Friday, February 28, 2020

हमारा राजा अमर रहे



लघुकथा
जनता ने देशपति से कहा, मंत्री को राजधर्म की याद दिलाओ। देशपति खुद मालिक के प्रति अपने धर्म के बोझ से दबा था।

देशपति ने कहा - राजधर्म का चैप्टर बहुत कठिन है। आजकल कौन याद करता है। बच्चे नकल मार कर पास होते हैं। सब चलता है‌।

जनता अपने जख्म चाटती रुआंसी हो गई। देश मुस्कराया-हमारा राजा अमर रहे।
#सुराघव

Thursday, February 20, 2020

मोदी भटके, पूंजी पर अटके



मोदी सरकार जिस दकियानूसी तरीके से देश की अर्थव्यवस्था को चला रही उसने कार्ल मार्क्स के उस सिद्धांत को सच साबित कर दिया है, जिसे जॉन मायनार्ड केन्जे ने 1936 में ही खारिज कर दिया था।

पूंजीवादी व्यवस्था में सरकार की भूमिका कल्याणकारी सत्ता की रहती है, मार्क्स इसका आकलन करने में चूक गये थे। वह सरकार की भूमिका की पूरी तरह अनदेखी कर गये थे।

मार्क्स का मानना था कि पूंजीवादी व्यवस्था पूरी तरह लाभ केंद्रित होती है, लाभ बढ़ने के लिए संसाधनों का शोषण और लूट की जाती है। लाभ बढ़ाने के लालच से अधिशेष (Surpluses) बढ़ते हैं। मांग घटनी शुरू हो जाती है।

पिछले पांच साल में हमारे देश के कुछ शीर्ष पूंजीपतियों के लाभ जिस अभूतपूर्व तेजी से बढ़े हैं, उसका ही नतीजा है कि अर्थव्यवस्था कमजोर मांग के भंवर में फंसकर लगातार गिरती विकास दर से संकट की ओर बढ़ रही है। यहां मार्क्स सच साबित हो रहे हैं।

अब सवाल उठता है

मार्क्स के जिस सिद्धांत को नब्बे साल पहले ही खारिज किया जा चुका है, भारतीय अर्थव्यवस्था उस सिद्धांत की पुरानी उधड़ी पटरी पर कैसे पहुंच गई है?

इसका जवाब केन्जे की थ्योरी में छुपा है। इसके लिए केन्जे द्वारा 1936 में लिखी गई किताब The General Theory of Employment, Interest and Money को निर्मला सीतारमण को अवश्य पढ़ना चाहिए, जिसमें पूंजीवादी खामियों पर नियंत्रण के लिए सरकार की कल्याणकारी भूमिका पर जोर दिया गया है। केन्जे के इसी सिद्धांत ने दुनिया में मार्क्सवाद की धज्जियां उड़ाईं और पूंजीवाद में लोगों का विश्वास डिगने नहीं दिया।

केन्जे का सीधा सिद्धांत है कि विकास बढ़ाने के लिए सरकार को मांग बढ़ानी चाहिए। शीर्ष पूंजीपतियों का लाभ देश के अधिशेष में न बदले, इसके लिए करों का संयोजन इस तरह हो कि इस लाभ का बड़ा हिस्सा फिर सरकारी खजाने में पहुंचे, जिसे जनता को रोजगार देने में खर्च किया जाए ताकि मांग बढ़े। मांग बढ़ेगी तो विकास बढ़ेगा।

मगर मोदी सरकार ने ठीक इसका उल्टा किया। उसने जीएसटी से कर प्रावधान ऐसा किया, जिसका लाभ चंद बड़े पूंजीपतियों को हुआ। अर्थव्यवस्था में मांग घटी तो
पूंजीपतियों से अधिशेष निचोड़ने की जगह, उन पर उल्टे आर्थिक पैकेज बरसाए गये।

इसका नतीजा यह हुआ कि मार्क्स ने सरकार की कल्याणकारी भूमिका पर ध्यान न देकर अपने सिद्धांतों में जो ब्लंडर किया था, मोदी सरकार ने एक ऐसी आर्थिक अराजक सरकार की भूमिका निभाई जिसने जनकल्याण की अपनी जिम्मेदारी की अनदेखी कर कुछ पूंजीपतियों को मनमाना लाभ कमाने दिया, और मार्क्स के उस अव्यवहारिक मान लिए गये सिद्धांत को भी सच साबित कर दिया।

