Monday, October 14, 2019

हरियाणा का पानी



सरस्वती नदी की खोज इसबार हरियाणा चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है। तीन साल पहले यमुनानगर के मुगलावालीं में एक गड्ढा खोदकर
हरियाणा सरकार ने सरस्वती नदी खोज निकालने का दावा किया था।

तथ्यों और तर्कों के प्रति नास्तिक शिक्षा वंचित ही गड्ढे की अंधआस्था में ऐसा दावा कर सकते हैं। असल में सरस्वती हरियाणा में तो कभी विलुप्त नहीं हुई, अपने मुख्य जलस्त्रोत से कट जाने की वजह से एक बरसाती नदी बनकर रह गई। इसके मुख्यस्रोत का जल अब सतलुज में बहता है। इसलिए सतलुज के पानी पर हरियाणा और राजस्थान का भी हक बनता है।

भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर शोध करने वाले #MichelDanino की किताब 'The Lost River : On The Trail Of The Sarasvati' में 1818 ई से 1900 के बीच जेम्स टूडो, सीएफ ओल्ढम, आरडी ओल्ढम और अलेक्जेंडर कनिंघम के अध्ययन और निष्कर्षों का हवाला दिया गया है। साथ ही लेखक ने खुद भी शिवालिक की पहाड़ियों से लेकर अरब सागर में गिरने के स्थल तक वैदिक नदी सरस्वती के पेलियों चैनल का अध्ययन किया।

1893 में सीएफ ओल्ढम ने अपने शोध-पत्र 'The Saraswati and the Lost River of the Indian Desert' में यह निष्कर्ष दिया था-
'यद्यपि यह नदी अपनी सहायक नदियों से संगम बनाती हुई बहती है और हमारे नक्शे में घग्गर नाम से दर्ज है, असल में यही पुरानी सरस्वती है। यह नाम लोगों में अब भी जाना जाता है।'

ओल्ढम ने इस संबंध में जितने भी साक्ष्य जुटाए उनका विवरण किताब में है। वेदों और हिंदू ग्रंथों के साक्ष्य को भी विस्तार से बताया गया है।

Wednesday, October 2, 2019

गांधी की तलाश



बिड़ला मंदिर
देश की राजधानी दिल्ली में अगर गांधीजी को तलाश करना हो तो वह कहां मिलेंगे?

क्या तीस जनवरी मार्ग स्थित गांधी स्मृति भवन उर्फ बिड़ला हाउस में, जहां दुनिया भर से लोग पहुंचते हैं? जहां उन्हें एक कथित हिंदू कट्टरपंथी ने गोली मार दी थी थी? या राजघाट पर समाधि में लीन? जहां पुष्पगुच्छ लिए लोग नतमस्तक होने के लिए कतार में रहते हैं?

वह मंदिर मार्ग स्थित श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर (बिड़ला मंदिर) में क्यों नहीं मिल सकते? गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ही कहा था -
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥9
(ज्ञानकर्मसंन्यासयोग - अध्याय चार)

अर्थात : हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात निर्मल और अलौकिक हैं- इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से जान लेता है, वह शरीर को त्याग कर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है।

इसलिए पूरे विश्वास के साथ मंगलवार को श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर पहुंचा। एक सनातनी हिंदू गांधी को समझने के लिए। खुली आंखों से तो नागरशैली के इस विशाल तिमंजिला मंदिर में अलग-अरग भवनों में देवी देवताओं की प्रतिमा दिखती है। शीशमहल में कान्हा दिखते हैं और वह गीता के उस संदेश की ही याद दिलाते हैं कि हर तरफ मैं हूं। मुगल-ए-आजम में के. आसिफ का शीश महल और शकील बदायुनी के बोल-चारों तरफ है उनका नजारा,- की प्रेरणा कहीं ओर से नहीं है। सब यहीं है। मगर आंखों को गांधी कहीं नहीं दिखते।

गांधीजी से जुड़ा इस मंदिर में क्या है?

हनुमानजी की सेवा में बैठे युवा पुजारी गोवर्धन दास इतना ही बताते हैं कि गांधी जी ने इसका उद्घाटन किया था।

मगर यह मंदिर गांधीजी की एक बड़ी सामाजिक क्रांति का भी प्रतीक है।

बात 1939 की है। मंदिरों में दलितों के प्रवेश पर वर्जनाएं थी। बड़े व्यावसाई बिड़ला घराने ने श्री लक्ष्मीनारायाण मंदिर का निर्माण कराया और गांधी जी इस शर्त पर इस मंदिर का लोकार्पण करने पहुंचे कि यहां अछूत जैसी वर्जनाएं नहीं होंगी और मंदिर के द्वार सबके लिए खुले होंगे। इसके बाद बिड़ला परिवार ने देश के अन्य शहरों में भी ऐसे मंदिर बनवाए जहां भेदभाव नहीं था और सनतान धर्म की मूल भावना के अनुरूप थे।
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गांधीजी का आदर पूरी दुनिया करती है, सिर्फ पाकिस्तान और पाकिस्तानियों को छोड़कर। वहां गांधीजी को जिन्ना के मुकाबले खलनायक की तरह पढ़ाया जाता है।

मगर अब हमारे देश में भी गांधीजी को अपमानित करने का प्रयास करते कुछ लोग दिख जाते है। गत 30 जनवरी को एक भगवा सुंदरी (भगवा साड़ी में) ने अलीगढ़ में गांधीजी का पुतला बनाकर गोलियां चलाई। (पत्रकारिता में जब दस्यु सुंदरी शब्द अपना लिया गया तो भगवा सुंदरी भी अपनाया जा सकता है)। लोकसभा चुनाव के दौरान भी एक भगवाधारी प्रत्याशी ने गांधीजी के बारे में अभद्र टिप्पणी की।

गांधीजी पर अभद्र टिप्पणी करने वाले ये लोग कौन हैं? ये विचारधारा तो पाकिस्तानी है, यह भारत में कैसे दिख रही है? क्या आईएसआई देश में गांधी विरोधी माहौल बना रही है?

