तुम चहको चिड़िया

खेती के नाम पर कीटनाशक रसायनों की आंधी से मची तबाही के बाद बची जैव संपदा को बचाने और बढा़ने के प्रयास आज दुनिया के कुछ हिस्सो में हो रहे हैं।

खासतौर पर पक्षियों और परिंदों को। इन्हें पिछली सदी में डीडीटी की खोज ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इसका इस्तेमाल मलेरिया और टाइफाइड रोकने के लिए किया गया। गंदी जगहों पर इसे छिड़का जाता था। 1945 के बाद तो इसे जनता भी सीधे खरीद सकती। इसके बाद करीब तीन दशक तक अमेरिका में खेतों में इसे कीटनाशक की तरह छिड़का गया।

1962 में रशेल कार्सन ने साइलेंट स्प्रिंग (खामोश बसंत) लिखकर डीडीटी से पर्यावरण के खतरों के बारे में चेताया। परिंदे खत्म हो रहे थे और इंसानों में कैंसर के मामले बढ़ रहे थे।

अमेरिका ने 1972 में इसके खेती में इस्तेमाल पर रोक लगा दी। भारत में इसे प्रतिबंधित करने में और तीस साल लगे।

डीडीटी के फूडचेन में आ जाने से चिडि़यों के एगशेल कमजोर हो गये। चिड़िया के तीन अंडों में से दो होते ही फूट जाते थे। ऐसे मामले भी दिखे जब परिंदों के अंडे बिना एगशेल के थे। भारत में घरेलू चिडि़या की तबाही की वजह इसे ही माना गया।

इसका दूसरा पहलु यह है कि डीडीटी को इस्तेमाल लायक कीटनाशक बताने के लिए  पॉल हरमन मुलर को 1948 में नोबेल पुरस्कार भी दिया गया।

पर्यावरण के लिए हो रहे प्रयासों से एक अच्छी खबर कोलंबियां के जंगल से आ रही है। इस जंगल में पक्षियों की 1920 प्रजातियां हैं। यह धरती पर मौजूद कुल प्रजातियों का 19 फीसदी है। यहां 900 हेक्टेयर जंगल को 2004 में पक्षियों के लिए संरक्षित किया गया था।

दूसरी अच्छी जानकारी यह है कि चंडीगढ़ की 50 किलोमीटर की पेरीफेरी में भी पक्षियों की 416 प्रजातियां देखी जा चुकी हैं।

गेहूं और कपास पट्टी में अंधाधुंध कीटनाशकों के इस्तेमाल ने घरेलु चिडि़या को करीब करीब खत्म कर दिया है। 20 मार्च को वर्ल्ड स्पेरो डे है। अगर इस दिन चिड़िया दिख जाए तो खुद को खुशकिस्मत समझना।

Comments