मंदिर के मदारी

जो जिन्ना को जूता तक न मार सका, उसने गांधी जी को गोली मार दी। असल में वह देश के बंटवारे से नहीं अंग्रेजों को भगा देने से दुखी था।

देश के बंटवारे का मुख्य सूत्रधार जिन्ना और उनकी मु.ली. (मुसलिम लीग) थी। 1937 में अंग्रेज हिंदू महासभा में भी अपने दलाल घुसाने में सफल रहे थे। ये दलाल अलगाववाद को बढा़ने के लिए मुली के सामानांतर काम करने लगे। ये दलाल अंग्रेजों की कठपुतली जिन्ना के खिलाफ नहीं बल्कि अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे भारतीय नायकों के खिलाफ जहर उगलते थे।

अंग्रेजों को भगा दिए जाने के बाद ये दलाल अनाथ हो गये थे। बहुत दुखी थे। इसलिए इनका सारा गुस्सा गांधी जी के खिलाफ था।

अंग्रेजों के उन दलालों की संतानों में भी गांधी जी के खिलाफ गुस्सा आज तक दिखता। वे गांधी जी के हत्यारे का मंदिर बनाकर उसे पूजते हैं। ब्रिटिश झंडे के लाल रंग में हल्दी मिलाकर एक नया रंग बनाकर उस रंग का कपडा़ सिर पर बांधते हैं। इस तरह आज भी अंग्रेजों की बफादारी निभाते हुए समाज में फूट डालते हैं।

ये लोग जिन्ना की समाधी पर जाकर शीश झुकाते हैं। लाहौर जाकर पाकिस्तानियों के पांव छूते हैं। इनकी सारी नफरत अंग्रेजों को भागने के लिए विवश करने वाले गांधी जी के खिलाफ है।

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