मोदी भले बातें किसानों की आय दूनी करने की कर रहे हैं, मगर किसानों की जमीन लेकर जिस तरह सड़कें बन रही हैं और उन सड़कों पर टोल जमीनों के मालिक रहे किसान नहीं बल्कि निजी कंपनियां वसूल रही हैं, उससे 18वीं सदी में यूरोप के छोटे किसानों की हालत सामने आती है, जिनकी जमीनें छीनकर भेड़ों के बाड़े बना दिए गये थे। मार्क्स ने अपनी किताब में इसका वर्णन किया है-

'18वीं शताब्दी में जो प्रगति हुई, वह इस रूप में व्यक्त होती है कि कानून खुद किसानों की जमीनें चुराने का साधन बन जाता है, हालांकि बड़े काश्तकार अपने छोटे स्वतंत्र उपायों का प्रयोग जारी रखते हैं। इस लूट का संसदीय रूप सामुदायिक ज़मीनों की बाड़ाबंदी से संबंधित कानूनों या उन अध्यादेशों की शक्ल में सामने आता है, जिनके द्वारा छोटे किसानों और जनता की सामुदायिक जमीन जमींदारों (अब कंपनियां समझें) की निजी संपत्ति घोषित कर दी जाती है।
#पूंजी (Das Capital) पृष्ठ-769, अध्याय-27

दुनिया की सरकारें भले ही आज अपनी अर्थिक समस्याओं से निपटने के लिए अभिजीत बनर्जी और रघुराम राजन के सिद्धांतों का अध्ययन कर रही हों, मगर हमारी अपढ़ और दकियानूस सरकार अर्थव्यवस्था को 18वीं सदी के तरीके से चला रही है। ऐसे में अगर देश की पूंजी को बचाने का रास्ता चाहिए तो कार्ल मार्क्स की 'पूंजी' का पुनर्पाठ अवश्य करें। साथ ही केंजियन थ्योरी का भी।

Wednesday, February 19, 2020

कैसा हे रे ट्रम्प!



गुजरात के संघी और भाजपाई आजकल 'नमस्ते सदा वत्सले' की जगह 'नमस्ते ट्रम्प' की दिन रात प्रेक्टिस कर रहे हैं।

'कैसा है रे मोदी' (Howdy Modi) कह कर पिछले साल अमेरिका के ह्यूस्टन में प्रवासी भारतीयों ने करोड़ों डॉलर खर्च कर मोदी जी को बुलवाकर ट्रम्प का प्रचार कराया था। दबाव इतना था कि मोदीजी को जोर से नारा लगाना पड़ा 'अबकी बार ट्रम्प सरकार'!

अब अहमदाबाद में ट्रम्प के अभूतपूर्व स्वागत की तैयारी की जा रही है। इस कार्यक्रम को पहले नाम दिया गया था 'केम छो ट्रम्प' (कैसा है रे ट्रम्प)। यह हाउडी मोदी का सही जवाब था। मगर ट्रम्प तो ट्रम्प है वह मोदी थोड़े ही है। लिहाजा भारत को कार्यक्रम का नाम बदलकर 'नमस्ते ट्रम्प' (ट्रम्प को नमन) करना पड़ा।

अब अहमदाबाद में एक लाख संघी और भाजपाई 'ट्रम्प को नमन' की प्रैक्टिस कर रहे हैं। ट्रम्प से दोस्ती की एक अजब दीवार भी बनाई गई है जो भारत और भारतीयों के बीच दीवार का रूप ले गई है। इस दीवार के एक ओर भारत के गरीब होंगे और दूसरी ओर ट्रम्प का भव्य स्वागत।

Saturday, February 15, 2020

भाजपा को ले डूबी सेट स्पीच


बीजेपी का बनवास जारी, क्या भाजपा को ले डूबी हेटस्पीच? https://www.navodayatimes.in/news/khabre/hate-speech-by-bjp-leader-anurag-thakur-and-pravesh-verma/137258/

