Thursday, July 25, 2019

बड़ा मौका गंवाया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति के मुकाबले दुनिया का एक बड़ा नेता बनने का मौका गंवा दिया।

कश्मीर मसले पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के झूठे बयान पर भारत सरकार ने सफाई देकर एक बडी़ कूटनीतिक भूल की है।

भारत सरकार ने वही नासमझी की, जैसा कि ट्रम्प चाहते थे। ट्रम्प ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई बात के संबंध में झूठ बोला था, इसलिए नरेंद्र मोदी को पूरे साहस के साथ खुद आगे बढ़कर दुनिया के सबसे शक्तिशाली नेता की बात को तत्काल झूठ बताना चाहिए था। अगर वह ऐसा करते तो पूरी दुनिया के लिए वह ट्रम्प के मुकाबले के नेता हो जाते और सरकारों के बीच द्विपक्षीय कूटनीतिक संबंधों को भी कोई खतरा न पैदा होता। अगर मोदी खुद आगे बढ़कर अमेरिकी राष्ट्रपति को झूठा कहते तो पूरी दुनिया में ट्रम्प की मिट्टी पलीद होती।

सरकार और विदेश मंत्रालय को इसमें चुप रहना चाहिए था, क्योंकि भारत और पकिस्तान सरकारों के बीच कश्मीर नीति शिमला समझौते के अनुरूप पहले से तय है। ट्रम्प ने यह तो नहीं कहा था कि उन्हें भारत सरकार या भारतीय विदेश मंत्रालय से कश्मीर पर मध्यस्थता का कोई अनुरोध मिला है।

इससे क्या हुआ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का व्यवहार इस मामले में उस बालक की तरह रहा जो मोहल्ले के दबंग लड़के के खुले झूठ का भी जवाब नहीं दे पाता और आकर मां पीछे चुपचाप खड़ा हो जाता है। और मां अपने बेटे को सही बताने के लिए मोहल्ले में लड़ने पहुंच जाती है। इस तरह अक्सर बच्चों की लडा़ई मोहल्ले की लडा़ई बन जाती है। भारत सरकार ने भी उसी मां जैसी भूमिका निभाई- 'बहन मेरा बेटा सही है। तेरा ही झूठा है।'

दूसरी ओर अमेरिकी सरकार ने समझदार मां की भूमिका निभाई और उसने इस मामले को और उलझाने की जगह अपनी विदेश नीति में ऐसा कुछ न होने की बात कहकर मामले को शांत करने की कोशिश की।

ट्रम्प को क्या लाभ हुआ
ट्रम्प को अगले साल अमेरिका में चुनाव लड़ना है। डेमोक्रेट्स उन्हें मूर्ख नेता प्रचारित कर रहे हैं। दूसरी ओर ट्रम्प अमेरिकी जनता के सामने यह साबित करने में कामयाब रहे कि झूठ दक्षिणपंथी राजनीति का सबसे कामयाब फार्मूला है। वह अपने एक छोटे से झूठ से भारत जैसे देश की सरकारों का हड़बड़ाने पर मजबूर कर सकते हैं। नरेंद्र मोदी जैसे नेता भी उनके झूठ के आगे भी मुहं नहीं खोल सकते। विकासशील देशों की सरकारें उनके झूठ को भी कितनी गंभीरता से लेते हैं।

असर क्या
इस मामले में प्रतिक्रिया देने की भारत सरकार की हड़बडी़ एक बडी़ कूटनीतिक भूल है। इसका असर जल्द ही और लंबे समय तक भारत-अमेरिका पर दिख सकता है। ऐसी मांयें जो बच्चों की बात पर खुद लड़ने मोहल्ले में पहुंच जाती हैं वे न सिर्फ अपने बच्चे को कमजोर बनाती हैं, बल्कि मोहल्ले में फिर उनकी बात को कोई गंभीरता से नहीं लेता।


Sunday, July 14, 2019

दो मिनट में ऐसे सीखें ज्योतिष

कल क्या दक्षिणी गोलार्द्ध का देश न्यूजीलैंड वर्ल्डकप जीतेगा?
क्योंकि...
1़आजकल भाग्य दक्षिणपंथियों के साथ है।
2. दुनिया के सभी प्रमुख देशों में दक्षिणपंथी अच्छी जीत के साथ सरकार बना रहे हैं।
3.भारत का मिशन चंद्रयान-2 भी चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड करेगा।
4. सबसे बड़ा दिन बीत जाने के बाद सूर्य देव भी अब दक्षिण की ओर सरकने लगे हैं।
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अगर कहीं इंग्लैंड जीतता है तो क्या यह भाग्य के पलटने की शुरुआत होगी?
तो क्या यह अगले साल अमरीका में ट्रम्प की हार का संकेत होगा?
तो क्या यह सभी दक्षिणपंथियों के दिन कठिन होने की शुरुआत होगी?
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उपरोक्त संभावनाओं का संबंध ज्योतिष से नही है। यह शुद्ध गणितीय विधान Probability का खेल है। जब आप किसी एक संभावना का अंदाजा लगाने के लिए तमाम समान संभावनाओं का आकलन कर निष्कर्ष निकालने की कोशिश करते हैं तो ऐसा ही होता है। इस तरह बनने वाला संभावनाओं का एक रोचक समुच्य आपको किसी एक नतीजे पर पहुंचने में मदद करता है।
हर इंसानी दिमाग अपने निर्णय ऐसे ही लेता है मगर फिर भी सबके निर्णय अलग अलग होते हैं।
इसका कारण यह है कि अलग अलग व्यक्तियों द्वारा तैयार संभावनाओं का सेट (समुच्य) अलग अलग होता है। जैसे उपरोक्त उदाहरण में न्यूजीलैंड की जीत के निष्कर्ष के लिए जो चार संभावनाओं का सेट तैयार किया गया है, सभी ऐसा ही सेट तैयार करें इसकी संभावना बिल्कुल नहीं है।

