बाजरे की खिचड़ी ऐसे बनाएं

सुधीर राघव 



बाजरे की खिचड़ी सर्दियों का खास व्यंजन है। मगर अब यह तेजी से लुप्त हो रही है।

इसे बनाना खूब मेहनत का काम है। बुजुर्ग बाजरे की तासीर गर्म बताते हैं। इसलिए रोटी से लेकर तरह तरह के बाजरा व्यंजन कभी सर्दियों में घर घर बनते थे।

हरित क्रांति के साथ वक्त बदला और मोटा अनाज खाना गरीबी और शर्म की बात हो गयी। घर घर और रोज रोज ही गेहूं पकने लगा।

मकर संक्रांति पर बाजरे की खिचड़ी खाने और कच्ची खिचड़ी के दान का महत्व है। खिचड़ी बनाने के लिए बाजरे को कम से कम तीन बार ओखली या कुंडी सोटे में कूटना पड़ता है और फटककर साफ करना होता है। कुटाई की इस प्रक्रिया में ही डेढ से दो घंटे लगते हैं।

 जिस जमाने में बना बनाया पित्जा आधे घंटे में घर पहुंच जाता है, बाजरे की खिचड़ी की फरमाइश करने में घरेलु कलह का जोखिम हो सकता है। अब आंगन में ओखली नहीं होती। जरूरी नहीं कि इमाम दस्ता भी मिल जाए।

कूटने फटकने के बाद बाजरे को चूल्हे पर पहले से खौल रहे पानी में डालकर करीब एक घंटे तक लगातार करछी से चलाना होता है ताकि इसमें गांठे न पडे़ं।

बाजरा तेजी से खदकने लगता है तो आग मंदी कर दी जाती है। करीब एक घंटे बाद इसमें चावल और भीगी चने की दाल व नमक डालकर करीब आधा घंटे और पकाना होता है। जब एक खास सुगंध इससे उठने लगती है तो समझो खिचडी़ पक गयी।

बाजरे की खिचडी़ परोसने का खास पारंपरिक तरीका है। इसे थाली में एक गिलासी घी से गार्निश करें। अगर घी से परहेज है तो दही से खायें। कुछ लोग इसे दूध डालकर खाना भी पसंद करते हैं।

मानव जाति को मजबूत रहना है तो उसे बाजरा खाने कि अपनी आदत को बनाये रखना होगा। विज्ञान कहता है कि   बाजरा और मीलट इंसानी डीएनए की रिपेयरिंग करने का गुण रखते हैं। अगर हम अपने बच्चों को बाजरा खाने की आदत डाल सके तो आने वाली पीढ़ियों में जेनेटिक बीमारियों का खतरा कम कर सकते हैं। ये बीमारियां अब तेजी से बढ़ रही हैं।

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