जो गांधीजी को अपमानित करते हैं, वे हिंदू नहीं है। वे खुद को कट्टर हिंदू कहते हैं या हिंदुत्व से जोड़ते हैं।

हिंदू और हिंदुत्व दो नितांत अलग चीजे हैं। हिंदू एक दर्शन है और वह सनातन है। दर्शन में बहुत से तत्व और सार होते हैं मगर तत्व में कोई दर्शन नहीं होता। तत्व का दर्शन हो सकता है। जैसे इंसानों में गुंडातत्व हो सकते हैं मगर गुंडातत्व में इंसानीयत नहीं होती। यह अभाव ही उसे गुंडातत्व बनाता है।

असल में हिंदुत्व शब्द अंग्रेज विचारकों की क्रिश्चिएनिटी ईसाइत या मसीहत का रूपांतरित अनुवाद है। ईसाइत जिसके तहत पोप और पादरी अन्य धर्मों को हेय मानते हुए उनके धर्म परिवर्तन पर जोर देते थे। दूसरी ओर हिंदू दर्शन में किसीको भी हेय नहीं माना जाता, यहां तक कि जीव जंतुओं और पेड़पौधों को भी पूजा जाता है।

मगर जो खुदको सिर्फ हिंदुत्व से जोड़ते हैं, उनके अन्य धर्मों के प्रति विचार कैसे हैं यह किसी से छुपा नहीं।
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एक हिंदू क्या होता है, यह हम गांधीजी से समझ सकते हैं।

गांधीजी ने खुद भी, 12 अक्तूबर, 1921 के यंग इंडिया में घोषणा की थी, ''मैं अपने को सनातनी हिंदू कहता हूं क्योंकि "मैं वेदों, उपनिषदों, पुराणों और समस्त हिंदू शास्त्रों में विश्वास करता हूं और इसीलिए अवतारों और पुनर्जन्मों में भी मेरा विश्वास है। मैं वर्णाश्रम धर्म में विश्वास करता हूं। इसे मैं उन अर्थों में मानता हूं जो पूरी तरह वेद सम्मत हैं, लेकिन उसके वर्तमान प्रचलित और भोंडे रूप को नहीं मानता।

16 सितंबर 1947 को दिल्ली में RSS की एक सभा में वह आमंत्रित थे। इस सभा में उन्होंने स्वयं सेवकों को संबोधित करते हुए कहा था- "अगर हम कहें कि हिंदुस्तान में सिवाय हिंदुओं के सबको गुलाम होकर रहना है, या पाकिस्तान वाले यह कहें कि पाकिस्तान में सिवाय मुसलमानों के सबको गुलाम बनकर रहना है, तो यह चीज चलेगी नहीं। ऐसा कहकर दोनों अपना धर्म छोड़ते हैं और अपने-अपने धर्म का नाश करते हैं।

"जो मुझे हिंदुओं और सिखों का दुश्मन कहते हैं, वे मुझे पहचानते नहीं। मेरी रग-रग में हिंदू धर्म समाया हुआ है। मैं धर्म को जिस तरह समझता हूं, उसी तरह उसकी और हिंदुस्तान की सेवा पूरी ताकत से कर रहा हूं। मेरे दिल की बात मैंने आपको सुना दी है। हिंदुस्तान की रक्षा का, उसकी उन्नति का यह रास्ता नहीं कि जो बुराई पाकिस्तान में हुई उसका हम अनुकरण करें। अनुकरण हम सिर्फ भलाई का ही करें।"
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भलाई का अनुकरण। यही हिंदू दर्शन है। डेढ़ सौवीं जयंती पर गांधीजी को नमन।

Tuesday, October 1, 2019

राजनीति का सिनेमा


पत्रकार मनोज ठाकुर कई वर्षों की साधना से बेहद सम-सामायिक शोध इस पुस्तक के रूप में सामने लाए हैं।

सिनेमा और पत्रकारिता का इस्तेमाल जिस तरह से राजनीति में हो रहा है और उससे जो नतीजे हासिल हैं, उस पर यह किताब बख़ूबी रोशनी डालती है।

रेम्मी व मिस्तुबा के इस निष्कर्ष का बहुत हद तक भारत के संदर्भ में सटीक उल्लेख किया गया है -'हमारे समाज का सबसे दुखद पहलू यह है कि मास मीडिया नेताओं के एक छोटे से समूह द्वारा अपने लाभ के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है।' इसी तरह विलकिंसन का शोध भी कहता है-मीडिया के संदेश को झूठ की ओर मोड़ना बेहद आसान है। संदेश के प्रभाव से लोगों के व्यवहार और विचार को बदला जा सकता है।

किताब सिनेमा की उस कथा को भी कहती हैं जो 'जैट्राप' नामक यंत्र से शुरू हुई। भारत में इस विधा के सतत विकास के साथ इसके एक्सीडेंटल प्राइमिनिस्टर तक राजनीति के दलदल में कुलबुलाने तक के सभी पड़ावों के बारे में बखूब बताती है।

अंत में लेखक मौजूदा हालात को इस तरह बयां करता है-
'श्रद्धा और आस्था के बाजार में नित नए धार्मिक विचारों की बिक्री शिखर पर है। फिल्म 'ग्लोबल बाबा' भी धर्म का चोला पहन कर दौलत, शौहरत और हैसियत बनाने वाले ढोंगी बाबाओं पर एक कटाक्ष है और उससे भी बढ़कर उनके अंधभक्तों पर, जिनकी आस्था को ये लंपट बाबा राजनीतिक लाभ के लिए कुर्सी की इच्छा रखने वाले नेताओं के पास गिरवी रख देते हैं। उन अंधभक्तों के लिए यह समझना जरूरी है कि :

न आपकी आस्था सस्ती है न आपका वोट।

यह किताब विषयवस्तु पर मनोज Manoj के विस्तृत अध्ययन और पकड़ की बानगी है। उम्मीद है कि उनका यह उपयोगी और रुचिकर लेखन भविष्य में भी इतनी मेहनत और अध्ययन के साथ ज़ारी रहेगा।

Tuesday, September 24, 2019

जंगल में मोरनी रुदन करै


जिन नेताओं की नजर किसान की जमीन और जंगल हड़पने पर रहती है, वे पर्यावरण पर अच्छा भाषण भी दे देते हैं। मुंबई में आरे के जंगल के 2700 पेड़ काटने की मंजूरी देने वालों को भी संयुक्त राष्ट्र में पर्यावरण पर बोलने के अवसर मिल जाता है, और वहां बोलने वाले सब ऐसे ही राष्ट्र अध्यक्ष हैं। दुनिया में पर्यावरण को बचाने के लिए हो रहे प्रयासों का यही दुर्भाग्य है।

अगर मेट्रो कारशेड के लिए जंगल, किसान और आदीवासियों की जमीन का अधिग्रहण किया जा सकता है तो फिर एंटीलिया और फिल्मी सितारों के बंगलों का क्यों नहीं? क्या देश के विकास के लिए घर और जमीन का बलिदान सिर्फ किसानों और आदिवासियों को ही करना चाहिए?

