Saturday, January 18, 2020

शाहीन बाग



बाग सिर्फ बाग नहीं होते
कभी मशाल भी होते हैं
जब नेता ही यह तय करने लगे कि
आम काटकर खाया जाएगा या
चूसकर

आम
आदमी हो जाता है मशाल लेकर
तब बाग सिर्फ बाग नहीं रहता
रोशनी की नई किरण हो जाता है


घाटियों की बर्फ पिघलती है
सुर्ख सेब निखर कर आते हैं
मगर जब नेता तय कर दे
सेब के तीन टुकड़े होंगे
तो बाग बाग नहीं रहता
तब संगीनें बाग हो जाती हैं
और उन पर उगते हैं
प्रतिबंध

शासक को लगी हो
खून की तलब तब
बाग बाग नहीं रहते
हो जाते हैं
जलियांवाला

नेता जब लोकतंत्र
को ठेंगे पर समझे
करने लगे
मनमानी
चारों ओर उगने लगती हैं
ख़ामोश मुंडियां
खूबसूरत और
खूबसीरत चेहरे
बाग तब बाग नहीं रहता
शाहीन हो जाता है!!

#सुराघव

Wednesday, January 15, 2020

क्या आपने नहीं सुना है

विरोध करना गुनाह है!
देश में लोकतंत्र है,
प्रजातंत्र है,
क्या आपने नहीं सुना है?

राजा के झूठ का ताना-बाना है
इसे करघे पर नहीं
जुबान से बुना है!
क्या आपने नहीं सुना है?

बज रहा है नक्कारखाने में तूती की तरह
यह शादी की शहनाई नहीं
किसी शंह शाह का तुन तुना है!
क्या आपने नहीं सुना है?

वह खाता भी है और लुटता भी
न खाऊंगा, न खाने दूंगा तो उसकी
मदहोशी का हुन हुना है?
क्या आपने नहीं सुना है?

न हिंदू न मुसलमान सब हैं इंसान
आप जो बजा रहे हैं
उसी का थमाया झुनझुना है!
क्या आपने नहीं सुना है?

प्यार खो गया जिस्म सब ठंडे हैं
वह गायब है
जो धूप सा गुनगुना है!
क्या आपने नहीं सुना है?

वे जागीं और देश को बचाने निकलीं
शाहीन बाग में
पायलों का शोर रुनझुना है!
क्या आपने नहीं सुना है?

#सुराघव

Tuesday, January 14, 2020

पिछले 400 साल में धर्म ने समाज को क्या दिया


सुधीर राघव

पिछले 400 साल में इंसान ने विज्ञान और धर्म को बिल्कुल अलग कर दिया है।

इस दौरान विज्ञान ने तेजी से तरक्की की। विज्ञान की यह तरक्की धर्मसत्ता पर कब्जा जमाने वाले मूर्ख और लालची लोगों को कभी नहीं रुचि और वे विज्ञान और आधुनिक शिक्षा के खिलाफ कुतर्क गढ़ते रहे।

सत्य की खोज में विज्ञान ने मौजूदा सभी धर्मों की तुलना में ज्यादा अच्छा काम किया है। उसने लगातार कुदरत के रहस्यों से पर्दा उठाया और प्रकृति के प्रति इंसान की समझ को लगातार विकसित किया।

दूसरी ओर पिछले चार सौ सालों में धर्म के नाम पर क्या हुआ? 400 साल का इतिहास गवाह है धर्म की आड़ में सदैव मूर्खों, लालची तथा क्रूरतम लोग राजनीतिक सत्ता पर काबिज हुए और उन्होंने आर्थिक रूप से अपने राष्ट्रों को बरबाद किया, बल्कि खून-खराबा भी किया।

यह किसी एक धर्म की बात नहीं है, सभी धर्मों के साथ यह खेल सत्तालोलुप लोगों ने धर्म की खाल ओढ़कर ही खेला है।

प्रकृति के बड़े सच से रूबरू कराने वाले गेलिलियो को मूर्ख धर्माधिकारियों द्वारा मौत की सजा सुना दी गई थी। उन्हें विवश किया गया कि अपने सिद्धांत को गलत बताएं। ऐसा करने पर गेलिलियो की मौत की सजा तो माफ़ कर दी गई मगर उन्हें बाकी उम्र कैदी के रूप में गुजारनी पड़ी। जो विज्ञानी लंबा जीवन जीता और नयी नयी खोज करता वह कैद में बीमारियों से 9 साल भी न जी सका।

