक्टर बेअसर होंगे।
(क्रमशः)

Monday, May 18, 2009

सरकार की चुनौतियां

जनता को धन्यवाद दिया जा सकता है कि इस बार की केंद्र सरकार उसके ही सहयोगियों द्वारा नहीं सताई जाएगी। मंदी के इस दौर में मनमोहन सिंह और आडवाणी में से किसी एक को चुनने का बड़ा अटपटा विकल्प था। जाहिर है जनता ने वही जो एक बच्चा भी करता। यदि मुकाबला मनमोहन सिंह और अरुण शौरी के बीच हुआ होता तो शायद तस्वीर कुछ ओर भी हो सकती थी। आडवाणी जी की हालत ऐसी है कि वह विपक्ष का नेता बनने को भी राजी नहीं हैं। वह शुरू से आदर्शवादी के तौर पर पेश आते रहे हैं। वह एक साथ दो पद नहीं रखते, इसलिए पीएम इन वेटिंग रहते, विपक्ष का नेता बनने में हो सकता है कि उनकी ज्यादा किरकिरी होती। खैर इसे छोड़ें, बात करते हैं नई सरकार की चुनौतियों की-

मजबूत नेता, निर्णायक सरकार
एक निरंकुश तानाशाह काफी मजबूत होता है और सभी निर्णय अकेले करने के कारण निर्णायक भी। लोकतंत्र में नेता नहीं राष्ट्र मजबूत होना चाहिए। सरकार में सर्वसम्मति नहीं तो ज्यादातर की सम्मति से फैसले होने चाहिए। राष्ट्रहित में उनपर बहस होनी चाहिए। इस जीत ने मनमोहन सिंह का भी आत्मविश्वास बढ़ाया है। इससे पहले एटमी डील को लेकर उनका कद काफी बढ़ चुका है। अब लोग उन्हें यस मैडम कहने वाला ही समझें तो वे वहीं हैं, जो अब भी लोकतंत्र में एक तानाशाह ढूंढते हैं, जो चाबुक लेकर सबको हांके। साथ ही उन्हें भी। इतना सब होने के बाबजूद भी मनमोहन सिहं को जनता के बीच अभी लोकप्रिय होना है। नहीं तो उन्हें भी पब्लिक उनके राजनीतिक गुरु की तरह भुला देगी। नरसिम्हाराव ने सबसे कठिन समय में देश संभाला और बहुत सी नई योजनाएं बनाई, मगर इस सबके लिए शायद ही कोई भलामानुस उन्हें याद करेगा। वह राजनीति में भ्रष्टाचार के लिए ही जाने जाएंगे, जबकि उन्होंने बहुत से फैसले ऐसे किए, जो उस समय का जनमानस सोच भी नहीं सकता था और उनका प्रत्यक्ष लाभ देश को मिला भी।

मंत्रिमंडल विस्तार
पिछले २० साल से दबाव की राजनीति केंद्र में हावी थी और मंत्रिपद उसीके तहत बंट रहे थे। इस बार दबाव मुक्त माहोल है। ऐसे में वह छोटे राज्य जिन्हें सांसद संख्या कम होने के कारण बनता हक नहीं मिल पा रहा था, अब इस दिशा में ध्यान देना होगा। रेल, रक्षा, कृषि और वाणिज्य मंत्रालय इस बार पंजाब, हरियाणा, यूपी या महाराष्ट्र को दिया जाना चाहिए। मंत्रालयों का रोटेशन बेहद जरूरी है। मौजूदा हालात को देखते हुए वित्तमंत्रालय के लिए मोंटेक सिंह आहलुवालिया को मनमोहन सिंह की तरह ही राजनीति में लाया जाना चाहिए।

आतंकवाद
आतंकवाद और सांप्रदायिक विचारधार का पतन शुरू हो चुका है। तालिबान पाकिस्तान में अपने आस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं। श्रीलंका लिट्टे से मुक्त हो चुका है। कश्मीर में भी लोकतंत्र के प्रति विश्वास बढ़ रहा है। भाजपा की हार के बाद अल्पसंख्यकों की आस्था भी मजबूत हुई होगी। मोदी अपने गढ़ में सिमट कर रहे गए हैं, जैसे तालिबान पाकिस्तान के सीमांत प्रांतों में। हो सकता है कि हताश आतंकवादी कुछ और हमलों को अंजाम दें, मगर अब वह अपने आस्तित्व को लंबे समय तक कायम नहीं रख पाएंगे।

विकास की धारा
निजी क्षेत्र के सहारे असंतुलित विकास होता है, क्योंकि कोई भी पूंजीपति पिछड़े इलाकों में अपनी पूंजी नहीं फंसाना चाहता, क्योंकि मूलभूत सुविधाएं न होने के कारण यहां उन पर निवेश का बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है और रिटर्न भी देर मिलते हैं। यहां सार्वजनिक निवेश में सबसे बड़ी दुविधा भ्रष्टाचार है। ऐसे में जब महानगरों में निजी क्षेत्र के लिए भी दोहन के लिए ज्यादा कुछ बचा नहीं और यहां प्रतियोगियों के एक साथ सक्रिय होने के कारण लाभ भी घटने लगे हैं, ऐसे में ग्रामीण और छोटे कस्बों की ओर निवेश का प्रवाह करना ही लाभदायक होगा। इसके लिए तैयार कौन होगा? यह देखने वाली बात है। राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण के खुशी-खुशी ठेके लेने वाली कंपनियां क्या ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ऐसा करेंगी। यह मुश्किल है, क्योंकि नेशनल हाइवे पर, जहां रोज लाखों की संख्या में वाहन गुजरते हैं, टोलटैक्स से उनका निवेश मोटा रिटर्न देता है, पर ग्रामीण क्षेत्रों में सबकुछ सार्वजनिक निवेश के ही भरोसे है। सर्वजनिक निवेश, जिसमें टेंडर खुलने से लेकर सड़क बनने और चैक पास होने तक काफी भ्रष्टाचार है। ऐसे में विकास का नया मॉडल तलाशना सबसे बड़ी चुनौती है। कोई भी नेता अगर कहता है कि वह लोगों के आचरण सुधार देगा तो गलत है। ऐसे में कोई नया मॉडल ही तलाशा जाना चाहिए।

महंगाई
आम आदमी पर इसका मनोवैग्यानिक असर ज्यादा है। मुद्रा मात्र विनिमय का साधन है। मुद्रा का अवमूल्यन असल में यह असर पैदा करता है कि उत्पादक का लाभ बढ़ रहा है। इसलिए कीमतें बढ़ती रहती हैं। बढ़ती कीमतें मुद्रा के प्रवाह को तेज करती हैं, मगर ये तब घातक होती हैं, जब निचले स्तर पर परिवर्तन नहीं होता। जब न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी नहीं होती। ऐसे में मजदूरी और वेतन पर निर्वाह करने वाले व्यक्ति के लिए यह सुविधाओं में वास्तविक कटौती होती है। अन्यथा बढ़ती कीमतें लाभ का माहौल बनाते हुए एक-दूसरे के सापेक्ष समान स्तर पर बढ़ती हैं। जैसे पैट्रोल की कीमत बढ़ने पर टैक्सी चालक उसे खुद वहन नहीं करता वहा उसका बोझ ग्राहक पर डालता है। ग्राहक जो सब्जी विक्रेता है, सब्जी के दाम बढ़ाकर इसे आगे करता है, इसी तरह सब्जी का खरीददार ढाबा भी अपने दाम बढ़ता है। ऐसे में वेतनभोगी उपभोक्ता महंगाई के सापेक्ष वेतन बढ़ाने का दबाव डालता है। पूरी व्यवस्था खुद को नए मूल्य के अनुरूप ढाल लेती है। फलों और सब्जियों या अन्य खाद्य पदार्थों के मामले में महंगाई का मतलब इनके उत्पादन और जमाखोरी से भी होता है। जमाखोरी एक पुरानी बीमारी है, जो अब वक्त के साथ कम हो रही है।

