चीन से निर्वासित गौंगोंग भारत में जीवनदायनी गंगा कैसे बनी

क्या पवित्र नदी को गंगा नाम आर्यों ने दिया या यह चीनी जल देवता गौंगोंग का ही अपभ्रंश है?

सरस्वती ही घग्गर है, ये दोनों नाम दो अलग- अलग संस्कृतियों ने दिये।

 वैदिक काल में इस भूखंड में दो संस्कृतियां थीं इसके काफी प्रमाण वेदों और प्राचीन ग्रंथों में मौजूद हैं। एक संस्कृति वह थी जो लिपी का इस्तेमाल नहीं करती थी और वह सारी जानकारियों को कंठस्थ करती थी। वैदिक ऋचाएं उसके पवित्र गान थे। बाद में कुछ काफिले बाहरी सभ्यताओं के इस क्षेत्र में आए अपनी लिपी के साथ। उन्होंने यहां की -ऋचाओं को अपनी भाषा में लिपीबद्ध किया और अपनी जानकारियों को भी इनमें जोड़ दिया।

उन्होंने यहां की नदियों और अन्य चीजों को अपने नाम दिये और प्राचीन ग्रंथों में भी वही नाम दर्ज किये। जबकि यहां के मूल निवासी नदियों को अपने ही नाम से पुकारते रहे। वे नाम आज भी लोगों के बीच जीवित हैं, जबकि दूसरी संस्कृति द्वारा दिये गये नाम ग्रंथों में बचे रहे। इनमें कुछ ही लोगों ने अपनाए।

ऋग्वेद में सरस्वती की स्तुति कयी जगह है, दूसरी ओर गंगा जिक्र नदी पर्व में जाहन्वी के नाम से आता है। उसमें भी ये संदेश है कि वीरो अब तुम्हें जाहन्वी की ओर चलना चाहिये। वही तुम्हारा असली घर है।

अत: जाहिर है कि ऋचाओं के रघने वाले तब गंगा नहीं पहुंचे थे और उन्होंने उसके बारे में सुना और उस ओर चलने का अपने लोगों का अह्वान किया।

गंगा में अलखनंदा, मंदाकिनी और भागीरथी की धाराएं हैं पर जाहन्वी स्थानीय नाम नहीं है। यह लिखित ऋग्वेद में मिलता है।

अब हम चीनी जल देवता गौंगोंग की बात करते हैं। सरकार यह शोध करवा रही है कि गंगा गोमुख ग्लेशियर से नहीं, बल्कि इसका मूल जल कैलाश मानसरोवर से आता है।
इस चीन क्षेत्र की लोककथाओं में गौंगोंग को तबाही और प्रलय मचाने वाले देवता कहा जाता है, जिसे एक अन्य शक्तिशाली देवता ने हराकर निर्वासित कर दिया था।

यह चीनी लोककथा हमारी भगीरथ कथा की पुष्टी करती है। चीनियों के लिए जो अपार जल राशि तबाही लाती थी भगीरथ ने क्या  गोमुख गुफा बनाकर उसका रुख मैदानों की ओर कर दिया। इससे चीनियो को राहत मिली और उनके लिए प्रलयकारी गौंगोग भारतीयों के लिए जीवनदायनी गंगा हो गयी।  (क्रमश)



Comments