Sunday, December 8, 2019

जानें कैसे बढ़ते हैं प्याज के दाम




जिस देश में नेशनल क्राइम ब्यूरो ने 2017 के बाद अपराधों का डाटा सार्वजनिक नहीं किया है, उसी देश में सरकार का क़ृषि मंत्रालय सितम्बर से ही चिल्ला रहा है कि इस बार प्याज उत्पादन कम रहेगा। फसल आने से पहले ही मंत्रालय यह चीख चीख कर बताता रहा है, जबकि विभाग के मंत्री ने पद और गोपनीयता की शपथ ले रखी है? ऐसा क्यों?

अगर आप इस 'क्यों' को समझ सकते हो तो यह भी समझ जाओगे कि प्याज के दाम कैसे बढ़ते हैं? किसान से दो रुपये किलो खरीदी गई प्याज बाजार में 100 रुपये किलो कैसे बिकती है।

व्यापारियों से चंदे के रूप में भारी-भरकम रकम मांगी जाती है। जब से 2000 के नोट चले हैं, रकम को चंदा दिखाने की भी जरूरत नहीं रह गई है। मिठाई के 20-30 बड़े डिब्बों में ही अरबों के बारे न्यारे हो जाते हैं। देश में दो हजार के जितने नोट चलन में हैं, उसका 70 फीसदी नोट आम जनता तक नहीं पहुंच रहे। सब नेताओं के घर आराम कर रहे हैं। पब्लिक डिजिटल बने और नेता हार्ड केश पर चले। यही नीति है।

इस तरह प्याज महंगी होंने से न तो किसान के हाथ कुछ आया है न व्यापारी के। माल नेताजी के पेट में है। इसलिए नीतिगत गोपनीय बातें शपथ लेने के बाद भी उनके पेट में नहीं पच रहीं। वे ये नहीं बताएंगे 2018 और 19 में महिलाओं के प्रति कितने अपराध इस देश में हुए। (वैसे यह डाटा हर महीने अपडेट होना चाहिए। ) मगर वह यह बिना पूछे बता रहे हैं कि प्याज उत्पादन कम रहेगा। क्योंकि कमाई यही बताने में है। गोपनीयता गयी भाड़ में।

Thursday, November 28, 2019

नाथूराम का अंडा

नाथूराम एक काल्पनिक पात्र है, इसी पर हैं मेरी ये दो कविताएं
1.
नाथूराम का अंडा है
इस पर किसका झंडा है
गांधी बाबा देख रहे हैं
छुपा हुआ एजैंडा है

लोकतंत्र की ओट है
मन में इनके खोट है
मुर्गा बनकर राजघाट पर
मांगा करते वोट हैं
पर जो फूटा बीच सड़क पर
नाथूराम का अंडा है
इस पर किसका झंडा है
गांधी बाबा देख रहे हैं
छुपा हुआ एजैंडा है

मुंह में राम देह में काम
मालिश वाले बाबा हैं
देश बेचकर मौज उडाएं
इनका चाय का ढाबा है
निकल न लेना आंख मूंदकर
घाट-घाट पर पंडा है
नाथूराम का अंडा है
इस पर किसका झंडा है
गांधी बाबा देख रहे हैं
छुपा हुआ एजैंडा है

#सुधीर_राघव

2.
कुछ गप ताने
कुछ शप ताने
लोकतंत्र को लील रहीं हैं
नाथूराम की संतानें

काला कौआ उड़कर आया
झट से बोले बगुला है
दीदें फाड़े जनता देखे
गजब तमाशा पगला है

रेस से पहले घोड़ा घर भागा
आंख दबाई संता ने
चाणक्य जब पूंछ रहा था
बात बताई बंता ने
लोकतंत्र को लील रहीं हैं
नाथूराम की संतानें

बात सदन की गरिमा की थी
चालीस कम थे टोटल में
राजभवन से सेंध लगी जब
सब बैठे थे होटल में

ये मिलकर कोई भला करेंगे
नहीं भरोसा जनता ने
उड़ने वाले उड़ा रहे हैं
करी बुराई कंता ने
लोकतंत्र को लील रहीं हैं
नाथूराम की संतानें

