शुंभ निशुंभ का मुक्ति मंत्र

शुंभ निशुंभ ने देव मुक्त भारत का नारा दिया था। इस नारे से उत्साहित सभी राक्षसों ने देवताओं को कई लडा़इयों में हराया।

रावण और जालंधर भी तीनों लोकों को देवताओं से मुक्त कराना चाहते थे।

सभी राक्षस असहिष्णु होते हैं। वह  दूसरों की स्वतंत्रता और प्रेम जैसे विचारों को सहन नहीं करते। वे हर ओर अपना ही शासन चाहते हैं। सभी राक्षस तानाशाह होते हैं। उनकी तानाशाही ही उन्हें पहले पहल लोकप्रिय बनाती है। क्योंकि हम सब में भी एक तानाशाह छुपा होता है । सुधार के नाम पर भी राक्षस जनता पर तरह तरह के अत्याचार करते हैं। बंदिशे थोपते हैं।

दूसरी और देवता उदार होते हैं। वे सुख और सुविधाएं बढा़ने पर जोर देते हैं। दान और वरदान के रूप में गरीब जनता को कई तरह की सब्सिडी देकर मदद करते हैं। गरीबों को जीवन यापन में मदद करते हैं।

इसी तरह नारायण राक्षसों को मुक्ति देकर भी अपना धाम देते हैं। वह किसी भी युग में राक्षस मुक्त जगत का नारा नहीं देते। बल्कि वे राक्षसों के त्याग और प्रयासों की भी सराहना करते हैं।

नारायण सहिष्णु होने से ही विष्णु हैं। वह राम के अवतार में रावण को अपना धाम देकर भी लंका को राक्षसराज मुक्त नहीं करते। बल्कि राक्षस कुल के विभीषण को ही राजा बनाते हैं।

नारायण की तरह गांधी भी कहते हैं पाप से नफरत करो पापी से नहीं।

असल में दूसरों की आजादी का सम्मान ही अपनी आजादी का सम्मान है। राक्षस यह नहीं समझ पाते। इसलिए तमाम तरह का बल और वरदान पाकर भी वे अपना शासन लंबे समय तक कायम नहीं रख पाते।

क्योंकि सत्ता पाते ही वे पहला नारा लगाते हैं देव मुक्त भारत।

Comments

Popular posts from this blog

चौकीदार का स्विस एकाउंट

जब जब धर्म को ग्लानि होती है, मैं उसका उत्थान करने स्वयं आता हूं : ईश्वर

कहत कत परदेसी की बात- प्रसंग पहेली का हल