क्रमशः

सरकार की चुनौतियां

जनता को धन्यवाद दिया जा सकता है कि इस बार की केंद्र सरकार उसके ही सहयोगियों द्वारा नहीं सताई जाएगी। मंदी के इस दौर में मनमोहन सिंह और आडवाणी में से किसी एक को चुनने का बड़ा अटपटा विकल्प था। जाहिर है जनता ने वही जो एक बच्चा भी करता। यदि मुकाबला मनमोहन सिंह और अरुण शौरी के बीच हुआ होता तो शायद तस्वीर कुछ ओर भी हो सकती थी। आडवाणी जी की हालत ऐसी है कि वह विपक्ष का नेता बनने को भी राजी नहीं हैं। वह शुरू से आदर्शवादी के तौर पर पेश आते रहे हैं। वह एक साथ दो पद नहीं रखते, इसलिए पीएम इन वेटिंग रहते, विपक्ष का नेता बनने में हो सकता है कि उनकी ज्यादा किरकिरी होती। खैर इसे छोड़ें, बात करते हैं नई सरकार की चुनौतियों की-

मजबूत नेता, निर्णायक सरकार
एक निरंकुश तानाशाह काफी मजबूत होता है और सभी निर्णय अकेले करने के कारण निर्णायक भी। लोकतंत्र में नेता नहीं राष्ट्र मजबूत होना चाहिए। सरकार में सर्वसम्मति नहीं तो ज्यादातर की सम्मति से फैसले होने चाहिए। राष्ट्रहित में उनपर बहस होनी चाहिए। इस जीत ने मनमोहन सिंह का भी आत्मविश्वास बढ़ाया है। इससे पहले एटमी डील को लेकर उनका कद काफी बढ़ चुका है। अब लोग उन्हें यस मैडम कहने वाला ही समझें तो वे वहीं हैं, जो अब भी लोकतंत्र में एक तानाशाह ढूंढते हैं, जो चाबुक लेकर सबको हांके। साथ ही उन्हें भी। इतना सब होने के बाबजूद भी मनमोहन सिहं को जनता के बीच अभी लोकप्रिय होना है। नहीं तो उन्हें भी पब्लिक उनके राजनीतिक गुरु की तरह भुला देगी। नरसिम्हाराव ने सबसे कठिन समय में देश संभाला और बहुत सी नई योजनाएं बनाई, मगर इस सबके लिए शायद ही कोई भलामानुस उन्हें याद करेगा। वह राजनीति में भ्रष्टाचार के लिए ही जाने जाएंगे, जबकि उन्होंने बहुत से फैसले ऐसे किए, जो उस समय का जनमानस सोच भी नहीं सकता था और उनका प्रत्यक्ष लाभ देश को मिला भी।

मंत्रिमंडल विस्तार
पिछले २० साल से दबाव की राजनीति केंद्र में हावी थी और मंत्रिपद उसीके तहत बंट रहे थे। इस बार दबाव मुक्त माहोल है। ऐसे में वह छोटे राज्य जिन्हें सांसद संख्या कम होने के कारण बनता हक नहीं मिल पा रहा था, अब इस दिशा में ध्यान देना होगा। रेल, रक्षा, कृषि और वाणिज्य मंत्रालय इस बार पंजाब, हरियाणा, यूपी या महाराष्ट्र को दिया जाना चाहिए। मंत्रालयों का रोटेशन बेहद जरूरी है। मौजूदा हालात को देखते हुए वित्तमंत्रालय के लिए मोंटेक सिंह आहलुवालिया को मनमोहन सिंह की तरह ही राजनीति में लाया जाना चाहिए।

आतंकवाद
आतंकवाद और सांप्रदायिक विचारधार का पतन शुरू हो चुका है। तालिबान पाकिस्तान में अपने आस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं। श्रीलंका लिट्टे से मुक्त हो चुका है। कश्मीर में भी लोकतंत्र के प्रति विश्वास बढ़ रहा है। भाजपा की हार के बाद अल्पसंख्यकों की आस्था भी मजबूत हुई होगी। मोदी अपने गढ़ में सिमट कर रहे गए हैं, जैसे तालिबान पाकिस्तान के सीमांत प्रांतों में। हो सकता है कि हताश आतंकवादी कुछ और हमलों को अंजाम दें, मगर अब वह अपने आस्तित्व को लंबे समय तक कायम नहीं रख पाएंगे।

विकास की धारा
निजी क्षेत्र के सहारे असंतुलित विकास होता है, क्योंकि कोई भी पूंजीपति पिछड़े इलाकों में अपनी पूंजी नहीं फंसाना चाहता, क्योंकि मूलभूत सुविधाएं न होने के कारण यहां उन पर निवेश का बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है और रिटर्न भी देर मिलते हैं। यहां सार्वजनिक निवेश में सबसे बड़ी दुविधा भ्रष्टाचार है। ऐसे में जब महानगरों में निजी क्षेत्र के लिए भी दोहन के लिए ज्यादा कुछ बचा नहीं और यहां प्रतियोगियों के एक साथ सक्रिय होने के कारण लाभ भी घटने लगे हैं, ऐसे में ग्रामीण और छोटे कस्बों की ओर निवेश का प्रवाह करना ही लाभदायक होगा। इसके लिए तैयार कौन होगा? यह देखने वाली बात है। राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण के खुशी-खुशी ठेके लेने वाली कंपनियां क्या ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ऐसा करेंगी। यह मुश्किल है, क्योंकि नेशनल हाइवे पर, जहां रोज लाखों की संख्या में वाहन गुजरते हैं, टोलटैक्स से उनका निवेश मोटा रिटर्न देता है, पर ग्रामीण क्षेत्रों में सबकुछ सार्वजनिक निवेश के ही भरोसे है। सर्वजनिक निवेश, जिसमें टेंडर खुलने से लेकर सड़क बनने और चैक पास होने तक काफी भ्रष्टाचार है। ऐसे में विकास का नया मॉडल तलाशना सबसे बड़ी चुनौती है। कोई भी नेता अगर कहता है कि वह लोगों के आचरण सुधार देगा तो गलत है। ऐसे में कोई नया मॉडल ही तलाशा जाना चाहिए।

महंगाई
आम आदमी पर इसका मनोवैग्यानिक असर ज्यादा है। मुद्रा मात्र विनिमय का साधन है। मुद्रा का अवमूल्यन असल में यह असर पैदा करता है कि उत्पादक का लाभ बढ़ रहा है। इसलिए कीमतें बढ़ती रहती हैं। बढ़ती कीमतें मुद्रा के प्रवाह को तेज करती हैं, मगर ये तब घातक होती हैं, जब निचले स्तर पर परिवर्तन नहीं होता। जब न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी नहीं होती। ऐसे में मजदूरी और वेतन पर निर्वाह करने वाले व्यक्ति के लिए यह सुविधाओं में वास्तविक कटौती होती है। अन्यथा बढ़ती कीमतें लाभ का माहौल बनाते हुए एक-दूसरे के सापेक्ष समान स्तर पर बढ़ती हैं। जैसे पैट्रोल की कीमत बढ़ने पर टैक्सी चालक उसे खुद वहन नहीं करता वहा उसका बोझ ग्राहक पर डालता है। ग्राहक जो सब्जी विक्रेता है, सब्जी के दाम बढ़ाकर इसे आगे करता है, इसी तरह सब्जी का खरीददार ढाबा भी अपने दाम बढ़ता है। ऐसे में वेतनभोगी उपभोक्ता महंगाई के सापेक्ष वेतन बढ़ाने का दबाव डालता है। पूरी व्यवस्था खुद को नए मूल्य के अनुरूप ढाल लेती है। फलों और सब्जियों या अन्य खाद्य पदार्थों के मामले में महंगाई का मतलब इनके उत्पादन और जमाखोरी से भी होता है। जमाखोरी एक पुरानी बीमारी है, जो अब वक्त के साथ कम हो रही है।

