Wednesday, July 30, 2008

इस्मीत तुम तो अमर रहोगे



इस्मीत तुमने आवाजों का समंदर पर किया

तुम वो जहाजी थे जिसने सुरों के तालाबों को बाँध लिया अपनी लय में

तुम तैराक थे धुन की धाराओं के

तब वह कौन था जो डूब गया

एक होटल के स्वीमिंगपूल में

इस्मीत तुम तो अमर रहोगे

संगीत की हर धड़कन में

-सुधीर राघव

रुबाई और उमर खैय्याम

रुबाई के बारे में हम मशहूर शायर निदा फाजली के लेख से जान सकते हैं। बीबीसी पर यह लेख उपलब्ध है। वे लिखते हैं, रुबाई चार पंक्तियों की कविता है जिसकी पहली दो और चौथी पंक्तियाँ तुकात्मक होती है और तीसरी लाइन आज़ाद रखी जा सकती है। इस छंद के बारे में कहा जाता है, 251 ईसवी सन में अरब के एक इलाक़े में सुल्तान याकूब का लड़का गोलियों से खेल रहा था। एक गोली के लुढ़कने पर उसने ख़ुशी में कुछ लफ्ज़ कहे थे। इन लफ्ज़ों में एक ख़ास लय थी। उस समय के शायर रोदकी ने इसी लय में तीन पंक्तियाँ जोड़ दीं और इस तरह रुबाई और इस का छंद वजूद में आया। पहली रुबाई अरब की देन ज़रूर है, लेकिन इस विधा को शोहरत ईरान में मिली। ईरान में 12वीं सदी, उमर ख़ैयाम की रुबाइयों के लिए मशहूर है।
निदा फाजली हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला को खैयाम की रूबाई से ही प्रेरित मानते हैं। साथ ही यह लिखते हैं - हरिवंश राय बच्चन भी ईरान के इस बोहेमियन महाकवि के जादू से नहीं बच सके। बच्चन जी की मुलाक़ात उमर ख़ैयाम की रूबाइयो से, फारसी भाषा में नहीं हुई। वह उमर खैयाम से फिट्ज जेराल्ड के अनुदित अंग्रेज़ी रूप के माध्यम से मिले थे। बच्चन जी अंग्रेज़ी के शिक्षक थे और अंग्रेज़ी के कवि यीट्स पर उन्होंने कैब्रिज से डॉक्ट्रेट की डिग्री भी प्राप्त की थी. शेक्सपियर के कई नाटकों का हिंदी में अनुवाद भी किया था।
जेराल्ड की तरह उन्होंने भी रुबाई के विशेष छंद को छोड़कर अपने ही मीटर में मधुशाला की चौपाइयों की रचना की है। ये भावभूमि के स्तर पर भी खैयाम के प्रतीकों और संकेतों के बावजूद ख़ैयाम से अलग भी है और छह सौ साल में जो समय बदला है, उस बदलाव से जुड़ी हुई भी हैं।
उमर खैयाम के बारे में ब्लॉग काकेश की कतरनें में एक बहुत अच्छा लेख है। इसके कुछ अंश इस तरह हैं- उमर खैय्याम (कुछ लोग ओमार खैय्याम भी कहते हैं) का जन्म 18 मई 1048 को पर्शिया या फारस (जिसे अब ईरान कहा जाता है) में हुआ था। मूल जन्म स्थान निशापुर था जिसका जिक्र उनकी शायरी में कई बार आया है.उनका पूरा नाम ग़ियाद अल-दिन अबुह फतेह उमर इब्न अब्राहिम अल खय्यामी था.खय्याम का शाब्दिक अर्थ होता है “तंबू बनाने वाला”। खैय्याम केवल शायर ही नहीं थे वरन एक भौतिक विज्ञानी, गणितज्ञ,खगोलशास्त्री और दार्शनिक भी थे. उमर खैय्याम अपने जीवन में अधिकतर निशापुर और समरकंद में ही रहे हाँलाकि उनका बचपन का कुछ हिस्सा बाल्ख (अफगानिस्तान) में भी बीता। उमर खैय्याम ने एक गणितज्ञ के रूप में बीजगणित के अनेक नये सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। उन्होने कुछ पुस्तकें भी लिखी जिसमें उन्होने पास्कल और युक्लिड के सिद्धांतों को सरलीकृत किया. उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को यूरोप में खूब सराहा गया. बीजगणित के अलावा उन्होने ज्यामिति (geometry) में भी योगदान दिया। उमर द्वारा तैयार कैलेंडर ही आज के ईरानी कैलेंडर का आधार रहा है जो अभी भी ईरान और अफगानिस्तान में प्रयोग में लाया जाता है।

Tuesday, July 29, 2008

ग़ज़ल

गजल का जन्म फारसी में हुआ और उसे उर्दू कवियों ने दिशा दी। गजल मिर्जा गालिब के साथ हर गली-कूचे तक पहुंची। गजल की शुरुआत खानकाह और आश्रम से हुई। नवीं शताब्दी हिजरी में गुजरात एवं दक्षिण में गंजल विधा को मान्यता दी गयी। यों तो गंजल अरबी शब्द है जिसका अर्थ है कातना-बुनना, किंतु कुछेक, गंजलगो के अनुसार गंजल फारसी का शब्द है जिसकी व्युत्पत्ति 'गजाला' शब्द से हुई। गजाला अर्थात् 'मृगनयनी' या 'मृग शावक'। अरब मुल्क में गंजल को कसीदा कहा गया, जबकि उर्दू कविता की किस्मों में गंजल के साथ मसनवी, कसीदा, कता, नज्म और रूबाई काव्य विधाएं हैं। कसीदा में किसी की प्रशस्ति में कुछ कहना है तो गंजल की एक जमीन पर कई-कई बातें कही जा सकती हैं। अर्थात जितनी बातें उतने शेर। उर्दू गजल की बुनियादें अमीर खुसरो से मिलती हैं। उनकी भाषा में अवधि और फारसी का पुट है। अमीर खुसरो के बाद उर्दू शायरी बाकायदा कुली कुतुबशाह, वली दकनी, मीर, सौदा, गालिब से होती हुई पंडित ब्रजनारायण चकबस्त, फिराक गोरखपुरी, तब्बू राम, मिलसयानी, मजरूह सुल्तानपुरी और हजारों नाम हैं जिनकी कलम से सजती-संवरती आज उस मुकाम पर पहुंची है जहां रंग-रूप रस और राग का व्यक्तिकरण है। फारसी में गज़ल के लिए कहा गया है 'बाजनान गुफ्तगू' अर्थात औरत के साथ बातचीत। उसे यों भी परिभाषित किया जा सकता है - 'सुखान अज जनान' या 'अज माशूक गुफ्तगू' यानी के औरत के बारे में बातचीत करना। प्रेमी-प्रेमिका की बतकही। उर्दू ग़ज़ल अपनी लोकप्रियता के कारण दूसरी भाषाओं के द्वारों पर दस्तकें देती हुई फारसी के दायरों से निकल कर और लश्करी जुबान में ढलकर हिन्दी एवं हिन्दीतर भाषाओं - गुजराती, मराठी, पंजाबी और राजस्थानी आदि में भी लिखी जाने लगी। फारसी गजल ने भी घटक-समूह (अर्कान) अरबी से उधार लिए। गजल उर्दू की बन गई, उसी प्रकार हिन्दी-काव्य में आकर गजल अब हिन्दी की बन गई है। आज हिन्दी काव्य-जगत में गजल को लिखने, प्रयोग करने और अपनाने की जो होड लगी है, वह अभूतपूर्व ही नहीं, अप्रत्याशित भी है। हर स्तर के कवि गजल को मुख्य शैली के रूप में अपना रहे हैं। फारसी गजल ने भी घटक-समूह (अर्कान) अरबी से उधार लिए। गजल उर्दू की बन गई, उसी प्रकार हिन्दी-काव्य में आकर गजल अब हिन्दी की बन गई है। आज हिन्दी काव्य-जगत में गजल को लिखने, प्रयोग करने और अपनाने की जो होड लगी है, वह अभूतपूर्व ही नहीं, अप्रत्याशित भी है। हर स्तर के कवि गजल को मुख्य शैली के रूप में अपना रहे हैं। इसी तरह, मतला, मक्ता, रदीफ, काफया की तकनीक के आधार पर भी हिन्दी काव्य में गजल पर कटु टिप्पणियाँ होती रही हैं। मतला, रदीफ, काफया, अरूज (पिंगल-शास्त्र) आदि का विधिवत् पालन करते हुए भी हिन्दी-काव्य में गजल का सुभाव (मिजाज), भाव-भंगिमा, शब्द-सौष्ठव उर्दू गजल से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। हिन्दी गजल के पास अपनी विराट शब्द-संपदा है, मिथक हैं, मुहावरे हैं, बिम्ब हैं, प्रतीक है, रदीफ है, काफए हैं। इस प्रकार, समकालीन हिन्दी-काव्य में गजल पारम्परिक गजल की काव्य-रूढयों से मुक्त होने का प्रयास भी है तथा नए शिल्प और विषय का उत्तरोत्तर विकास भी हमें इसमें परिलक्षित होता है। दुष्यंत कुमार और माधव कौशिक ने इसे हिंदी में नए आयाम दिए।