सेट आप अपनी जानकारियों और अनुभव से तैयार करते हैं। क्रिकेट के जानकार इंग्लैंड और न्यूजीलैंड के पिछले मैचों के नतीजों से कल की संभावना का सेट तैयार करेंगे।
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अगली बार अगर कोई ज्योतिषि आपको नतीजा बताए तो उससे कह सकते हो कि हमें पता है, तुम ग्रहों की स्थितियों से संभावनाओं का सेट तैयार करते हो तो हम भी अपनी जानकारियों और अनुभव से सेट तैयार कर कर सकते हैं।

रही बात भविष्यवाणी के सच निकलने की तो हर भविष्यवाणी के सच होने की संभावना भी उतनी ही है जितनी कि उसके गलत होने की। यानी प्रोबेबिलिट है एक बटा दो।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह भविष्यवाणी आपने की है या किसी ज्योतिषि ने। जिसे सही होना है वह सही होगी और जिसे गलत होना है, वह गलत होगी। क्योंकि यह सिर्फ संभावनाओं का खेल है न कि कोई ज्योतिष।


Saturday, July 13, 2019

क्या करे सरकार


रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों (जिन्हें अर्थशास्त्र में उपभोक्ता वस्तुएँ कहते हैं) की कीमतेंं अगर नहीं बढ़ रही हैं तो यह सरकार की सफलता नहीं है। इसका अर्थ है कि गरीबों की पर्चेजिंग पावर (क्रयशक्ति) छीन ली गई है।

गरीब के पास पैसा आता है तो वह सबसे पहले अनाज, सब्जी, दूध, कपड़ा ही खरीदता है। इसका लाभ किसान को भी होता है। उसकी क्रयशक्ति भी बढ़ती है।

जब गरीब की क्रयशक्ति छीन ली जाती है तो बच्चे कुपोषण से दम तोड़ते हैं। मुजफ्फरपुर जैसे चमकी बुखार यानी एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम जैसी घटनाएं सामने आती हैं।

सरकार के अपने आंकडो़ के अनुसार 2018 में बेरोजगारी की दर देश में 45 साल में सबसे ऊंची रही।

क्या इस तथ्य और चमकी बुखार के बीच कोई संबंध है?

क्या गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों में बच्चों की मौत के मामलों के तेजी से बढ़ने और अभिभावकों क्रयशक्ति के बीच कोई संबंध है? मुजफ्फरपुर को लेकर इस पर शोध होना जरूरी है। ऐसे शोध ही सरकार के नीति निर्धारण में काम आएंगे।

देश में सालना 12 लाख बच्चे पांच साल से कम उम्र में ही मर जाते हैं। यह संख्या दुनिया के देशों में सबसे अधिक है। यह जोन होपकिंस ब्लूमबर्ग स्कूल आफ पब्लिक हेल्थ के अमरीकी शोधकर्ताओं द्वारा जुटाया गया एक डाटा है। सरकार तो अब ऐसे आंकड़े सार्वजनिक ही नहीं करती, क्योंकि इनसे नकारात्मकता फैलती है।

मगर इस समस्या पर बहुत ही सकारात्मक ढंग से सोचने की जरूरत है।

सरकार को पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था की चिंता करने की जरूरत नहीं है। यह काम तो अब अंबानी और अडानी ही कर देंगे। सरकार को इसमें कुछ नहीं करना है। सरकार को चाहिए कि वह धनकुबेरों के अलावा भी बाकी की जनता को ध्यान में रखकर नीतियां बनाए।

बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करे। इस वक्त देश की पहली जरूरत यही है।

Wednesday, May 22, 2019

गधा आए तो धोबी कमाए


एक पुरानी कहावत है कि गधा आए तो धोबी कमाए। यानी गधा आ जाने पर धोबी का काम बढ़ता है और कमाई बढ़ती है। नेताओं और धनकुबेरों के बीच भी अब ऐसा ही संबंध बन गया है। कौन सा नेता जीतेगा इसके अंदाजे भर से शेयर बाजार में कुछ धनकुबेरों पर धन बरसने लगता है।