यह सिर्फ गेलिलियो की मौत नहीं, बल्कि विज्ञान के आगे धर्म की पहली बड़ी हार थी। धर्म की यह हार हुई थी उन मूर्ख लोगों की वजह से जो धर्म की आड़ में सर्वोच्च ताकतवर हो गये थे।

गेलिलियो का सिद्धांत पुनर्जीवित हुआ और सौ साल के भीतर ही चर्च ने उस कृत्य के लिए माफी मांगी। यूरोप ने धर्म को वेटिकन तक सीमित कर दिया और आधुनिक शिक्षा और विज्ञान पर जोर दिया। लिहाजा अगली सदियों में पूरी दुनिया में यूरोप का परचम लहराया। सत्ता और ताकत बढ़ी थी विज्ञान से मगर शासकों के मन में धर्म के बीज ने फिर गलत रंग दिखाया और वे पूरी दुनिया में धर्म परिवर्तन कराने निकल पड़े। ऐसे कृत्यों ने दुनिया में घृणा को बढ़ाया। नतीजतन दुनिया ने दो दो विश्वयुद्ध झेले।

धर्म की खाल में छुपे मूर्खों की धर्म और ज्ञान में अनास्था का सबसे बड़ा सुबूत यह है कि वे नाम लेते हैं कि हम धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं, मगर युद्ध वे धर्म के हथियारों से नहीं लड़ते। तब वे विज्ञान के सिद्धांत पर विकसित हथियारों का ही इस्तेमाल करते हैं। तब वे तंत्र मंत्र, जादू-टोना और हवन यज्ञ के हथियारों से नहीं लड़ते।

दुनिया में एटम बम का इस्तेमाल एक बौद्ध देश के खिलाफ हुआ। जबकि दूसरे विश्वयुद्ध के ज्यादा बड़े खलनायक जर्मनी और इटली थे।

धर्म के नाम पर एकजुट हुए मित्रदेशों के मूर्ख शासनाध्यक्षों ने ऊर्जा और द्रव्यमान के संबंध के रहस्य से पर्दा उठाने वाले विज्ञान के महान सिद्धांत से एटम बम बनवाकर अपनी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया। सिद्धांत की खोज करने वाले और एटम बम बनाने वाले वैज्ञानिकों को अपनी खोज का ताजिंदगी अफसोस रहा। मगर बम का इस्तेमाल करने वाले शासक को कभी अपने कृत्य का अफसोस नहीं हुआ।

क्यों?

क्योंकि मूर्ख कभी अफसोस नहीं करते। वे हत्याएं करते और करवाते हैं और धर्म का चोला ओढ़कर चैन से सो जाते हैं। दूसरी ओर एक विद्वान वैज्ञानिक अपनी खोज का मूर्खों द्वारा दुरुपयोग कर लेने पर भी ताजिंदगी खुद को दोषी मानते हुए अफसोस करता है।

धर्म के नाम पर जब अफगानिस्तान में मुल्ला उमर और लादेन जैसे मूर्खों ने सत्ता संभाली तो उन्होंने न सिर्फ अफगानिस्तान की हर खूबसूरत चीज को तबाह किया बल्कि अपने मूर्खता पूर्ण कृत्यों से पूरी दुनिया में मुस्लिमों के प्रति नफ़रत को बढ़ाया। बौद्ध विहारों को नष्ट किया। महिलाओं पर पाबंदियां लगाईं। आधुनिक शिक्षा का विरोध किया। सदियों पुरानी पद्यति के मदरसों को बढ़ाया। नतीजा क्या निकाला।

उनके तालिबान ने भले धर्म के नाम जेहाद लड़ा मगर उनके हथियार धर्म के नहीं थे। चाहे वह एके-47 हो, स्टींजर मिसाइल हो, टैंक हों।

धर्म की आड़ में हमेशा मूर्ख और क्रूर लोग ही शीर्ष सत्ता पर काबिज होते हैं और देश को आर्थिक रूप से और सब तरह से बर्बाद करते हैं। शिक्षण संस्थानों को तबाह करते हैं यह हमें नहीं भूलना चाहिए।

धर्म व्यक्तिगत आस्था और विकास का महान साधन है और मूर्ख तथा जलील लोग इसे अपने लिए सत्ता की सीढ़ी बनाते हैं।

Saturday, January 11, 2020

भाजपा का ज्योतिष क्या कहता है


#जेएनयू, #जामिया और #जाधवपुर

भारतीय ज्योतिष के अनुसार ये तीनों नाम मकर राशि से हैं। मकर राशि के स्वामी शनि हैं। शनि को न्याय और सच का देवता माना जाता है।