Tuesday, February 4, 2020

हाफ पैंट में जिन्ना


सुधीर राघव

इस बार
जिन्ना आया है हाफ पैंट में
नाम बदलकर
धर्म बदलकर
शक्ल बदलकर

उसका गणवेश
उसकी भाषा
उसका चश्मा
उसकी बंडी
प्रेम
भाईचारे और
देश की एकता-अखंडता को
दे रहे हैं चुनौती

उसके अवचेतन में
कभी शैतान ने सुलगाई थी जो भट्टी
वह उस पर अपनी राजनीति पकाता है
और
बच्चों के हाथ में बंदूक देकर जोर से चीखता है
जिसमें भी दिखे प्रेम
जो भी दिखे धर्मनिरपेक्ष
करता हो भाईचारे की बात
ढूंढो हर उस आदमी को जो मानता है गांधी को
कहो उसे गद्दार और
'गोली मारो सालों को'

आज भी पाकिस्तान
उसके दिल में और जुबान पर रहता है
वह वहां से बुलवाता है
अपने जीजाओं को
देता है नागरिकता
और नवाजता है पद्मश्री
हर सच्चे भारतीय से उसे है नफ़रत
वह माइक पकड़कर चीखता है
'गोली मारो सालों को'

लोग कहते हैं
पाकिस्तान लेकर
जिन्ना चला गया था हमेशा के लिए
मगर उसका खून
रह गया था यहीं
नागपुर के संतरों का बाग
इसका गवाह है

उठो गांधी!
चलो डांडी मार्च पर
इससे पहले कि
सरकार हमारे लहू के नमक पर लगा दे टैक्स
हमें रोकना है जिन्ना को
नहीं तो वह पकड़ा देगा
हर बच्चे के हाथ में बंदूक
उसने पाकिस्तान में भी ऐसा ही किया है।
#सुराघव

यहां बोलती हैं चुप्पियां




यह अभिज्ञात की कविता है! यहां चुप्पियां बोलती हैं! हर दु:ख का स्वागत है!

हिंदी के प्रख्यात आलोचक और कवि केदारनाथ सिंह अभिज्ञात में ग़ालिब के उस रूप को पाते हैं जो अपने टूटने की आवाज का भी स्वागत करता है‌। कवि स्वयं भी कहता है -:
हर घर से दुत्कारे जाने वाले
हे दु:ख
यह एक कवि का घर है
स्वागतम्! स्वागतम्! (पृष्ठ-47)

बहुमुखी प्रतिभा संपन्न पत्रकार, लेखक, कवि, उपन्यासकार और अभिनेता डॉ. हृदय नारायण सिंह में छुपी इन अपार संभावनाओं को भांपकर ही कभी हिंदी के मूर्द्धन्य कवि हरिवंशराय बच्चन ने 'अभिज्ञात' उपनाम दिया था। इसी उपनाम से हृदय नारायण सिंह की लेखनी तीस साल से निरंतर रचना के नये संसार रच रही है। अभिज्ञात का नौवां काव्य संग्रह 'कुछ दु:ख, कुछ चुप्पियां' हमारे हाथ में है। यह बोधि प्रकाशन से आया है।

अभिज्ञात का कविता संसार भावनाओं का सागर है। उसे पढ़ना किसी उफनते सागर में नौका बिहार है। यह सागर कहीं एकदम शांत है, कहीं ऊंचे ज्वार हैं, कहीं भावनाओं के भाटे हैं तो कहीं चक्रवात और भंवर। मगर इस समुद्र के सफर में आप अकेले होकर भी अकेले नहीं होते। अभिज्ञात की कविता आपके साथ होती है। इसकी वजह है-
'गीत जब भी कोई गाता है
उसके होंठ नहीं
उसका हृदय उसमें होता है शामिल।' (पृष्ठ-19)

भावनाओं के संसार की रचना करते वक्त अक्सर कवि अंग्रेजी रोमांस युग के कवियों से ज्यादा आगे नहीं सोच पाते। जहां प्रेयसी द्वारा छोड़े गए प्रियतम की व्यथा दुःख की सबसे बड़ी कविता है। प्रकृति के लिए उपमाएं और रूपक गढ़ना ही रोमांच का चरम है या निराशा की लंबी-चौड़ी कथा के अंत में बसंत की झलक बता देना सबसे बड़ा आशावाद होता है।

