<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052</id><updated>2012-02-16T15:27:28.437+05:30</updated><category term='shivani'/><title type='text'>सुधीर राघव</title><subtitle type='html'>आओ अपने भीतर की लय को साझा करें</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/'/><link rel='hub' 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type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;हमारे देश की जनता का मिजाज अजीब है। काम-वाम करने वाले उसकी नजर में कद्र के काबिल नहीं है। वे सब डंडे के यार हैं। जनता का सीधा फलसफा है कि मेहनती को जितना पीटो, वह उतना सही रहता है। कोई काम करने चले तो उसमें नुक्स निकालने वाले दस आ जाते हैं। दूसरी ओर आप कोई काम मत कीजिए, बल्कि जो काम कर रहा है उसके खिलाफ नौटंकी शुरू कर दीजिए। जोर-जोर से चिल्लाइये-देखो कितनी गड़बड़ हो रही है। क्या गड़बड़ हो रही है, भले ही यह भी मत बताएं। आप पायेंगे कि आपके सिर्फ शोर मचाने से ही आपके चारों ओर समर्थकों की भीड़ लग गई है। यह भीड़ उस काम में लगे खलनायक को पीटने पर भी उतारू है। जब तक आप नौटंकी करेंगे आपको खूब जनसमर्थन मिलेगा और जैसे ही आप के हाथ में काम करने की जिम्मेवारी आएगी आप समर्थन खो देंगे। इसे एक उदाहरण से और अच्छे तरह से समझा जा सकता है। &lt;br /&gt;देश के एक बड़े ही सम्मानीय नेताजी हैं. आडवाणी जी। उन्होंने मंदिर मुद्दे, जम्मू-कश्मीर से धारा-३७० हटाने के मुद्दे को लेकर देश में सिर्फ अपनी रथयात्राओं के जरिए एक बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा किया और डूब कर दो सीटों तक पहुंच गई भाजपा को सत्ता तक ला दिया। सत्ता हाथ आई तो काम करने की जुम्मेवारी आई। काम करने की जिम्मेवारी आई तो वही नेता जो जनता के सबसे प्रिय और कद्दावर थे, अप्रिय हो गए। जब उन्हें प्रधानमंत्री बनना था तो जनता ने पार्टी को पटखनी देकर विपक्ष में पहुंचा दिया। ऐसा नहीं था कि पार्टी कोई बुरा काम कर रही थी। काम ठीक-ठाक ही था। पर असली दिक्कत जनता की है, उसे काम करने वाले कम और नौटंकी करने वाले ज्यादा पसंद है। उनका सुपरहीरो जो कल तक रथयात्राओं से मजमा लगाता था अब चुपचाप गृहमंत्रालय संभाल रहा था। न लाहौर पर झंडा लहराने की बात होती थी, न धारा ३७० हटाने की और न मंदिर बनाने की। जनता का तो सारा मजा किरकिरा हो गया। इसलिए वोट की लात मार कर सारा फीलगुड निकाल दिया। अब भी यही हाल है। सरकार और सिस्टम अपना काम कर रहा है। जो भ्रष्ट हैं,&amp;nbsp; इन काम करने वालों की मेहनत से ही जेल जा रहे हैं मगर इन काम करने वालों को सिर्फ गालियां मिल रही हैं और सारा श्रेय लूट ले रहे हैं नौटंकी करने वाले। कभी किसी ने उन्हें श्रेय दिया कि फलां ऑडिट करने वालों ने इस घोटाले को पकड़ा और इसलिए उन्हें सम्मानित किया जाए। नहीं साहब वे तो काम करने वाले थे। सम्मानित तो इन्हें किया जाना चाहिए जो धरने पर बैठते हैं। भाई नौटंकी और ड्रामा के लिए दादा साहिब फालके पुरस्कार है मगर हम उसमें और भारत रत्न में कोई फर्क ही नहीं समझते। जहां दादा साहब फालके पुरस्कार दिया जाना चाहिए, वहां हम भारत रत्न देने की वकालत करते हैं। &lt;br /&gt;इनमें कुछ तो ऐसे योगी पुरुष भी हैं जिनकी अपनी ट्रस्ट क्या कमाती हैं और कैसे कमाती हैं, इसपर कोई सवाल उठाए तो उसे गद्दार बताना शुरू कर देते हैं। उन्हें पता है कि देश की जनता एंग्री यंग और ओल्डमैन दोनों को पसंद करती है। गालीगलौच करते रहोगे तो जनता के प्रिय रहोगे। अगर सवाल सुनकर बनता जवाब दिया तो न सिर्फ फस जाओगे बल्कि कहींके नहीं रहोगे। ...तो साथियो आइए...सिर्फ धरना-प्रदर्शन से ही हम इस देश की सारी समस्याओं को मिटा सकते हैं। काम करके नहीं। काम करेंगे तो नुक्स निकलेंगे। इतने नुक्स की खलनायक बना दिए जाओगे। इसलिए बूढ़े होते आडवाणी जी ने अपने अनुभव के भंडार को जाया नहीं होने दिया और अगली रथयात्रा की मात्र घोषणाभर से मोदी को धोबीपाट पटखनी मार दी है। उन्हें कम न समझा जाए, वह जनता की नब्ज अच्छी तरह जानते हैं। धन्य है हमारी जनता। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-5804348830793454220?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/5804348830793454220/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=5804348830793454220' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5804348830793454220'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5804348830793454220'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='नौटंकी बहुत हुई, अब दसटंकी हो जाए'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-4477346354790335180</id><published>2011-09-17T17:49:00.000+05:30</published><updated>2011-09-17T17:49:15.754+05:30</updated><title type='text'>शेर का उपवास</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;b&gt;सुधीर राघव&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;बचपन में हम सभी को बहुत सी कहानियां पढ़ाई गईं और बहुत सी सुनाई गईं। ये कहानियां होती हैं परियों की, राजाओं की, जंगल की, भूतों की...। यह क्यों पढ़ाई जाती हैं? यह समझने के लिए हम पूरी उम्र लगाते हैं, तब कोई कहानी समझ आती है। जब आप बड़े होते हैं तो कभी लगता है कि चारों ओर जंगल उग आया है और उसमें एक राजा है। कभी लगता है कि सच,... कोई परी होती है। ऐसे ही किसी न किसी मोड़ पर भूत-प्रेत या अन्य पात्र भी कभी कभार टकरा जाते हैं। आज अचानक एक ऐसी ही कहानी याद आ गई है, जो बचपन में पढ़ी थी। हो सकता है कि जिक्र करते ही आप भी समझ जाएं कि यह कहानी अब काल्पनिक नहीं रही। अपने चारों ओर नजर दौड़ाएंगे तो उसका पात्र भी खड़ा मिल जाएगा।&lt;br /&gt;एक शेर बड़ा जबर शिकारी था। वह चार खाता तो बारह मारता। सब ओर उसकी दहशत थी। उसके राज में जंगल तरक्की कर रहा था। इसकी गूंज दूर-दूर तक थी। वक्त के साथ यह शेर भी बूढ़ा हो चला। दांत हिलने लगे, नाखून कमजोर हो गए। पंजे के प्रहार में वह पहले वाली ताकत न रही। ऐसे में शिकार का पीछा करता तो पोल खुल जाती। इसलिए उसे एक उपाय सूझा। वह भगवा वस्त्र पहन कर और हाथ में माला लेकर वट के पेड़ के नीचे बैठ गया। कौवे ने जब इस भेष में उसे देखा तो चौंक गया।&lt;br /&gt;शेर ने उसे समझाया कि अब मैं संन्यासी हो गया हूं और उपवास पर हूं। मैंने शिकार करना छोड़ दिया है। अब कोई मोह-माया भी नहीं है। हाथ में एक सोने का कंगन है। इसे भी किसी भले मानुष को दान करना चाहता हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सुन कर कौआ खुशी से पागल हो गया, वह बोला महाराज में पूरे जंगल को यह बता कर आता हूं। ...और उड़ गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने में एक किसान उधर से गुजरा। पहले तो वह शेर को देखकर डर गया मगर उसके भगवा वस्त्र देख उसे कौतुहल हुआ। वह कुछ बोलता उससे पहले ही शेर ने वही किस्सा दोहरा दिया जो कौवे को सुनाया था। साथ में यह भी जोड़ दिया कि मुझे तो तुम ही इस सोने के कंगन के लिए सबसे योग्य पात्र लगते हो।&lt;br /&gt;किसान लालच में आ गया और जैसे ही कंगन लेने शेर के पास पहुंचा तो शेर ने उसका काम तमाम कर दिया। शेर ने पेट भरा और उसकी हड्डियां ठिकाने लगा दीं। इतने में जंगल के और जानवर भी उसके चारों ओर आ गए। सब खुद को कंगन के लिए सबसे योग्य बताने लगे। इस पर शेर ने फैसला सुनाया कि रोज एक जानवर आएगा और वह एकांत में उसकी योग्यता जांचेंगे। यह काम कल से शुरू किया जाएगा। शाम को जो उनके पास पहले आएगा उसे ही कल का समय दे दिया जाएगा। सभी जानवर खुशी-खुशी लौट गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर कहानी के पीछे एक शिक्षा भी होती थी। इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है, फिलहाल मुझे याद नहीं आ रहा। हां देश में अगर चुनाव हो जाए तो हो सकता है उसके बाद याद&amp;nbsp; आ जाए। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-4477346354790335180?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/4477346354790335180/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=4477346354790335180' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/4477346354790335180'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/4477346354790335180'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='शेर का उपवास'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-1905036071867237373</id><published>2011-08-28T20:09:00.000+05:30</published><updated>2011-08-28T20:09:32.513+05:30</updated><title type='text'>कुलीन खुश, जनता खुश और सांप भी खुश</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="mbl notesBlogText clearfix"&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;दोस्तो समाज में व्यवस्था कुछ और नहीं, बस कुछ कूटनीतियों का खेल है। यह खेल कैसा है, कैसे चलता है, मेरी समझ में यह कुछ इस तरह से आया है।&amp;nbsp; &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;1. कुलीन कूटनीति .&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अपने घर में सांप निकले तो खुद मत मारो, पूरे गांव को इक्ट्ठा कर लो।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;. लाभ का नियम&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सांप भी मर जाएगा और आपकी लाठी भी बची रहेगी।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;.कथा का सार&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कैग  की रिपोर्ट में टूजी घोटाले और कॉमनवेल्थ घोटाले का सांप सरकार के घर में  निकालकर दिखा दिया था। सरकार (कांग्रेस) को डर था कि अगर सांप खुद मारा तो  लाठी टूट जाएगी। द्रमुक समर्थन वापस लेगी, अपने लोग भी नाराज होंगे, सरकार  गिर जाएगी। तब तक मीडिया ने भी शोर मचा दिया सांप है-सांप है। सारे तंत्र  सांप मारने को इक्कट्ठे हुए। न्यायपालिका ने सीबीआई को आदेश दिया, नतीजा  राजा और कल्माडी अंदर। जो काम सरकार को करना चाहिए था वह काम उसका न्यायालय  ने करवा दिया। सांप मरकर भी ऐंठता रहता है और बहुत से सांप छिपे होने का  डर रहता है। इसलिए पेस्टकंट्रोल जरूरी है। यह काम भी सरकार को खुद करते हुए  लोकपाल बिल लाना चाहिए था मगर उसका यह काम जनता ने कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शिक्षा &lt;/strong&gt;- कुलीन कूटनीति में न गर्जने की जरूरत होती है न बरसने की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;2. जनता की&amp;nbsp; कूटनीति&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;सांप भले मरे न मगर उसे कूटो जी भरकर।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;लाभ का नियम&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;साले को इतना कूटा है कि इस बार पक्का मर जाएगा। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;कथा का सार&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;जनता ने जैसे ही सुना कि सरकार के घर सांप नहीं, कई-कई सांप निकले हैं तो जोश बढ़ने लगा। जनता सुबह-शाम उठते-बैठते सरकार को गालियां देती ये सांप मारे ही जाने ही चाहिए। उसकी अपनी भुजाएं इन सांपों को मारने के लिए फड़क रही थीं मगर बिना नेता के कभी पब्लिक आगे बढ़ती है। इस बार सौभाग्य से नेता मिल गए और सरकार के आगे मजमा लगा दिया कि सांपों को नए बिल बनाकर कूटा जाए। और ऐसा कूटा जाए कि दोबारा निकलने की हिम्मत न कर सकें। जनता की पुरजोर मांग पर सरकार ने माना कि नए बिल बनाए जाएंगे।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;शिक्षा-&lt;/b&gt; जनता को खुश करने के लिए आश्वासन ही काफी हैं।&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;3. सर्प कूटनीति&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;हमेशा नया बिल तलाशो, अपना बिल मत बनाओ&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;लाभ का नियम&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;नया बिल मतलब, नया भोजन&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;कथा सार-&lt;/b&gt; पब्लिक के शोर से पहले तो सांप डर गए थे, पर जब उन्होंने सुना कि नये बिल बनाए जा रहे हैं तो उनमें खुशी की लहर है। उनकी बैठक में एक बूढ़े सांप ने कहा कि नए बिल का मतलब नया भोजन होता है। सांप कभी अपना बिल नहीं बनाता, जो बिल मिलता है उसी में घुस जाता है। बिल का मालिक जब लौटकर आता है तो उसीको खाकर पेट भी भर लेता है। अब तक हम जिन बिलों में रह रहे थे वे बड़े पुराने हो गए हैं। अब तो पब्लिक तक समझ जाती है कि इस बिल में पहले से सांप बैठा है। पुराने तरीके सारे फेल हो रहे हैं और हमें पेट भर खाना नहीं मिल रहा है। पहले बिल के बाहर जिस चाय वाले की मदद से हम अपना माल अंदर करते थे अब उनका पता भी सबको चल गया। वे भी पकड़े जाने लगे। क्या करें। टैंडर-वैंडर सबके ऑडिट और उस पर राइट टू इन्फारमेशन। ऐसे में नए बिलों की सख्त जरूरत है। नए बिल का मतलब नए छेद। हम उसमें ये छेद तलाश लेंगे। यही तो हमारा हुनर है। नए बिल बनने पर ही हमारा पेट भरेगा।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;शिक्षा &lt;/b&gt;- बिल बनाने से सांप मरता नहीं पलता है। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;b style="color: red;"&gt;-सुधीर राघव&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-1905036071867237373?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/1905036071867237373/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=1905036071867237373' title='24 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1905036071867237373'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1905036071867237373'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/08/blog-post_28.html' title='कुलीन खुश, जनता खुश और सांप भी खुश'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>24</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-7116234338363248502</id><published>2011-08-03T18:51:00.000+05:30</published><updated>2011-08-03T18:51:15.454+05:30</updated><title type='text'>वेदों में है सनहार्वेस्टर की धारणा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;b&gt;सुधीर राघव&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दैविक सभ्यता को समझने के लिए, जिसका जिक्र वेदों में है हमें ऊर्जा क्रांति की जरूरत है। जिस तेजी से साइंस तरक्की कर रही है, उससे लगता है कि अगली सदी तक हम यह क्रांति कर चुके होंगे। अभी तक हम जो भी ऊर्जा के साधन या ईंधन इस्तेमाल करते हैं, वे स्वयं ऊर्जा के सैकेंड, थर्ड कंज्यूमर या उनके अवशेष हैं। जबकि वह सभ्यता सूर्य जैसे तारों की ऊर्जा का सीधा इस्तेमाल करती थी। इसके काफी अच्छे संकेत हमें वेदों में मिलते हैं। &lt;br /&gt;दूसरी ओर हमारी सभ्यता ऊर्जा संग्रहण के मामले में अभी अलजेंडरो वोल्ट के उसी सिद्धांत से ज्यादा आगे नहीं बढ़ पायी है, जिससे बेटरियों का निर्माण शुरू हुआ। सौर ऊर्जा के इस्तेमाल और संग्रहण का जो आयडिया हमारे पास है, वह भी दोयम दर्जे का है। उसमें भी हम रिफ्लेक्शन के जरिए उष्मा ऊर्जा में बदलते हैं और फिर उसे विद्युत ऊर्जा में बदलकर इस्तेमाल में लाते हैं। इस काम में हम सूर्य की जितनी ऊर्जा को रिफलेक्ट करते हैं उसका बहुत ही कम हिस्सा ऊष्मा में बदल पाता है और उसके बाद विद्युत ऊर्जा में भी वह सारा हिस्सा नहीं बदलता। इस तरह हम बहुत कम हिस्से को ही अपने लिए उपयोगी बना पाते हैं। दूसरी ओर प्रकृति में बेहद सटीक सिस्टम का उदाहरण हमारे सामने है, जिसके जरिए सूरज की ऊर्जा से धरती पर पूरा जीवन चल रहा है। जिन्होंने जीवन की इकाइयां यहां बसाईं वे जानते थे कि ऊर्जा का दोहन किस तरह करना है। यह प्रक्रिया है फोटो सिंथेसिस। धरती का पूरा जीवनचक्र अपनी ऊर्जा की आपूर्ति के लिए इसी पर टिका हुआ है। पौधे क्लोरोफिल की सहायता से सूर्य से आ रही ऊर्जा को पानी और कार्बनडाइऑक्साइड की मदद से न्यूट्रीयेंट में बदल देते हैं। फिर न्यूट्रीयेंट (पौषक तत्व) के जरिए सूर्य की वही ऊर्जा पौधों से अन्य प्राणियों में जाती है। जब हिरण पौधे खाता है तो यह ऊर्जा उसमें जाती है और उसे जीवित रखती है। हिरण को जब शेर खाता है तो सूर्य की वही ऊर्जा हिरण से शेर में ट्रांसफर होती है। इस तरह फूड चैन के जरिए हम सब सूर्य की ऊर्जा से चल रहे हैं। &lt;br /&gt;इसके विपरीत हम अब तक सौर ऊर्जा को संरक्षित करने की कोई इतनी प्रभावशाली बैटरी या तकनीक नहीं निकाल पाये जितनी फोटोसिंथेसिस है। पर अगली सदी ऊर्जा क्रांति की ही है। भविष्य में हम तारामंडलों के बीच सफर करने लायक हो जाएंगे, सर स्टीफन हॉकिंग का कहना है कि यह तभी संभव होगा जब हम करीब प्रकाश के आसपास की गति पा लें।&amp;nbsp; &lt;br /&gt;मगर इसके लिए हमें ऐसे अंतरिक्ष यान बनाने होंगे, जो सन हार्वेस्टर हों। वेदों में जिन्हें अश्व कह कर संबोधित किया गया है असल में वे ऐसे ही अंतरिक्षयान थे जो सनहार्वेस्टर थे। वेदों में इसलिए इन अश्वों को सूर्य से उत्पन्न बताया गया है। ऐसा जिक्र अनेक बार आया है। ऐसा ही एक उदाहरण हम यजुर्वेद के उन्नतीसवें अध्याय के पांचवें मंत्र में भी देख सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: red;"&gt;त्रीणि त ऽ आहुदिंवि बंन्धनार्नि त्रोण्यप्सु त्रीण्यन्तः समुद्रे।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: red;"&gt;उतेव में वरुणश्छन्त्स्यर्दन्यत्रा त ऽ आहुः परमं जनित्रम॥५॥&lt;/span&gt; (एकोनत्रिंशोऽध्यायः, यजुर्वेद)&lt;br /&gt;अर्थ - (हे अश्व!) तुम्हारा श्रेष्ठ उत्पादक सूर्य बताया गया है तथा स्वर्ग में तुम्हारे तीन बंधन बताए गए हैं, अंतरिक्ष में भी तीन बंधन बताए गए हैं और वरुण रूप से तुम मेरी प्रशस्ति करते हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मंत्र से स्पष्ट होता है कि अश्व, वास्तव में सनहार्वेस्टर ही थे। इनके तीन बंधन स्वर्ग का अर्थ है कि स्पेस स्टेशन से यह तीन जगह और तीन अन्य जगह से इसे कंट्रोल किया जाता होगा। धरती पर बसने वालों की यह वरुण देव से सीधा संपर्क भी करता होगा। &lt;br /&gt;(क्रमशः)&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-7116234338363248502?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/7116234338363248502/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=7116234338363248502' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/7116234338363248502'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/7116234338363248502'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='वेदों में है सनहार्वेस्टर की धारणा'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-3261927191062454756</id><published>2011-07-20T18:00:00.001+05:30</published><updated>2011-07-20T18:00:46.933+05:30</updated><title type='text'>रसद और मदद के सिग्नल हैं मंत्र</title><content type='html'>&lt;b&gt;सुधीर राघव&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;वेदों के अध्ययन से कुछ और जो ठोस संकेत मिलते हैं वे ये हैं कि मानव को धरती पर बसाने के दौरान उन्हें समय-समय पर मदद भी भेजी जाती थी। जब तक उनके लिए संभव हुआ वे अंतरिक्षयान जिसे कि वेदों में अश्व कहा गया है के जरिए हमें मदद भेजते रहे। इन मदद देने वालों को हमने देवता कहा और यज्ञों के जरिए इनका अह्वान किया। जब तक संभव हुआ ये मदद देने भी आए। यज्ञ उन्हें आकाश से उस स्थान को ढूंढने में मदद करते थे, जहां मदद की जरूरत होती थी। यज्ञ की अग्नि में सुगंधित सामग्री और घी का इस्तेमाल और मंत्रोचारण इसलिए किया जाता था, ताकि साधारण लगी आग और मदद मांगने के लिए दिए जा रहे सिग्नल में अंतर कायम हो। वे अपने यंत्रों के जरिए स्पेस सेंटर यानी स्वर्ग से मंत्र ध्वनि से ही अंदाजा लगाते होंगे कि कहां इसकी जरूरत है। इसलिए ये सिर्फ मंत्र ही नहीं मदद मांगने के सिग्नल थे। यही वजह है कि हम आज तक संकट होने पर मदद के लिए ऊपर ताकते हैं कि ऊपर वाला मदद करेगा। उन्होंने मानव सभ्यता को यहां विकसित करने के लिए जब तक संभव हुआ मदद भेजी होगी। &lt;br /&gt;वेदों में ऐसे मंत्र काफी हैं, जिनमें देवताओं से मदद मांगी गई है। हम यजुर्वेद के इसी मंत्र को देखते हैं-&lt;br /&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;घृतेनाञ्जन्त्सं पथो देवायानान् प्रजानन्वाज्यप्येतु देवान।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="color: red;"&gt; अनुत्व सप्ते प्रदिशः सतन्ता ५ स्वधामस्मै यजमानाय धेहि॥२॥ &lt;/b&gt;(एकोनत्रिंशोऽध्यायः, यजुर्वेद) &lt;br /&gt;&lt;span style="color: #0b5394;"&gt;अर्थ- देवताओं के गमन योग्य मार्ग का घृत द्वारा सिंचित करते हुए यह यज्ञ देवताओं को प्राप्त हो। हे अश्व। समस्त दिशाओं में बसे प्राणी तुम्हें गमन करते हुए देखें। तुम इस यजमान को अन्न-धन आदि प्रदान करने वाले होवो।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यजुर्वेद के उन्नतीसवें अध्याय के इस दूसरे श्लोक से यह फिर स्पष्ट होता है कि अश्व का अर्थ अंतरिक्ष यान ही है, अंतरिक्ष में उड़ते हुए यह सभी को नजर आए ऐसी कामना की गई है और यजमान के लिए रसद मांगी गई है। यह संभव है कि धरती पर मनुष्यों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ मदद मांगने वालों की संख्या भी बढ़ी होगी। इसलिए देवताओं ने यह शर्त रख दी होगी कि आपमें से फलां-फलां पुरुषों की मौजूदगी में यज्ञ होगा अर्थात मदद मांगी जाएगी तो ही मदद मिलेगी। इन पुरुषों को ही ऋषि का नाम दिया गया।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;इसलिए हर मदद के लिए अलग-अलग यज्ञ हैं और हर यज्ञ के लिए अलग-अलग ऋषि। यजुर्वेद के हर अध्याय में इसका विवरण है। अध्याय के शुरू में ही सबसे पहले ऋषियों फिर देवता और फिर उसकी छंदों का विवरण है। जैसे प्रथम अध्याय के ऋषि हैं-परमेष्ठी प्रजापतिः &lt;br /&gt;देवता हैं- सविता, यज्ञ, विष्णु, अग्नि, प्रजापति, अप्सवितारौ, इंद्र, वायु, द्योविद्युतौ।&lt;br /&gt;छंद है-बृहति, उष्णिक, त्रिष्टुप, जगति, अनुष्टुप, पंक्ति, गायत्री। &lt;br /&gt;(क्रमशः)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-3261927191062454756?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/3261927191062454756/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=3261927191062454756' title='25 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3261927191062454756'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3261927191062454756'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/07/blog-post_20.html' title='रसद और मदद के सिग्नल हैं मंत्र'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>25</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-2044758040594443654</id><published>2011-07-09T14:25:00.001+05:30</published><updated>2011-07-21T20:29:09.404+05:30</updated><title type='text'>वेदों में वर्णन है ग्रह की खोज का</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;b&gt;सुधीर राघव&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;वेदों के अध्ययन से लगता है कि बसने लायक ग्रहों की तलाश में कई मिशन निकले थे। सौरमंडल में बसने लायक गुंजाइश दिखने पर इसके सभी ग्रहों के लिए अलग-अलग दल निकले। इन दलों का नेतृत्व कर रहे देवों के नाम पर ही सौरमंडल के ग्रहों का नामकरण किया गया। इसलिए इसकी पूरी संभावना है कि हमें धरती पर बसाने वाले हमारे किसी नजदीकी सौरपरिवार से रहे हों। अपने तारा मंडल और हमारे सौरमंडल के बीच उन्होंने एक स्पेस सेंटर बनाया जिसे स्वर्ग का नाम दिया गया। (जैसा कि पिछले आलेखों में भी स्पष्ट किया गया है) &lt;br /&gt;इसके संदर्भ में कुछ तर्क भी समर्थन करते हैं। पहला तो यह कि ग्रह नाम ही इसलिए दिया गया क्योंकि इन्हें ग्रहित किया जाना था। यह तलाशना था कि कौन सा ग्रहण करने योग्य है। यजुर्वेद के तेइसवें अध्याय के दूसरे श्लोक से प्रकट होता है कि ग्रह के चयन में वे तीन विशेषताओं की तलाश करते थे, पहली सूर्य से पर्याप्त ऊर्जा, दूसरी वहां पर वायु की उपस्थित और तीसरी स्वर्ग (स्पेस सेंटर) से संपर्क की सुविधा। ग्रहों पर उतरने के लिए भी विशेष स्तुति थी, यथा-&lt;br /&gt;&lt;b style="color: #e06666;"&gt;उपयामगृहीतेऽसि प्रजापतये त्वा जुष्टंगृह्णाम्येष ते योनिः सूर्य्य स्ते महिमा यप्तेऽहन्त्सं वत्सरे महिमा सम्बभूव यस्ते वावयन्तरिक्षे महिमा सम्बभूव यस्ते दिवि सूर्य्य महिमा सम्बभूव तस्मै ते महिम्ने प्रजापतये स्वाहा देवेभ्य॥२॥&lt;/b&gt; (त्रयोविंशोऽध्यायः , यजुर्वेद) &lt;br /&gt;अर्थ- &lt;span style="color: #0b5394;"&gt;हे ग्रह, उपयाम पात्र में ग्रहीत हो। तुम्हें प्रजापति की प्रति के निमित्त ग्रहण करता हूं। यह तुम्हारा स्थान है और सूर्य तुम्हारी महिमा है। हे ग्रह, तुम्हारी सुंदर महिमा दिन के समय प्रति वर्ण प्रकट होती है, तुम्हारी महिमा वायु और अंतरिक्ष में प्रकट है और स्वर्ग तथा सूर्य लोक में प्रकट है। तुम्हारी उस महिमा से युक्त प्रजापति के लिए और देवताओं के लिए यह हवि स्वाहुत हो। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;(क्रमशः)&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-2044758040594443654?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/2044758040594443654/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=2044758040594443654' title='22 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2044758040594443654'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2044758040594443654'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/07/blog-post_09.html' title='वेदों में वर्णन है ग्रह की खोज का'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>22</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-2558969835396687279</id><published>2011-07-02T17:01:00.001+05:30</published><updated>2011-07-03T19:31:37.410+05:30</updated><title type='text'>अंतरिक्षयान का वर्णन भी है यजुर्वेद में</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;सुधीर राघव&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;अगर किन्ही पराग्रहियों ने मनुष्य को धरती पर बसाया तो यहां तक वे किन यानों से पहुंचे, ये कैसे थे, किससे बने थे और इन्हें क्या कहा जाता था ये सब सवाल उठते हैं। इनका जवाब यजुर्वेद के तेइसवें अध्याय में मिलता है। इन यानों को अश्व कहा जाता था। और ऐसे अश्व की चाह इन्सानों में भी रही और धरती पर साधन के रूप में मिले घोड़े में उन्होंने इसी नाम से पुकारा। परिवहन का यह साधन भी हवा से बातें करे यह मनुष्य की इच्छा रही और मुहावरों तक में झलकी।इस अध्याय के ग्याहरवें श्लोक के सवालों में से एक है कि स्वर्ग पर्यंत पहुंचने वाला महान पक्षी कौन है। इसका जवाब अगले श्लोक में यह कहकर दिया गया है कि अश्व ही स्वर्ग पर्यंत पहुंचने वाला महान पक्षी है। देखें- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #cc0000;"&gt;द्योरासीत्पूर्विचत्तिरश्वऽ आसीदूबृहद्वयः।&lt;/div&gt;&lt;span style="color: #cc0000;"&gt;अविरासीत्यिलिप्पिल रात्रिरासीत्यिशाड़ि्गला॥ 12 ॥&lt;/span&gt;&lt;b&gt; (यजुर्वेद, त्रियोविशंऽध्यायः)&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;&lt;div style="color: #134f5c;"&gt;अर्थ- पूर्व स्मरण का विषय ही वृष्टि है, अश्व ही स्वर्ग पर्यंत पहुंचने वाला महान पक्षी है। रक्षिका पृथ्वी ही वृष्टि द्वारा चिकनी होती है। रूप को निगलने वाली रात्री है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा सोलहवें श्लोक में भी इसका विस्तार से वर्णन है कि यह तीव्रगामी है और देवायन मार्ग से देवताओं के पास जाता है। यह नष्ट भी नहीं होता। &lt;br /&gt;&lt;div style="color: #e06666;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #cc0000;"&gt;न वाऽउऽएतन्म्रियसे न रिष्यसि देवाँऽहृदेषि पथिभिः सुगेभिः।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: #cc0000;"&gt;यत्रासते सुकृतो यत्र ते ययुस्तत्र त्व देवः सविता दधातु॥१६॥&lt;/span&gt;&lt;b&gt; (यजुर्वेद, त्रियोविशंऽध्यायः) &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #45818e;"&gt;अर्थ- हे अश्व! तुम मृत्यु को प्राप्त नहीं होते और न कभी विनिष्ठ ही होते हो। तुम तीव्रगामी होकर देवायन मार्ग द्वारा देवताओं के पास जाते हो, जिस लोक में पुण्यात्मा गये हैं तथा जहां वे निवास करते हैं, उसी लोक में सूर्य प्रेरक सविता देव तुम्हारी स्थापना करें।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;ये अश्व और यान किस तरह बनते थे इसके भी कुछ संकेत दिए गए हैं। इससे भी स्पष्ट हो जाता है कि ये अश्व जीते-जागते घोड़े नहीं यान ही थी। तेइसवें अध्याय के सेंतीसवें श्लोक में स्पष्ट लिखा है कि चांदी, सोने और लेड आदि की सूचियां (शृंखलाएं) मिलाकर इनका निर्माण होता था। वायमंडल में प्रवेश करते वक्त ये जलें नहीं इसलिए इन्हें मिलाकर कोई उच्चमिश्रित धातु तैयार की जाती होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #cc0000;"&gt;रजता हरिणीःसीसा युजो युज्यन्ते कर्मभिः।&lt;/div&gt;&lt;span style="color: #cc0000;"&gt;अश्वस्य वाजिनस्त्वचि सिमाः शम्यन्तु शम्यन्तीः॥३७॥&lt;/span&gt; &lt;b&gt; (यजुर्वेद, त्रियोविशंऽध्यायः)&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;&lt;div style="color: #45818e;"&gt;अर्थ- चांदी, स्वर्ण और सीसा आदि की सूचियाँ संयुक्त होकर अश्वकार्य में लगती हैं। वे वेगवान अश्व के निमित्त भली भांति रेखा युक्त संस्कार के करने वाली हों।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;इस तरह यह प्रमाण और पुख्ता होते हैं कि धरती पर मनुष्य क्रम विकास का नतीजा नहीं बल्कि उसे यहां बसाया गया। (क्रमशः)&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #45818e;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-2558969835396687279?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/2558969835396687279/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=2558969835396687279' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2558969835396687279'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2558969835396687279'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='अंतरिक्षयान का वर्णन भी है यजुर्वेद में'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-3320400777446719934</id><published>2011-06-16T18:27:00.001+05:30</published><updated>2011-06-16T18:28:28.711+05:30</updated><title type='text'>क्रमविकास नहीं, मनुष्य को रचा गया</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;b&gt;सुधीर राघव&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;आदिग्रंथों के अध्ययन से कई ऐसे तथ्य मिलते हैं जो डार्विन के क्रमविकास के सिद्धांत को न सिर्फ चुनौति देते हैं, बल्कि अधिक सत्य भी जान पड़ते हैं। क्रमविकास का सिद्धांत कहता है कि आवश्यकता के अनुसार जीनों ने परिवर्तन किया और पीढ़ियां नए रूप में विकसित हुईं। आदिग्रंथों से यह साक्ष्य मिलते हैं कि परालौकिक जीवों ने हमारी रचना की और पृथ्वी पर बसाया। बसाने के बाद जीवों में आवश्यकता अनुसार थोड़े बहुत परिवर्तन हों इसकी गुंजाइश अनुकूलन के रूप में रही। एक और तर्क है जो क्रम विकास को चुनौती देता है, वह उसका अपना ही तर्क है, जिससे क्रमविकास खंडित होता है। क्रमविकास का सिद्धांत कहता है कि जीवों में एक परिवर्तन कई पीढ़यों की सतत प्रक्रिया के बाद आता है, यानी कुछ सौ साल एक परिवर्तन में लग जाते हैं। एक कौशिकय जीव से जटिल जीव बनने में करोड़ों पीढ़ियां लगनी चाहिए। मनुष्य में तैतीस हजार जीन हैं और दुनिया के सबसे जटिल पौधे में पचपन हजार से ज्यादा। इस तरह पृष्वी पर जीवन कई सौ करोड़ साल पुराना होना चाहिए, जबकि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति सबसे नई पर्वत शृंखला हिमालय के साथ ही मानी जाती है। &lt;br /&gt;यजुर्वेद के उन्नीसवें अध्याय में श्लोक संख्या अस्सी से पिचानवे के बीच इसका वर्णन है कि मनुष्य की रचना किस तरह की गई। आश्यचर्यजनकरूप से यह काफी सांइटफिक विवरण है। इसे पढ़ कर लगता है कि सरस्वती, अश्विनीकुमार, वरुण ऐसे चिकित्सा विग्यानी थे जिन्होंने मनुष्य के अलग-अलग अंगों का निर्माण किया। इन श्लोकों को पढ़ कर यह भी स्पष्ट होता है को पहले अन्य वनस्पतियों का निर्माण किया गया, उनके ही आधार को और परिमार्जित करते हुए मनुष्य का निर्माण किया गया। मानव की रचना करते वक्त सबसे पहले त्वचा और मांस बनाया गया फिर हड्डियों पर प्रयोग और मज्जा का निर्माण किया। देखें ये श्लोक-&amp;nbsp; &lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;तदस्य रूपममृत५ शवीभिस्तिस्त्रो दधुर्देवताः स५रशणाः।&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;लोमानि शष्यैर्बहुधा न तोक्मभिस्त्वगस्य मा५समभवन्न लाजाः॥81॥&amp;nbsp; &lt;br /&gt;तदश्विनाभिषजा रूद्रवर्तनी सरस्वती वयति पेशोsअंतरम।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt; अस्थि मज्जानं मासरैः करोतरेण दधतो गवां त्वचि॥82॥&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;span style="color: red;"&gt; (यजुर्वेद ॥एकनविंशोsध्याय॥)