आज देख सरिता

देख सरिता
तेरी बेटियां आज अनाथ हो गईं
उनका बाप भी मर गया
वो बड़ी होंगी तो उनकी संवेदनाएं कैसे जिंदा रहेंगी
तूने गलत किया था
तेरी बेटियां अनाथ हो गईं
आज देख सरिता

उसे दूसरी बीवी मिल जाएगी
दूसरे बच्चे मिल जाएंगे
तेरे दोषी भी एक दिन छूट जाएंगे
तूने खुद की जान नहीं दी अपनी बेटियों की जान ली है सरिता
तेरी बेटियां अनाथ हो गईं
आज देख सरिता

तेरे प्रेम का किनारा तेरी मौत था
शायद कइयों को सीख मिली होगी
न्याय के दीए का तेल खत्म हो चुका है
न्याय की उम्मीद तेरे साथ ही रुख्सत हुई
तूने मासूमों को सजा दी है सरिता
तेरी बेटियां अनाथ हो गईं
आज देख सरिता

Monday, July 28, 2008

गीत था प्रेम का

हमने फूलों से सुना
पत्तियों से सुना
आसमान ने गाया
धरती ने सुना
गीत था प्रेम का
प्रेम से सुना
हवा जा रही थी
यही गा रही थी
रोक कर उसे
हमने ये सुना
गीत था प्रेम का
प्रेम से सुना
परिंदों ने गाया
सब उसकी है माया
मोन ने गाया
स्वर ने सुना
गीत था प्रेम का
प्रेम से सुना।
-सुधीर राघव

अमीर खुसरो

अमीर खुसरो का जन्म १२५३ ईश्वी में हुआ। इनका वास्तविक नाम था - अबुल हसन यमीनुद्दीन मुहम्मद। खुसरो दहलवी का जन्म उत्तर-प्रदेश के एटा जिले के पटियाली नामक ग्राम में गंगा किनारे हुआ था। गाँव पटियाली उन दिनों मोमिनपुर या मोमिनाबाद के नाम से जाना जाता था। इस गाँव में अमीर खुसरो के जन्म की बात हुमायूँ काल के हामिद बिन फ़जलुल्लाह जमाली ने अपने ऐतिहासिक ग्रंथ 'तज़किरा सैरुल आरफीन' में सबसे पहले कही। अमीर खुसरो को बचपन से ही कविता करने का शौक़ था। बादशाह जलालुद्दीन फ़ीरोज़ खिलजी ने अमीर खुसरो की एक चुलबुली फ़ारसी कविता से प्रसन्न होकर उन्हें 'अमीर' का ख़िताब दिया था जो उन दिनों बहुत ही इज़ज़त की बात थी।अमीर खुसरो की माँ दौलत नाज़ हिन्दू (राजपूत) थीं। ये दिल्ली के एक रईस अमीर एमादुल्मुल्क की पुत्री थीं। ये बादशाह बलबन के युद्ध मंत्री थे। ये राजनीतिक दवाब के कारण नए-नए मुसलमान बने थे। इस्लाम धर्म ग्रहण करने के बावजूद इनके घर में सारे रीति-रिवाज हिन्दुओं के थे। खुसरो के ननिहाल में गाने-बजाने और संगीत का माहौल था। खुसरो के नाना को पान खाने का बेहद शौक था। इस पर बाद में खुसरो ने 'तम्बोला' नामक एक मसनवी भी लिखी। इस मिले जुले घराने एवं दो परम्पराओं के मेल का असर किशोर खुसरो पर पड़ा। जब खुसरो पैदा हुए थे तब इनके पिता इन्हें एक कपड़े में लपेट कर एक सूफ़ी दरवेश के पास ले गए थे। दरवेश ने नन्हे खुसरो के मासूम और तेजयुक्त चेहरे के देखते ही तत्काल भविष्यवाणी की थी - "आवरदी कसे राके दो कदम। अज़ खाकानी पेश ख्वाहिद बूद।" अर्थात तुम मेरे पास एक ऐसे होनहार बच्चे को लाए हो खाकानी नामक विश्व प्रसिद्ध विद्वान से भी दो कदम आगे निकलेगा। चार वर्ष की अल्प आयु में ही खुसरो अपने पिता के साथ दिल्ली आए और आठ वर्ष की अवस्था तक अपने पिता और भाइयों से शिक्षा पाते रहे। अमीर खुसरो के पहले भाई एज्जुद्दीन (अजीउद्दीन) (इजजुद्दीन) अली शाह (अरबी-फारसी विद्वान) थे। दूसरे भाई हिसामुद्दीन कुतलग अहमद (सैनिक) थे। तीन भाइयों में अमीर खुसरो सबसे अधिक तीव्र बुद्धि वाले थे। अपने ग्रंथ गुर्रतल कमाल की भूमिका में अमीर खुसरो ने अपने पिता को उम्मी अर्थात् अनपढ़ कहा है। लेकिन अमीर सैफुद्दीन ने अपने सुपुत्र अमीर खुसरो की शिक्षा-दीक्षा का बहुत ही अच्छा (नायाब) प्रबंध किया था। अमीर खुसरो की प्राथमिक शिक्षा एक मकतब (मदरसा) में हुई। वे छ: बरस की उम्र से ही मदरसा जाने लगे थे। उनके समस्त परिवार ने औलिया साहब से धर्मदीक्षा ली थी। उस समय खुसरो केवल सात वर्ष के थे। अमीर सैफुद्दीन महमूद (खुसरो के पिता) अपने दोनों पुत्रों को लेकर हज़रत निजामुद्दीन औलिया की सेवा में उपस्थित हुए। उनका आशय दीक्षा दिलाने का था। संत निजामुद्दीन की ख़ानक़ाह के द्वार पर वे पहुँचे। वहाँ अल्पायु अमीर खुसरो को पिता के इस महान उद्देश्य का ज्ञान हुआ। खुसरो ने कुछ सोचकर न चाहते हुए भी अपने पिता से अनुरोध किया कि मुरीद 'इरादा करने' वाले को कहते हैं और मेरा इरादा अभी मुरीद होने का नहीं है। अत: अभी केवल आप ही अकेले भीतर जाइए। मैं यही बाहर द्वार पर बैठूँगा। अगर निजामुद्दीन चिश्ती वाक़ई कोई सच्चे सूफ़ी हैं तो खुद बखुद मैं उनकी मुरीद बन जाऊँगा। आप जाइए। जब खुसरो के पिता भीतर गए तो खुसरो ने बैठे-बैठे दो पद बनाए और अपने मन में विचार किया कि यदि संत आध्यात्मिक बोध सम्पन्न होंगे तो वे मेरे मन की बात जान लेंगे और अपने द्वारा निर्मित पदों के द्वारा मेरे पास उत्तर भेजेंगे। तभी में भीतर जाकर उनसे दीक्षा प्राप्त कर्रूँगा अन्यथा नहीं। खुसरो के ये पद निम्न लिखित हैं -
'तु आँ शाहे कि बर ऐवाने कसरत, कबूतर गर नशीनद बाज गरदद। गुरीबे मुस्तमंदे बर-दर आमद, बयायद अंदर्रूँ या बाज़ गरदद।।'
अर्थात: तू ऐसा शासक है कि यदि तेरे प्रसाद की चोटी पर कबूतर भी बैठे तो तेरी असीम अनुकंपा एवं कृपा से बाज़ बन ज़ाए।
खुसरो मन में यही सोच रहे थे कि भीतर से संत का एक सेवक आया और खुसरो के सामने यह पद पढ़ा - 'बयायद अंद र्रूँ मरदे हकीकत, कि बामा यकनफस हमराज गरदद। अगर अबलह बुअद आँ मरदे - नादाँ। अजाँ राहे कि आमद बाज गरदद।।'
अर्थात - "हे सत्य के अन्वेषक, तुम भीतर आओ, ताकि कुछ समय तक हमारे रहस्य-भागी बन सको। यदि आगुन्तक अज्ञानी है तो जिस रास्ते से आया है उसी रास्ते से लौट जाए।' खुसरो ने ज्यों ही यह पद सुना, वे आत्मविभोर और आनंदित हो उठे और फौरन भीतर जा कर संत के चरणों में नतमस्तक हो गए। इसके पश्चात गुरु ने शिष्य को दीक्षा दी। यह घटना जाने माने लेखक व इतिहासकार हसन सानी निज़ामी ने अपनी पुस्तक तजकि-दह-ए-खुसरवी में पृष्ठ ९ पर सविस्तार दी है। यह भी सर्वमान्य है कि खुसरो सत्रह वर्ष की छोटी आयु में ही एक उत्कृष्ट कवि के रुप में दिल्ली के साहित्यिक क्षेत्र में छा गए थे। उनकी इस अद्भुत काव्य प्रतिभा पर उनके गुरु हज़रत निजामुद्दीन औलिया को भी फक्र था। इनका मधुर कंथ इनकी सरस एवं प्रांजल कविता का ॠंगार था। जिस काव्य गोष्ठी अथवा कवि सम्मेलन में अमीर अपनी कविता सुनाते थे उसमें एक गम्भीर सन्नाटा छा जाता था। निसंदेह अमीर खुसरो दहलवी जन्मजात कवि थे। इन्होंने कविता लिखने व पढ़ने का ढंग किसी से नहीं सीखा, किन्तु इनके काव्य गुरु ख़वाजा शमशुद्दीन माने जाते हैं। इसका कारण यह बताया जाता है कि ख्वारिजी ने खुसरो के विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ 'पंचगंज' अथवा ख़म्साऐ खुसरो को शुद्ध किया था। खुसरो का निधन १३२५ ईश्वी में हुआ।