उक्त तीनों विश्वविद्यालयों में भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार का कड़ा विरोध इस बात का ज्योतिषीय प्रमाण है कि शनिदेव भाजपा पर कुपित हो गये हैं। धर्म के नाम पर अधर्म करने, किसी से अन्याय करने और झूठ बोलने से शनि कुपित होते हैं। ऐसा प्राचीन ज्योतिष ग्रंथ मानते हैं।

भाजपा, भारतीय जनता पार्टी और बीजेपी; तीनों नामों से वृष राशि बनती है। वृष के लिए शनि भाग्येश हैं। ये आंदोलन इस बात के प्रतीक हैं कि भाजपा ने अपने गलत कार्यों से भाग्य के देवता को रुष्ट कर लिया है।

#एएमयू की राशि मेष बनती है और असम, अरुणाचल की भी। मेष के स्वामी मंगल हैं। भाई-बहन-बांधवों का अपमान करने और जमीन घोटाले करने से मंगल क्रुद्ध होते हैं। आडवाणी सहित वरिष्ठ बांधवों से जो व्यवहार हुआ वह किसी से छुपा नहीं।

बालकों और युवाओं का संबंध बुध ग्रह से हैं। बुध को बुद्धि, ज्ञान धन और ऋद्धि-सिद्धी का कारक माना जाता है। सरकार के खिलाफ छात्र आंदोलन बुद्ध के रुष्ट होने का प्रतीक है। सरकार की बुद्धि काम नहीं कर रही। कुछ सूझ नहीं रहा। प्रधानमंत्री जनता से सलाह मांग रहे हैं। अर्थव्यवस्था डांवाडोल हैं। निर्दोषों को सजा देने और अधिक पाप की वजह से बुध के कुपित होने के स्पष्ट संकेत हैं।

बलात्कार के मामले बढ़ रहे हैं। रेप पीड़िताओं पर जिस तरह उल्टी कार्रवाई हुई उसने लग्नेश शुक्र को भी नाराज कर दिया।

महाराष्ट्र में हाथ आई सत्ता का फिसलना सिंह राशि के स्वामी सूर्य के कुपित होने का संकेत है। पार्टी के बुजुर्गों का अपमान करने से बृहस्पति भी नाराज होते हैं। बृहस्पति की राशि मीन से दिल्ली चुनाव के नतीजे इसका संकेत देंगे।


भाजपा का मजबूत आईटी सेल इसके मजबूत राहू का संकेत है। राहू का प्रभाव बढ़ने से नेता बेहिचक झूठ बोल जाते हैं। राहू मजबूत होता है तो केतु भी मजबूत होता है। केतु श्वान शक्तियों को वफादार बनाता है।



Friday, December 27, 2019

हिंदू उत्पीड़न


उत्पीड़न किसी के अल्पसंख्यक होने की वजह से नहीं होता। उत्पीड़न बहुसंख्यकों का भी होता है। उन्नाव रेप केसों और चिन्मयानंद मालिश केस में सभी पीड़िताएं बहुसंख्यक समाज से हैं।

गुन्डों, पुलिस और प्रशासन ने पीड़ित परिवारों को जिस तरह प्रताड़ित किया, उसके आगे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की प्रताड़ना की कहानी भी छोटी लगती है।

असल में उत्पीड़न हमेशा पूरी दुनिया में गरीब का होता है। वह अल्पसंख्यक समुदाय से हैं या बहुसंख्यक, यह बात कोई मायने नहीं रखती।

जो संघी, नेता और टुकड़खोर गैंग यह कहता है कि पाकिस्तान में हिंदुओं के उत्पीड़न की कहानियां सुनकर उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं, वे यह नहीं बताते कि उन्नाव में जब रेप पीड़िताओं और उनके परिवारों को यातनाएं दी जा रही थीं, तब उनके रौंगटे कहां सो रहे थे? तब क्यों उठ खड़े न हुए।

देश में कुलदीप सेंगर, आसाराम, नित्यानंद, चिन्मयानंद, राम रहीम जिस तरह हिंदू बेटियों और उनके परिवारों को प्रताड़ित करते रहे, क्या वे यातनाएं रोंगटे खड़े करने वाली नहीं।

उत्पीड़न सिर्फ गरीब का हो रहा है, कुछ लालची और मूर्ख नेता मूर्ख वोटरों को साधने के लिए इसे जाति और धर्म से जोड़ देते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हुए घुसपैठियों को नागरिकता देने के लिए CAA जैसा कानून लाते हैं।

