टांगें बचा के चल

पत्तों को बेशक झाड़ दे
शाखें बचा के चल
यह आंधियों का दौर है
आंखें बचा के चल

उड़ जाने दे आकाश में
परिंदों का काफिला
हर चोंच को दाना मिले
पांखें बचा के चल

गधों की बाजी लग गई
घोडो़ं की दौड़ में
दीन के रस्ते पे भी अब
टांगें बचा के चल

उठना पडे़गा हर सुबह
सजदे के बास्ते
मुर्गे को बेशक लील जा
बांगें बचा के चल
#सुधीर_राघव

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