प्रमुख कृतियां
तुहफ़ा-तुस-सिगर, बाक़िया नाक़िया, तुग़लकनामा, नुह-सिफ़िर

छाप-तिलक

छाप-तिलक तज दीन्हीं
रे तोसे नैना मिला के ।
प्रेम बटी का मदवा पिला के,
मतबारी कर दीन्हीं

रे मोंसे नैना मिला के ।
खुसरो निज़ाम पै बलि-बलि जइए
मोहे सुहागन कीन्हीं

रे मोसे नैना मिला के ।

काहे को ब्याहे बिदेस

काहे को ब्याहे बिदेस, अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
भैया को दियो बाबुल महले दो-महले

हमको दियो परदेस
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
हम तो बाबुल तोरे खूँटे की गैयाँ

जित हाँके हँक जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
हम तो बाबुल तोरे बेले की कलियाँ घर-घर माँगे हैं जैहें

अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
कोठे तले से पलकिया जो निकली

बीरन में छाए पछाड़
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
हम तो हैं बाबुल तोरे पिंजरे की चिड़ियाँ

भोर भये उड़ जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
तारों भरी मैनें गुड़िया जो छोडी़

छूटा सहेली का साथ
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
डोली का पर्दा उठा के जो देखा

आया पिया का देस
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
अरे, लखिय बाबुल मोरे

काहे को ब्याहे बिदेस
अरे, लखिय बाबुल मोरे

(खुसरो की इस रचना को फिल्म उमराव जान में गया, ख्य्याम के संगीत से सजे इस गीत को आवाज दी जगजीत कौर ने)


मुकरियाँ
1
खा गया पी गया
दे गया बुत्ता
ऐ सखि साजन?
ना सखि कुत्ता।

2
नंगे पाँव फिरन नहिं देत
पाँव से मिट्टी लगन नहिं देत
पाँव का चूमा लेत निपूता
ऐ सखि साजन?
ना सखि जूता!


लिपट लिपट के वा के सोई
छाती से छाती लगा के रोई
दांत से दांत बजे तो ताड़ा
ऐ सखि साजन? ना सखि जाड़ा!

4
ऊंची अटारी पलंग बिछायो
मैं सोई मेरे सिर पर आयो
खुल गई अंखियां भयी आनंद
ऐ सखि साजन? ना सखि चांद!
5
रात समय वह मेरे आवे
भोर भये वह घर उठि जावे
यह अचरज है सबसे न्यारा
ऐ सखि साजन? ना सखि तारा!

6
जब माँगू तब जल भरि लावे
मेरे मन की तपन बुझावे
मन का भारी तन का छोटा
ऐ सखि साजन? ना सखि लोटा!

7
बेर-बेर सोवतहिं जगावे
ना जागूँ तो काटे खावे
व्याकुल हुई मैं हक्की बक्की
ऐ सखि साजन? ना सखि मक्खी!
8
आप हिले और मोहे हिलाए
वा का हिलना मोए मन भाए
हिल हिल के वो हुआ निसंखा
ऐ सखि साजन? ना सखि पंखा!

9
बिन आये सबहीं सुख भूले
आये ते अँग-अँग सब फूले
सीरी भई लगावत छाती
ऐ सखि साजन? ना सखि पाती!

10
सगरी रैन छतियां पर राख
रूप रंग सब वा का चाख
भोर भई जब दिया उतार
ऐ सखी साजन? ना सखि हार!

11
पड़ी थी मैं अचानक चढ़ आयो
जब उतरयो तो पसीनो आयो
सहम गई नहीं सकी पुकार
ऐ सखि साजन? ना सखि बुखार!