Tuesday, December 24, 2019

डबल इंजन की डबल गेम


देश में डबल इंजन सरकार है।

एक इंजन कहता है - No NRC
दूसरा इंजन कहता है - पूरे देश में NRC लागू करेंगे।

एक इंजन कहता है - मेरे पुतले को जूता मारो।
दूसरा इंजन कहता है - खबरदार! थारा-44 लागू है।

एक इंजन कहता है -5 Trillions की अर्थव्यवस्था बनाएंगे।
दूसरा इंजन कहता है - इंटरनेट बंद कर दो, लहसुन प्याज खाना जरूरी नहीं, व्यापार चौपट करो, रोजगार कम करो।

एक इंजन कहता है - सबका साथ सबका विकास।
दूसरा इंजन कहता है - पाक बंग्लादेश और अफगानिस्तान से घुसे मुसलमानों को छोड़कर बाकी सब घुसपैठियों को शरणार्थी माना जाएगा।

एक इंजन कहता है कि कश्मीर में शांति है और दूसरे इंजन ने अब कश्मीर जाना ही छोड़ दिया है।

सरकार के इन दोनों इंजनों के बीच इतनी वैचारिक खींचतान है कि अगर कबीर दास आज होते तो यह कहते देर न लगाते -
"दो इंजनों के बीच में डिब्बा बचा न कोये!"

धड़ाधड़ डिब्बे डिरेल हो रहे हैं। महाराष्ट्र के बाद अब झारखंड भी हाथ से गया। मगर डबल इंजन की डबल गेम थमने का नाम नहीं ले रही।

जनता गुहार कर रही है - भाई! ये खींचतान बंद करो! डबल गेम बंद करो। एक ही इंजन से गाड़ी चलाओ। एक ही दिशा में गाड़ी चलाओ! विकास की दिशा में। रोजगार बढ़ाओ। काम बढ़ाओ। तुम्हारे पास दो इंजन हैं तो दूसरे को गुजरात में लगा दो या हरियाणा और असम में लगा दो। वहां बिना इंजन के ही सरकारें चार पांच साल से खड़ी हैं। कुछ करती ही नहीं है।

पर डबल इंजन आपस में ही जूझ रहे हैं। जनता की तो कोई सुनता ही नहीं।

Saturday, December 21, 2019

CAA क्यों


मानव तस्करों का जाल पूरी दुनिया में फैला है। यह अरबों डॉलर का खेल है। मानव तस्कर लोगों को बड़े बड़े सपने दिखाकर घुसपैठ कराते हैं।

इन मानव तस्करों के हाथों बिके हुए नेता इन घुसपैठियों को नागरिकता देने कि लिए अपने देशों के नागरिकता कानूनों में संशोधन करते हैं। इससे मानव तस्करों को अपना जाल फैलाने में मदद मिलती है। वह यह कहकर नये कबूतर फांसते हैं कि जिन्हें हमने पहले घुसपैठ कराई थी, देखो उनको नागरिकता मिल गई। वहां सरकार में अपना ही आदमी है। अगले संशोधन में आपकी भी नागरिकता पक्की।

बिके हुए नेता के बच्चों और संबंधियों की संपत्ति अचानक करोड़ो गुना बढ़ती है मगर उसकी कोई जांच नहीं करता, क्योंकि सरकार ही उस नेता के इशारे पर चल रही होती है। मानव तस्करी का यह खेल जाति-धर्म की आड़ में भी खेला जाता है।

संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में मानवाधिकार संगठन इस मानव तस्करी पर नजर रखते हैं और रिपोर्ट तैयार करते हैं, इसलिए इन संगठनों के खिलाफ दुनिया में ऐसे बिके हुए नेता माहौल बनाते हैं।

जब भी दुनिया के किसी देश में नागरिकता कानून में संशोधन हो तो उसे किसी जाति और धर्म से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए। उसे दुनिया भर में फैले मानव तस्करी के रैकेट से जोड़कर देखो। आपको हर सवाल का जवाब मिल जाएगा। अगर यह संशोधन जल्दबाजी में किया जाए तब तो समझो पूरी दाल ही काली है।
जून 2000 अभिषेक बच्चन की डेब्यू फिल्म रिफ्यूजी में गुजरात में फेरे मानव तस्करों के जाल को अच्छे से दिखाया गया था।

करता आप सोच सकते हैं कि सरकार यह क्यों नहीं बता रही कि CAA से देश और देशवासियों को क्या-क्या लाभ होगा?

