Friday, November 22, 2019

महाराष्ट्र में बेरम खां की दूसरी हार


महाराष्ट्र में चुनाव के बाद शिवसेना ने जिस भाजपा को समर्थन देने से इंकार किया, असल में वह भाजपा है ही नहीं।

कमल के निशान पर चुनाव जीत कर आए कुल 105 विधायकों में 70 से ज्यादा वे हैं, जो चुनाव से पहले ही NCP, कांग्रेस या अन्य दलों छोड़कर भाजपा में शामिल कराए गए और अपने दम पर चुनाव जीतने में सक्षम थे।

चुनाव से पहले ही भाजपा समझ गई थी कि महाराष्ट्र की जनता में फडनवीस सरकार के प्रति काफी ज्यादा नाराजगी है। इसलिए भाजपा अपने खांटी नेताओं और विचारधारा से बंधे कार्यकर्ताओं को टिकट देने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। अन्य दलों से जीतने वाले नेता धनबल, सीबीआई बल और ईडी बल लगाकर तोड़े गये।

शिवसेना पांच साल तक फडनवीस सरकार में रहकर भी विपक्ष की भूमिका निभाती रही। खटास इतनी थी कि दोनों अलग-अलग ही चुनाव लड़ें इसकी पूरी संभावना थी। मगर जिस तरह भाजपा अन्य दलों में तोड़-फोड़ मचा रही थी, उसे देखते हुए शिवसेना के क्षत्रपति उद्धव ठाकरे ने वीर शिवाजी वाली रणनीति अपनाई कि हम बेरम खां से गले तो मिलेंगे मगर बख्तरबंद पहनकर।

चुनाव नतीजे आने के बाद भाजपा में अहंकार इतना था कि वह चाहती थी कि मुख्यमंत्री उसका ही बने। मूल भाजपाई विचारधारा वाले सिर्फ 30 नेता ही चुनाव जीते थे। स्पष्ट था कि महाराष्ट्र की जनता भी नहीं चाहती थी कि फडनवीस फिर मुख्यमंत्री बनें। किसानों के साथ उनका जो बर्ताव रहा। कीचड़ भरे रास्तों से गुजरकर जो जनता वोट डालने गई, उसे विकास चाहिए था। न कीचड़ और न कमल। उद्धव इसे बखूबी समझ रहे थे।

और तोड़-फोड़ के दम पर सरकार बना लेने की भाजपा की धूर्त्त नीति को शिवसेना और मराठा सरदार शरद पवार ने अपनी सूझबूझ से चौपट कर दिया।

भाजपा के पास अब करने के लिए एक ही काम बचा है। वह चाहे तो राज्यपाल से विधानसभा भंग कराने की सिफारिश करा सकती है। मगर यह सत्ता के लिए उसके लालच की पराकाष्ठा होगा।

एक बड़ी मूर्खता भी।

Wednesday, November 13, 2019

मंदबुद्धि फैसलों की अंधी मार


दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले दोनोें देश चीनी माल के उपभोक्ता हैं। ऐसे में अमेरिकी प्रतिबंधों का असर चीन के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर एक फीसदी से भी कम है। यही वजह है कि चीन को अमेरिकी रुख की ज्यादा परवाह नहीं है और उसने ट्रम्प की शर्तों पर झुकना स्वीकार भी नहीं किया है।

दूसरी ओर जिस तरह चीन की जीडीपी हर साल डेढ़ ट्रिलियन के करीब बढ़ रही है, उससे अमेरिका भयभीत हैं। चीन की सालाना जीडीपी 14 ट्रिलियन को पार कर चुकी है‌‌।

अमेरिका की जीडीपी 21 ट्रिलियन से कम है और सालाना एक ट्रिलियन की गति से बढ़ रही है। अमेरिका का डर यह है कि मौजूदा गति से चीन अगले एक दशक में उसके बराबर आ जाएगा।

चीन को रोकने का ट्रम्प फार्मूला बचकाना है। ट्रम्प दो तरह से काम कर रहे हैं। एक तो चीन पर प्रतिबंध लगाए हैं, दूसरे विकासशील देशों पर अमेरिका से आयात बढ़ाने और अमेरिकी माल पर टैक्स कम करने का दबाव बनाया है।