मगर अभिज्ञात की कविता एकदम अलग सतह पर खड़ी मिलती है। अभिव्यक्ति के बहुत से नये रास्ते तलाशती है। कवि स्वयं कहता है- 'शब्दों के बीच की चुप्पी ही कविता है।' (पृष्ठ-43)

कवि मानता है कि मनुष्य जाति की निरुपायता का पहला और अंतिम हल कविता में ही छुपा है। देश और दुनिया में जो चल रहा है, कवि उसका चश्मदीद गवाह है और बिना डरे गवाही देता है-:

'जिस दौर में
कमजोर विपक्ष पर
बनाए जा रहे हों लतीफे
और लोग ले रहे हों उसका लुत्फ
वह कविता विरोधी समय ही है' (पृष्ठ-13)

'जब निष्कर्ष किसी के इंतजार में हों
जब सत्य की दिशा ख़ेमा तय करता हो
वह कविता विरोधी समय ही है' (पृष्ठ-14)

'शब्द केवल
दुष्प्रचार के काम आएं
शब्द केवल विज्ञापन बनें
कौन हैं शब्दों के हत्यारे...
यह सदी का सबसे बड़ा प्रश्न है

लेकिन यह हम
अब शब्दों में नहीं पूछ सकते
प्रश्न पूछने वाली
भाषा खो गई है
अब प्रश्न
पूछते ही
उठने लगती हैं
नीयत पर
उंगलियां।' (पृष्ठ-42)

मनुष्य के बारे में अभिज्ञात की समझ सीधे डार्विन को चुनौती देती है। वह इंसान को बंदरों की नहीं, बल्कि प्याज की एक उन्नत किस्म बताते हैं। पीठ सिर्फ इंसान का बोझ नहीं ढोती। वह मजबूरियों को ढोती है। इस पुराने विचार को नये बिंब इस कविता संग्रह में मिले हैं। यथा-:

'जिनके पेट खाली होते हैं
मुफ़ीद होती है उनकी पीठ इश्तिहार के लिए।' (पृष्ठ-36)

'पीठ ढाल नहीं
यह ढोल है
इसे बजाओ
यह बहुत कुछ कहेगी।' (पृष्ठ-35)

अभिज्ञात दुनिया को कई आंखों से देखते हैं। यही वजह है कि उनमें लिखने की भूख अनंत है। नौ कविता संग्रहों के अलावा उनके दो उपन्यास और तीन कहानी संग्रह भी आ चुके हैं।

Thursday, January 30, 2020

हाफ पैंट कोरोनावायरस



गांधी जी के नाम से क्यों कांपता है 'हाफपैंट कोरोनावायरस'?
आओ इस पर विचार करें।

एक निहत्थे, सरल, अहिंसक बुजुर्ग पर कोई इंसान भला कैसे गोली चला सकता है? कोई भी इंसान इतना घिनौना और गिरा हुआ नहीं हो सकता। वह भी तब जबकि वह बुजुर्ग कोई साधारण बुजुर्ग नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे महान विचार हो। ऐसा विचार जो सदैव अजर अमर है। इसलिए गांधी जी पर गोली चलाने वाल इंसान नहीं हो सकता। तब वह कौन था?

राष्ट्रपिता पर गोली चलाने वाला वह देशद्रोही असल में पहला घातक म्यूटेंट कोरोना वायरस था। उसका नाम था 'हाफपैंट कोरोनावायरस'!

