एक क्रांति का अध्ययन - (पत्रकारिता के बदलाव-2)

सुधीर राघव

बीसवीं सदी का आखिरी दशक हिंदी पत्रकारिता का स्वर्ण बिक्री युग लेकर आया।

देश के सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबारों में हिंदी का बर्चस्व तेजी से बढा़। अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषायी अखबार  सिमटते और पिछड़ते गये। हिंदी बाजार पर छाने लगी।

हर युग के विरोधाभाष होते हैं। और ये शोध का विषय होते हैं।

पत्रकारिता के कबीर (मसि कागद और कागद कारे) प्रभाष जोशी की छत्रछाया में एक दशक पहले तेजी से उदय हुआ जनसत्ता इस स्वर्ण बिक्री युग में प्रसार करने में विफल रहा।

इसकी बहुत सी वजह संस्थान से जुड़े लोग गिनाते रहे हैं और गिनाई भी जा सकती हैं। मगर हिंदी पत्रकारिता का हर छात्र इसका अध्ययन युग परिवर्तन के लक्षणों के संदर्भ में अवश्य करेगा। उसे करना भी चाहिए।

हर युग के अपने लक्षण होते हैं। जब नये लक्षण पुराने लक्षणों को हटाकर उनकी जगह लेते हैं तो युग बदलते हैं।

बदलाव एक सतत और धीमी प्रक्रिया हैं मगर जब ये बहुत तेजी से होते हैं तो क्रांति कहलाते हैं।

बीसवीं सदी के आखिरी दशक में हिंदी पत्रकारिता में जो बडे़ बदलाव हुये, क्या वे किसी क्रांति का सूत्रपात थे?

हम उनका अध्ययन करेंगे। गुरु क्रांति करें तो शिष्यों का कर्त्तव्य है कि वे उनका अध्ययन जरूर करें। निस्संदेह अनुसरण  न करें, क्योंकि हर नया युग सिर्फ नये लक्षणों का इंतजार करता है। (क्रमश:)

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