ब्लूमबर्ग और क्विंट की रिपोर्ट के अनुसार कुछ ऐसी कंपनियां हैं, जिनके शेयर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक भाग्य के साथ चढ़-उतर रहे हैं। जब देश में मतदान हो रहा था तो इनके शेयर गिर रहे थे मगर जैसे ही एग्जिट पोल में फिर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना जताई गई तो इनके शेयर तेजी से बढ़े।
अरबपति गौतम अडानी की कंपनी अडानी इंटरप्राइजेज लि. और इसकी इकाइयों, मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्री और अनिल अंबानी की रिलायंस इनफ्रास्ट्रक्चर लिमटेड को शेयरों ने एग्जिट पोल के बाद अच्छी बढ़त बनाई। किसी न किसी रूप से गुजरात से जुड़ी कंपनियों के शेयर पांच साल पहले जब 2014 में नरेंद्र मोदी ने जीत दर्ज की थी तब भी बढ़ रहे थे मगर पिछले साल दिसंबर में जब राज्यों के चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा तो इनके शेयर में गिरावट देखी गई।
11 अप्रैल से 12 मई के बीच अडानी इंटरप्राइजेज, अडानी पावर, रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर, रिलायंस कैपिटल, रिलायंस इंडस्ट्री के शयरों का प्रदर्शन अधिकांश समय तक गिरावट दिखा रहा था। मगर 19 मई को एग्जिटपोल के बाद इनमें रौनक लौट आई। अडानी इंटरप्राइजेज के शेयरों में 25 फीसदी से ज्यादा की बढ़त देखी गई तो अडानी पावर और रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर में भी दस फीसदी से ज्यादा का उछाल दिखा। रिलायंस कैपिटल और रिलायंस इंडस्ट्री में यह बढ़त दस फीसदी से कम रही।

2014 के चुनाव नतीजों के बाद भी इन कंपनियों के शेयर तेजी से बढ़े थे। अडानी पावर के शेयर तो सौ फीसदी तक बढ़े थे।

23 मई को नतीजों का असर फिर इन कंपनियों के शेयरों पर दिखेगा। ज्यादातर एग्जिट पोल भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन को 377 से 350 के बीच सीटें दे रहे हैं।
पिछले छह महीने से निवेशक अडानी इंटर प्राइजेज को लेकर चिंतित थे, एक सप्ताह पहले तक इसके शेयर गिर रहे थे। निवेशक अपनी एक चौथाई पूंजी गवा चुके थे। कंपनी के चेयरमैन अडानी, जो कि गुजराती हैं और राज्य की सबसे बड़ी बंदरगाह चलाते हैं का कहना है कि उन्हें मोदी सरकार की ओर से कोई स्पेशल ट्रीटमेंट नहीं मिला है। रिलायंस इंडस्ट्री के चेयरमैन मुकेश अंबानी, जिनकी रिफाइनरी गुजरात के जामनगर में है, उनके भाई अनिल अंबानी, जिन पर विपक्षी दल राफेल डील को लेकर आरोप लगाते रहे हैं, भी कहते हैं कि सिर्फ राजनीतिक उद्देश्य से उन पर आरोप लगाए गए हैं। उनकी ओर से कुछ भी गलत नहीं हुआ है।

Sunday, May 19, 2019

चंदाखोर जीते तो लुटेगी जनता

2017 से 19 के दौरान जिस पार्टी को सबसे ज्यादा चंदा मिला है अगर वही सत्ता में आती है तो जनता कष्ट झेलने के लिए तैयार रहे।

एक रिपोर्ट के अनुसार चुनावी चंदा देने वाले बडे़ पूंजीपति घराने इसका 21 हजार गुना तक लाभ वसूलते हैं। अगर बडी़ चंदाखोर पार्टी सत्ता में आई तो अगले दो साल का बजट चंदा देने वालों को ही ध्यान में रखकर बनेगा। चंदा देने वालों को काला बाजारी और मुनाफाखोरी की भी पूरी छूट रहेगी। दालों, चीनी और खाद्य वस्तुओं में अचानक तेजी देखने को मिलेगी, जैसी कि 2014 से 16 के बीच भी देखी गयी थी।

सबसे ज्यादा चुनावी चंदा किसे मिला? इसके लिए आप एसोसिएशन फार डेमोक्रैटिक रिफार्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट देख सकते हैं। भाजपा को सबसे ज्यादा चंदा मिला है। अगर भाजपा ही सत्ता में आती है तो चंदा देने वाले मुनाफा बटोरेंगे। नीतियां तय करने में दबाव बनाएंगे। अगर भाजपा सत्ता में आई तो महंगाई और बड़े घराने दोनों हाथों से लूटेंगे।

अगर किसी अन्य दल कि सरकार बनती है तो चंदा देने वालों का ज्यादा दबाव नहीं रहेगा। वह पलटकर कह सकते हैं कि जिसे ज्यादा चंदा दिया उसे ही अपनी बात कहो। हम तो जनता की सुनेंगे।

Thursday, May 9, 2019

हरियाणे में हो सकै आधम-आध




“ऊंट किस करवट बैठेगा?”