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;अर्थ- दोनों (अश्विनी कुमारों) और सरस्वती तीनों देवताओं ने सम्यक प्रकार  क्रीड़ा करते हुए इन्द्र का अक्षय रूप को संधान करते हुए रोगों को औषधि आदि  से संपन्न किया और त्वचा को भी प्रकट किया तथा खीलें भी मांस को पुष्ट  करने वाली हुईं।&amp;nbsp;  पृथ्वी पर सोमरस की स्थापना करते हुए रुद्र के समान मार्ग वाले वैद्य अश्विनी कुमार और सरस्वती शरीर में स्थित इंद्र के रूप को परिपूर्ण करते हैं। शष्यादि चूर्ण मय चारु के श्राव से हड्डियों को और गलन वस्त्र से मज्जा को पूर्ण करते हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;जिस तरह दूध में आसानी से जीवन के अंश उत्पन होकर दही बनता है, वहीं से प्रेरणा लेने की बात नीचे के श्लोक में यह कहकर की गई है कि दुग्ध के द्वारा उज्जवल अमृत रूप एवं प्रजननशील वीर्य को उत्पन्न किया। साथ ही नकारात्मक विचारों को रोकने के भी उपाय किए गए। इन श्लोकों में इस बात का बड़ा ही सुंदर वर्णन है कि किस अंग और अव्यव के लिए प्रेरणा कैसे ली? यह पूरी तरह से साइंटफिक बनाता है। इसमें वरुण एक हृदय चिकित्सक नजर आते हैं, उन्होंने हृदय के बायीं ओर तिल्ली और गले की नाड़ी को बनाया। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black;"&gt;&lt;b&gt;पायसा शुक्रममतं जनित्रँ सुरया मूत्रान्जनयन्त रेतः।&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black;"&gt;&lt;b&gt; आपमतिं दुर्मतिं वाधमानाऽऊदध्यंवात् सव्वं तदारात्॥84॥&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black;"&gt;&lt;b&gt;इन्द्रः सवितादेब सुत्रामा हृदयेन सत्यं पुरोडांशेन सविता जजान।&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;यकृत क्लोमानं वरुणो भिषज्यन मतस्ने वायव्यैर्न मिनाति पित्तम॥85॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;span style="color: red;"&gt;(यजुर्वेद ॥एकनविंशोsध्याय॥)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;अर्थ- तीनों देवताओं ने निर्मल दुग्ध के द्वारा उज्जवल अमृत रूप एवं प्रजननशील वीर्य को उत्पन्न किया और निकट में स्थित होकर उन्होंने अग्यान और दुर्मति को बाधा दी। आमाशय में गए उस अन्न को नाड़ी में प्राप्त और पक्वाशय में गए अन्न को सुरारस से कल्पित मूत्र से मूत्र की कल्पना की। &amp;nbsp;भली भांति रक्षण करने वाले इंद्र हृदय से हृदय को प्रकट करता है। सविता ने पुरोडास से इंद्र के सत्य को उत्पन्न किया, वरुण ने चिकित्सा करते हुए हृदय में बायीं ओर स्थित मांस पिण्ड रूप तिल्ली को और गले की नाड़ी को प्रकट किया तथा सोम संबंधी अर्ध्व पात्रों से हृदय के दोनों और की हड्डियों और पित्त की कल्पना की।&amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;div style="color: black;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;इंद्रस्य रूपमृषभो बलाय कर्णाभ्या५ श्रोत्रममृतग्रहाभ्याम।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;यवा न बर्हिभ्रुंवि केसगणि कर्कवन्धु जग्ये मधु सारधंमुखात॥91॥&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;अंगान्यात्मन् भिषजा तश्विनात्मानमड्गैः समाधात् सरस्वती।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: black;"&gt; इंद्रस्य रूपँ शतमानमायुश्चन्द्रेण ज्योतिरमृतं दधानाः॥93॥&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; (यजुर्वेद ॥एकनविंशोsध्याय॥)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;अर्थ- बल के निमित्त इन्द्र का रूप उत्कृष्ट किया श्रोच से संबंधित ग्रहों द्वारा वाणी को सुनने वाली कर्ण इंद्रीय हुई। जौ और कुशा भ्रकुटियों के बालों के सम्पादक हुए। मुख के द्वारा बेर के समान और मधुसदृश्य लार आदि का प्राकट्य हुआ। इंद्र के रूप को और शतवर्ष पूर्णायु को चंद्र की ज्योति से अमरतत्व का सम्पादन करते हुए वैद्य अश्विद्रय ने आत्मा में अवयवों को संयुक्त किया और सरस्वती ने उस आत्मा का अवयवों के द्वारा संपादन किया।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;क्या इतना सब पढ़ने के बाद भी हमें लगता है कि हमें किसी परालौकिक जीव (देवताओं) ने नहीं बनाया, बल्कि क्रमविकास के रूप में हम आगे बढ़े। मुझे तो अब डार्विन पर शक होता है। क्या आपको भी? इसी क्रम में आगे अभी बहुत सी जानकारियां हैं? (क्रमशः)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-3320400777446719934?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/3320400777446719934/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=3320400777446719934' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3320400777446719934'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3320400777446719934'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/06/blog-post_16.html' title='क्रमविकास नहीं, मनुष्य को रचा गया'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-5144551122141122982</id><published>2011-06-12T21:25:00.003+05:30</published><updated>2011-07-11T20:37:25.749+05:30</updated><title type='text'>वेदों में है यह हम किस ग्रह से आए- भाग-१</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;b&gt;सुधीर राघव&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति को लेकर क्रमविकास की सर्वमान्य और विग्यानसम्मत धारणा हमारे पास मौजूद है मगर प्राचीन हिन्दूग्रंथों के अध्ययन से कुछ रोचक संकेत मिलते हैं। दो साल पहले इस ब्लाग पर स्कंध, विष्णु और अन्य पुराणों के प्रसंग लेकर लिखा था कि जीवन किसी अन्य ग्रह से भी आया हो सकता है। आया नहीं इसे धरती पर बसाया गया। सारे पुराण चूकि बारह सौ से दो हजार साल के बीच पुराने ही हैं, इसलिए सोचा कि इस पर कुछ और अध्ययन किया जाए। वेदों के अध्ययन में भी काफी सूक्तियां पढ़ने को मिलीं जो चार्ल्स डार्विन द्वारा गैलापागोस द्वीप समूह पर प्रजातियों के अध्ययन के बाद निकाले गए निष्कर्षों को चुनौती देती हैं। इस कड़ी में हम यजुर्वेद की कुछ सूक्तियां देखते हैं। यजुर्वेद में देवों की प्रार्थानाओं के मंत्र हैं। पर इसके सत्रहवें अध्याय में कुछ मंत्र हमें सृष्टि रचना के बारे में भी संकेत देते हैं। पहला ठोस संकेत तो यह मिलता है कि धरती पर जीवन बसाने के दौरान सबसे पहले अंतरिक्ष में स्वर्ग को स्थापित किया गया, यह कोई स्पेस सेंटर जैसा होगा, जहां से रहकर पृथ्वी पर जीवन बसाने का कार्यक्रम चलाया गया। यजुर्वेद का यह मंत्र ऐसे ही संकेत देता है।&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;तऽआयजन्त द्रविण५ समस्माऽऋषयः पूर्वे जरितारो न भूना असूर्त्ते सूर्त्ते रजसि निषत्ते ये भूतानि समकृण्वन्निमानी॥२८॥ (यजुर्वेद ॥सप्तदशोऽध्यायः) &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;अर्थ - (ब्रह्मा के रचे हुए) प्राचनी कालीन ऋषियों ने इन प्राणियों के लिए जल रूपी रस को तथा प्रर्थनाओं को भले प्रकार देते हुए अंतरिक्ष से विद्यमान होकर प्राणियों की रचना की। &lt;br /&gt;--&lt;br /&gt;स्वर्ग एक स्पेस सेंटर था, कोई ग्रह नहीं इसके संकेत हमें नीचे लिखे&amp;nbsp; मंत्र से मिलते हैं। &lt;b&gt;&lt;br /&gt;पृथिव्याऽआशा अहमुदन्तरिक्षमन्तरिक्षाद्दिवमारुहम्। दिवो नाकम्य पृष्ठात् स्वर्ज्योतिरगामहम्॥६७॥ (यजुर्वेद ॥सप्तदशोऽध्यायः) &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;अर्थ - मैं पृथ्वी से जाकर अंतरिक्ष में पहुंचा हूं और अंतरिक्ष से स्वर्ग के लिए गया हूं। स्वर्ग के कल्याणमय पृष्ठ देश पर विद्यमान ज्योतिमंडल को प्राप्त हुआ हूं॥&lt;br /&gt;&amp;nbsp;--&lt;br /&gt;स्वर्ग के स्पेससेंटर होने से इसे ऊर्जा की जरूरत रही होगी। इसलिए अग्नी का पूजन करते हुए धरतीवासी इसे नीचे न गिरने देने की प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना इसलिए क्योंकि यहां बस रहे जीवन को यहीं से मदद आती थी। अग्नी पूजा का नीचे लिखा&amp;nbsp; मंत्र इसके पर्याप्त संकेत देता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सुपर्णोऽसिगरुत्मान पृष्ठे पृथिव्याः सीद। भासान्तरिक्षमापृण ज्योतिषादिवमुत्तभान तेजसादिशऽउद्ट्ट५ह॥७२॥ (यजुर्वेद ॥सप्तदशोऽध्यायः) &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थ- हे अग्निदेव, तुम सुपर्ण पक्षी के आकार के बराबर एवं गरुण के समान हो। अतः पृथ्वी पर विद्यमान हो और अपने तेज से अंतरिक्ष को पूर्ण करो। अपने बल पर स्वर्ग को ऊंचा स्थिर करो और अपने तेज से दिशाओं को मजबूत करो॥&lt;br /&gt;हमारे आदिग्रंथों में इस तरह के पर्याप्त मंत्र और संकेत हैं कि जीवन दूसरे ग्रह से लाकर बसाया। हालांकि वैग्यानिक भी इस बात को मानने लगे हैं कि धरती पर जीवन दूसरे ग्रह से आया होगा। डाक्टर स्टीफन हाकिंग भी इस बात को मानते हैं कि पृथ्वी पर जीवन आवश्यक तत्व किसी अन्य ग्रह के डार्क मैटर के साथ उल्कापात के रूप में धरती पर आए और जीवन क्रमविकास के रूप में आगे बढ़ा। दूसरी ओर आदि ग्रंथ इस बात का स्पष्ट संकेत देते हैं कि किसी नष्ट होते ग्रह ने जीवन को यहां बसाया और उसमें जरूरत के अनुरूप परिवर्तन भी किए। वह स्पेस सेंटर जिसे स्वर्ग कहा गया, उसका रिसर्च लंबे समय तक चला और वह मरने वालों को उठा कर भी ले जाता रहा होगा ताकि परीक्षण किया जा सके कि जीवन में किस तरह के सुधार की जरूरत है। मोक्ष और स्वर्ग जाने की अवधारण आज भी उसी रूप में जीवित है। यहां बसाने के काम कई सदी तक चला होगा। उसके बाद या तो हमारा मातृग्रह नष्ट हो गया होगा और वह स्पेससेंटर भी समय के साथ या उल्कापिंडों की टक्कर से नष्ट हुआ होगा। संभवतः भविष्य में कभी अंतरिक्ष में उसका मलवा ढूंढ लें। यह पूरी योजना बीच में ही टूट गई, इसलिए यहां बसा जीवन अपने बसाने वाले जीवों के अनुरूप ग्यान नहीं पा सका। इसके बावजूद जो प्राचीन गणनाएं हैं, ग्रहों की दूरी और उनके परिभ्रमणकाल को लेकर जो जानकारियां हैं उनका सटीक होना भी इस बात का सुबूत है कि वह ग्यान हमें विरासत में उन्हीं से मिला होगा। कुंडली जिसका आज भी इतना महत्त्व है, वह सौरमंडल में ही नहीं नक्षत्र और तारामंडलों के जरिए अंतरिक्ष में हमारी स्थिति का सटीक ग्यान करवाती थी। यह आज भी इस बात की सही जानकारी देती है कि जब हम पैदा हुए तो कौन से ग्रह, तारा मंडल और नक्षत्र कितनी-कितनी डिग्री और चरण पर थे। इस आधार पर हम धरती पर अपनी लोकेशन की गणना कर सकते हैं। (क्रमशः)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;इस ब्लाग पर पुराना लेख देखने के लिए इस एड्रेस पर जाएं-ः&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;http://sudhirraghav.blogspot.com/2009/07/blog-post_28.html&lt;br /&gt;समुद्र मंथन- दूसरे ग्रह से आए यान की क्रैश लैंडिंग की कथा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-5144551122141122982?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/5144551122141122982/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=5144551122141122982' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5144551122141122982'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5144551122141122982'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='वेदों में है यह हम किस ग्रह से आए- भाग-१'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-6641834841031842211</id><published>2011-05-21T17:11:00.000+05:30</published><updated>2011-05-21T17:11:33.130+05:30</updated><title type='text'>तेल की दलाली में तोंद चिकनी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt; &lt;b&gt;सुधीर राघव&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;पिछले दो साल से पेट्रोल के दाम देश में तेजी से बढ़ रहे हैं, दूसरी ओर तेल कंपनियों के घाटे की बातकर उन्हें मोटी सबसिडी भी दी जा रही है। ऊपरी तौर पर यह सब एक सामान्य प्रक्रिया जैसा दर्शाया जा रहा है, लेकिन जब आप आंकड़ों का अध्ययन करें तो पता चलेगा कि तेल की दलाली में तोंद चिकनी हो रही है। हकीकत यह है कि देश की पेट्रो कंपनियों का मुनाफा तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2009 की तुलना में 2010 में शुद्ध लाभ लगभग दोगुना रहा। भारत पेट्रोलियम ने वर्ष 2010 में 1537.62 करोड़ का शुद्ध लाभ कमाया, जबकि 2009 में यह केवल 735.9 करोड़ रुपये ही था। इसी तरह हिन्दुस्तान पेट्रोलियम का शुद्ध लाभ इसी अवधि में 574.98 करोड़ से बढ़कर 1301.37 करोड़ तक पहुंच गया। 2011 के आंकड़े तो अभी जारी होने हैं, इसमें अच्छी खासी बढ़ोतरी की उम्मीद है। ओएनजीसी इस वित्तवर्ष के पहले 9 महीनों में ही 16100 करोड़ रुपये का मुनाफा कमा चुकी है। सरकार पेट्रो कंपनियों को 30,000 करोड़ की सबसिडी दे रही है। पेट्रो क्षेत्र की सभी कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं और सबसिडी की राशि तो सिर्फ दो कंपनियों के मुनाफे जितनी है। इसी तरह रिलायंस पेट्रोलियम के नए नतीजे तो उपलब्ध नहीं हैं मगर कंपनी के मुताबिक उसने 2009 में 105 करोड़ रुपये शुद्ध लाभ कमाया था, जबकि इस बार कंपनी की मेंगलोर रिफाइनरी के नतीजे के अनुसार अकेले इस यूनिट ने 2011 में नेट प्रोफेट में 119 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की है। इस रिफाइनरी का शुद्ध लाभ इस बार 553 करोड़ रुपये रहा है। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;क्या है खेल &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;डीजल, केरोसिन और रसोई गैस के नाम पर सबसिडी दी जा रही है। डीजल की सबसिडी है तो किसानों के लिए मगर इसका अधिकतम उपयोग एग्जिक्यूटिव गाड़ियों, ट्रांसपोर्ट वाहनों में हो रहा है। किसानों की तरह ही ट्रांसपोर्ट वाहनों के लिए भी हम इस सबसिडी को जायज कह सकते हैं मगर एग्जिक्यूटिव श्रेणी की कारों का सबसिडी पर चलना सबसे बड़ा बोझ है। इनकी खरीद पर जो राशि सरकार को जाती है वह बीस साल से कोई ज्यादा नहीं बढ़ी है, जबकि इस लाभ के चलते डीजल कारों की संख्या तबसे कई सौ गुना बढ़ गई है। सरकार सबसिडी की राशि इस अनुपात में बढ़ा नहीं सकती, नतीजा सारा अतिरिक्त बोझ पेट्रोल पर डाला जा रहा है। होना यह चाहिए की डीजल सबसिडी की पूरी राशि डीजल कारों के शौकीनों से वसूली जाए। तब हमारी तेल नीति अधिक तर्कसंगत हो सकती है, मगर यह भी एक अलग खेल है जो सबसिडी के नाम पर खेला जा रहा है और मंत्रालय में बैठे लोग अपने वारे-न्यारे कर रहे हैं।केरोसीन के नाम पर दी जा रही सबसिडी का हाल तो और भी बुरा है। झोंपड़ पट्टी वाला जिसके नाम पर यह सबसिडी जारी होती है, राशनकार्ड न होने पर केरोसिन तेल की एक बोतल चालीस रुपये में खरीदता है और इस तेल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल पेट्रोलपंपों पर मिलावट के लिए हो रहा है। यह इस देश का हाल है, सबसिडी देकर साधन बेकार किए जा रहे हैं। जो जरूरतमंद है वह महंगे दाम पर खरीद रहा है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-6641834841031842211?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/6641834841031842211/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=6641834841031842211' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6641834841031842211'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6641834841031842211'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/05/blog-post_21.html' title='तेल की दलाली में तोंद चिकनी'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-6394387674862999526</id><published>2011-05-14T17:14:00.001+05:30</published><updated>2011-05-14T21:23:19.791+05:30</updated><title type='text'>समाज का सीडी सत्य</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;सुधीर राघव &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;पौष्टिकता और मूल्य में कोई सीधा संबंध होता तो  अर्थशास्त्र भी विग्यान होता। खाद्य चीजों की कीमत उसकी पौष्टिकता से कम और लोगों  के रुझान से ज्यादा तय होती है। यही हालत हमारे समाज में सत्य की है। सत्य  भी एक रुझान है। इसी रुझान में आजकल नया ट्रेंड जुड़ा है सीडी सत्य का। यह  सत्य भी फोरेंसिक साइंस के सत्यापन से अलग रुझान के सत्यापन से सत्यापित  होता है। रुझान तय कर देता है कि बात सच है या नहीं, साइंस के फेर में  पड़ते हैं तो सत्य को तलाशते-तलाशते भी शक दूर नहीं होता और प्याज के  छिलकों की तरह कुछ हाथ नहीं आता। दो रोचक प्रसंग सामने हैं, और उन्हें लेकर  बड़े गजब के रुझान दिख रहे हैं, इसलिए मन नहीं माना, नतीजा अब सुधीरा खड़ा  ब्लाग पे....&lt;br /&gt;दो प्रसंग हैं-एक शांतिभूषण मामले का और दूसरा अमर सिंह की सीडी का। &lt;br /&gt;शांति  भूषण मामले में कई तरीके से फोरेंसिक जाँच हुई. पहलीबार वोइस टेस्ट किया  गया और रिपोर्ट जारी कर दी गई कि आवाज शांति भूषण की ही है और मान लिया गया  कि सीडी सही है. इसके बाद पहले शांति भूषण ने खुद हैदराबाद कि ट्रुथ लैब  से फिर सीबीआई कि और से चंडीगढ़ सीएफएसएल से सीडी की वोइस स्पेक्ट्रोग्राफी  जांच की गई। वाइस स्पेकट्रम में सामने आया कि न तो यह निरंतर था और एक  अंतराल के बाद इसमें वैवलैंथ भी अलग थी। यानी ध्वनि का ग्राफ एक जैसा नहीं  था, बीच में एक कट था और उस कट के बाद ग्राफ की मोटाई ज्यादा शो हो रही थी।  यानी माध्यम में परिवर्तन था और यह कट-पेस्ट कर सीडी बनाए जाने का  पर्याप्त सुबूत था। इस आधार के बाद पबि्लक की तरफ से फिर रुझान आ गया कि  सीडी झूठ है। सीडी को लेकर जनता को यह नहीं बताया जाता कि यह सच है या झूठ  है, बड़ी चतुराई से मीडिया के माध्यम से अपने अनुकूल जाती कोई बात दी जाती  है और लोग आकलन कर लेते हैं। इसलिए शांतिभूषण के मामले में दो रुझान  प्राप्त हुए। तब सत्य क्या है? &lt;br /&gt;इस सीडी का भी सत्य संदिग्ध है, इसमें टेप बातचीत सच हो भी सकती है और नहीं  भी। फोरेंसिक जांच से यह साबित हो जाता है कि आवाज किसकी है, वह बता भी  दिया गया है कि आवाज उसी व्यक्ति की है, जिसकी बताई जा रही है।&amp;nbsp; पर जो  बातचीत है वह अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग संदर्भों में हुई बातचीत के शब्द  उठाकर पेस्ट कर नए अर्थ भी पैदा कर बनाई जा सकती है। इसे एडीटिंग कहते हैं।  रीमिक्स इसका सुलभ उदाहरण है। इस आधार पर यह सीडी झूठ हो सकती है, मगर  अलग-अलग वेबलेंथ के कुछ और कारण भी हो सकते हैं- बातचीत को आपने अपने फोन  से अटैच्ड रिकार्डर में रिकार्ड किया है, फिर यहां से अपने मतलब भर की  बातचीत को एक फाइल में पेस्ट कर सीडी बना ली। दूसरा बातचीत  टेलिकान्फ्रेंसिंग के माध्यम से दो से ज्यादा लोगों के बीच हो रही है, ऐसे  में अगर दो लोगों का संपर्क करवाने के बाद बातचीत के दौरान तीसरा खुद को  अलग कर लेता है तो बीच की डिस्टरबेंस कम होगी और ध्वनि तरंग पर इसका असर  दिखेगा। इसलिए सिर्फ तरंग की मोटाई में अंतर के आधार पर यह भी नहीं कहा जा  सकता कि यह झूट है। इसलिए यह तय है कि समाज का सत्य सिर्फ उसका रुझान तय  करता है, यह सत्य सचमुच सत्य हो यह जरूरी नहीं। &lt;br /&gt;अब अमर सिंह की सीडी का सत्य लेते हैं। इसकी कोई वोइस स्पेक्ट्रोग्राफी हुई  है, ऐसी जानकारी नहीं है। आवाज का टेस्ट हुआ है, यह भी नहीं पता। विपाशा  बार-बार कह रही हैं कि आवाज उनकी नहीं है, मगर अमर सिंह की छवि ऐसी है कि  इस सीडी को सत्य माने जाने का ही रुझान आएगा। मैं यह नहीं कहता कि यह सीडी  गलत या सही होगी, क्योंकि यह तो सही-सही फोरेंसिक सत्यापन के बाद भी नहीं  कहा जा सकता, हां यह पता लगाया जा सकता है कि आवाज वही है यां इनकी  फ्रीक्वेंसी अलग-अलग है। इसलिए समाज का अपना सीडी सत्य होता है और इसे जांच  की कोई जरूरत नहीं होती। हां दो पक्ष इसे अपने नफानुकसान के हिसाब से  मुद्दा बनाकर लड़ जरूर सकते हैं, लोगों का ध्यान खींच सकते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-6394387674862999526?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/6394387674862999526/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=6394387674862999526' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6394387674862999526'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6394387674862999526'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='समाज का सीडी सत्य'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-6659880960547927683</id><published>2011-04-20T20:19:00.000+05:30</published><updated>2011-04-20T20:19:33.790+05:30</updated><title type='text'>आओ बिल्ली के गले में घंटी बांधें</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;जानते हो, मूसकों में सबसे सम्मानित चूहा किसे माना गया था?...उसे ही, जिसने यह सुझाव दिया था कि बिल्ली के गले में घंटी बांधी जाए। सबने उसकी ओर बड़ी उम्मीद से देखा था। सबके लिए उसने एक महान विचार को जन्म दिया था। ... यह सब सिर्फ तब तक था, जब तक किसी ने यह सवाल नहीं किया था कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा? अगर वह चूहा थोड़ी समझदारी दिखाता और कहता कि यह तय करने के लिए एक कमेटी बना ली जाए तो शायद उसका सम्मान भी अब तक बचा रहता। मगर वह चूहा था, इंसान जैसा शातिर नहीं था, इसलिए इतना नहीं कह पाया। &lt;br /&gt;अब कहा जा रहा है कि नेताओं के गले में लोकपाल विधेयक का घंटा बांध दिया जाए तो भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। नेताओं का भ्रष्टाचार ही सबसे खतरनाक है , उसकी जद में बेचारे सारे उद्योगपति, ठेकादार और आला अफसर पिस रहे हैं। इन सभी को नेताओं को कमीशन देना पड़ता है। आम आदमी से भी क्या नेता कमीशन ले रहे हैं? उससे तो घूस लेता है गांव का पटवारी, या ट्रैफिक सिग्नल पर खड़ा सिपाही। एस्टेट आफिस का क्लर्क, एक तहसीलदार, पुराना केस हक में कराने के िलए कोई वकील या लाइसेंस बनवाने के लिए कोई दलाल। &lt;br /&gt;भ्रष्टाचार है क्योंकि लोगों के पास चरित्र नहीं है। भूख और गुलामी से लड़ते रहे हैं, इसलिए चरित्र बनने में अभी समय लगेगा। जब गुलाम थे, तब अधिकार ही नहीं थे, इसलिए चरित्र था। उन दिनों भी जो लोग अंग्रेज सरकार की नौकरी में थे और जिनके पास थोड़े बहुत अधिकार थे उतने ही भ्रष्ट थे, जितने आज हैं। तब प्रोविंस के लिए जो लोग जनता के वोट से चुने जाते थे उनके पास ज्यादा अधिकार ही नहीं थे, इसलिए ज्यादातर जनप्रतिनिधि और नेता ईमानदार थे। आजादी के बाद नेताओं के पास अधिकार आए तो उनके चरित्र का भी पता चला। जैसी जनता होगी उसे वैसे ही प्रतिनिधि मिलेंगे। भ्रष्टाचार एक चारित्रिक समस्या है। गंभीर समस्या है। सिर्फ नेताओं के स्तर से इसे नहीं रोका जा सकता, हां नेताओं की लगामें कस कर बड़े उद्योगपतियों, आला अफसरों, बड़े ठेकेदारों को जरूर राहत दी जा सकती है। इससे आम जनता को कई राहत नहीं मिलने वाली। &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-6659880960547927683?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/6659880960547927683/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=6659880960547927683' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6659880960547927683'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6659880960547927683'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/04/blog-post_20.html' title='आओ बिल्ली के गले में घंटी बांधें'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-2480142847790613955</id><published>2011-04-16T15:59:00.001+05:30</published><updated>2011-04-16T15:59:23.811+05:30</updated><title type='text'>तेंदुलकर का एक और शतक...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;सचिन तेंदुलकर का आईपीएल में पहला शतक भी बेकार गया। उन्होंने कोच्चि की टीम के खिलाफ शानदार&amp;nbsp; बल्लेबाजी की और शतक बनया। कोच्चि टीम जो पहले मुकाबलों में कहीं छोटे लक्ष्य पाने में विफल रही १८३ का बड़ा लक्ष्य आसानी से हासिल कर जीत गई। सचिन का शतक क्या अपशगुन साबित हुआ मुंबई इंडियन्स के लिए। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-2480142847790613955?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/2480142847790613955/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=2480142847790613955' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2480142847790613955'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2480142847790613955'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/04/blog-post_16.html' title='तेंदुलकर का एक और शतक...'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-4348534333497839720</id><published>2011-04-08T21:05:00.003+05:30</published><updated>2011-04-09T19:55:06.926+05:30</updated><title type='text'>हम ही देर से जागे हैं</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;h1 class="title"&gt;&lt;a href="http://sudhirraghav.blogspot.com/"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/h1&gt;&lt;b&gt;सुधीर राघव&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;भ्रष्टाचार की इस लड़ाई में&lt;br /&gt;हम ही देर से जागे हैं&lt;br /&gt;जिसने खूब कमीशन खाया&lt;br /&gt;वह भी हमसे आगे है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौराहे पर भीड़ जमी है&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;पर होरी आज अकेला है&lt;br /&gt;पटवारी के दफ्तर से&amp;nbsp;&lt;br /&gt;फर्द नहीं मिल पाई है&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक हजार का नोट चाहिए&lt;br /&gt;नेता को बस वोट चाहिए&lt;br /&gt;मदद नहीं मिल पाई है&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थका बेचारा घर को लौटा&lt;br /&gt;बस आंख में पानी था&lt;br /&gt;जंतर-मंतर की भीड़ में&lt;br /&gt;उसका चेहरा बेमानी था &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनशन पर पटवारी बैठा&lt;br /&gt;फोटो अखबारों में आई है&lt;br /&gt;भ्रष्टाचार मिट जाएगा&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;अच्छी उम्मीद जगाई है.&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-4348534333497839720?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/4348534333497839720/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=4348534333497839720' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/4348534333497839720'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/4348534333497839720'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/04/blog-post_08.html' title='हम ही देर से जागे हैं'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-8056493928426147724</id><published>2011-04-01T21:27:00.002+05:30</published><updated>2011-04-01T21:27:36.747+05:30</updated><title type='text'>टीम इंडिया को शुभकामनाएं</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;भारत इस मैच को जीते यही हमारी इच्छा है. &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-8056493928426147724?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/8056493928426147724/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=8056493928426147724' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/8056493928426147724'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/8056493928426147724'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='टीम इंडिया को शुभकामनाएं'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-7798519282417205373</id><published>2011-03-27T20:54:00.000+05:30</published><updated>2011-03-27T20:54:42.285+05:30</updated><title type='text'>किस की मदद करेगा बुध</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;बुधवार को भारत-पाक का मुकाबला होना है.वृष राशि के भारत के लाभ भाव में चार ग्रहों की मौजूदगी बेहद अच्छी है पर कन्या राशि के पाक को कम मत आंकिये. गोचर कहता है- कन्या राशि का स्वामी बुध है अौर बुधवार को ही मैच है, नीच चल रहा बुध किस की मदद करेगा. नीच बुद्धि गलत फैसले विवादित निर्णय का संकेत है. बुध अपनी मदद करेगा या मित्र शुक्र की. आप खुद फैसला करें. आप अौर आपके परम मित्र में मुकाबला है, आप किसकी मदद करेंगे?&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-7798519282417205373?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/7798519282417205373/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=7798519282417205373' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/7798519282417205373'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/7798519282417205373'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/03/blog-post_27.html' title='किस की मदद करेगा बुध'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-3682773725694609587</id><published>2011-03-17T21:04:00.000+05:30</published><updated>2011-03-17T21:04:30.098+05:30</updated><title type='text'>धोनी की साढेसाती</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;दो में से क्या चाहिए, सचिन का महाशतक या टीम की जीत. सितारों का मूड बदलेगा कहानी क्योंकि सहवाग का बल्ला फिर आराम करेगा.म अच्छर से नाम वाले सभी हैं परेशान, धोनी की साढेसाती कराएगी गलत फैसले.&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-3682773725694609587?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/3682773725694609587/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=3682773725694609587' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3682773725694609587'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3682773725694609587'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/03/blog-post_17.html' title='धोनी की साढेसाती'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-3769919906799008737</id><published>2011-03-10T18:31:00.002+05:30</published><updated>2011-03-10T18:31:47.129+05:30</updated><title type='text'>सहवाग का बल्ला चलेगा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;साउथ अफ्रीका के खिलाफ सहवाग का बल्ला चलेगा. मामला रोचक होगा. &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-3769919906799008737?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/3769919906799008737/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=3769919906799008737' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3769919906799008737'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3769919906799008737'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/03/blog-post_10.html' title='सहवाग का बल्ला चलेगा'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-1172023706042225839</id><published>2011-03-03T21:18:00.003+05:30</published><updated>2011-03-03T21:21:56.468+05:30</updated><title type='text'>फिर गरजेगा सचिन का बल्ला</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;इस रविवार को फिर गरजेगा सचिन का बल्ला, सितारे तो कहते हैं खुशी अंत तक नहीं बनी रहेगी. अगर गुरु ने मंगल का साथ दिया, सूर्य भी तो उसी का देगा. शुक्र की वृष राशि का क्या होगा हाल, सहवाग का बल्ला फिर रहेगा उदास.&lt;br /&gt;17 फरवरी की पोस्ट का ये आकलन देखें- &lt;br /&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;सबसे पहले हम मेष राशि को लेते हैं। इसमें अश्वनी, भरणी और कृतिका नक्षत्र का प्रथम चरण आता है। इस राशि में अस्ट्रेलिया और&lt;/span&gt; आयरलैंड&lt;/b&gt;&lt;b&gt; की टीमें आती हैं। मेष राशि का स्वामी मंगल है। यह गोचर में फिल्हाल लाभ भाव में पंचमेश सूर्य के साथ बड़े लाभ के योग बना रहा है मगर यह स्थिति सिर्फ पंद्रह मार्च तक ही रहेगी। मंगल का खेल से सीधा रिश्ता है। इन तीनों ही टीमों का नाम कृतिका नक्षत्र का है। ऐसे में मंगल और सूर्य का योग ऐसा ही है जैसा राजा और सेनापती का।&amp;nbsp; अगर पंद्रह मार्च तक के मैचों में &lt;span style="color: red;"&gt;आयरलैंड&amp;nbsp;&lt;/span&gt; उल्टफेर करती हैं तो मान लेना कि ज्योतिष कुछ हद तक सही है। अगर ये दोनों टीमें आसानी से हारती हैं तो मेरी तरह शक करना।&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-1172023706042225839?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/1172023706042225839/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=1172023706042225839' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1172023706042225839'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1172023706042225839'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='फिर गरजेगा सचिन का बल्ला'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-7701044526942459299</id><published>2011-02-25T16:59:00.000+05:30</published><updated>2011-02-25T16:59:05.309+05:30</updated><title type='text'>रविवार को सचिन का बळला चलेगा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;रविवार को सचिन और धोनी का बळला चलेगा. सहवाग, और विराट से अधिक उममीद नही दिख रही जयोतिष के हिसाब से. गोतम और युवराज से अचछा तो हरभजन कर सकते है. धोनी कि सिंह राशि पर साढ़ेसाती चल रही है. इंग्लैंड और इंडिया दोनों की राशि एक ही है. &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-7701044526942459299?