क्या CAA से देश की अर्थव्यवस्था बढ़ेगी या देश पर और बोझ पड़ेगा?

क्या CAA से भारतीयों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे या कम होंगे?

क्या CAA से देश में प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी या कम हो जाएगी?

क्या CAA से पड़ोसी देशों के जिन घुसपैठियों को नागरिकता दी जाएगी, उनका बोझ पड़ोसी देश उठाएंगे या हम टैक्स पेयर?

क्या सरकार CAA से लाखों घुसपैठियों को एक साथ नागरिकता देने जा रही है?

असम में NRC से जो 41 लाख घुसपैठिए पहचाने गए हैं क्या उनमें 19 लाख हिंदू हैं और क्या CAA से इन सबको तत्काल नागरिकता दे दी जाएगी?

मैक्सिको के बार्डर से मानव तस्करों के माध्यम से अमरीका में घुसपैठ करने वाले भारतीय और तमाम एशियाई खुद को अपने देश में सताया हुआ कहकर ही अमरीका में शरण मांगते है! ऐसे ही रोजगार और अन्य कारणों से भारत में घुसपैठ करने वाले पड़ोसी देशों के नागरिक भी खुद को अपने देशों में सताया हुआ कहकर शरण मांगते है!
सरकार जल्दबाजी न करे देश को इस कानून की लाभ और हानियों पर विचार करें।

Monday, December 16, 2019

कपड़ों के पीछे


आप उन्हें कभी
उनके कपड़ों से नहीं पहचान सकते
वक्त के साथ बदलते हैं उनके कपड़े

कभी वे लादेन बनकर आएंगे
तो कभी गोडसे

हर बार उनके निशाने पर होगा कोई मसीहा
और समाज की शांति समृद्धि

वे रोज जाकेट बदल बदल कर आएंगे
तो कभी कोट-पैंट में
छोटी मूंछ रखकर
आप उन्हें कपड़ों से कैसे पहचानोगे

आप उन्हें उनके हथियार से पहचानो
नफ़रत के हथियार से

कभी वे यहूदियों से नफ़रत करते मिलेंगे
कभी हिंदुओं से
कभी मुसलमानों से या ईसाइयों से
तो कभी सिख, बौद्ध और जैनों के खिलाफ जहर उगलेंगे

वे यह कह कर तुममें नफ़रत भरेंगे
कि लोगों को उनके कपड़ों से पहचानो

मगर हम हिंदुस्तानी
हर भारतीय यह शपथ लेता है
कि हम हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
आपस में हमेशा प्रेम से रहेंगे
अहिंसा के मार्ग पर चलेंगे
कभी उनके मंसूबों को सफल नहीं होने देंगे
जो पहचाने नहीं जा सकते कभी कपड़ों से

गांधी बाबा ने इस देश को सिखाया है
नफ़रत फैलाने वालों को कैसे हराना है प्रेम से

शहीदों ने अपने खून से सींचा है
इस देश की एकता को
कोई नफ़रत का कीड़ा
उसमें अपने दांत नहीं गढ़ा सकता
यकीन मानें
वह जल्द अपने मुंह की खाएगा।

#सुराघव







Sunday, December 8, 2019

जानें कैसे बढ़ते हैं प्याज के दाम




जिस देश में नेशनल क्राइम ब्यूरो ने 2017 के बाद अपराधों का डाटा सार्वजनिक नहीं किया है, उसी देश में सरकार का क़ृषि मंत्रालय सितम्बर से ही चिल्ला रहा है कि इस बार प्याज उत्पादन कम रहेगा। फसल आने से पहले ही मंत्रालय यह चीख चीख कर बताता रहा है, जबकि विभाग के मंत्री ने पद और गोपनीयता की शपथ ले रखी है? ऐसा क्यों?

अगर आप इस 'क्यों' को समझ सकते हो तो यह भी समझ जाओगे कि प्याज के दाम कैसे बढ़ते हैं? किसान से दो रुपये किलो खरीदी गई प्याज बाजार में 100 रुपये किलो कैसे बिकती है।

व्यापारियों से चंदे के रूप में भारी-भरकम रकम मांगी जाती है। जब से 2000 के नोट चले हैं, रकम को चंदा दिखाने की भी जरूरत नहीं रह गई है। मिठाई के 20-30 बड़े डिब्बों में ही अरबों के बारे न्यारे हो जाते हैं। देश में दो हजार के जितने नोट चलन में हैं, उसका 70 फीसदी नोट आम जनता तक नहीं पहुंच रहे। सब नेताओं के घर आराम कर रहे हैं। पब्लिक डिजिटल बने और नेता हार्ड केश पर चले। यही नीति है।