चीन तो अमेरिकी प्रतिबंधों से नहीं झुका मगर विकासशील देश अपने नासमझ नेताओं की वजह से जबरदस्त दबाव में हैं। पिछले एक साल में अमेरिका ने हथियारों का निर्यात इसी नीति से 35 फीसदी बढ़ा लिया है। भारत जैसे देश उससे प्रदूषक जीवाश्म ईंधन खरीदने के अरबों के सौदे फाइनल कर रहे हैं। इन देशों का भुगतान संतुलन चरमरा रहा है और अपने रिजर्व बैंक से पैसा मांग रहे हैं।

तेजी से आगे बढ़ रहे भारत की गति पर ब्रेक लगा दिए गए हैं। दुनिया के पांचवें नंबर की अर्थव्यवस्था बन चुका भारत अब सातवें नंबर पर फिसलने के करीब है। ब्रिटेन धकेल कर पांचवें नंबर पर आ चुका है। बराबरी पर आ चुकी फ्रांस की अर्थव्यवस्था भी मार्च तक हमसे आगे निकल जाएगी।

चीन 15.5 ट्रिलियन जीडीपी के साथ नये वित्तवर्ष में प्रवेश करेगा। सालान डेढ़ ट्रिलियन के उसके विकास पर फिलहाल कोई लगाम नहीं दिख रही है। अमेरिका और यूरोप के प्रमुख देश अपनी सामान्य गति से तेज चल रहे हैं। बांग्लादेश भी 8 फीसदी की दर से तरक्की कर रहा है।

दुनिया में मंदी कहीं नहीं है। मंदी अगर कहीं है तो सिर्फ भारत और पाकिस्तान मेंहै। दोनों देश अपने नेता की मूर्खताओं की कीमत चुका रहे हैं। नेताओं को नहीं पता कि क्या करना है। वे वही करते हैं जो अमेरिका चाहता है, फ्रांस चाहता है, चीन और रूस चाहते हैं।

देश में सिर्फ मांग बढा़ने और रोजगार बढ़ाने की जरूरत है। अर्थव्यवस्था अपने आप पटरी पर आ जाएगी। मगर सरकार मांग बढ़ाने के प्रयास करने की जगह लिक्विडिटी बढ़ा रही है।

सरकार प्रत्यक्ष रोजगार बढ़ाकर जनता तक पैसा पहुचाने की जगह उन उद्मियों को और उत्पादन बढ़ाने के लिए पैसा दे रही है, जिन का पहले का माल ही नहीं बिक रहा है।

सरकार समझती है कि आर्थिक राहतें मिलने पर उद्यमी उत्पादन बढ़ाएंगे और रोजगार बढ़ेगा तो मांग बढ़ जाएगी। मगर सरकार यह नहीं समझ रही कि जिनका पैसा पुराना माल ही न बिकने से फंसा है, वे और नया उत्पादन क्यों करेंगे? वे पैसा लेंगे और एसी जगह और देशों में लगाएंगे, जहां उनका माल बिके। फिर वह चाहे बांग्लादेश हो या नेपाल या आस्ट्रेलिया और अफ्रीकी देश। अंबानी और अडानी जैसे उद्यमी भारत से बाहर ठीक ठाक निवेश कर रहे हैं।और तमाम मंदी कथाओं के बावजूद परम मुनाफे में हैं।

जैसा कि नेता और चैनल मंदी मंदी विलाप कर रहे हैं, असल में यह मंदी नहीं है। यह सिर्फ मंदबुद्धि से किए गये अंधे फैसलों की मार है।

अयोध्या राम मंदिर नागर शैली में ही क्यों


राम


Tuesday, November 12, 2019

ठंड और घमंड से बचें




ठंड और घमंड से बचकर रहो। दोनों जब लगते हैं, बुरी तरह पस्त करते हैं।

फ़रवरी 1996 के शुरू तक कोई यह अंदाजा नहीं लगा सकता था कि पंजाब में भाजपा और अकाली दल भी कभी दोस्त हो सकते हैं। आतंकवाद के पूरे दौर में इन दोनों ने ही एक दूसरे को सबसे ज्यादा कोसा था। एकदम विपरीत विचारधारा थी। फरवरी खत्म होने से पहले दोनों एक हुए और राज्य में सरकार भी बनाई।