शेर मारने गया शिकारी
गंजा होकर लौटा है
चुपके से कल बता रहा था
अभी तीस का टोटा है

तीर कमान उधर के निकले
छलांग लगाई हंता ने
बनते बनते बन ही जाती
बात बिगाड़ी बंता ने
लोकतंत्र को लील रहीं हैं
नाथूराम की संतानें

#सुधीर_राघव

Saturday, November 23, 2019

सच छुपाने वाले



दिल्ली में जो पत्रकार भाजपा मुख्यालय बीट देखते हैं, आज उनके लिए शर्मनाक स्थिति है।

इतनी बड़ी खिचड़ी पक गई और उन्हें भनक तक न लगी। शुक्रवार को जब इस खिचड़ी के दाल-चावल मिलकर चूल्हे पर चढ़ चुके थे, पूरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सुबह से ही वह प्लांटेड खबर घुमाई जा रही थी कि उद्धव के नेतृत्व में एनसीपी और कांग्रेस के दो डिप्टी सीएम वाली सरकार बन रही है।

हालांकि इससे एक दिन पहले जब पवार सोनिया से मिलकर बाहर निकले थे, उनके हाथ में उद्धव सरकार के समर्थन वाली कांग्रेस की कोई चिट्ठी नहीं थी। सोनिया का जवाब था कि वह अभी पार्टीजनों की राय लेंगी। जाहिर है कि उन्हें न तो शिवसेना पर भरोसा था और न पवार पर। इसलिए सरकार बनाने की कोई जल्दबाजी नहीं की गई।

सोनिया गांधी के टालू रवैये से शुक्रवार सुबह तक मराठा सरदार का धैर्य जवाब दे गया। वह दोनों ओर से सक्रिय थे। पर्दे के आगे भी और पीछे भी। भाजपा भी ताक में थी। एक तरफ मोदी और पवार की मुलाकात फिक्स हुई तो दूसरी तरफ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में उद्धव की सरकार बनने का फार्मूला वाली खबर प्लांट कर दी गई। इस तरह पवार जब पर्दे के आगे विफल रहे तो पीछे की कोशिशों ने रंग दिखाया।

मीडिया की साख के लिए यह संकट की बात है कि वह अब प्लांट खबरों से ही खेलता रहता है और असली खबर दी ही नहीं जाती।

नेता और सरकार चला रहे लोग जब बेईमान हो तो ऐसा होता है। वे सच को छुपाते हैं, यानी ख़बरों को छुपाते हैं। झूठ प्लांट किया जाता है। सरकार की ओर से प्लांट किए जाने वाले झूठ का शिकार मीडिया आसानी से बनता है। वह उसे पहली नजर में नकार नहीं सकता। उसे परखने के लिए और सच तक पहुंचने के लिए वक्त की जरूरत होती है, जो 24 घंटे आगे निकलने की होड़ में अब नहीं बचा है।
मगर
नेता जब सच छुपाने वाले हो जाएं तब मीडिया का दायित्व और बढ़ जाता है।

Friday, November 22, 2019

महाराष्ट्र में बेरम खां की दूसरी हार


महाराष्ट्र में चुनाव के बाद शिवसेना ने जिस भाजपा को समर्थन देने से इंकार किया, असल में वह भाजपा है ही नहीं।

कमल के निशान पर चुनाव जीत कर आए कुल 105 विधायकों में 70 से ज्यादा वे हैं, जो चुनाव से पहले ही NCP, कांग्रेस या अन्य दलों छोड़कर भाजपा में शामिल कराए गए और अपने दम पर चुनाव जीतने में सक्षम थे।

चुनाव से पहले ही भाजपा समझ गई थी कि महाराष्ट्र की जनता में फडनवीस सरकार के प्रति काफी ज्यादा नाराजगी है। इसलिए भाजपा अपने खांटी नेताओं और विचारधारा से बंधे कार्यकर्ताओं को टिकट देने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। अन्य दलों से जीतने वाले नेता धनबल, सीबीआई बल और ईडी बल लगाकर तोड़े गये।