क्रमशः

Thursday, May 14, 2009

बात गई अब, १६ मई

जो मतदान के लिए निकले और वे भी जो जिन्होंने सिर्फ छुट्टी मनाई तथा वोट डालने नहीं जा सके, अब १६ मई का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। पर जो वोट डालने गए उनके लिए १६ मई सार्थक है, क्योंकि नतीजे उन्होंने ही पैदा किए। ऐसे में जब देश के बाकी हिस्सों में बहुत कम मतदान होने की खबरें आ रही थीं, चौथे और पांचवें चरण में पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में ६० फीसदी से कहीं ज्यादा वोटिंग हुई। तत्कालीन राजनीतिक आकलन इसका अलग पहलु से किया जा सकता है, मगर इसे गणतंत्र की अवधारणा के मायने में भी देखा जा सकता है।

इतिहास पर नजर डालें तो भारत में ६०० ईसा पूर्व तक हमें गणतंत्र की अवधारणा दिखाई देती है। खासकर उत्तर-पश्चिम के इस हिस्से में जिसे आज पंजाब कहा जाता है छोटे-छोटे कई गणराज्य थे। ऐसे कई लिखित प्रमाण मिलते हैं, जिनमें वाहीक प्रदेश यानी आधुनिक पंजाब में गणराज्यों के होने का पता चलता है। पंजाब में कुरु और मद्र नामक राजतंत्रवादियों के रूप में रहते थे। बाद में ये ही मद्र और कुरु तथा उन्हीं की तरह शिवि, पांचाल, मल्ल और विदेह गणतंत्रात्मक हो गए। पाणिनी ने अष्ठाध्यायी में गण की व्यख्या संघ के रूप में की है। बुद्धकाल तक अनेक गणराज्यों के स्थापित होने के उल्लेख मिलते हैं। भारतीय गणशासन के संबंध में भी पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। गण के निर्माण की इकाई कुल थी। प्रत्येक कुल का एक एक व्यक्ति गणसभा का सदस्य होता था। उसे कुलवृद्ध या पाणिनि के अनुसार गोत्र कहते थे। उसी की संज्ञा वंश्य भी थी। प्राय: ये राजन्य या क्षत्रिय जाति के ही व्यक्ति होते थे। ऐसे कुलों की संख्या प्रत्येक गण में परंपरा से नियत थी, जैसे लिच्छविगण के संगठन में 7707 कुटुंब या कुल सम्मिलित थे। उनके प्रत्येक कुलवृद्ध की संघीय उपाधि राजा होती थी। सभापर्व में गणाधीन और राजाधीन शासन का विवेचन करते हुए स्पष्ट कहा है कि साम्राज्य शासन में सत्ता एक व्यक्ति के हाथ में रहती है। (साम्राज्यशब्दों हि कृत्स्नभाक्) किंतु गण शासन में प्रत्येक परिवार में एक एक राजा होता है। (गृहे गृहेहि राजान: स्वस्य स्वस्य प्रियंकरा:, सभापर्व, 14,2)। ये लोग शांतिकल में कृषि आदि पर निर्भर रहते थे किंतु युद्धकाल में अपने संविधान के अनुसार योद्धा बनकर संग्राम करते थे। इनका राजनीतिक संघटन बहुत दृढ़ था और ये अपेक्षाकृत विकसित थे। ये गणराज्य तिरुहत से लेकर कपिलवस्तु तक पहले हुए थे। बुद्ध स्वयं शाक्यगण में उत्पन्न हुए थे। पाणिनी ने उत्तर-पश्चिम के इन गणराज्यों को आयुधजीवी कहा है। यहां के दो गणराज्यों मालव और क्षुद्रक ने सिकंदर से लोहा लिया था। मालवों के आक्रमण में तो सिकंदर घायल भी हो गया था।

सिकंदर का हमला भारत में गणराज्यों की अवधारणा के लिए घातक साबित हुआ। इस हमले के बाद तानाशाही की वही अवधारणा बलवती हुई, जिसे ४०० ईसा पूर्व अजातशत्रु और वर्षकर अपनाना चाहते थे। चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य ने गणराज्य व्यवस्था को भारत के लिए कमजोरी मानते हुए एक मजबूत शासक की अवधारणा के तहत ज्यादातर गणराज्यों को जीतकर महान मगध साम्राज्य की नींव रखी। इसके बाद हमें गणतंत्र के दर्शन छोटे-छोटे रूपों में होते हैं। अंतिम झलक गुप्त साम्राज्य के उदय काल तक दिखाई पड़ती है। समुद्रगुप्त द्वारा धरणिबंध के उद्देश्य से किए हुए सैनिक अभियान से गणराज्यों का विलय हो गया। अर्वाचीन पुरातत्व के उत्खनन में गणराज्यों के कुछ लेख, सिक्के और मिट्टी की मुहरें प्राप्त हुई हैं। विशेषत: विजयशाली यौधेय गणराज्य के संबंध की कुछ प्रमाणिक सामग्री मिली है। (वा. श्. अ.) भारतीय इतिहास के वैदिक युग में जनों अथवा गणों की प्रतिनिधि संस्थाएँ थीं विदथ, सभा और समिति। आगे उन्हीं का स्वरूपवर्ग, श्रेणी पूग और जानपद आदि में बदल गया। गणतंत्रात्मक और राजतंत्रात्मक परंपराओं का संघर्ष जारी रहा। गणराज्य नृपराज्य और नृपराज्य गणराज्य में बदलते रहे।
सिकंदर के हमले के बाद भी गणराज्यों की आत्मा नहीं दबी। सिकंदर की तलवार, मौर्यों की मार अथवा बाख़्त्री यवनों और शक कुषाणों की आक्रमणकारी बाढ़ उनमें से कमजोरों ही बहा सकी। अपनी स्वतंत्रता का हर मूल्य चुकाने को तैयार मल्लोई (मालवा), यौधेय, मद्र और शिवि पंजाब से नीचे उतरकर राजपूताना में प्रवेश कर गए और शताब्दियों तक आगे भी उनके गणराज्य बने रहे। उन्होंने शाकल आदि अपने प्राचीन नगरों का मोह छोड़ माध्यमिका तथा उज्जयिनी जैसे नए नगर बसाए, अपने सिक्के चलाए और अपने गणों की विजयकामना की। मालव गणतंत्र के प्रमुख विक्रमादित्य ने शकों से मोर्चा लिया, उनपर विजय प्राप्त की, शकारि उपाधि धारण की और स्मृतिस्वरूप 57-56 ई0 पू0 में एक नया संवत् चलाया जो क्रमश:कृतमालव और विक्रम संवत् के नाम से प्रसिद्ध हुआ और जो आज भी भारतीय गणनापद्धति में मुख्य स्थान रखता है। तथापि स्वातंत्र्यभावना की यह अंतिम लौ मात्र थी। गुप्तों के साम्राज्यवाद ने उन सबको समाप्त कर डाला।

इस तरह रोम में जब लोकतंत्र अवधारणा के रूप में पनप रहा था, उससे कहीं पहले प्राचीन पंजाब में यह शैली बन चुका था। इतिहास सिर्फ अवधारणाएं चिन्हित नहीं करता यह संस्कार भी बताता है। आज भी ऐसे लोग मिल जाते हैं, जो यह वकालत करते हैं कि वोट डालने से क्या होगा? कमजोर सरकार चुनकर हम क्या साबित करेंगे। सरदार पटेल और इंदिरागांधी जैसे नेता अब नहीं रहे। वे लोकतंत्र में एक चेहरे के रूप में शासक तलाशते हैं। असल में ये अब भी वही डर ढो रहे हैं, जो सिकंदर के हमले के बाद पैदा हुआ था। ये अजातशत्रु और वर्षकर की उसी विचारधारा को जाने-अनजाने लेकर चल रहे हैं, जिस बुद्ध ने अनुचित बताते हुए नकार दिया था।