पहेलियाँ
तरवर से इक तिरिया उतरी उसने बहुत रिझाया
बाप का उससे नाम जो पूछा आधा नाम बताया
आधा नाम पिता पर प्यारा बूझ पहेली मोरी
अमीर ख़ुसरो यूँ कहेम अपना नाम नबोली
उत्तर—निम्बोली

२।फ़ारसी बोली आईना,तुर्की सोच न पाईना
हिन्दी बोलते आरसी,आए मुँह देखे जो उसे बताए
उत्तर—दर्पण

३।बीसों का सर काट लिया
ना मारा ना ख़ून किया
उत्तर—नाखून

Sunday, July 27, 2008

भारतेंदु हरिश्चंद्र

आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म ०९ सितम्बर १९५० को बनारस के एक सभ्रांत अग्रवाल परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें भजन संगीत का शौक था। उन्होंने पांच वर्ष की अवस्था में ही निम्नलिखित दोहा बनाकर अपने पिता को सुनाया और सुकवि होने का आशीर्वाद प्राप्त किया-
लै ब्योढ़ा ठाढ़े भए श्री अनिरुध्द सुजान।
वाणा सुर की सेन को हनन लगे भगवान।।
३४ साल की अल्प आयु में ६ जनवरी १९८५ को उनका निधन हो गया।
भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया हॅ। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया हॅ।

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देशन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।।

भारतेन्दु बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। हिंदी पत्रकारिता, नाटक और काव्य के क्षेत्र में उनका बहुमूल्य योगदान रहा। उन्होंने 'हरिश्चंद्र पत्रिका', 'कविवचन सुधा' और 'बाल विबोधिनी' पत्रिकाओं का संपादन भी किया। वे एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे। उनके पिता गोपाल चंद्र एक अच्छे कवि थे और गिरधर दास उपनाम से कविता लिखा करते थे। भारतेंदु जी की अल्पावस्था में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया था अतः स्कूली शिक्षा प्राप्त करने में भारतेंदु जी असमर्थ रहे। घर पर रह कर हिंदी, मराठी, बांग्ला, उर्दू तथा अंग्रेज़ी का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। उनको काव्य-प्रतिभा अपने पिता से विरासत के रूप में मिली थी। पंद्रह वर्ष की अवस्था से ही भारतेंदु ने साहित्य सेवा प्रारंभ कर दी थी, अठारह वर्ष की अवस्था में उन्होंने कवि वचन-सुधा नामक पत्र निकाला जिसमें उस समय के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएं छपती थीं। वे बीस वर्ष की अवस्था मे ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाए गए और आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक के रूप मे प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने १८६८ मे 'कविवचनसुधा` नामक पत्रिका निकाली, १८७६ 'हरिश्चन्द्र मैगजीन` और फिर 'बाल बोधिनी` नामक पत्रिकाएँ निकालीं, साथ ही उनके समांतर साहित्यिक संस्थाएँ भी खड़ी कीं। वैष्णव भक्ति के प्रचार के लिए उन्होने 'तदीय समाज` की स्थापना की थी। अपनी देश भक्ति के कारण राजभक्ति प्रकट करते हुये भी उन्हें अंग्रेजी हुकूमत का कोपभाजन बनना पड़ा। उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने १८८० मे उन्हें 'भारतेंदु` की उपाधि प्रदान की। हिन्दी साहित्य को भारतेन्दु की देन भाषा तथा साहित्य दोनो ही क्षेत्रों में है। भाषा के क्षेत्र में उन्होंने खड़ी बोली के उस रूप को प्रतिष्ठित किया, जो उर्दू से भिन्न है और हिन्दी क्षेत्र की बोलियों का रस लेकर संवर्धित हुआ है। इसी भाषा में उन्होंने अपने सम्पूर्ण गद्य साहित्य की रचना की।
हमहू सब जानति लोक की चालनि, क्यौं इतनौ बतरावति हौ। हित जामै हमारो बनै सो करौ, सखियाँ तुम मेरी कहावती हौ॥'हरिचंद जु' जामै न लाभ कछु, हमै बातनि क्यों बहरावति हौ।सजनी मन हाथ हमारे नहीं, तुम कौन कों का समुझावति हौ॥

ऊधो जू सूधो गहो वह मारग, ज्ञान की तेरे जहाँ गुदरी है।कोऊ नहीं सिख मानिहै ह्याँ, इक श्याम की प्रीति प्रतीति खरी है॥ये ब्रजबाला सबै इक सी, 'हरिचंद जु' मण्डलि ही बिगरी है।एक जो होय तो ज्ञान सिखाइये, कूप ही में इहाँ भाँग परी है॥
साहित्य सेवा के साथ-साथ भारतेंदु जी की समाज सेवा भी चलती थी। उन्होंने कई संस्थाओं की स्थापना में अपना योग दिया। दीन-दुखियों, साहित्यिकों तथा मित्रों की सहायता करना वे अपना कर्तव्य समझते थे। धन के अत्यधिक व्यय से भारतेंदु जी ॠणी बन गए और दुश्चिंताओं के कारण उनका शरीर शिथिल होता गया। परिणाम स्वरूप सं. 1885 में अल्पायु में ही मृत्यु ने उन्हें ग्रस लिया।विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
स्टारार्थी लभते स्टारम् मोक्षार्थी लभते गतिं ।।
एक कालं द्विकालं च त्रिकालं नित्यमुत्पठेत।
भव पाश विनिर्मुक्त: अंग्रेज लोकं संगच्छति ।।
अर्थात इससे विद्यार्थी को विद्या , धन चाहने वाले को धन , स्टार-खिताब-पदवी चाहने वाले को स्टार और मोक्ष की कामना करने वाले को परमगति की प्राप्ति होती है । जो प्राणी रोजाना ,नियम से , तीनो समय इसका- (अंग्रेज - स्तोत्र का) पाठ करता है वह अंग्रेज लोक को गमन करने का पुण्य लाभ अर्जित करने का अधिकारी होता है ।
प्रमुख कृतियाँनाटक: 'वैदिक हिंसा हिसा न भवति` (१८७३), 'भारत दुर्दशा` (१८७५), 'साहित्य हरिश्चंद्र` (१८७६) 'नीलदेवी` (रचनाकाल १८८१)। 'अंधेर नगरी` (रचनाकाल १८८१) काव्यकृतियां : 'भक्तसर्वस्व`, प्रेममालिका` (रचनाकाल १८७१), 'प्रेम माधुरी` (१८७५), 'प्रेम-तरंग` (१८७७), 'उत्तरार्द्ध भक्तमाल`(१८७६-७७), 'प्रेम-प्रलाप` (१८७७), 'होली` (१८७९), 'मधुमुकुल` (१८८१), 'राग-संग्रह` (१८८०), 'वर्षा-विनोद` (१८८०), 'विनय प्रेम पचासा` (१८८१), फूलों का गुच्छा` (१८८२), 'प्रेम फुलवारी` (१८८३) और 'कृष्णचरित्र` (१८८३)। अनुवाद : बंगला से "विद्यासुन्दर" नाटक, संस्कृत से "मुद्राराक्षस" नाटक, और प्राकृत से "कपूरमंजरी" नाटक। निबंध संग्रह : 'भारतेन्दु ग्रन्थावली` (तीसरा खंड) में संकलित है। उनका "नाटक` शीर्षक प्रसिद्ध निबंध (१८८५) ग्रंथावली के दूसरे खंड के परिशिष्ट में नाटकों के साथ दिया गया
गले मुझको लगा लो ए दिलदार होली में ।
बुझे दिल की लगी भी तो ए याए होली में ।।

नहीं यह है गुलाले सुर्ख उड़ता हर जगह प्यारे,
य आशिक ही है उमड़ी आहें आतिशबार होली में ।

गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझको भी जमाने दो,
मनाने दो मुझे भी जानेमन त्योहार होली में ।

है रंगत जाफ़रानी रुख अबीरी कुमकुम कुच है,
बने हो ख़ुद ही होली तुम ए दिलदार होली में ।