दुनिया के पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान किसने पहुंचाया है? क्या किसानों और आदिवासियों ने? या उद्योगपतियों के लालच ने।

मानव सभ्यता ने जब से आग जलाना सीखा, तब से ही वह लकड़ी और लकड़ी के कोयले और कोयले का इस्तेमाल कर रहा है। कार्बन उत्सर्जन कर रहा है।

यह तब नुकसानदेह नहीं था, बल्कि पर्यावरण संतुलन और वायुमंडल में ऑक्सीजन तथा कार्बनडाइऑक्साइड का संतुलन बनाए रखने में अहम था। भू-भाग पर विशाल जंगल थे जो जीवों की जरूरत से ज्यादा ऑक्सीजन बनाते थे। दहन इस अतिरेक को संतुलित करता था।

पाषाण युग बीतते बीतते मानव ने खेती शुरू कर दी। जंगलों को साफ कर उस जमीन का इस्तेमाल भी किया मगर इससे भी फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि इंसान जंगल की जगह उस जमीन पर घनी फसल उगाने लगा था। ऑक्सीजन उत्सर्जन में इससे कोई बड़ी कमी नहीं आई।

फर्क पड़ना शुरू हुआ अठाहरवीं शताब्दी में, जब यूरोप में औद्योगिक क्रांति शुरू हुई। जंगलों और कोयले का पूरी दुनिया में दोहन शुरू हुआ।

ऊर्जा ही शक्ति है। मगर दो सदी तक ऐसा नहीं हुआ। जिनके पास जंगल और कोयले के भंडार थे और प्रर्यावरण संरक्षक थे, वे सभी देश गुलाम बना लिए गये।

बीसवीं सदी में गुलामी और पर्यावरण के खिलाफ हुई औद्योगिक क्रांति के नतीजे सामने आने लगे। तब मानवता और पर्यावरण की चिंता शुरू हुई।

मगर पर्यावरण की आड़ में भी महाशक्तियों ने अपना खेल खेला। अगर पर्यावरण की चिंता होती तो पेट्रोलियम ईंधन को प्रतिबंधित किया जाता न कि पारंपरिक ईंधन को।

पेट्रोलियम के तरल और गैस दोनों ही ईंधन मीथेन जैसे हाइड्रोकार्बन और हैलोजेन गैसों का उत्सर्जन करते हैं जो पर्यावरण के लिए कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन से 84 गुणा अधिक हानिकारक है।

कार्बन उत्सर्जन को तो प्रकृति खुद बरसात से नीचे ले आती है मगर फ्लोरीन समूह की हैलोजेन गैसें और क्लोरो-फ्लोरो कार्बन सीधे ओजोन परत में छेद करते हैं और उसे खत्म करते हैं। कार्बन उत्सर्जन से अस्थमा जैसी बीमारियां हो सकती हैं मगर हाइड्रोकार्बन और हैलोजेन गैसें तो कैंसर की जनक हैं।

जब आप रसोई गैस जलाते हैं तो जलने से पहले जो आपको गंध आती है वह हवा में मीथेन, ईथेन, प्रोपेन और ब्यूटेन का लीक हुआ एक मिक्सचर होता है। जल्द ही आप इस गंध के लिए सहज हो जाते हैं। मगर इन गैसों का हर घर से रोज अल्पमात्रा में भी पर्यावरण में मिलना कितना ख़तरनाक है? इसकी चर्चा संयुक्त राष्ट्र अगली सदी में करेगा। फिलहाल वह 18वीं सदी की यूरोप की गलतियों के लिए गरीब देशों पर कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए दबाव बना रहा है ताकि वे अमेरिकी कंपनियों से बड़े पैमाने पर प्राकृतिक गैस और कचरे तेल का आयात करें। यही अमेरिका और साऊदी अरब की स्थाई दोस्ती का राज है।

Friday, September 20, 2019

अर्थव्यवस्था को घी पिलाना


देसी घी ताकत देता। हम सब यह मानते हैं।
मगर जब पहला हार्ट अटैक आ चुका हो तो निढाल पड़े मरीज को घी नहीं पिलाते।

पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही की विकास दर 8% थी, इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में तमाम अनुकूलताओं के बावजूद विकास दर मात्र 5% रह जाना अर्थव्यवस्था के लिए एक हार्ट अटैक ही था।

जब से यह हार्ट अटैक आया है, सरकार बिना मर्ज को समझे उद्योगों को नित नई राहत और पैकेज के रूप में घी पर घी पिलाए जा रही है, मगर इससे हालात सुधरने की कोई संभावना नहीं दिखती। उल्टा इसके नतीजे गंभीर हो सकते हैं।

देश के सभी प्रमुख अर्थशास्त्री और कई उद्यमी भी लगातार कह रहे हैं कि सरकार को पैकेज देने की जरूरत नहीं है, सरकार सिर्फ बाजार में मांग बढा़ने के उपाय करे।

जो उद्यमी ऐसे समय में भी सरकार से पैकेज मांग रहे हैं, वे सिर्फ लालची हैं।


पैकेज देने से उद्योगों के लिए पूंजी की तरलता तो बढ़ेगी मगर इससे मांग भी बढ़ेगी, ऐसा कोई संबंध नहीं है। मांग बढ़ाने के लिए सरकार को बिल्कुल इतर उपाय करने होंगे।

सरकार ने क्या किया है इसे ट्रेडमिल पर दौड़ रहे व्यक्ति के उदाहरण से समझते हैं-

मान लीजिए कि ट्रेडमिल पर खड़ा व्यक्ति देश की अर्थव्यवस्था है। ट्रेडमिल के रनिंग ट्रेक या पहिए की गति ही मांग है। दौड़ने वाले पांव उद्योग हैं। सहारा देने वाले हत्थे ही सर्विस सेक्टर और कृषि क्षेत्र है। ट्रेडमिल बहुत ही धीमे धीमे चल रही है। नतीजतन अर्थव्यवस्था ने दौड़ना बंद कर दिया है और वह धीमे धीमे ही चल पा रही है।

ऐसे में अर्थव्यवस्था की गति बढ़ाने के लिए अब सरकार को क्या करना चाहिए?

जाहिर है कि ट्रेडमिल की गति बढ़ानी चाहिए अर्थात मांग बढ़ानी चाहिए। बाजार में मांग होगी तो उद्यमी उत्पादन बढ़ाएंगे, इस तरह उत्पादन के साथ विकास दर भी बढ़ेगी।

मगर सरकार कर क्या रही है?