इस बार हरियाणा में यह सवाल नहीं पूछना। जो कल तक आठ-दो आठ-दो कर रहे थे। अब इस सवाल पर बगलें झांकते हैं। मगर जो अनुभवी हैं, वह उलटा सवाल पूछते हैं- ऊंट उठ्या ई कद था? ज्यों का त्यों बैठा सै। भाई एकाध पांव इधर-उधर सिकोड़ सके तो एकाधा फैला वी सके।


ताऊ होके के घूंट में उतनी राजनीति रोज धुएं में उड़ा देता है, जितनी के बल पर लोग खुद को लीडर समझते हैं। पिछले पांच साल में हरियाणा की राजनीति पूरी तरह बदल गई है। बदली तो पूरे देश की ही है मगर जहां हिंदू बनाम मुसलमान का ध्रुवीकरण नहीं चल सकता, वहां क्या चलेगा, इसकी प्रयोगशाला नेताओं ने हरियाणा को बनाया है।


35-1 यहां की राजनीति का नया कोडवर्ड है। भारतीय जनता पार्टी को लगता है कि यह मंत्र उसके लिए चमत्कारी है। इसी से 8-2 का सुर भी निकलता है, जिसे वह साधने के लिए पांच साल से लगातार रियाज कर रही है। जींद उपचुनाव में जिस तरह से भाजपा ने कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला और जननायक जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी के दिग्विजय सिंह चौटाला को हराया, उसने इस फार्मूले की सफलता पर मुहर भी लगा दी। मगर भाजपा, कांग्रेस और जेजेपी ने जिस तरह से चुनावी शतरंज बिछाई है और अपने वजीर उतारे हैं, उसने 35-1 की बात को बेमानी कर दिया है। यकीन न हो तो किसी भी ताऊ से पूछ लो। वह खड़ी फसल देख के बता सकता है कि कै मन किले होगा। ताऊ की बात खरी है- भाई ब्यौंत तो पूरा था। फसल ठाडी ऐ ना थी। पर हवा मार गई। इब तो आधम-आध हो सकै सै।


35-1 वाले क्या यह बता सकते हैं कि भिवानी-महेंद्रगढ़ में यह फार्मूला कैसे चलेगा। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने यहां से जाट उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। वही पिछली बार वाले। भाजपा के मौजूदा सांसद धरमबीर दो साल से तो चुनाव लड़ने की अनिच्छा जता रहे थे। पार्टी ने टिकट दिया है तो प्रचार पर जाते हैं, मगर महेंद्रगढ़ के ज्यादातर गांवों में तो इसबार लोग उन्हें देखने के लिए भी नहीं जुटते। उनका सहारा मोदी लहर है, पिछली बार की तरह इस बार भी उठी तो तर जाएंगे, नहीं तो डूबने का कोई गम नहीं। उनका मुकाबला कांग्रेस की श्रुति चौधरी से है। जो पिछले चुनाव में तीसरे स्थान पर रही थीं मगर तब दूसरे स्थान पर रहे राव बहादुर सिंह अब कांग्रेस में शामिल हैं। इस बार स्थिति बदली हुई है। वह हरियाणा का विकास पुरुष कहे जाते बंसीलाल की पोती हैं और उनके लिए उनकी मां तथा हुड्डा सरकार में मंत्री रहीं किरण चौधरी ज्यादा मेहनत करती हैं। जेजीपी ने यहां से स्वाति यादव को उतारा है। अगर 35-1 कोई फार्मूला है तो वह यहां भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ स्वाति यादव के पक्ष में जाना चाहिए। मगर नतीजे आपको बताएंगे कि ऐसा कोई फार्मूला नहीं है। पिछली बार यादव वोटों से धर्मवीर जीते थे मगर इस बार कहानी अलग है। स्वाति यादव के मैदान में होने से श्रुति की प्रसन्नता बढ़ गई है। राहुल गांधी ने भी उनके लिए प्रचार किया।

हिसार सीट पर अगर कोई कहता है कि 35-1 चलेगा तो वह वहां से कांग्रेस की जीत की बात करता है। मगर 35-1 की बात करने वाले कन्नी काट लेते हैं। क्योंकि यह मंत्र तो भाजपा की जीत के लिए फूंका जाता है। भाजपा और जेजेपी दोनों ने यहां से जाट प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। कांग्रेस ने कुलदीप बिस्नोई के पुत्र भव्य बिस्नोई को टिकट दिया है। भव्य हरियाणा के तीसरे लाल भजन लाल के पौत्र हैं। दादा के वोटबैंक पर पोते का स्वाभाविक क्लेम बनता है। भाजपा ने यहां सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने वाले चौधरी बीरेंद्र सिंह के आईएएस बेटे बृजेंद्र सिंह को टिकट दिया है। वह किसान नेता सर छोटू राम के परिवार से हैं। जेजेपी से मौजूदा सांसद दुष्यंत चौटाला मैदान में हैं। वह ताऊ देवी लाल के पौत्र हैं। पिछली बार दुष्यंत इनेलो की टिकट पर जीते थे। चाचा अभय चौटाला से पटरी न बैठने पर अपनी अलग पार्टी बना ली। जो नेता राजनीति में बढ़ते परिवारवाद को मुद्दा बनाते हैं, उन्हें हिसार सीट का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। देश की राजनीति की नब्ज को समझना है तो वह बनारस में नहीं इस बार हिसार जैसी सीटों पर धड़क रही है।