यह अटल जी और प्रकाश सिंह बादल राजनीतिक विनम्रता और दूरदर्शिता ही थी कि दोनों एक हो पाए। इसी विनम्रता की वजह से भाजपा ने पूरे देश में विस्तार किया।
सत्ता का घमंड सबसे बुरा होता है।

दूसरी और कांग्रेस ने कोई सबक नहीं लिया। वह धुर विरोधी विचारधाराओं के ऐसे समझौतों को हिकारत से देखती रही। देश के आजादी आंदोलन में अग्रणी रही यह पार्टी अब बुरी तरह सिकुड़ चुकी है।
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जम्मू-कश्मीर में मोदी और शाह ने भी धुर विरोधी विचारधारा वाली पीडीपी के साथ समझौताकर अटलजी के प्रयोग को दोहराया। यह प्रयोग बुरी तरह असफल हुआ, क्योंकि न तो मोदी-शाह में अटलजी जैसी विनम्रता थी और न ही महबूबा में प्रकाश सिंह बादल जैसी सहनशीलता और समझदारी।

सत्ता का घमंड सिर चढ़ चुका था।

अब महाराष्ट्र में भी साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाली शिवसेना ने भाजपा को वायदे से मुकरने वाली और घमंडी बताते हुए राजग से नाता तोड़ लिया है। यह अच्छा संकेत नहीं मगर बड़ा सवाल यह है कि इतनी ठोकरें खाने के बाद भी क्या कांग्रेस घमंड मुक्त हो पायी है?

क्या विरोधी विचारधाराओं को भी सम्मान देकर साथ जोड़ने कि अटलजी जैसी विनम्रता उसमें विकसित हो पाई है?

सोमवार रात तक का घटनाक्रम तो बताता है कि कांग्रेस का हाल अभी तक उस रस्सी जैसा है, जिसके बल नहीं गये।

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घमंड के और भी साइड इफेक्ट हैं। अटलजी की विनम्रता की वजह से जब भाजपा खूब तरक्की कर रही थी आडवाणी जी को लगा कि अगले पीएम वही होंगे। पार्टी में अटलजी के सहयोगियों की भूमिकाएं सीमित होने लगीं। उसके बाद जो नतीजा आया वह सबको पता है।

अब भाजपा में एकबार फिर उसी अंदाज में 2024 के बाद की तैयारी शुरू हो गयी है। महाराष्ट्र प्रकरण उसकी झांकी है। शाह में भी आडवाणी जी की छवि अंगड़ाई ले रही है।

16 सितंबर को मोदी जी के जन्मदिन पर पहलीबार फडनवीस की पत्नी अमृता फडनवीस ने ही उन्हें फादर आफ नेशन कहते हुए ट्वीट कर शुभकामनाएं दी थीं। इसके एक हफ्ते बाद अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने 'हाऊडी मोदी' कार्यक्रम में इसी उपमा को दोहराया था।

गठबंधन के पास बहुमत होते हुए भी मोदी प्रिय फडनवीस मुख्यमंत्री नहीं बन सके। कहते हैं शाह फोन करते रहे और उद्धव ने उठाया नहीं।

पर शाह की शैली यह नहीं है। उन्हें अगर फडनवीस सरकार बनवानी होती तो वह फोन के भरोसे नहीं रहते बल्कि मुंबई में डेरा डाल देते।

यह सब इस बात के संकेत हैं कि भाजपा में कोई 'प्लान बी' शुरू हो चुका है। यह ठीक वैसा ही जैसा 2001 में अटलजी कि विकल्प के लिए शुरू हुआ था।

Monday, November 11, 2019

एक सेल्यूट तो बनता है

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की प्रशंसा उनके साहस के लिए भी की जानी चाहिए।

पिछले 133 वर्षों में न्यायधीश और नेता जिस मसले पर फैसला लेने से हिचकते रहे, उसका फैसला करने में उन्होंने कोई हिचक नहीं दिखाई। फैसला कैसा है ? यह अलग विषय है। फैसला किया गया, यही इस मुद्दे की महत्वपूर्ण बात है।