सरकार पैकेज और राहत लेकर तरलता बढ़ा रही है, यानी वह ट्रेडमिल पर खड़ी अर्थव्यवस्था के जूतों में तेल और ग्रीस लगा रही है। सरकार न्यूटन के नियम पर काम कर रही है उसे लगता है कि घर्षण कम होगा तो अर्थव्यवस्था तेजी से दौड़ेगी।

मगर क्या इससेे अर्थव्यवस्था तेजी से दौड़ने लगेगी? नहीं। इससे खड़े खड़े ही फिसलने का खतरा है।

अगर बाजार में मांग ही नहीं हो तो तरलता बढ़ाने का उपाय बेकार है। इससे पैसा और तेजी से बाहर जाएगा।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को उद्योगो को 1लाख 45 हजार करोड़ की राहत देने की घोषणा की। तत्काल शेयर बाजार 900 अंक उछल गया। अगर बाजार में मांग नहीं है तो यह उछाल दूध के उफान जैसा है। विदेशी निवेशक इस उफान से मलाई उतारकर जल्द ही निकल लेंगे। आने वाले सप्ताह में गिरते बाजार के रूप में यह नजारा दिख सकता है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि विदेशी निवेशक इस उछले हुए बाजार से दोनों हाथ भरकर खुश होकर निकलें।

जो अर्थव्यवस्था को चाहिए था वह सरकार ने नहीं किया। सरकार ने वह किया है जो एक समझदार सरकार को इस परिस्थिति में बिल्कुल नहीं करना चाहिए था।



Tuesday, September 17, 2019

एक ही आदमी बचा सकता है मंदी से


वित्तमंत्रालय से लेकर RBI तक लगता है सब थैलियां सिलने में ही लगे हैं। शक्तिकांत साहब पहली तिमाही के डाटा पर अब चौंक रहे हैं।

आफिस में बैठकर ठीक से डाटा अध्ययन करते तो अप्रैल मई और जून में ही चौंक चौंक कर आंखें और अक्ल इतनी चौड़ी हो गई होती कि ढंग के नीतिगत उपाय करते। अभी जो स्थिति है उसमें दूसरी तिमाही और बुरी तरह चौंकाने वाली है। विकास दर 4 फीसदी रह जाए तो चौंकना मत।

अगर कोई अर्थशास्त्री होता तो अप्रैल में ही चौंक गया होता। इतिहास का छात्र है, इसलिए चीज के इतिहास हो जाने के बाद ही चौंकता है।

शक्तिकांत के देर से चौंकने के लिए आप उसे दोष न दें, बल्कि देश उस व्यक्ति की अक्ल से तत्काल सावधान हो जाए जिसने देश के प्रख्यात अर्थशास्त्रियों की उपेक्षा कर एक इतिहास पढ़ने वाले को RBI का खजाना सौंप दिया।

साहब और शक्तिकांत दोनों का अर्थशास्त्र एक जैसा है। त्राहि त्राहि करता बाजार कहता है कि उपाय करिए तो वह रेपो रेट थोड़ा और कम कर देते हैं। उपाय के नाम पर बस यही आता है। ऐसे इतिहासकार अगर घटा घटाकर रेपो रेट शून्य पर भी ले जाएं और पूरी अर्थव्यवस्था को ही इतिहास कर दें तो भी चौंकना मत।

बाजार डिमांड बढ़ाने के उपाय करने को कहता है तो जनाब लिक्विडिटी बढ़ाने के उपाय करने लगते हैं। लिक्विडिटी बढ़ाने का फायदा तो तब है जब बाजार में मांग हो।

मांग कैसे बढ़े? 1930 के बाद पहली बार देश में यह सवाल खड़ा हुआ है। भगवान की दया से इतनी आबादी है कि कभी मांग का संकट नहीं रहा, हमेशा मुद्रास्फीति ही काटने को दौड़ती रही अर्थात मांग तो आपूर्ति से ज्यादा बनी रही। मगर अब मांग ही नहीं है।

अब मांग क्यों सूख गई? जनता की क्रयशक्ति किसने छीनी ली? कौन है जो नौकरियों पर कुंडली मारकर बैठा है? भर्तियां कर नहीं रहा है, लोगों के रोजगार छीनने के रोज नये उपाय कर रहा है? गरीब और मध्यम वर्ग को निचौड़ रहा है?

जब तक इन सवालों को नहीं टटोलेंगे इस मंदी का समाधान मिलने वाला नहीं।

Sunday, September 15, 2019

यह गलती ले डूबी विक्रम को


चंद्रयान-2 का लैंडर विक्रम लैंडिंग के दौरान कैसे चकमा खा गया? इसका राज लैंडिंग के दौरान का उसका डाटा खोलता है।

इस डाटा से जो तस्वीर बनती है वह कुछ इस तरह है।

विक्रम अॉटो लैंडिंग कर रहा था और वर्टिकल दूरी तथा गति का डाटा इसरो के नियंत्रण कक्ष तक भी आ रहा था। मगर क्या यह डाटा रियल टाइम और रियल था?

असल में यह डाटा विक्रम के कंप्यूटर में पहले से फीड 15 मिनट के लैंडिंग प्रोग्राम का डाटा था। इसी फीड प्रोग्राम के मुताबिक विक्रम को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरना था और वह इसी के अनुरूप उतर रहा था, लैंडिंग प्रक्रिया के दौरान इसमें कोई बदलाव संभव भी नहीं था।

अगर इस प्रोग्राम में फीड वर्टिकल दूरी से वास्तविक दूरी चार किलोमीटर से ज्यादा कम निकले तो सोचिए क्या हुआ होगा?

जब विक्रम के कंप्यूटर का आखिरी डाटा उसे चांद की सतह से 2.1 किलोमीटर ऊपर दिखा रहा था, क्या तब वह वास्तव में चांद की सतह पर था? नतीजा तो यही बताता है।

इस डाटा के मुताबिक विक्रम की गति तब 48 मीटर प्रति सैकेंड यानी 173 किलोमीटर प्रति घंटे के करीब थी। 1471 किलो का विक्रम जब इस गति से चांद की सतह से टकराया तो साबुत कैसे बच गया? यह धरती पर 245 किलो वजन की चीज की 173 किमी/घंटा की गति पर टक्कर के बराबर था।

इस लिहाज से विक्रम काफी नाजुक था। विक्रम को इस तरह बनाया गया था कि वह चांद की सतह पर अधिकतम 2 मीटर प्रति सैकेंड की गति अर्थात 7.2 किमी/घंटा पर लैंडिंग में ही सुरक्षित था? तब यह सतह पर साबुत कैसे मिला?

आर्बिटर से मिली थर्मल इमेज के हवाले से इसरो इसकी पुष्टि कर चुका है लैंडर चांद की सतह पर साबुत और तिरछा पड़ा है।

इससे दो सवाल पैदा होते हैं-

अगर तेज गति से क्रेश लैंडिंग थी तो विक्रम साबुत कैसे हैं?