इस तरह प्याज महंगी होंने से न तो किसान के हाथ कुछ आया है न व्यापारी के। माल नेताजी के पेट में है। इसलिए नीतिगत गोपनीय बातें शपथ लेने के बाद भी उनके पेट में नहीं पच रहीं। वे ये नहीं बताएंगे 2018 और 19 में महिलाओं के प्रति कितने अपराध इस देश में हुए। (वैसे यह डाटा हर महीने अपडेट होना चाहिए। ) मगर वह यह बिना पूछे बता रहे हैं कि प्याज उत्पादन कम रहेगा। क्योंकि कमाई यही बताने में है। गोपनीयता गयी भाड़ में।

Thursday, November 28, 2019

नाथूराम का अंडा

नाथूराम एक काल्पनिक पात्र है, इसी पर हैं मेरी ये दो कविताएं
1.
नाथूराम का अंडा है
इस पर किसका झंडा है
गांधी बाबा देख रहे हैं
छुपा हुआ एजैंडा है

लोकतंत्र की ओट है
मन में इनके खोट है
मुर्गा बनकर राजघाट पर
मांगा करते वोट हैं
पर जो फूटा बीच सड़क पर
नाथूराम का अंडा है
इस पर किसका झंडा है
गांधी बाबा देख रहे हैं
छुपा हुआ एजैंडा है

मुंह में राम देह में काम
मालिश वाले बाबा हैं
देश बेचकर मौज उडाएं
इनका चाय का ढाबा है
निकल न लेना आंख मूंदकर
घाट-घाट पर पंडा है
नाथूराम का अंडा है
इस पर किसका झंडा है
गांधी बाबा देख रहे हैं
छुपा हुआ एजैंडा है

#सुधीर_राघव

2.
कुछ गप ताने
कुछ शप ताने
लोकतंत्र को लील रहीं हैं
नाथूराम की संतानें

काला कौआ उड़कर आया
झट से बोले बगुला है
दीदें फाड़े जनता देखे
गजब तमाशा पगला है

रेस से पहले घोड़ा घर भागा
आंख दबाई संता ने
चाणक्य जब पूंछ रहा था
बात बताई बंता ने
लोकतंत्र को लील रहीं हैं
नाथूराम की संतानें

बात सदन की गरिमा की थी
चालीस कम थे टोटल में
राजभवन से सेंध लगी जब
सब बैठे थे होटल में

ये मिलकर कोई भला करेंगे
नहीं भरोसा जनता ने
उड़ने वाले उड़ा रहे हैं
करी बुराई कंता ने
लोकतंत्र को लील रहीं हैं
नाथूराम की संतानें

शेर मारने गया शिकारी
गंजा होकर लौटा है
चुपके से कल बता रहा था
अभी तीस का टोटा है

तीर कमान उधर के निकले
छलांग लगाई हंता ने
बनते बनते बन ही जाती
बात बिगाड़ी बंता ने
लोकतंत्र को लील रहीं हैं
नाथूराम की संतानें

#सुधीर_राघव

Saturday, November 23, 2019

सच छुपाने वाले



दिल्ली में जो पत्रकार भाजपा मुख्यालय बीट देखते हैं, आज उनके लिए शर्मनाक स्थिति है।

इतनी बड़ी खिचड़ी पक गई और उन्हें भनक तक न लगी। शुक्रवार को जब इस खिचड़ी के दाल-चावल मिलकर चूल्हे पर चढ़ चुके थे, पूरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सुबह से ही वह प्लांटेड खबर घुमाई जा रही थी कि उद्धव के नेतृत्व में एनसीपी और कांग्रेस के दो डिप्टी सीएम वाली सरकार बन रही है।

हालांकि इससे एक दिन पहले जब पवार सोनिया से मिलकर बाहर निकले थे, उनके हाथ में उद्धव सरकार के समर्थन वाली कांग्रेस की कोई चिट्ठी नहीं थी। सोनिया का जवाब था कि वह अभी पार्टीजनों की राय लेंगी। जाहिर है कि उन्हें न तो शिवसेना पर भरोसा था और न पवार पर। इसलिए सरकार बनाने की कोई जल्दबाजी नहीं की गई।

