शब्दों के गाल

सुधीर राघव 


जब शब्दों के गाल
रो रोकर सूज जाते हैं
या खिलखिलाकर फूल जाते हैं
तो कविता हो जाते हैं

कविता नहीं होते
सेल्फी के लिए पाउट बनाते पिचके गाल
पता नहीं क्यों कविता हो जाते हैं
शर्म से लाल और कपोलों पर उचके गाल

आंसूं जब बच्चे के गालों पर
सूख जाते हैं
तो कविता हो जाती है
मां जब चेहरा साफकर
काला टीका लगाती है
तो कविता हो जाती है

प्रेम में डूबे गीत कविता नहीं होते
कविता तब होती है
जब शब्द जिंदा हो जाते हैं
अपने गालों पर प्रेम दिखाते हैं

कोई कवि कविता नहीं कहता
शब्द भावनाओं की सलीब पर चढ़ते हैं
और कविता बनते हैं...
#सुधीर राघव

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