रसा गर जामे-मय गैरों को देते हो तो मुझको भी,
नशीली आँख दिखाकर करो सरशार होली में ।
वर्ण्य विषयभारतेंदु जी की यह विशेषता रही कि जहां उन्होंने ईश्वर भक्ति आदि प्राचीन विषयों पर कविता लिखी वहां उन्होंने समाज सुधार, राष्ट्र प्रेम आदि नवीन विषयों को भी अपनाया। अतः विषय के अनुसार उनकी कविता श्रृंगार-प्रधान, भक्ति-प्रधान, सामाजिक समस्या प्रधान तथा राष्ट्र प्रेम प्रधान हैं।
श्रृंगार रस प्रधान भारतेंदु जी ने श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों ही पक्षों का सुंदर चित्रण किया है। वियोगावस्था का एक चित्र देखिए-
देख्यो एक बारहूं न नैन भरि तोहि याते जौन जौन लोक जैहें तही पछतायगी। बिना प्रान प्यारे भए दरसे तिहारे हाय, देखि लीजो आंखें ये खुली ही रह जायगी। भक्ति प्रधान भारतेंदु जी कृष्ण के भक्त थे और पुष्टि मार्ग के मानने वाले थे। उनको कविता में सच्ची भक्ति भावना के दर्शन होते हैं। वे कामना करते हैं -
बोल्यों करै नूपुर स्त्रीननि के निकट सदा पद तल मांहि मन मेरी बिहरयौ करै। बाज्यौ करै बंसी धुनि पूरि रोम-रोम, मुख मन मुस्कानि मंद मनही हास्यौ करै। सामाजिक समस्या प्रधान भारतेंदु जी ने अपने काव्य में अनेक सामाजिक समस्याओं का चित्रण किया। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों पर तीखे व्यंग्य किए। महाजनों और रिश्वत लेने वालों को भी उन्होंने नहीं छोड़ा-
चूरन अमले जो सब खाते, दूनी रिश्वत तुरत पचावें। चूरन सभी महाजन खाते, जिससे जमा हजम कर जाते। राष्ट्र-प्रेम प्रधान भारतेंदु जी के काव्य में राष्ट्र-प्रेम भी भावना स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। भारत के प्राचीन गौरव की झांकी वे इन शब्दों में प्रस्तुत करते हैं -
भारत के भुज बल जग रच्छित, भारत विद्या लहि जग सिच्छित। भारत तेज जगत विस्तारा, भारत भय कंपिथ संसारा। प्राकृतिक चित्रण प्रकृति चित्रण में भारतेंदु जी को अधिक सफलता नहीं मिली, क्योंकि वे मानव-प्रकृति के शिल्पी थे, बाह्य प्रकृति में उनका मर्मपूर्ण रूपेण नहीं रम पाया। अतः उनके अधिकांश प्रकृति चित्रण में मानव हृदय को आकर्षित करने की शक्ति का अभाव है। चंद्रावली नाटिका के यमुना-वर्णन में अवश्य सजीवता है तथा उसकी उपमाएं और उत्प्रेक्षाएं नवीनता लिए हुए हैं-
कै पिय पद उपमान जान यह निज उर धारत, कै मुख कर बहु भृंगन मिस अस्तुति उच्चारत। कै ब्रज तियगन बदन कमल की झलकत झांईं, कै ब्रज हरिपद परस हेतु कमला बहु आईं।
महत्वपूर्ण कार्यआधुनिक हिंदी साहित्य में भारतेंदु जी का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भारतेंदु बहूमुखी प्रतिभा के स्वामी थे। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध आदि सभी क्षेत्रों में उनकी देन अपूर्व है। भारतेंदु जी हिंदी में नव जागरण का संदेश लेकर अवतरित हुए। उन्होंने हिंदी के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण कार्य किया। भाव, भाषा और शैली में नवीनता तथा मौलिकता का समावेश करके उन्हें आधुनिक काल के अनुरूप बनाया। आधुनिक हिंदी के वे जन्मदाता माने जाते हैं। हिंदी के नाटकों का सूत्रपात भी उन्हीं के द्वारा हुआ। भारतेंदु जी अपने समय के साहित्यिक नेता थे। उनसे कितने ही प्रतिभाशाली लेखकों को जन्म मिला। मातृ-भाषा की सेवा में उन्होंने अपना जीवन ही नहीं संपूर्ण धन भी अर्पित कर दिया। हिंदी भाषा की उन्नति उनका मूलमंत्र था - निज भाषा उन्नति लहै सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल।।
अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण भारतेंदु हिंदी साहित्याकाश के एक दैदिप्यमान नक्षत्र बन गए और उनका युग भारतेंदु युग के नाम से प्रसिध्द हुआ। हरिश्चंद्र चंद्रिका, कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैग्जीन, स्त्री बाला बोधिनी जैसे प्रकाशन उनके विचारशील और प्रगतिशील संपादकीय दृष्टिकोण का परिचय देते हैं।

भारतेंदु हरिश्चंद्र


आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म ०९ सितम्बर १९५० को बनारस के एक सभ्रांत अग्रवाल परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें भजन संगीत का शौक था। उन्होंने पांच वर्ष की अवस्था में ही निम्नलिखित दोहा बनाकर अपने पिता को सुनाया और सुकवि होने का आशीर्वाद प्राप्त किया-
लै ब्योढ़ा ठाढ़े भए श्री अनिरुध्द सुजान। वाणा सुर की सेन को हनन लगे भगवान।।
३४ साल की अल्प आयु में ६ जनवरी १९८५ को उनका निधन हो गया। निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया हॅ। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया हॅ।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।।
भारतेन्दु बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। हिंदी पत्रकारिता, नाटक और काव्य के क्षेत्र में उनका बहुमूल्य योगदान रहा। उन्होंने 'हरिश्चंद्र पत्रिका', 'कविवचन सुधा' और 'बाल विबोधिनी' पत्रिकाओं का संपादन भी किया। वे एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे। उनके पिता गोपाल चंद्र एक अच्छे कवि थे और गिरधर दास उपनाम से कविता लिखा करते थे। भारतेंदु जी की अल्पावस्था में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया था अतः स्कूली शिक्षा प्राप्त करने में भारतेंदु जी असमर्थ रहे। घर पर रह कर हिंदी, मराठी, बांग्ला, उर्दू तथा अंग्रेज़ी का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। उनको काव्य-प्रतिभा अपने पिता से विरासत के रूप में मिली थी। पंद्रह वर्ष की अवस्था से ही भारतेंदु ने साहित्य सेवा प्रारंभ कर दी थी, अठारह वर्ष की अवस्था में उन्होंने कवि वचन-सुधा नामक पत्र निकाला जिसमें उस समय के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएं छपती थीं। वे बीस वर्ष की अवस्था मे ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाए गए और आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक के रूप मे प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने १८६८ मे 'कविवचनसुधा` नामक पत्रिका निकाली, १८७६ 'हरिश्चन्द्र मैगजीन` और फिर 'बाल बोधिनी` नामक पत्रिकाएँ निकालीं, साथ ही उनके समांतर साहित्यिक संस्थाएँ भी खड़ी कीं। वैष्णव भक्ति के प्रचार के लिए उन्होने 'तदीय समाज` की स्थापना की थी। अपनी देश भक्ति के कारण राजभक्ति प्रकट करते हुये भी उन्हें अंग्रेजी हुकूमत का कोपभाजन बनना पड़ा। उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने १८८० मे उन्हें 'भारतेंदु` की उपाधि प्रदान की। हिन्दी साहित्य को भारतेन्दु की देन भाषा तथा साहित्य दोनो ही क्षेत्रों में है। भाषा के क्षेत्र में उन्होंने खड़ी बोली के उस रूप को प्रतिष्ठित किया, जो उर्दू से भिन्न है और हिन्दी क्षेत्र की बोलियों का रस लेकर संवर्धित हुआ है। इसी भाषा में उन्होंने अपने सम्पूर्ण गद्य साहित्य की रचना की।हमहु सब जानति लोक की चालनि, क्यौं इतनौ बतरावति हौ।हित जामै हमारो बनै सो करौ, सखियाँ तुम मेरी कहावती हौ॥'हरिचंद जु' जामै न लाभ कछु, हमै बातनि क्यों बहरावति हौ।सजनी मन हाथ हमारे नहीं, तुम कौन कों का समुझावति हौ॥