Wednesday, May 13, 2009

पंजाब में दिखेगा सिंह इज किंग का दम

सुधीर राघव

पंजाब में एक सिख प्रधानमंत्री के खिलाफ पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी के लिए वोट मांगना शिरोमणि अकाली दल (बादल) के लिए भी आसान नहीं है। वह भी तब जब फिल्म सिंह इज किंग ने यहां अच्छा-खासा बिजनेस किया हो। एसजीपीसी प्रधान अवतार सिंह मक्कड़ यह कहकर जरूर मनमोहन सिंह के खिलाफ आक्रामक हुए थे कि वह असली सिख नहीं हैं, मगर उनकी बात बीच में ही दब गई। अकाली राजनीति के कुशल खिलाड़ी प्रकाश सिंह बादल ने इसे कोई तवज्जो नहीं दी। वजह साफ है कि गलती से भी यह मुद्दा बनता तो नुकसान काफी होता।

शिअद को आडवाणी के नाम की जगह अपने काम पर ज्यादा भरोसा है। ऐन चुनाव के बीच पांचवें वेतन आयोग को मंजूरी दिलाकर बादल सरकार ने कर्मचारियों का गुस्सा काफी हद तक ठंडा कर दिया है। इससे एक बड़ा नुकसान बच गया। पाकिस्तानी पत्रकार अरुसा आलम और कैप्टन अमरिंदर सिंह की नजदीकियां भी अकालियों के लिए एक रोचक मुद्दा हैं, इसके चलते उनकी जनसभाओं की रौनक बढ़ती है और खूब ठहाके लगते हैं। इसके अलावा कांग्रेस में खुली धड़ेबंदी भी हल्का-फुल्का फायदा दिला सकती है। पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और बीबी राजिंदर कौर भट्ठल के बीच खींचतान किसी से छिपी नहीं है।
इसके बावजूद कांग्रेस की सीटें बढ़ेंगी, इसकी पूरी संभावना है, क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ जालंधर और पटियाला से ही जीती थी। फिरोजपुर, बठिंडा, संगरूर, लुधियाना, होशियारपुर, आनंदपुर साहिब में भी कांग्रेस को वोट के लिहाज से लाभ होता दिख रहा है। यहां मुकाबले काफी नजदीकी हैं। ज्यादातर सीटों पर अकाली-भाजपा गठबंधन और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है।
पंजाब में इस बार दो चरणों में मतदान हो रहा है। इसलिए नतीजे कुछ चौंकाने वाले हो सकते हैं। पंजाब के वोटर ज्यादातर मौकों पर एकतरफा जनादेश देते आए हैं और बहादुर लड़ाकों की तरह तख्त पलट में विश्वास रखते हैं। इसलिए पंजाब का चुनावी विश्लेषण कमोबेश ठीक ही बैठता रहा है। हो सकता है कि सभी 13 सीटों पर चुनाव एक साथ होते तो इस बार भी ऐसा होता। पहले चरण में चार सीटों के मतदान में उमड़ी भीड़ संकेत है कि समीकरण बदल सकते हैं। बठिंडा, जहां अमरिंदर और बादल परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर है, वहां करीब 79 फीसदी मतदान हुआ है। अब जिन 9 सीटों पर 13 मई को मतदान होना है, वहां स्थितियां कुछ ऐसी नजर आ रही हैं-

अमृतसर : मुहावरों से ही विरोधियों को चित कर देने वाले और लाफ्टर की दुनिया के गुरु नवजोत सिंह सिद्धू यहां से भाजपा के लिए हैट्रिक बनाने की कोशिश में हैं। उन्होंने 2004 में कांग्रेस के रघुनंदन लाल भाटिया को मात दी थी। मगर एक गैर-इरादतन हत्या के पुराने मामले के चलते उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। बाद में उपचुनाव में फिर से जीते और अब तीसरी बार जीत के लिए मैदान में हैं। इस बार उनका मुकाबला कांग्रेस के उम्मीदवार ओपी सोनी से है। सोनी 1986 में जब अमृतसर के मेयर बने थे तो उन्होंने शहर में काफी विकास कार्य करवाये। यही कारण है कि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को यहां से सिर्फ दो सीटें मिलीं, जिनमें से एक सोनी ने जीती थी। सोनी को परिसीमन से भी कुछ लाभ हो सकता है।

आनंदपुर साहिब : पंजाब में आतंकवाद का सफाया करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू को कांग्रेस ने यहां से उम्मीदवार बनाया है। बिट्टू को राहुल गांधी की पसंद बताया जा रहा है। उन्हें मोहाली और खरड़ से अच्छा-खासा समर्थन मिल सकता है। बिट्टू का प्रिय नारा यहां सिंह इज किंग है। राहुल भी यहां उनके लिए मनमोहन सिंह के नाम पर ही वोट मांग कर गए। दूसरी ओर डॉ. दलजीत सिंह चीमा शिअद और भाजपा के साझे उम्मीदवार हैं। अकाली दल यहां कांग्रेस के खिलाफ 84 के दंगों और जगदीश टाइटलर व सज्जन कुमार की भूमिका को लेकर सवाल खड़ा कर रहा है। इसे लेकर राहुल की रैली से पहले भी विरोध प्रदर्शन किया गया और पुतले फूंके गए। अकाली दल को यहां आनंदपुर साहिब और चमकौर साहिब में अच्छी खासी बढ़त का अनुमान है। यहां 10 उम्मीदवार मैदान में हैं।

गुरदासपुर : यहां से जीत की हैट्रिक बना चुके भाजपा प्रत्याशी और अभिनेता विनोद खन्ना अपनी चौथी जीत के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं। मगर इस बार मुकाबला काफी करीबी और कड़ा है। पिछला चुनाव वह नौशहरा पत्तन का पुल बनने से जीत गए थे। इस बार इस सीमावर्ती इलाके में सड़कें बनवाने पर काफी जोर रहा और कथनौर का पुल बनवाया गया है। विनोद खन्ना को लगता है कि इस बार उनका रास्ता इसी पुल से संसद तक जा सकता है। पर कांग्रेस के प्रताप सिंह बाजवा उन्हें कड़ी टक्कर दे रहे हैं। काहनूवाल से बटाला तक उनकी लोगों पर अच्छी पकड़ है। वैसे बसपा के स्वर्ण सिंह ठाकुर उनके वोट काटेंगे।

जालंधर : यह सीट कांग्रेस का मजबूत किला कही जाती है और शिअद के लिए यह एक प्रयोगशाला है। पिछली बार अकाली-भाजपा की आंधी में भी कांग्रेस के राणा गुरजीत सिंह सीट निकाल ले गए थे। इस बार यह सीट सुरक्षित है। अकाली दल ने राज गायक हंसराज हंस को उम्मीदवार बनाया है। यहां दलित वोट 60 फीसदी से ज्यादा है, मगर वह दो हिस्सों में बंटा है। एक वाल्मिकी समुदाय है, जिससे हंस को काफी उम्मीद है। हंस युवा वोटरों को भी आकर्षित कर रहे हैं, साथ ही उनकी बेदाग छवि भी उन्हें फायदा दे सकती है। मगर वह राजनीति के नए खिलाड़ी हैं। मीडिया के एक हिस्से ने उनका बहिष्कार भी कर रखा है। दूसरी ओर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे मोहिंदर सिंह केपी मैदान में हैं। उन्हें पार्टी के कैडर वोट और रविदास बिरादरी के वोट मिलने की पूरी उम्मीद है। मगर बसपा के सुरजीत सिंह भी उन्हीं की बिरादरी के हैं और उनके वोट काटेंगे।

