राजनीति की बू

सुधीर राघव 


कवि तुम्हारी कविता से अब
राजनीति की बू आती है
खुदगर्जी की कांव कांव है
न कोयल की कू आती है

कवि तुम्हारी कविता से अब
राजनीति की बू आती है
सारे सुर विलंबित हो गये
सुनो सियार की हू आती है
नफरत के रोज तराने लेकर
कहां से कविता तू आती है
कवि तुम्हारी कविता से अब
राजनीति की बू आती है

Comments