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/7701044526942459299/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=7701044526942459299' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/7701044526942459299'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/7701044526942459299'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/02/blog-post_25.html' title='रविवार को सचिन का बळला चलेगा'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-8531358143920474297</id><published>2011-02-17T17:31:00.001+05:30</published><updated>2011-03-03T21:21:07.750+05:30</updated><title type='text'>श्रीलंका जीतेगा वर्ल्डकप</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;ज्योतिष के आधारभूत तथ्य वैग्यानिक दृष्टि से सही हैं इसमें शक नहीं, मगर इसके फलादेश वाले हिस्से को लेकर मुझे हमेशा शक रहा है। मुझे लगता है कि इसके फलादेश वाला हिस्सा सिर्फ संभावना पर आधारित है, इसलिए गोचर, दशा, अंतरदशा, नवमांश, दशांश और न जाने कहां तक बात को खींच कर गोटी बैठाने की बात की जाती है। वैग्यानिक आधार पर हम ग्रहों के प्रभाव को ही लेते हैं जो राशियों के मुताबिक होता है। उस आधार पर यहां वर्ल्डकप में भाग ले रही टीमों की राशि और मौजूदा गोचर के हिसाब से आकलन करेंगे, और वर्ल्डकप के नतीजे अगर उस अनुरूप रहते हैं तो मैं भी मानने लगूंगा कि ज्योतिष का फलादेश वाला भाग भी वैग्यानिक तथ्य है।&lt;br /&gt;सबसे पहले हम मेष राशि को लेते हैं। इसमें अश्वनी, भरणी और कृतिका नक्षत्र का प्रथम चरण आता है। इस राशि में अस्ट्रेलिया और आयरलैंड की टीमें आती हैं। मेष राशि का स्वामी मंगल है। यह गोचर में फिल्हाल लाभ भाव में पंचमेश सूर्य के साथ बड़े लाभ के योग बना रहा है मगर यह स्थिति सिर्फ पंद्रह मार्च तक ही रहेगी। मंगल का खेल से सीधा रिश्ता है। इन तीनों ही टीमों का नाम कृतिका नक्षत्र का है। ऐसे में मंगल और सूर्य का योग ऐसा ही है जैसा राजा और सेनापती का।&amp;nbsp; अगर पंद्रह मार्च तक के मैचों में आयरलैंड&amp;nbsp; उल्टफेर करती हैं तो मान लेना कि ज्योतिष कुछ हद तक सही है। अगर ये दोनों टीमें आसानी से हारती हैं तो मेरी तरह शक करना। पंद्रह मार्च के बाद लग्नेश खुद व्यय भाव में चला जाएगा। वहां गुरु का साथ तो होगा मगर लग्नेश और पंचम दोनों व्यय भाव में जाकर क्या कमाएंगे। इसलिए अगर आस्ट्रेलिया सहित ये टीमें अगर फाइनल में नहीं पहुंचती हैं तो ज्योतिष को सही समझना वर्ना मेरी तरह शक करना।&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वृष राशि में इंडिया, इंग्लैंड, वेस्ट इंडीज और बांग्लादेश आते है। अब इस राशि का हाल सुनो। भाग्येश शनि वक्री चल रहे हैं। यानी भाग्येश ही उल्टी चाल चल रहा है।&amp;nbsp; पांचवे स्थान में जो प्रतियोगिता का भी होता है शनि की उल्टी चाल बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। उस पर गुरु की दृष्टि अगर मदद करदे तो ठीक है। मेष राशि के खिलाफ तो वे भी मदद नहीं करेंगे। स्वराशि के गुरु मेष की ही मदद करेंगे, क्योंकि वे उसके भाग्येश हैं। अगर आस्ट्रेलिया से ये चारों देश हारें तो समझना ज्योतिष सही है नहीं तो मेरी तरह शक करना।प्रतियोगिता के फाइनल के समय पंचम भाव का स्वामी बुध व्यय भाव में होगा। इसलिए इनमें से किसी के भी फाइनल में पहुंचने और जीतने की संभावना नहीं है। &lt;br /&gt;मिथुन राशि में केन्या और कनाडा हैं। इस राशि का स्वामि बुध है और मंगल उसका शत्रु होकर नवम भाव में है। ये देश छल कपट के किसी विवाद को तो जन्म दे सकते हैं मगर किसी चमत्कार की उम्मीद ज्योतिष के हिसाब से तो नहीं है। यानी दोनों टीमों का बेड़ा गर्क है। यह बात वैसे भी सबको दिख रही है। ऐसा हो भी सकता है। अगर ये टीमें उलटफेर करती हैं तो मेरी तरह शक करना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कन्या राशि पाकिस्तान की है। इसका स्वामी भी बुध है। राशि में बैठा पंचमेश वक्री शनि बता रहा है कि इस बार यह टीम कई अन्य टीमों का गणित बिगाड़ेगी। इसके बावजूद सितारे फाइनल तक ले जाने की बात नहीं कहते। &lt;br /&gt;वृश्चिक राशि से न्यूजीलैंड और नीदरलैंड हैं।&amp;nbsp; इसका स्वामी मंगल चौथे भाव में गुरु और सूर्य के साथ है। गुरु, राजा और सेनापति एक ही साथ हैं मगर युद्द का विगुल बज गया है और ये मां की गोद में जाकर बैठे हैं। खुद सुख में डूबे हैं तो राशि का भला क्या करेंगे। यदि फिरभी ये टीमें फाइनल में पहुंचे तो ज्योतिष पर शक करना।&amp;nbsp; सूर्य और गुरु की राशियों पर कोई टीम ही नहीं है। अगर इंडिया को भारत कहा जाए तो यह गुरु की धनु राशि का देश हो जाता है। तब भारत की संभावना इस वर्ल्डकप में ज्योतिष के आधार पर अच्छी हो जाएंगी मगर उसे इंडिया ही पुकार जाता है। इसलिए मंगल कुछ भी कर सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मकर राशि की टीम जिम्बाव्बे को कम मत आंकिएगा। तीसरे भाव में गुरु की भाग्य पर सीधी दृष्टि कुछ भी कर सकती है। अगर यह टीम कोई बड़ा उल्टफेर करती है तो ज्योतिष को सही समझना। भाग्य में वक्री लग्नेश शनि बता रहा है कि यह टीम इस बार अपने बारे में बनी पुरानी अवधारणा तोड़ देगी। &lt;br /&gt;शनि की ही दूसरी राशि कुंभ में साउथ अफ्रीका और श्रीलंका की&amp;nbsp;  राशि में मंगल और सूर्य बताते हैं कि पंद्रह मार्च तक इनके आगे कोई नहीं टिकने वाला। फाइनल मुकाबले वाले दिन राशि में शुक्र चंद्र की मौजूदगी भी बताती है कि इन टीमों पर सब मोहित हो जाएंगे। इसलिए फाइनल मुकाबला इन दोनों टीमों के बीच ही बनता है। इन दोनों में अगले अच्छरों की राशि लें तो फाइनल जीतने की संभावना श्रीलंका की है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा अनुभव और मानना है कि ज्योतिष का फलादेश भाग सिर्फ संभावना और तुक्का है टीम इंडिया जैसा खेल रही है उससे उसकी ही संभावना है। अगर टीम इंडिया जीतती है तो हो सकता है कि ज्योतिषी खिलाड़ियों की कुंडली और नवमांश, दशांश डालकर तुक्का बैठा ही दें मगर तब उसे मैं तो सच नहीं मानूंगा, टीम अपनी मेहनत से जीती और कर्म ही सब तय करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-8531358143920474297?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/8531358143920474297/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=8531358143920474297' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/8531358143920474297'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/8531358143920474297'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/02/blog-post_17.html' title='श्रीलंका जीतेगा वर्ल्डकप'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-618261088227288213</id><published>2011-02-09T21:23:00.000+05:30</published><updated>2011-02-09T21:23:17.361+05:30</updated><title type='text'>एक लड़की जो न्यूयार्क को प्यार करती है</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;कोई किसीको भी प्यार कर सकता है। यह उसका व्यक्तिगत मामला ही नहीं, अधिकार भी है। मुझे भी इस पर लिखने की हिम्मत नहीं होती अगर उसके प्यार से पूरी व्यवस्था न हिल जाती और हड़कंप न मचता। उसके इस प्यार की वजह से चंडीगढ़ का डेंटल कालेज चार दिन तक ठप्प रहा और उसके प्रिंसिपल को अपना पद गंवाना पड़ा। &lt;br /&gt;किस्सा पांच दिन पुराना है। डेंटल कालेज की एक छात्रा ऐसी टीशर्ट पहनकर क्लास में पहुंची, जिस पर लिखा था, आई लव एनवाई (न्यूयार्क)। प्रिंसिपल ने उसे क्लास में तो कुछ नहीं कहा, बाद में चपरासी भेजकर अपने कमरे में बुलाया। वहां कुछ और फैकेल्टी भी मौजूद थे। लड़की तब टीशर्ट पर स्वेटर डाल कर आई। प्रिंसिपल ने कहा, अब तुम डीसेंट लग रही हो मगर सुबह तुमने क्या पहना था। इस पर लड़की ने गुस्से से स्वेटर की जिप खोल कर फिर से टीशर्ट दिखा दी।&lt;br /&gt;इसके बाद लड़की ने अपने पिता को फोन किया। पिता ने प्रिंसीपल की शिकायत वीसी से की। इसके बाद छात्र नेता भी आ गए और डेंटल कालेज का सारा कामकाज ठप्प हो गया। कुछ छात्र भूख हड़ताल पर बैठ गए। पांच दिन तक हंगामा चला तब प्रिंसिपल ने खुद पद छोड़कर पीजीआई जाने की बात कही। प्रिंसिपल के हटने के बाद ही मामला शांत हुआ। &lt;br /&gt;ग्रीन कार्ड का मोह और न्यूयार्क से प्यार आज राष्ट्र प्रेम से ज्यादा मायने रखता है। आईलव माई इंडिया कहकर भले ही आप कुछ न कर सकें मगर न्यूयार्क से आपके प्यार का इजहार आपका रुतबा तो बढ़ा ही देता है। साठ के दशक के अंत में चीन प्रेम के ऐसे ही इजहार के चलते वामपंथियों ने भले अपनी किरकरी करवाई हो मगर अब न्यूयार्क प्रेम की ही तूती बोलती है। इसलिए अब वह लड़की रोज यह टीशर्ट पहनकर कालेज आ सकती है। वही क्यों और भी उससे प्रेरणा ले सकती हैं। हो सकता है आने वाले समय में कुछ स्कूलों की ड्रेस पर भी यही लाइन लिखी मिले।&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-618261088227288213?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/618261088227288213/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=618261088227288213' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/618261088227288213'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/618261088227288213'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/02/blog-post_09.html' title='एक लड़की जो न्यूयार्क को प्यार करती है'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-6040560060038531265</id><published>2011-02-02T18:05:00.000+05:30</published><updated>2011-02-02T18:05:29.911+05:30</updated><title type='text'>धोनी भी चाहते हैं कि वर्ल्डकप के बाद सचिन संन्यास ले लें</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;क्रिकेट प्रेमियों के लिए यह चौकाने वाली खबर है कि कप्तान महेंद्र सिंह धोनी मान रहे हैं कि सचिन को वर्ल्डकप के बाद संन्यास ले लेना चाहिए। बीबीसी की खबर के अनुसार बुधवार को उन्होंने मीडिया से कहा कि वास्तव में देखें तो ये उनका अंतिम विश्व कप होगा. यदि हम ये विश्व कप जीत जाते हैं तो ये टीम की ओर से उनको सबसे बड़ा तोहफ़ा होगा और हम इसकी पूरी कोशिश करेंगे. हालांकि सचिन ने कभी अपने संन्यास की बात नहीं कही है और परफार्मेंस के आधार पर भी देखें तो वे अभी भी धोनी से अच्छा खेल रहे हैं। ऐसे में धोनी को उनके संन्यास की बात क्यों सूझ रही है। यह बात समझ से परे है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-6040560060038531265?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/6040560060038531265/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=6040560060038531265' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6040560060038531265'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6040560060038531265'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='धोनी भी चाहते हैं कि वर्ल्डकप के बाद सचिन संन्यास ले लें'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-8586307653262497233</id><published>2011-01-27T19:31:00.001+05:30</published><updated>2011-01-28T17:47:49.684+05:30</updated><title type='text'>गणतंत्र की अवधारणा को कमजोर करते हैं सारे सुपर हीरो</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;बेटमैन, सुपरमैन, स्पाइडरमैन, हीमैन, निंजा...बच्चों के सुपर हीरोज की एक लंबी सीरीज है। इन सभी के पास एक घोषित खलनायक है, जिसके खिलाफ ये ताकत दिखाने के हर फैसले लेते हैं। यहां तक कि हत्या तक कर देने का भी। एक तरफ हम लोकतांत्रिक समाज बनाने का आदर्श रखते हैं, दूसरी ओर हमारे बच्चों के नायक ठेठ व्यक्तिवादी लोग हैं, जो कुछ प्रकृति से इतर शक्तियों से भी लैस हैं। यहां तक कि दुनिया के प्रमुख ग्रंथ भी व्यक्ति पूजा का ही संदेश देते हैं। ऐसे में हमें समाज के कितना लोकतांत्रिक होने की उम्मीद करनी चाहिए। अब जबकि बच्चे टीवी और सिनेमा की दुनिया के सुपरमैनों के दीवाने हैं। क्या हमारे बच्चे भी हर फैसला खुद करना का अधिकार नहीं चाहते? क्या वे पर्सिनेलिटी सिंड्रोम का शिकार हो रहे हैं? वे हमेशा किसी को खलनायक बनाने की फिराक में रहते हैं। यह द्वंद्व छात्र हिंसा में भी परिवर्तित हो रहा है। समाज के खलनायक इतने घोषित नहीं होते, जितने कथाओं में होते हैं।इसलिए यह द्वंद्व उन्हें अपराध की दलदल में भी ले जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले एसपीएस राठौर और अब तलवार पर हमला करने वाला उत्सव शर्मा भी ऐसे ही सुपर हीरोज से प्रेरित लगता है। गाजियाबाद में छात्र का अपहरण कर उसके भाई को गोली मारने वाला छात्र नेता भी उत्सव की तरह ही पर्सनेल्टी सिंड्रोम का शिकार लगता है। दोनों को दुनिया में अपने खलनायक स्पष्ट नजर आते हैं। असल में वे खुद खलनायक बनने की ओर हैं। इस तरह के फैसले ही अपराध की ओर बच्चों का रास्ता खोलते हैं। ज्यादातर अपराधी आक्रोश के चलते ही गलत रास्ते पर जाते हैं। वे अपने फैसले खुद करना चाहते हैं, जबकि लोकतंत्र में इसके लिए न्यायपालिका है। लोकतंत्र की अपनी समस्याएं हैं, जो लोगों व्यावहार संबंधी कमजोरियों की वजह से है। इस पर सोचिए कि हर आदमी सुपर मैन हो और हर दूसरे को खलनायक माने तो ऐसे समाज की क्या हालत होगी। &lt;br /&gt;यह बात इस मामले में खरी उतरती है कि साहित्य समाज बनाने में अपनी भूमिका भी निभाता है। अगर हम व्यक्तिवादी और अहंवादी नायक गढ़ते हैं तो समाज को हिंसा के लिए भी तैयार रहना चाहिए। क्या हम अपने बच्चों के लिए कुछ सहज और सामान्य पात्र रच सकते हैं।ऐसे पात्र जो मिल बैठकर फैसला करते हैं। हर कोई अपनी जिम्मेदारी समझता है और अपने हिस्से के ही फैसले लेता है। या हम व्यक्तिपूजक बनकर समाज की अशांति को बनाए रखना चाहते हैं। जिस समाज में हर नायक औरों के हिस्से के फैसले भी खुद करता हो उसमें अशांति ही होगी। हिंसा ही होगी और अपराध ही बढ़ेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-8586307653262497233?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/8586307653262497233/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=8586307653262497233' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/8586307653262497233'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/8586307653262497233'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/01/blog-post_27.html' title='गणतंत्र की अवधारणा को कमजोर करते हैं सारे सुपर हीरो'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-1003393473875891890</id><published>2011-01-24T17:29:00.001+05:30</published><updated>2011-01-24T17:29:58.727+05:30</updated><title type='text'>वर्ल्डकप में तुरुप के तीन पत्ते</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;इस वर्ल्डकप में भारतीय क्रिकेट के फेवरेट होने की बात इस बार भी कही जा रही है। हर मैच में गेंदबाजों की अपनी भूमिका होती है मगर मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि इस बार भारतीय क्रिकेट टीम को ट्राफी मिलेगी या नहीं, यह तीन बल्लेबाजों की परफार्मेंस तय करेगी। अगर ये तीनो फार्म में रहते हैं तो कोई भी टीम और कोई भी बड़ा स्कोर मायने नहीं रखेगा। इन खिलाड़ियों का क्रम इस तरह-&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वीरेंद्र सहवाग&lt;/b&gt;-इनकी आक्रामक शैली पूरी टीम को मजबूत करती है। जिस दिन यह नहीं चलते अक्सर वह टीम का बुरा दिन ही होता है। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;युसुफ पठान-&lt;/b&gt;जब तक यह क्रीज पर हैं तो समझो मैच भारत की मुट्ठी में रहेगा। अपनी आक्रामक शैली से यह कहीं से भी मैच में टीम की वापसी करवा सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;विराट कोहली-&lt;/b&gt;भले ही अनुभव कम है मगर भारतीय धरती पर किसी भी टीम की बखिया उधेड़ने में सक्षम हैं। युसुफ की तरह यह युवा तुर्क भी मैच का रुख मोड़ता नजर आएगा।&lt;br /&gt;पर ये तीन एक साथ मैच में खिलाए जाएंगे इसमें शक। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-1003393473875891890?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/1003393473875891890/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=1003393473875891890' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1003393473875891890'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1003393473875891890'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/01/blog-post_24.html' title='वर्ल्डकप में तुरुप के तीन पत्ते'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-878789627550316246</id><published>2011-01-02T17:03:00.000+05:30</published><updated>2011-01-02T17:03:01.612+05:30</updated><title type='text'>क्या वाम पंथियों का दिमाग मोटा होता है?</title><content type='html'>&lt;div class="mbl notesBlogText clearfix"&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;यह सवाल उठा है  यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के रिसर्चरों के एक शोध से, जिसमें उन्होंने  पाया है कि दिमाग की बनावट ही दक्षिण और वाम विचारधारा तय करती है।  उन्होंने अपने शोध में पाया कि वाम पंथ को मानने वाले लोगों के मस्तिष्क के  बीच का हिस्सा एंटीरियर सिंगुलेट दक्षिण पंथियों की तुलना में मोटा होता  है। एमआरआई स्कैनरों से करीब नब्बे राजनेताओं के दिमाग का अध्ययन किया गया।  एंटीरियर सिंगुलेट वह हिस्सा है, जो भावनात्मक और निर्णय प्रक्रिया को तय  करता है। शोध से संबंधित खबर पीटीआई से जारी हुई।&lt;br /&gt;अब इस मोटे को अगर हम दूसरी भाषा में कहें तो &lt;strong&gt;वामपंथियों का यह हिस्सा मोटा अर्थात अधिक विकसित होता &lt;/strong&gt;है, इन्हें एक बार में समस्याओं के एक से ज्यादा हल नजर आते हैं। दूसरी ओर दक्षिणपंथी एक भावावेग में फैसला कर लेते हैं।जहां दक्षिणपंथी भावनात्मक फैसलों की वजह से तेजी से लोकप्रिय होते हैं, वहीं इसी वजह से वे अपनी लोकप्रियता जल्दी गंवा भी देते हैं। इसलिए उनका उत्थान पतन तेजी से होता है जितनी तेजी से वे प्रगति करते हैं, उतने समय वे उस उत्थान के साथ टिके नहीं रह पाते। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-878789627550316246?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/878789627550316246/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=878789627550316246' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/878789627550316246'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/878789627550316246'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='क्या वाम पंथियों का दिमाग मोटा होता है?'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-1695538770559695410</id><published>2010-12-31T18:09:00.001+05:30</published><updated>2010-12-31T18:09:33.761+05:30</updated><title type='text'>नव वर्ष मुबारक</title><content type='html'>नव वर्ष की सभी ब्लागर्स को शुभकामनाएं।&lt;br /&gt;सुधीर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-1695538770559695410?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/1695538770559695410/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=1695538770559695410' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1695538770559695410'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1695538770559695410'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='नव वर्ष मुबारक'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-5871119834164264245</id><published>2010-11-16T17:36:00.002+05:30</published><updated>2010-11-16T17:36:33.593+05:30</updated><title type='text'>सवासेर गेहूं - कहानी पुरानी मगर समय के साथ समाज की तस्वीर और भयाभय हुई</title><content type='html'>प्रेमचंद की कहानी सवासेर गेहूं आप सबने पढ़ी होगी। उसमें आजसे पचास साल पुराने समाज की तस्वीर है, जिसमें साहूकारी प्रथा पीढ़ी दर पीढ़ी की गुलामी देती है। सवासेर गेहूं की वह कहानी तो प्रेमचंद जी की कल्पना थी, मगर सवासेर गेहूं के लिए बेटी की जान लेने वाले गरीब अब भी उसी तनाव और द्वंद्व में समाज की हकीकत बने हुए हैं। एक अखबार में छपी यह खबर उस पुरानी कहानी का नया चेहरा दिखाने वाली है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहराइच.एक किशोरी के सैम्पू खरीदने के लिए एक किलो गेहूं बेच देने से नाराज बाप के उसे कथित तौर पर पीट-पीटकर मार डालने की घटना सामने आई है।अख्तरुल (12वर्ष) की मां ने उसे बचाने का प्रयास किया लेकिन आरोपी मिजान अहमद ने उसे बुरी तरह पीटा। रात में मिजान अहमद ने अपने अचेत बेटी को उठाने की कोशिश की तो उसे मरा हुआ पाया। मिजान ने रात में ही दो पड़ोसियों की मदद से अख्तरुल का शव कब्रिस्तान में दफना दिया।&lt;br /&gt;सुबह उसके परिवार के सदस्यों ने अख्तरुल को गुम पाया और उसकी तलाश शुरू कर दी।अख्तरुल की मां ने ग्रामीणों की मदद से कैसरगंज थाने में एक शिकायत दर्ज कराई। कै&lt;br /&gt;सरगंज के थानाध्यक्ष कपिलमुनि सिंह ने खोजबीन के बाद शव के कब्रिस्तान में होने का पता लगा लिया और उसे बाहर निकाल कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। पुलिस ने मिजान अहमद और उसके दो भतीजों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-5871119834164264245?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/5871119834164264245/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=5871119834164264245' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5871119834164264245'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5871119834164264245'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='सवासेर गेहूं - कहानी पुरानी मगर समय के साथ समाज की तस्वीर और भयाभय हुई'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-5964388726017175797</id><published>2010-10-29T21:18:00.000+05:30</published><updated>2010-10-29T21:18:23.252+05:30</updated><title type='text'>जीवन की कला</title><content type='html'>&lt;strong&gt;सुधीर राघव &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने बच्चों से कहा- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं तुम्हें सिखाऊंगा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे पास बहुत सी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छी-अच्छी बाते हैं, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैं तुम्हारे जितना था &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे माता-पिता भी मुझे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिखाते थे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर मैं नहीं समझ सका &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने मेरे कान खींचे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम भी नहीं सुनते हो &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं तुम्हारे भी कान खींचूंगा....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं कान खींच रहा हूं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्योंकि जो मैं बताता हूं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चे नहीं सीख रहे हैं... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चे वही सीख रहे हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो मैं करता हूं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चे हमसे शब्द नहीं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन जीने की कला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर वह कला क्या हमें आती है??&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-5964388726017175797?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/5964388726017175797/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=5964388726017175797' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5964388726017175797'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5964388726017175797'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/10/blog-post_29.html' title='जीवन की कला'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-5726255968805050763</id><published>2010-10-27T11:06:00.003+05:30</published><updated>2010-10-27T11:15:16.470+05:30</updated><title type='text'>कौन बचाएगा संस्कृति???</title><content type='html'>&lt;strong&gt;सुधीर राघव &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृति मुझे भी बचानी थी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और तुम्हे भी बचानी थी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर इसे तो वे ही बचा सकते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिनके हाथ में टीवी का रिमोट है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिनेमा के टिकट हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अफसोस!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे अलग संस्कृति में &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ढल रहे हैं।। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिमोट मेरे हाथ में भी है &lt;br /&gt;तुम्हारे हाथ में भी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मल्टीप्लैक्स में &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टिकट लिए &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कतार में &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं भी खड़ा हूं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और तुम भी।। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे मित्र, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारी दीवार पर लगा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिकनीपोश नारी चित्र &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धुंधला पड़ जितनी जल्दी हटा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसीसे यह&amp;nbsp;उम्मीद जगती है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद हम अपनी संस्कृति बचा ले जाएं।। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिस्स!!!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-5726255968805050763?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/5726255968805050763/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=5726255968805050763' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5726255968805050763'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5726255968805050763'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/10/blog-post_27.html' title='कौन बचाएगा संस्कृति???'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-2005279859168681410</id><published>2010-10-25T12:38:00.000+05:30</published><updated>2010-10-25T12:38:33.160+05:30</updated><title type='text'>खास हिन्दुओं की नई खेप</title><content type='html'>आजकल खास हिन्दुओं की नई खेप आम हिन्दुओं को कायर, नपुंसक और न जाने क्या-क्या कह रही है। वैसे आम भारतीय के लिए यह बोली नई नहीं है। लंबे समय से नेताओं के मुंह से यह बोली सुनते आए हैं। आपसी नफरत को बढाते हुए मुल्क का बंटवारा भी कर चुके हैं। आम और खास हिन्दू का अंतर इनकी ओर से बस इतना ही बताया जाता है कि आम हिन्दू का खून नहीं खौलता और खास हिन्दू का खून खौल रहा है। कश्मीर को लेकर और आतंकवाद को लेकर। इनके खून खौलने का शिकार भी आम हिन्दू ही होता है, सबसे ज्यादा गालियां उसे ही पड़ती हैं कि तुम्हारा खून नहीं खोलता। तुम कायर हो और नपुंसक हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अस्सी के दशक में ऐसे ही खून खौलाने का काम मुसलमानों में लादेन ने किया था। अनपढ़ और कबीलायी क्षेत्र में सबसे ज्यादा खून खौला और&amp;nbsp;युवक नई पढ़ाई पढ़कर तालिबान बने। अब उस खून खौलने का खामियाजा पूरी मुसलमान कौम झेल रही है। जिनका नहीं खोला वे आम मुसलमान भी। आज पूरी दुनिया में उन्हें शक की नजर से देखा जाता है। जिहाद के नाम पर जो आतंकवाद शुरू किया गया, मासूम लोगों की जान ली गई, लेकिन आज सबसे ज्यादा खामियाजा इस विचारधारा को अपनाने वाले या संबंधित पूरा समुदाय ही उठा रहा है। अमेरिका से लेकर पूरी दुनिया की सरकारें इनकी नकेल कसने में जुटी हैं और आतंकवाद को सब जगह मार पड़ रही है। इनके अपने समुदाय में लोग अब खुलकर इन के खिलाफ आने लगे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत जिस तेजी से तरक्की कर रहा है, वह जाहिर है यूरोप और अमेरिका को खटक ही रहा है। मुसलिम आतंकवाद को खड़ा कर और उसे निपटाने के नाम पर प्रमुख तेल अर्थव्यवस्था पर कब्जा किया ही जा चुका है। तो क्या अब खास हिन्दुओं के नाम पर कोई हिन्दू लादेन खड़ा करने की कोशिश है, ताकि अगले दस बीस साल में भारत को अगला इराक, इरान, अफगानिस्तान या पाकिस्तान जैसा बना दिया जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां तक आतंकवाद से निपटने का काम है तो हमारी सेना और पुलिस अपनी पूरी ताकत लगा कर इसे कर रही है। हिन्दुओं का भी खून खौलाकर क्या कश्मीर या आतंकवाद की समस्या सुलझेगी या हमारी पुलिस और सेना के लिए एक और सिरदर्द बढे़गा। उसका ध्यान और क्षमता बंटेगी। ऐसे ही नब्बे के दशक में कुछ लोगों ने खास हिन्दू बनने की कोशिश की और पटाक्षेप जिन्ना की मजार पर माथा टेक कर किया। सभी राजनितिक दल वोट बैंक के नाम पर ऐसे नाटक करते हैं, क्योंकि उनका तो यह धंधा है, मगर आम आदमी को उस कीचड़ में घसीटना, जहां नेता लोग पहले से लोट-पोट हो रहे हैं, बुरा ही नहीं देश के लिए खतरनाक भी है। नेताओं के बहकावे में आकर हम भड़कते रहे तो देश खामियाजा उठायेगा ही, जैसा अफगानिस्तान ने उठाया है। आम आदमी को गालियां दे देकर उस कीचड़ में न घसीटा जाए तो बेहतर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां तक मुसलमानों के नाम पर आतंकवाद की समस्या है तो मुझे लगता है कि वह अगले कुछ साल में नियंत्रण में आ जाएगी क्योंकि मुसलमान भाई खुद भी काफी जागरूक हो रहे हैं। मस्जिद विवाद पर फैसले को लेकर दोनों समुदायों ने जो धैर्य दिखाया वह इस बात का संकेत है। हिंसा और आतंकवाद से सब पीड़ित हैं। अगर हमारी शांति की इच्छा को, हमारी सहिष्णुता को, हमारे धैर्य को हमारी कायरता समझा जा रहा है तो ये खास लोग समझते रहे। इन्हें पता है कि ये खास लोग हैं ये हर हाल में सुरक्षित रहेंगे। लादेन और मुल्ला उमर की तरह, टोरा-बोरा की पहाडि़यों में, आईएसआई या सीआईए के संरक्षण में। भुगतेगा और मरेगा तो आम आदमी ही। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने जवानों पर भरोसा रखिये। एक जागरूक नागरिक की तरह आसपास की चीजों पर नजर रखिए। आम नागिरक से हमारे वीर जवानों को इतनी ही मदद काफी है। खून खौलाकर अशांति और दो समुदायों को भड़काने की बोली बंद की जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(जरूरी नहीं कि आप सब मेरी इस बात से सहमत हों। अगर कोई असहमति है तो जरूर बताइएगा। बेहिचक बताइएगा। धन्यवाद।।)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-2005279859168681410?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/2005279859168681410/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=2005279859168681410' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2005279859168681410'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2005279859168681410'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/10/blog-post_9934.html' title='खास हिन्दुओं की नई खेप'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-4025872669154762974</id><published>2010-10-25T08:24:00.001+05:30</published><updated>2010-10-25T08:27:34.061+05:30</updated><title type='text'>विचारों से असहमति निंदा नहीं है</title><content type='html'>ब्लॉग जगत में विचारों से असहमति को लगता है निंदा के रूप में लिया जाता है। एक अलग तरह का तनाव पैदा होता है। हम इन्हें सहन नहीं कर पाते हैं, ऐसा करने वाले को नाराजगी भी झेलनी पड़ती है। इसमें कोई अलग बात नहीं है, जो व्यक्ति दुखी होगा, वह नाराजगी तो जताएगा ही। पर क्या हमें वैचारिक असहमति पर दुखी होना चाहिए? सभी के विचार एक जैसे हो जाएंगे तो विचार विनिमय कैसे होगा? उसकी जरूरत ही नहीं रहेगी। इससे तो अच्छा है कि हम अंतर्जाल की जगह घर की डायरी में अपना-अपना लिखें और अपना-अपना पढ़ें। पर समाज इसका नाम नहीं है, सभ्य समाज विचारों को साझा करने का नाम है और असहमतियों पर तर्क-वितर्क करने का नाम है। इंटरनेट ने हमें यह मौका दिया है। हां मैं हां मिलाने वाले लोग ही अच्छे नहीं होते। असहमत हैं तो असहमति प्रकट करनी ही चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं भी नहीं चाहता कि आप सब भी मेरी इस बात से सहमत हों। अगर कोई असहमति है तो जरूर बताइएगा। बेहिचक बताइएगा। धन्यवाद।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-4025872669154762974?