शिवसेना पांच साल तक फडनवीस सरकार में रहकर भी विपक्ष की भूमिका निभाती रही। खटास इतनी थी कि दोनों अलग-अलग ही चुनाव लड़ें इसकी पूरी संभावना थी। मगर जिस तरह भाजपा अन्य दलों में तोड़-फोड़ मचा रही थी, उसे देखते हुए शिवसेना के क्षत्रपति उद्धव ठाकरे ने वीर शिवाजी वाली रणनीति अपनाई कि हम बेरम खां से गले तो मिलेंगे मगर बख्तरबंद पहनकर।

चुनाव नतीजे आने के बाद भाजपा में अहंकार इतना था कि वह चाहती थी कि मुख्यमंत्री उसका ही बने। मूल भाजपाई विचारधारा वाले सिर्फ 30 नेता ही चुनाव जीते थे। स्पष्ट था कि महाराष्ट्र की जनता भी नहीं चाहती थी कि फडनवीस फिर मुख्यमंत्री बनें। किसानों के साथ उनका जो बर्ताव रहा। कीचड़ भरे रास्तों से गुजरकर जो जनता वोट डालने गई, उसे विकास चाहिए था। न कीचड़ और न कमल। उद्धव इसे बखूबी समझ रहे थे।

और तोड़-फोड़ के दम पर सरकार बना लेने की भाजपा की धूर्त्त नीति को शिवसेना और मराठा सरदार शरद पवार ने अपनी सूझबूझ से चौपट कर दिया।

भाजपा के पास अब करने के लिए एक ही काम बचा है। वह चाहे तो राज्यपाल से विधानसभा भंग कराने की सिफारिश करा सकती है। मगर यह सत्ता के लिए उसके लालच की पराकाष्ठा होगा।

एक बड़ी मूर्खता भी।

Wednesday, November 13, 2019

मंदबुद्धि फैसलों की अंधी मार


दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले दोनोें देश चीनी माल के उपभोक्ता हैं। ऐसे में अमेरिकी प्रतिबंधों का असर चीन के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर एक फीसदी से भी कम है। यही वजह है कि चीन को अमेरिकी रुख की ज्यादा परवाह नहीं है और उसने ट्रम्प की शर्तों पर झुकना स्वीकार भी नहीं किया है।

दूसरी ओर जिस तरह चीन की जीडीपी हर साल डेढ़ ट्रिलियन के करीब बढ़ रही है, उससे अमेरिका भयभीत हैं। चीन की सालाना जीडीपी 14 ट्रिलियन को पार कर चुकी है‌‌।

अमेरिका की जीडीपी 21 ट्रिलियन से कम है और सालाना एक ट्रिलियन की गति से बढ़ रही है। अमेरिका का डर यह है कि मौजूदा गति से चीन अगले एक दशक में उसके बराबर आ जाएगा।

चीन को रोकने का ट्रम्प फार्मूला बचकाना है। ट्रम्प दो तरह से काम कर रहे हैं। एक तो चीन पर प्रतिबंध लगाए हैं, दूसरे विकासशील देशों पर अमेरिका से आयात बढ़ाने और अमेरिकी माल पर टैक्स कम करने का दबाव बनाया है।

चीन तो अमेरिकी प्रतिबंधों से नहीं झुका मगर विकासशील देश अपने नासमझ नेताओं की वजह से जबरदस्त दबाव में हैं। पिछले एक साल में अमेरिका ने हथियारों का निर्यात इसी नीति से 35 फीसदी बढ़ा लिया है। भारत जैसे देश उससे प्रदूषक जीवाश्म ईंधन खरीदने के अरबों के सौदे फाइनल कर रहे हैं। इन देशों का भुगतान संतुलन चरमरा रहा है और अपने रिजर्व बैंक से पैसा मांग रहे हैं।