राम की सौगंध खाकर मंदिर बनाने की बात कहकर वोट मांगने वाले भी जब सत्ता में जम गए, वे तब भी विधेयक लाकर कोई फैसला करने की हिम्मत नहीं दिखा सके। राम के नाम पर वोट मांगकर और दो तिहाई से ज्यादा बहुमत पाकर भी नेता जब फैसला लेने से मुकर गये तब देश के चीफ जस्टिस ने पूरे साहस से अपनी भूमिका निभाई है।

अरबों में खेलने वाले तथाकथित बड़े-बड़े धर्मगुरु भी जब धर्म से जुड़े इस मामले में एक राय से कोई फैसला लेने या सहमति बनाने में अक्षम साबित हुए तब पांच जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से एक फैसला लेकर दुनिया को दिखाया कि जब किसी को कोई हल न सूझा रहा हो तो न्याय का मंदिर ही सबको रास्ता दिखाएगा।

धर्म के ठेकेदार और नेता तो जनता को बस लड़वा सकते हैं, समस्याएं खड़ी कर सकते हैं। उनके पास समस्याओं का कोई हल नहीं है। यह एक बार फिर साबित हो गया है।

1886 में अवध का अंग्रेज ज्यूडिशियल कमिश्नर डब्लू यंग भी इस मामले में फैसला लेने से हिचक गया था और यथा स्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। उसकी सबसे बेशर्म टिप्पणी यह थी कि उसने मौका मुआयना के बाद पाया था कि मस्जिद का निर्माण हिंदुओं के लिए पवित्र माने जाने वाले स्थान पर किया गया। इसके बावजूद वह फैसला करने कि हिम्मत नहीं दिखा सका। वे अंग्रेज जिनकी तूती तब पूरी दुनिया में बोलती थी, इस मसले पर फैसला लेने की हिम्मत नहीं दिखा सके थे।

यह हिम्मत दिखाई हमारे चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के नेतृत्व में पांच जजों की संविधान पीठ ने।

हो सकता है कि फैसले से कुछ लोग असंतुष्ट हों। वे अपील का हक भी रखते हैं, मगर मसले को लटकाया नहीं गया, फैसला लिया गया। इसलिए पांचों जजों के लिए एक सेल्यूट तो बनता है।

Saturday, November 2, 2019

पेगासस पर सवार नर्क का सम्राट


ह्वाट्स एप में सेंध लगाकर जासूसी करने वाला NSO ग्रुप किसके लिए जासूसी करता है यह बहुत दबा छुपा नहीं है।
यह एक इस्राइली कंपनी है, जिसे इस्त्राइल के पूर्व सैन्य अधिकारियों ने गठित किया। NSO ने जिस मलवेयर वायरस पेगासस का इस्तेमाल किया है, वह अमेरिकी सेना के लिए विकसित किए गये जासूसी वायरस का ही वर्जन है।

NSO अमरीका और इस्राइल की मित्र सरकारों तथा राजनीतिक दलों के लिए ही काम करता है। प्रति क्लाइंट जासूसी के लिए 4.6 करोड़ रुपये लिए जाते हैं। भारत में 40 से ज्यादा सरकार विरोधी नेताओं, पत्रकारों, वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की जासूसी NSO को मोटा भुगतान कर करवाई गयी।

विपक्ष मोदी सरकार से यह सवाल पूछ रहा है कि वह बताए कि भारत में जासूसी सरकार ने करवाई या भाजपा ने। इस संबंध में सूचना एवं तकनीकी मंत्री रविशंकर प्रसाद का बयान बड़ा बचकाना है। उन्होंने कहा है कि ह्वाट्स एप से सरकार ने यह जानकारी मांगी है कि यह जासूसी किसके लिए की गई।

तकनीकी मंत्री का यह ज़वाब तकनीकी ज्ञान से कोसों दूर है। NSO का क्लाइंट कौन है यह सिर्फ NSO बता सकता है। ह्वाटस एप कैसे बताएगा। वह तो सिर्फ उन लोगों के बारे में ही बता सकता है, जिनकी जासूसी की गई। ह्वाट्स एप इसमें खुद भी साइबर सेंध से पीड़ित पक्ष है।