समाज के एक कोने में अंग्रेजों को भगा दिए जाने से हताश होकर सड़ रहे हाफ पैंटियों के वैचारिक कचरे के प्रदूषण से यह 'हाफपैंट कोरोनावायरस' पनपा था। समाज में नफ़रत फैलाना इसका प्रमुख लक्षण था।

पटेल उस कचरे को तभी पूरी तरह साफ कर देना चाहते थे। मगर नेहरू ने ऐतिहासिक गलती करते हुए उन्हें रोक दिया था। आज नफ़रत का वह वायरस देश को फिर अपनी चपेट में ले रहा है।

चीन का 'नोबल कोरोनावायरस' ला इलाज हो सकता है मगर 'हाफपैंट कोरोनावायरस' लाइलाज नहीं है। इसका इलाज गांधी ही हैं। भाईचारा, प्रेम और अहिंसा का गांधी सिद्धांत नफ़रत के इस कीटाणु के खिलाफ अचूक दवा है।

यही वजह है कि गांधी जी की हत्या करने के बाद भी यह 'हाफपैंट कोरोनावायरस' उनके नाम से आज भी थर- थर कांपता है।

#पुण्यतिथी_पर_महान_आत्मा_को_नमन

Saturday, January 18, 2020

शाहीन बाग



बाग सिर्फ बाग नहीं होते
कभी मशाल भी होते हैं
जब नेता ही यह तय करने लगे कि
आम काटकर खाया जाएगा या
चूसकर

आम
आदमी हो जाता है मशाल लेकर
तब बाग सिर्फ बाग नहीं रहता
रोशनी की नई किरण हो जाता है


घाटियों की बर्फ पिघलती है
सुर्ख सेब निखर कर आते हैं
मगर जब नेता तय कर दे
सेब के तीन टुकड़े होंगे
तो बाग बाग नहीं रहता
तब संगीनें बाग हो जाती हैं
और उन पर उगते हैं
प्रतिबंध

शासक को लगी हो
खून की तलब तब
बाग बाग नहीं रहते
हो जाते हैं
जलियांवाला

नेता जब लोकतंत्र
को ठेंगे पर समझे
करने लगे
मनमानी
चारों ओर उगने लगती हैं
ख़ामोश मुंडियां
खूबसूरत और
खूबसीरत चेहरे
बाग तब बाग नहीं रहता
शाहीन हो जाता है!!

#सुराघव

Wednesday, January 15, 2020

क्या आपने नहीं सुना है

विरोध करना गुनाह है!
देश में लोकतंत्र है,
प्रजातंत्र है,
क्या आपने नहीं सुना है?

राजा के झूठ का ताना-बाना है
इसे करघे पर नहीं
जुबान से बुना है!
क्या आपने नहीं सुना है?

बज रहा है नक्कारखाने में तूती की तरह
यह शादी की शहनाई नहीं
किसी शंह शाह का तुन तुना है!
क्या आपने नहीं सुना है?

वह खाता भी है और लुटता भी
न खाऊंगा, न खाने दूंगा तो उसकी
मदहोशी का हुन हुना है?
क्या आपने नहीं सुना है?

न हिंदू न मुसलमान सब हैं इंसान
आप जो बजा रहे हैं
उसी का थमाया झुनझुना है!
क्या आपने नहीं सुना है?

प्यार खो गया जिस्म सब ठंडे हैं
वह गायब है
जो धूप सा गुनगुना है!
क्या आपने नहीं सुना है?

वे जागीं और देश को बचाने निकलीं
शाहीन बाग में
पायलों का शोर रुनझुना है!
क्या आपने नहीं सुना है?

#सुराघव

Tuesday, January 14, 2020

पिछले 400 साल में धर्म ने समाज को क्या दिया


सुधीर राघव

पिछले 400 साल में इंसान ने विज्ञान और धर्म को बिल्कुल अलग कर दिया है।

इस दौरान विज्ञान ने तेजी से तरक्की की। विज्ञान की यह तरक्की धर्मसत्ता पर कब्जा जमाने वाले मूर्ख और लालची लोगों को कभी नहीं रुचि और वे विज्ञान और आधुनिक शिक्षा के खिलाफ कुतर्क गढ़ते रहे।

सत्य की खोज में विज्ञान ने मौजूदा सभी धर्मों की तुलना में ज्यादा अच्छा काम किया है। उसने लगातार कुदरत के रहस्यों से पर्दा उठाया और प्रकृति के प्रति इंसान की समझ को लगातार विकसित किया।