करनाल ऐसी सीट है, जहां 35-1 का फार्मूला काम कर जाए। क्योंकि यहां लड़ाई ही 35 में है। कुरुक्षेत्र में कांग्रेस के नवीन जिंदल चुनाव लड़ने से इनकार कर चुके हैं। उन्हें हर घंटे साठ लाख का नुकसान हो रहा है। यह उनका कहना है। यहां से भाजपा के पूर्व सांसद राजकुमार सैनी जोर शोर से बागी हुए थे। पांच साल बड़ा शोर किया। अब चुनाव के समय नामांकन भी ठीक से नहीं भर सके और शांत हैं। भाजपा के नायब सिंह सैनी खुलकर ताल ठोक रहे हैं। इनेलो से अभय चौटाला के छोटे पुत्र अर्जुन चौटाला से उनका मुकाबला है। कांग्रेस के निर्मल सिंह भी मैदान में हैं मगर उनमें जिंदल वाली बात नहीं है। नायब सिंह के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रैली करने आए। एक दिन पहले कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने मोदी की तुलना अहंकारी दुर्योधन से की थी। अगले ही दिन मोदी कुरुक्षेत्र में थे। कुरुक्षेत्र रैली में मोदी ने अपनी दुखती रग भी साझा की। कहा-नामदार परिवार उन्हें गाली देता है। उनके दुख में पूरा हरियाणा कितना भावुक हुआ है यह 23 मई को उन्हें भी पता चल जाएगा।

गुरुग्राम में राव इंद्रजीत अब भी अहीरों के एक मात्र बड़े नेता हैं। वह स्वतंत्रता सेनानी राव तुलाराव के वंशज हैं। वह किसी भी पार्टी में रहें कोई फर्क नहीं। अब देखना है कि लालू प्रसाद यादव के समधि और कांग्रेस प्रत्याशी कैप्टन अजय यादव केंद्रीय मंत्री को कितनी चुनौती दे पाते हैं।

फरीदाबाद में भी गणित भाजपा के पक्ष में है। कांग्रेस ने यहां प्रत्याशी बदल कर अवतार सिंह भड़ाना पर दाव खेला है। कई जगह घूमकर वापस आए भड़ाना क्या कर पाते हैं, यह नतीजे बता देंगे। आम आदमी पार्टी के लिए यहां प्रदेश अध्यक्ष नवीन जयहिंद लड़ रहे हैं। यमुना का पानी जब बैक मारता है तो फरीदाबाद तक लौटता है। इस हाड़ सुखाऊ गर्मी में दिल्ली में कोई लहर बची होगी तो नवीन तक जरूर पहुंचेगी।

हरियाणा में दो सुरक्षित सीटें हैं। अंबाला इस बार भाजपा के लिए उतनी सुरक्षित नहीं मानी जा रही है, जैसी पिछले चुनाव में थी। यहां से उलटफेर के संकेत मिल रहे हैं। यहां अनिल विज के अक्खड़पन और तौर तरीकों का बोझ भी रत्नलाल कटारिया को उठाना पड़ सकता है। कटारिया के बारे में यह भी कहा जाता है कि वह यह समझकर बैठे थे कि उन्हें टिकट मिलना ही नहीं, इसलिए पांच साल से पब्लिक के बीच नहीं जा रहे थे। हालांकि यह हालत भाजपा के ज्यादातर सांसदों की रही। अच्छे दिन कब आएंगे जैसे सवालों का उनके पास जवाब नहीं था और जितने भी शर्मदार सांसद थे, वे पांच साल जनता से नजरें चुराते रहे। ऐसे में कांग्रेस की कुमारी सैलजा अपना पुराना रुतबा हांसिल करने के लिए पूरा जोर लगा रही हैं। यहां सीधा मुकाबला है, इसलिए किसी तीसरे की बात नहीं। उनके लिए प्रियंका गांधी ने रैली की।