लुधियाना : अकालियों का यह मजबूत गढ़ इस बार खतरे में बताया जा रहा है। शहर की टूटी सड़कें और गंदगी सबसे बड़ा मुद्दा है। शहर के बीचो-बीच से गुजरने वाले और गंदगी के केंद्र बुड्ढा नाले को हटवाने का वादा राहुल भी अपनी रैली में कर गए हैं। लुधियाना शहर में बंधी इस उम्मीद के चलते कांग्रेस प्रत्याशी मनीष तिवारी अकालियों के इस गढ़ को बेधने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। शिअद ने यहां कांग्रेस छोड़ कर आए गुरचरण सिंह गालिब को मैदान में उतारा है। वह पहले यहां से कांग्रेस के दो बार सांसद रह चुके हैं। यहां कुल 13 उम्मीदवार मैदान में हैं।

खडूर साहिब : चार जिलों के 9 विधानसभा हलकों को मिलाकर इस बार परिसीमन के बाद यह संसदीय क्षेत्र सामने आया है। सफल व्यापारी से सफल राजनेता बने राणा गुरजीत सिंह को कांग्रेस ने इस बार यहां से टिकट दिया है। पिछले चुनाव में वह विपरीत लहर में भी जालंधर से अपना पहला लोकसभा चुनाव जीत गए थे। उससे पहले वह कपूरथला से विधानसभा चुनाव जीते थे। यहां उनका कड़ा मुकाबला शिरोमणि अकाली दल के डॉ. रतन सिंह अजनाला से है। राजनीति में आने से पहले अजनाला एक डॉक्टर के तौर पर सेवारत थे। वह अजनाला क्षेत्र से चार बार विधायक रह चुके हैं। इसलिए यहां मुकबाला काफी कड़ा दिख रहा है तथा बाजी किसी भी ओर पलट सकती है।

होशियारपुर : इस सीट पर भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा है। बसपा भी यहां पर कांग्रेस वोटों में बड़ी सेंध लगाकर मुख्य मुकाबले में रहती है। इसके अलावा वामपथिंयों के कैडर वोट भी समीकरणों को प्रभावित करते हैं। कांग्रेस ने यहां से संतोष चौधरी को मैदान में उतारा है। पिछली बार यहां से भाजपा के अविनाश राय खन्ना ने चुनाव जीता था मगर यह सीट आरक्षित हो जाने से वह इस बार यहां से चुनाव नहीं लड़ सके और भाजपा ने प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी सोम प्रकाश को यहां से प्रत्याशी बनाया है।

फतेहगढ़ साहिब : पूर्व अकाली नेता सुखदेव सिंह लिबड़ा कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। सिंह इज किंग के नारे ने उन्हें लुभाया और जब एटमी डील पर मनमोहन सरकार खतरे में पड़ी तो उन्होंने क्रॉस वोटिंग की। इस डील से कई समीकरण बदले और लिबड़ा कांग्रेस में आ गए और यहां से उन्हें टिकट भी दे दी गई। शिअद ने उनके मुकाबले में यहां लोकसभा के डिप्टी स्पीकर रहे चरणजीत सिंह अटवाल को मैदान में उतारा है। अटवाल को यहां पार्टी वोटों का भरोसा है मगर मान गुट के कुलवंत सिंह संधू कुछ कट्टर वोटरों को लुभा सकते हैं।

फरीदकोट : यह सीट भी आरक्षित है। शिरोमणि अकाली दल ने यहां से परमजीत कौर गुलशन को प्रत्याशी बनाया है। पिछला चुनाव वह बठिंडा लोकसभा सीट से जीती थीं। उन्होंने सीपीआई और कांग्रेस की साझी उम्मीदवार कुशल भौरा को मात दी थी। भौरा इस बार भी सीपीआई की टिकट पर उनके सामने हैं, मगर कांग्रेस ने इस बार अपना अलग उम्मीदवार खड़ा किया है।

Tuesday, May 5, 2009

हरियाणा : ऊंट बीच मा ई डटैगा?

इस दशक में तेज प्रगति के बावजूद विकास हरियाणा में कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। जाति-बिरादरी और भितरघात ही यहां की 10 में से 8 लोकसभा सीटों के नतीजे तय करने वाले हैं। भीषण गर्मी में बिजली-पानी की किल्लत से सब परेशान हैं। इसके अलावा भिवानी और गुड़गांव में परिसीमन अपना असर दिखा सकता है। पिछले चुनाव में 10 में से 9 सीटें जीतने वाली कांग्रेस के लिए पुराना प्रदर्शन दोहराना मुश्किल होगा।

हालांकि मत प्रतिशत की दृष्टि से हरियाणा में तस्वीर बदलने के लिए 6 से 10 फीसदी तक का स्विंग चाहिए, मगर इनेलो-भाजपा गठबंधन, हजकां का उदय और दलित वोटों का ध्रुवीकरण करती बसपा के चलते यह नामुमकिन भी नहीं लगता। इनेलो से गठबंधन का फायदा भाजपा को फरीदाबाद, करनाल और अंबाला में मिल सकता है। नई बनी पार्टी हजकां हिसार, भिवानी और गुड़गांव में मुख्य मुकाबले में है। गुड़गांव और कुरुक्षेत्र में बसपा नतीजे प्रभावित कर सकती है। कुल मिलाकर हरियाणा की लोकसभा सीटों पर मौजूदा परिदृश्य कुछ ऐसा है-:

हिसार : हरियाणा की इस सीट पर सबकी नजरें लगी हैं। 80 के दशक में ताऊ देवी लाल के नीचे से मुख्यमंत्री की कुर्सी खींचकर खुद मुख्यमंत्री बन जाने वाले और 90 के दशक में नरसिम्हाराव की सरकार बचाने के लिए राजनीति के पीएचडी कहे जाने वाले भजन लाल यहां से मैदान में हैं। पर पिछले पांच साल में बहुत कुछ बदला है। यह पुराना कांग्रेसी अब छोटे बेटे कुलदीप के साथ अलग पार्टी बना हरियाणा जनहित कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ रहा है।



बिश्नोई समाज भले ही कुलदीप से उतना खुश न हो मगर अपने नेता के सम्मान से समझौता नहीं करेगा। परिसीमन के बाद आदमपुर और हांसी के हिसार में जुड़ जाने से भजन लाल की जीत की दावेदारी और मजबूत हुई है। यहां की गैरजाट बिरादरियां नतीजे बदल सकती हैं। इस सबके बावजूद भजन लाल की उम्र और सेहत दोनों विपक्ष के लिए मुद्दा हैं। उनके बड़े बेटे चंद्रमोहन के बोए कांटे भी उनकी राह में आ रहे हैं। चांद से शादी कर चर्चा में आई और फिर तलाक से गुस्साई फिजा भी उनके खिलाफ हिसार में प्रचार कर रही हैं। इनेलो के उम्मीदवार संपत्त सिंह जनसभाओं में लोगों से पूछ रहे हैं कि जो ठीक से चल, फिर और बोल नहीं सकता उसे सांसद चुनकर क्या करोगे?