यह प्रकरण इसका उदाहरण है कि जनता को किस तरह बेवकूफ बनाया जा रहा है और देश का पैसा किधर जा रहा है।

पेगासस शब्द ग्रीक मिथक से लिया गया है, जिसका मतलब है पंखों वाला घोड़ा। इस पर अब नर्क का सम्राट सवार है।

Monday, October 14, 2019

हरियाणा का पानी



सरस्वती नदी की खोज इसबार हरियाणा चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है। तीन साल पहले यमुनानगर के मुगलावालीं में एक गड्ढा खोदकर
हरियाणा सरकार ने सरस्वती नदी खोज निकालने का दावा किया था।

तथ्यों और तर्कों के प्रति नास्तिक शिक्षा वंचित ही गड्ढे की अंधआस्था में ऐसा दावा कर सकते हैं। असल में सरस्वती हरियाणा में तो कभी विलुप्त नहीं हुई, अपने मुख्य जलस्त्रोत से कट जाने की वजह से एक बरसाती नदी बनकर रह गई। इसके मुख्यस्रोत का जल अब सतलुज में बहता है। इसलिए सतलुज के पानी पर हरियाणा और राजस्थान का भी हक बनता है।

भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर शोध करने वाले #MichelDanino की किताब 'The Lost River : On The Trail Of The Sarasvati' में 1818 ई से 1900 के बीच जेम्स टूडो, सीएफ ओल्ढम, आरडी ओल्ढम और अलेक्जेंडर कनिंघम के अध्ययन और निष्कर्षों का हवाला दिया गया है। साथ ही लेखक ने खुद भी शिवालिक की पहाड़ियों से लेकर अरब सागर में गिरने के स्थल तक वैदिक नदी सरस्वती के पेलियों चैनल का अध्ययन किया।

1893 में सीएफ ओल्ढम ने अपने शोध-पत्र 'The Saraswati and the Lost River of the Indian Desert' में यह निष्कर्ष दिया था-
'यद्यपि यह नदी अपनी सहायक नदियों से संगम बनाती हुई बहती है और हमारे नक्शे में घग्गर नाम से दर्ज है, असल में यही पुरानी सरस्वती है। यह नाम लोगों में अब भी जाना जाता है।'

ओल्ढम ने इस संबंध में जितने भी साक्ष्य जुटाए उनका विवरण किताब में है। वेदों और हिंदू ग्रंथों के साक्ष्य को भी विस्तार से बताया गया है।

Wednesday, October 2, 2019

गांधी की तलाश



बिड़ला मंदिर
देश की राजधानी दिल्ली में अगर गांधीजी को तलाश करना हो तो वह कहां मिलेंगे?

क्या तीस जनवरी मार्ग स्थित गांधी स्मृति भवन उर्फ बिड़ला हाउस में, जहां दुनिया भर से लोग पहुंचते हैं? जहां उन्हें एक कथित हिंदू कट्टरपंथी ने गोली मार दी थी थी? या राजघाट पर समाधि में लीन? जहां पुष्पगुच्छ लिए लोग नतमस्तक होने के लिए कतार में रहते हैं?

वह मंदिर मार्ग स्थित श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर (बिड़ला मंदिर) में क्यों नहीं मिल सकते? गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ही कहा था -
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥9
(ज्ञानकर्मसंन्यासयोग - अध्याय चार)

अर्थात : हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात निर्मल और अलौकिक हैं- इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से जान लेता है, वह शरीर को त्याग कर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है।

इसलिए पूरे विश्वास के साथ मंगलवार को श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर पहुंचा। एक सनातनी हिंदू गांधी को समझने के लिए। खुली आंखों से तो नागरशैली के इस विशाल तिमंजिला मंदिर में अलग-अरग भवनों में देवी देवताओं की प्रतिमा दिखती है। शीशमहल में कान्हा दिखते हैं और वह गीता के उस संदेश की ही याद दिलाते हैं कि हर तरफ मैं हूं। मुगल-ए-आजम में के. आसिफ का शीश महल और शकील बदायुनी के बोल-चारों तरफ है उनका नजारा,- की प्रेरणा कहीं ओर से नहीं है। सब यहीं है। मगर आंखों को गांधी कहीं नहीं दिखते।

गांधीजी से जुड़ा इस मंदिर में क्या है?