दूसरी सुरक्षित सीट सिरसा पिछली बार इनेलो के खाते में गई थी। यहां मुकाबला इसबार त्रिकोणीय है। इनेलो ने अपने मौजूदा सांसद चरणजीत सिंह रोड़ी पर ही दांव लगाया है। कांग्रेस ने एक बार फिर प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को उतारा है, जो पिछले चुनाव में रोड़ी के सामने दो लाख से ज्यादा मतों के अंतर से हारे थे। भाजपा ने सुनीता दुग्गल को टिकट दिया है। वह अपना पिछला विधानसभा चुनाव हार चुकी हैं। मगर यहां सिरसा सीट पर उन्हें मोदी लहर पर बड़ा भरोसा है। जेजेपी ने यहां निर्मल सिंह मल्हेड़ी को चुनाव लड़ाया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों इस बात से खुश हैं कि ताऊ देवीलाल का वोट बैंक चौटला परिवार में जितना ज्यादा बंटेगा, उतना ही फायदा होगा।
अब बात करते हैं रोहतक और सोनीपत की, जहां भाजपा फिर 35-1 के सहारे है। हुड्डा के गढ़ को भेदने के लिए भाजपा ने इस बार रोहतक से पुराने कांग्रेसी और कभी हुड्डा के खास रहे अरविंद शर्मा को मैदान में उतारा है। पंजाबी, ब्राह्मण और बाकी बिरादरियों के सहारे दीपेंद्र हुड्डा से सीट छीन लेने की तैयारी की जा रही है। पंजाबी समुदाय और अन्य जातियों पर भूपेंद्र सिंह हुड्डा की अच्छी पकड़ रही है। वह रोहतक के विकास के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में देखना है कि क्या 35-1 चला या नहीं। सोनीपत में भी कहानी ऐसी है। कांग्रेस ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा को मैदान में उतार कर अपना सबसे बड़ा दांव खेल दिया है। हुड्डा सोनीपत के दमाद हैं और दामाद को कोई खाली हाथ नहीं लौटाता, यह बात हुड्डा पर टिप्पणी करने के बाद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भी अनुभव कर चुके होंगे। भाजपा के मौजूदा सांसद रमेश कौशिक के लिए राहत की बात यह है कि जेजेपी ने दिग्विजय सिंह चौटाला को मैदान में उतार दिया है। भाजपा समझ रही है कि समीकरण जींद चुनाव जैसे हैं मगर हरियाणा की राजनीति में सुरजेवाला और भूपेंद्र सिंह हुड्डा के कद का फर्क भी सोनीपत के नतीजे तय कर देंगे। यह वही दिग्विजय हैं, जिन्होंने जींद में सुरजेवाला से दूसरा स्थान भी छीन लिया था। मगर इसबार उन्हें यहां दांव उल्टा पड़ सकता है।

हरियाणा की यह चुनावी बिसात बताती है कि धर्म और जाति के नाम पर बांटने का खेल नेता अपनी सुविधा के अनुसार ही खेलते हैं। जहां धर्म का कार्ड चलता है वहां हिंदू –मुसलमान करते हैं और जहां यह नहीं चलता, वहां भी 35-1 जैसे फार्मूले ढूंढ लेते हैं। जनता को इनके बहकाने में नहीं आना चाहिए। ये नेता हैं। चुनाव जीतने के बाद पाकिस्तान भी जाते हैं। बिरयानी भी खाते हैं और कुछ तो ऐसे हैं जो जाकर पांव भी छूते हैं और देश में हिंदू-मुसलमान करते हैं और पाकिस्तान भेजने की बात कहते हैं।

Saturday, April 27, 2019

नवजात बच्चों की सुरक्षा से खेल गयी सरकार


तरक्की बातें और बातों ने तरक्की खूब कर ली है। नेता चुनाव प्रचार और हवाई यात्राओं में अरबों खर्च रहे हैं।


इधर देश नाईजीरिया हुआ जा रहा है। पिछले तीन महीने में देश में खसरा और चेचक के मामले तीन गुना हो गये हैं। इसकी वजह है कि बडी़ संख्या में नवजातों का टीकाकरण नहीं किया जा रहा। खसरा का टीका बच्चे को जन्म के समय ही दिया जाता है।

यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 29 लाख बच्चों को 2017 में यह टीका नहीं दिया गया। इस मामले में भारत की हालत दुनिया में नाईजीरिया के बाद सबसे खराब है। नाईजीरिया में 40 लाख बच्चों को यह दवा नहीं पिलाई गयी। पाकिस्तान, इंडोनेशिया और इथोपिया जैसे देश भी अपने बच्चों का वैक्सिनेशन करने में भारत से बेहतर हैं।

मोदी सरकार में 2017 से की जा रही इस लापरवाही के नतीजे भी सामने आने लगे हैं। दो साल में देश में बच्चों में खसरे के मामले तेजी से बढ़े हैं। 2018 में भारत में खसरे के 55399 मामले सामने आए थे। यूनिसेफ के अनुसार 2019 के पहले तीन महीनों में ही 1,10,000 मामले सामने आ चुके है। इस अवधि में खसरे के मामलों में 300 फीसदी वृद्धि हुई हो। यह हालत तब है, जायादातर प्रसव अस्पतालों में होते हैं।

Friday, April 19, 2019

साध्वी ने जोड़े मालेगांव विस्फोट और मुंबई हमले के तार


क्या भारत में पनप रहा उग्रराष्ट्रवाद भी पाकिस्तान से संचालित हैक्या जिहादियों और अतिराष्ट्रवादियों के तार आपस में जुड़े हैं? क्या यह ऐसा जिंगोइज्म है, जिसमें देशभक्ति नहीं, बल्कि इसका उद्देश्य सिर्फ देश का महौल बिगाड़ना है?
क्या 26 नवंबर 2008 को लश्कर-ए-तोयबा ने अजमल कसाब और इस्माइल खान सहित दस बंदूकधारियों को गुजरात से लगते समुद्र से होकर इसलिए मुंबई भेजा था ताकि अपनी एक कथित साध्वी के श्राप को सच साबित किया जाए?
29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव में विस्फोट हुआ था। विस्फोट में इस्तेमाल कार की जांच करते हुए महाराष्ट्र पुलिस साध्वी प्रज्ञा तक पहुंची थी। 8 अक्टूबर 2008 को महाराष्ट्र पुलिस ने साध्वी को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया। इसके डेढ़ माह के अंदर ही 26 नवंबर 2008 को पूरी तैयारी के साथ लश्कर के दस आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला किया। इस हमले में 164 लोग शहीद हुए। इनमें मुंबई के आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) के प्रमुख हेमंत करकरे भी शामिल थे।

