इमरजेंसी: अभिव्यक्ति के अधिकार पर चोट

इमरजेंसी अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट थी!

1972 की जनगणना के अनुसार देश की कुल साक्षरता दर महज 30 फीसदी थी। ऐसे में 70 फीसदी के लिए अभिव्यक्ति का साधन लिखना पढ़ना नहीं था। वे ज्यादा से ज्यादा संताने पैदा कर खुद को अभिव्यक्त करते थे। एक जोडे़ के दस दस बच्चे होते थे।

भारतीयों की अभिव्यक्ति की इस आजादी पर इमरजेंसी में कडी़ चोट की गई। दो से ज्यादा बच्चों वाले पुरुषों को जबरन पकड़ पकड़कर उनकी शुक्राणु वाहक नसें बांध दी गईं। महिलाओं की फैलोपियन ट्यूब को भी अॉपरेशन कर बांधा गया।

संतान उत्पन्न करना प्रकृति प्रदत्त अधिकार था। इसलिए यह हर भारतीय की मर्जी थी कि जितनी चाहे संतान पैदा करे। अनपढ़ लोगों के लिए तो यह खुद को अभिव्यक्त करने का एक मात्र तरीका था। सरकार ने उनके अभिव्क्ति के इस अधिकार पर सर्जरी ब्लेड चलवा दिया था।

अत: बहादुर लोग अभिव्यक्ति के अपने अधिकार की रक्षा के लिए जेपी के नेतृत्व में एकजुट होकर लडे़!

वैसे आबादी नियंत्रण का इंदिरा का प्रयोग नया नहीं था। 1970 में चीन एक बच्चा नीति सफलतापूर्वक लागू कर चुका था।

चीन की सफलता का राज यह था कि उसने अपने लोगों को भारीभरकम जुर्माने और कई तरह के नागरिक अधिकार छीनने का भय दिखाया और उन्हें मजबूर किया कि वह एक से ज्यादा बच्चे पैदा न करें।
दूसरी और इंदिरा सरकार ने लोगों को सुविधा दी कि सरकार खुद लोगों के आपरेशन करवायेगी ताकि उनके ज्यादा बच्चे पैदा न हों। लोगों को यह सुविधा रास नहीं आई और उन्होंने विद्रोह कर दिया।

इससे यह भी साबित हुआ कि लोगों को दंड का भय दिखाकर ही उन पर राज किया जा सकता है न कि उन्हें सुविधा देकर।

अभिव्यक्ति की आजादी पर जो संकट आया था उसकी निंदा शादीशुदा ही नहीं कई छडे़ आज भी करते हैं।

अगर अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ अपनी बात कहने की आजादी है तो अभिव्यक्ति को असली संकट आज के समय में है। बस झूठ के सुर में सुर मिलाने की आजादी है। आपने कोई सच कहा तो आपको गालियां सुननी होंगी। अघोषित सेंसरशिप का मीडिया में आज कोई विरोध नहीं है।

इसलिए हमारी अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब होता है सिर्फ बच्चे पैदा करने की आजादी।

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