इनेलो का यह कद्दावर नेता कड़े मुकाबलों में जूझने के लिए जाना जाता है। वह कोई बड़ा उलटफेर करने में सक्षम हैं। कांग्रेस के निवर्तमान सांसद जय प्रकाश उर्फ जेपी के लिए इस बार सीट बचाना कड़ी चुनौती है। भजन लाल को जितने भी वोट जाएंगे, उतने ही जेपी कमजोर होंगे। यहां प्रदेश में सबसे ज्यादा कुल 38 उम्मीदवार मैदान में हैं। इनमें 27 निर्दलीय हैं। पर मुख्य मुकाबला तिकोना हो जाए तो भी बहुत है।

रोहतक : यहां हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की प्रतिष्ठा दांव पर है। उनके पुत्र और निवर्तमान सांसद दीपेंद्र हुड्डा कांग्रेस की टिकट पर मैदान में हैं। पिछले चार साल में प्रदेश में सबसे ज्यादा 35 अरब रुपये के विकास कार्य रोहतक में ही करवाए गए हैं। यही वजह कि हुड्डा समर्थक यहां मुकबला एकतरफा तक बता रहे हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस यहां डेढ़ लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीती थी। इस बार इनेलो के नफे सिंह राठी, हजकां के कृष्णमूर्ति हुड्डा सहित कुल 16 उम्मीदवार मैदान में हैं।

अंबाला : यहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस की कुमारी शैलजा और भाजपा के रतन लाल कटारिया में ही दिख रहा है। खेमों में बंटी कांग्रेस शैलजा के लिए भारी पड़ सकती है। कालका के उजड़े व्यापारियों और चंद्रमोहन समर्थकों को मनाना उनके लिए बड़ी चुनौती है। प्रदेशाध्यक्ष फूल चंद मुलाना भी यहां से टिकट के दावेदार थे। अगर शैलजा को यहां से जीत दर्ज करनी है तो इन उलझे समीकरणों को सुलझाना होगा। दूसरी तरफ कटारिया का भरोसा भाजपा और इनेलो वोटों पर है। कांग्रेस के बागियों से भी उन्हें पूरी उम्मीद है। वैसे पिछले चुनाव में शैलजा को यहां से 4 लाख से ज्यादा वोट मिले थे और जीत का अंतर ही दो लाख वोटों से ज्यादा का था। हजकां के दलबीर सिंह वाल्मीकि और बसपा के चंद्रपाल सहित यहां कुल 7 उम्मीदवार मैदान में हैं।

कुरुक्षेत्र : कांग्रेस के निवर्तमान सांसद नवीन जिंदल को इस बार यहां कड़ी मेहनत की जरूरत है। वैसे कैलाशो सैनी के इनेलो छोड़कर कांग्रेस में आने से जिंदल मजबूत हुए हैं। इनेलो के अशोक अरोड़ा और बसपा के गुरुदयाल सैनी मुकाबले को तिकोना बना रहे हैं। हजकां के जसवंत सिंह चीमा सहित कुल 14 उम्मीदवार मैदान में हैं। स्वच्छ छवि और संसदीय क्षेत्र में अपने खर्च पर पिछले पांच साल में लगवाए गए नेत्र चिकित्सा और स्वास्थ्य शिविरों द्वारा जिंदल ने लोगों की काफी सहानुभूति जुटाई है। शहर के लिए कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं ला सके। इसके अलावा पार्टी कार्यकर्ताओं की भी यह शिकायत रही है कि उनकी उपेक्षा होती रही है। परिसीमन में यमुनानगर शहर कुरुक्षेत्र से हटाकर कलायत को शामिल किया गया है। पिछले चुनाव में जिंदल को यमुनानगर से 35 हजार वोटों की लीड मिली थी। वह इस बार नहीं है। पंजाबी समुदाय का वोट इनेलो के अशोक अरोड़ा के लिए काफी मददगार हो सकता है। बसपा उम्मीदवार को अपने कैडर वोट के अलावा अपनी छवि का भी लाभ मिल सकता है। जिंदल को पिछले चुनाव में यहां 3,62054 वोट मिले थे, जबकि इनेलो-भाजपा के वोट जोड़ भी दें तो 3,27764 वोट बनते हैं। इसलिए मुकाबला कांटे का रहेगा मगर तस्वीर बदलने के लिए कम से कम 6 फीसदी का स्विंग चाहिए।

सोनीपत : यहां उलटफेर की काफी संभावना है। कांग्रेस के लिए यहां विकास एक बड़ा मुद्दा है, जबकि विपक्ष बिजली-पानी की किल्लत और सरकारी नौकरियों में भाई-भतीजावाद को मुद्दा बनाए हुए है। निवर्तमान सांसद भाजपा के किशन सिंह सांगवान चौथी बार सांसद बनने के लिए मैदान में हैं। मगर विधानसभा उपचुनाव में इसी क्षेत्र के गोहाना हलके से उनके बेटे प्रदीप सांगवान ने चुनाव लड़ा और जमानत तक नहीं बचा पाए। कांग्रेसी इससे उत्साहित हैं। कहने को वह इनेलो-भाजपा के संयुक्त उम्मीदवार हैं, मगर इनेलो के वोट उन्हें मिल पाएंगे, इसमें शक है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि सांगवान ने प्रदेश में इनेलो-भाजपा समझौते का विरोध किया था। कांग्रेस के जितेंद्र मलिक को परिसीमन का भी लाभ मिल सकता है। जींद का हलका जुड़ने से कांग्रेस को फायदा होने की उम्मीद है। बसपा के देवराज दीवान सहित यहां कुल 2१ प्रत्याशी मैदान में हैं, इनमें 7 निर्दलीय हैं।
भिवानी-महेंद्रगढ़ : परिसीमन के चलते इस सीट से इस बार आश्चर्यजनक परिणाम सामने आ सकते हैं। भिवानी शहर में विकास मुख्य मुद्दा हो सकता है, मगर और जगह बिरादरी के हिसाब से ही वोट तय होंगे। निवर्तमान सांसद कुलदीप बिश्नोई अलग पार्टी बनाकर भी यहां से खुद चुनाव नहीं लड़ रहे। सड़कों, बिजली-पानी का बुरा हाल है। जनता उनसे नाराज है, मगर उनकी पार्टी के राव नरेंद्र को महेंद्रगढ़ के यादव वोट एक मुश्त मिल सकते हैं। बंसी लाल की पुत्रवधु और हरियाणा की पर्यटन एवं वन राज्य मंत्री किरण चौधरी अपनी बेटी श्रुति के लिए टिकट ले आने में सफल रही हैं। बंसी लाल की विरासत और किरण चौधरी की मेहनत ही श्रुति का मजबूत पक्ष है। कुलदीप से खफा वोट भी कांग्रेस को मिल सकते हैं। मगर पार्टी में खेमेबाजी यहां भी है। इनेलो के अजय चौटाला एक बार फिर कड़ी मेहनत कर रहे हैं। मगर बाहरी उम्मीदवार का मुद्दा उनके खिलाफ जा सकता है। बसपा ने यहां पूर्व मंत्री ठाकुर बीर सिंह के बेटे बिक्रम सिंह को टिकट दिया है। शहर और आसपास के गांवों के ठाकुर वोट उन्हें मिलेंगे। यहां 18 निर्दलीय सहित 29 प्रत्याशी हैं।