मालेगांव विस्फोट की आरोपी साध्वी प्रज्ञा को भारतीय जनता पार्टी ने भोपाल से चुनाव मैदान में उतारा है। शहीद हेमंत करकरे के बारे में साध्वी ने खुलासा किया है कि उन्हें गिरफ्तार करने पर उन्होंने शहीद करकरे को श्राप दिया था कि तेरा सर्वनाश होगा। इस श्राप के बाद आतंकवादियों ने उसे मार दिया। साध्वी का कहना है कि जिस दिन मैं गई तो उसके (शहीद करकरे) यहां सूतक लगा था और जब उसे आतंकियों ने मारा तो सूतक खत्म हुआ।
इस बयान को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। साध्वी की गिरफ्तारी और मुंबई हमले के बीच क्या संबंध था? क्या दोनों के तार जुड़े थे? इसकी जांच जरूरी है। देश की सुरक्षा के लिए जरूरी है।
   

Wednesday, April 17, 2019

दिल्ली व्यस्त और तटस्थ

दिल्ली में नेता मुखर हैं मगर जनता चुप!


दिल्ली व्यस्त है! तटस्थ है! क्या युवा! क्या बुजुर्ग! अधिकांश मोबाइल पर झुके नजर आएंगे! कुछ गेम खेलते। कुछ कानों में लीड लगाये फुसफुसाते!

येलो लाइन! ग्रीन लाइन। रेड लाइन। ब्लू लाइन। मजेंटा लाइन। हर मेट्रो में एक सा नजारा है। चाय और खाने के स्टाल पर। पार्कों में, फुटपाथों पर। गलियों में।

आप किधर भी निकल जाएं। दिल्ली का सियासी पारा कितने डिग्री है? अंदाजा नहीं मिलेगा। आप टटोलेंगे तो भी नहीं।

दिल्ली से थोडा़ दाएं बाएं निकलिए। चाहे मेरठ की ओर या रोहतक की ओर। यात्री गाड़ियों में भी लोग चुनाव पर चर्चा करते मिल जाएंगे।

मगर दिल्ली चुप्प है। एकदम शांत। ऐसा नहीं कि दिल्ली में कुछ हो नहीं रहा। सियासी नाटक चरम पर है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जितने मुखर हैं दिल्ली उतनी ही शांत। कांग्रेस और आप गठबंधन करते हैं या नहीं। अपनी बला से। भाजपा चेहरे बदलेगी या नहीं! कोई सुझाव नहीं।

यह देश की राजधानी है। यहां देश की राजनीति की दिशा तय होती है। 2014 में दिल्ली मुखर थी। आंदोलनों से आंदोलत थी। मगर इसबार सन्नाटा है। यह सन्नाटा नेताओं के लिए कोई बडा़ झन्नाटा अपने अंदर छुपाये है। नतीजे चौंकाने वाले होंगे।

Sunday, March 31, 2019

चौकीदार की खाल में नेता



चौकीदार कभी अपने नाम के आगे चौकीदार नहीं लगाता। वह चौकीदारी करता है। मालिक को सलाम भी करता है। मगर इसबार सीधे उसकी पहचान पर डाका पडा़ है।

यह नया दौर है। अब लुटेरे नकाब पहनकर नहीं आते। न घोड़े पर सवार होते हैं।

वे दल बनाकर आएंगे। सबसे पहले तुमसे तुम्हारी पहचान छीनेंगे। फिर उसमें खुद छुपकर देश को लूटेंगे। विशेश विमान लेकर पाकिस्तान जाएंगे। पांव छुएंगे। क्या लेंगे? क्या देंगे? ये देश को नहीं बताएंगे। देश को मिलेगी नोटबंदी। बेरोजगारी।

वे कभी चायवाला बनेंगे। कभी चौकीदार बनेंगे। कभी गाय बनेंगे। कभी राष्ट्रभक्त बनेंगे। ये लुटेरे हर वह चेहरा ओढे़ंगे, जिसके पीछे अपनी चोरी छुपा सकें।

यह कोई नया प्रयोग नहीं है। हमारे मुहावरे हमें बताते हैं- धूर्त भेडि़या अक्सर भेड़ की खाल ओढ़कर शिकार करता है।

लोग बेरोजगार होंगे। मगर उनकी और उनकी प्रेमिकाओं तथा बच्चों की संपत्ति करोड़ों के गुणांक में बढ़ती रहेगी। वे पहले सिर्फ आह थे। सत्ता के मद में वाह हुए और अब आपके चेहरे ओढ़ कर शाह हो गये हैं।

Thursday, March 28, 2019

न्याय की ही बात करेंगे



मोदी सरकार चुनिंदा चैनलों को विज्ञापन पर ही 65 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च कर चुकी है। इसके अलावा मौदी की विदेश यात्राओं के दौरान उन देशों में विज्ञापन पर एक अरब डालर खर्चे गये।