दूसरी ओर पिछले चार सौ सालों में धर्म के नाम पर क्या हुआ? 400 साल का इतिहास गवाह है धर्म की आड़ में सदैव मूर्खों, लालची तथा क्रूरतम लोग राजनीतिक सत्ता पर काबिज हुए और उन्होंने आर्थिक रूप से अपने राष्ट्रों को बरबाद किया, बल्कि खून-खराबा भी किया।

यह किसी एक धर्म की बात नहीं है, सभी धर्मों के साथ यह खेल सत्तालोलुप लोगों ने धर्म की खाल ओढ़कर ही खेला है।

प्रकृति के बड़े सच से रूबरू कराने वाले गेलिलियो को मूर्ख धर्माधिकारियों द्वारा मौत की सजा सुना दी गई थी। उन्हें विवश किया गया कि अपने सिद्धांत को गलत बताएं। ऐसा करने पर गेलिलियो की मौत की सजा तो माफ़ कर दी गई मगर उन्हें बाकी उम्र कैदी के रूप में गुजारनी पड़ी। जो विज्ञानी लंबा जीवन जीता और नयी नयी खोज करता वह कैद में बीमारियों से 9 साल भी न जी सका।

यह सिर्फ गेलिलियो की मौत नहीं, बल्कि विज्ञान के आगे धर्म की पहली बड़ी हार थी। धर्म की यह हार हुई थी उन मूर्ख लोगों की वजह से जो धर्म की आड़ में सर्वोच्च ताकतवर हो गये थे।

गेलिलियो का सिद्धांत पुनर्जीवित हुआ और सौ साल के भीतर ही चर्च ने उस कृत्य के लिए माफी मांगी। यूरोप ने धर्म को वेटिकन तक सीमित कर दिया और आधुनिक शिक्षा और विज्ञान पर जोर दिया। लिहाजा अगली सदियों में पूरी दुनिया में यूरोप का परचम लहराया। सत्ता और ताकत बढ़ी थी विज्ञान से मगर शासकों के मन में धर्म के बीज ने फिर गलत रंग दिखाया और वे पूरी दुनिया में धर्म परिवर्तन कराने निकल पड़े। ऐसे कृत्यों ने दुनिया में घृणा को बढ़ाया। नतीजतन दुनिया ने दो दो विश्वयुद्ध झेले।

धर्म की खाल में छुपे मूर्खों की धर्म और ज्ञान में अनास्था का सबसे बड़ा सुबूत यह है कि वे नाम लेते हैं कि हम धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं, मगर युद्ध वे धर्म के हथियारों से नहीं लड़ते। तब वे विज्ञान के सिद्धांत पर विकसित हथियारों का ही इस्तेमाल करते हैं। तब वे तंत्र मंत्र, जादू-टोना और हवन यज्ञ के हथियारों से नहीं लड़ते।

दुनिया में एटम बम का इस्तेमाल एक बौद्ध देश के खिलाफ हुआ। जबकि दूसरे विश्वयुद्ध के ज्यादा बड़े खलनायक जर्मनी और इटली थे।

धर्म के नाम पर एकजुट हुए मित्रदेशों के मूर्ख शासनाध्यक्षों ने ऊर्जा और द्रव्यमान के संबंध के रहस्य से पर्दा उठाने वाले विज्ञान के महान सिद्धांत से एटम बम बनवाकर अपनी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया। सिद्धांत की खोज करने वाले और एटम बम बनाने वाले वैज्ञानिकों को अपनी खोज का ताजिंदगी अफसोस रहा। मगर बम का इस्तेमाल करने वाले शासक को कभी अपने कृत्य का अफसोस नहीं हुआ।

क्यों?

क्योंकि मूर्ख कभी अफसोस नहीं करते। वे हत्याएं करते और करवाते हैं और धर्म का चोला ओढ़कर चैन से सो जाते हैं। दूसरी ओर एक विद्वान वैज्ञानिक अपनी खोज का मूर्खों द्वारा दुरुपयोग कर लेने पर भी ताजिंदगी खुद को दोषी मानते हुए अफसोस करता है।