ऊधो जू सूधो गहो वह मारग, ज्ञान की तेरे जहाँ गुदरी है।कोऊ नहीं सिख मानिहै ह्याँ, इक श्याम की प्रीति प्रतीति खरी है॥ये ब्रजबाला सबै इक सी, 'हरिचंद जु' मण्डलि ही बिगरी है।एक जो होय तो ज्ञान सिखाइये, कूप ही में इहाँ भाँग परी है॥
साहित्य सेवा के साथ-साथ भारतेंदु जी की समाज सेवा भी चलती थी। उन्होंने कई संस्थाओं की स्थापना में अपना योग दिया। दीन-दुखियों, साहित्यिकों तथा मित्रों की सहायता करना वे अपना कर्तव्य समझते थे। धन के अत्यधिक व्यय से भारतेंदु जी ॠणी बन गए और दुश्चिंताओं के कारण उनका शरीर शिथिल होता गया। परिणाम स्वरूप सं. 1885 में अल्पायु में ही मृत्यु ने उन्हें ग्रस लिया।विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
स्टारार्थी लभते स्टारम् मोक्षार्थी लभते गतिं ।।
एक कालं द्विकालं च त्रिकालं नित्यमुत्पठेत।
भव पाश विनिर्मुक्त: अंग्रेज लोकं संगच्छति ।।
अर्थात इससे विद्यार्थी को विद्या , धन चाहने वाले को धन , स्टार-खिताब-पदवी चाहने वाले को स्टार और मोक्ष की कामना करने वाले को परमगति की प्राप्ति होती है । जो प्राणी रोजाना ,नियम से , तीनो समय इसका- (अंग्रेज - स्तोत्र का) पाठ करता है वह अंग्रेज लोक को गमन करने का पुण्य लाभ अर्जित करने का अधिकारी होता है ।
प्रमुख कृतियाँनाटक: 'वैदिक हिंसा हिसा न भवति` (१८७३), 'भारत दुर्दशा` (१८७५), 'साहित्य हरिश्चंद्र` (१८७६) 'नीलदेवी` (रचनाकाल १८८१)। 'अंधेर नगरी` (रचनाकाल १८८१) काव्यकृतियां : 'भक्तसर्वस्व`, प्रेममालिका` (रचनाकाल १८७१), 'प्रेम माधुरी` (१८७५), 'प्रेम-तरंग` (१८७७), 'उत्तरार्द्ध भक्तमाल`(१८७६-७७), 'प्रेम-प्रलाप` (१८७७), 'होली` (१८७९), 'मधुमुकुल` (१८८१), 'राग-संग्रह` (१८८०), 'वर्षा-विनोद` (१८८०), 'विनय प्रेम पचासा` (१८८१), फूलों का गुच्छा` (१८८२), 'प्रेम फुलवारी` (१८८३) और 'कृष्णचरित्र` (१८८३)। अनुवाद : बंगला से "विद्यासुन्दर" नाटक, संस्कृत से "मुद्राराक्षस" नाटक, और प्राकृत से "कपूरमंजरी" नाटक। निबंध संग्रह : 'भारतेन्दु ग्रन्थावली` (तीसरा खंड) में संकलित है। उनका "नाटक` शीर्षक प्रसिद्ध निबंध (१८८५) ग्रंथावली के दूसरे खंड के परिशिष्ट में नाटकों के साथ दिया गया
गले मुझको लगा लो ए दिलदार होली में ।
बुझे दिल की लगी भी तो ए याए होली में ।।

नहीं यह है गुलाले सुर्ख उड़ता हर जगह प्यारे,
य आशिक ही है उमड़ी आहें आतिशबार होली में ।

गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझको भी जमाने दो,
मनाने दो मुझे भी जानेमन त्योहार होली में ।

है रंगत जाफ़रानी रुख अबीरी कुमकुम कुच है,
बने हो ख़ुद ही होली तुम ए दिलदार होली में ।

रसा गर जामे-मय गैरों को देते हो तो मुझको भी,
नशीली आँख दिखाकर करो सरशार होली में ।
वर्ण्य विषयभारतेंदु जी की यह विशेषता रही कि जहां उन्होंने ईश्वर भक्ति आदि प्राचीन विषयों पर कविता लिखी वहां उन्होंने समाज सुधार, राष्ट्र प्रेम आदि नवीन विषयों को भी अपनाया। अतः विषय के अनुसार उनकी कविता श्रृंगार-प्रधान, भक्ति-प्रधान, सामाजिक समस्या प्रधान तथा राष्ट्र प्रेम प्रधान हैं।
श्रृंगार रस प्रधान भारतेंदु जी ने श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों ही पक्षों का सुंदर चित्रण किया है। वियोगावस्था का एक चित्र देखिए-
देख्यो एक बारहूं न नैन भरि तोहि याते जौन जौन लोक जैहें तही पछतायगी। बिना प्रान प्यारे भए दरसे तिहारे हाय, देखि लीजो आंखें ये खुली ही रह जायगी। भक्ति प्रधान भारतेंदु जी कृष्ण के भक्त थे और पुष्टि मार्ग के मानने वाले थे। उनको कविता में सच्ची भक्ति भावना के दर्शन होते हैं। वे कामना करते हैं -
बोल्यों करै नूपुर स्त्रीननि के निकट सदा पद तल मांहि मन मेरी बिहरयौ करै। बाज्यौ करै बंसी धुनि पूरि रोम-रोम, मुख मन मुस्कानि मंद मनही हास्यौ करै। सामाजिक समस्या प्रधान भारतेंदु जी ने अपने काव्य में अनेक सामाजिक समस्याओं का चित्रण किया। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों पर तीखे व्यंग्य किए। महाजनों और रिश्वत लेने वालों को भी उन्होंने नहीं छोड़ा-
चूरन अमले जो सब खाते, दूनी रिश्वत तुरत पचावें। चूरन सभी महाजन खाते, जिससे जमा हजम कर जाते। राष्ट्र-प्रेम प्रधान भारतेंदु जी के काव्य में राष्ट्र-प्रेम भी भावना स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। भारत के प्राचीन गौरव की झांकी वे इन शब्दों में प्रस्तुत करते हैं -
भारत के भुज बल जग रच्छित, भारत विद्या लहि जग सिच्छित। भारत तेज जगत विस्तारा, भारत भय कंपिथ संसारा। प्राकृतिक चित्रण प्रकृति चित्रण में भारतेंदु जी को अधिक सफलता नहीं मिली, क्योंकि वे मानव-प्रकृति के शिल्पी थे, बाह्य प्रकृति में उनका मर्मपूर्ण रूपेण नहीं रम पाया। अतः उनके अधिकांश प्रकृति चित्रण में मानव हृदय को आकर्षित करने की शक्ति का अभाव है। चंद्रावली नाटिका के यमुना-वर्णन में अवश्य सजीवता है तथा उसकी उपमाएं और उत्प्रेक्षाएं नवीनता लिए हुए हैं-
कै पिय पद उपमान जान यह निज उर धारत, कै मुख कर बहु भृंगन मिस अस्तुति उच्चारत। कै ब्रज तियगन बदन कमल की झलकत झांईं, कै ब्रज हरिपद परस हेतु कमला बहु आईं।
महत्वपूर्ण कार्यआधुनिक हिंदी साहित्य में भारतेंदु जी का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भारतेंदु बहूमुखी प्रतिभा के स्वामी थे। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध आदि सभी क्षेत्रों में उनकी देन अपूर्व है। भारतेंदु जी हिंदी में नव जागरण का संदेश लेकर अवतरित हुए। उन्होंने हिंदी के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण कार्य किया। भाव, भाषा और शैली में नवीनता तथा मौलिकता का समावेश करके उन्हें आधुनिक काल के अनुरूप बनाया। आधुनिक हिंदी के वे जन्मदाता माने जाते हैं। हिंदी के नाटकों का सूत्रपात भी उन्हीं के द्वारा हुआ। भारतेंदु जी अपने समय के साहित्यिक नेता थे। उनसे कितने ही प्रतिभाशाली लेखकों को जन्म मिला। मातृ-भाषा की सेवा में उन्होंने अपना जीवन ही नहीं संपूर्ण धन भी अर्पित कर दिया। हिंदी भाषा की उन्नति उनका मूलमंत्र था - निज भाषा उन्नति लहै सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल।।
अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण भारतेंदु हिंदी साहित्याकाश के एक दैदिप्यमान नक्षत्र बन गए और उनका युग भारतेंदु युग के नाम से प्रसिध्द हुआ। हरिश्चंद्र चंद्रिका, कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैग्जीन, स्त्री बाला बोधिनी जैसे प्रकाशन उनके विचारशील और प्रगतिशील संपादकीय दृष्टिकोण का परिचय देते हैं।