करनाल : यदि कांग्रेस यहां इस बार चुनाव हारती है तो विरोधियों की जीत का श्रेय पूरी तरह से पार्टी की खेमेबाजी को जाएगा। पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा-इनेलो के संयुक्त उम्मीदवार आईडी स्वामी का जोश बढ़ाने के लिए काफी कारक इस बार यहां मौजूद हैं। निवर्तमान सांसद अरविंद शर्मा हाईकमान से सीधे जाकर टिकट लाने में कामयाब रहे हैं। वैसे भी कांग्रेस के पास यहां उनसे बेहतर उम्मीदवार नहीं था, मगर इस बार उनके लिए चुनौतियां कई हैं। इनेलो-भाजपा एकजुट हैं तथा हजकां और बसपा भी उनके ही वोटों में सेंध लगाने वाली हैं। यहां 23 प्रत्याशी हैं। इनमें 12 निर्दलीय हैं।
सिरसा : यहां कांग्रेस उम्मीदवार अशोक तंवर राहुल गांधी की पसंद बताए जाते हैं। उनके लिए मुख्यमंत्री हुड्डा खुद 4 बार प्रचार करने आ चुके हैं। इनेलो के डॉ. सीताराम को पार्टी के कैडर वोट और हजकां के राजेंद्र धानक को बिरादरी के वोटों पर भरोसा है। बसपा के राजेश वैद सहित यहां से कुल 15 उम्मीदवार मैदान में हैं। इनमें 7 निर्दलीय हैं।
गुड़गांव-रेवाड़ी : यहां से कुछ चौंकाने वाले नतीजे मिलने के संकेत हैं। यहां यादव वोट कांग्रेस के राव इंद्रजीत, हजकां के राव नरवीर सिंह और भाजपा की सुधा यादव के बीच बंटेगा। इसके विपरीत मुस्लिम वोट एक मुश्त बसपा के जाकिर हुसैन को मिल सकते हैं। अहीर और मुस्लिम वोट करीब-करीब बराबर हैं। ऐसे में अन्य बिरादरियों का झुकाव जिसकी तरफ हुआ वह सीट निकाल लेगा। मुख्य मुकाबला यहां कांग्रेस, बसपा और हजकां के बीच ही माना जा रहा है। यहां 24 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें 9 निर्दलीय हैं।

फरीदाबाद : निवर्तमान सांसद कांग्रेस के अवतार सिंह भड़ाना के लिए इस बार कई मुश्किलें हैं। पार्टी के तीन विधायक तो उन्हें टिकट देने का खुला विरोध भी कर चुके हैं। भाजपा-इनेलो के साझे उम्मीदवार रामचंद्र बैंदा के लिए परिस्थितियां अनुकूल दिख रही हैं। इनेलो का कैडर वोट उन्हें मिलने की काफी संभावना है, इससे वह यहां उलटफेर कर सकते हैं। यहां से बसपा के चेतन और हजकां के चंद्र सहित कुल 23 प्रत्याशी मैदान में हैं। इनमें 10 निर्दलीय हैं।

सुधीर राघव

हरियाणा : ऊंट बीच मा ई डटैगा?

इस दशक में तेज प्रगति के बावजूद विकास हरियाणा में कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। जाति-बिरादरी और भितरघात ही यहां की 10 में से 8 लोकसभा सीटों के नतीजे तय करने वाले हैं। भीषण गर्मी में बिजली-पानी की किल्लत से सब परेशान हैं। इसके अलावा भिवानी और गुड़गांव में परिसीमन अपना असर दिखा सकता है। पिछले चुनाव में 10 में से 9 सीटें जीतने वाली कांग्रेस के लिए पुराना प्रदर्शन दोहराना मुश्किल होगा।

हालांकि मत प्रतिशत की दृष्टि से हरियाणा में तस्वीर बदलने के लिए 6 से 10 फीसदी तक का स्विंग चाहिए, मगर इनेलो-भाजपा गठबंधन, हजकां का उदय और दलित वोटों का ध्रुवीकरण करती बसपा के चलते यह नामुमकिन भी नहीं लगता। इनेलो से गठबंधन का फायदा भाजपा को फरीदाबाद, करनाल और अंबाला में मिल सकता है। नई बनी पार्टी हजकां हिसार, भिवानी और गुड़गांव में मुख्य मुकाबले में है। गुड़गांव और कुरुक्षेत्र में बसपा नतीजे प्रभावित कर सकती है। कुल मिलाकर हरियाणा की लोकसभा सीटों पर मौजूदा परिदृश्य कुछ ऐसा है-:

हिसार : हरियाणा की इस सीट पर सबकी नजरें लगी हैं। 80 के दशक में ताऊ देवी लाल के नीचे से मुख्यमंत्री की कुर्सी खींचकर खुद मुख्यमंत्री बन जाने वाले और 90 के दशक में नरसिम्हाराव की सरकार बचाने के लिए राजनीति के पीएचडी कहे जाने वाले भजन लाल यहां से मैदान में हैं। पर पिछले पांच साल में बहुत कुछ बदला है। यह पुराना कांग्रेसी अब छोटे बेटे कुलदीप के साथ अलग पार्टी बना हरियाणा जनहित कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ रहा है।



बिश्नोई समाज भले ही कुलदीप से उतना खुश न हो मगर अपने नेता के सम्मान से समझौता नहीं करेगा। परिसीमन के बाद आदमपुर और हांसी के हिसार में जुड़ जाने से भजन लाल की जीत की दावेदारी और मजबूत हुई है। यहां की गैरजाट बिरादरियां नतीजे बदल सकती हैं। इस सबके बावजूद भजन लाल की उम्र और सेहत दोनों विपक्ष के लिए मुद्दा हैं। उनके बड़े बेटे चंद्रमोहन के बोए कांटे भी उनकी राह में आ रहे हैं। चांद से शादी कर चर्चा में आई और फिर तलाक से गुस्साई फिजा भी उनके खिलाफ हिसार में प्रचार कर रही हैं। इनेलो के उम्मीदवार संपत्त सिंह जनसभाओं में लोगों से पूछ रहे हैं कि जो ठीक से चल, फिर और बोल नहीं सकता उसे सांसद चुनकर क्या करोगे?



इनेलो का यह कद्दावर नेता कड़े मुकाबलों में जूझने के लिए जाना जाता है। वह कोई बड़ा उलटफेर करने में सक्षम हैं। कांग्रेस के निवर्तमान सांसद जय प्रकाश उर्फ जेपी के लिए इस बार सीट बचाना कड़ी चुनौती है। भजन लाल को जितने भी वोट जाएंगे, उतने ही जेपी कमजोर होंगे। यहां प्रदेश में सबसे ज्यादा कुल 38 उम्मीदवार मैदान में हैं। इनमें 27 निर्दलीय हैं। पर मुख्य मुकाबला तिकोना हो जाए तो भी बहुत है।

रोहतक : यहां हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की प्रतिष्ठा दांव पर है। उनके पुत्र और निवर्तमान सांसद दीपेंद्र हुड्डा कांग्रेस की टिकट पर मैदान में हैं। पिछले चार साल में प्रदेश में सबसे ज्यादा 35 अरब रुपये के विकास कार्य रोहतक में ही करवाए गए हैं। यही वजह कि हुड्डा समर्थक यहां मुकबला एकतरफा तक बता रहे हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस यहां डेढ़ लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीती थी। इस बार इनेलो के नफे सिंह राठी, हजकां के कृष्णमूर्ति हुड्डा सहित कुल 16 उम्मीदवार मैदान में हैं।

अंबाला : यहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस की कुमारी शैलजा और भाजपा के रतन लाल कटारिया में ही दिख रहा है। खेमों में बंटी कांग्रेस शैलजा के लिए भारी पड़ सकती है। कालका के उजड़े व्यापारियों और चंद्रमोहन समर्थकों को मनाना उनके लिए बड़ी चुनौती है। प्रदेशाध्यक्ष फूल चंद मुलाना भी यहां से टिकट के दावेदार थे। अगर शैलजा को यहां से जीत दर्ज करनी है तो इन उलझे समीकरणों को सुलझाना होगा। दूसरी तरफ कटारिया का भरोसा भाजपा और इनेलो वोटों पर है। कांग्रेस के बागियों से भी उन्हें पूरी उम्मीद है। वैसे पिछले चुनाव में शैलजा को यहां से 4 लाख से ज्यादा वोट मिले थे और जीत का अंतर ही दो लाख वोटों से ज्यादा का था। हजकां के दलबीर सिंह वाल्मीकि और बसपा के चंद्रपाल सहित यहां कुल 7 उम्मीदवार मैदान में हैं।