तेजी से आगे बढ़ रहे भारत की गति पर ब्रेक लगा दिए गए हैं। दुनिया के पांचवें नंबर की अर्थव्यवस्था बन चुका भारत अब सातवें नंबर पर फिसलने के करीब है। ब्रिटेन धकेल कर पांचवें नंबर पर आ चुका है। बराबरी पर आ चुकी फ्रांस की अर्थव्यवस्था भी मार्च तक हमसे आगे निकल जाएगी।

चीन 15.5 ट्रिलियन जीडीपी के साथ नये वित्तवर्ष में प्रवेश करेगा। सालान डेढ़ ट्रिलियन के उसके विकास पर फिलहाल कोई लगाम नहीं दिख रही है। अमेरिका और यूरोप के प्रमुख देश अपनी सामान्य गति से तेज चल रहे हैं। बांग्लादेश भी 8 फीसदी की दर से तरक्की कर रहा है।

दुनिया में मंदी कहीं नहीं है। मंदी अगर कहीं है तो सिर्फ भारत और पाकिस्तान मेंहै। दोनों देश अपने नेता की मूर्खताओं की कीमत चुका रहे हैं। नेताओं को नहीं पता कि क्या करना है। वे वही करते हैं जो अमेरिका चाहता है, फ्रांस चाहता है, चीन और रूस चाहते हैं।

देश में सिर्फ मांग बढा़ने और रोजगार बढ़ाने की जरूरत है। अर्थव्यवस्था अपने आप पटरी पर आ जाएगी। मगर सरकार मांग बढ़ाने के प्रयास करने की जगह लिक्विडिटी बढ़ा रही है।

सरकार प्रत्यक्ष रोजगार बढ़ाकर जनता तक पैसा पहुचाने की जगह उन उद्मियों को और उत्पादन बढ़ाने के लिए पैसा दे रही है, जिन का पहले का माल ही नहीं बिक रहा है।

सरकार समझती है कि आर्थिक राहतें मिलने पर उद्यमी उत्पादन बढ़ाएंगे और रोजगार बढ़ेगा तो मांग बढ़ जाएगी। मगर सरकार यह नहीं समझ रही कि जिनका पैसा पुराना माल ही न बिकने से फंसा है, वे और नया उत्पादन क्यों करेंगे? वे पैसा लेंगे और एसी जगह और देशों में लगाएंगे, जहां उनका माल बिके। फिर वह चाहे बांग्लादेश हो या नेपाल या आस्ट्रेलिया और अफ्रीकी देश। अंबानी और अडानी जैसे उद्यमी भारत से बाहर ठीक ठाक निवेश कर रहे हैं।और तमाम मंदी कथाओं के बावजूद परम मुनाफे में हैं।

जैसा कि नेता और चैनल मंदी मंदी विलाप कर रहे हैं, असल में यह मंदी नहीं है। यह सिर्फ मंदबुद्धि से किए गये अंधे फैसलों की मार है।

अयोध्या राम मंदिर नागर शैली में ही क्यों


राम


Tuesday, November 12, 2019

ठंड और घमंड से बचें




ठंड और घमंड से बचकर रहो। दोनों जब लगते हैं, बुरी तरह पस्त करते हैं।

फ़रवरी 1996 के शुरू तक कोई यह अंदाजा नहीं लगा सकता था कि पंजाब में भाजपा और अकाली दल भी कभी दोस्त हो सकते हैं। आतंकवाद के पूरे दौर में इन दोनों ने ही एक दूसरे को सबसे ज्यादा कोसा था। एकदम विपरीत विचारधारा थी। फरवरी खत्म होने से पहले दोनों एक हुए और राज्य में सरकार भी बनाई।

यह अटल जी और प्रकाश सिंह बादल राजनीतिक विनम्रता और दूरदर्शिता ही थी कि दोनों एक हो पाए। इसी विनम्रता की वजह से भाजपा ने पूरे देश में विस्तार किया।
सत्ता का घमंड सबसे बुरा होता है।

दूसरी और कांग्रेस ने कोई सबक नहीं लिया। वह धुर विरोधी विचारधाराओं के ऐसे समझौतों को हिकारत से देखती रही। देश के आजादी आंदोलन में अग्रणी रही यह पार्टी अब बुरी तरह सिकुड़ चुकी है।
***