अगर विक्रम साबुत है तो संपर्क क्यों टूट गया?

इसका जवाब यहां छुपा है।

यह तय है कि विक्रम अगर साबुत है तो लैंडिंग प्रक्रिया के अनुरूप इंजन और थ्रस्टर चलते रहे होंगे और ये प्रक्रिया पूरे 15 मिनट ही चली होगी। जबकि 11वें मिनट के बाद हमारा उससे संपर्क टूट गया था।

अब हम लैंडिंग को दसवें मिनट से लेते हैं-

रफ ब्रेकिंग चरण के दस मिनट बीत चुके हैं विक्रम का डाटा वर्टिकल ऊंचाई पांच किलोमीटर बता रहा है मगर वास्तव में यह सतह से कुछ सौ मीटर ऊपर ही रह गया है। गति इतनी है कि सतह से टकराते ही विक्रम के टुकड़े हो जाएं मगर तभी फाइन ब्रेकिंग के लिए थ्रस्टर ऑन हुए। रफ ब्रेकिंग के दौरान जो विक्रम क्षैतिज अवस्था में नीचे आ रहा था सीधा हो गया।

विक्रम के सीधा होते ही थ्रस्टर्स और 800 न्यूटन के चार तरल ईंधन इंजनों ने इतना बल पैदा किया कि इसे सतह से टकराने नहीं दिया मगर थ्रस्टर और इंजनों से सतह पर मौजूद धूल बड़ी मात्रा में उड़ी और विक्रम को ढंक लिया, इस धूल की वजह से विक्रम का संपर्क टूट गया मगर अंदर कंप्युटर सुरक्षित था और लैंडिंग प्रोग्राम पूरे तय 15 मिनट चला। यह दृश्य एक फंसी हुई आतिशबाजी की तरह था। इंजन और थ्रस्टर जब बंद हुए तो यह एक तरफ लुढ़क गया।

Thursday, September 12, 2019

ट्रैफिक सुधार के लिए चंडीगढ़ मॉडल


ज्यादातर शहरों में हमारे पास ट्रेफिक का ऐसा गुजरात मॉडल है

चंडीगढ़ देश के उन गिने-चुने शहरों में है जहां लोग ट्रैफिक नियमों का सबसे ज्यादा पालन करते हैं। ऐसा अब शुरू नहीं हुआ है वर्षो से है। जाहिर है कि वहां नियम पालन की वजह भारी-भरकम जुर्माना नहीं है। जब जुर्माना कम था तब भी अधिकांश लोग नियमों का पालन करते थे, यहां तक कि रात में हाईबीम पर गाड़ी भी नहीं चलाते।

जो भक्त ये मान रहे हैं कि सिर्फ जुर्माना बढ़ाने से ही नियमों का पालन हो सकता है, उन भक्तों की बुद्धि पर और ऐसे नियम बनाने वाले नेताओं की कमअकली पर सिर्फ तरस खाया जाना चाहिए।

चंडीगढ़ में भी पांच दस फीसदी ऐसे गुंडा मवाली तत्त्व हैं जो बुलेट से पटाखे छोड़ते हैं, हेलमेट नहीं लगाते, उन्हें हर ट्रेफिक नियम तोड़ने में मजा आता है और आसानी से पकड़ में नहीं आते। जुर्माना कितना भी बढ़ जाए वे नहीं रुक सकते।

मगर वहां अधिकांश लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करते हैं तो इसकी वजह क्या है? भारी-भरकम जुर्माना इसकी वजह नहीं है। जो कम जुर्माना राशि पहले थी, लोग उस पर भी पालन कर रहे थे।

अतः वजह जुर्माना नहीं बल्कि वहां मौजूद नियमित जांच की एक आदर्श व्यवस्था है। पुलिस के पास पर्याप्त स्टाफ है जो नियमित जांच करता है। हर चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल हैं। जैब्रा लाइन्स हैं। ट्रैफिक पुलिसकर्मी हैं।

दूसरी ओर अन्य राज्यों और शहरों में जहां पुलिस स्टाफ जरूरत से बेहद कम है, ट्रैफिक जांच महीने में एकाध बार होने वाला कमाई उत्सव ही है। इसलिए वहां के लोग ट्रैफिक नियमों के प्रति कभी जागरूक नहीं हो पाये।

अब जैसे लोग, उन्हें वैसी ही सरकार भी मिल गई। एक ऐसी सरकार जो चंडीगढ़ जैसी मौजूद आदर्श व्यवस्था को छोड़कर दक्षिण भारतीय फिल्मों से प्रेरणा लेकर नये ट्रैफिक जुर्माना नियम बनाती है, जिसका एक ही जानवर सिद्धांत है कि लोगों के चेहरे पर डर दिखना चाहिए।

अगर सरकार सचमुच चाहती है कि पूरे देश में ट्रैफिक नियमों का सही से पालन हो तो हर शहर और हाइवे टोल प्लाजा के पास नियमित जांच व्यवस्था हो। ट्रैफिक सिग्नल हों और पार्किंग की समुचित व्यवस्था उसे तत्काल करनी चाहिए।

जुर्माना राशि भले न्यूनतम हो मगर यह सुनिश्चित हो कि ज़ो रोज गलती करेगा, उसका रोज चालान होगा। वह बच नहीं सकता। छह चालान के बाद लाइसेंस रद्द हो जाएगा। विकसित देशों में जहां ट्रैफिक नियमों का पालन अच्छे से होता है तो उसकी एक ही वजह है, प्रर्याप्त और नियमित जांच व्यवस्था।

दुनिया में देशों की नीतियां विद्वानों की समितियां समुचित अध्ययन के बाद तैयार करती हैं। मगर हमारे यहां तो यह फिल्म देखकर भी तय हो सकती है।

कोई नई दवा भी तैयार होती है तो ऐलोपेथी में उसके परीक्षण की एक लंबी प्रक्रिया के बाद उसे इंसान पर इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही संभावित साइड इफेक्ट्स की सूची भी रिसर्च के दौरान ही तैयार की जाती है।

दूसरी ओर आयुर्वेद में घातक स्टीरायड युक्त शिवलिंगी, हाइली एल्काइड (घातक क्षारीय)आक और किडनी को ध्वस्त करने में सक्षम भारी तत्वों पारा और सोने की भस्म भी बिना किसी परीक्षण सीधे इंसान को खिला दी जाती है, ऊपर से यह भी दावा किया जाता है कि इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता।