हनुमानजी की सेवा में बैठे युवा पुजारी गोवर्धन दास इतना ही बताते हैं कि गांधी जी ने इसका उद्घाटन किया था।

मगर यह मंदिर गांधीजी की एक बड़ी सामाजिक क्रांति का भी प्रतीक है।

बात 1939 की है। मंदिरों में दलितों के प्रवेश पर वर्जनाएं थी। बड़े व्यावसाई बिड़ला घराने ने श्री लक्ष्मीनारायाण मंदिर का निर्माण कराया और गांधी जी इस शर्त पर इस मंदिर का लोकार्पण करने पहुंचे कि यहां अछूत जैसी वर्जनाएं नहीं होंगी और मंदिर के द्वार सबके लिए खुले होंगे। इसके बाद बिड़ला परिवार ने देश के अन्य शहरों में भी ऐसे मंदिर बनवाए जहां भेदभाव नहीं था और सनतान धर्म की मूल भावना के अनुरूप थे।
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गांधीजी का आदर पूरी दुनिया करती है, सिर्फ पाकिस्तान और पाकिस्तानियों को छोड़कर। वहां गांधीजी को जिन्ना के मुकाबले खलनायक की तरह पढ़ाया जाता है।

मगर अब हमारे देश में भी गांधीजी को अपमानित करने का प्रयास करते कुछ लोग दिख जाते है। गत 30 जनवरी को एक भगवा सुंदरी (भगवा साड़ी में) ने अलीगढ़ में गांधीजी का पुतला बनाकर गोलियां चलाई। (पत्रकारिता में जब दस्यु सुंदरी शब्द अपना लिया गया तो भगवा सुंदरी भी अपनाया जा सकता है)। लोकसभा चुनाव के दौरान भी एक भगवाधारी प्रत्याशी ने गांधीजी के बारे में अभद्र टिप्पणी की।

गांधीजी पर अभद्र टिप्पणी करने वाले ये लोग कौन हैं? ये विचारधारा तो पाकिस्तानी है, यह भारत में कैसे दिख रही है? क्या आईएसआई देश में गांधी विरोधी माहौल बना रही है?

जो गांधीजी को अपमानित करते हैं, वे हिंदू नहीं है। वे खुद को कट्टर हिंदू कहते हैं या हिंदुत्व से जोड़ते हैं।

हिंदू और हिंदुत्व दो नितांत अलग चीजे हैं। हिंदू एक दर्शन है और वह सनातन है। दर्शन में बहुत से तत्व और सार होते हैं मगर तत्व में कोई दर्शन नहीं होता। तत्व का दर्शन हो सकता है। जैसे इंसानों में गुंडातत्व हो सकते हैं मगर गुंडातत्व में इंसानीयत नहीं होती। यह अभाव ही उसे गुंडातत्व बनाता है।

असल में हिंदुत्व शब्द अंग्रेज विचारकों की क्रिश्चिएनिटी ईसाइत या मसीहत का रूपांतरित अनुवाद है। ईसाइत जिसके तहत पोप और पादरी अन्य धर्मों को हेय मानते हुए उनके धर्म परिवर्तन पर जोर देते थे। दूसरी ओर हिंदू दर्शन में किसीको भी हेय नहीं माना जाता, यहां तक कि जीव जंतुओं और पेड़पौधों को भी पूजा जाता है।

मगर जो खुदको सिर्फ हिंदुत्व से जोड़ते हैं, उनके अन्य धर्मों के प्रति विचार कैसे हैं यह किसी से छुपा नहीं।
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एक हिंदू क्या होता है, यह हम गांधीजी से समझ सकते हैं।

गांधीजी ने खुद भी, 12 अक्तूबर, 1921 के यंग इंडिया में घोषणा की थी, ''मैं अपने को सनातनी हिंदू कहता हूं क्योंकि "मैं वेदों, उपनिषदों, पुराणों और समस्त हिंदू शास्त्रों में विश्वास करता हूं और इसीलिए अवतारों और पुनर्जन्मों में भी मेरा विश्वास है। मैं वर्णाश्रम धर्म में विश्वास करता हूं। इसे मैं उन अर्थों में मानता हूं जो पूरी तरह वेद सम्मत हैं, लेकिन उसके वर्तमान प्रचलित और भोंडे रूप को नहीं मानता।