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/4025872669154762974/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=4025872669154762974' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/4025872669154762974'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/4025872669154762974'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/10/blog-post_25.html' title='विचारों से असहमति निंदा नहीं है'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-3220827598360920123</id><published>2010-10-20T09:23:00.001+05:30</published><updated>2010-10-21T23:47:12.494+05:30</updated><title type='text'>दिवाली से पहले</title><content type='html'>&lt;strong&gt;सुधीर राघव&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दशहरे पर &lt;br /&gt;रावण बच गया &lt;br /&gt;इसलिए रच रहा है &lt;br /&gt;दिवाली से पहले &lt;br /&gt;राम के वनवास का षड्यंत्र। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं जानता &lt;br /&gt;राम वन जाएगा &lt;br /&gt;तभी तो रावण मरेगा, &lt;br /&gt;शायद सरस्वती ऐसे ही &lt;br /&gt;बुद्धि फैरती है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर रावण की मां &lt;br /&gt;कब तक खैर मनाएगी &lt;br /&gt;क्योंकि दशहरा तो &lt;br /&gt;हर साल आता है।। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुनश्च- &lt;strong&gt;अगले दशहरे &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;फिर मिलेंगे रावण।।&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-3220827598360920123?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/3220827598360920123/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=3220827598360920123' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3220827598360920123'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3220827598360920123'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/10/blog-post_20.html' title='दिवाली से पहले'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-1271561006686943840</id><published>2010-10-15T14:05:00.001+05:30</published><updated>2010-10-16T10:43:52.730+05:30</updated><title type='text'>समंदर को डूबते देखा है</title><content type='html'>&lt;strong&gt;सुधीर राघव &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े-बड़े जहाज डूबते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर हौसला नहीं डूबता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुनामी लहरों के थपेड़े &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मचाते हैं तबाही &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तहस-नहस हो जाते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सौ सुरक्षा से सजे बेड़े &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब एक डोंगी की &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिसात ही क्या है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में हौसला तैर कर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निकल जाता है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किनारे पहुंच देखता है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊंची लहरें उतर रही हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समंदर धीरे-धीर डूब रहा है।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-1271561006686943840?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/1271561006686943840/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=1271561006686943840' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1271561006686943840'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1271561006686943840'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/10/blog-post_15.html' title='समंदर को डूबते देखा है'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-2649092917853988687</id><published>2010-10-11T21:28:00.000+05:30</published><updated>2010-10-11T21:28:20.949+05:30</updated><title type='text'>शुकदेव की कथा पर विश्वास नहीं होता तो इसे पढ़ें</title><content type='html'>शुकदेव के जन्म को लेकर पौराणिक कथा बताती है कि महर्षि व्यास के यह पुत्र बारह वर्ष तक माता के गर्भ में रहे। तर्क में आस्था रखने वाले इस बात पर विश्वास नहीं करेंगे। मगर अब साइंस ने कुछ ऐसा ही चमत्कार कर दिखाया है। इसमें बारह नहीं बीस साल पहले कंसीव भ्रूण से हृष्ट-पुष्ट बच्चे का जन्म हुआ है। पहले शुकदेव की संक्षेप में कथा--भगवान शिव पार्वती को अमर कथा सुना रहे थे। पार्वती जी कथा सुनते-सुनते निद्रा के वशीभूत हो गयीं और उनकी जगह पर वहां बैठे एक शुक ने हुंकारी भरना प्रारम्भ कर दिया। जब भगवान शिव को यह बात ज्ञात हुई, तब उन्होंने शुक को मारने के लिये उसका पीछे अपना त्रिशूल छोड़ा। शुक जान बचाने के लिए तीनों लोकों में भागता रहा, भागते-भागते वह व्यास जी के आश्रम में आया और सूक्ष्मरूप बनाकर उनकी पत्नी के मुख में घुस गया। वहीं गर्भ में रह गया। ऐसा कहा जाता है कि ये बारह वर्ष तक गर्भ के बाहर ही नहीं निकले। जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं आकर इन्हें आश्वासन दिया कि बाहर निकलने पर तुम्हारे ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा, तभी ये गर्भ से बाहर निकले। यही शुक व्यासजी के अयोनिज पुत्र के रूप में प्रकट हुए। गर्भ में ही इन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का सम्यक ज्ञान हो गया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब अमेरिका के ईस्टर्न वर्जिनिया मेडिकल स्कूल के जॉन इंस्टीट्यूट फार रिप्रोडक्टिव मेडिसन के प्रयास से हुए इस बच्चे की कथा। यह संस्थान बांझपन से पीड़ित दंपती का इलाज करता है। इस संस्थान में १९९० में एक दंपत्ती ने अपना इलाज करवाया था। इलाज सफल रहने के बाद उन्होंने चार कंसीव भ्रूण संस्थान को ही डोनेट कर दिए थे। इन्हें फ्रीज्ड कर रखा गया। अब जिस ४२ वर्षीय महिला ने इनमें से एक भ्रूण से बच्चे को जन्म दिया है, उसका इलाज इस संस्थान में दस साल से चल रहा था। इलाज करने वाल डॉक्टर और संस्थान की डायरेक्टर सर्गेइ ओइनिगर का कहना है कि पिछले वर्ष फ्रीज्ड भ्रूण इस महिला को इम्पलांट किया गया था। इससे अब हृष्ट-पुष्ट बच्चे ने जन्म लिया है। ऐसा माना जाता है कि फ्रीज्ड भ्रूण से चालीस साल बाद तक बच्चा पैदा हो सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उम्मीद है कि अब आपको शुकदेव जी की जन्म की कथा और ज्यादा विश्वसनीय लगेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कुछ और रोचक बातें &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;-क्या आप जानते हैं कि बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री और लालू प्रसाद यादव की पत्नी राबड़ी देवी के पास १७ लाख रुपये से ज्यादा कीमत का पशुधन है। नामांकन के दौरान आयोग को उपलब्ध कराई जानकारी के मुताबिक उनके पास ६२ गायें और ४२ बछड़े हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-राष्ट्रमंडल में तैयारियों और घोटाले के खबरें अब पीछे छूट चुकी हैं। जिस गति से सोना बरस रहा है, उससे इसमें सट्टेबाजों की भी रुचि जाग गई है। गाजियाबाद पुलिस ने वैशाली से तीन सट्टेबाजों को कॉमनवेल्थ गेम्स में सट्टा लगाने के आरोप में गिरफ्तार किया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-दुनिया का सबसे बड़ा ऑटो बाजार अब चीन बनने जा रहा है। चीन की समाचार एजेंसी शिन्हुआ का दावा है कि पिछले वर्ष की तुलना में पच्चीस फीसदी ग्रोथ के साथ ही चीन इस मामले में अमेरिका को पछाड़ देगा और इस साल करीव एक करोड़ सत्तर लाख वाहन बिकने का अनुमान है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-2649092917853988687?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/2649092917853988687/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=2649092917853988687' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2649092917853988687'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2649092917853988687'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/10/blog-post_11.html' title='शुकदेव की कथा पर विश्वास नहीं होता तो इसे पढ़ें'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-4828409705985150471</id><published>2010-10-08T22:23:00.002+05:30</published><updated>2010-10-08T22:23:22.442+05:30</updated><title type='text'>जो सरल है वही बचेगा</title><content type='html'>प्रकृति सरल और सहज जीव को ही पसंद करती है। साइंस ने भी यह साबित किया है कि जो जितना जटिल है उसके लुप्त होने की संभावना उतनी ही ज्यादा है। दुनिया के अब तक के ज्ञात सबसे जटिल डीएनए संरचना को डिकोड कर लिया गया है। यह एक जापानी पौधा है। इस पर सुंदर सफेद फूल आते हैं। इसे पैरिस जापोनिका नाम से जाना जाता है। लंदन की क्यू गोर्डेंस के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया है कि यह अब तक का सबसे बड़ा जेनेटिक कोड है। यह मनुष्य के जेनेटिक कोड से करीब पचास गुणा बड़ा है। इसकी जटिलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मनुष्य के डीएनए में करीब ३३ हजार जीन्स होते हैं। &lt;br /&gt;वैज्ञानिकों का कहना है कि इतना जटिल डीएनए होने की वजह से इसके लुप्त होने का खतरा भी ज्यादा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-4828409705985150471?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/4828409705985150471/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=4828409705985150471' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/4828409705985150471'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/4828409705985150471'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/10/blog-post_08.html' title='जो सरल है वही बचेगा'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-3923475288126813028</id><published>2010-10-05T21:55:00.000+05:30</published><updated>2010-10-05T21:55:21.788+05:30</updated><title type='text'>जवाब दो</title><content type='html'>&lt;strong&gt;सुधीर राघव&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदमी ने आदमी से पूछा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरी जात क्या है? &lt;br /&gt;तेरा धर्म क्या है? &lt;br /&gt;तेरा देश क्या है? &lt;br /&gt;तेरा नाम क्या है? &lt;br /&gt;तेरा पता क्या है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदमी क्या कहता- &lt;br /&gt;उसने ईश्वर की ओर देखा &lt;br /&gt;ईश्वर भी क्या कहता &lt;br /&gt;उसने आदमी की ओर देखा &lt;br /&gt;दोनों चुप थे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर सवालों की अनुगूंज बढ़ती गई &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरी जात क्या है? &lt;br /&gt;तेरा धर्म क्या है? &lt;br /&gt;तेरा देश क्या है? &lt;br /&gt;तेरा नाम क्या है? &lt;br /&gt;तेरा पता क्या है? &lt;br /&gt;...........&lt;br /&gt;............&lt;br /&gt;.............&lt;br /&gt;..............&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-3923475288126813028?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/3923475288126813028/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=3923475288126813028' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3923475288126813028'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3923475288126813028'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='जवाब दो'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-3373647842792399682</id><published>2010-09-30T01:08:00.002+05:30</published><updated>2010-10-05T21:52:21.103+05:30</updated><title type='text'>घर के सामने वाला वो पेड़</title><content type='html'>सुधीर राघव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक पेड़ का कट जाना &lt;br /&gt;और ठूंठ बनकर रह जाना &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी पीड़ा की&amp;nbsp;अभिव्यक्ति &lt;br /&gt;किसी ठोकर लगे पांव में &lt;br /&gt;मिल सकती है &lt;br /&gt;पर मेरी कविता में नहीं &lt;br /&gt;शब्द कटोरा लिए भावनाओं &lt;br /&gt;से मांगने आते हैं &lt;br /&gt;और रत्ती भर पाते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्तियों और टहनियों की &lt;br /&gt;उपयोगिता है&lt;br /&gt;टपक चुके फलों में अगर बीज &lt;br /&gt;बन चुके होंगे तो &lt;br /&gt;वे खाद पानी मिलते ही उग आएंगे &lt;br /&gt;ठूंठ का क्या होगा &lt;br /&gt;उसका तो शिवलिंग भी नहीं बनता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर गुजरने वाले की आंख में खटकेगा? &lt;br /&gt;ठूंठ क्या कहेगा? &lt;br /&gt;उसकी अभिव्यक्ति तो &lt;br /&gt;खिलखिलाती पत्तियों में थी &lt;br /&gt;टहनियों में थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी कविता ठूंठ की कविता नहीं है &lt;br /&gt;यह कविता है ठूंठ के हौसले की &lt;br /&gt;उस उम्मीद की, फिर से कोंपलें फूटेंगी&lt;br /&gt;फिर से पत्तियां खिलखिलाएंगी &lt;br /&gt;इंतजार है तो बस एक बारिश का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...और मौसम विभाग बता रहा है &lt;br /&gt;इस साल मानसून अच्छा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्साहित माली छंटाई के लिए तैयार है&lt;br /&gt;कहते हैं, जिस साल छंटाई होती है &lt;br /&gt;बाग में फल अच्छे आते हैं।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-3373647842792399682?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/3373647842792399682/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=3373647842792399682' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3373647842792399682'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3373647842792399682'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/09/blog-post_30.html' title='घर के सामने वाला वो पेड़'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-3181366077681409744</id><published>2010-09-27T12:49:00.003+05:30</published><updated>2010-09-27T12:50:46.769+05:30</updated><title type='text'>फिर विवाद के मूड में हैं कंगारू</title><content type='html'>कहते हैं, रस्सी जल जाए तो भी बल नहीं जाता। भले ही आस्ट्रेलिया के हाथ से टेस्ट की नंबर वन टीम होने का दर्जा छिन चुका है मगर स्लेजिंग की आदत खिलाड़ियों की अभी नहीं छूटी है। ऐसा लग रहा है कि अपनी इसी आदत की वजह से कंगारू इस दौरे में भी कोई बड़ा विवाद खड़ा कर सकते हैं। इसके शुरुआती लक्षण उन्होंने बोर्ड एकादश के साथ हो रहे अभ्यास मैच में भी दिखा दिए हैं। श्रीसांत और पीयूष चावला को वाटसन ने निशाना बनाया। उन्हें गेंदबाजी सीखने को कहा गया। अब श्रीसांत या भज्जी से ऐसा व्यवहार क्या जाएगा तो क्या वे चुप्प रहेंगे? लगता है कि जीत के दबाव और खिलाड़ियों के तनाव तथा फिक्सिंग ने इस खेल को जेंटलमैन का गेम नहीं रहने दिया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-3181366077681409744?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/3181366077681409744/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=3181366077681409744' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3181366077681409744'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3181366077681409744'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/09/blog-post_27.html' title='फिर विवाद के मूड में हैं कंगारू'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-5747488593040940994</id><published>2010-09-26T17:57:00.003+05:30</published><updated>2010-09-26T19:52:20.748+05:30</updated><title type='text'>क्रिकेट में सहवाग होना</title><content type='html'>वीरों में वीरेंद्र है वो &lt;br /&gt;बल्ला उगले आग &lt;br /&gt;क्रिकेट में भगवान से बढ़कर &lt;br /&gt;है अपना सहवाग &lt;br /&gt;दुनिया के सब बॉलर डरते &lt;br /&gt;जमकर चौके छक्के पड़ते &lt;br /&gt;बचने के लिए जतन सब करते&lt;br /&gt;पर सबको देता दाग &lt;br /&gt;क्रकेट में भगवान से बढ़कर &lt;br /&gt;है अपना सहवाग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिहरे-तिहरे शतक बनाकर &lt;br /&gt;खूब करै कमाल &lt;br /&gt;कई सच-इन झूठिन कर डाले &lt;br /&gt;सबके चेहरे लाल &lt;br /&gt;अच्छे-अच्छे आउट स्विंगर गए &lt;br /&gt;मैदान छोड़कर भाग &lt;br /&gt;क्रकेट में भगवान से बढ़कर &lt;br /&gt;है अपना सहवाग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लंका में अभी डंका बाजा &lt;br /&gt;ऐसा है क्रिकेट का राजा &lt;br /&gt;बादल बन और सब पे छाजा &lt;br /&gt;दुबके फिरें कंगारू सारे &lt;br /&gt;जब फुफकारे नाग &lt;br /&gt;क्रकेट में भगवान से बढ़कर &lt;br /&gt;है अपना सहवाग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली अक्तूबर को मोहाली में&lt;br /&gt;फिर से होगी जंग &lt;br /&gt;देखो बल्ला बोलेगा या &lt;br /&gt;बॉल करेगी तंग &lt;br /&gt;कुछ भी हो पर खूब जमेगा&lt;br /&gt;दोनों टीमों का रंग&lt;br /&gt;पर कंगारू सहमे फिरते हैं &lt;br /&gt;वीरू न जाए जाग&lt;br /&gt;क्रकेट में भगवान से बढ़कर &lt;br /&gt;है अपना सहवाग&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-5747488593040940994?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/5747488593040940994/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=5747488593040940994' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5747488593040940994'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5747488593040940994'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/09/blog-post_26.html' title='क्रिकेट में सहवाग होना'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-277498302361485271</id><published>2010-09-25T00:42:00.000+05:30</published><updated>2010-09-25T00:42:53.687+05:30</updated><title type='text'>छोटी खबर पर बड़ी मिसाल</title><content type='html'>कुछ लोगों को यह एक छोटी खबर लग सकती है, मगर यह लापरवाही की बड़ी मिसाल है। चंडीगढ़ के पास छतबीड़ चिड़ियाघर में घड़ियाल के पंद्रह में से चौदह बच्चे मारे गए हैं। जू प्रशासन इनकी मौत का जिम्मेदार ठहरा रहा है, एक नर घड़ियाल को। पूरी कहानी पढ़ोगे तो यह बात आपके गले से भी नहीं उतरेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घड़ियाल के ये पंद्रह बच्चे सात जून को जन्में थे। घड़ियाल संरक्षण कार्यक्रम के तहत इनकी ब्रीडिंग की जा रही थी। काफी दिन तक ये दिखाई नहीं पड़े तो जू के अधिकारियों ने इनकी तलाश शुरू की। तलाब का सारा पानी निकाल दिया गया। उसमें बस एक ही बच्चा मिला। अधिकारियों ने तब ये सोचा कि शायद बाकी बच्चे बाड़े के रेत के टीले में जा छुपे हों। फिर रेत की खुदाई शुरू हुई। बीस सितंबर को रेत में से ग्यारह बच्चों के कंकाल मिले। तत्काल एक फारेस्ट गार्ड को निलंबित कर दिया गया। चिड़ियाघर के फील्ड डायरेक्टर चर्चिल कुमार का अखबारों में बयान आया कि इन बच्चों को नर घड़ियाल ने खा लिया होगा। हम मामले की जांच करेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नर घड़ियाल तो बेचारा अपनी सफाई दे नहीं सकता पर उस पर लगे इस आरोप को साबित करने के लिए भी कई सवालों का जवाब देना होगा। पहला तो यह कि अगर इन्हें नर घड़ियाल ने खाया होता तो इसकी संभावना बहुत कम थी कि तीन माह के इन बच्चों के कंकाल मिलते। इन सरीसृप जीवों की पाचन शक्ति काफी अच्छी होती है और छोटी अस्थियां तक पच ही जाती हैं। दूसरा सवाल यह है कि घड़ियाल संरक्षण के नियमों के तहत इन बच्चों को बड़े घड़ियालों से अलग तलाब में रखा जाना चाहिए था। इसके अलावा पानी का तापमान २६ डिग्री सेल्सियस तक नियंत्रित रखने के लिए अंडर वाटर बाल्व प्रयोग होने चाहिए थे, वे नहीं किए गए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-277498302361485271?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/277498302361485271/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=277498302361485271' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/277498302361485271'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/277498302361485271'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/09/blog-post_24.html' title='छोटी खबर पर बड़ी मिसाल'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-461018421799612932</id><published>2010-09-21T01:35:00.001+05:30</published><updated>2010-09-21T01:35:23.787+05:30</updated><title type='text'>दुनिया का बंटवारा</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;सुधीर राघव &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हव्वा और आदम ने ठाना &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया का बंटवारा होगा, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मादा सृष्टि मेरी होगी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नर संसार तुम्हारा होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पांव की जूती नहीं रहूंगी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जोर-जुल्म भी नहीं सहूंगी, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझको भी आज़ादी प्यारी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दासी बनकर नहीं जिऊंगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वर्ग से हम दोनों आए थे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन तुमने नर्क बनाया, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सृष्टि का आधार बनी में &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुमने अपना नाम कमाया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंकुर कोख में मैंने पाला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारा जीवन उसमें ढाला, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना कोई हक न समझा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब तेरी झोली में डाला। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर नर तूने कद्र न जानी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब चाहा तब की मनमानी, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तूनें सदियों खूब सताया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब ये अबला हुई सयानी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाती हूं दहलीज लांघकर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारे दुख खूंटी पे टांगकर, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे सुख का द्वार खुला है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुश हूं मैं मुक्ति जानकर। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाओ-जाओ नर चिल्लाया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हव्वा का प्रस्ताव भी भाया, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुक्ति लोगी, मुक्ति दोगी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं सतायेगी मोह माया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरे कारण बंधन में था &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बास-सुबास न चंदन में था, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जीवन फर्राटा लेगा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा पहिया मंदन में था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना स्वर्ग में फिर रच लूंगा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्ञान से सारे सुख कर लूंगा, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कंधे पर से बोझ हटा है, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखो कैसे मैं जी लूंगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी सेब एक टूट के आया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हव्वा ने आदम को थमाया, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नजर मिली दोनों की फिरसे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधा-आधा उसको खाया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगा ज्ञान से प्रेम बड़ा है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन अब भी वहीं खड़ा है, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके लिए स्वर्ग ठुकराया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब क्यों यह अहंकार चढ़ा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंद्र का वह लोक छोड़कर, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देवत्व के बंधन तोड़कर। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने अपना लोक बसाया, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चारों ओर है अपनी माया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माया का विस्तार है इतना, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वर्गलोक का सार न जितना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर टूटते हैं हम दोनों, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर कोई बंटवारा होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो न संसार तुम्हारा होगा,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न संसार हमारा होगा।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-461018421799612932?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/461018421799612932/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=461018421799612932' title='20 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/461018421799612932'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/461018421799612932'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/09/blog-post_20.html' title='दुनिया का बंटवारा'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-1297076129880100068</id><published>2010-09-14T01:14:00.000+05:30</published><updated>2010-09-14T01:14:17.960+05:30</updated><title type='text'>आप भी जानें - क्या है चंडीगढ़ की सुखना झील का संकट</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TI58iltekGI/AAAAAAAAAHc/bjAtsN1VAR4/s1600/Sukhna_lake_3.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" ox="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TI58iltekGI/AAAAAAAAAHc/bjAtsN1VAR4/s320/Sukhna_lake_3.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;ऊपर चित्र में दिखाई गई यह जलीय वनस्पति सुखना झील के पानी पर तैर रही थी। यह बड़ी तेजी से बढ़ रही थी। अप्रैल माह में यह वनस्पती झील की सतह पर छा गई थी।&amp;nbsp;&amp;nbsp;इस झील में सैलानी बोटिंग करते हैं। जब बोटिंग एरिया तक यह वनस्पति पहुंची तो प्रशासन जागा और मजदूर लगाकर इसको हटाने का काम शुरू किया गया। इस कंटीली वनस्पति को छूने से एलर्जी भी देखी गई। यह एक्वेटिक वीड क्या बला है। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है। अभी तक इसके वेलिसनेरिया, हाइड्रीला और ब्राजील चारा वीड होने की अटकलें लगाई जा रही थीं। हिन्दुस्तान के चंडीगढ़ संस्करण में १३ सितंबर को छपी खबर में पंजाब यूनिवर्सिटी की बॉटनी विभाग की प्रोफेसर डेजी बातिश ने इसके पोटामोजेटोन क्रिस्पस होने की संभावना व्यक्त की है। हालांकि उनका कहना है कि अभी इसका लैब परीक्षण होना है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TI585hn9YOI/AAAAAAAAAHk/0x4R0VWLr-E/s1600/Sukhna_lake.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" ox="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TI585hn9YOI/AAAAAAAAAHk/0x4R0VWLr-E/s320/Sukhna_lake.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह चित्र इस बनस्पति की एक&amp;nbsp;पत्ती का है। इसके किनारे आरी के दांत जैसे तीखे और पत्ती की बीच की शिरा पर भी छोटे छोटे कांटे हैं। इन कांटों की संख्या २० से २५ के बीच हैं। हाइड्रीला की पत्तियों पर भी ऐसे कांटे होते हैं, जिनकी संख्या ११ से ३९ तक हो सकती है। मगर हाइड्रीला की पत्ती लंबाई चोड़ाई इससे कुछ कम होती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TI59YGbWWJI/AAAAAAAAAHs/8WOLR1CNcQE/s1600/Sukhna_lake_4.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" ox="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TI59YGbWWJI/AAAAAAAAAHs/8WOLR1CNcQE/s320/Sukhna_lake_4.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यह दायीं ओर का तीसरा&amp;nbsp;चित्र इसके मुख्य तने का है, जिस पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर तीन-तीन पत्तियां होती हैं। इस तने पर भी छोटे-छोटे कांटे होते हैं। इस तरह के कांटे हाइड्रीला में भी होते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या जेनेटिकली मॉडिफाइड बला है&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यह बूटी असल में क्या है, इसका पुष्ट जवाब अभी तक नहीं मिल रहा है। अगर आपकी बॉटनी में रुचि हैं, या आप बॉटनी पढ़ाते हैं, आप इसमें मदद कर सकते हैं। क्या आपने अपने आसपास के जलाशयों में ऐसी बूटी को देखा है? यह भी संभव है कि इस जलीय खरपतवार को सुनियोजित तरके से फैलाया जा रहा हो। आखिर अमेरिका में हाइड्रीला की रोकथाम के लिए जैविक उपायों के तहत लाखों डॉलर खर्च किए जाते हैं। सुखना झील में यह खरपतवार प्रकृतिकतौर पर पैदा हुई है या जैनेटिकली मॉडीफाइड कोई बला है, अभी इस रहस्य का उत्तर तलाशना बाकी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;....और आप नीचे के चित्र में हिन्दुस्तान के चंडीगढ़ संस्करण का १३ सितंबर का वह पूलआउट देख रहे हैं, जिसमें पर्यावरण से जुड़ी इस समस्या को गंभीरता से उठाया गया है। &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TI5_AWoC2wI/AAAAAAAAAH0/gdOUwjtO8-g/s1600/sukhna+lake+13-09-10.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" ox="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TI5_AWoC2wI/AAAAAAAAAH0/gdOUwjtO8-g/s320/sukhna+lake+13-09-10.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-1297076129880100068?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/1297076129880100068/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=1297076129880100068' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1297076129880100068'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1297076129880100068'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/09/blog-post_8473.html' title='आप भी जानें - क्या है चंडीगढ़ की सुखना झील का संकट'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TI58iltekGI/AAAAAAAAAHc/bjAtsN1VAR4/s72-c/Sukhna_lake_3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-6234200556034486077</id><published>2010-09-13T13:07:00.000+05:30</published><updated>2010-09-13T13:07:58.054+05:30</updated><title type='text'>सुखना का यह संकट कौन दूर करेगा</title><content type='html'>जो भी चंडीगढ़ घूमने आता है, उसने यहां रॉक गार्डन और सुखना झील जरूर देखी होगी। इस खूबसूरत शहर की पहचान मानी जाती है यह झील। सुखना करीब छह माह से एक नए संकट से जूझ रही है। इसमें एक रहस्यमय इक्वेटिक वीड तेजी से पनप रही है। यह रहस्यमय कंटीली वनस्पती गर्मियों में सुखना की ऊपरी सतह पर इतनी ज्यादा फैल गई थी कि बोटिंग एरिया भी प्रभावित होने लगा था। तब इसे हटाने के लिए करीब सत्तर मजदूर लगाए गए। उन्हें भी इसे हटाते समय एलर्जी का शिकार होना पड़ा। अब बारिश के बाद जलस्तर बढ़जाने पर यह ऊपरी सतह पर नहीं है मगर पानी के अंदर अब भी लहलहा रही है। जिस गति से यह बढ़ती है, उससे यह पूरी संभावना है कि यह सर्दियों में पानी की ऊपरी सतह पर फिर अपना कब्जा जमा ले। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जलीय वनस्पति क्या है, इसे लेकर भी अटकले ही हैं, अब तक चार नाम सामने आ चुके हैं, मगर किसी को भी लेकर ही विशेषग्य पुष्ट नहीं हैं। इसे वेलिसनेरिया, ब्राजील चारा वीड, हाइड्रीला के बाद अब पोटामोजेटोन बताया जा रहा है। मजदूरों वाली योजना से इसका पूरा सफाया न होने के बाद अब प्रशासन झील में बीस हजार ग्रास कॉर्प मछलियां डालने की योजना बना रहा है। &lt;br /&gt;हालंकि गर्मियों में बड़ी ग्रासकॉर्प मछलियां पानी में ऑक्सीजन की कमी से मरने लगी थीं, तब उन्हें निकालने के लिए ठेका दिया गया था। यह भी अभी तक पता नहीं है कि क्या झील में ऑक्सीजन की कमी इसी रहस्यमय जड़ी की वजह से तो नहीं हुई है। &lt;br /&gt;सोमवार को हिन्दुस्तान के चंडीगढ़ संस्करण में छपी खबर के मुताबिक बॉटनी विशेषग्यों कहते हैं कि जलीय वनस्पतियां अनुकूलन के लिए अपने रंग-रूप में बदलाव भी लाती हैं। संभवतः इस बदलाव की वजह से ही यह आसानी से पहचान में नहीं आ रही।