भारी-भरकम जुर्माना भी लोगों को पारे की भस्म खिलाने जैसा ही इलाज है। इस इलाज के साइड इफेक्ट्स छुपे नहीं हैं और इससे कोई सुधार होगा लगता नहीं। क्या अब बुलेट के पटाखों की आवाज कम हो गई है? नहीं।

हां शरीफ लोगों के चेहरे पर डर जरूर है। कुछ शरीफ लोग अपनी गाड़ी से चलना कम कर देंगे। बहुत से ड्राइवरों की नौकरी जाएगी। कोई मालिक नहीं चाहेगा कि वह अपने ड्राइवर की एक गलती का इतना जुर्माना चुकाये जो उसकी मासिक सेलरी से भी ज्यादा है।

Wednesday, September 11, 2019

मुर्दा होती कौम


1919 की तुलना में 2019 का समाज एकदम मुर्दा समाज है।

1919 में जब दमनकारी रोलेट एक्ट लागू किया गया तो विरोध में समाज उठ खड़ा हुआ। अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा।

ऐसा नहीं है कि भक्त तब नहीं थे। तब भी अंग्रेजों के भक्त समाज में भरे पड़े थे। वे भी रोलेट एक्ट के फायदे गिनाते थे। मगर तब का समाज जिंदा समाज था और लोग इतने समझदार थे कि दमनकारी और पालनकारी नीति का अंतर बखूबी समझ लेते थे।

सास-बहू और नाग-नागिन देखकर बड़ी हुई इस पीढ़ी में वह समझ नहीं दिखती।

गुजरात की राज्य सरकार ने मोटर व्हीकल एक्ट के नये जुर्माना नियमों को लागू करने से इनकार कर दिया है। गुजरात के लोगों को यह छूट मिलनी भी चाहिए। रोलेट एक्ट के प्रावधान अंग्रेजों पर लागू नहीं थे। सिर्फ उन्हें ही अव्वल और विश्वसनीय नागरिक माना गया था। बाकी देशवासी दोयम दर्जे के नागरिक थे।

मुर्दा कौम से ही सरकारें मनमाने जुर्माने वसूल सकती हैं। जिंदा कौमें तो नमक पर भी टैक्स देने से इन्कार कर देती हैं। गांधी का सत्याग्रह यही सिखाता है। कानून पहले भी था, जुर्माना पहले भी था मगर ऐसा मनमाना और दमनकारी नहीं था, जिसकी जद में आटो और ट्रक चालकों की रोजी-रोटी भी आ जाए।

Tuesday, September 10, 2019

7 दिन के हिसाब में छुपा है लैंडर विक्रम का दुर्भाग्य



चंद्रयान-2 की लांचिंग पहले 15 जुलाई को होनी थी और विक्रम की लैंडिंग 7 सितंबर को। मगर लांचिंग ऐन मौके पर रोकनी पड़ी। सफल लांचिंग सावन के पहले सोमवार 22 जुलाई को हुई मगर लैंडिंग का समय नहीं बदला जा सकता था, क्योंकि 7 सितंबर को ही उस हिस्से में दिन होना था जहां लैंडिंग प्रस्तावित थी।


इससे कुछ सवाल उठते हैं।

चंद्रयान-2 मिशन के पूर्व शेड्यूल टाइम में 7 दिन की कटौती क्या लैंडर विक्रम को भारी पड़ी?

क्या सात दिन की भरपाई के लिए चांद के कक्षा क्षेत्र में चंद्रयान को कम समय दिया गया? क्या इस वजह से लैंडर विक्रम लैंडिंग से पहले अपनी गति तय प्रोग्राम के अनुरूप कम नहीं कर सका?

15 जुलाई को जो पहला लांचिंग शेड्यूल प्रस्तावित था वह 54 दिन का था। यानी 54वें दिन लैंडिंग होनी थी। उसके मुताबिक चंद्रयान को चंद्रमा की कक्षाओं में अपने घटनाक्रम पूरे करने के लिए कुल 32 दिन मिलने थे। मगर नये शेड्यूल में उसे इस सारे काम के लिए 20 अगस्त से 7 सितंबर तक सिर्फ 18 दिन ही मिले यानी पूरे 12 दिन कम।

दूसरी ओर धरती की कक्षाओं में यान ने 6 दिन का ज्यादा समय लिया। पहले शेड्यूल में इसे 17 दिन में पृथ्वी की कक्षाओं में अपने घटनाक्रम पूरे करने थे मगर नये शेड्यूल में उसे 22 जुलाई से 14 अगस्त तक कुल 23 दिन लगे।

यहां यह भी समझना जरूरी है कि जब चंद्रयान-2 धरती की कक्षाएं बदल रहा था तो उसकी गति लगातार तेज हो रही थी, वहीं चंद्रमा पर छोटी कक्षाओं में जाते हुए गति धीमी होती गई।

अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की टीम के साथ कार्यक्रम की कवरेज करने वाले नेशनल ज्योग्राफिक के हवाले से न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि लैंडिंग से पहले जब फाइन ब्रेकिंग चरण शुरू हुआ तो विक्रम की गति निर्धारित गति से ज्यादा थी। करता उसे गति कम करने का प्रर्याप्त समय नहीं मिला।

इसरो की ओर से 4 अगस्त को विक्रम के 35 किमी x101 किमी की कक्षा में आ जाने की जानकारी दी गई। यानी इस कक्षा में न्यूनतम बिंदु पर भी चांद की सतह से ऊंचाई 35 किमी होनी थी। इसी कक्षा से लैंडिंग हुई।

मगर शनिवार तड़के 1:38 बजे लैंडिंग शुरू होते ही विक्रम से जो डाटा मिला उसमें विक्रम की चांद की सतह से ऊंचाई 30 किलोमीटर से कुछ ही ज्यादा थी।

इसरो सारे डाटा की जांच कर रहा है। इसकी भी जांच होगी कि क्या चांद के स्पेस में विक्रम को पर्याप्त समय नहीं मिला?