16 सितंबर 1947 को दिल्ली में RSS की एक सभा में वह आमंत्रित थे। इस सभा में उन्होंने स्वयं सेवकों को संबोधित करते हुए कहा था- "अगर हम कहें कि हिंदुस्तान में सिवाय हिंदुओं के सबको गुलाम होकर रहना है, या पाकिस्तान वाले यह कहें कि पाकिस्तान में सिवाय मुसलमानों के सबको गुलाम बनकर रहना है, तो यह चीज चलेगी नहीं। ऐसा कहकर दोनों अपना धर्म छोड़ते हैं और अपने-अपने धर्म का नाश करते हैं।

"जो मुझे हिंदुओं और सिखों का दुश्मन कहते हैं, वे मुझे पहचानते नहीं। मेरी रग-रग में हिंदू धर्म समाया हुआ है। मैं धर्म को जिस तरह समझता हूं, उसी तरह उसकी और हिंदुस्तान की सेवा पूरी ताकत से कर रहा हूं। मेरे दिल की बात मैंने आपको सुना दी है। हिंदुस्तान की रक्षा का, उसकी उन्नति का यह रास्ता नहीं कि जो बुराई पाकिस्तान में हुई उसका हम अनुकरण करें। अनुकरण हम सिर्फ भलाई का ही करें।"
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भलाई का अनुकरण। यही हिंदू दर्शन है। डेढ़ सौवीं जयंती पर गांधीजी को नमन।

Tuesday, October 1, 2019

राजनीति का सिनेमा


पत्रकार मनोज ठाकुर कई वर्षों की साधना से बेहद सम-सामायिक शोध इस पुस्तक के रूप में सामने लाए हैं।

सिनेमा और पत्रकारिता का इस्तेमाल जिस तरह से राजनीति में हो रहा है और उससे जो नतीजे हासिल हैं, उस पर यह किताब बख़ूबी रोशनी डालती है।

रेम्मी व मिस्तुबा के इस निष्कर्ष का बहुत हद तक भारत के संदर्भ में सटीक उल्लेख किया गया है -'हमारे समाज का सबसे दुखद पहलू यह है कि मास मीडिया नेताओं के एक छोटे से समूह द्वारा अपने लाभ के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है।' इसी तरह विलकिंसन का शोध भी कहता है-मीडिया के संदेश को झूठ की ओर मोड़ना बेहद आसान है। संदेश के प्रभाव से लोगों के व्यवहार और विचार को बदला जा सकता है।

किताब सिनेमा की उस कथा को भी कहती हैं जो 'जैट्राप' नामक यंत्र से शुरू हुई। भारत में इस विधा के सतत विकास के साथ इसके एक्सीडेंटल प्राइमिनिस्टर तक राजनीति के दलदल में कुलबुलाने तक के सभी पड़ावों के बारे में बखूब बताती है।

अंत में लेखक मौजूदा हालात को इस तरह बयां करता है-
'श्रद्धा और आस्था के बाजार में नित नए धार्मिक विचारों की बिक्री शिखर पर है। फिल्म 'ग्लोबल बाबा' भी धर्म का चोला पहन कर दौलत, शौहरत और हैसियत बनाने वाले ढोंगी बाबाओं पर एक कटाक्ष है और उससे भी बढ़कर उनके अंधभक्तों पर, जिनकी आस्था को ये लंपट बाबा राजनीतिक लाभ के लिए कुर्सी की इच्छा रखने वाले नेताओं के पास गिरवी रख देते हैं। उन अंधभक्तों के लिए यह समझना जरूरी है कि :

न आपकी आस्था सस्ती है न आपका वोट।

यह किताब विषयवस्तु पर मनोज Manoj के विस्तृत अध्ययन और पकड़ की बानगी है। उम्मीद है कि उनका यह उपयोगी और रुचिकर लेखन भविष्य में भी इतनी मेहनत और अध्ययन के साथ ज़ारी रहेगा।