सोनिया गांधी के टालू रवैये से शुक्रवार सुबह तक मराठा सरदार का धैर्य जवाब दे गया। वह दोनों ओर से सक्रिय थे। पर्दे के आगे भी और पीछे भी। भाजपा भी ताक में थी। एक तरफ मोदी और पवार की मुलाकात फिक्स हुई तो दूसरी तरफ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में उद्धव की सरकार बनने का फार्मूला वाली खबर प्लांट कर दी गई। इस तरह पवार जब पर्दे के आगे विफल रहे तो पीछे की कोशिशों ने रंग दिखाया।

मीडिया की साख के लिए यह संकट की बात है कि वह अब प्लांट खबरों से ही खेलता रहता है और असली खबर दी ही नहीं जाती।

नेता और सरकार चला रहे लोग जब बेईमान हो तो ऐसा होता है। वे सच को छुपाते हैं, यानी ख़बरों को छुपाते हैं। झूठ प्लांट किया जाता है। सरकार की ओर से प्लांट किए जाने वाले झूठ का शिकार मीडिया आसानी से बनता है। वह उसे पहली नजर में नकार नहीं सकता। उसे परखने के लिए और सच तक पहुंचने के लिए वक्त की जरूरत होती है, जो 24 घंटे आगे निकलने की होड़ में अब नहीं बचा है।
मगर
नेता जब सच छुपाने वाले हो जाएं तब मीडिया का दायित्व और बढ़ जाता है।

Friday, November 22, 2019

महाराष्ट्र में बेरम खां की दूसरी हार


महाराष्ट्र में चुनाव के बाद शिवसेना ने जिस भाजपा को समर्थन देने से इंकार किया, असल में वह भाजपा है ही नहीं।

कमल के निशान पर चुनाव जीत कर आए कुल 105 विधायकों में 70 से ज्यादा वे हैं, जो चुनाव से पहले ही NCP, कांग्रेस या अन्य दलों छोड़कर भाजपा में शामिल कराए गए और अपने दम पर चुनाव जीतने में सक्षम थे।

चुनाव से पहले ही भाजपा समझ गई थी कि महाराष्ट्र की जनता में फडनवीस सरकार के प्रति काफी ज्यादा नाराजगी है। इसलिए भाजपा अपने खांटी नेताओं और विचारधारा से बंधे कार्यकर्ताओं को टिकट देने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। अन्य दलों से जीतने वाले नेता धनबल, सीबीआई बल और ईडी बल लगाकर तोड़े गये।

शिवसेना पांच साल तक फडनवीस सरकार में रहकर भी विपक्ष की भूमिका निभाती रही। खटास इतनी थी कि दोनों अलग-अलग ही चुनाव लड़ें इसकी पूरी संभावना थी। मगर जिस तरह भाजपा अन्य दलों में तोड़-फोड़ मचा रही थी, उसे देखते हुए शिवसेना के क्षत्रपति उद्धव ठाकरे ने वीर शिवाजी वाली रणनीति अपनाई कि हम बेरम खां से गले तो मिलेंगे मगर बख्तरबंद पहनकर।

चुनाव नतीजे आने के बाद भाजपा में अहंकार इतना था कि वह चाहती थी कि मुख्यमंत्री उसका ही बने। मूल भाजपाई विचारधारा वाले सिर्फ 30 नेता ही चुनाव जीते थे। स्पष्ट था कि महाराष्ट्र की जनता भी नहीं चाहती थी कि फडनवीस फिर मुख्यमंत्री बनें। किसानों के साथ उनका जो बर्ताव रहा। कीचड़ भरे रास्तों से गुजरकर जो जनता वोट डालने गई, उसे विकास चाहिए था। न कीचड़ और न कमल। उद्धव इसे बखूबी समझ रहे थे।

और तोड़-फोड़ के दम पर सरकार बना लेने की भाजपा की धूर्त्त नीति को शिवसेना और मराठा सरदार शरद पवार ने अपनी सूझबूझ से चौपट कर दिया।

भाजपा के पास अब करने के लिए एक ही काम बचा है। वह चाहे तो राज्यपाल से विधानसभा भंग कराने की सिफारिश करा सकती है। मगर यह सत्ता के लिए उसके लालच की पराकाष्ठा होगा।

एक बड़ी मूर्खता भी।

Wednesday, November 13, 2019

मंदबुद्धि फैसलों की अंधी मार


दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले दोनोें देश चीनी माल के उपभोक्ता हैं। ऐसे में अमेरिकी प्रतिबंधों का असर चीन के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर एक फीसदी से भी कम है। यही वजह है कि चीन को अमेरिकी रुख की ज्यादा परवाह नहीं है और उसने ट्रम्प की शर्तों पर झुकना स्वीकार भी नहीं किया है।