मगर अनुकूलन लंबे समय की प्रक्रिया है। अगर ऐसा है तो यह संभव है कि इस जड़ी के अंकुर या बीज कई साल पहले से सुखना की सतह पर पनपने का संघर्ष कर रहे हों। &lt;br /&gt;इसी तरह की समस्या १९६० में अमेरिका के फ्लोरिडा की झीलों में शुरू हुई थी। वहां हाईड्रीला ने कुछ ही वर्षों में करीब साढ़े तीन सौ मील जल सतह पर कब्जा कर लिया था। तब उसकी रोकथाम के लिए उपाय शुरू किए गए। नतीजा यह है कि अमेरिका में इस पर नियंत्रण के लिए अब भी हर साल लाखों डॉलर खर्चे जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सवाल यह है कि सुखना को इस नए संकट से कौन मुक्त करेगा। प्रशासन इससे निपटने के लिए बस अंधेरे में तीर चला रहा है। देश के बॉटनी साइंसदानों को इसमें रुचि लेनी चाहिए। यह उन्हीं का विषय है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-6234200556034486077?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/6234200556034486077/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=6234200556034486077' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6234200556034486077'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6234200556034486077'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/09/blog-post_13.html' title='सुखना का यह संकट कौन दूर करेगा'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-5981044773792261672</id><published>2010-09-10T01:27:00.002+05:30</published><updated>2010-09-10T01:27:39.134+05:30</updated><title type='text'>हिंसा के पेट से हिंसा ही जन्म लेगी</title><content type='html'>हिंसा से प्रतिहिंसा, प्रतिहिंसा की प्रतिक्रिया- यह आतंकवाद की शृंखला है। धर्म के नाम पर ऐसा आतंकवाद दुनिया में तेजी से बढ़ रहा है और करीब-करीब सभी प्रमुख धर्म अपने अनुयायियों के दिलों में अन्य धर्मों के लिए बढ़ते विद्वेष की समस्या से जूझ रहे हैं। अमेरिका के लिए ११ सितंबर इस विद्वेष का प्रतीक बन गया है। जिहाद के नाम पर अमेरिका पर आतंकवादी हमला हुआ, उसकी प्रतिहिंसा आज नौ साल बाद भी जारी है। अमेरिका के एक ईसाई संगठन 'डव वर्ल्ड आउटरीच सेंटर’ ने कुरान की प्रतियां जलाने की घोषणा की है। यह वैचारिक आतंकवाद दुनिया के मुसलमानों पर उस खूनी आतंकवाद को कहर से अतिरिक्त है, जो अमेरिकी बमवर्षकों ने इराक और अफगानिस्तान में हजारों लोगों की जान लेकर बरपाया। ये बमवर्षक उन ईसाइ विचारों के अधीन थे जिन्हें भय था कि जिहादी मुसलिम उन्हें खत्म कर देंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्म की आड़ लेकर आज दुनिया में सबसे ज्यादा विद्वेष फैलाया जा रहा है। धार्मिक नेता इस आतंकवाद के सफाये के लिए व्यापक धर्म सुधार शुरू करने की जगह सिर्फ यही राग अलाप कर पल्ला झाड़ लेते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खासकर ऐसे धार्मिक संगठनों, जहां चढ़ावे का पैसा निजी हाथों और संस्थाओं में जाता है, वहां इस पैसे के दुरुपयोग की संभावना ज्यादा सामने आ रही हैं। दुनिया में धर्म के नाम पर जितना पैसा आता है, उससे चाहें तो शिक्षण संस्थान, चिकित्सा संस्थान और उद्योग-धंधे शुरू कर गरीबी, बीमारी और बेरोजगारी को दुनिया से काफी हद तक दूर किया जा सकता है। जबकि यह काम काफी छोटे पैमाने पर किया जाता है। जिन देशों में भी धर्म के नाम पर आतंकवाद फल-फूल रहा है, वहां ये तीनों समस्याएं (गरीबी, बीमारी और बेरोजगारी) सबसे ज्यादा हैं। इसके बावजूद धर्मस्थलों का काफी पैसा हथियारों की खरीद पर जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी ओर हिन्दुओं के ज्यादातर प्रमुख धर्मस्थल सरकारी ट्रस्टों या श्राइन बोर्डों की देखरेख में हैं। सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार तो हो सकता है, (मामले सामने आते भी रहते हैं) मगर आतंकवाद का खतरा नहीं हो सकता। इस पैसे का इस्तेमाल हथियार खरीदने में हो, इसकी संभावना कम है। यही वजह है कि (चिदंबरम की भाषा में भी कहें तो) भगवा आतंकवाद के जो मामले सामने आ रहे हैं, वे कोई बहुत संगठित नहीं हैं। उनके पास इतने आर्थिक संसाधन नहीं हो सकते कि वे कोई बड़ा संगठन खड़ा कर सकें। जबकि अन्य धर्मस्थलों पर ऐसे सरकारी नियंत्रण की बात नहीं हो रही है। दुनिया में धर्म के नाम पर आने वाले पैसे को जब तक ठीक से विकास में लगाने की प्रणाली नहीं बनाई जाएगी, तब तक दुनिया आतंकवाद से जूझती रहेगी। लोगों के दिमागों में बहुत जहर है। इसकी वजह सिर्फ यही है कि वे एक-दूसरे से डरते हैं। यह डर ही आतंकवाद को पैदा करता है। इसे दूर करना होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सुधार तभी संभव हैं, जब सभी धर्मों के नेता आगे आएं। गुरु नानक, कबीर, रहीम, रविदास ने हिन्दू धर्म में आई बुराइयों को दूर करने के लिए जो सुधारवाद की मुहिम चलाई, वैसी ही मुहिम आज सभी धर्मों में आतंकवाद के खिलाफ चलाए जाने की जरूरत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-5981044773792261672?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/5981044773792261672/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=5981044773792261672' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5981044773792261672'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5981044773792261672'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/09/blog-post_09.html' title='हिंसा के पेट से हिंसा ही जन्म लेगी'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-2578649653652254997</id><published>2010-09-06T15:23:00.000+05:30</published><updated>2010-09-06T15:23:51.035+05:30</updated><title type='text'>सृष्टि का सृष्टा कौन</title><content type='html'>महान साइंसदान स्टीफन हॉकिंग ने अपनी नई किताब ‘द ग्रैंड डिजाइन’ में स्पष्ट किया है कि इस सृष्टि का कोई सृष्टा नहीं है और भौतिकी के नियम ऐसे हैं कि शून्य से भी सृष्टि की स्वस्फूर्त उत्पत्ति संभव है। इसलिए हम सृष्टि के उस निर्माण को अपनी तर्कशक्ति से भी देख सकते हैं (भौतिकी के नियमों से)। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि हॉकिंग ने इसका विश्लेषण कैसे किया है यह तो पुस्तक के साथ जल्द ही सबके सामने आ जाएगा, मगर मुझे अस्सी के दशक के रूसी साइंसदानों की बात याद आ रही है, वे एंटी कॉस्मोस (एंटी ब्रह्माण्ड) का सिद्धांत लाए थे। उनके अनुसार सृष्टि का निर्माण शून्य से उसी प्रकार है जैसे हमारी गिनती है। शून्य दो हिस्सों में टूटा एक और माइनस एक में। फिर इस में वह एक ही जुड़ जुड़ कर पूरी गिनती और गुणा-भाग जैसे संबंध बनाकर पूरा गणित बन जाता है। वैसे ही सृष्टि आपसी संबंधों से विस्तार करती रही है। हालांकि एंटी ब्रह्माण्ड की अवधारणा कई सवालों का जवाब नहीं दे पायी। जैसे इस ब्रह्माण्ड और एंटी ब्रह्मांड के बीच ऐसा क्या है जो इन्हें आपस में मिलने से रोक रहा है। बीच में अगर कुछ नहीं है तो दोनों फिर मिलकर आकार से ऊर्जा में बदल जाएंगे। शून्य हो जाएंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस विषय को लेकर १९९५ में मैंने भी एक लेख लिखा था जो कुछ अखबारों में छपा भी था, सृष्टि निर्माण की यह अवधारणा हमारी वैदिक अवधारणा से मिलती जुलती है। शून्य जो परम ब्रह्म है, ब्रह्मा और सहांरक शिव के रूप में अभिव्यक्त होता है। क्या यह वही है, जिसे ब्रह्मांड और एंटी ब्रह्मांड कहा जा रहा है। वदों में सृष्टि के पालक के रूप में विष्णु भी हैं, इस तथ्य को भी जब तक ये साइंसदान नहीं तलाशते तब तक इनकी व्याख्या अधूरी है। इससे यह लगता है कि वेदों की व्यख्याएं पूरी तरह वैग्यानिक हैं और अब हमने अपनी समझ से उनका मानवीकरण कर दिया है, जिससे वे आसानी से समझ नहीं आतीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #cc0000;"&gt;अंत में एक हल्की-फुल्की बात -&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #0c343d;"&gt;मुन्ने बदनाम हुए&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिक्सिंग तेरे लिए &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुकी मज़ीद निकला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल चारों का फिसला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बट्ट आमरे आसिफ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिकेट कामरान हुए &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिक्सिंग तेरे लिए &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्ने बदनाम हुए &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिक्सिंग तेरे लिए &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;(यह पाकिस्तान को समर्पित)&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-2578649653652254997?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/2578649653652254997/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=2578649653652254997' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2578649653652254997'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2578649653652254997'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/09/blog-post_06.html' title='सृष्टि का सृष्टा कौन'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-3930880102044548638</id><published>2010-09-04T03:39:00.000+05:30</published><updated>2010-09-04T03:39:47.660+05:30</updated><title type='text'>क्या आतंकवाद का कोई धर्म होता है</title><content type='html'>&lt;strong&gt;कलियुग केवल नाम अधारा। सुमिर-सुमिर नर उतरें पारा।।&lt;/strong&gt; पांच सौ साल पुरानी चौपायी की यह कड़ी आज भी हमारे समाज की उतनी ही सही तस्वीर है, जितनी कि तबके समाज की होगी। नाम का सहारा लेकर लोग अब भी अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करते हैं, चाहे वे राजनीतिक हों, आर्थिक हों या सामाजिक। यही वजह है कि धर्मस्थलों के साये में या धर्म के नाम पर कई बार वे संगठन तेजी से ताकतवर होते हैं, जिनकी आस्था भय और आतंक में होती है। अगर हम लोग खुद से ही यह सवाल करें कि व्यवस्था को बनाए रखने के लिए भय कितना जरूरी है तो ज्यादातर यही जवाब देंगे कि भय नहीं होगा तो लोग मनमानी करेंगे। पुलिस का डर नहीं होगा तो सब चोरियां करेंगे। कानून का भय नहीं होगा तो सब अपराध करेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सवाल उठता है कि क्या हमारे पास चरित्र नहीं है और जो है उसका निर्माण भय ही करता है। भय नहीं होगा तो हम कुछ भी करेंगे? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फिलासफी और हमारे मनोविग्यान में खोट है। भय में जब तक हमारी आस्था है, तब तक समाज में आतंकवाद ऐसे ही फलेफूलेगा। वह उस रक्तबीज राक्षस की तरह है कि एक मारोगे तो उसके खून से दूसरा उग आएगा। यह भय हममें कहां से आया, यह सवाल महत्त्वपूर्ण नहीं है, यह भय हमारे अंदर जन्म से कुदरत ने दिया और जंगल के हर जीव में होता है। यह भय उसकी रक्षा भी करता है। सवाल यह है कि यह भय आज भी कायम है। जंगल में भय था मगर हमने सभ्य समाज का आधार भी भय को ही बनाया। समाज में सभ्यता की रचना करने वाले सभी धर्म लोगों को बुरे कर्मों से बचाने के लिए भय को ही आधार बनाते हैं, ईश्वर का डर दिखाया जाता है। गरुण पुराण जैसे ग्रंथ भी हैं जिन्हें पढ़ कर रूह तक कांप जाती है। करीब-करीब सभी धर्मों में इस तरह के डर दिखाए गए हैं। चाहे वह कयामत के दिन की बात हो। इस तरह सभ्य समाज की रचना करने में भी प्रेम की जगह भय का ही सहारा लेना पड़ा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विचार का यह भय ही खतरनाक है, जो बार-बार आतंकवाद बनकर हमारे सामने आ खड़ा होता है। कहा जाता है औरंगजेब रोज सवा मन जनेऊ उतरवा देता था, उसकी धर्मिक कट्टरता ने बहुत से सिर कत्ल किए, सिर्फ इसलिए ताकि वह खुद को मजबूत रख सके और मुगलों में लंबी उम्र तक उसने शासन भी किया। इससे वह खुद तो मजबूत रहा मगर मुगल साम्राज्य की दीवारें खोखली कर गया। उसके जाते ही वह भरभरा कर गिरा। तालिबान और लादेन ने भी अपने समाज में लोकप्रियता और मजबूती अपनी धार्मिक कट्टरता की वजह से ही पायी मगर आज हालत यह है कि पूरी दुनिया में समाज की साख को बट्टा लगा और अमेरिका जैसे देश तो सिर्फ इसलिए किसी व्यक्ति की जामा तलाशी लेते हैं कि उसका सर नेम खान या ऐसा ही होता है। उनके दिल पर क्या गुजरती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्म के नाम पर अगर लोग भीरू बनेंगे तो यकीन मानो कि किसी भी महत्वाकांक्षी के मन में यह भावना आ सकती है कि इस आतंक को हथियार बनाकर भीरू लोगों को डराया जा सकता है और उन पर शासन किया जा सकता है। यही वजह है कि धर्म का चोला ओढ़कर आतंकवाद जब भी आया है, वह समाज के लिए ज्यादा घातक और ज्यादा लोगों की जान लेने वाला साबित हुआ है। धर्म युद्धों के नाम पर लोग हजारों सालों से मरते और मारे जाते रहे हैं। जो लोग कहते हैं कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता, वे गलतफहमी में हैं आतंकवाद किसी भी रंग का हो सकता है। महाभारत के युद्ध को धर्मयुद्ध कहा जाता है, इसमें १८ अक्षोणी कौरव सेना और १६ अक्षोणी पांडव सेना थी, जिसमें से पांच पांडव और कुछ ही लोग बचे थे। दुर्योधन ने अधर्म किया था मगर बाकी जो लाखों लोग मरे वे सिर्फ इसलिए क्योंकि युद्ध करना उनकी जीविका का साधन था। वे सिपाही थे। इस तरह कुछ लोगों की महत्त्वाकांक्षाओं को धर्म मानकर लोग हिंसा पर उतर आते हैं। जान लेते और देते हैं। &lt;br /&gt;जो लोग यह मानते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, वे या तो भोले हैं या बहुत ज्यादा चतुर हैं। जब तक आतंकवाद धर्म का नाम ले कर फलता-फूलता है तब तक यह उम्मीद होती है कि सत्ता अब इसी धर्म के नाम पर चलेगी मगर जैसे ही सरकारों की प्रतिहिंसा उस पर भारी पड़ने लगती है तब उसी धर्म के नेता बोलने लगते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। यह नारा बहुत देर से आता है। पंजाब में पंद्रह साल आतंकवाद चला और करीब तीस हजार लोग मारे गए। धर्मस्थलों तक में हथियार छुपाये गए। उन्हें किसी ने नहीं रोका। &lt;br /&gt;धर्म के नाम पर सत्ता बनाने की महत्त्वकांक्षा सभी धर्मों के लोगों में देखी जाती है। यह गाहे-बगाहे आतंकवाद के रूप में सामने आती है। इस तरह आतंकवाद हरा, पीला, भगवा, नीला, केसरिया, लाल, सफेद किसी भी रंग में हो सकता है। जब तक हम बच्चों को धर्म के नाम पर भय का पाठ पाढ़ाएंगे, तब तक वे दादागीरी का सपना देखते रहेंगे। दंबंग होने की धुन भविष्य में और लादेन पैदा करेगी। धर्म के नाम पर सिर्फ प्रेम का संदेश दिया जाए तभी दुनिया से आतंकवाद खत्म हो सकता है। &lt;br /&gt;आतंकवाद की खुराक भय है और जब तक धर्म में भय दिखाने की बात होगी तब तक यह विष बेल पलती रहेगी। एक पत्ता तोड़ोगे तो दूसरा उगता रहेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-3930880102044548638?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/3930880102044548638/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=3930880102044548638' title='18 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3930880102044548638'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3930880102044548638'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/09/blog-post_03.html' title='क्या आतंकवाद का कोई धर्म होता है'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-5277686486872235663</id><published>2010-09-02T13:21:00.000+05:30</published><updated>2010-09-02T13:21:08.427+05:30</updated><title type='text'>जो सुनायेगा, दिखायेगा-वही बच पायेगा</title><content type='html'>क्या जो बांचा जाए, सिर्फ वही साहित्य है। क्या जो लिखे, वही लेखक है? क्या जो बोले, वही वक्ता है? क्या जो प्रस्तुत करे, वही प्रस्तोता या अभिनेता? दूसरी ओर क्या जो पाठक है, वही श्रोता भी नहीं है? क्या जो श्रोता है, वही दर्शक भी नहीं है? अब साहित्यकार के सामने वह समाज है, जो कम पाठक, कम श्रोता और ज्यादा बड़ा दर्शक है। ऐसे में सिर्फ कागद कारे करके पाठक वर्ग खड़ा नहीं किया जा सकता। अब लेखक को संपूर्ण रचेयता बनना होगा, जो साहित्य सुनायेगा, दिखायेगा-वही बच पायेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी साहित्य को जनता-जनार्दन के बीच ले जाना है तो आज के साहित्यकारों को कबीर बनना होगा- मसि कागद छुओ नहीं, कलम गही न हाथ। इसके बावजूद उनसे संपूर्ण साहित्य&amp;nbsp;पुरुष&amp;nbsp;कौन है? उनका खरा और निर्भीक साहित्य स्कूलों और विश्वविद्यालयों के लिए आज भी रहस्यवाद बना हुआ है। तुलसी, सूर, कबीर और मीरा की कहा आज भी हर हिन्दुस्तानी को दिन में एक-दो बार सुनने को मिलता है और वह साथ गुनगुनाये बिना नहीं रह पाता। दूसरी और आज के हमारे हिन्दी साहित्यकार हैं, उनकी शिकायत है कि हिन्दी पट्टी के लोग ही नहीं पढ़ रहे हैं। उन्हें पढ़ने की आदत डालनी होगी। अब सवाल उठता है कि कितने लोगो आदत बदलें और कैसे बदलें, जब एक लेखक कागद कारे करने की अपनी आदत बदलकर आधुनिक साधनों के इस्तेमाल की आदत नहीं अपना पा रहा तो एक अरब की जनता (यह मानते हुए कि बाकी दस करोड़ देश में लेखक होंगे) खुद को क्यों बदले। हिन्दी पट्टी के साठ करोड़ लोगों के पास तो अपनी नाचने गाने की और भी समृद्ध तथा शानदार परंपरा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खड़ी बोली की&amp;nbsp;बृज पट्टी में आज भी कृष्ण लीला भजन और तीज के गीत उतने ही लोकप्रिय हैं। पीढ़ियों से सुहागिनें और कन्यायें इन्हें गा रही हैं, कभी बासी नहीं हुए। राजस्थान का कालबेलिया, ढोला-मारू जैसे किस्से, हरियाणा की रागनियां क्या कभी बासी होंगी। मध्यप्रदेश का लोक गीत ससुराल गेंदा फूल हो या भोजपुरी का मुन्नी बदनाम हुई, जब सुनाया गया और दिखाया गया तो बच्चे-बच्चे की जुवान पर गूंज रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-5277686486872235663?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/5277686486872235663/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=5277686486872235663' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5277686486872235663'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5277686486872235663'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='जो सुनायेगा, दिखायेगा-वही बच पायेगा'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-8648268608464571287</id><published>2010-09-01T01:16:00.000+05:30</published><updated>2010-09-01T01:16:21.401+05:30</updated><title type='text'>बोलो कौन पढ़ता है हिन्दी साहित्य</title><content type='html'>बीबीसी इंडिया ने अपने श्रोताओं और पाठकों के समक्ष यह सवाल उछाला है। हिन्दी साहित्य के नाम पर अब भी प्रतिक्रियाओं में प्रेमचंद, निराला, बच्चन और धर्मवीर भारती जैसे नाम ही लिए गए। जो आजकल लिख रहे हैं, उनके बारे में कहा गया है कि वे या तो अपने साहित्यक मित्रों या शत्रुओं के लिए लिख रहे हैं या फिर किसी पुरस्कार पाने के लिए। देश की हिन्दी पट्टी में ही आधुनिक साहित्य नहीं पढ़ा जा रहा है। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि पुस्तकें बहुत महंगी, ऐसे पाठकों के लिए मैत्रयी पुष्पा का जवाब था कि सिनेमा का टिकट भी महंगा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपर जो सवाल उठाया गया है वह सचमुच गंभीर है। नया हिन्दी साहित्य क्यों नहीं पढ़ा जा रहा है। साहित्य का मतलब अगर पुस्तकों से ही है तो अब वह जरूर संकट में है। साहित्य का मतलब अगर सिनेमा और टीवी तथा इंटरनेट और अखबार (भले ही सप्ताह का एक पन्ना) भी है तो यकीन मानो कि हिन्दी साहित्य पहले से काफी मजबूत हुआ है। दुनिया की अन्य भाषाओं का साहित्य अनूदित हो कर हिन्दी में आ रहा है। वह नाटकों और फिल्मों के रूप में भी आया है। मोगली, मालगुडी डेज, नीम का पेड़, पिपली लाइव, थ्री इडीयट, बालिका वधु, लापतागंज जैसी रचनाएं किसी भी साहित्य के लिए मजूबत हस्ताक्षर और प्रयोगधर्मी हैं। अब हिन्दी इंटरनेट पर मजबूती से बढ़ रही है। ब्लाग पर चक्रधर की चक्कलस है तो आलोक पुराणिक की अगड़म-बगड़म भी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि अच्छा साहित्य नहीं लिखा जा रहा, मगर अब हिन्दी लेखक को पुस्तकीय संस्करणों तक ही नहीं बंधे रहना चाहिए, उन्हें अन्य लोकप्रिय माध्यमों की ओर रुख करना चाहिए। जितने खर्च में एक पुस्तक छपती है उतने खर्च में एक वेबसाइट शुरू की जा सकती है और उस पर लेखक जीवनभर की रचनाएं डाल सकता है। जो हिन्दी अभी एसएमएस के जरिए रोमन में पढ़ी जा रही है, वह थोड़े प्रयास से देवनागरी में भी हो सकती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पर हम हिन्दी पढ़ने, बोलने या लिखने वाले सबकी अपनी राय होगी। लेकिन बीबीस पर श्रोताओं की प्रतिक्रिया समचमुच बड़े सवाल छोड़ती है, एक बार अवश्य देखें इस लिंक पर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2010/08/100831_indiabol_hindi_audio.shtml&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-8648268608464571287?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/8648268608464571287/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=8648268608464571287' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/8648268608464571287'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/8648268608464571287'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/08/blog-post_31.html' title='बोलो कौन पढ़ता है हिन्दी साहित्य'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-7680887493321309233</id><published>2010-08-30T23:22:00.000+05:30</published><updated>2010-08-30T23:22:30.985+05:30</updated><title type='text'>वेतनभोगी और नेता</title><content type='html'>&lt;b&gt;सुधीर राघव&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;'महंगाई डायन खाय जात है`, बेचारा वेतनभोगी रघुवीर यादव का सुर निकाल रहा है-क्या करें मालिक वेतन ही नहीं बढ़ाता है। खर्चे लगातार बढ़ रहे हैं। अब गुजारा नहीं होता।&lt;br /&gt;'तो फिर नेता क्यों नहीं बन जाते?` मित्र समझा रहा है-संसद में जाओ और मजे से अपना पांच-छह गुणा वेतन बढ़ाओ। न किसी से पूछने की जरूरत, न कोई रोकने वाला। बोझ बढ़ेगा तो डाल दो पब्लिक पर, वह है न ढोने के लिए। &lt;br /&gt;'नेतागीरी हमसे नहीं होगी, उसके लिए भी तो कुछ क्वालीफिकेशन वगैरा चाहिए या नहीं।Ó वेतनभोगी अपनी लाचारी जता रहा है- हमें भाषण करना भी तो नहीं आता है और लोग क्यों सुनेंगे हमारी? सुनने के लिए पहले ही बड़े-बड़े नेता पड़े हैं। उनके बीच हम कहां टिकेंगे। &lt;br /&gt;'अरे! नेता बनने के लिए किसी क्वालीफिकेशन की जरूरत नहीं है।...अच्छा यह बताओ कि तुम्हारे परिवार में कभी कोई मंत्री, विधायक रहा है।`&lt;br /&gt;'नहीं।`&lt;br /&gt;'कोई पार्षद या सरपंच।`&lt;br /&gt;'नहीं।`&lt;br /&gt;'तब तो तुम सिर्फ जमीन से जुड़े नेता बन सकते हो।` मित्र बात को खोलकर समझा रहा है।&lt;br /&gt;'जमीन से जुड़ा नेता? वो क्या होता है?` &lt;br /&gt;'जमीन से जुड़ा नेता नहीं जानते।..अरे राजनीति में भी जमीन बनानी पड़ती है।...और जमीन यानी प्रॉपर्टी। जमीन से जुड़ा नेता मतलब इस प्रॉपर्टी से डील करने वाला। हर नेता को जमीन चाहिए। इसलिए जमीन से जुड़े नेता की नेताओं में बहुत इज्जत होती है। वह चुनाव में खड़े होने, बैठने सबके पैसे लेता है। कोई जीते या हारे, कोई किसी की जमीन कब्जाए या कोई किसी को जमीन से बेदखल करे, उसका कमीशन पक्का।...यानी दोनों हाथों में लड्डू।`&lt;br /&gt;'इसके लिए करना क्या होगा?` वेतनभोगी की आंखें फैलकर सवालिया निशान हो जाती हैं। &lt;br /&gt;'कुछ खास नहीं, बस रोज शहर के जो दो चार बड़े नेता हैं उनके यहां जाओ। दिन भर वहीं डटो, खाओ-पियो और यह हवा बनाते रहो कि हर मोहल्ले में बस तुम्हारे ही लोग हैं। चार-छह चेले चपाटे रखो। बड़े नेता जिस मोहल्ले में जाएं तो वे फूल मालाएं लेकर पहले से पहुंच जाएं। तुम्हारे और नेताजी के नाम के जयकारे लगाएं।...इसके बाद जब चुनाव नजदीक आएं तो चेलों की मार्फत यह शिगूफा छुड़वाओं की इस बार तुम भी मैदान में ताल ठोकने वाले हो। किसी पार्टी की टिकट के तुम मोहताज नहीं हो, अपने दम पर जीतने की कूव्वत रखते हो।...फिर देखो कैसे नेता खुद तुम्हारे पास दंडवत करते हुए नोट लेकर पहुंचते हैं।`&lt;br /&gt;'यह सब भी हमसे नहीं होगा।` वेतनभोगी बेबसी जता रहा है-चेला-चपाटे कहां से लाएंगे। इसके लिए भी तो खर्चा-पानी चाहिए। पैसा कहां से आएगा? ...कुछ और बताओ।&lt;br /&gt;'कुछ और...तो आत्महत्या कर लो। आत्महत्या का भी तो सरकार पैसा &lt;br /&gt;देती है।`&lt;br /&gt;'यह पैसा तो बस किसानों को मिलता है। वेतनभोगी को देखना है तो पंजाब के मास्टरों को देख लो, बेचारे रोज पानी की टंकी पर चढ़े रहते हैं, कई ने जान दी, क्या हुआ?...कोई अच्छी सलाह दो।` वेतनभोगी बुरा सा मुंह बना रहा है।&lt;br /&gt;'अच्छी सलाह...तो मर्द बनो मर्द।`&lt;br /&gt;'मतलब?`&lt;br /&gt;'मतलब...बच्चा दूध पीने की जिद करे, बिस्कुट मांगे, खिलौना मांगे तो डांट दो। बीवी नई साड़ी की फरमाइश करे तो झल्ला जाओ कि आज खाना कैसा बनाया है। अभी तक खाना बनाना नहीं आता। संयम सीखो। सप्ताह में दो चार दिन व्रत रखो?`&lt;br /&gt;मित्र की इस सलाह पर वेतनभोगी मौन है। मगर बाहर गली में लाखों सामवेत स्वर उठ रहे हैं-महंगाई डायन खाय जात है...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के कलम में २९ अगस्त २०१० को प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-7680887493321309233?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/7680887493321309233/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=7680887493321309233' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/7680887493321309233'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/7680887493321309233'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/08/blog-post_30.html' title='वेतनभोगी और नेता'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-4312019228679673650</id><published>2010-08-29T01:36:00.000+05:30</published><updated>2010-08-29T01:36:04.438+05:30</updated><title type='text'>धिक है धोनी</title><content type='html'>इस ट्राई सीरिज में तो ऐसा लगा कि टीम इंडिया सिर्फ एक ही बल्लेबाज से खेल रही थी। सहवाग का बल्ला चले तो जीत नहीं तो पूरे पचास ओवर खेलने के भी लाले पड़ जाते। कहते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। वही हुआ और बहुत सी सीरीज की तरह भारत यह ट्राई सीरीज भी हार गया। इस हार के बाद धोनी की कप्तानी पर सवाल उठेंगे। वे उठने भी चाहिए, जिस तरह से रोहित शर्मा, दिनेश कार्तिक को मौके पर मौके दिए जाते रहे और सौरभ तिवारी को बाहर ही बैठाए रखा गया, उससे धोनी की छवि भयभीत कप्तान की ही बनी है, अब वह प्रयोगधर्मी नहीं दिखते। इसके अलावा उन्होंने टॉप ऑर्डर के फेल होने पर कभी भी आगे बढ़ कर मोर्चा संभालने की कोशिश नहीं की। वह नए खिलाड़ियों को क्रम में ऊपर भेजते रहे, जबकि खुद कभी वन या टू डाउन पारी संभालने नहीं आए।&amp;nbsp;&amp;nbsp;विश्वकप जीतना है तो यह समय है कि उनके विकल्प पर विचार किया जाए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-4312019228679673650?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/4312019228679673650/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=4312019228679673650' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/4312019228679673650'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/4312019228679673650'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/08/blog-post_28.html' title='धिक है धोनी'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-8889070106967021852</id><published>2010-08-25T12:55:00.000+05:30</published><updated>2010-08-25T12:55:14.797+05:30</updated><title type='text'>प्रेम का भी गणित होता है</title><content type='html'>जो लोग गणित को बोर और उबाऊ विषय मानते हैं, अब उनके चौंकने की बारी है। गणितीय समीकरणों का सहारा लेकर यह साबित किया जा चुका है कि प्रेम का भी गणित होता है। खासकर पुरुषों के प्रेम का। पुरुष उन्हीं महिलाओं की ओर ज्यादा आकर्षित होते हैं, जिनके नितंबों और कमर में एक खास अनुपात होता है। यह अनुपात एक और दशमलव सात का है। यानी नितंब के घेरे की तुलना में अगर कमर का घेरा तीस फीसदी कम हो तो उस महिला का प्रेमी सिर्फ उसका दीवाना होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या आप इस गणितीय समीकरण से इत्तिफाक रखते हैं, मुझे नहीं लगता कि कोई एक नजर देखकर इस घेरे के अनुपात का अंदाजा लगा लेता होगा। हां अगर कोई दर्जी हो तो दूसरी बात है। हां पुरुष थोड़ा सलीका पसंद होते हैं और गणित यह सलीका सिखाता है, इसमें कोई दो राय नहीं। यह गणित का सलीका है कि दो और दो चार ही होते हैं, इसलिए गणित विश्वसनीय बनता है। वैसे उपरोक्त अध्ययन के बारे में आप विस्तार से इस लिंक पर पढ़ सकते हैं- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Now, a math formula to find you your perfect lover &lt;br /&gt;http://in.news.yahoo.com/139/20100824/981/tsc-now-a-math-formula-to-find-you-your_1.html&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-8889070106967021852?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/8889070106967021852/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=8889070106967021852' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/8889070106967021852'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/8889070106967021852'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/08/blog-post_25.html' title='प्रेम का भी गणित होता है'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-3789257697388237336</id><published>2010-08-23T23:28:00.000+05:30</published><updated>2010-08-23T23:28:18.540+05:30</updated><title type='text'>राखी का संदेशा</title><content type='html'>इस बार की राखी भाइयो फिर संदेशा लाई,&lt;br /&gt;बांध प्रेम का धागा, कर लो मजबूत कलाई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महंगाई पर मस्त हुए हैं ये नेता अलबेले, &lt;br /&gt;ऊपर से तंग करें रोज, मुये माओ के चेले। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोड़ें बम गिरावें रेलें, बने जान के दुश्मन, &lt;br /&gt;इनकी अक्ल ठिकाने लाओ, करके जरा कड़ा मन। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत माता लिए हाथ में घूम रही है राखी, &lt;br /&gt;नेता भ्रष्ट अफसर अय्याश, चोर बनी है खाकी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवा अरब हैं मुंड और रक्षा नर को करनी है &lt;br /&gt;नारायण खुद ही बनना है, नहीं देर करनी है। &lt;br /&gt;अब तो हाथ बढ़ाओ साथी लो बांध प्रेम का धागा, &lt;br /&gt;दुनिया नतमस्कत होगी, जब लहू हिन्दुस्तानी जागा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुधीर राघव&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-3789257697388237336?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/3789257697388237336/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=3789257697388237336' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3789257697388237336'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/3789257697388237336'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/08/blog-post_23.html' title='राखी का संदेशा'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-6291296635708618550</id><published>2010-08-22T02:06:00.000+05:30</published><updated>2010-08-22T02:06:16.584+05:30</updated><title type='text'>नेता जैसा पेट</title><content type='html'>देश तरक्की कर रहा &lt;br /&gt;लेकर कहते वोट, &lt;br /&gt;जनता भूखी मर रही &lt;br /&gt;अपने बढ़वाते नोट। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गेहूं भले सड़ जाएगा &lt;br /&gt;पर नहीं गरीब को भेंट, &lt;br /&gt;लाखों ले भी नहीं भरे &lt;br /&gt;यह कैसा नेता का पेट। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह पेट देश को लीलता &lt;br /&gt;नहीं इसका कोई हवाल, &lt;br /&gt;खेल, रेल या तेल हो &lt;br /&gt;सबमें खाया माल। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेट घड़ा है पाप का, इतना तो मत खाय। &lt;br /&gt;हाय लगे गरीब की, फौरन ही फट जाए।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सुधीर राघव&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-6291296635708618550?