धर्म के नाम पर जब अफगानिस्तान में मुल्ला उमर और लादेन जैसे मूर्खों ने सत्ता संभाली तो उन्होंने न सिर्फ अफगानिस्तान की हर खूबसूरत चीज को तबाह किया बल्कि अपने मूर्खता पूर्ण कृत्यों से पूरी दुनिया में मुस्लिमों के प्रति नफ़रत को बढ़ाया। बौद्ध विहारों को नष्ट किया। महिलाओं पर पाबंदियां लगाईं। आधुनिक शिक्षा का विरोध किया। सदियों पुरानी पद्यति के मदरसों को बढ़ाया। नतीजा क्या निकाला।

उनके तालिबान ने भले धर्म के नाम जेहाद लड़ा मगर उनके हथियार धर्म के नहीं थे। चाहे वह एके-47 हो, स्टींजर मिसाइल हो, टैंक हों।

धर्म की आड़ में हमेशा मूर्ख और क्रूर लोग ही शीर्ष सत्ता पर काबिज होते हैं और देश को आर्थिक रूप से और सब तरह से बर्बाद करते हैं। शिक्षण संस्थानों को तबाह करते हैं यह हमें नहीं भूलना चाहिए।

धर्म व्यक्तिगत आस्था और विकास का महान साधन है और मूर्ख तथा जलील लोग इसे अपने लिए सत्ता की सीढ़ी बनाते हैं।

Saturday, January 11, 2020

भाजपा का ज्योतिष क्या कहता है


#जेएनयू, #जामिया और #जाधवपुर

भारतीय ज्योतिष के अनुसार ये तीनों नाम मकर राशि से हैं। मकर राशि के स्वामी शनि हैं। शनि को न्याय और सच का देवता माना जाता है।

उक्त तीनों विश्वविद्यालयों में भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार का कड़ा विरोध इस बात का ज्योतिषीय प्रमाण है कि शनिदेव भाजपा पर कुपित हो गये हैं। धर्म के नाम पर अधर्म करने, किसी से अन्याय करने और झूठ बोलने से शनि कुपित होते हैं। ऐसा प्राचीन ज्योतिष ग्रंथ मानते हैं।

भाजपा, भारतीय जनता पार्टी और बीजेपी; तीनों नामों से वृष राशि बनती है। वृष के लिए शनि भाग्येश हैं। ये आंदोलन इस बात के प्रतीक हैं कि भाजपा ने अपने गलत कार्यों से भाग्य के देवता को रुष्ट कर लिया है।

#एएमयू की राशि मेष बनती है और असम, अरुणाचल की भी। मेष के स्वामी मंगल हैं। भाई-बहन-बांधवों का अपमान करने और जमीन घोटाले करने से मंगल क्रुद्ध होते हैं। आडवाणी सहित वरिष्ठ बांधवों से जो व्यवहार हुआ वह किसी से छुपा नहीं।

बालकों और युवाओं का संबंध बुध ग्रह से हैं। बुध को बुद्धि, ज्ञान धन और ऋद्धि-सिद्धी का कारक माना जाता है। सरकार के खिलाफ छात्र आंदोलन बुद्ध के रुष्ट होने का प्रतीक है। सरकार की बुद्धि काम नहीं कर रही। कुछ सूझ नहीं रहा। प्रधानमंत्री जनता से सलाह मांग रहे हैं। अर्थव्यवस्था डांवाडोल हैं। निर्दोषों को सजा देने और अधिक पाप की वजह से बुध के कुपित होने के स्पष्ट संकेत हैं।

बलात्कार के मामले बढ़ रहे हैं। रेप पीड़िताओं पर जिस तरह उल्टी कार्रवाई हुई उसने लग्नेश शुक्र को भी नाराज कर दिया।

महाराष्ट्र में हाथ आई सत्ता का फिसलना सिंह राशि के स्वामी सूर्य के कुपित होने का संकेत है। पार्टी के बुजुर्गों का अपमान करने से बृहस्पति भी नाराज होते हैं। बृहस्पति की राशि मीन से दिल्ली चुनाव के नतीजे इसका संकेत देंगे।


भाजपा का मजबूत आईटी सेल इसके मजबूत राहू का संकेत है। राहू का प्रभाव बढ़ने से नेता बेहिचक झूठ बोल जाते हैं। राहू मजबूत होता है तो केतु भी मजबूत होता है। केतु श्वान शक्तियों को वफादार बनाता है।



