सूरज के जगने से पहले

चिड़ियों के
उठने से पहले
सूरज के
जगने से पहले
जगे हुए थे
जितने चेहरे
क्या वे सभी
शिकारी थे
या कुछ दीन
दुखारी थे

दुनिया में जो
दौड़ लगी है
खुद से ही ये
होड़ लगी है
टूटी जिंदगी
जोड़ लगी है
नाव घाट पर
मोड़ लगी है

चंदा और
चकोर के साथी
दिया और
तेल की बाती
भटक रहे थे
जितने साये
क्या वे सभी
शिकारी थे
या कुछ दीन
दुखारी थे

उनकी राह में
उल्लू थे
न ही मनाली
कुल्लू थे
चमगादड़
मंडराते थे
कुत्ते भौंक
डराते थे
भूखे शेर भी
मिलते थे
भूतों से साये
हिलते थे
सूरज जब
उठ जाता था
उनको थाप
सुलाता था
सरहद की
रखवाली में
और खुद ही
जुट जाता था

सूरज के
सोने से पहले
जागे हैं
जितने चेहरे
न वे दीन
दुखारी हैं
न वे निपट
भिखारी हैं
सबके सब
कुशल शिकारी हैं

#सुधीर_राघव

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