जम्मू-कश्मीर में मोदी और शाह ने भी धुर विरोधी विचारधारा वाली पीडीपी के साथ समझौताकर अटलजी के प्रयोग को दोहराया। यह प्रयोग बुरी तरह असफल हुआ, क्योंकि न तो मोदी-शाह में अटलजी जैसी विनम्रता थी और न ही महबूबा में प्रकाश सिंह बादल जैसी सहनशीलता और समझदारी।

सत्ता का घमंड सिर चढ़ चुका था।

अब महाराष्ट्र में भी साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाली शिवसेना ने भाजपा को वायदे से मुकरने वाली और घमंडी बताते हुए राजग से नाता तोड़ लिया है। यह अच्छा संकेत नहीं मगर बड़ा सवाल यह है कि इतनी ठोकरें खाने के बाद भी क्या कांग्रेस घमंड मुक्त हो पायी है?

क्या विरोधी विचारधाराओं को भी सम्मान देकर साथ जोड़ने कि अटलजी जैसी विनम्रता उसमें विकसित हो पाई है?

सोमवार रात तक का घटनाक्रम तो बताता है कि कांग्रेस का हाल अभी तक उस रस्सी जैसा है, जिसके बल नहीं गये।

***
घमंड के और भी साइड इफेक्ट हैं। अटलजी की विनम्रता की वजह से जब भाजपा खूब तरक्की कर रही थी आडवाणी जी को लगा कि अगले पीएम वही होंगे। पार्टी में अटलजी के सहयोगियों की भूमिकाएं सीमित होने लगीं। उसके बाद जो नतीजा आया वह सबको पता है।

अब भाजपा में एकबार फिर उसी अंदाज में 2024 के बाद की तैयारी शुरू हो गयी है। महाराष्ट्र प्रकरण उसकी झांकी है। शाह में भी आडवाणी जी की छवि अंगड़ाई ले रही है।

16 सितंबर को मोदी जी के जन्मदिन पर पहलीबार फडनवीस की पत्नी अमृता फडनवीस ने ही उन्हें फादर आफ नेशन कहते हुए ट्वीट कर शुभकामनाएं दी थीं। इसके एक हफ्ते बाद अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने 'हाऊडी मोदी' कार्यक्रम में इसी उपमा को दोहराया था।

गठबंधन के पास बहुमत होते हुए भी मोदी प्रिय फडनवीस मुख्यमंत्री नहीं बन सके। कहते हैं शाह फोन करते रहे और उद्धव ने उठाया नहीं।

पर शाह की शैली यह नहीं है। उन्हें अगर फडनवीस सरकार बनवानी होती तो वह फोन के भरोसे नहीं रहते बल्कि मुंबई में डेरा डाल देते।

यह सब इस बात के संकेत हैं कि भाजपा में कोई 'प्लान बी' शुरू हो चुका है। यह ठीक वैसा ही जैसा 2001 में अटलजी कि विकल्प के लिए शुरू हुआ था।

Monday, November 11, 2019

एक सेल्यूट तो बनता है

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की प्रशंसा उनके साहस के लिए भी की जानी चाहिए।

पिछले 133 वर्षों में न्यायधीश और नेता जिस मसले पर फैसला लेने से हिचकते रहे, उसका फैसला करने में उन्होंने कोई हिचक नहीं दिखाई। फैसला कैसा है ? यह अलग विषय है। फैसला किया गया, यही इस मुद्दे की महत्वपूर्ण बात है।

राम की सौगंध खाकर मंदिर बनाने की बात कहकर वोट मांगने वाले भी जब सत्ता में जम गए, वे तब भी विधेयक लाकर कोई फैसला करने की हिम्मत नहीं दिखा सके। राम के नाम पर वोट मांगकर और दो तिहाई से ज्यादा बहुमत पाकर भी नेता जब फैसला लेने से मुकर गये तब देश के चीफ जस्टिस ने पूरे साहस से अपनी भूमिका निभाई है।