Friday, December 27, 2019

हिंदू उत्पीड़न


उत्पीड़न किसी के अल्पसंख्यक होने की वजह से नहीं होता। उत्पीड़न बहुसंख्यकों का भी होता है। उन्नाव रेप केसों और चिन्मयानंद मालिश केस में सभी पीड़िताएं बहुसंख्यक समाज से हैं।

गुन्डों, पुलिस और प्रशासन ने पीड़ित परिवारों को जिस तरह प्रताड़ित किया, उसके आगे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की प्रताड़ना की कहानी भी छोटी लगती है।

असल में उत्पीड़न हमेशा पूरी दुनिया में गरीब का होता है। वह अल्पसंख्यक समुदाय से हैं या बहुसंख्यक, यह बात कोई मायने नहीं रखती।

जो संघी, नेता और टुकड़खोर गैंग यह कहता है कि पाकिस्तान में हिंदुओं के उत्पीड़न की कहानियां सुनकर उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं, वे यह नहीं बताते कि उन्नाव में जब रेप पीड़िताओं और उनके परिवारों को यातनाएं दी जा रही थीं, तब उनके रौंगटे कहां सो रहे थे? तब क्यों उठ खड़े न हुए।

देश में कुलदीप सेंगर, आसाराम, नित्यानंद, चिन्मयानंद, राम रहीम जिस तरह हिंदू बेटियों और उनके परिवारों को प्रताड़ित करते रहे, क्या वे यातनाएं रोंगटे खड़े करने वाली नहीं।

उत्पीड़न सिर्फ गरीब का हो रहा है, कुछ लालची और मूर्ख नेता मूर्ख वोटरों को साधने के लिए इसे जाति और धर्म से जोड़ देते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हुए घुसपैठियों को नागरिकता देने के लिए CAA जैसा कानून लाते हैं।

Tuesday, December 24, 2019

डबल इंजन की डबल गेम


देश में डबल इंजन सरकार है।

एक इंजन कहता है - No NRC
दूसरा इंजन कहता है - पूरे देश में NRC लागू करेंगे।

एक इंजन कहता है - मेरे पुतले को जूता मारो।
दूसरा इंजन कहता है - खबरदार! थारा-44 लागू है।

एक इंजन कहता है -5 Trillions की अर्थव्यवस्था बनाएंगे।
दूसरा इंजन कहता है - इंटरनेट बंद कर दो, लहसुन प्याज खाना जरूरी नहीं, व्यापार चौपट करो, रोजगार कम करो।

एक इंजन कहता है - सबका साथ सबका विकास।
दूसरा इंजन कहता है - पाक बंग्लादेश और अफगानिस्तान से घुसे मुसलमानों को छोड़कर बाकी सब घुसपैठियों को शरणार्थी माना जाएगा।

एक इंजन कहता है कि कश्मीर में शांति है और दूसरे इंजन ने अब कश्मीर जाना ही छोड़ दिया है।

सरकार के इन दोनों इंजनों के बीच इतनी वैचारिक खींचतान है कि अगर कबीर दास आज होते तो यह कहते देर न लगाते -
"दो इंजनों के बीच में डिब्बा बचा न कोये!"

धड़ाधड़ डिब्बे डिरेल हो रहे हैं। महाराष्ट्र के बाद अब झारखंड भी हाथ से गया। मगर डबल इंजन की डबल गेम थमने का नाम नहीं ले रही।

जनता गुहार कर रही है - भाई! ये खींचतान बंद करो! डबल गेम बंद करो। एक ही इंजन से गाड़ी चलाओ। एक ही दिशा में गाड़ी चलाओ! विकास की दिशा में। रोजगार बढ़ाओ। काम बढ़ाओ। तुम्हारे पास दो इंजन हैं तो दूसरे को गुजरात में लगा दो या हरियाणा और असम में लगा दो। वहां बिना इंजन के ही सरकारें चार पांच साल से खड़ी हैं। कुछ करती ही नहीं है।

पर डबल इंजन आपस में ही जूझ रहे हैं। जनता की तो कोई सुनता ही नहीं।