अब चलतें है फ्लैशबैक में

15 जुलाई को सभी तैयारियां पूरी थीं। उलटी गिनती चालू थी। राष्ट्रपति लांचिंग देखने के लिए बेंगलुरु में थे। जीएसएलवी मार्क-3 राकेट से लांचिंग तड़के 2 :52 बजे होनी थी। सीधा प्रसारण शुरू था। मगर 55 मिनट पहले ही लांचिंग रोक दी गई। तीन दिन बाद 18 जुलाई को इसरो ने आधिकारिक रूप से सिर्फ इतना ही बताया कि कोई तकनीकी रोड़ा था।

हांलांकि मीडिया में ऐसी खबरें जरूर दिखीं कि क्रायोजेनिक स्टेज में लिकेज मिली है। अगर ऐसा होता तो लीकेज जांच और पूरे मॉड्यूल की रिअसैंम्बलिंग में लंबा समय लग सकता था मगर इसरो से इसी दिन 22 जुलाई का नया लांचिंग शेड्यूल भी आ गया।

22 जुलाई को दोपहर 2:40 बजे प्रधानमंत्री की गरिमामय उपस्थिति में चंद्रयान-2 की सफल लांचिंग हुई।


इस 7 दिन के अंतर से क्या नुकसान हुआ? और इसका जिम्मेदार कौन है? इसका जवाब आप इसरो चीफ के आंसुओं और बेबसी में तलाश सकते हैं।

इस मामले में डॉ के सिवन और इसरो को दोष नहीं दिया जा सकता। यह टीम इस सदी के महान वैज्ञानिकों में शुमार होने की कूवत रखती है।

जब देश की सेना नारियल फोड़ने को विवश हैं तो एक वैज्ञानिक ऐसा करने से कैसे बच सकता है। उसकी टीम की तो दस साल की मेहनत दांव पर लगी थी। यह टीम अब भी 99 फीसदी सफल है। इसे बधाई देने में कंजूसी न करें।



Monday, September 9, 2019

अपने वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों पर भरोसा करें




इसरो का चंद्रयान अभियान विज्ञान का एक महान प्रयोग रहा। वैज्ञानिकों के समर्पण ने इसे किफायती बनाया। इसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है।


इसकी महानता का अंदाजा इससे लगाइए कि जितनी कीमत हमने एक राफेल विमान की फ्रांस को दी है, चंद्रयान-2 की लागत उससे करीब आधी है। यानी कुल 36 राफेल विमान सौदे की कीमत में तो इसरो चंद्रयान-2 जैसे 70 से ज्यादा मिशन पूरे कर सकता है।

इस दौर में दुनिया की शक्तियों के बीच हथियारों और लड़ाकू विमानों से पारंपरिक युद्ध नहीं लड़े जाने हैं। अब लड़ाई का मैदान अंतरिक्ष और आर्थिक मोर्चा है।

जिस देश के पास योग्य और कुशल अर्थशास्त्री और वैज्ञानिक होंगे और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होंगे, भविष्य की लड़ाई में वे देश ही टिकेंगे और तरक्की करेंगे।

राजनीतिक हस्तक्षेप इतना नहीं होना चाहिए कि योग्य अर्थशास्त्री देश के लिए काम न कर पाएं और छोड़कर निकलने को मजबूर हों। हस्तक्षेप इतना न हो कि सावन के सोमवार के लिए वैज्ञानिकों को अपने पूरे प्रयोग का शेड्यूल ही बदलना पड़े और वे विफलता पर विवश होकर आंखों में आंसू भरकर रह जाएं।

जब आप अपने मिग-21 से अमेरिकी एफ-16 मार सकते हैं तो राफेल की खरीद एक विकसित देश से ऐसे कबाड़ की खरीद है, जिसका भविष्य में शायद ही कभी इस्तेमाल हो।

यही धन आप इसरो और डीआरडीओ को दे सकते हैं। ये 60 करोड की लागत में आपको अग्नि पांच बनाकर देते हैं। यानी एक राफेल की कीमत में करीब 300 मिसाइलें। दुश्मन हिमाकत की कोशिश करें तो उसके कुछ सोचने से पहले ही अंतरिक्ष से निशाना बनाएं।

मगर अपने वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों से ये लाभ हम तभी ले पाएंगे, जब उन पर भरोसा करेंगे। उनकी सलाह पर अमल करेंगे। अगर सब कुछ राजनीति ही तय करेगी तो हम विकसित देशों के हथियारों का कबाड़ खरीदकर अपने लिए सिर्फ आर्थिक संकट खरीदेंगे। नेताओं का हस्तक्षेप अपने वैज्ञानिकों की विफलताओं का कारण बनेगा। उनकी आंखों में आंसू भर देगा।

मगर आंसू पौंछने की राजनीति का अपना ही आनंद है।

Wednesday, August 28, 2019

आरबीआई की लूट है लूट सके तो लूट

सरकार अब आरबीआई से 1.76 लाख करोड़ रुपए लाभांश और सरप्लस पूंजी के तौर पर लेने जा रही है। 1991 में चंद्र शेखर सरकार ने आरबीआई से लेकर सोना गिरवी रखा था। वह कदम देश की अर्थव्यवस्था पर काफी भारी पड़ा था। 29 साल बाद फिर मोदी सरकार ने आरबीआई की गोलक पर नजर डाली है। इसके क्या नतीजे हो सकते हैं, अर्थशास्त्रियों की बातों पर गौर करें। उनके बयान मीडिया रिपोर्टों से कापी पेस्ट हैं।

विदेशी निवेशक भागेंगे

कार्लटन यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर विवेक दहेजिया ने आरबीआई से सरकार के पैसा लेने पर कहा है, ''केंद्रीय बैंक अपनी कार्यकारी स्वायत्तता खो रहा है और सरकार के लालच को पूरा करने का ज़रिया बनता जा रहा है. इससे रिज़र्व बैंक की विश्वसनीयता कमज़ोर होगी. जो निवेशक भारत की तरफ़ देख रहे हैं वो कहेंगे कि आरबीआई पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है. मुझे नहीं लगता कि यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है.''

बहुत बुरे नतीजे होंगे
आरबीआई के उप गवर्नर रहे विरल आचार्य ने सरकार को चेताया था कि सरकार ने आरबीआई में नीतिगत स्तर पर हस्तक्षेप बढ़ाया तो इसके बहुत बुरे नतीजे होंगे. विरल आचार्य ने पिछले साल कहा था कि सरकार आरबीआई के पास सुरक्षित पैसे को हासिल करना चाहती है. इसके दो महीने बाद ही उर्जित पटेल ने आरबीआई से इस्तीफ़ा दे दिया था.

विरल आचार्य आरबीआई के डिप्टी गवर्नर के रूप में 26 अक्तूबर, 2018 को चर्चा में आए थे जब उन्होंने आरबीआई की स्वायत्तता से समझौता करने का आरोप लगाते हुए मोदी सरकार को खरी-खोटी सुनाई थी. उनका ये भाषण रिज़र्व बैंक की बोर्ड बैठक के ठीक तीन दिन बाद हुआ था. क़रीब डेढ़ घंटे के भाषण में तब उन्होंने कहा था कि जो सरकारें अपने केंद्रीय बैंकों की स्वायत्तता का सम्मान नहीं करतीं, उन्हें देर-सबेर वित्तीय बाज़ारों के ग़ुस्से का सामना करना ही पड़ता है.