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/6291296635708618550/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=6291296635708618550' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6291296635708618550'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6291296635708618550'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html' title='नेता जैसा पेट'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-7721791332751970194</id><published>2010-08-16T13:16:00.001+05:30</published><updated>2010-08-16T13:16:49.059+05:30</updated><title type='text'>सहवाग का गुणगान</title><content type='html'>आस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान इयान चैपल ने क्रिकइन्फो पर अपने आलेख में सहवाह की काफी प्रशंसा की है। उन्होंने सहवाग को टेस्ट क्रिकेट का विश्व का लंबे समय से सबसे खतरनाक बल्लेबाज बताया है। वह लिखते हैं कि सहवाग किसी भी अन्य खिलाड़ी से प्रतिओवर औसतन दो रन ज्यादा बनाते हैं और विशाल स्कोर खड़े करने में माहिर हैं। यह दोनों ही गुण उनके अलावा सिर्फ सर डॉन ब्रेडमैन में थे। वह यहां तक लिखते हैं कि यह सहवाग का सौभाग्य है या दुर्भाग्य कि सचिन तेंदुलकर भी उसी टीम में खेलते हैं, जो उनसे ज्यादा प्रचार पाते हैं। यह पहली बार नहीं है जब चैपल ने सहवाग की प्रशंसा की है। इससे पहले वह जनवरी में सहवाग को नया ब्रेडमैन कह चुके हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The three S's of Sehwag&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/post-create.g?blogID=2364923868109514052"&gt;http://www.blogger.com/post-create.g?blogID=2364923868109514052&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत की ओर से वीरू सर्वश्रेष्ठ - हाल ही में छपे एक साइंटफिक शोधपत्र में वीरेंद्र सहवाग को मैच जिताने के आधार पर भारत का सबसे श्रेष्ठ खिलाड़ी बताया गया है। इस सूची में टॉप पर ब्रेडमैन को रखा गया है। सहवाग छठे स्थान पर हैं। तेंदुलकर टॉप टेन से भी बाहर हैं। १८७७-२००६ के बीच के पचास महान खिलाड़ियों में द्रविड़ और गावस्कर को भी रखा गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Bradman best, Sehwag greater than Sachin: Study&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://timesofindia.indiatimes.com/sports/cricket/top-stories/Bradman-best-Sehwag-greater-than-Sachin-Study/articleshow/6316559.cms"&gt;http://timesofindia.indiatimes.com/sports/cricket/top-stories/Bradman-best-Sehwag-greater-than-Sachin-Study/articleshow/6316559.cms&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस संबंध में विस्तार से पढ़ने के लिए लिंक्स पर क्लिक करें&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-7721791332751970194?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/7721791332751970194/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=7721791332751970194' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/7721791332751970194'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/7721791332751970194'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/08/blog-post_16.html' title='सहवाग का गुणगान'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-5697920143877662054</id><published>2010-08-09T12:56:00.000+05:30</published><updated>2010-08-09T12:56:07.587+05:30</updated><title type='text'>क्रिकेट को खेल ही रहने दें, धर्म न बनाएं</title><content type='html'>एक स्कूल की घटना बता रहा हूं। छात्रों को दिवाली का प्रस्ताव लिखने के लिए दिया गया। एक छात्र लिख कर लाया हमारे देश में बहुत से त्योहार मनाए जाते हैं। दिवाली उनमें से एक है। होली भी एक त्योहार है, इस दिन हम एक दूसरे पर रंग फैंकते हैं। गुरुपर्व पर हम गुरुद्वारों में जाते हैं। लंगर छकते हैं। क्रिसमस पर हम चर्च में प्रार्थना करते हैं। ईद पर हम एक दूसरे के गले मिलते हैं। रक्षाबंधन पर बहने अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं। .....इत्यादि। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरा सोचो इस लेख पर अध्यापक की प्रतिक्रिया क्या रही होगी। जाहिर है उसने छात्र को मुर्गा बनाया और दो चार बेंत भी फटकारे। अध्यापक अगर बहुत ज्यादा सभ्य होता तो वह कहता, जाओ पुस्तकालय में जाकर अध्ययन करो। परिवार वालों से पूछों, दिवाली के बारे में पता करो और फिर से प्रस्ताव लिखो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विषय की पूरी जानकारी न हो तो व्यक्ति विषय से भटकता है। संजय भास्कर के ब्लॉग आदत..मुस्कुराने की पर क्रिकेट का समाज के विकास में योगदान पढ़ कर ऐसा लगा। शीर्षक पढ़कर लगा कि इसमें क्रिकेट के योगदान को लेकर अच्छी जानकारियां मिलेंगी मगर निराशा हुई। क्रिकेट के अलावा बाकी सब विषयों पर शब्द खर्च किए गए। पोस्ट का लेखक कहता है कि -जब सवाल पूछ लिया तो जवाब दिया जाना जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह नजरिया ही अटपटा है। सवाल पूछा है, इसलिए जवाब देना जरूरी नहीं होता, जवाब हो तभी वह दिया जाना चाहिए, नहीं तो विषय से भटककर आप हास्यस्पद हो जाते हैं। आप धर्म तो अकेले क्रिकेट को बताते हैं मगर जब इसके योगदान की बात आती है तो अन्य खेलों की ओट में छिपने लगते हैं। मैं यह भी जानना चाहता हूं कि वे कौन से मानक हैं, जिनके तहत ठीकठाक क्रिकेट खेलने वाले को तो भगवान कह दिया जाता है, मगर अपने दम पर एक नहीं कई बार हॉकी विश्वकप जिताने वाले को सिर्फ जादूगर कहा जाता है। जादूगर यानी हाथ की सफाई दिखाने वाला। क्या ये मानक आपको अन्य खेलों के प्रति हमारी उपेक्षा के द्योतक नहीं लगते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइये अब इस सवाल को देखते हैं क्रिकेट एक मनोरंजन का साधन है। इस संबंध में एक बात पूछना चाहूंगा कि एक दिन में मनोरंजन के कितने घंटे होने चाहिए। एक-दो-तीन या छह। एक महीने में अगर तीन टेस्ट हुए तो कुल मिलाकर नब्बे घंटे का मनोरंजन हुआ। कुछ वनडे भी हुए तो महीने के सबसे उपयोगी समय के सौ से ज्यादा घंटे सिर्फ मनोरंजन में गए। प्रतिदिन आठ घंटे के हिसाब से महीने में २४० घंटे काफी उपयोगी होते हैं इसमें से आधा समय हमें मनोरंजन को दे देना चाहिए। बहुत बढ़िया। इसका असर देखते हैं...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;व्यवस्थाओं के पतन में क्रिकेट का हाथ-&lt;/strong&gt; सरकारी कार्यालयों में क्रिकेट के जुनून ने काफी काम प्रभावित किया है। मैच के लिए छुट्टी लेना। ड्यूटी के समय में रेडियो कान से लगाये रखना, हमारे देश के सरकारी कार्यालयों में ये दृश्य आम था। एक तो भ्रष्टाचार और ऊपर से कामचोरी की आदत। क्रिकेट का इसमें योगदान क्या है यह बताने की जरूरत नहीं। सब जानते हैं। हमारा मीडिया भी क्रिकेट के नाम पर लोगों की भावनाओं से खेलता है। एक वरिष्ठ पत्रकार अपने ब्लॉग पर लिखते हैं कि कॉमनवेल्थ घोटाला मीडिया सामने लेकर आया। क्रिकेट में इससे बड़े घोटाले हैं, आईपीएल भी मीडिया सामने नहीं लाया, वह तभी निकला जब मोदी और थरूर ने खुद ट्विट किया। मीडिया को पता है कि क्रिकेट से विग्यापन मिलते हैं अन्य खेलों से क्या मिलेगा। मैच फिक्सिंग की कहानी भी किसी से छुपी नहीं है। &lt;br /&gt;आदत.. मुस्कुराने की संदर्भ वाली पोस्ट के लेखक आमीन ने एक और सवाल उठाया है कि कोई किसी की भी पूजा कर सकता है। हां, करे। उसे कौन रोक रहा है। जैसे कोई किसी की पूजा कर सकता है, वैसे ही कोई किसी से असहमत भी तो हो सकता है। असहमत होना क्या गुनाह है। पूजा करने वाला तो अपनी भावनाएं सार्वजनिक कर सकता है मगर असहमत होने वाला नहीं, यह कौन सा मानक है।&lt;br /&gt;कहना चाहूंगा कि क्रिकेट की इस अंधी भक्ति ने अन्य खेलों को भी देश में काफी नुकसान पहुंचाया है। मगर नई पीढ़ी में यह अंधी भक्ति नहीं दिखाई देती, जो हमारी पीढ़ी में थी। वह समझदार है और क्रिकेट के नाम पर हो रहे खेल को भी समझती है। क्रिकेट के नाम पर हो रहे इस खेल से तो खुद खिलाड़ी भी दुखी हैं। इस बार ट्वेंटी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप की हार के बाद धोनी ने लेट नाइट पार्टियों का जिक्र किया था इसके अलाव खिलाड़ी बर्न आउट की बात भी करते रहते हैं। महीने में सौ घंटे के मनोरंजन को मनोरंजन नहीं कहा जा सकता। यह धंधा बन रहा है। इसमें ज्यादातर वे हैं जो क्रिकेट खेलते नहीं हैं। कुछ चारणभाट प्रंशसागीत गा रहे हैं, कुछ कारोबारी मोटा मुनाफा कमा रहे हैं।&lt;br /&gt;क्रिकेट के अगर लाभ गिनें तो आज भारत इस खेल में महाशक्ति है। आईसीसी उधर ही झुकता है, जहां भारत चाहता है न कि इसका जन्मदाता ब्रिटेन। इसे यह शक्ति बनाया है, इसके नाम के पीछे पैदा किए गए जुनून ने। यह देश में कितने करोड़ का बिजनेस है यह आंकड़े भी इसके लाभ में दिए जा सकते हैं। मगर यह इसके खेल होने की गरिमा के नहीं, इसके तेजी से धंधा बनने की कहानी कहते हैं। &lt;br /&gt;अंत में स्टाइलिश खिलाड़ी लक्ष्मण के बारे में कहना चाहूंगा कि कौन कहता है कि चमत्कार दोहराये नहीं जाते। पहले द्रविड़ के साथ और इस बार रैना के साथ लक्ष्मण ने दिखाया कि चमत्कार करना वह जानते हैं। इस टेस्ट में सचिन ने भी जीवनदान मिलने के बाद लक्ष्मण का अच्छा साथ निभाया। लक्ष्मण की ये दो पारियां मुझे किसी भी खिलाड़ी के शतकों के अंबार पर भारी लगती हैं। इसके बावजूद मैं लक्ष्मण को भगवान नहीं कहना चाहूंगा, वह एक सच्चा खिलाड़ी है। वह विपरीत परिस्थियों में जीत पैदा करता है। उसने अपनी टेस्ट क्रिकेट का उच्चतम स्कोर बांग्लादेश के खिलाफ नहीं बनाया है। &lt;br /&gt;इसलिए कह रहा हूं कि क्रिकेट को खेल ही रहने दें और इसे धर्म न बनाएं। इसे धर्म बनाकर बहुत से ठेकेदार अपनी दुकानें चलाना चाहते हैं। ये दुकानें इस खेल और खिलाड़ी दोनों को तबाह कर सकती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संदर्भ के लिए अवश्य देखें -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://sanjaybhaskar.blogspot.com/2010/08/blog-post_06.html"&gt;http://sanjaybhaskar.blogspot.com/2010/08/blog-post_06.html&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://pramathesh.blogspot.com/2010/08/blog-post_05.html"&gt;http://pramathesh.blogspot.com/2010/08/blog-post_05.html&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बाज़ार के हवाले भूख&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-5697920143877662054?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/5697920143877662054/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=5697920143877662054' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5697920143877662054'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5697920143877662054'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/08/blog-post_09.html' title='क्रिकेट को खेल ही रहने दें, धर्म न बनाएं'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-6251569790893393686</id><published>2010-08-03T01:30:00.000+05:30</published><updated>2010-08-02T01:37:57.160+05:30</updated><title type='text'>पुनश्चः - मान्यताओं का खेल</title><content type='html'>सुधीर राघव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाज के सामने हमेशा से कुछ प्रश्न रहते हैं, जिनके जवाब नहीं मिलते। इनके संबंध में जानने की इच्छा की भरपायी के चलते मान्यताएं पैदा होती हैं, और वे इस कमी को पूरा करती हैं। वक्त के साथ इनमें से कुछ सवालों को खोज भी लिया जाता है मगर समाज का एक बड़ा हिस्सा फिर भी पुरानी मान्यताओं से चिपके रहना चाहता है। इसी का फायदा नेता और बाजार की ताकतें उठाती हैं। मान्यताओं का यह खेल लंबें समय से समाज में खेला जाता है। मान्यताओं के लिए लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। अपनी संतानों तक का वध कर देने में संकोच नहीं करते। समाज में तनाव भी पैदा होते हैं। दुनिया में तालिबान और आतंकवाद के पीछे आप झांके तो सारी लड़ाई किसी न किसी मान्यता पर टिकी नजर आएगी। हरियाणा की खाप पंचायतें भी अपनी मान्यताओं की रक्षा के लिए संघर्ष पर उतारू हैं। इस ब्लॉग पर फरवरी में मान्यतावाद को लेकर लिखना शुरू किया था। इस पर अन्य ब्लॉगर साथियों के साथ काफी तर्क-वितर्क भी चले। उसीका लब्बोलुआब संगठित और संपादित तौर पर यहां रख रहा हूं। इसी ब्लॉग पर ज्यादातर बातें आप पढ़ चुके हैं। इसके अलावा&amp;nbsp;&amp;nbsp;http://tewaronline.com/?author=11&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; पर भी आपने दो लेखों में इन बातों को पढ़ा होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत परेशान करती हैं मान्यताएं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक किस्सा सुना रहा हूं। एक गांव के किनारे की सड़क से पति-पत्नी लड़ते हुए गुजर गए। उन दोनों को लड़ते हुए गांव के ही दो लोगों ने देखा। इनमें एक शादी-शुदा था और दूसरा कुंवारा। शादीशुदा ने कहा-जरूर औरत की गलती होगी। कुंवारा बोला नहीं, आदमी की ही गलती होगी। मेरा बाप भी बिना वजह मेरी मां से लड़ता रहता है। शादीशुदा ने अपने अनुभव के आधार पर तर्क दिए। थोड़ी देर में विवाद बढ़ गया। तर्क की जगह गाली-गलौच ने ले ली। शोर बढ़ता देख गांव के और लोग भी आ गए। अपनी-अपनी वजहों से वे सभी उन दोनों के गुटों में लामबद्ध हो गए। गर्मी बढ़ने पर हाथापाई हुई और लाठियां चलने लगी। आधे से ज्यादा गांव घायल हुआ। आपस में दुश्मनियां बंध गईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब ऊपर किस्सा पढ़ रहे थे तो आप भी गांववालों की मूर्खता पर हंस रहे होंगे। मान्यतावादियों के साथ यही दिक्कत होती हैं। वे हंसी का पात्र बनते हैं। तटस्थ लोगों को वे मूर्ख ही नजर आते हैं। मान्यताओं के आधारा पर जब आप सच झूठ का फैसला करने निकलते हैं और आपके पास तर्क नहीं होते तो आप उग्र हो जाते हैं। मान्यताएं समाज में बहुत खून खराबा कराती आई हैं। धर्म के नाम पर दंगे हों या नक्सलवाद, लोग अपनी मान्यताओं को बचाए रखने के लिए दूसरे की जान ले लेते हैं। वैसे आदमी अपने अनुभवों के आधार पर मान्यताओं से प्रभावित होता है। आम आदमी किसी मान्यता के लोकप्रियता के आधार पर भी उससे प्रभावित होता है। मन्यताओं की उम्र आदमी की उम्र से लंबी जरूर हो सकती है, मगर वह सामाज की उम्र से लंबी नहीं होती। समाज सदियों से बहुत सी मान्यताओं को बदलते हुए खत्म होते हुए देख चुका है। गैलीलियो से पहले पश्चिम में यह माना जाता था कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमता है। मान्यता तोड़ने के लिए जहर पीने के लिए भी बाध्य होना पड़ सकता है, क्योंकि मान्यतावादी मूर्ख ही नहीं भीड़ बनकर खतरनाक भी हो जाते हैं। हरियाणा में खाप पंचायतों के फैसले इसका एक उदाहरण भर हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सदियां गुजर चुकी हैं, बहुत सी मान्यताएं टूटीं मगर समाज में अब भी मान्यतावादियों का ही बाहुल्य है। कुछ मुट्ठीभर लोग हैं जो मान्यताओं से खेलकर फायदा भी उठाते हैं। ऐसे में मीडियाकर्मियों का कम से कम फर्ज बनता है कि वे मान्यतावादी न बनते हुए व्याख्यावादी बनें। वे समस्याओं को मान्यताओं की नजर से नहीं, बल्कि मान्यताओं की सीमाएं बताते हुए वास्तु स्थिति रखें। मान्यतावदियों के झगड़े कभी सुलझाए नहीं जा सकते। दो लोगों के झगड़े पूरे समूह और समुदायों में तबदील हो जाते हैं। इसमें पिसता है आम आदमी। मेहनतकश। जो बंद का आह्वान करता है, उसे सोचना चाहिए कि एक सींग-मूंगफली बेचने वाले के घर उस दिन रोटी कैसे पकेगी। वह तो रोज दिहाड़ी करके गुजारा करता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मान्यतावाद क्या है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में मान्यताएं वे अर्धसत्य हैं, जिनके सत्य को हम बिना जाने ही सत्य मानकर ढोते हैं। असल में मान्यताएं हमें तत्काल फैसला लेने में मदद करती हैं। हम तत्काल फैसला कर लेते हैं कि फलां धर्म, जाति या समुदाय के लोग वैसे होते हैं। मान्यताएं युगों से भी चली आ रही हैं और समय के साथ-साथ अनुभवों से नई बनती और संक्रामक रोग की तरह एक से दूसरे के बीच फैलती हैं और पुरानी धीरे-धीरे बदलती भी रहती हैं। एक व्यक्ति अपने अनुभव का बखान करता है और दूसरा उसे मान लेता है कि ऐसी परिस्थितियों में उसके साथ भी ऐसा हो सकता है। यही मान्यता है। असल में कुछ मान्यताएं ऐसी भी होती हैं, जिनका सत्य हम जानकर भी नहीं जानना चाहते। मान्यताएं चूंकि अर्ध सत्य होती हैं, इसलिए इन्हें विशेषणों से महिमा मंडित किया जाता है। मान्यता में क्रिया तो होती नहीं बस प्रतिक्रिया होती है। अर्ध सत्य सबका साझा नहीं होता, इसलिए समाज के अलग-अलग वर्गों में एक ही विषय पर दो या दस तरह की मान्यताएं देखने को मिलती हैं। सब अपने अर्ध सत्य को स्थापित करना चाहते हैं। इसलिए समाज में संघर्ष होते हैं। विजेता कुछ समय के लिए अपनी मान्यता को स्थापित करते हैं। उसे चुनौती देने वाले आते रहते हैं। इस तरह मान्यतावादी आपस में लड़ते रहते हैं। उनके पास विशेषणों से भरे प्रवचन होते हैं। तर्क नहीं होते। भ्रम होते हैं। इसलिए झगड़े होते हैं। वैसे भी जब आदमी के पास तर्क नहीं रहता तो वह गुंडा हो जाता है। वह लाठी से जवाब देता है। तर्क के लिए बुद्धि चाहिए और मान्यता बुद्धि के श्रम से बचाती है। इसलिए आलसी मस्तिष्क झट इससे चिपक कर अपनी समस्याएं सुलझा लेना चाहता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्याख्यावाद क्या है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह विग्यान है। इसमें स्थिति होती है, क्रिया होती है, प्रतिक्रिया होती है और इति सिद्धम होता है। अपने सत्य बताने के लिए उसे कहना नहीं पड़ता कि यह सत्य है। व्याख्या विशेषण की मोहताज नहीं है। उसका सूत्र है इति सिद्धम। इति सिद्धम आसान नहीं है। इसके लिए बुद्धि को श्रम करना पड़ता है। समाज में मान्यतावादियों का ही बोलबाला है। व्याख्यावादी कहीं नहीं दिखते। यही वजह है कि व्याख्यावादियों के अविष्कारों के उपयोग जब मान्यतावादी अपने तरीके से करते हैं तो और घातक हो जाते हैं। परमाणु ऊर्जा का मंत्र महान आइंस्टाइन की व्याख्या थी, मगर अमेरिकी मान्यतावादियों के हाथ में यह परमाणु बम के रूप में तबाही मचाने वाला साबित हुआ। मान्यताएं समाज में दुश्मन पैदा करती हैं। अगर हमें मित्र बनना है तो व्याख्यावाद की ओर बढ़ना है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मान्यताएं छोड़कर कैसा लगेगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर तालिबान अपनी मान्यताएं त्याग दें, जाति और धर्म से ऊंच-नीच जैसे विशेषण निकाल दें, समाज में आप किसी को छोटा और बड़ा मानकर फैसले न करें। क्षेत्र और नाम अगर हमारे फैसलों में आड़े न आएं तो देखिए समाज के कितने झगड़ खुद ही खत्म हो जाते हैं। समाज में ऐसी दो चार नहीं हजारों मान्यताएं हैं। हरियाणा की खाप पंचायतों की अपनी मान्यताएं हैं। समाज की करीब ८० फीसदी हिंसा हमारी मान्यताओं की वजह से ही होती है, बाकी २० फीसदी रक्तपात की वजह हादसे होते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मान्यताएं कैसे बनती हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मान्यताओं को लेकर लोगों में यह भ्रम है कि मान्यताएं सामूहिक ही होती हैं। मगर ऐसा नहीं होता। वह किसी भी व्यक्ति के जेहन से निकलती हैं और छूत की बीमारी की तरह तेजी से फैलती हैं। हर मान्यता के पीछे व्यक्तिगत अनुभव और भ्रम होते हैं, जब वह व्यक्ति उन्हें प्रचारित करता है तो कुछ और लोग अपने अनुभव और भ्रम से उनसे जु़ड़ते चले जाते हैं, इस तरह मान्यताएं सामूहिक हो जाती हैं। इसे एक उदाहरण से स्पष्ट करना चाहूंगा। आप का कोई काम नहीं हो रहा है। दो महीने से आप काफी परेशान हैं। काम ऐसा है कि कोई मदद करने वाला भी नहीं दिख रहा। आप मदद के लिए रोज किसी न किसी से कहते हैं। पर कुछ नहीं हुआ है। आप जिस रास्ते से गुजरते हैं, उसमें एक कीकर का पेड़ हैं। एक दिन आपके मन में विचार आता है। आप उस पेड़ के पास रुकते हैं। उस पर एक रुपये का सिक्का चढ़ाते हैं और मदद के लिए कहते हैं। कुछ दिन बाद आपका काम हो जाता है। आप खुश हैं और आश्चर्यचकित हैं। यह पेड़ सचमुच मदद करता है, आपकी पहली मान्यता बनती है, जिसके पीछे आपका काम हो जाने का प्रत्यक्ष अनुभव है। आप यह बात अपने मित्रों-दोस्तों को बताते हैं। कुछ ही महीनों बाद आप देखते हैं कि उस कीकर के पेड़ के पास धर्मस्थल बन रहा है, संभव है कि इसके लिए सहयोग करने वालों में आप भी सबसे आगे हों। इस तरह से व्यक्ति की मान्यताएं भी सामूहिक मान्यताएं बनती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झगड़े की जड़ कैसे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर यह तय है कि मान्यताएं हमारे विवेक पर पर्दा डालती हैं और झगड़े भी करती हैं। इसे एक उदाहरण से और अच्छी तरह से समझा जा सकता है। एक बच्चा मां के पास जाता है और अपने घर की ओर इशारा करके पूछता है मां यह किसका घर है। मां कहती है बेटा यह तुम्हारा ही घर है। बेटा कहता है, अच्छा यह मेरा घर है। उसका मन अब इस बात को मान लेना चाहता है कि यह उसका घर है। पर कुछ शक है। वह पिता के पास जाता है और पूछता है पापा क्या यह मेरा घर है। पिता कहता है हां बेटा यह तुम्हारा ही घर है और उसकी मान्यता दृढ़ हो जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उसकी मान्यता है कि यह मेरा घऱ है। अब वह अपने भाई के पास जाता है और कहता है भाई यह मेरा घर है। उधर भाई भी उसी माता-पिता की संतान है और उन्हीं परिस्थितियों के बीच बड़ा हो रहा है, इसलिए उसके पास भी यह मान्यता पहले से है कि यह मेरा घर है। इसलिए भाई खंडन करता है कि नहीं छोटे यह मेरा घर है। छोटा कहता है नहीं मेरा है। दोनों झगड़ा करते हैं। रोते हुए मां-बाप के पास जाते हैं, तब मां-बाप कहते हैं, बच्चो यह हमारा घर है। हम सबका घर है। दोनों बच्चों को पहले तो समझ नहीं आता कि मां-बाप अब झूठ बोल रहे हैं, या पहले झूठ बोल रहे थे, मगर उनकी पहली मान्यता टूटती है। उनका भ्रम टूटता है। यह मान्यता आसानी से इसलिए टूट जाती है क्योंकि जिनकी वजह से यह मान्यता पैदा हुई थी उन्होंने ही इसका खंडन कर दिया। इसलिए बच्चों के पास मानने के अलावा कोई चारा नहीं था। तर्क-कुतर्क की गुंजाइश भी नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाज में मान्यताएं इसलिए आसानी से नहीं टूट पातीं क्योंकि समाज का कोई माई-बाप नहीं होता। इसलिए समाज में मान्यताओं के लेकर झगड़े हजारों साल तक चलते रहते हैं। धर्म को लेकर जुड़ी मान्यताओं में ऐसा हो रहा है। उन्हें जिसने शुरू किया, वह हमारे बीच है नहीं, तब जो खंडन करेगा वह नया झगड़ा ही पैदा करेगा। किसका ईश्वर श्रेष्ठ है, यह फैसला कभी नहीं होने वाला। क्षेत्रीय तौर पर इसका फैसला यह होता है कि जहां जिसके अनुयायी अधिक होते हैं, उसी का ईश्वर भी श्रेष्ठ होता है। जहां संख्या बराबरी की होती है या मुकाबले में ठीक-ठाक होती है तो झगड़े ज्यादा होते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-6251569790893393686?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/6251569790893393686/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=6251569790893393686' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6251569790893393686'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6251569790893393686'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='पुनश्चः - मान्यताओं का खेल'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-1846336970728146832</id><published>2010-08-02T03:56:00.003+05:30</published><updated>2010-08-01T23:25:17.937+05:30</updated><title type='text'>कोल्हू का विरोध- क्या सचिन नया भगवान?</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;मान्यतावादी समाज कोल्हू के बेल की तरह होता है। उसे कितना भी हांकों वह कहीं नहीं पहुंच पाता। ऐसे समाज में वे लोग ताकतवर हो जाते हैं जो मान्यतारूपी अपने कोल्हू गाड़ लेते हैं। जनता खुद आकर इनके चारों और चक्कर काटने लगती है। इस कोल्हू में जनता के श्रम से जो रस निकलता है, उसीसे कोल्हू गाड़ने वाले मालामाल होते हैं। धर्म के नाम पर खुली दुकानें इस देश में कभी घाटे का सौदा साबित नहीं होतीं। &lt;br /&gt;इसलिए आजकल एक नई मान्यता गढ़ी जा रही है कि क्रिकेट धर्म है। जहिर है जो बाजार एक-एक खिलाड़ी पर दो सौ करोड़ का दांव लगा रहा है, वह यह गारंटी भी पैदा करेगा कि यह घाटे का सौदा न बने। बाजार में जुमला उछलते ही चारण-भाट प्रशंसागीत में जुट गए। क्रिकेट धर्म है तो एक भगवान भी चाहिए, इसलिए सचिन को बीच में खींच लिया गया। खैर सचिन ने भी कभी इसका खंडन नहीं किया। &lt;br /&gt;यह आईपीएल के दौरान सामने आ ही चुका है कि पैसा किस तरह क्रिकेट को चलाता है। हमारे यहां, हिन्दू मान्यता में भगवान के बारे में प्रसिद्ध है कि वह प्रेम के मोल बिकते हैं। कहा जाता है - दुर्योधन की मेवा त्यागी, साग विदुर घर खायो।। पर क्रिकेट में ऐसा नहीं है। भगवान यहां अंबानी के टीम में मिलता है। पहले खिलाड़ी खेलते थे अब वे विक रहे हैं। यह उस दौर का क्रिकेट है जब कुछ -पंडों- द्वारा उसे धर्म का दर्जा दिया जा रहा है। हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल है मगर धर्म नहीं हैं। शतरंज में हम लगातार विश्व चैंपियन हैं मगर यह धर्म नहीं हैं। शूटिंग में अभिनव बिंद्रा ओलंपिक में एकमात्र देश के गोल्डमेडल अर्जित करने वाले हैं, मगर वह भगवान नहीं हैं। &lt;br /&gt;अब और देशों की बात करें। आस्ट्रेलिया क्रिकेट की महाशक्ति है और लंबे समय से विश्वचैम्पियन है, मगर वहां यह धर्म नहीं है। इंग्लैंड इसका जनक है, मगर वहां इसकी जगह फुटवाल के दीवाने ज्यादा हैं। उनके लिए खेल सिर्फ खेल है और धर्म नहीं है। हमारे यहां ही इसे धर्म क्यों बनाया जा रहा है। जानते हो ऐसा क्यों? सिर्फ इसलिए क्योंकि कोल्हू वहीं गाड़ा जाता है, जहां बेल हों। अगर कोल्हू को चलाने के लिए बेल ही न हों तो कोल्हू किस काम का। इस देश में पहले ही इतनी मान्यताएं हैं, पहले ही इतने झगड़े हैं। उसमें धर्म के नाम पर एक और कोल्हू नहीं गड़ने देने चाहिए। अच्छा तो यही है कि सचिन खुद खंडन करें। वह कहें कि वह भगवान नहीं है, वे उसी तरह एक अच्छे खिलाड़ी हैं, जैसे और खेलों में भी होते हैं। कोई भी बच्चा अभ्यास से कल एक अच्छा खिलाड़ी बन सकता है। सचिन जैसा या उससे भी अच्छा खिलाड़ी बन सकता है। पर भगवान कह देने का मतलब तो फुलस्टाप है। मतलब अब और कोई बच्चा सचिन नहीं बन सकता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-1846336970728146832?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/1846336970728146832/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=1846336970728146832' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1846336970728146832'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1846336970728146832'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/07/blog-post_30.html' title='कोल्हू का विरोध- क्या सचिन नया भगवान?'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-8030567336895216731</id><published>2010-07-25T00:56:00.002+05:30</published><updated>2010-07-25T00:56:19.954+05:30</updated><title type='text'>विचार में खून की मिलावट</title><content type='html'>क्या विचार भी खून मांगते हैं? या यह सिर्फ एक भ्रम है कि विचारों में खून मिला देने से वे अधिक ताकतवर हो जाएंगे। जैसे माओ के चेले मार्क्सवाद में खून मिलाकर सोच रहे हैं कि यह ताकतवर हो रहा है। उन्हें लगता है कि बुर्जुआ ताकतें इतनी आगे निकल रही हैं तो अव वर्ग संघर्ष हो ही जाना चाहिए। नहीं हो रहा है तो हम करेंगे। बम चलाएंगे, गोली दागेंगे और पटरियां उखाड़ कर ट्रेन गिराएंगे। इस तरह हम विचारधारा में खून मिलाएंगे। देश का पूरा मिडल क्लास बुर्जुआ हो चला है। पूंजीपति गांव तक पहुंच रहा है। गांव से भी गरीब भगा दिए जाएंगे। इससे पहले कि सभी गरीब खत्म कर दिए जाएं, वर्ग संघर्ष हो जाना चाहिए। नहीं तो हम चीन को क्या जवाब देंगे? क्या मुंह दिखाएंगे?  &lt;br /&gt;दूसरी ओर पूंजीपति भी अपनी विचारधारा में रक्त मिलाता है। मगर उसका तरीका दूसरा है। उसे रक्त मिलाने के लिए किसी बंदूक या हथियार की जरूरत नहीं है। वह सिर्फ मीडिया से कहता है कि सचिन की बायोग्राफी के पन्नों को सचिन के रक्त मिलाकर बनी लुगदी से तैयार किया जाएगा (भले सचिन इसक खंडन करें) ...और किताब की कीमत ५०० से बढ़कर पिचहतर सौ डालर हो जाती है। क्रिकेट प्रेमी सचिन को भगवान मानते हैं, पूंजीपति इस मान्यता को समझता है और इसका मोल भी जानता है। इसलिए किताब जो सिर्फ विचार का प्रतीक है, वह उसमें भी खून मिलाने की बात करता है। कमजोर का खून चूसने के आरोप तो बुर्जुआ वर्ग पर पहले से ही हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब गरीब क्या करता है? वह इन सब विचारधाराओं के लिए रक्त की आपूर्ति करता है। भले ही उसमें होमोग्लोबिन १० ग्राम से कम हो। वह माओवादियों और पुलिस के बीच क्रास फायरिंग में मारा जाता है, या उस बारूदी सुरंग पर उसका भी पेर पड़ता है या वह उस ट्रेन में सवार होता है, जिसकी पटरियां उखाड़ दी गई थीं या वह वर्दी पहने उनसे जूझ रहा होता है और अपने पीछे विधवा पत्नी और कुआंरी बहन छोड़ जाता है। वह किसी मिल में मजदूरी या किसी जमींदार की बेगार करते खून सुखाता है। इस तरह गरीब का खून माओवाद से लेकर पूंजीवाद तक सबकी विचारधारा के काम आता है। गरीब का खून गरीब के काम तब आता है, जब बच्चे की दवाई खरीदने के लिए पैसे नहीं होते और वह अपना खून बेचकर दवा लेकर आता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा अनुरोध बस इतना है कि जिन्हें अपनी विचारधारा में मिलाने के लिए खून चाहिए वे गरीब के खून के प्यासे न बनें। बहुत से समाज सेवक ब्लड डोनेशन कैम्प चलाते हैं, मीडिया में फोटो खिंचवाते हैं। उनसे सहयोग मांग लें। किसी गरीब का घर न उजाड़ें। इन्सान होने के नाते कुछ तो रहम सीखें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-8030567336895216731?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/8030567336895216731/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=8030567336895216731' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/8030567336895216731'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/8030567336895216731'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/07/blog-post_24.html' title='विचार में खून की मिलावट'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-2174949756660705460</id><published>2010-07-23T01:15:00.000+05:30</published><updated>2010-07-23T01:15:04.364+05:30</updated><title type='text'>मुर्गी और अंडे पर डॉक्टर श्याम गुप्ता धर्मशास्त्र से ढूंढ लाए अच्छे तर्क</title><content type='html'>मेरी पिछली पोस्ट, जरा मान्यता से हटकर सोचें-पहले मुर्गी आई या अंडा पर डॉ. श्याम गुप्ता जी ने ऋग्वेद और यजुर्वेद के हवाले से कुछ अच्छे तर्क रखे हैं। वह लिखते हैं- सही कथन है , पहले मुर्गी ही आई.&lt;br /&gt;---वैदिक विग्यान के अनुसार ( रिग्वेद, यजुर्वेद..)सर्व प्रथम ब्रह्मा ने.....-- मानस श्रिष्टि की---इच्छा से उत्पन्न--सनक, सनंन्दन, सनातन, सनत्कुमार--फ़िर नारद व सप्तर्षि--यह सब अमैथुनी एकलिन्गी श्रिष्टि थी।&lt;br /&gt;---पुनः अपने शरीर से मनु व शतरूपा को उत्पन्न किया...यह अपने अंग, कोशिका, स्टेमसेल या डी एन ए--से निर्मित श्रिष्टि थी, एकलिन्गी ही थे&lt;br /&gt;---अन्ततः ओटोमेटिक प्रज़नन प्रणाली(क्रमिक स्वकीय सेक्सुअल रेप्रोडक्सन--अन्डा+ निषेचन प्रणाली)हेतु दक्ष की कन्याएं( स्त्री या मुर्गी...)की उत्पत्ति होकर विभिन्न रिषियों के संसर्ग से आगे संतति(अन्डा से..) चली।&lt;br /&gt;----अतः पहले मुर्गी ही आई, अन्डा बाद में । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जवाब- वेदों में वर्णन काफी गूढ़ शैली में है और उसे समझने के लिए भी साइंस की अच्छी खासी जानकारी भी कम पड़ने लगती है। इसलिए अपनी वर्तमान जानकारी के संदर्भ में ही हम उसकी व्याख्या समझ पाते हैं। सृष्टि की उत्पत्ति कुछ इस प्रकार हमारे प्राचीन ग्रंथों में बताई जाती है- &lt;br /&gt;निष्प्रभेऽस्मिन् निरालोके सर्वतस्तमसावृते । &lt;br /&gt;बृहदण्डमभूदेकं प्रज्ञानां बीजमव्ययम् ॥ &lt;br /&gt;(महाभारत आदिपर्व १।२९) &lt;br /&gt;अर्थात-सृष्टि के प्रारम्भ में जब वस्तु विशेष और नाम, रूप आदि का भान नहीं होता था, प्रकाश का कहीं नाम नहीं था, सर्वत्र अन्धकार ही अन्धकार छा रहा था, उस समय एक बहुत बड़ा अण्ड प्रकट हुआ अर्थात् अण्ड के समान गोल आकृति वाली पृथ्वी उत्पन्न हुई, जो सम्पूर्ण प्रजाओं का अविनाशी बीज था अर्थात् सब प्रकार की सृष्टि के उसमें बीज विद्यमान थे । &lt;br /&gt;सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रज्ञाः । &lt;br /&gt;अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ॥८॥ &lt;br /&gt;तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् । &lt;br /&gt;तस्मिन् जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥९॥ &lt;br /&gt;अर्थात-उस परमात्मा ने अपने शरीर (प्रकृति) से नाना प्रकार की प्रजा (सृष्टि) रचने की कामना करते हुये आरम्भ में अप (कारण मूल जल) की उत्पत्ति की और उसमें बीज (शक्तिरूप) आरोपित किया । वह (बीज) सहस्रों आदित्यों की प्रभा वाला सुवर्ण के समान अण्डरूप हो गया । उसमें सब लोकों का पितामह (उत्पादक) ब्रह्मा (परमात्मा) उत्पन्न हुआ, अर्थात् परमात्मा ने उसमें अपनी शक्ति प्रकट की । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विराजमसृजद् ब्रह्मा सोऽभवत् पुरुषो विराट् । &lt;br /&gt;स सम्राट् सा सरूपात्तु वैराजस्तु मनुः स्मृतः ॥१४॥ &lt;br /&gt;स वैराजः प्रजासर्गः स सर्गे पुरुषो मनुः । &lt;br /&gt;वैराजात् पुरुषाद् वीराच्छतरूपा व्यजायत ॥१५॥ &lt;br /&gt;अर्थात् ब्रह्मा ने विराट् को उत्पन्न किया, उस विराट् से मनु की उत्पत्ति हुई और वही मनु प्रजाओं की सृष्टि करने वाला हुआ, उसी मनु से ही नानाविध प्रजायें उत्पन्न हुईं । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां तक अमैथुनी सृष्टि का सवाल है तो उसे लेकर काफी रोचक व्याख्या है। पौराणिक क्षेत्र में, ऐसी सृष्टि जो स्त्री और पुरुष के लैंगिक संबंध से नहीं; बल्कि किसी अप्राकृतिक रूप से हुई हो। जैसे–घड़े से अगस्त्य मुनि की अथवा वैवस्वत मनु की छींक से इक्ष्वाकु की उत्पत्ति को अमैथुनी सृष्टि कहा गया है। आज के संदर्भ में कहें तो परखनली शिशु। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सृष्टि निर्माण के संबंध में हो सकता है कि भविष्य में कभी यह खुलासा भी हो कि यह किसी और गृह के लोगों ने बसाई। वह नष्ट होता हुआ कोई गृह भी हो सकता है। अभी सृष्टि निर्माण को लेकर साइंस के पास जो धारणा है वही सबसे मान्य है और वह है क्रमविकास। यह मान्य इसलिए क्योंकि इसमें तर्क एक दूसरे को सुलझाते जाते हैं और कहीं भी पहली अटकती नहीं। अन्य मतों में बहुत से सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी पोस्ट पर डॉक्टर श्याम गुप्ता जी का एक और सवाल था-मछलियों जैसे जीवों में अन्डा जेलीय पदार्थ का होता है इसी प्रकार स्त्री में भी अन्डा( ओवम) केल्सियम खोल से ढका नहीं होता,अपितु जेलीय जैसी झिल्ली से, तो प्रश्न उठता है कि मानव, विकास क्रम में पक्षियों से पहले है या बाद में?? &lt;br /&gt;इसका जवाब भी स्पष्ट है-जिन कछुए जैसे जीवों ने सतह पर अंडे देने शुरू किए उनके लिए जरूरी था कि अंडों पर केल्शियम कवच हो, नहीं तो वे मिट्टी में ही घुल जाते। इस इच्छा ने उनके जीन में विस्तार किया और अंडे देने वाले जीव बन गए। इसके बाद सतह पर भी जिनके अंडे सुरक्षित नहीं रह पा रहे थे, उनके जीन तक यह संदेश गया कि अगर अंडे को अंदर तब तक रखें जब तक वे बच्चे की तरह विकसित न हो जाएं तो उनकी संतानों की सुरक्षा की गारंटी बढ़ जाएगी। इस तरह उनके जेलीय अंडे गर्भ में ही भ्रूण के रूप में विकसित हुए और अंदर केल्शियम कवच की जरूरत नहीं थी। क्रमविकास के लिहाज से यह तय है कि पहले जेलीय अंडों वाले जीव पानी पर आए, फिर स्थल पर कवच वाले अंडे देने वाले जीव आए और उसके बाद बच्चों को जन्म देने वाले जीव आए होंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-2174949756660705460?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/2174949756660705460/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=2174949756660705460' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2174949756660705460'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2174949756660705460'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/07/blog-post_22.html' title='मुर्गी और अंडे पर डॉक्टर श्याम गुप्ता धर्मशास्त्र से ढूंढ लाए अच्छे तर्क'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-2779083348115342575</id><published>2010-07-19T13:46:00.001+05:30</published><updated>2010-07-19T17:13:59.950+05:30</updated><title type='text'>जरा मान्यता से हटकर सोचें -पहले मुर्गी आई या अंडा</title><content type='html'>यह सवाल सदियों से पीछा कर रहा है। डार्विन के क्रमविकास में इसका जवाब बहुत पहले ही मिल चुका है। मगर आइंस्टाइन का सापेक्षवाद हमारी बुद्धि की सबसे अच्छी व्याख्या है। हम अतीत के सवालों के जवाब भी वर्तमान परिस्थितियों के सापेक्ष तलाशते हैं। हम देखते आ रहे हैं कि अंडे से चूजा निकलता है, चूजे से मुर्गी बनती है और मुर्गी फिर अंडा देती है। इस तरह बिना किसी बड़े परिवर्तन के सदियों से यह चक्र चल रहा है। इस तरह यह हमारी ठोस मान्यता बन गई है। अगर हम इससे दाएं-बायें सोचते हैं तो विश्वास नहीं कर पाते। साइंसदानों ने अब जब कहा कि पहले मुर्गी ही आई होगी तो हम हक्के-बक्के हैं। &lt;br /&gt;अब हम क्रमविकास के माध्यम से इसे देखते हैं। सृष्टि में जीवन के शुरुआत का सबसे मान्य तथ्य यह है कि अमीनो एसिड से दो तरह की प्रणालियां बनीं, पहली- जो वायुमंडल से कार्बन डायऑक्साइड लेकर ऑक्सीजन छोड़ती थी और दूसरी वे जो ऑक्सीजन ग्रहण कर कार्बनडायक्साइड छोड़ती थीं। इन्होंने स्वयं का विस्तार करते हुए दो तरह की कोशिकाएं बनाईं एक जैव और दूसरी पादप। पहले ये एक कोशकिए थीं जिन्होंने आगे विस्तार कर जटिल कोशकिए जीव बनाए। इनसे सागरों में जेलीय अंडे बने और मछली जैसे जटिल जीव बने। सागरों में जब मछलियों की संख्या बहुत ज्यादा हुई तो इनमें से कुछ ने बचने के लिए किनारों का रुख किया। जान बचाने के इसी क्रम में कच्छप या कछुए जैसे जीव आए होंगे। &lt;br /&gt;इस तरह पहले कछुए वे थे जो मछलियों की जरह ही जैलीनुमा अंडों से निकले थे। कई पीढ़ियों तक मैदानों में रहने के बाद इन्हें खुद को बचाने के लिए जरूरी था कि वे जमीन पर अंडे दें। यह संदेश जब इनके जीन तक पहुंचा तो जीन में परिवर्तन हुआ और केल्सियम के शेल वाले अंडे देने वाले कछुए अस्तीत्व में आए। इन्ही में आगे क्रम विकास से धरातल के और जीव बने होंगे। इसी तरह किसी अंडे से निकला कोई कछुआ मुर्गी जैसे जीव में विकसित हुआ होगा। &lt;br /&gt;इसलिए जवाब यह है कि यह निश्चित है कि पहली मुर्गी भी किसी अंडे से ही जन्मी थी मगर उस अंडे को किसी मुर्गी ने नहीं बल्कि क्रम विकास में उसके सबसे नजदीकी रिश्तेदार ने दिया होगा। इस तरह साइंसदानों की यह बात भी अपनी जगह सही हो जाती है कि अंडे का केल्शियम शैल धरती पर कहीं नहीं बन सकता, उस प्रोटीन को बनाने वाले उत्तक सिर्फ पंछियों की ओवरी में ही होते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-2779083348115342575?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/2779083348115342575/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=2779083348115342575' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2779083348115342575'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/2779083348115342575'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/07/blog-post_19.html' title='जरा मान्यता से हटकर सोचें -पहले मुर्गी आई या अंडा'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-5260462838775134543</id><published>2010-07-17T12:50:00.004+05:30</published><updated>2010-07-18T11:37:53.201+05:30</updated><title type='text'>प्रेम खुशफहमी से शुरू होता है और गलतफहमी पर खत्म</title><content type='html'>प्रिय मनोज, खाप पंचायतों के संदर्भ में तुम्हारी लंबी टिप्पणी मुझे जीमेल और आर्कुट पर तीन हिस्सों में मिली, उसे पिछली पोस्ट में तुम हू-ब-हू देख सकते हो। तुमने अपनी बात बड़ी बेबाकी से कही और यह बेबाकी चीजों और समस्याओं को समझने में मदद करती है। &lt;br /&gt;असल में मान्यताओं से मुक्ति नहीं मान्यताएं ही तनाव देती हैं। इसका लेफ्ट या राइट से कोई संबंध नहीं, जहां तक लड़कियों के जीवन बर्बाद करने वाली बात तुमने लेफ्ट वालों के बारे में बताई है उसका भी लेफ्ट और राइट से कोई संबंध नहीं है। दक्षिणपंथी बाबाओँ पर भी यौन उत्पीड़न की आरोप लगते रहते हैं और काफी कुछ सामने आता रहता है। असल में ये चीजें व्यक्तिगत चरित्र पर निर्भर करती हैं। किसी विचारधारा का इससे ज्यादा लेनादेना नहीं होता। एक लेफ्टवाला भी मान्यतावादी हो सकता है, जब वह मानकर चले कि उसे लेफ्ट ही चलना है, जबकि सारे तर्क राइट या मिडल के पक्ष में हो। हमारी सारी बहस अधिक तार्किक होने को लेकर है। हम राइट की मान्यता को लेफ्ट से काटें और लेफ्ट की राइट से, हमारा मकसद यह भी नहीं है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि मान्यता किसी खोज के लिए शुरुआती चरण तो हो सकती है मगर मंजिल मिल जाने के बाद भी उसी मान्यता से चिपके रहो तो यही मान्यतावाद है। यही समाज में तनाव पैदा करता है। जैसे कि माना मूलधन सौ की मान्यता लेकर हम असली मूलधन की गणना कर लेते हैं और बाद में असली मूलधन को ले लेते हैं और मान्यता को छोड़ देते हैं। &lt;br /&gt;अब जिस लड़की का उदाहरण आपने दिया है उसके संदर्भ में ही, लड़की किसी से प्रेम करती थी, उसे उसके साथ जाना है। दूसरी ओर लड़की को यह भी पता है कि मुझे तो एक न एक दिन मां-बाप के घर से जाना ही है। अगर में इस लड़के के साथ नहीं जाउंगी, जो मुझे अच्छा लगता है और जिसपर मेरा विश्वास है तो मुझे किसी अन्जान के साथ जाना होगा। उसे घर से जाना ही है, इसलिए उसके लिए प्रेम विवाह का रास्ता दुविधा जरूर पैदा करता है मगर अंतर्मन से बाधा खड़ी नहीं करता और वह पिता का घर अपनी मर्जी से छोड़ने का फैसला भी कर लेती है। दूसरी ओर पिता की यह मान्यता है कि अगर लड़की फैसला करती है तो उसकी नाक कटती है। वह इसका विरोध करता है। वह इस पर विचार करने के लिए एक बारी भी राजी नहीं होता कि क्या लड़की इससे खुश रहेगी। बच्चे कानून का सहारा लेकर शादी कर लेते हैं। उसके बाद वास्तविकताएं सामने आती है। दूसरी तरह के तनाव सामने आते हैं। अब लड़की अपने मां-बाप को त्याग कर आई होती है। लड़के को पता है कि अब उसके सिवा इसका कोई दूसरा ठिकाना नहीं है। लड़की की स्थित कमजोर हो जाती है। लड़का अपनी खीज भी उसपर निकालने लगता है। लड़की मां-बाप से मदद भी नहीं मांग सकती। दूसरी ओर लड़के के मां-बाप पूरी तरह से लड़के के पक्ष  में होते हैं और वे तो चाहते ही हैं कि लड़का इस लड़की को छोड़ दे। तनाव और बढ़ाया जाता है। इस वजह से प्रेम विवाह अक्सर असफल हो जाते हैं। इसकी ज्यदातार वजह यह है कि लड़की का बाप, जिसे हर स्थिति में बेटी को संरक्षण देना चाहिए, वह रिश्ते खत्म कर अपनी ही बेटी को समाज में कमजोर और असहाय छोड़ देता है, सिर्फ उसके उस फैसले की सजा के रूप में जिसमें उसे खुश रहना था। &lt;br /&gt;ऐसे ही केस में अगर पिता लड़की की बात मान कर खुशी-खुशी शादी कर देता तो, लड़की में आत्मविश्वास रहता। तनाव के क्षणों में वह मायके से मदद भी ले सकती थी या लड़के पर भी यह डर रहता कि इसकी भी मदद करने वाले हैं। वह भी मनमाने फैसले नहीं कर सकता। एक और बात मैं कहना चाहूंगा कि प्रेम खुशफहमी से शुरू होता है और गलतफहमी से खत्म। प्रेमियों में कोई किसी का बुरा नहीं करना चाहता, मगर रोज के तनाव  या आसपास के लोग उनमें कई बार गलतफहमियां पैदा कर देते हैं। गलतफहमियों से बचाने के लिए आसपास कुछ अच्छे लोग या परिवार के शुभचिंतक होने ही चाहिए। इसलिए पिता का यह फर्ज है कि वह अपनी बालिग लड़की के हर फैसले में उसका साथ थे, कम से कम उसके व्यक्तिगत फैसलों के लिए अपनी मान्यताओं को बीच में लाकर उसे कमजोर न करे। इससे वह बेटी का सबसे ब़ड़ा अहित करता है। अपने बच्चों की सुरक्षा पिता की जिम्मेदारी है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;(मान्यतावाद पर आलेख इस साइट पर भी है, देखें-&lt;br /&gt;http://www.tewaronline.com/bolgari.html&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-5260462838775134543?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/5260462838775134543/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=5260462838775134543' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5260462838775134543'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5260462838775134543'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/07/blog-post_17.html' title='प्रेम खुशफहमी से शुरू होता है और गलतफहमी पर खत्म'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-4364089288976264336</id><published>2010-07-15T11:30:00.001+05:30</published><updated>2010-07-17T00:36:08.671+05:30</updated><title type='text'>मान्यतवाद पर मनोज की बेबाकी</title><content type='html'>मान्यता से चिपकना ही मान्यतावाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर, मान्यतावाद पर अपने तर्क में आपका जवाब शानदार है। इसके लिए बधाई। &lt;br /&gt;बधाई इसके लिए भी कि मैं भी कुछ सोचने लगा हूं। अभी तक लंपटगिरी ही कर रहा था। सर मान्यताएं तोडऩे का काम मैं करीब पांच साल से लगातार कर रहा हूं। था ही बोलो ज्यादा ठीक रहेगा। क्योंकि तोड़ नहीं पाया।  जैसे ही आप समाज में कुछ अलग करना चाहते हैं अकेले पड़ जाते हैं। कोई आपको अधर्मी कहना शुरू कर देगा, कोई पापी। बुद्धिजीवी आपको नया तमगा दें देंगे कामरेड, या नक्सली। यकीन मानना सर मान्ताएं तोडऩे का सफर कुरुक्षेत्र से शुरू किया। क्षमा मांगते हुए लिख रहा हूं, उस पवित्र नगरी को अपवित्र करने का जो भी उपक्रम मै कर सकता था किया। अपने अनुभव पर लिख रहा हूं, हालांकि तजुर्बा अधिक नहीं है। बदले में सर तनाव ही मिला। यह तनाव किसी बाहरी व्यक्ति ने नहीं दिया। अंदर से तनाव मिला। मुझे लगता है कि यह कुछ कुछ ऐसा ही रहा होगा,जैसे आप दीवार पर जितनी जोर से गेंद मारते हो,वह वापिस उतनी ही तेजी से आपकी ओर आएगी। &lt;br /&gt;दूसरी बात, हम खाप पंचायात और प्रेम विवाह की करते हैं। सर मैं सौ फिसदी प्रेम विवाह के पक्ष में हूूं। मैं चाहता हूं कि जाति की दीवार टूट जाए। लेकिन सवाल फिर बड़ा है, क्यां , यह संभव है।  यह बात अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूं, सर अनुसूचित जाति का लड़का भी दूसरी जाति की लड़की के साथ शादी करने पर संतुष्ट नहीं होता। ऐसे जोड़े एक दो नहीं मैं कईयों को जानता हूं। जहां तलाक सिर्फ इसी बिनाह पर हो गया कि अनुसूचित जाति का लड़का अपने अंदर की हीन भावना को  तोड़ ही नहीं पाया। वह इससे उभर ही नहीं पाया। और इसका परिणाम यह निकला कि वह पुरुष वेश्य की तरह व्यवहार करने लगा। बाद में उस इंटरकास्ट लड़की यानी अपनी पत्नी से तलाक लेकर अपनी ही जाति की दूसरी लड़की से शादी की। और वह कोई आम लड़का नहीं था। हरियाणा में लेफ्ट का बड़ा विचारक था। कितनी ही लड़कियां इस कथित लेफ्ट की वजह से बर्बाद हो गई है।&lt;br /&gt;सर यदि आप का मान्यताएं तोडऩे की बात करते हैं, मान्यताओं को तोडऩे का मतलब सर पड़ोस की लड़की के साथ इंटरकोर्स करना है तो यह तो संभव नहीं। मान्यता तोडऩे का मतलब यदि पड़ोस की या गांव की लड़की से प्रेम कर उसे भगा ले जाकर उसका  कैरियत तबाह करना है तो मैं इसे सिरे से खारिज करता हूं। कथित मार्डनाइजेशन के नाम पर जिस तरह से प्रेम को बदनाम किया जा रहा है,सर वह वक्त दूर नहीं जब यह कहा जाएगा कि प्रेम पाकीज नहीं प्रेम तो पाप है। क्योंकि उसकी वजह हम ही होंगे। प्रेम के नाम पर बहुत से लंपट लड़कियों को झांसा देकर उन्हें कहां कहां नहीं छोड़ते। सर माफ करना मैं फिल्ड का आदमी हूं, और आप कैबिन के। सर मान्यता है तो समाज है। मुझे तो लगता है कि मान्यताओंं ने ही समाज की सरंचना की होगी। अन्यथा पूर्व पाषाण युग का इंसान कहां किसी चीज को मानता था। उसकी कोई मान्यता ही नहीं थी। एक ही सिस्टम चलता था, जो ताकतवर है वहीं सही है। फिर क्यों वहीं मानव समाज की ओर आया। इतिहास भी इस बात का गवाह है, मान्ताएं जरूरी है। सर यदि ऐसा नहीं है तो हम अपने बच्चों को क्या यह नहीं कहेंगे झूठ बोलना पाप है। भ्रष्टाचार करना पाप है। दूसरो को तंग करना पाप है। निर्बल की सेवा करनी चाहिए। या हम अपने बच्चों को कहेेंगे ऐसा कुछ नहीं है। बस वह करों जो उन्हें अच्छा लगे। क्या हम अपने बच्चों को ऐसा कह सकते हैं। बताओ सर ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;लड़की का विस्थापन &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;एक दोस्त के भतीजे से अपने साथ पढऩे वाली लड़की से मंदिर में शादी कर ली। लड़की के परिजनों को पता चला तो लड़की पर दबाव बनाया कि लड़के के खिलाफ बयान दें। इधर लड़के ने कहा कि उसकी पत्नी खतरे में है। लिहाजा इस परिवार के साथ मैं भी क्षेत्र के पुलिस स्टेशन चला गया। रात करीब एक बजे तक पुलिस के आला अधिकारियों के फोन करने के बाद पुलिस हरकत में आई। लड़की के चाचा को बुलाया गया। उन्होंने आश्वासन दिया कि लड़की को कुछ नहीं होगा। सुबह मामला पंचायत मेें रखेंगे। तब तक लड़के के परिजनों ने तमाम तरह के झूठ बोले। मसलन लड़की लड़के के साथ 15 दिन रही। और, मैं मुक खड़ा देखता रहा। खैर,अगले दिन काफी कोशिश के बाद&amp;nbsp; लड़की आ गई। वह अपने बयान पर कायम थी। लड़के के साथ जाना। सो चली गई। लेकिन लड़की के चेहरे पर प्यार को पाने की खुशी नहीं थी। वह अपने पापा को फेश नहीं कर पा रही थी। कमोबेश उनके पापा के हालात भी वैसे ही थे। क्या यह विस्थापन है, या फिर प्यार की जीत। लड़की के पिता की हालत उस मछली की तरह जिसे पानी से निकाल लिया गया हो। वह तडफ़ रहा था। रो रहा था। बेबस था। लड़की भी खुश नहीं थी। उसे दुख था , परिजनों....&lt;br /&gt;कमोबेश उनके पापा के हालात भी वैसे ही थे। क्या यह विस्थापन है, या फिर प्यार की जीत। लड़की के पिता की हालत उस मछली की तरह जिसे पानी से निकाल लिया गया हो। वह तडफ़ रहा था। रो रहा था। बेबस था। लड़की भी खुश नहीं थी। उसे दुख था , परिजनों को इस तरह से छोडऩे का। &lt;br&gt;वह जवाब भी मांग रही थी। अपने पति से। क्या उसे अपने प्यार पर यकीन नही था। था तो &lt;br&gt;आखिर उसके पुलिस को झूठ क्यों बोला। वह जवाब मांग रही थी। पत्नी होने का हक चाह रही थी। अफसोस उसे उसका हक नहीं दिया गया। पहला हक ही मार लिया गया। न&amp;nbsp; पति जवाब दे पाया, न परिजन। खैर मैँ तो क्या बोलता। बस सोच रहा था, क्या यह प्यार है,या क्षणिक देहिक सुख की चाहत। प्यार के लिए घर से उड़ान भरने वाली वह लड़की क्या सचमुच वह पाएगी जिसकी वह चाहत रखे हुए यह उड़ान भर रही है। पता नहीं..... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;((मनोज के विचार खाप पंचायतों को लेकर मेरी पोस्ट के संदर्भ में हैं, जो जीमेल से भेजे गए हैं)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-4364089288976264336?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/4364089288976264336/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=4364089288976264336' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/4364089288976264336'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/4364089288976264336'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/07/blog-post_15.html' title='मान्यतवाद पर मनोज की बेबाकी'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-9190027465671941134</id><published>2010-07-15T01:56:00.000+05:30</published><updated>2010-07-15T01:56:18.357+05:30</updated><title type='text'>भविष्यवाणी के झूठ निकलने से ज्यादा खतरनाक है उसका सच हो जाना</title><content type='html'>http://baithak.hindyugm.com/2010/07/blog-post_13.html पर ज्योतिष को लेकर एक रोचक बहस चली रही है। इसकी शुरूआत डाक्टर अरुणा कपूर की पोस्ट ज्योतिषियों पर व्यंग्य के जवाब में संगीता पुरी जी का लेख -विज्ञान की एक सीमा है, प्रकृति असीमित है... दिया गया है। इसे विस्तार से ऊपर के लिंक पर देखा जा सकता है। ज्योतिष के पक्ष में उन्होंने काफी तर्क दिए हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस संबंध में कई बातें ऐसी हैं, जिनसे सहमत होने के लिए तर्क पर्याप्त नहीं हैं। पहला तो यह कि विज्ञान भी सीमित नहीं है। वह असीमित है और लगातार विकास कर रहा है। उसका विकास कहां जाकर रुकेगा यह सीमा कोई नहीं बता सकता। दूसरा जहां तक ज्योतिष शास्त्र के विज्ञान होने की बात है, इसमें काल गणना, ग्रह गणना, ग्रह स्थित, गोचर, यह सब विज्ञान है। इसका वह हिस्सा जिसके तहत भविष्यवाणियां की जाती हैं, वह संदिग्ध है। वह प्रमाणित नहीं है। इसके बावजूद ज्योतिष के नाम पर सबसे ज्यादा दुकानदारी समाज में इसी हिस्से के सहारे चल रही है। यही वजह है कि जब भविष्यवाणियां सही निकलती हैं तो वे समाज के लिए ज्यादा खतरनाक होती हैं, क्योंकि वे खूब प्रचार पाती हैं और समाज में भ्रम और अंधविश्वास को बढ़ाती हैं। जहां तक झूठी निकलने वाली भविष्यवाणियां हैं तो उनका प्रचार नहीं हो पाता और इसलिए वे समाज का भ्रम आज तक नहीं तोड़ पायी हैं। भले ही झूठी निकलने वाली भविष्यवाणियों की संख्या ज्यादा हो। मीडिया को चाहिए की वे ऐसी भविष्यवाणियों का ज्यादा प्रचार करे जो झूठी निकलती हैं। &lt;br /&gt;भविष्यवाणियां क्या हैं और वे सच भी क्यों हो जाती हैं, इसका जवाब हमें प्रोबेबिलिटी में मिलता है। क्या होना है यह पूरी तरह कोई नहीं जानता। सहजभाव से अंदाजा हर आदमी लगाता है। जब कभी यह अंदाजा सही निकलता है तो वह खुद अचम्भित होता है। यह ठेठ तुक्का है। यह एक जानकार ज्योतिषि का भी उतना ही सही या गलत हो सकता है, जितना कि परिस्थितियों से अनजान ऑक्टोपस का। किसी की भी बात सही हो सकती है और गलत भी। क्योंकि हर काम के कई विकल्प होते हैं और उनमें से एक बार में कोई एक ही होता है, जैसे एक बार में ऊंट एक ही करवट बैठेगा। इसलिए आदमी का सहज मन अंदाजा लगाता है और जब उसे लगता है कि उसके अंदाजे सही होने लगे तो वह खुद को ज्योतिषि कहना शुरू कर देता है। &lt;br /&gt;पिछले साल एक ज्योतिषि एक टीवी चैनल पर दिखाया गया था, जिसने अपनी मौत का वक्त घोषित किया था। उसके सभी पूर्वानुमान (भविष्यवाणियां) सही निकले थे इसलिए उसने प्रबल मार्केश योग के आधार पर अपनी मृत्यु का समय भी घोषित कर दिया। चैनलवालों को और क्या चाहिए, सीधा प्रसारण शुरू कर दिया गया। नब्ज नापने के लिए डॉक्टर लगा दिया गया। धीरे-धीर समय निकल गया और मौत नहीं आई। उस ज्योतिषि को दुख हुआ होगा मगर देखते वक्त मुझे भी दुख हुआ कि देखो एक भविष्यवाणी गलत होते ही सारी प्रतिष्ठा खत्म हो गई। इस बुजुर्ग आदमी ने पिछले तीस-चालीस साल में सही भविष्यवाणियां की उसने जो आत्मविश्वास दिया उसीने उसे इतना बड़ा कदम उठाने का हौसला दिया होगा। &lt;br /&gt;इस तरह ज्योतिष शास्त्र का दुरुपयोग अंधविश्वास फैला कर भी किया जा रहा है। इसमें लोगों का आर्थिक शोषण भी किया जाता है। जहां तक पूत के पांव पालने में देखने की बात है तो वह आपमें पूर्वाग्रह पैदा कर सकता है। इसलिए पालने में देखने की वजाय पूत के पांव परिवरिश कर संवारने चाहिए। जो होना है सो होना है। इसलिए समाज को भाग्यवादी बनाकर निठल्ला नहीं बनाया जा सकता। हमें यह तह करना है कि हमें कुछ करना है। जो होना है वह हमारी चिंता नहीं है। इसलिए ज्योतिष का भविष्यवाणी वाला हिस्सा हमारे लिए जरूरी नहीं है। यह एक रोचक खेल भर हो सकता है। एक खेल जिसमें गणित के कुछ सूत्र लगाए जा सकते हैं। आप अंदाजा लगाइए सच हो जाए तो मुस्कराइये अगर सच न भी हो तो भी मुस्कराइये। &lt;br /&gt;भविष्यवाणियों के समर्थक एक और तर्क देते हैं कि यह दैवीय विद्या है। तो उन्हें यह जान लेना चाहिए कि कोई भी विद्या दैवीय या राक्षसी नहीं होती। विद्या तो विद्या होती है, विज्ञान होती है, उसका इस्तेमाल करने वाले देवता या राक्षस हो सकते हैं। इसलिए सुधार की जरूरत विद्या में नहीं उसका इस्तेमाल करने वालों में है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-9190027465671941134?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/9190027465671941134/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=9190027465671941134' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/9190027465671941134'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/9190027465671941134'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/07/blog-post_14.html' title='भविष्यवाणी के झूठ निकलने से ज्यादा खतरनाक है उसका सच हो जाना'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-7690068363462639931</id><published>2010-07-13T12:07:00.002+05:30</published><updated>2010-07-13T12:07:47.884+05:30</updated><title type='text'>पॉल बाबा - हर जुआरी का दिन होता है</title><content type='html'>स्पेन के संबंध में की गई पॉल बाबा की आखिरी भविष्यवाणी भी सही निकली और खुद को फुटबाल के बड़े खिलाडियों से ज्यादा चर्चित और महान साबित कर उनके संन्यास की घोषणा हो गई। यह ऐसा ही है जब कोई जुए में अथाह सम्पति जीतकर कहने लगता है कि वह अब नहीं खेलेगा। मगर यहां उस ऑक्टोपस से अन्याय हो रहा है, क्योंकि वह कुछ नहीं कर रहा, सब उसके नाम पर जलघऱ वाले कर रहे हैं। वह ऑक्टोपस जुआरी नहीं है, मगर उस जलघर में जरूर कोई जुआरी दिमाग का था, जिसने इतना बड़ा खेल खेला कि पूरी दुनिया अचम्भित है। &lt;br /&gt;कैसीनो में ऐसा अक्सर देखने को मिल सकता है कि कोई जुआरी दाव पर दाव जीत रहा है। उसे सिर्फ इतना कहा जाता है कि आज उसका दिन है। कोई यह भी कहता है कि उस पर देवी मेहरबान है। जैसा कि पिछली पोस्ट में बताया गया कि यह सब प्रोबेबिलटी का गणतीय खेल है। पूर्वानुमान लगाना मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है और पूर्वानुमान अक्सर सब की जिंदगी में सच होते हैं। लेकिन जब वे लगातार सच होने लगते हैं तो आदमी खुद को भगवान मानने लगता है। यहीं वह धोखा खा जाता है। &lt;br /&gt;जुए के खेल में हर जुआरी को अक्सर हारना होता है, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो। इसलिए वह हर बार यह कह कर तोबा करता है कि एक बार उतनी रकम जीत लूं तो फिर कभी नहीं खेलूंगा। मगर उनमें से शायद ही कोई ऐसा कर पाता है। जुआ खेलने वाला तो बर्बाद ही होता है मगर जुआ खिलाने वाला कभी नहीं हारता। यही प्रोबेबिलटी का गणित बताता है। इसे हम इस उदाहरण से देखते हैं। घूमते चक्र पर १०० तक अंक हैं दाव लगाने के लिए। एक बार में कोई एक अंक ही निकलेगा। इसलिए निन्यानवे अंक जुआ खिलाने वाले कैसीनो के समर्थन में है और सिर्फ एक अंक जुआरी की किस्मत के लिए। इतना एक तरफा खेल होने के बावजूद भी जुआरी खेलता है और कई बार जीतता भी है, या जीतता भी चला जाता है। एक साथ आठ नहीं पंद्रह-पंद्रह दाव भी जीतकर विजेता बनता है, मगर इसके बावजूद वह पॉल बाबा नहीं बनता। &lt;br /&gt;पॉल बाबा हमारी मान्यताएं ही बनाती हैं। यह पिछली पोस्ट में भी बताया गया कि पॉल बाबा के लिए सिर्फ दो विकल्पों में से एक चुनना था, जिसके सच होने की संभावना काफी होती है। इसलिए यह कोई बड़ा दांव नहीं था। अब यह देखते हैं कि ऐसी ही भविष्यवाणियों की पुनरावृत्ति की कितनी संभावनाएं हैं, तो आप जानें की फीफा चार साल बाद होता है, ऐसे में चार सौ साल में कम से कम चौदह बार ऐसी भविष्यवाणियां सच हो सकती हैं। ज्यादा से ज्यादा तो आप मानें सौ बार। तब आप आश्चर्य से पागल हो जाएंगे। यही है प्रोबेबिलटी का खेल। जुआघरों में यही खेला जाता है और जुआरी भी पागलपन की हद तक इसके लती हो जाते हैं। इसी तरह अब दुनिया को पॉल बाबा की लत लग गई है। अपने हुनर से जीतने वाले खिलाड़ियों की चर्चा आज पॉल बाबा से कम है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-7690068363462639931?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/7690068363462639931/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=7690068363462639931' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/7690068363462639931'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/7690068363462639931'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/07/blog-post_13.html' title='पॉल बाबा - हर जुआरी का दिन होता है'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-1733091334180002845</id><published>2010-07-11T01:48:00.003+05:30</published><updated>2010-07-12T10:54:14.343+05:30</updated><title type='text'>पॉल बाबा का रहस्य आप भी जानें</title><content type='html'>फीफा वर्ल्ड कप के दौरान मैच के नतीजों को लेकर अपनी भविष्यवाणियों से चर्चा में आए पॉल बाबा उर्फ जर्मनी के एक एक्वेरियम में पल रहे ऑक्टोपस से सभी अचम्भित हैं। सेमिफाइनल मुकाबले में जर्मनी की हार की सटीक भविष्यवाणी के बाद तो पॉल बाबा की पूरी दुनिया में तूती बोल रही है। मीडिया भी इसका दीवाना हो चुका है। बड़े-बड़े ज्योतिषि उससे ईर्ष्या कर रहे हैं। आम लोगों की नजर में यह ऑक्टोपस एक चमत्कार है। उन्हें इसका रहस्य समझ से परे लगता है। मान्यतावादी समाज के लिए उसका यह रहस्यमय रूप ही आदर्श है। ऐसे उदाहरण अंधविश्वास के खिलाफ उठने वाले हर तर्क को काटने के लिए कारगर हथियार की तरह इस्तेमाल होते हैं। वह भी बिन इसका सत्य जाने। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस ऑक्टोपस से जो करवाया जा रहा है, वह नया नहीं है। हमारे समाज में ज्योतिषियों की दुकान भी ऐसे ही चलती है। असल में इसका रहस्य किसी ज्योतिष या पारलौकिक शक्ति में नहीं है, बल्कि ठेठ गणित में छुपा है। इस रहस्य को सुलझाने के लिए हम पहले ऑक्टोपस द्वारा भविष्यवाणी किए जाने के तरीके का आकलन करते हैं। मैच का नतीजा जानने के लिए ऑक्टोपस के सामने दो डिब्बों में भोजन परोसा जाता है। ये दोनों डिब्बे एक-एक टीम का प्रतिनिधित्व करते हैं, और उनपर संबंधित देश का चिन्ह लगा होता है। ऑक्टोपस भोजन ग्रहण करने के लिए जिस डिब्बे को खोलता है, मान लिया जाता है कि उसी की टीम जीतेगी और ज्यादातर मामलों में वही टीम जीती भी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें विजेता टीम चुनने के तरीके का चयन ऑक्टोपस ने नहीं मनुष्य ने अपनी सहज बुद्धि से किया है। इसी में इसका राज भी छुपा है। ऑक्टोपस के सामने दो ही डिब्बे रखे जाते हैं, इसलिए जब-जब मैच फंसे भविष्यवाणी गलत निकली। ऑक्टोपस को रोज की ही तरह ही भोजन ग्रहण करना है इसलिए उसने हमेशा की तरह ही एक डिब्बा खोला है। उसके लिए यह भविष्यवाणी नहीं उसका रोज का काम है। इस काम में मनुष्य ने जो भविष्यवाणी निकाली है उसका रहस्य प्रायकता यानी प्रोबेबिलटी में छुपा है। जिन्होंने गणित पढ़ा है, उन्हे पियरे सिमन लाप्लास का प्रोबबिलटी का सूत्र भी पता होगा। जितने कम विकल्प होते हैं उनके सच साबित होने की संभवाना उतनी ही ज्यादा होती है। जब आपको दो विकल्पों में से एक चुनना होता है तो उसके सही होने की दर काफी ज्यादा एक बटा दो अर्थात दशमलव पांच है। दूसरी ओर किसी छह फलक वाले लूडो के पांसे में एक निर्धारित अंक आने की संभावना इससे काफी कम दशमलव एकछह (.16) ही रह जाती है।&lt;br /&gt;अब हम देखते हैं कि यदि ऑक्टोपस के सामने तीन डिब्बे रखे जाते तो क्या उसकी वे भविष्यवाणियां भी सही साबित होतीं, जो मैच ड्रा होने यां फंसने की वजह से सही नहीं हो पायीं। तीसरा डिब्बा ड्रा की भविष्यवाणी के लिए होता। अगर आप हां कहते हैं तो यह सिर्फ आपकी पूर्व मान्यता है और आपका विश्वास चमत्कार पर जम गया है। लेकिन आप गलत हैं। तब गलती होने की संभवना बढ़ जाती और भविष्यवाणी सच साबित होने की संभावना दशमलव पांच (.50) से घटकर दशमलव तीनतीन (.33) पर आ जाती। &lt;br /&gt;इसी चतुराई के चलते अधिक डिब्बे ऑक्टोपस के सामने नहीं रखे गए। अब विचार करें कि वर्ल्डकप शुरू होने से पहले सभी 32 टीमों के डिब्बे एक साथ पॉल बाबा के आगे रखकर विजेता की भविष्यवाणी कराई जाती तो क्या होता। ऐसा नहीं था कि उस भविष्यवाणी के सच होने की संभावना नहीं थी मगर यह काफी कम दशमलव शून्यशून्यतीन (.003) के करीब होती। पॉल बाबा तो तब भी एक ही डिब्बा खोलते मगर भविष्यवाणी गलत होने का इतना बड़ा जोखिम भला कौन लेता। &lt;br /&gt;पॉल बाबा के संरक्षकों से ज्यादा हिम्मतवाला तो वो जुआरी होता है जो ताश के 52 पत्तों पर दांव लगाता है। सोचो उसके लिए कितनी कम संभावना होती है और फिर भी वह दाव लगाकर जीतता है। और कई बार जीतता ही चला जाता है। कभी हारता भी है और हारता ही चला जाता है। इसी तरह पॉल बाबा की भविष्यवाणियां भी कभी सच साबित होती जाएंगी और कभी गलत भी निकलेंगी। लेकिन जब गलत निकलने लगेंगी लोग उसे भूल जाएंगे। अब जब सच हैं तो सब उसके दीवाने हैं। यही अंधविश्वास है। यही मान्यतावाद है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-1733091334180002845?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/1733091334180002845/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=1733091334180002845' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1733091334180002845'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1733091334180002845'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/07/blog-post_10.html' title='पॉल बाबा का रहस्य आप भी जानें'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-8445442621959736208</id><published>2010-07-09T12:43:00.000+05:30</published><updated>2010-07-09T12:43:43.971+05:30</updated><title type='text'>मान्यता से चिपकना ही मान्यतावाद</title><content type='html'>खाप पंचायतें और मान्यतावाद से जुड़ी पिछली पोस्ट पर मुझे एक टिप्पणी अपने आर्कुट पर प्रिय मनोज की मिली। उन्होंने काफी तर्क से अपनी बात रखी है, जो इस तरह से है-&lt;br /&gt;-सर अब दिक्कत यह है कि क्या हमें मान्यतावाद से कभी मुक्ति मिल सकती है। और,आखिर हम क्यों इससे मुक्ति चाहते हैं। मुझे लगता है आपने मान्यतावाद का एक पक्ष देखा, दूसरा पक्ष भी है। जो बेहद अच्छा है। मान्यतावाद हमें सही आचरण करने की सीख भी देता है। यह भी तो मान्यता है कि भगवान या अल्लाह, या इशा या गाड कुछ भी कहें हमें  देख रहा है। और, हम उसके डर से सही आचरण कर रहे हैं। गीता के ज्ञान को तो हम कभी भूल भी नहीं सकते। जो हमें कर्म की सीख देता है। मुझे लगता है सर यदि मान्यताएं न हो, तो इंसान फस्र्टरेट हो जाएगा। इंसान है तो मान्यताएं है, हां, मान्यताओं में यदि वैज्ञानिक पुट आ जाए तो बात बन सकती है। मेरे ख्याल से हमें मान्यताओं में वैज्ञानिकता लाने की बात करनी चाहिए। मेरे ख्याल से मान्यताएं सर अवचेतन मन का वह अनुशासन है जो हमें समाज में सही सही करने के लिए प्रेरित करता है, या मजबूर करता है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनोज की इस टिप्पणी से आगे एक और पंक्ति थी जो शायद आर्कूट की शब्द सीमा की वजह से अधूरी रह गई थी। मान्यताओं को लेकर मनोज की बात एक सच्चे आम आदमी की द्योतक है। इसलिए यह भावनात्मक रूप से हम सबको छूती है। पर जहां तक तर्क की बात है तो यह खुद अपना ही खंडन करती है, जब कहती है कि यदि मान्यताओं वैज्ञानिकता लाने की बात करनी चाहिए। इस विषय पर पहली ही पोस्ट से यही लिखा गया है कि मान्यतावाद की जगह हमें वैज्ञानिक सोच से व्याख्यावाद को अपनाना चाहिए। साइंस की तरक्की के साथ ही आज हमारे पास मान्यताओं को परखने के ज्यादा सटीक पैमाने हैं और जो मान्यताएं समाज में सिर्फ दंगे फैलाती हैं उन्हें खारिज किया जाना चाहिए। जहां तक मान्यताओं का सवाल है तो वे बस किसी के कहने और सुनने से खारिज नहीं होती हैं। पहले वे अप्रासंगिक होती हैं, समाज उनके अप्रासांगिक होने की कीमत दंगों और झगड़ों के रूप में चुकाता है, फिर लगातार होते नुकसान के बाद समाज के कुछ लोग जागते हैं और मुहिम शुरू करते हैं और उसे स्वीकारोक्त मिलती है। २१वीं सदी ने भारत में बहुत सी मान्यताओं को कमजोर किया है। इनमें एक है बेटा ही कुल का चिराग है। अब समाज में एक बेटी वाले दंपत्तियों की संख्या भी बढ़ रही है। वे इसे खुलकर खारिज भी करते हैं। हालांकि अभी यह संख्या बहुत ज्यादा नहीं है मगर बेटा-बेटी के अंतर की जो सैकड़ों सालों से चली आ रही मान्यता थी वह कमजोर पड़ रह है इसे साबित करती है। विज्ञान ने भी बता दिया है कि संतान में जो गुणसूत्र होते हैं उनमें माता-पिता दोनों के वंश का वहन समानरूप से जीन करते हैं। बल्कि माता का पलड़ा कुछ भारी ही होता है। जैसा बीज वैसा फल की मान्यता भी टूट रही है, कलम से कहीं ज्यादा अच्छे फल बिना बीज के मिल जाते हैं। &lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;जहां तक मान्यताओं को सवाल वह भ्रम से ही पैदा होती हैं और भ्रम ही पैदा करती हैं। इसीलिए झगड़े होते हैं। किसी मान्यता को लेकर काम शुरू करना बुरा नहीं है, आप एक काल्पनिक लक्ष्य मानकर काम शुरू करते हैं। मान्यतावाद बुरा है। मान्यतावाद वह है जब आप मान्यता से चिपके रहते हैं और असलीयत सामने आने पर भी उसे नहीं छोड़ते। साइंस और गणित में भी काल्पनिक लक्ष्य मानकर आप गणनाएं करते हुए सत्य को खोज लाते हैं। आप इसे इस तरह समझ सकते हैं कि अगर आपके पास ब्याज की दर है, समय तथा कुलधन है तो मान लो मूलधन १०० की मान्यता लेकर असली मूलधन की गणना इससे कर सकते हैं, मगर असली मूलधन सामने आने के बाद भी अगर आप कहते हैं कि नहीं मूलधन तो सौ ही है, वही हमने माना था तो आप गलत कहलाएंगे, आप फिर भी अड़े रहेंगे तो झगड़ा होगा। आपके समर्थन में आसपास के लोग भी अड़ गए तो दंगा भी हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह सत्य को अपनाने और मान्यताओं को छोड़ने के बीच का जो जड़त्व है उसे तोड़ना होगा। मान्यतावाद से मुक्ति में ही हमारी भलाई है। इसलिए इससे मुक्त होना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-8445442621959736208?