दूसरी ओर जिस तरह चीन की जीडीपी हर साल डेढ़ ट्रिलियन के करीब बढ़ रही है, उससे अमेरिका भयभीत हैं। चीन की सालाना जीडीपी 14 ट्रिलियन को पार कर चुकी है‌‌।

अमेरिका की जीडीपी 21 ट्रिलियन से कम है और सालाना एक ट्रिलियन की गति से बढ़ रही है। अमेरिका का डर यह है कि मौजूदा गति से चीन अगले एक दशक में उसके बराबर आ जाएगा।

चीन को रोकने का ट्रम्प फार्मूला बचकाना है। ट्रम्प दो तरह से काम कर रहे हैं। एक तो चीन पर प्रतिबंध लगाए हैं, दूसरे विकासशील देशों पर अमेरिका से आयात बढ़ाने और अमेरिकी माल पर टैक्स कम करने का दबाव बनाया है।

चीन तो अमेरिकी प्रतिबंधों से नहीं झुका मगर विकासशील देश अपने नासमझ नेताओं की वजह से जबरदस्त दबाव में हैं। पिछले एक साल में अमेरिका ने हथियारों का निर्यात इसी नीति से 35 फीसदी बढ़ा लिया है। भारत जैसे देश उससे प्रदूषक जीवाश्म ईंधन खरीदने के अरबों के सौदे फाइनल कर रहे हैं। इन देशों का भुगतान संतुलन चरमरा रहा है और अपने रिजर्व बैंक से पैसा मांग रहे हैं।

तेजी से आगे बढ़ रहे भारत की गति पर ब्रेक लगा दिए गए हैं। दुनिया के पांचवें नंबर की अर्थव्यवस्था बन चुका भारत अब सातवें नंबर पर फिसलने के करीब है। ब्रिटेन धकेल कर पांचवें नंबर पर आ चुका है। बराबरी पर आ चुकी फ्रांस की अर्थव्यवस्था भी मार्च तक हमसे आगे निकल जाएगी।

चीन 15.5 ट्रिलियन जीडीपी के साथ नये वित्तवर्ष में प्रवेश करेगा। सालान डेढ़ ट्रिलियन के उसके विकास पर फिलहाल कोई लगाम नहीं दिख रही है। अमेरिका और यूरोप के प्रमुख देश अपनी सामान्य गति से तेज चल रहे हैं। बांग्लादेश भी 8 फीसदी की दर से तरक्की कर रहा है।

दुनिया में मंदी कहीं नहीं है। मंदी अगर कहीं है तो सिर्फ भारत और पाकिस्तान मेंहै। दोनों देश अपने नेता की मूर्खताओं की कीमत चुका रहे हैं। नेताओं को नहीं पता कि क्या करना है। वे वही करते हैं जो अमेरिका चाहता है, फ्रांस चाहता है, चीन और रूस चाहते हैं।

देश में सिर्फ मांग बढा़ने और रोजगार बढ़ाने की जरूरत है। अर्थव्यवस्था अपने आप पटरी पर आ जाएगी। मगर सरकार मांग बढ़ाने के प्रयास करने की जगह लिक्विडिटी बढ़ा रही है।

सरकार प्रत्यक्ष रोजगार बढ़ाकर जनता तक पैसा पहुचाने की जगह उन उद्मियों को और उत्पादन बढ़ाने के लिए पैसा दे रही है, जिन का पहले का माल ही नहीं बिक रहा है।

सरकार समझती है कि आर्थिक राहतें मिलने पर उद्यमी उत्पादन बढ़ाएंगे और रोजगार बढ़ेगा तो मांग बढ़ जाएगी। मगर सरकार यह नहीं समझ रही कि जिनका पैसा पुराना माल ही न बिकने से फंसा है, वे और नया उत्पादन क्यों करेंगे? वे पैसा लेंगे और एसी जगह और देशों में लगाएंगे, जहां उनका माल बिके। फिर वह चाहे बांग्लादेश हो या नेपाल या आस्ट्रेलिया और अफ्रीकी देश। अंबानी और अडानी जैसे उद्यमी भारत से बाहर ठीक ठाक निवेश कर रहे हैं।और तमाम मंदी कथाओं के बावजूद परम मुनाफे में हैं।

जैसा कि नेता और चैनल मंदी मंदी विलाप कर रहे हैं, असल में यह मंदी नहीं है। यह सिर्फ मंदबुद्धि से किए गये अंधे फैसलों की मार है।