सरकार चाहे तो चुनिंदा चैनलों पर पैसा लुटाने की जगह न्यूनतम आय गारंटी (न्याय) जैसी योजना चला सकती है।  चैनलों पर पैसा लुटाने से देश को क्या लाभ हुआ। उन्होंने सर्फ जहरीलीं बहसें चलाई।

2017 तक ही सरकार 48000 करोड़ देश में चुनिंदा चैनलों को विज्ञापनों पर खर्च कर चुकी थी। इससे बहुत ज्यादा रोजगार भी सृजित नहीं हुए। चैनल पर सिर्फ बहस दिखाने के लिए ज्यादा स्टाफ की जरूरत भी नहीं थी।  इधर उधर चल रहीं खबरें उठाने के लिए तथा सारी व्यवस्था के लिए सौ सवा सौ का स्टाफ भी बहुत ज्यादा था।

इसके अलावा मेहुल चौकसी और नीरव मोदी जैसे लोग 2014 से 16 के बीच जो पैसा लेकर भागे हैं। वह भी कम नहीं है।

न्याय जैसी योजनाएं चलाना मुश्किल नहीं हैं। बस सरकार को तय करना है कि उसकी प्राथमिकता क्या है? नीरव और चौकसी जैसे लोगों पर धन लुटाना है या गरीबों तक कुछ पैसा पहुचाना है। नीरव मोदी जैसे लोग धन का बडा़ हिस्सा विदेश में खर्च करते हैं। गरीब के पास धन जाएगा तो वह जरूरत की चीज खरीदेगा। मांग बढे़गी तो मंदी खत्म होगी। उत्पादन बढे़गा और रोजगार पैदा होंगे।

इसलिए रघुराम राजन भी न्यूनतम आय गारंटी योजना को देश के लिए अच्छा कदम बताते हुए कह रहे हैं कि इस योजना को लागू किया जा सकता है।

जब भी गरीब के लिए कोई योजना घोषित हो तो व्यापारियों और उद्यमियों को खुश होना चाहिए, क्योंकि मांग बढ़ने वाली है।

 लोगों को बहकाने के लिए मोदी हथकंडे अपना सकते हैं मगर जनता न्याय की बात ही कहेगी।

सत्ता छल बल से जनता का सपना तोड़ सकती है मगर लोगों को सपने देखने से नहीं रोक सकती।

नेता चुनाव से पहले वादे करते हैं। लेकिन इन वादों को पूरा करने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत होती है।
नरेंद्र मोदी ने भी 2014 में सत्ता में आने से पहले अनेक वादे किए थे।
विदेशों में जमा सारा कालाधन वापस लाकर लोगों के खाते में देने का वादा था। मगर कालाधन वापस लाने का कोई प्रयास नहीं किया। बल्कि 2017 में स्विस बैंक ने सूचना दी की भारतीयों की रकम दूनी हो गयी है।

दो करोड़ रोजगार हर साल देने का वादा पूरा करने के लिए भी मोदी सरकार ने कुछ नहीं किया। इन पांच साल में रोजगार के अवसर तेजी से घटे।

इस तरह नरेंद्र मोदी एक दुर्बल इच्छाशक्ति वाले नेता साबित हुए जिन्होंने अपने ही वादों पर अमल की दिशा में कोई काम नहीं किया। मोदी का फायदा सिर्फ  नीरव मोदी जैसे लोगों ने उठाया।

Friday, March 22, 2019

खेल करेगी खेमेबंदी


भाजपा की खेमेबंदी इसबार खेल करेगी। कुछ बडे़ नेताओं को तो मोदी-शाह की जोडी़ खुद ठिकाने लगा रही है।

पार्टी में ही एक खेमा जोर लगा रहा है नितिन गडकरी किसी तरह संसद न पहुंचे। राजनाथ सिंह को रोकने के लिए भी चाल चल दी गयी है। वह इसबार गोतमबुद्ध नगर से चुनाव लड़ना चाह रहे थे मगर उन्हें फिर से लखनऊ का ही टिकट दे दिया गया है।

एक समय ऐसा था जब आडवाणी गांधीनगर से नामांकन करते थे तो मोदी को साथ रखते थे।


असल में इसबार बुजुर्ग आडवाणी को धकेलकर अमितशाह खुद गांधीनगर से ताल ठोक रहे हैं। उनकी नजर नई सरकार में गृहमंत्री की कुर्सी पर है। ऐसे में राजनाथ सिंह को रोकना जरूरी है। मोदी के बाद अमित शाह ही पार्टी का चेहरा बनना चाहते हैं। इसमें गडकरी भी बडी़ बाधा है।

नवादा और बेगूसराय के बीच गिरीराज सिंह को भी न घर का छोडा़ है न घाट का। इतने सारे खेल करने के बाद भी मोदी फिर बनारस से ही मैदान में है। यह बताता है कि मोदी-शाह खेमा कितना ओवर कान्फीडेंट है।

इसबार चुनाव नतीजे भाजपा के लिए चौंकाने वाले हो सकते है। अति आत्मविश्वास से ऐसा होता है।