लोककल्याण का मार्ग

(सरनाथ के नाथ-2)

लोकगीत को ध्यान से सुनें। खासकर जब महिलाएं गा रही हों। परंपराओं को सहजकर रखने में महिलाएं निपुण हैं। लोककल्याण का रास्ता भी लयबद्ध होता है। सबको अपनी लय ढूंढनी होती है। लोकगीतों में हम लयबद्ध हैं। वहीं हमारी खोई लय मिलती है।

दुनिया को दुखों से मुक्ति दिलाने के लिए राजमहल के सुखों, पत्नी और दुधमुंहे बच्चे को छोड़कर सिद्धार्थ चुपके से निकल गये थे।

यह वह समय था जब जैन धर्म का बोलबाला था। मान्यता थी कि मुक्ति के लिए तप करो। स्वयं को कष्ट दो। सिद्धार्थ ने भी लंबा तप किया। वह भोजन में तिल और चावल ही लेते मगर मुक्ति का मार्ग नहीं मिला। उन्होंने वह भोजन भी त्याग दिया।

वैसे जीव विज्ञान भी मानता है कि व्रत रखने से पिट्युटरी ग्लांड से हार्मोनल स्राव बढ़ता है।

लंबे उपवास के बाद भी लोककल्याण का मार्ग नहीं सूझ रहा था। एक दिन उनके कानों में महिलाओं के गाने की आवाज पडी़ 'वीणा के तारों को न तो इतना ढीला छोडो़ कि उनसे सुर न निकले और न ही इतना कसो कि वह टूट जाए'।

सिद्धार्थ समझ गये कि ईश्वर का यह संदेश उनके लिए ही है। इसके बाद ही गया में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ।

जैन धर्म में वृक्षों का महत्व पहले से था। हर तीर्थंकर के वैराग्य प्रतीक रूप में एक वृक्ष है।

जैनमत के अनुसार कहा जा रहा था कि यह अवसर्पिणी युग है जिसमें अच्छाई कम होती जाती है और बुराई बढ़ती   जाती है। यह भी घोषणा कर दी गयी थी कि 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के निर्वाण के 3 वर्ष 8 माह बाद अवसर्पिणी युग का चौथा चरण दुषमा-सुखम (सुख-दुख) भी खत्म हो जाएगा और पांचवां चरण दुषमा (दुख) शुरू हो जाएगा। पांडवों के निर्वाण के साथ ही हिंदू धर्म में तो पहले ही कलियुग शुरू होने की घोषणा हो चुकी थी।

24 जैन तीर्थंकरों में से 22 महान इक्ष्वाकु वंश से हैं। और दो हरिवंश से। हिंदुओं में भगवान राम इक्ष्वाकु वंश से हैं ।  जैन मान्यता के अनुसार कृष्ण  जो 22वें तीर्थंकर के समकालीन हैं, हरिवंश (यदुवंश) से हैं।

उस निराशा भरे समय में इक्ष्वाकु वंश के ही शाक्य कुल उत्पन्न गौतम ने भगवान बुद्ध बनकर धर्म की ध्वजा संभाली। क्या यह नियति द्वारा तय था? (क्रमश:)

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