संदिग्ध आंकड़े
वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता ने कहा, ''जिस दिन शक्तिकांत दास आरबीआई के गवर्नर बने उसी दिन साफ़ हो गया था कि सरकार जो चाहेगी उसे आरबीआई को करना होगा. शक्तिकांत दास आईएएस अधिकारी रहे हैं और वह वित्त मंत्रलाय में प्रवक्ता के तौर पर काम करते थे. जब नोटबंदी हुई तो दास ने समर्थन किया था. शक्तिकांत दास दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज में इतिहास पढ़ रहे थे. दास ने सरकारी अधिकारी के तौर पर काम किया है. रिज़र्व बैंक के पास पैसे का होना बहुत ज़रूरी है क्योंकि विदेशी मार्केट में कुछ होगा तो रुपया और कमज़ोर होगा. सरकार के आंकड़े पहले से ही संदिग्ध हैं. इस बात को मोदी सरकार के पूर्व आर्थिक सलाहकार भी उठा चुके हैं.''

प्रियरंजन दास ने जो कहा था

आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ प्रियरंजन दास ने सरकार की नीयत और नीतियों के संबंध में कुछ माह पहले ही कहा था कि "पिछले दिनों मोदी सरकार ने आरबीआई से जो 3.61 लाख करोड़ रुपये मांगे हैं उसकी कड़ी नोटबंदी के ग़लत फ़ैसले से मिलती है. सरकार आरबीआई से पैसे इसलिए माँग रही है क्योंकि सरकार ये सोच रही थी कि नोटबंदी से वो तीन या साढ़े लाख करोड़ रुपए काला धन पकड़ेगी यानी ये राशि सिस्टम में वापस नहीं आएगी. सरकार सोच रही थी कि ये राशि वो आरबीआई से ले लेगी. अब वो हुआ नहीं तो सरकार बैंकों की मदद करने के नाम पर आरबीआई से साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये माँग रही है."

अब सरकार की सुनो : कुछ भी तय नहीं

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आरबीआई से पैसा लेने पर मंगलवार को पहली प्रतिक्रिया दी. प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने बताया कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से मिले फंड को कैसे खर्च किया जाएगा, इसका निर्णय अभी नहीं लिया गया है. उन्होंने कहा कि RBI से मिले फंड्स का उपयोग कैसे होगा इस विषय पर अभी कुछ बोल नहीं सकती हूं. हम निर्णय लेंगे उसके बाद आपको इसकी जानकारी मिल जाएगी. इसके अलावा वित्त मंत्री ने बिमल जलान समिति समिति पर उठ रहे सवालों को बेबुनियाद बताया।

Monday, August 26, 2019

मंदी आई नहीं, बुलाई गई


रोजगार मुहैया कराने में देश का दूसरा सबसे बड़ा सेक्टर कपड़ा उद्योग जीएसटी लगाये जाने के बाद से तबाह हो रहा है। कपड़ा पहले कर मुक्त था। हां अंग्रेजी शासन के समय अवश्य इसे तबाह करने के लिए भारी भरकम कर लगाया गया था।

भारत में कपड़े पर जीएसटी लगाने का पूरा लाभ बांग्लादेश और चीन को मिल रहा है। नोटबंदी और जीएसटी के बाद से भारत के कपड़ा निर्यात में करीब 2 अरब डालर की गिरावट है। दूसरी ओर इस अवधि में बांग्लादेश और चीनी कपड़े का आयात दो अरब डालर से ज्यादा बढ़ा है। जीएसटी की वजह से लागत बढ़ी और भारतीय कपड़ा प्रतियोगिता से बाहर हो गया है।

कपड़ा उद्योग की बदौलत ही आज बांग्लादेश का टका भारतीय रुपये से ज्यादा मजबूत हो गया है।

कहा जा सकता है कि देश में मंदी आई नहीं है, बल्कि नासमझी भरी करतूतों से बुलाई गई है।

पांच साल पहले देश से कपड़ा निर्यात 37 अरब डाॅलर से ज्यादा का था, अब यह 35 अरब डॉलर से भी नीचे खिसक रहा है। दूसरी ओर कपड़ा आयात जो 5 अरब डालर का था अब 8 अरब को छूने की तैयारी कर रहा है। यानी आयात में 50 फीसदी की ग्रोथ है।

हम इतिहास से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

प्लासी के युद्ध से पहले भारतीय सूती और सिल्क के कपड़े की यूरोप, एशिया और अफ्रीकी बाजारों में तूती बोलती थी । ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स मिल ने अपनी किताब 'द हिस्ट्री आफ ब्रिटिश इंडिया' में इसका उल्लेख किया है। वह वर्ष 1813 का उल्लेख करते हैं कि इस बात के साक्ष्य हैं कि उस समय तक भारत के सूती और सिल्क उत्पाद ब्रिटिश बाजारों में 50 से 60 फीसदी तक मुनाफे पर बेचे जाते थे। इसके बावजूद वे ब्रिटिश कपड़ों से सस्ते पड़ते थे । इसलिए ब्रिटिश उद्योग को बचाने के लिए यह जरूरी हो गया था कि भारतीय कपड़े पर 70 से 80 फीसदी ड्यूटी लगाई जाए। देश की सत्ता पर कब्जा करने के बाद अंग्रेजों ने ऐसा ही किया। कपड़े पर भारी भरकम कर लगाया।

इसलिए गांधी जी ने चरखा चलाकर अंग्रेजों की चूल्हें हिलाईं। उनका संदेश साफ था कि हर भारतीय अपनी जरूरत का कपड़ा खुद तैयार करेगा और अंग्रेजों को कर नहीं जाएगा।

इसी का असर था कि आजाद भारत में कपड़े पर कर नहीं लगाया गया और इस उद्योग ने भरपूर रोजगार पैदा किए और विदेशी मुद्रा कमाकर दी। दुनिया में साख भी बनाई।

मगर अब जीएसटी थोपे जाने के बाद इस उद्योग की हालत वैसी ही हो चली है, जैसी अंग्रेजों के समय भारतीय बुनकरों की हो गई थी। बनारस, मिर्जापुर, लुधियाना, फरीदाबाद ही नहीं महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण का भी यही हाल है। कोलकाता भी बांग्लादेश से आ रहे माल का ट्रेड सेंटर बनता जा रहा है।

उम्मीद है कि इस गांधी जयंती पर सरकार की आंखें खुलें और कपड़ा फिर कर मुक्त हो।