अरबों में खेलने वाले तथाकथित बड़े-बड़े धर्मगुरु भी जब धर्म से जुड़े इस मामले में एक राय से कोई फैसला लेने या सहमति बनाने में अक्षम साबित हुए तब पांच जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से एक फैसला लेकर दुनिया को दिखाया कि जब किसी को कोई हल न सूझा रहा हो तो न्याय का मंदिर ही सबको रास्ता दिखाएगा।

धर्म के ठेकेदार और नेता तो जनता को बस लड़वा सकते हैं, समस्याएं खड़ी कर सकते हैं। उनके पास समस्याओं का कोई हल नहीं है। यह एक बार फिर साबित हो गया है।

1886 में अवध का अंग्रेज ज्यूडिशियल कमिश्नर डब्लू यंग भी इस मामले में फैसला लेने से हिचक गया था और यथा स्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। उसकी सबसे बेशर्म टिप्पणी यह थी कि उसने मौका मुआयना के बाद पाया था कि मस्जिद का निर्माण हिंदुओं के लिए पवित्र माने जाने वाले स्थान पर किया गया। इसके बावजूद वह फैसला करने कि हिम्मत नहीं दिखा सका। वे अंग्रेज जिनकी तूती तब पूरी दुनिया में बोलती थी, इस मसले पर फैसला लेने की हिम्मत नहीं दिखा सके थे।

यह हिम्मत दिखाई हमारे चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के नेतृत्व में पांच जजों की संविधान पीठ ने।

हो सकता है कि फैसले से कुछ लोग असंतुष्ट हों। वे अपील का हक भी रखते हैं, मगर मसले को लटकाया नहीं गया, फैसला लिया गया। इसलिए पांचों जजों के लिए एक सेल्यूट तो बनता है।

Saturday, November 2, 2019

पेगासस पर सवार नर्क का सम्राट


ह्वाट्स एप में सेंध लगाकर जासूसी करने वाला NSO ग्रुप किसके लिए जासूसी करता है यह बहुत दबा छुपा नहीं है।
यह एक इस्राइली कंपनी है, जिसे इस्त्राइल के पूर्व सैन्य अधिकारियों ने गठित किया। NSO ने जिस मलवेयर वायरस पेगासस का इस्तेमाल किया है, वह अमेरिकी सेना के लिए विकसित किए गये जासूसी वायरस का ही वर्जन है।

NSO अमरीका और इस्राइल की मित्र सरकारों तथा राजनीतिक दलों के लिए ही काम करता है। प्रति क्लाइंट जासूसी के लिए 4.6 करोड़ रुपये लिए जाते हैं। भारत में 40 से ज्यादा सरकार विरोधी नेताओं, पत्रकारों, वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की जासूसी NSO को मोटा भुगतान कर करवाई गयी।

विपक्ष मोदी सरकार से यह सवाल पूछ रहा है कि वह बताए कि भारत में जासूसी सरकार ने करवाई या भाजपा ने। इस संबंध में सूचना एवं तकनीकी मंत्री रविशंकर प्रसाद का बयान बड़ा बचकाना है। उन्होंने कहा है कि ह्वाट्स एप से सरकार ने यह जानकारी मांगी है कि यह जासूसी किसके लिए की गई।

तकनीकी मंत्री का यह ज़वाब तकनीकी ज्ञान से कोसों दूर है। NSO का क्लाइंट कौन है यह सिर्फ NSO बता सकता है। ह्वाटस एप कैसे बताएगा। वह तो सिर्फ उन लोगों के बारे में ही बता सकता है, जिनकी जासूसी की गई। ह्वाट्स एप इसमें खुद भी साइबर सेंध से पीड़ित पक्ष है।

यह प्रकरण इसका उदाहरण है कि जनता को किस तरह बेवकूफ बनाया जा रहा है और देश का पैसा किधर जा रहा है।

पेगासस शब्द ग्रीक मिथक से लिया गया है, जिसका मतलब है पंखों वाला घोड़ा। इस पर अब नर्क का सम्राट सवार है।