कुरुक्षेत्र : कांग्रेस के निवर्तमान सांसद नवीन जिंदल को इस बार यहां कड़ी मेहनत की जरूरत है। वैसे कैलाशो सैनी के इनेलो छोड़कर कांग्रेस में आने से जिंदल मजबूत हुए हैं। इनेलो के अशोक अरोड़ा और बसपा के गुरुदयाल सैनी मुकाबले को तिकोना बना रहे हैं। हजकां के जसवंत सिंह चीमा सहित कुल 14 उम्मीदवार मैदान में हैं। स्वच्छ छवि और संसदीय क्षेत्र में अपने खर्च पर पिछले पांच साल में लगवाए गए नेत्र चिकित्सा और स्वास्थ्य शिविरों द्वारा जिंदल ने लोगों की काफी सहानुभूति जुटाई है। शहर के लिए कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं ला सके। इसके अलावा पार्टी कार्यकर्ताओं की भी यह शिकायत रही है कि उनकी उपेक्षा होती रही है। परिसीमन में यमुनानगर शहर कुरुक्षेत्र से हटाकर कलायत को शामिल किया गया है। पिछले चुनाव में जिंदल को यमुनानगर से 35 हजार वोटों की लीड मिली थी। वह इस बार नहीं है। पंजाबी समुदाय का वोट इनेलो के अशोक अरोड़ा के लिए काफी मददगार हो सकता है। बसपा उम्मीदवार को अपने कैडर वोट के अलावा अपनी छवि का भी लाभ मिल सकता है। जिंदल को पिछले चुनाव में यहां 3,62054 वोट मिले थे, जबकि इनेलो-भाजपा के वोट जोड़ भी दें तो 3,27764 वोट बनते हैं। इसलिए मुकाबला कांटे का रहेगा मगर तस्वीर बदलने के लिए कम से कम 6 फीसदी का स्विंग चाहिए।

सोनीपत : यहां उलटफेर की काफी संभावना है। कांग्रेस के लिए यहां विकास एक बड़ा मुद्दा है, जबकि विपक्ष बिजली-पानी की किल्लत और सरकारी नौकरियों में भाई-भतीजावाद को मुद्दा बनाए हुए है। निवर्तमान सांसद भाजपा के किशन सिंह सांगवान चौथी बार सांसद बनने के लिए मैदान में हैं। मगर विधानसभा उपचुनाव में इसी क्षेत्र के गोहाना हलके से उनके बेटे प्रदीप सांगवान ने चुनाव लड़ा और जमानत तक नहीं बचा पाए। कांग्रेसी इससे उत्साहित हैं। कहने को वह इनेलो-भाजपा के संयुक्त उम्मीदवार हैं, मगर इनेलो के वोट उन्हें मिल पाएंगे, इसमें शक है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि सांगवान ने प्रदेश में इनेलो-भाजपा समझौते का विरोध किया था। कांग्रेस के जितेंद्र मलिक को परिसीमन का भी लाभ मिल सकता है। जींद का हलका जुड़ने से कांग्रेस को फायदा होने की उम्मीद है। बसपा के देवराज दीवान सहित यहां कुल 2१ प्रत्याशी मैदान में हैं, इनमें 7 निर्दलीय हैं।
भिवानी-महेंद्रगढ़ : परिसीमन के चलते इस सीट से इस बार आश्चर्यजनक परिणाम सामने आ सकते हैं। भिवानी शहर में विकास मुख्य मुद्दा हो सकता है, मगर और जगह बिरादरी के हिसाब से ही वोट तय होंगे। निवर्तमान सांसद कुलदीप बिश्नोई अलग पार्टी बनाकर भी यहां से खुद चुनाव नहीं लड़ रहे। सड़कों, बिजली-पानी का बुरा हाल है। जनता उनसे नाराज है, मगर उनकी पार्टी के राव नरेंद्र को महेंद्रगढ़ के यादव वोट एक मुश्त मिल सकते हैं। बंसी लाल की पुत्रवधु और हरियाणा की पर्यटन एवं वन राज्य मंत्री किरण चौधरी अपनी बेटी श्रुति के लिए टिकट ले आने में सफल रही हैं। बंसी लाल की विरासत और किरण चौधरी की मेहनत ही श्रुति का मजबूत पक्ष है। कुलदीप से खफा वोट भी कांग्रेस को मिल सकते हैं। मगर पार्टी में खेमेबाजी यहां भी है। इनेलो के अजय चौटाला एक बार फिर कड़ी मेहनत कर रहे हैं। मगर बाहरी उम्मीदवार का मुद्दा उनके खिलाफ जा सकता है। बसपा ने यहां पूर्व मंत्री ठाकुर बीर सिंह के बेटे बिक्रम सिंह को टिकट दिया है। शहर और आसपास के गांवों के ठाकुर वोट उन्हें मिलेंगे। यहां 18 निर्दलीय सहित 29 प्रत्याशी हैं।

करनाल : यदि कांग्रेस यहां इस बार चुनाव हारती है तो विरोधियों की जीत का श्रेय पूरी तरह से पार्टी की खेमेबाजी को जाएगा। पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा-इनेलो के संयुक्त उम्मीदवार आईडी स्वामी का जोश बढ़ाने के लिए काफी कारक इस बार यहां मौजूद हैं। निवर्तमान सांसद अरविंद शर्मा हाईकमान से सीधे जाकर टिकट लाने में कामयाब रहे हैं। वैसे भी कांग्रेस के पास यहां उनसे बेहतर उम्मीदवार नहीं था, मगर इस बार उनके लिए चुनौतियां कई हैं। इनेलो-भाजपा एकजुट हैं तथा हजकां और बसपा भी उनके ही वोटों में सेंध लगाने वाली हैं। यहां 23 प्रत्याशी हैं। इनमें 12 निर्दलीय हैं।
सिरसा : यहां कांग्रेस उम्मीदवार अशोक तंवर राहुल गांधी की पसंद बताए जाते हैं। उनके लिए मुख्यमंत्री हुड्डा खुद 4 बार प्रचार करने आ चुके हैं। इनेलो के डॉ. सीताराम को पार्टी के कैडर वोट और हजकां के राजेंद्र धानक को बिरादरी के वोटों पर भरोसा है। बसपा के राजेश वैद सहित यहां से कुल 15 उम्मीदवार मैदान में हैं। इनमें 7 निर्दलीय हैं।
गुड़गांव-रेवाड़ी : यहां से कुछ चौंकाने वाले नतीजे मिलने के संकेत हैं। यहां यादव वोट कांग्रेस के राव इंद्रजीत, हजकां के राव नरवीर सिंह और भाजपा की सुधा यादव के बीच बंटेगा। इसके विपरीत मुस्लिम वोट एक मुश्त बसपा के जाकिर हुसैन को मिल सकते हैं। अहीर और मुस्लिम वोट करीब-करीब बराबर हैं। ऐसे में अन्य बिरादरियों का झुकाव जिसकी तरफ हुआ वह सीट निकाल लेगा। मुख्य मुकाबला यहां कांग्रेस, बसपा और हजकां के बीच ही माना जा रहा है। यहां 24 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें 9 निर्दलीय हैं।

फरीदाबाद : निवर्तमान सांसद कांग्रेस के अवतार सिंह भड़ाना के लिए इस बार कई मुश्किलें हैं। पार्टी के तीन विधायक तो उन्हें टिकट देने का खुला विरोध भी कर चुके हैं। भाजपा-इनेलो के साझे उम्मीदवार रामचंद्र बैंदा के लिए परिस्थितियां अनुकूल दिख रही हैं। इनेलो का कैडर वोट उन्हें मिलने की काफी संभावना है, इससे वह यहां उलटफेर कर सकते हैं। यहां से बसपा के चेतन और हजकां के चंद्र सहित कुल 23 प्रत्याशी मैदान में हैं। इनमें 10 निर्दलीय हैं।

सुधीर राघव