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/8445442621959736208/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=8445442621959736208' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/8445442621959736208'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/8445442621959736208'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/07/blog-post_09.html' title='मान्यता से चिपकना ही मान्यतावाद'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-5155475043840529923</id><published>2010-07-04T13:43:00.000+05:30</published><updated>2010-07-04T13:43:22.190+05:30</updated><title type='text'>खाप पंचायतें और मान्यतावाद</title><content type='html'>असम की उत्तरी पहाड़ियों में हॉफलोंग के पास गांव है जटिंगा। आपमें से ज्यादातर लोगों ने इसके बारे में पढ़ा और सुना होगा, कुछ ने हो सकता है जाकर देखा भी हो। कहा जाता है कि यहां प्रवासी पक्षी सामूहिक आत्महत्याएं करते हैं। ये आत्महत्याएं सितंबर से नबंवर के बीच होती हैं और ज्यादातर शाम सात बजे से रात दस बजे के बीच होती हैं। सदूर साइबेरिया तक से आने वाले पक्षी अचानक यहां पहुंचकर आत्महत्या क्यों करने लगते हैं यह एक बडा़ रहस्य है। इस पर कई तरह के विचार सामने आए हैं। ये अध्ययन पहले पक्षियों के व्यवहार और मौसम को लेकर हुए, इनके अनुसार इन दिनों यहां कुहासा ज्यादा होता है मौसम की प्रतिकूलता की वजह से ये अधमरी हालत में गिरते हैं। इसके अलावा एक अध्ययन जटिंगा के लोगों के व्यवहार को लेकर, यह काफी चौंकाने वाला है। कहा जाता है कि जटिंगा के लोग इन पक्षियों के कुशल शिकारी हैं। वे छत्तों पर यां ऊंची जगहों पर बैठकर रात में रोशनियां करते हैं, जब इनसे आकर्षित होकर पक्षी तेजी से एकदम नीचे की ओर आते हैं तो ये अपने लंबे बांसों को भाले की तरह हवा में फेंक कर इन्हें गिरा लेते हैं। ये पक्षी सामूहिक कतारों में उड़ते हैं, इसलिए समूह में ही मारे जाते हैं। &lt;br /&gt;इसके बावजूद जटिंगा अपने शिकारियों की वजह से नहीं पक्षियों की कथित सामूहिक आत्महत्याओं के लिए जाना जाता है। वजह हमारी प्रवृत्ति है जो चीजों को रहस्यमयरूप में ज्यादा पसंद करती है। नेचुरल चीजें कोई खास नहीं है अगर सुपरनेचुरल है तो हमारा सिर झुक जाता है। दूसरी ओर सत्य यह है कि सुपरनेचुरल कुछ नहीं होता, यह प्रकृत्ति है और इसमें सबकुछ प्रकृत्त प्रदत्त है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब हम मूल विषय पर आते हैं। मान्यताएं तब आत्मघाती बन जाती हैं, जब वे अपने ही जीन्स को नष्ट करने का फैसला लेने लगती हैं। हरियाणा में जाटों की खाप पंचायतें इसका उदाहरण हैं। बात हमने जटिंगा से शुरू की थी, वहां पक्षी अपनी प्रकृतिक उड़ान पर होते हैं। हरियाणा का जाट समुदाय भी आजकल एक बड़ी समस्या से जूझ रहा है। युवा प्रेमीजोड़े परंपराओं और मान्यताओं को तोड़ते हुए घरों से उड़ान भरते हैं और कुछ दिन बाद ही इनके शव कहीं लटके होते हैं या रेल पटरी पर पड़े होते हैं। इन कथित आत्महत्याओं में जिसकी भी जांच हो पाती है, वह हत्या ही निकलती है, बाकी समाज और राजनीतिक दबाव में मामले रफादफा भी हो जाता हैं। मीडिया की सक्रियता से मनोज-बबली मामला उछला और उसमें फांसी तक की सजा हुई। इसके बाद से इस तरह के मामले अब सामने लाने की हिम्मत लोग जुटाने लगे हैं। &lt;br /&gt;कानून के दबाव में आई पंचायतें अब समस्या का राजनीतिक हल तलाशने में जुट गई हैं, हालांकि पहले चौपलों से ही फरमान होता था और फैसला हो जाता थ। फिर न कोई कोर्ट न कचहरी। पर ये पंचायतें मान्यताओं की रक्षा के लिए जिनसे भिड़ रही हैं, वही भी इनके अपने जीन हैं, अपनी ही युवा पीढ़ी है। उसके लिए मान्यताएं मानसिक गुलामी हैं। वह जिन्दगी अपने तरीके से जीना चाहती है। हीर-रांझा के किस्से और युवाओं में बलिदान की भावना काफी ज्यादा होती है, उन्हें लगता है कि यही बात उन्हें नायक बना सकती है। इसलिए वे फरमानों की चिंता न करते हुए अधिक जटिल रास्ता चुनते हैं, जो ज्यादातर मामलों में मौत की ओर जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जटिंगा के पक्षी अपनी सतंतियों को बढ़ाने के लिए सर्दियों से पहले जटिंगा के रास्ते पर बढ़ते हैं। हरियाणा के युवा जोड़े भी मुक्त उड़ान पर होते हैं। पक्षी भूखे आदिवासियों के भोजन का साधन बनते हैं और ये युवा जोड़े मान्यताओं के दानव का पेट भरने के लिए मान्यतावादी खापों द्वारा शिकार किए जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंचायतों के पास भी अपने तर्क हैं - पहला यह कि हिन्दू मेरिज एक्ट में सुधार होना चाहिए, एक गोत्र में शादी को मान्यता नहीं देनी चाहिए। यह अलग बात है कि जब हाईकोर्ट ने पूछा कि यह गोत्र क्या है और किस हिन्दू ग्रंथ में कहा गया है कि एक ही गोत्र में शादी वर्जित है तो याचिका देने वाले पंचायतों के मुखिया जवाब नहीं दे पाये। इस तरह जनकारियों और तर्क के अभाव में ही हम मान्यताओं की गठरी सिर पर उठाए घूमते हैं। इन मुखियाओं ने भी यही साबित किया। अब मान भी लेते हैं कि अगर हिन्दू मेरिज एक्ट में सुधार कर भी दिया जाए तो क्या वे प्रेमी जोड़े जो घर-परिवार और पंचायतों तथा मौत के डर से भी मान्यताओँ को ढोने को तैयार नहीं है और घरों से भाग रहे हैं, वे कानून बन जाने के बाद रुक जाएंगे। अगर ऐसा होता तो सारे अपराध भी रुक गए होते। &lt;br /&gt;समस्याएं तो समाज और उसकी मान्यताएं ही पैदा करती हैं, कानून तो सिर्फ तय नियमों में किसी को अपराधी और निरपराधी बताता है। लोगों के समूह की यह प्रवृत्ति होती है कि जो उनकी मान्यताओं को ढोने को तैयार नहीं है उसे किसी तरह से अपराधी घोषित करवाया जाए। ताकि उसका जीना और मुहाल किया जा सके। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समस्याओं के हल बौद्धिक तरीके से ढूंढे जाते हैं। तर्क की कसौटी से पैदा होते हैं। डंडे के जोर से कुछ नहीं होता। डंडे वाले हाथ हमेशा बदलते रहते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-5155475043840529923?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/5155475043840529923/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=5155475043840529923' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5155475043840529923'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5155475043840529923'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/07/blog-post_04.html' title='खाप पंचायतें और मान्यतावाद'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-4247018260117151579</id><published>2010-07-01T13:43:00.000+05:30</published><updated>2010-07-01T13:43:09.077+05:30</updated><title type='text'>मान्यतावाद से मुक्ति कैसे</title><content type='html'>मान्यतावाद और व्याख्यावाद को लेकर हमने इस वर्ष फरवरी में इसी ब्लॉग पर लंबी चर्चा चलाई थी। समय था, जब राज ठाकरे, शिव सेना और शाहरूख खान की टिप्पणियों को लेकर तनाव बन रहा था। पाठकों की टिप्पणियों के साथ मान्यतावाद और व्याख्यावाद को परिभाषित करने की कोशिश भी की गई थी। आज अचानक विकिपीडिया में मैंने मान्यतावाद की परिभाषा देखी। इसमें इसे अंग्रेजी के शब्द स्टीरियोटाइप से जोड़ा गया है। साथ ही इसमें मेरे लिए सुखद आश्चर्य यह था कि प्रसंग के रूप में लिंक मेरे इसी ब्लॉग का है। साथ में स्टीरियोटाइप के लिए चार और लिंक हैं। विकिपीडिया में जो परिभाषा है मैं यहां एक बार फिर आपके लिए रख रहा हूं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी सामाजिक समूह (जैसे किसी धर्म या जाति) के बारे में आम जनता के मन में पारम्परिक रूप से घर कर गयी धारणा को मान्यतावाद या स्टीरियोटाइप (stereotype) कहते हैं। मान्यतावाद किसी सामाजिक समूह के बारे में 'सरलीकृत' धारणाओं को कहते हैं। प्राय: ये धारणाएं वस्तुनिष्ट सत्य पर आधारित नहीं होतीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि मुझे लगता है कि मान्यताओं को लेकर कुछ मान्यतावादी स्टीरियोटाइप हो सकते हैं, सभी स्टीरियोटाइप मान्यतावादी हों यह जरूरी नहीं है। पर यह तय है कि मान्यताएं हमारे विवेक पर पर्दा डालती हैं। इसे एक उदाहरण से और अच्छी तरह से समझा जा सकता है। एक बच्चा मां के पास जाता है और अपने घर की ओर इशारा करके पूछता है मां यह किसका घर है। मां कहती है बेटा यह तुम्हारा ही घर है। बेटा कहता है, अच्छा यह मेरा घर है। उसका मन अब इस बात को मान लेना चाहता है कि यह उसका घर है। पर कुछ शक है। वह पिता के पास जाता है और पूछता है पापा क्या यह मेरा घर है। पिता कहता है हां बेटा यह तुम्हारा ही घर है और उसकी मान्यता दृढ़ हो जाती है। &lt;br /&gt;अब उसकी मान्यता है कि यह मेरा घऱ है। अब वह अपने भाई के पास जाता है और कहता है भाई यह मेरा घर है। उधर भाई भी उसी माता-पिता की संतान है और उन्हीं परिस्थितियों के बीच बड़ा हो रहा है, इसलिए उसके पास भी यह मान्यता पहले से है कि यह मेरा घर है। इसलिए भाई खंडन करता है कि नहीं छोटे यह मेरा घर है। छोटा कहता है नहीं मेरा है। दोनों झगड़ा करते हैं। रोते हुए मां-बाप के पास जाते हैं, तब मां-बाप कहते हैं बच्चों यह हमारा घर है। हम सबका घर है। दोनों बच्चों को पहले तो समझ नहीं आता कि मां-बाप अब झूठ बोल रहे हैं, या पहले झूठ बोल रहे थे, मगर उनकी पहली मान्यता टूटती है। उनका भ्रम टूटता है। यह मान्यता आसानी से इसलिए टूट जाती है क्योंकि जिनकी वजह से यह मान्यता पैदा हुई थी उन्होंने ही इसका खंडन कर दिया। इसलिए बच्चों के पास मानने के अलावा कोई चारा नहीं था। तर्क-कुतर्क की गुंजाइश भी नहीं। &lt;br /&gt;समाज में मान्यताएं इसलिए आसानी से नहीं टूट पातीं क्योंकि समाज का कोई माई-बाप नहीं होता। इसलिए समाज में मान्यताओं के लेकर झगड़े हजारों साल तक चलते रहते हैं। धर्म को लेकर जुड़ी मान्यताओं में ऐसा हो रहा है। उन्हें जिसने शुरू किया, वह हमारे बीच है नहीं, तब जो खंडन करेगा वह नया झगड़ा ही पैदा करेगा। किसका ईश्वर श्रेष्ठ है, यह फैसला कभी नहीं होने वाला। क्षेत्रीय तौर पर इसका फैसला यह होता है कि जहां जिसके अनुयायी अधिक होते हैं, उसी का ईश्वर भी श्रेष्ठ होता है। जहां संख्या बराबरी की होती है या मुकाबले में ठीक-ठाक होती है तो झगड़े ज्यादा होते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम कुछ नए उदाहरणों से समझ सकते हैं, जिस तरह इस मान्यता को बाजार और मीडिया द्वारा खूब बढ़ावा दिया जा रहा है कि देश में क्रिकेट धर्म है और सचिन तेंदुलकर भगवान। हो सकता है वर्षों बाद यह मान्यता और दृढ़ हो जाए तब अगर कोई सवाल करेगा कि तेंदुलकर बीस साल भी खेल कर देश को वर्ल्डकप नहीं जिता पाये और रिकी पोंटिंग ने उससे ज्यादा कारनाम अपने १२ साल के करियर में कर दिया तो निस्संदेह इस बात पर झगड़े होंगे। इसलिए मान्यताएं प्रशंसा में दिए गए रूपक और उपमाएं भी हो सकती हैं, या बाजार द्वारा गढ़ी रणनीतियां भी। इतना तह है कि मान्यताएं विवेकहीन लोगों के मानसिक शोषण का औजार ही बनती हैं। इनसे मुक्त होने का मार्ग समाज को तलाशना होगा। समाज मान्यताओं से मुक्त कैसे हो सकता है, यह एक गंभीर सवाल है। इस पर और चिंतन की जरूरत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-4247018260117151579?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/4247018260117151579/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=4247018260117151579' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/4247018260117151579'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/4247018260117151579'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='मान्यतावाद से मुक्ति कैसे'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-1612923348961278332</id><published>2010-06-26T17:06:00.000+05:30</published><updated>2010-06-26T17:06:14.170+05:30</updated><title type='text'>एनडीए की राह पर कांग्रेस, बंटाधार करेगी</title><content type='html'>पेट्रो पदार्थों को लेकर कांग्रेस भी एनडीए सरकार की नीति पर चल रही है। यह नीति आम आदमी का जीना मुहाल कर देगी। पेट्रोल कीमतों को अब खुला छोड़ा गया है, जबकि बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ गए हैं, जब यह सस्ता था तब ऐसा क्यों नहीं किया गया। इसका सीधा फायदा तेल कंपिनयों के खाते में गया। अब इसकी बानगी भी देखिए कि कैसे मनमोहन सरकार एनडीए सरकार के पदचिन्हों पर चल रही है। &lt;br /&gt;एनडीए ने 1998 से 2004 के बीच पेट्रोल के दाम में पचास फीसदी से भी ज्यादा, डीजल के दाम में करीब 111 फीसदी, रसोई गैस में करीब नब्बे  फीसदी और केरोसिन तेल के दाम में तीन सौ फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी की। &lt;br /&gt;जब 1998 में एनडीए ने सत्ता की बागडोर संभाली पेट्रोल करीब 23 रुपये लीटर था जो 2004 में 34 रुपये लीटर तक पहुंचा। डीजल 10.25 रुपये से बढ़कर 21.74 रुपये तक पहुचा। इसी तरह रसोई गैस के दाम 136 से उछल कर 242 रुपये तक पहुंचे। सबसे ज्यादा बढ़ोतरी केरोसिन के तेल में ढाई रुपये से सीधे नौ रुपये हुई जो तीन सौ फीसदी से भी ज्यादा है।&lt;br /&gt;आइए अब कांग्रेस सरकार के राज में क्या हुए यह देखें, वर्ष 2004 में पेट्रोल 34 रुपये लीटर था वह अब 51 रुपये लीटर यानी ठीक पचास फीसदी की ही बढ़ोतरी। डीजल 22 से 40 रुपये लीटर यानी नब्बे फीसदी की बढ़ोतरी, रसोई गैस 241 रुपये से 345 रुपये यानी करीब 45 फीसदी की बढ़ोतरी इसी तरह केरोसिन 9 रुपये से 12 रुपये किया, जिसमें 33 फीसदी की बढ़ोतरी है। अतः जाहिर है कि पेट्रोल, डीजल और गैस का प्रयोग करने वालों पर दोनों ही सरकारों ने करीब-करीब एक सी ही गाज गिराई है। इससे यह भी साफ है कि सरकारें बदलने से कुछ नहीं होता। सब एक ही थेली के चट्टे-बट्टे हैं। दोनों ही सरकारों ने छह साल के समान कार्यकाल में ही यह गुल खिलाए हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-1612923348961278332?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/1612923348961278332/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=1612923348961278332' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1612923348961278332'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1612923348961278332'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/06/blog-post_26.html' title='एनडीए की राह पर कांग्रेस, बंटाधार करेगी'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-6551931892228123385</id><published>2010-06-25T12:15:00.002+05:30</published><updated>2010-06-25T12:15:48.500+05:30</updated><title type='text'>साइबर गुलामी के लिए तैयार रहें</title><content type='html'>सामाजिक और आर्थिक गुलामियों के बाद अब समाज को साइबर गुलामी के नए फंदे के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा। सामाजिक और आर्थिक गुलामियों ने तो धीरे-धीरे पांव पसारे। पूरी दुनिया को गुलाम बनाने का किसी एक का सपना अधूरा ही रहा। भले एक समय था जब ब्रिटेन का सूरज कभी अस्त नहीं होता था, मगर तब यूरोप के ही अनेक देश और तीसरी दुनिया के कुछ देश भी अपनी संप्रभुता बचाने में कामयाब रहे। ब्रिटेन ने अन्य देशों की संप्रभुता को जिस तरह एक-एक कर निगला उसमें उसे वर्षों मेहनत करनी पड़ी। मगर साइबर गुलामी एक सैकेंड में पूरी दुनिया को अपनी बेड़ियों में असहाय कर देगी। यह काम अमेरिका से होने वाला है। अमेरिका एक ऐसा कानून लाने की तैयारी कर रहा है, जिसके तहत राष्ट्रपति बराक ओबामा के हाथ में एक किल बटन होगा और इसे दबाते ही पूरी दुनिया में न तो कोई गूगल से कुछ सर्च कर पाएगा और न जीमेल और याहू से मेल हो सकेगी। अमेरिका के नेशनल इंटेलीजेंस के डायरेक्टर डेनिस ब्लेयर ने अपनी रिपोर्ट में इस पर बल दिया है। इस प्रस्ताव को प्रोटेक्टिंग साइबरस्पेस एसए नेशनल एसेट एक्ट का नाम दिया गया है। &lt;br /&gt;इस तरह आपकी साइबर आजादी भविष्य में अमेरिकी राष्ट्रपति के हाथ में होगी। इससे कितने लोग प्रभावित होंगे इसका अंदाजा गूगल के इस दावे से लगाया जा सकता है कि सिर्फ उसके ही प्रतिदिन तीन अरब यूजर्स हैं। याहू और गूगल के अलावा यूट्यूब भी अमेरिका से ही संचालित होता है। इस तरह दुनिया को अब एक अन्य साइबर सेंटर की बेहद जरूरत है जो अमेरिका से बाहर हो। यह भारत और चीन या कहीं भी हो सकता है। इससे भले साइबर शीतयुद्ध जैसे हालात बनें मगर सिर्फ यह दुनिया को साइबर गुलामी के खतरे से बचा सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-6551931892228123385?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/6551931892228123385/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=6551931892228123385' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6551931892228123385'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6551931892228123385'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/06/blog-post_25.html' title='साइबर गुलामी के लिए तैयार रहें'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-1394692130031370384</id><published>2010-06-19T17:41:00.000+05:30</published><updated>2010-06-19T17:41:47.407+05:30</updated><title type='text'>एक एफआईआर के साथ दफन हो गए कनिष्क के कई राज</title><content type='html'>सुधीर राघव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंडीगढ़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एफआईआर नंबर 105, फिल्लौर पुलिस स्टेशन, 15 अक्तूबर 1992। इस एफआईआर के साथ करीब 25 साल पुराने कनिष्क कांड के कई राज दफन हैं। हालांकि अब कोई पुलिस अधिकारी इस पर मुंह खोलने को राजी नहीं है। यह एफआईआर है कनिष्क कांड के मास्टर माइंड्स में एक माने जाते और बब्बर खालसा इंटरनेशनल के सरगना रहे तलविंदर सिंह परमार समेत छह आतंकवादियों की पुलिस मुठभेड़ में मौत के संबंध में। हालांकि बाद में मानवाधिकार संगठनों ने इन आतंकवादियों की मौत पर बहुत हो-हल्ला मचाया और इसे फर्जी मुठभेड़ बताया, मगर कनिष्क हादसे में मारे गए 329 लोगों के परिजनों को न्याय मिले, इससे किसी को भी सरोकार नहीं था। न कनाडा सरकार को और न हमारी ही पुलिस को। सब किसी न किसी को बचाने के लिए इस मामले की कडिय़ों को खोलने की जगह उनपर पर्दा डालते रहे। &lt;br /&gt;मगर वक्त के साथ राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय दबाव कम हुए और आरोपों- प्रत्यारोपों के बीच कुछ ऐसे तथ्य भी सामने आए जो भले ही पुलिस प्राथमिकियों में दर्ज न हों मगर वे गवाह और दस्तावेजों के रूप में निकल कर फिर से खड़े हो गए। पंजाब के ह्यूमन राइट कमीशन ने यह बात जोरशोर से उठाई थी कि परमार को एनकाउंटर से करीब पांच दिन पहले जम्मू से गिरफ्तार किया गया था। उसने पूछताछ में कनिष्क की साजिश का पूरा खुलासा किया था। उसने भिंडरावालां के भतीजे लखवीर सिंह रोडे को मुख्य साजिशकर्ता बताया था। रोडे और इंद्रजीत सिंह रैयत ने ब्रिटिश कोलंबिया के जंगलों में जून के महीने में ट्रांजिस्टर टाइमर की सहायता से डायनामाइट विस्फोट का परीक्षण भी किया था। जिस एल सिंह के नाम से एयर इंडिया की टिकट बुक हुई थी वह लखबीर सिंह था और दूसरा एम. सिंह मनजीत सिंह था। &lt;br /&gt;इस संबंध में मानवाधिकार संगठन की ओर से यह दावा भी किया गया था कि रोडे का नाम सामने आने पर ही पूछताछ के पूरे दस्तावेजों को नष्ट कर दिया गया था। कुछ कारणों से सुरक्षा एजेंसियां नहीं चाहती थीं कि रोडे का नाम सामने आए। इसलिए ही परमार के एनकाउंटर की खबर आई थी। एफआईआर में एनकाउंटर का समय सुबह 5:30 बजे बताया गया है। यह मुठभेड़ फिल्लौर के एक गांव कंग अडिय़ां के पास हुई थी। यह भी कहा गया था कि एफआईआर और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का समय मेल नहीं खाता। &lt;br /&gt;इस संबंध में जब फिल्लौर के मौजूदा डीएसपी परमपाल सिंह से बात की गई तो उनका कहना था कि वह अभी यहां नए ही आए हैं और इस संबंध में ज्यादा कुछ नहीं कह सकते। यह बहुत ही पुराना मामला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; भले ही अब कोई कुछ न बोले। झूठ को छुपाये रखने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। शोर मचाना पड़ता है। सच के लिए नहीं, सच तो अपने आप सामने आता है। कनिष्क मामले में भी अब यही हो रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(19 जून 2010 को हिन्दुस्तान चंडीगढ़ में प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-1394692130031370384?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/1394692130031370384/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=1394692130031370384' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1394692130031370384'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/1394692130031370384'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/06/blog-post_19.html' title='एक एफआईआर के साथ दफन हो गए कनिष्क के कई राज'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-5745627982421252938</id><published>2010-06-14T19:39:00.002+05:30</published><updated>2010-06-14T19:39:52.084+05:30</updated><title type='text'>स्वर्ग से सीधा प्रसारण</title><content type='html'>सुधीर राघव&lt;br /&gt;--------&lt;br /&gt;व्यंग्य &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुद्धि और प्रतिभा संपन्न विज्ञानी दिन रात एक करके कोई नई खोज करता है। बाद में दुनिया उसे अपने नफे-नुकसान के हिसाब से इस्तेमाल करती है। इस्तेमाल इतने रूपों में होता है कि खुद वैज्ञानिक ने न सोचा हो। अब दुनिया के साइंसदान गॉड पार्टिकल ढूंढने में जुटे हैं। देर-सवेर मिल जाएगा। हो सकता है कभी सशरीर स्वर्ग जाने का रास्ता भी मिल जाए। सशरीर नहीं तो हो सकता है कभी कोई ऐसी वेवलेंथ मिलजाए जो माइक्रोवेव या इलेक्ट्रानिक वेव की तरह स्वर्ग की घटनाओं का सीधा प्रसारण करने में सक्षम हो। सोचो तब क्या होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया में ब्रेकिंग न्यूज के लिए जैसी मारकाट मची है, उसे देखकर लगता है कि आदमी को स्वर्ग में भी चैन से नहीं रहने दिया जाएगा। कैमरामैन और रिपोर्टर वहां भी जमे होंगे। भोपाल गैस कांड में यूनियन कार्बाइड केमिकल्स के भगौडे़ चेयरमैन वारेन एंडरसन को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह चुप्पी साधे हुए हैं। मीडिया के बहुत कुरेदने पर भी साफ-साफ नहीं बोल रहे। दो-चार बातें कहीं, वह भी गोलमोल। एक चैनल का इनपुट एडीटर माथा पकड़कर बैठा है। आउटपुट के लिए क्या है हमारे पास। वह रिपोर्टरों पर गरज रहा है, इतनी बड़ी न्यूज छिपी है, अर्जुन को उस दिन किसका फोन आया था। किसी रिपोर्टर में दम नहीं जो इसे ब्रेक कर सके। &lt;br /&gt;..क्यों नहीं सर। एक जूनियर प्रोड्यूसर मिमिया रहा है-अपने कवीश कुमार की स्वर्ग में अच्छी पकड़ है। उनसे कहा जाए की राजीव जी से संपर्क कर उनका सीधा इंटरव्यू करें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब फोन लाइन पर कवीश मिमिया रहा है- सर...। ढूंढना बहुत मुश्किल है। बहुत पुराना केस है। रोज 1१ करोड़ लोग मर कर स्वर्ग पहुंचते हैं। कोई एकाध ताजा अटपटा मामला होता है तो हम खबर करते ही हैं न....&lt;br /&gt;इनपुट एडीटर का पारा गर्म है-अबे दस साल से वहां घास खोद रहे हो। टीए-डीए ले रहे हो सो अलग। एक आदमी तुम से नहीं ढूंढा जाता। &lt;br /&gt;...ठीक है सर,...मैं देखता हूं। उधर से कवीश की पहले दबी आवाज आती है फिर चहकती हुई-क्यों न सर हम उन यमदूतों से बातचीत का सीधा प्रसारण करें, जो उस दिन मरने वालों के जीव को ले गए थे।...एकदम ब्रेकिंग न्यूज होगा सर।।&lt;br /&gt;हां, यह भी ठीक रहेगा। इनपुट एडीटर के चेहरे पर मुस्कराहट है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक और चैनल सड़क हादसे को कवर कर रहा है। इसमें एक कार चालक की मौत हुई है। खबर के दौरान दर्शकों को क्विज में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है।-आप बताइये मरने वाला स्वर्ग जाएगा या नर्क। अगले दस मिनट में यमराज उसके भाग्य का फैसला करने वाले हैं। जिसका जवाब सही होगा उसे इनाम में हेंडीकेम दिया जाएगा, जिसकी बाजार कीमत है 8,999 रुपये। तत्काल अपना जवाब हमें स्क्रीन पर लिखे नंबर पर एसएमएस करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ी देर बाद दर्शकों से फिर एक सवाल- देखिए इसे कैसे नर्क में गर्म सलाखों से दागा जा रहा है। यह सजा कौनसा पाप करने पर दी जाती है। आप अपना जवाब जल्दी ही हमें एसएमएस करें। जवाब थोड़ा कठिन है, इसलिए हम आपको हिंट भी दे देते हैं कि इसका वर्णन आपको गरुड़ पुराण में मिल सकता है। तो जल्दी कीजिए, भेजें अपना जवाब और जीतें एक बंपर पुरस्कार। मलेशिया जाने का मौका। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इतना ही नहीं नर्क-स्वर्ग के घोटालों का पर्दाफाश भी टीवी चैनलों पर हो रहा है और उनकी टीआरपी बढ़ रही है। चैनलों के सेटेलाइट स्वर्ग की परिक्रमा कर रहे हैं। उधर, स्वर्ग में बैठक चल रही है, मनुष्य का हस्तक्षेप यहां तक बढ़ गया है। हमें कुछ नए जैमर विकसत करने होंगे जो फिर से मनुष्यों की तरंगों को जाम कर दें। नहीं तो मनुष्य किसी को भी चैन से नहीं रहने देगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वर्ग की इस बैठक का भी सीधा प्रसारण हो गया है। इसके बाद से धरती पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। ...जानना हमारा अधिकार है। स्वर्ग के लोग ऐसा नहीं कर सकते। ...पर लोग यह नहीं समझ रहे कि जानना तो उनका अधिकार है मगर उनकी रुचि क्या जानने में हैं। वह पुण्य को नहीं पाप को ही जानना चाहते हैं। क्यों?&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;(13 जून 2010 को हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के कलम में प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-5745627982421252938?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/5745627982421252938/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=5745627982421252938' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5745627982421252938'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/5745627982421252938'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/06/blog-post_14.html' title='स्वर्ग से सीधा प्रसारण'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-6927412557627528358</id><published>2010-06-13T23:06:00.002+05:30</published><updated>2010-06-13T23:06:23.000+05:30</updated><title type='text'>अभिज्ञात की दुनिया में सच के 25 रूप</title><content type='html'>समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभिज्ञात अपनी बसाई दुनिया लेकर फिर पाठकों के सामने हाजिर हैं। यह दुनिया है उनके लिए जो सपने देखना पसंद करते हैं, मगर हर कहानी पाठक को सपनों के आकाश से हकीकत के उस धरातल पर ले आती है, जो कढ़ाई में खदकते हलवे की तरह बुलबुले छोड़ रहा है। हर बुलबुला जिंदगी के एक सच से पहचान करवाता है और अपना स्वाद छोड़ जाता है। सच के इतने रूप लेखक अपनी जिंदगी के चारों ओर से ही तलाश कर लाया है। अभिज्ञात के अंदर छुपे पत्रकार की पारखी नजर और संवेदनशील कवि इस सच को शब्दों की सजीवनी से साक्षात करता है। मिस्र की संरक्षित ममियां भले ही अपने युग को फिर कभी नहीं जिएंगी पर अभिज्ञात के पात्र लौट-लौटकर आते हैं और सीधे पाठक के जेहन में उतर जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस संग्रह की अधिकतर कहानियां कादम्बिनी, हंस, वागर्थ, वर्तमान साहित्य और वामा जैसी प्रतिष्ठित साहित्यक पत्रकाओं में छप चुकी हैं। पहली ही कहानी -कॉमरेड और चूहे- हमारे चिकित्सा शिक्षण संस्थानों के हालात बयां करती है कि किस तरह एक आदर्श को कुतरने के लिए यहां के चतुर्थश्रेणी कर्मचारी ही काफी हैं। स्वार्थ अभिज्ञात की लेखनी से नए अर्थ लेकर निकलता है, कहानी -औलाद- में। एयरहोस्टेस मां अपने नाजायज नवजात को न बचाने के लिए डॉक्टर से कहती है, मगर डॉक्टर उसे इसलिए बचाना चाहता है, क्योंकि यह उसका पहला ही केस है। लघुकथा -बंटवारे-यह बता कर चौंकाती है कि जब कोई घर बंटता है तो सबसे ज्यादा खुश भिखारी होते हैं कि अब उन्हें एक की जगह चार घर से भीख मिलेगी। -तीसरी बीवी-कोलकात्ता में बसे बांग्लादेशियों की बदतर जिंदगी की झलक दिखाती है। आज ी भले अपनी मर्जी से प्रेम विवाह करे मगर पुरुष उसके आर्थिक और यौन शोषण पुराने हथकंडों अपना कर ही करता है। यहां कोई बदलाव नहीं है। औरत की आजादी किसी को बर्दाश्त नहीं। भले ही कुलटा कहानी में किसी पात्र का नाम नहीं है मगर यह कुलटा की गाली से भयभीत सभी ियों के साझा डर का दर्शाती है। पति-पत्नी के बीच नौकझौंक की एक बहुत ही रोचक कहानी है फिर मुठभेड़। यह बिल्कुल नए अंदाज में हैं, शादी की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर भी यह जोड़ा दिनभर यह वादा करने के बाद कि आज नहीं लड़ेंगे रात को जरा सी बात पर आपस में मारपीट करके ही सोता है। इस कहानी संग्रह में कुल 25 कहानियां हैं और सब सच के इतने ही रूप दिखाती हैं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह कहानियां मर्म को बेधती हैं, हूक पैदा करती हैं तो कभी ढांढस बंधाती हैं। इनमें अनुभव, संवेदना और मर्म साथ-साथ चलते हैं। लेखक किसी एक अंदाज में बंधी किस्सागोई नहीं करता, इसलिए पाठक दूर तक उसके साथ चलता है और ऊबता भी नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानी संग्रह-तीसरी बीवी&lt;br /&gt;प्रकाशक : शिल्पायन &lt;br /&gt;मूल्य : 150 रुपये &lt;br /&gt;आवरण चित्र : डॉ. लाल रत्नाकर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;( हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के कलम में 13 जून 2010 को प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2364923868109514052-6927412557627528358?l=sudhirraghav.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/feeds/6927412557627528358/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2364923868109514052&amp;postID=6927412557627528358' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6927412557627528358'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2364923868109514052/posts/default/6927412557627528358'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/06/25.html' title='अभिज्ञात की दुनिया में सच के 25 रूप'/><author><name>सुधीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_iOcV-MzZCpk/TEn282bVYwI/AAAAAAAAAGo/UDIuON4TDks/S220/sudhir-raghav.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2364923868109514052.post-7581230171137821414</id><published>2010-06-02T09:32:00.001+05:30</published><updated>2010-06-02T15:16:07.382+05:30</updated><title type='text'>गांव ने पूछा है- फिर कब आओगे?</title><content type='html'>सपना सच तो होता है मगर अपनी कीमत भी वसूलता है। अपने गांव तक भी पक्की सड़क हो यह करीब पैंतीस साल पुराना सपना था, इस सच हुए भी पच्चीस साल से ज्यादा होने को आए। पुराने सपने में एक दृश्य था कि गांव तक सड़क आएगी तो खुशहाली लाएगी। गर्मियों की छुट्टियों में जब हम मम्मी-डैडी के साथ