Saturday, July 26, 2008

जब हम जिद पर आते हैं

धमाके करने वाले

आदमी को नहीं पहचानते

वे दहशत के बीज बोते हैं

लाशें बिछा कर

साबित करना चाहतें हैं अपनी जिद

पर वे नहीं जानते

जब हम जिद पर आते हैं तो बदल देते हैं

भूगोल और इतिहास

पाकिस्तान से बांग्लादेश

ऐसे ही बना ।

-सुधीर राघव

Friday, July 25, 2008

जुबान में तेजाब

कुछ लोग जिनके हाथों में तेजाब है
बिगाड़ देना चाहते हैं इन्सानिअत का चेहरा
उन्हें मासूमीयत से नफरत है
सुन्दरता उन्हें रास नहीं आती
वे बसाना चाहते हैं कुरूपता की बस्ती
मगर ये उतने खतरनाक नहीं हैं
इन्हे पहचान कर रोका जा सकता है
कुछ और लोग हैं जिन्हें पकड़ना काफी मुश्किल है
इनके हाथ में नहीं जुबान में तेजाब है
इनसे सावधान रहिये।
-सुधीर राघव

Wednesday, July 23, 2008

जनता को अभी जानना है

संसद में जो कुछ हुआ
उस पर मीडिया शरमा रहा है
या इस नाटक नौटंकी को भुना रहा है
एक भाजपाई हैं जो कहीं भी नोट लेने पहुंच जाते हैं
पैसे पूरे न मिलें तो पब्लिक को दिखाते हैं
वे अपनी साख बनाते हैं या देश की साख से खेलते हैं
जनता सब जानती है
दूसरे अपने कामरेड हैं, जो संघ संघ चिल्लाते हैं
सोवियत संघ का बंटाधार किया अब चीन से हाथ मिलाते हैं
ये अमेरिकी विरोध है या देश हित से खेल रहे हैं
जनता सब जानती है
तीसरी कांग्रेस है जिसे डील करनी है
सरकार को दाव पर लगा देने के पीछे कोई साजिश है या देश
जनता को अभी यह जानना है
तुम्हारी अग्नि परीक्षा अभी बाकि है मनमोहन।
-सुधीर राघव

Saturday, July 19, 2008

तूफानों से मत डरो

हवा का रुख तो बदलता रहता है
तूफानों से मत डरो
ये हार कर चले जाएंगे
इन्होंने डटकर जूझना नहीं सीखा
हवा बेपेंदी की होती है
इसलिए हारती है
जीतता वह है जो धैर्य से डटा रहता है
मानव तुमने सीखा है इंतजार करना
हवाओं के अपने अनुकूल होने का
तभी तो हर बार हवा हारती है
और तुम जीत जाते हो।
-सुधीर राघव

Wednesday, July 16, 2008

भीष्म फिर वाणसेय्या पर

सूरज इस बार भी पश्चिम से नहीं निकलेगा
पर उत्तरी ध्रुव शायद दक्षिणी ध्रुव से मिलने को आतुर है
माफ करना अलेक्जेंडर पोप (अपनी कविता के लिए)
अगर ये दोनों मिल भी जाएंगे तो प्रलय नहीं आएगी
प्रकाश करात दक्षिणपंथियों के सुर से सुर मिलाने को आतुर हैं
उन्हें रोकनी है अपनी एटमी डील
उन्हें शायद डर है इसके चेन रिएक्शन से
पर इन ध्रुवों को मिलने से पहले
पाटनी होगी अपने बीच की जमीन को
जमीन जो सोमनाथ दादा हैं
जमीन जो युवा भारत की उम्मीद है
पोते के सपनों को कोई दादा ही पानी देता है
तब वह पौधा वट वृक्ष बनता है
करात तुम सरकार गिराने का द्रोपदी हठ मत ठानों
मत मजबूर करो अपने भीष्म को वाणसेय्या पर सोने के लिए।
-सुधीर राघव

Monday, July 14, 2008

स्मोकर

तुम्हारे फेफड़े धुआं मांगते हैं
ताजी हवा में तुम्हारा दम घुटता है
तुम्हारे विचार बिना निकोटिन की खुराक के अलसाए रहते हैं
वे सिगरेट के कश के साथ ही जागते हैं
क्या तुम जानते हो
जितना धुआं तुम उगलते हो
उसकी कालिख से मौत की स्याही बनती है
तुम अपने लिए चुनते हो धीमा जहर
औरों को बांटते हो मौत
स्मोकर, तुम अपने आसपास के लोगों के लिए भी बहुत खतरनाक हो।
-सुधीर राघव

Saturday, July 12, 2008

अब मत मरना आरुषि

आरुषि की मौत
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए सिर्फ खबर नहीं है
यह खबरों की वह खिचड़ी है
जिसे वह रोज नया तड़का लगाकर
परोसता है ग्राहक बढ़ाने के लिए
कायस पर कायस
बस यही उसका काम है
सच ढूंढने के लिए सीबीआई है न
कभी चैनल पर कोई मॉडल आती
खुद को आरुषि की आत्मा बताती
फिर चैनल द्वारा गढ़ी कथा में ढल कर मौत तक जाती
इन दो महीनों में हर रोज नए तरीके से मरी आरुषि
वह एक बार नहीं कई बार मारी गई
उसके मां-बाप की इज्जत उतारी गई
कहानी में रोमांच बढ़े
इसलिए अवैध संबंधों के किस्से गढ़े
निर्दोष लोग जेल भिजवाए गए
सोचता हूं गलत क्या है?
आरुषि का पिता होना
या मीडिया का मूल्यों से गिर जाना।
-सुधीर राघव

जनसंख्या दिवस

स्कूल में जनसंख्या दिवस मनाया गया..
नेता अवगुणा सिंह जी ने भाषण दिया
बोले, देखिए
बच्चे दो ही काफी और से माफी
इतना कहकर बांटी टाफी
टाफी खा बच्चे मुस्काए
एक ने कहा, एक सवाल पूछूं अंकल
पर सच बताना
अवगुणा जी बोले, पूछो बेटा पूछा
बच्चे ने पूछा, अंकल बच्चे आपके कितने हैं
अवगुणा जी घबराए-चकराए
दो कम बताते हुए जवाब दिया
छह
बेटा, किसी को नहीं पता, बताना मत

Thursday, July 10, 2008

तब सरपट दौड़े

उनको सबने जख्म लगाए, जो आंसू से डरते थे
बदनाम गली में उनको देखा, जो मंदिर में मिलते थे।
शाख हिली तो पत्ते टूटे और हवा में बिखर गए
वही धूल में पड़े मिले, जो खूब हवा में उड़ते थे।
नाह धोकर घर से निकले फिर भी वो बदनाम हुए
उन पर खूब ऊछाला सबने जो कीचड़ से डरते थे।
जब-जब चाबुक पड़ा वक्त का पूंछ उठा कर सरपट दौड़े,
वरना वे ऐसे घोड़े थे जो चौराहे पर अड़ते थे।
-सुधीर राघव

Wednesday, July 9, 2008

खास आदमी

मेरे लोकतंत्र में
सरकार आम आदमी चुनता है
मगर सरकार को चलाता
कोई खास आदमी है
सरकार को गिराता
कोई खास आदमी है
सरकार को बचाता भी कोई खास आदमी है
ये चलाने, गिराने और बचाने वाले
तीनों ही वसूलते हैं पूरी कीमत
पर आम आदमी को
भुगतना है सरकार को चुनने का खामियाजा
और चुकानी है पायी-पायी।
-सुधीर राघव

Tuesday, July 8, 2008

यहां आपका स्वागत है

जब आपकी भावनाएं शब्दों की लय पा लेती हैं
और आपका मन जुटा लेता है इन्हें सबसे साझा करने का साहस
तो बन जाती है कविता।
मौन क्यों हो कवि? यह ब्लॉग तुम्हारे लिए ही है।
यहां आपका स्वागत है। अगर आप भी चाहते हैं कि इस ब्लॉग पर आपकी कविता प्रकाशित हो तो संपर्क करें
sudhir.raghav@gmail.com

विशेष सूचना यहाँ प्रकाशित आलेख/कविता/कहानी एवं टिप्पणियाँ बिना लेख़क की पूर्व अनुमति के कहीं भी प्रकाशित करना पूर्णतया वर्जित है।

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भाग रहा हूँ

जबसे आया हूँ यहाँ
भाग रहा हूँ
कौन है आगे, पीछे कौन है पता नही'
मैं बस भाग रहा हूँ
निकलना है आगे
मन में हैं दृढ़ इच्छा
बनन है सिकंदर, लेकर सद्
इच्छा भाग रहा हूँ
हरियाली है यहाँ, हर तरह की हरियाली
लिकिन ठहराव नही है मेरे रस्ते में
मैं भाग रहा हूँ
कभी कर्मो की खातिर, कभी कर्मो से
कभी अपनों की खातिर, कभी अपने आप से
मैं भाग रहा हूँ
सोचता हूँ, रुक जाऊ, ठहरू कुछ पहर
कर लू आराम, फिर भरु उड़ान
सोचता अभी, झकझोरता तभी
मेले सी महफिल में रह गया अकेला...मैं भाग रहा हूँ
करना है साबित, बताना है जिगर है कितना
समझकर भी नही चाहते समझना जो
उनको समझाने को, जताने को
मैं भाग रहा हूँ
कुछ बदला है माहौल तब और अब में
बनने लगी है सख्सियत कुछ नजरों में उनकी
अब पहचान भी कुछ बना ली है
कभी कभी दूसरो से आगे भी निकलने लगा हूँ
लेकिन सच बताऊँ अब डर सताने लगा है,
छीन न ले कोई मेरी जगह
इसलिए भाग रहा हूँ
- रवि प्रकाश

Monday, July 7, 2008

रोटी

रोटी की कीमत
मनमोहन से नहीं
आडवाणी से नहीं
करात, माया और मुलायम से भी नहीं
उस गरीब से पूछो
जिसे सुबह से एक निवाला भी नहीं मिला।

मनमोहन की उम्मीद मानसून पर टिकी है
आडवाणी को लगता है कि यह महंगाई उसके लिए खोल सकती है सत्ता का दरवाजा
करात को रोटी से नहीं एटमी डील से ज्यादा खतरा है
मुलायम सोचता है
काश उसकी भी सत्ता तक कोई डील हो जाए

हमने लोकतंत्र के नाम पर ये कुकरमुत्ते उगाए हैं
इन्हें काटकर ही पौष्टिक सब्जी बनाई जा सकती है
पर पहले कोई रोटी तो लेकर आए।
-सुधीर राघव

Sunday, July 6, 2008

यों मिटी गरीबी....

कल तक एक दूसरे की जान के दुश्मन आज दोस्त हो गए हैं। होते भी क्यों नहीं, गरीबी और मज़बूरी कुछ भी करा देती है। लोग गरीबी से तंग आकर आत्महत्या तक कर लेते हैं और मज़बूरी में गधे को बाप तक कह देते हैं। उस हालात से तो अच्छा ही है। मजबूर को बाप मिल गया और कंगाल को आता।
मुलायम और अमर ने बहुत दिनों तक गरीबी झेली है। अब थोड़ा मोल भाव कर सरकार से हाथ मिला लिया तो क्या बुराई? वैसे भी करात एंड पार्टी तो परमाणु करार करने नहीं देती। अब करात जी भी सोच रहे होंगे कि शायद सपा ने यह कोई बदला ही लिया है। हो भी सकता है किसी दिन मुलायम और करात जी उलझ गए हों और अब मुलायम का मौका लग गया। इससे मुलायम जी कई निशाने लगा गए हैं। सबसे बड़ी बात कि पार्टी की तंगहाली खत्म हो जाएगी। भई चुनावों के लिए धन भी तो जुटाना था। गरीबी में आखिर कितने दिन गुजारते। कंगाली में तो आता भी गीला हो जाता है।
एक बात और, मनमोहन जी भी मन मारकर जी रहे थे। कई तो उन्हें मनमसोसकर सिंह कहने लगे थे। उधर से अमेरिका का डंडा और इधर से सीपीएम की दरांती और हथौड़ा। बेचारे मनमसोसकर। खैर अब तो वे घर जाकर ठाठ से सौ सकेंगे। उन्हें कई डाक्टर भी चैन से सोने की सलाह दे चुके थे। अकेले वे ही क्यों मुलायम जी भी चुनावों की तयारी करने में जुट सकेंगे।

Saturday, July 5, 2008

तुम महान हो हिमालय


पहाड़ अपने ही वजन से मिट्टी होते हैं

सबसे ऊंचे शिखर को ही पहले ढकती है बर्फ

पत्थर सा होकर शिखर बन जाना कोई बड़प्पन नहीं

क्योंकि

तेज बौछारों में जब खिसकती है नीचे की मिट्टी

तो

ये पत्थर ही सबसे पहले लुढ़कते हैं

इसलिए हो जाने दो

इन पत्थरों को मिट्टी

और उग आने दो अपने सीने पर हरियाली।

ये देवदार और चीड़

तुम पर तुम्हारे करोड़ों शिखर

तुमसे ही पलते हैं और रखते हैं तुम्हें अपनी छायां में

जो औरों को जीवन देता है वही पूजा जाता है

तुम उन पठारों से नहीं हो

जो ऊंचाई में तुमसे बहुत बौने हैं

पर अपने चट्टानी दंभ से अकड़े हुए हैं

उन पर जीवन पलता नहीं मशीनें लेकर टूट पड़ता है

ये चट्टानें बन जाती हैं खदानें

हर पत्थर को तोड़ा जाता है रोड़ी बजरी तक या पीसकर रेत कर दिया जाता है

तुम महान हो हिमालय

क्योंकि

तुमने सीख लिया है

विनम्रता से मिट्टी होना।

-सुधीर राघव